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Wednesday, August 20, 2008

भारत के माओवादी भी चुनाव लड़ें

आलोक प्रकाश पुतुल
झापा, नेपाल से लौटकर
नेपाल की सीमा में घुसते ही मेचीनगर में जब हमारा ड्राइवर कस्टम की औपचारिकता निभा रहा था तो मैंने वहीं चहलकदमी कर रहे नेपाल पुलिस के जवान से आहिस्ता से पूछा-“कल तक जिन माओवादियों को आप लोग चुन-चुन कर मारते थे, अब उनकी सरकार बन रही है. क्या सोचते हैं ? ”उसने पहले तो अजीब-सा चेहरा बनाया फिर हंसते हुए कहा-“अब उनको शलामी करेंगे.”
लेकिन इस एक वाक्य के जवाब को हमारे गोरखा ड्राइवर ने यात्रा के दौरान बाद में पूरा किया, जब मैंने उससे भी यही सवाल पूछा कि यहां कि पुलिस क्या करेगी ? उसने मुस्कुराते हुए कहा “ इंडिया में भी तो डाकू लोग, गुंडा लोग पार्लियामेंट में मेंबर बन जाता है। उनका तो कोई आईडोलॉजी भी नहीं होता।”मुझे लगा कि सवाल पूछने में अब थोड़ी सावधानी बरतनी होगी.हम नेपाल के झापा जिले में थे. झापा यानी माओवादियों का इलाका. हाल के चुनाव में नेकपा माओवादी के विश्वदिप लिङदेन लिम्बु, धर्म प्रसाद धिमिरे और गौरी शकर खडका इस इलाके से चुनाव जीत कर काठमांडू पहुंचे हैं.
माओवादी गांव शांतिनगर
घने जंगलों वाले इलाकों से होते हुए सड़क किनारे एक स्कूल का बोर्ड देख कर हमने गाड़ी रुकवाई. लिटिल ऑक्सफोर्ड इंग्लिश स्कूल. पड़ोस के सोनसरी जिले से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद अपने गांव शांतिनगर लौटे दीपेंद्र प्रधान 160 बच्चों वाला यह बोर्डिंग स्कूल चलाते हैं.उनके छोटे से कार्यालय की दीवार पर नेपाल नरेश स्व. वीरेंद्र विक्रम शाह और उनकी पत्नी की एक उखड़ी हुई तस्वीर टंगी हुई है. नेपाल में अब माओवादी सरकार को लेकर दीपेंद्र प्रधान मुस्कराते हुए कहते हैं- “ मैं सोचता हूं कि हमारे देश को इसकी आवश्यकता थी, इसलिए ऐसा हुआ.इसके पीछे सबसे बड़ा कारण भ्रष्टाचार है”
दीपेंद्र बताते हैं- “ हमारे गांव में कभी कोई नहीं आता था, कोई पुलिस वाला नहीं। आप जिस रास्ते से आए हैं, वो हाईवे है लेकिन अगर य़हां कोई मर भी जाता, अगर कोई किसी को शूट भी कर दे तो यहां कोई नहीं आता था न सेना, न पुलिस. ये हालत इलेक्शन से दो साल पहले तक थी. नेपाली जनता को लगा कि इतने साल तक सबको अपना समझ के वोट दिय़ा तो एक बार माओवादियों को ट्राई करने में क्या हर्ज है. इसलिए जनता ने माओवादियों को वोट दिया. मैंने भी माओवादियों को वोट दिया.मुझे उम्मीद है कि वे कुछ करेंगे. अगर ये इसमें असफल रहे तो दो साल बाद फिर चुनाव होगा.”वे बताते हैं कि किस तरह माओवादियों ने उनके गांव में नहर लाई और किस तरह माओवादियों के कारण इलाके में चोरी की घटनाएं खत्म हो गईं. दीपेंद्र के पास माओवादियों के पक्ष में कई बाते हैं.लेकिन तीन महीने पहले दुलाबाड़ी से ब्याह कर शांतिनगर में आने वाली गांव की एक बहु ने इस बार चुनाव में भाग नहीं लिया. जिंस-टॉप पहने हुए इस बहु ने हाथों को घुमाते हुए पूछा- “किसी के जीतने से क्या होता है ? जो जीतता है, वो तो राजगद्दी में बैठता है. वो थोड़ी हमसे चावल-दाल के बारे में पूछता है.”
बेरोजगारी
शांतिनगर गांव में दूर-दूर तक धूसर वीरान जमीन नजर आती है. कहीं-कहीं कुछ पेड़ नजर आते हैं, थोड़े से नारियल के थोड़े कुछ और पेड़. कुछ नौजवान एक कच्चे घर के बरामदे में लुडो खेल रहे हैं. घर और पड़ोस की कुछ बुजुर्ग महिलाएं भी वहीं खेल देख रही हैं. हमारे वहां बैठते और दुआ सलाम करते भीड़ इकट्ठी होने लगती है. गांव के लोगों से बात करें तो सबके मन में राजा औऱ पुरानी सरकार के प्रति एक आक्रोश साफ नजर आता है. राजा के लिए गांव के एक नौजवान कहते हैं-उसका घड़ा भर चुका था.गांव में अधिकांश लोगों के पास खेती के लिए जमीन नहीं है. जो खेत हैं, वे सरकार के हैं. सरकार के कब्जे वाले. खेती की संभावना भी नहीं है क्योंकि सिंचाई के साधन नहीं हैं. गांव वालों की मानें तो गांव के 90 फिसदी घर गिरवी हैं, साहूकार के पास. गांव के हर घर से कोई न कोई नौजवान काम करने के लिए दूसरे देश में है. अधिकांश भारत में. कागज पत्तर बनवाने औऱ रोजगार के लिए एजेंट को एक लाख दस हजार नेपाली रुपए देने पड़ते हैं. भारतीय़ मुद्रा में कोई 70 हजार.भीड़ में से एक नौजवान कहते हैं- “ हमारे यहां की सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी है. हमारे लोग बाम्बे से बिहार तक काम की तलाश में जाते हैं लेकिन अभी तो प्रचंड जी का सरकार बना है, अभी तो उनसे उम्मीद करने ठीक नहीं है लेकिन हमें विश्वास है कि वे हमारी समस्याओं को दूर करेंगे.”लेकिन माओवादियों के बारे में तो कहा जाता है कि वे उग्रवादी हैं, आतंक फैलाते हैं ? उनसे कैसी उम्मीद ?“ ये सब गलत इश्यू बनाए गए हैं. हम भी माओवादी हैं.” एक नौजवान आत्मविश्वास के साथ भीड़ में खड़े औऱ बैठे लोगों की ओर इशारा करते हुए कहते हैं- “ये भी माओवादी है, वो भी माओवादी है, हम सब माओवादी है. ये जनता ही माओवादी है.”
हम सब माओवादी है.
वे बताते हैं कि गांव के सभी लोगों ने माओवादियों को ही वोट भी दिया. भीड़ में कुछ पुरुष-स्त्री स्वर उभरते हैं- “ हम भी माओवादी...माओवादी...!”आतंकवादी मत कहिए
भीड़ में शामिल एक प्रौढ़ कहते हैं- “हम लोगों ने बहुत आशा के साथ माओवादियों को चुना है. हमने नेपाली कांग्रेस को देखा, नेकपा को देखा, राजी की पार्टी को भी देखा. लेकिन किसी ने हमारा दुख नहीं समझा. हमें गांव में रोजगार चाहिए. हम अपने दुख-दर्द को लेकर बाहर जाते हैं. हम भी अपने मां-पिता के साथ रहना चाहते हैं, अपने बच्चों के साथ रहना चाहते हैं.”गांव के कमल भंडारी कहते हैं- “ वो आतंकवादी इसलिए कहे जाते हैं, क्योंकि वे सरकार से जीत गए हैं. गरीब आदमी के पास घास नहीं है, कपास नहीं है. कल कारखाना नहीं है. सरकार के पास तो सब कुछ है लेकिन हम लोगों को देता नहीं है. माओवादी सब ठीक करेंगे .”
गांव में दुकान चलाने वाले बुजर्ग अभिकेसर मानते हैं कि माओवादियों ने चुनाव में आ कर अपनी ताकत दिखा दी है. उन्हें इस बात से बहुत दुख होता जब कोई माओवादियों को आतंकवादी कहता है. अमरीका से खासे नाराज अभिकेसर के अनुसार माओवादी जनता के साथ हैं और वे जनता की लड़ाई लड़ रहे हैं. ऐसे में जनता को कोई आतंकवादी कहे, यह उन्हें अच्छा नहीं लगता. देश-दुनिया की खबरों से वाकिफ अभिकेसर कहते हैं- “ भारत में जिस तरह आज माओवादी आंदोलन चल रहा है, एक समय नेपाल में भी ऐसा ही था. जिस तरह से यहां के माओवादियों ने हथियार छोड़ कर, जनता को साथ लेकर पार्लियामेंट में गए, वहां के माओवादी भी ऐसा ही करें, आपके साथ कितनी जनता है, ये दिखा दें. अगर जनता आपके साथ है तो वहां भी नेपाल जैसा ही होगा न ? अगर जनता आपके साथ है तो क्यों डरते हैं.” अभिकेसर ठहाके लगाते हुए कहते हैं- “ अगर जनता आपके साथ नहीं है तो फिर छोड़िए.”
www.raviwar.com से साभार

Thursday, August 7, 2008

जीवित रहेगा नक्सलवाद

महाश्वेता देवी
लेखिका व सामाजिक चिंतक
नक्सलवाद की प्रासंगिकता और इसके प्रति जन रूझानों में कोई कमी नहीं आई है। लगता है, 70 के दशक से कहीं अधिक इसकी जरूरत आज है। विगत 10–15 सालों में भूखे, गरीबों की संख्या में लगातार इजाफा हुआ है। राजनीतिक–आर्थिक तंत्र पूरी तरह अमीरों के हवाले हैं। यह आंदोलन और आगे बढ़ेगा, क्योंकि वर्तमान व्यवस्था में बहुसंख्यक लोग हाशिये पर खड़े हैं और उनका तीमारदार कोई नहीं है। सरकार भी मान रही है कि नक्सलवाद का प्रसार लगातार बढ़ रहा है और अभी यह देश के एक-तिहाई से अधिक क्षेत्रों में अपनी जड़ें जमा चुका है, लेकिन सरकार नक्सलवाद को लेकर हमेशा यह दुविधा पालती रही है कि इसे कानून-व्यवस्था की समस्या माना जाए या सामाजिक–आर्थिक समस्या। समस्या यह है कि सरकार नक्सलियों के दमन की नीति पर चलती रही और उन समस्याओं पर बिल्कुल गौर नहीं किया, जिनके आलोक में नक्सलवाद का उदय हुआ था।
नक्सलवाद लोगों के दिलों में इसलिए जगह बनाए हुए है, क्योंकि इसके आंदोलनकर्मियों का अपना कोई हित नहीं होता। उन्हें न तो सत्ता चाहिए और न वोट। वे वैचारिक लड़ाई लड़ने वाले आत्म-त्यागी लोग हैं। उनमें गजब का साहस है। उनके बलिदानी व्यक्तित्व में मुझे आदर्श नजर आता है। उनका आंदोलन ईमानदार, आकर्षक व अच्छे उद्देश्यों के लिए है। यही कारण है कि मेरी लेखनी में भी यह प्रमुखता से मौजूद है। फिर आपको यह समझना होगा कि उल्फा, बोडो, एनएससीएन की तरह यह कोई पृथकतावादी आंदोलन नहीं है। फिर नक्सली संगठनों को स्थानीय स्तर पर समर्थन भी पृथकतावादी संगठनों से काफी अधिक प्राप्त है। नक्सलवाद की जड़ें इसलिए भी मौजूद हैं कि नक्सल संगठनों ने बिल्कुल निचले स्तर से अपनी जड़ें जमानी शुरू कीं। जैसे छत्तीसगढ़ में सबसे पहले आदिवासियों को बिचौलियों और तेंदू पत्ता के ठेकेदारों के खिलाफ एकजुट किया गया। जमीनी स्तर पर यह आंदोलन शुरू हुआ, इसलिए सरकार के लिए आज यह एक बड़ी चुनौती बन गई। राज्य व्यवस्था के अपराधीकरण और पंगु होने का नतीजा ही है कि नक्सलवाद का प्रसार तेजी से हो रहा है।
जिन मुद्दों पर यह आंदोलन शुरू हुआ था, वे आज भी मौजूद हैं इसलिए कोई कारण नहीं कि इस आंदोलन की जड़ें कमजोर हो जाएं। आज देश में 56 नक्सल गुट मौजूद हैं और इनके प्रभाव में देश की एक-तिहाई भूमि है। मैं समझती हूं कि इसके अधिकार क्षेत्र में और बढ़ोत्तरी होगी, क्योंकि समाज से असंतोष और विक्षोभ का नाश नहीं हुआ है। लाखों लोग भूखे, पीड़ित, शोषित और अपने मौलिक अधिकारों से भी वंचित हैं, ऐसे में नक्सलवाद का खात्मा कैसे होगा? अर्थव्यवस्था का जब तक असंतुलित विकास होगा, दबे-कुचले लोग व्यवस्था के प्रतिरोध में हथियार उठाएंगे ही। यह स्थिति सर्वकालिक व सर्वदेशीय होगी।
प्रस्तुति- आशुतोष प्रताप सिंह
www.rashtriyasahara.com से साभार

लालू से बेहाल लाल

सुरेन्द्र किशोर
वरिष्ठ पत्रकार
बिहार–झारखंड में वाम दल, खासकर भाकपा–माकपा पहले ही कमजोर हो चुके थे। अब राजद जैसे मजबूत दल का सहारा छिन जाने के बाद तो इन दो राज्यों में उनका चुनावी भविष्य और भी अनिश्चित हो गया है। पूरे हिंदी इलाके में से सिर्फ झारखंड से सीपीआई के एक प्रतिनिधि मौजूदा लोकसभा में हैं। जबकि सन् 1991 के चुनाव में सीपीआई के अविभाजित बिहार से लोकसभा के लिए आठ सदस्य चुने गए थे। ऐसा लालू प्रसाद के जनता दल के साथ सीपीआई के चुनावी तालमेल के कारण ही संभव हो सका था। विधायिकाओं में वाम दलों की ताकत, राजद के साथ तालमेल पर निर्भर रहने लगा है। साथ ही खुद राजद की बढ़ती– घटती राजनीतिक ताकत का असर भी वामपंथियों पर पडा़ है। अब तो फिलहाल कोई तालमेल है ही नहीं। लोकसभा में हाल के विश्वास मत प्रकरण के बाद तो वाम दल राजद से कट गए हैं।
बिहार विधानसभा में इन दिनों सीपीआई के तीन और सीपीएम के एक सदस्य हैं। झारखंड विधानसभा में तो इन दलों का कोई प्रतिनिधित्व ही नहीं है जबकि सत्तर के दशक में सीपीआई को एक समय अविभाजित बिहार विधानसभा में मुख्य प्रतिपक्षी दल का दर्जा हासिल था। तब सीपीआई राज्य की मुख्यधारा की पार्टी मानी जाती थी।अब वह हाशिए पर है यानी यदि विधायिका में ताकत का ध्यान रखें तो भाकपा बिहार में बसपा से भी छोटी पार्टी बन चुकी है।
वाम दल से राजद का साथ हालांकि गत चुनाव में ही छूट गया था। पर अगले लोकसभा चुनाव में एक बार फिर से साठगांठ की संभावना बन सकती थी। हाल में परमाणु करार के मुद्दे पर केंद्र सरकार से समर्थन वापस लेकर वाम दलों ने बिहार में ऐसी किसी संभावना को भी समाप्त कर दिया है। यदि कोई चमत्कार हुआ और भाजपा विरोध को आधार बना कर एक बार फिर राजद–वाम मिल कर चुनाव लड़ने को तैयार हो जाएं तो यहां वाम की स्थिति सुधरने की स्थिति बन सकती है। वैसे स्थिति सुधरेगी हीयह दावे के साथ अभी नहीं कहा जा सकता है।मंडल विवाद के बाद 1991 में हुए लोकसभा चुनाव में बिहार में सीपीआई को जो आठ सीटें मिलीं, वे उसकी वास्तविक ताकत का प्रतिनिधित्व नहीं करती थीं। उसके बाद लालू प्रसाद के जनता दल और बाद में राजद से चुनावी तालमेल व राजनीतिक साठगांठ का अंतत: कम्युनिस्ट दलों को नुकसान ही हुआ। वाम के लिए लालू प्रसाद का यह ‘धृतराष्ट्र आलिंगन’ साबित हुआ।
नब्बे के दशक में आरक्षण को लेकर मंडल समर्थन–मंडल विरोध के आधार पर तब लगभग पूरा बिहार दो खेमों में बंट गया था।उन दिनों सीपीआई–सीपीएम के बीच के अनेक मंडल समर्थक तत्व व उनके समर्थक लालू प्रसाद के साथ चले गए और मंडल विरोधी लोग कांग्रेस व भाजपा के समर्थक बन गए। बिहार के एक प्रमुख सीपीआई नेता राज कुमार पूर्वे ने, जो कई बार विधायक रहे, अपनी किताब ‘स्मृति शेष’ में लिखा कि ‘सिर्फ जनता दल को ही नहीं ,बल्कि कांग्रेस व भाजपा को भी हमने (यानी भाकपा ने) अपने जनाधार में जातीय उन्माद फैलाने का मौका दिया। कठिन संघर्ष से बने हमारे जनाधार का बडा़ हिस्सा जातीय उन्माद का शिकार हो गया। हमारी पार्टी यूनिट भी इस आधार पर बंट गई। जिन लोगों ने कम्युनिस्ट पार्टी छोड़ी, उन लोगों ने यह अनुभव किया कि उनका पुराना दल उनके हितों की रक्षा नहीं कर सकता। हां,कुछ लोगों ने जरूर क्षणिक स्वार्थवश पार्टी छोड़ी।’ पूर्वे की ये कुछ पंक्तियां भाकपा की मौजूदा हालत को बखूबी बयान कर देती हैं।
कम्युनिस्ट पार्टियों ने लालू प्रसाद की सरकार के समक्ष इतनी नरमी दिखाई कि इनके काडर उदास हो चले। गरीबों की समस्याओं को लेकर शासन से लड़ने और जरूरत पड़ने पर जेल जाने की आदत ही अब वाम दलों में नहीं रही। यह सब सांप्रदायिक दल यानी भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के नाम पर होता रहा। हालांकि यह आरोप भी है कि नेतृत्व का बडा़ हिस्सा सुविधापरस्त हो गया। ऐसी रणनीति अपनाने के कारण बिहार में वाम दल न सिर्फ कथित सांप्रदायिक दल को सत्ता में आने से रोक सके ,बल्कि लगता है कि उनकी अपनी ताकत भी अब ऐसी नहीं रही कि कभी वे भविष्य में उठ कर खडा़ भी हो सकते हैं।
उधर,चुनाव लड़ने वाले वाम दलों से भी टूट कर अनेक लोग नक्सली आंदोलनमें गए। विनोद मिश्र के नेतृत्व वाला नक्सली संगठन कभी बिहार का सबसे बडा़ व प्रामाणिक नक्सली संगठन माना जाता था। पर उसने जब से चुनाव लड़ना शुरू किया है, तब से उसका भी विकास रूक सा गया है। अब कम्युनिस्ट आंदोलन के नाम पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माआ॓वादी) ही बिहार झारखंड में ताकतवर होते जा रहे हैं। इस तरह कुल मिलाकर देखा जाए तो कम्युनिस्ट ताकत बिहार झारखंड में बढ़ी है। पर उसका बडा़ हिस्सा भूमिगत है और हथियार के बल पर सत्ता हासिल करना चाहता है। पता नहीं कि वे कभी सफल होंगे या नहीं, पर एक बात तय है कि चुनाव लड़ने वाली कम्युनिस्ट पार्टियां बिहार –झारखंड की राजनीति को निर्णायक ढंग से आने वाले दिनों में प्रभावित नहीं कर पाएंगी। इस सिलसिले में एक आंकडा़ महत्वपूर्ण है। 1998 के लोक सभा चुनाव में सीपीआई को अविभाजित बिहार में मात्र 3।40 प्रतिशत मत मिले थे। यह मत 1999 में घटकर 2।70 रह गया। कभी बिहार में सीपीआई को अपने बल पर करीब 7 प्रतिशत मत मिलते।
नवम्बर 2005 में हुए बिहार विधान सभा के चुनाव में सीपीआई को 2।09 प्रतिशत और सीपीएम को 0.68 प्रतिशत मत मिले। इनसे अधिक वोट तो बिहार में बसपा को मिले। बसपा को सन् 2005 में 4.17 प्रतिशत और सपा को 2.52 प्रतिशत मत मिले। बसपा का सघन क्षेत्र उत्तर प्रदेश सटा हुआ बिहार का इलाका है। वहां वाम दलों को बसपा से तालमेल का कुछ लाभ मिल सकता है।
www.rashtriyasahara.com से साभार

कल का वाम

राजेन्द्र शर्मा
राजनीतिक विश्लेषक
वामपंथ ने जब से यूपीए सरकार से अपना समर्थन वापस लिया है और खासतौर पर मनमोहन सिंह की सरकार ने जब से वामपंथ के बिना ही लोकसभा में अपना बहुमत साबित किया है, उसके बाद से ही वामपंथ के लिए जोर-जोर से शोक गीत पढ़े जाने की शुरूआत हो गयी है। एक आ॓र यूपीए सरकार को उकसाया जा रहा है कि वामपंथ के अंकुश से बरी होने के बाद, निर्द्वन्द्व होकर नव-उदारवादी रास्ते पर सरपट दौड़ चले। दूसरी आ॓र वामपंथ को समझाया जा रहा है कि इस विफलता से सबक ले कि आर्थिक नीतियों से लेकर विदेश नीति तक, विभिन्न क्षेत्रों में नव-उदारवादी नीतियों का विरोध करेगा तो घाटे में रहेगा। इन दोनों ही फतवों में एक बात समान है। ये फतवे देने वाले यह भूल जाते हैं कि यह झगडा़ सिर्फ वामपंथ बनाम अन्य का आपसी मामला नहीं है। इसमें इस देश की जनता का भी दखल है बल्कि अंतत: तो उसी को फैसला करना है। जनता की यह सत्ता ही वामपंथ के शोक गीत पढ़ने वालों को गलत साबित करते हुए आने वाले दिनों में वामपंथ की बढ़ती प्रासंगिकता साबित करने जा रही है।


इसके दो बहुत ही सीधे सरल से कारण हैं, जो परस्पर जुड़े हुए हैं। पहला, शासक हलकों के स्तर पर नव-उदारवादी नीतियों पर जितनी सर्वानुमति दिखाई देती है, जनता के स्तर पर इन नीतियों का उतना ही विरोध है। बेशक, जनता के इस विरोध को दबाने, छुपाने, भटकाने की तमाम कोशिशें लगातार जारी रही हैं और इन कोशिशों को कुछ न कुछ कामयाबी भी मिली है। इसके बावजूद इन नीतियों और आम आदमी के बीच खाई ज्यादा से ज्यादा चौड़ी ही होती जा रही है। इसी का नतीजा है कि न सिर्फ सत्ता में रहने वाले का आम चुनाव में सत्ता से हटाया जाना एक नियम ही बन गया है बल्कि श्रीमती गांधी की हत्या की पृष्ठभूमि में हुए 1984 के असामान्य चुनावों के बाद से किसी भी आम चुनाव में जनता ने किसी एक पार्टी को तो दूर, किसी चुनाव-पूर्व गठबंधन को भी पूर्ण-बहुमत नहीं दिया है। उल्टे इन नव-उदारवादी नीतियों के मुख्य प्रतिनिधि के रूप में कांग्रेस और भाजपा जैसी पार्टियों से जनता इस कदर विमुख हो चुकी है कि आज ये पार्टियां मिलकर भी संसद की आधी सीटों तक भी मुश्किल से ही पहुंच पाती हैं। जिसे आज राजनीति में गठबंधन युग कहा जाने लगा है, आम जनता और प्रमुख सत्ताधारी पार्टियों की इसी विमुखता की सचाई का दूसरा नाम है।

इस राजनीतिक संकट से उबरने की कोशिश में सत्ता की राजनीति की एक धारा ने सांप्रदायिक धु्रवीकरण का सहारा लेने का रास्ता पकडा़ है। तत्काल इसकी काट के लिए वामपंथ, उस मध्यमार्गी राजनीति को सहारा देकर खडा़ करने की कोशिश कर रहा है, जिसके झंडे नव-उदारवाद की आंधी में मुख्य-सत्ताधारी पार्टियों ने नव्बे के दशक के शुरू में ही गिरा दिए थे। 2004 के चुनाव में भाजपा के नेतृत्व में एनडीए के इंडिया शाइनिंग के नारे के बुरी तरह से पिटने के बाद सरकार के गठन के लिए कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन को बाहर से समर्थन देने के जरिए वामपंथ, मध्यमार्गी राजनीति का ही पुनराविष्कार करने की कोशिश कर रहा था। इसीलिए यह समर्थन एक सीमित किंतु जनहितकारी साझा न्यूनतम कार्यक्रम के आधार पर दिया गया था ताकि वामपंथ के दबाव के सहारे सरकार को मध्यमार्ग पर रखा जा सके। असली मुद्दा यह नहीं है कि यह कोशिश सफल हुई या विफल रही या इस कोशिश को तो विफल होना ही था। असली मुद्दा मौजूदा हालात में ऐसी कोशिश के जरूरी होने का है।

जाहिर है कि नव-उदारवादी रास्ते की अपनी वफादारी के लिए कांग्रेस के नेतृत्व ने एक अपेक्षाकृत संतुलित रास्ता निकालने की इस कोशिश को विफल कर दिया है। लेकिन इससे जनता के पक्ष में संतुलित ऐसे रास्ते की जरूरत खत्म नहीं होती है बल्कि और बढ़ जाती है। वामपंथ की तीसरा मोर्चा या विकल्प खडा़ करने की कोशिश, इसी जरूरत से जुड़ा है। बेशक यह विकल्प न तो आसानी से खडा़ हो पाएगा और न ही इसका कोई बना-बनाया सांचा पहले से मौजूद है। एक-डेढ़ दशक पहले कौन कह सकता था कि वामपंथ, बाहर से ही सही समर्थन देकर कांग्रेस के नेतृत्ववाली सरकार चार साल से ज्यादा चलवाएगा। वैसे यह भी कौन कह सकता था कि भारत में कथित आर्थिक सुधारों के सूत्रकार मनमोहन सिंह की सरकार पर चार बरस तक अनेक मामलों में जनता के हितों का अंकुश लगाए रखा जा सकेगा।

अचरज नहीं कि इन्हीं जटिलताओं के बीच, खुद वामपंथ की समझ तथा लक्ष्य की एकता की सीमाएं भी सामने आती हैं। ये जटिलताएं इस तथ्य से और भी बढ़ जाती हैं कि देश के तीन राज्यों में अपेक्षाकृत लंबी अवधि से जो वामपंथी राज्य सरकारें कायम हैं, उनके ऊपर अखिल भारतीय स्तर पर शासकों द्वारा अपनायी गयी नव-उदारवादी नीतियों का विरोध करने के साथ-साथ, देश के पैमाने पर लागू की जा रही इन नीतियों के ही दायरे में अपने -अपने राज्य में मेहनतकश जनता को राहत दिलाने की जिम्मेदारी भी है। इसी संदर्भ में वामपंथी नेतृत्व वाली सरकारों और खासतौर पर प। बंगाल की वाम मोर्चा सरकार के उघोगीकरण के कुछ कदमों को लेकर नव-उदारवादी नीतियों के वामपंथ के विरोध की ही साख बिगाड़ने की कोशिश की गयी है। किसी खास कदम के सही-गलत, जरूरी-गैरजरूरी होने से अलग इस तरह के प्रचार का मकसद देश भर में ठीक उन्हीं नीतियों का रास्ता निरापद करने की कोशिश करना है, जिनकी आलोचना का स्वांग किया जा रहा होता है।

बेशक, वामपंथ की अपनी सीमाएं भी हैं। जाहिर है कि उसकी सबसे बड़ी सीमा तो देश के पैमाने पर उसका सीमित आधार ही है। वामपंथ उस आम राजनीतिक-सामाजिक वातावरण के प्रभावों से भी पूरी तरह से बरी होने का दावा नहीं कर सकता है, जिसके बीच तथा एक अल्पसंख्यक उपस्थिति के रूप में उसे काम करना पड़ रहा है। सोमनाथ चटर्जी प्रकरण इसका ताजा गवाह है। फिर भी आज के दौर में जब शासकों और शासितों के बीच की दूरी अनुल्लंघनीय रूप से बढ़ती जा रही है, आम शासितों के हितों को अपना प्रस्थानबिंदु बनाने वाले वामपंथ की जरूरत बढ़ने ही जा रही है और उसकी संभावनाओं का भी बढ़ना तय है। हां, अंत में एक वैधानिक चेतावनी और खासतौर पर वामपंथ के आधार की सीमाओं के चलते, बहुत सी जगहों पर शासकों व शासितों के बीच की खाई, हिंसक विस्फोटों का भी रूप ले सकती है।