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Tuesday, July 13, 2010

मर गया देश, अरे, जीवित रह गये तुम !

(साथी अजय प्रकाश ने अपने ब्लॉग जनज्वार पर साहित्य और संस्कृति की समकालीन अवसरवादिता, वैचारिक दोगलापन और ठकुरसुहाती को लक्ष्य कर एक अत्यंत ज़रूरी बहस छेड़ी है . उनका यह प्रयास स्तुत्य है और उनके समर्थन में जुटते हुए मैं इस पूरी बहस को यहाँ रख रहा हूँ. साथ ही इस प्रकरण पर लोगों ने जो  प्रतिक्रियाएं दी हैं उन्हें भी प्रस्तुत किया जा रहा है -राजेश चन्द्र .)
हत्यारों की गवाहियां अभी बाकी हैं राजेंद्र बाबू?
अजय प्रकाश

देश के मध्य हिस्से में माओवादियों और सरकार के बीच चल रहे संघर्ष का शीर्षक रखने में, राजेंद्र बाबू उतना भी साहस नहीं दिखा पाये जितना कि शरीर के मध्य हिस्से के छिद्रान्वेषण पर वे लगातार दिखाते रहे हैं।


इसे सनसनी माने या सच, मगर कार्यक्रम तय है कि इस बार साहित्यिक पत्रिका ‘हंस’ के सालाना जलसे में लेखिका अरुंधति राय और सलवा जुडूम अभियान के मुखिया छत्तीसगढ़ के डीजीपी विश्वरंजन आमने-सामने होंगे। यह जानकारी सबसे पहले हिंदी समाज के जनपक्षधर लोगों में पढ़ी जाने वाली मासिक पत्रिका ‘समयांतर’ के माध्यम से जनज्वार तक पहुंची, जिसकी पुष्टि अब ‘हंस‘ भी कर चुका है। ‘हंस’ से मिली जानकारी के मुताबिक इन दो मुख्य वक्ताओं के अलावा अन्य वक्ता भी होंगे।

तमाशे की फ़िराक में राजेंद्र बाबू
हर वर्ष 31जुलाई को होने वाले इस कार्यक्रम का महत्व इस बार इसलिए भी अधिक है कि ‘हंस’ अपने प्रकाशन के पच्चीसवें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। ऐसे में पत्रिका के संपादक राजेंद्र यादव की कोशिश होगी कि धमाकेदार ढंग से पत्रिका की सिल्वर-जुबली का मजा लिया जाये। मजा लेने के शगल में पक्के अपने राजेंद्र बाबू ने माओवाद के मसले पर बहस का विषय रखा है, ‘वैदिकी हिंसा, हिंसा न भवति।’

‘हंस’ ऐसे किसी ज्वलंत मसले को लेकर ऐसा संस्कृतनिष्ठ और घुमावदार शीर्षक रखेगा, हतप्रभ करने वाला है। खासकर तब जबकि पत्रिका के तौर पर ‘हंस’ और संपादक के बतौर राजेंद्र यादव खुल्लमखुल्ला, खुलेआमी के हमेशा अंधपक्षधर रहे हों। वैसे में देश के मध्य हिस्से में चल रहे माओवादियों और सरकार के बीच संघर्ष का शीर्षक रखने में राजेंद्र बाबू उतना भी साहस नहीं दिखा पाये हैं,जितना कि शरीर के मध्य हिस्से के छिद्रान्वेषण पर वे लगातार दिखाते रहे हैं।

हिंदी में प्रतिष्ठित कही जाने वाली इस पत्रिका के संपादक का यह शीर्षक चिंता का विषय है और अनुभव का भी। अनुभव का इसलिए कि एक कार्यक्रम के दौरान एक दूसरे राजनीतिक मसले पर श्रोता उनके इस रूप से रू-ब-रू हुए थे। संसद हमले मामले पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दोषी करार दिये जाने के बाद फांसी की सजा पाये अफजल गुरु को लेकर ‘जनहस्तक्षेप’दिल्ली के  गांधी शांति प्रतिष्ठान में एक कार्यक्रम किया था जिसमें अन्य वक्ताओं के साथ राजेंद्र यादव भी आमंत्रित थे।

बोलने की बारी आने पर संचालक ने जब इनका नाम उदघोषित  किया तो अपने राजेंद्र बाबू ने मामले को कानूनी बताते हुए वकील कमलेश जैन को बोलने के लिए कहा। कमलेश जैन ने अफजल गुरु को लेकर वही बातें कहीं जो कि सरकार का पक्ष है। कमलेश सरकारी पक्ष को इस तरह पेश करने लगीं कि मजबूरन श्रोताओं ने हूटिंग की और आयोजकों को शर्मशार होना पड़ा। जबकि हम सब जानते हैं कि अफजल का केस लड़ रहे वकील,सामाजिक कार्यकर्ता और जन पक्षधर बुद्धिजीवी इस मामले में फेयर ट्रायल की मांग करते रहे हैं। कारण कि सर्वोच्च न्यायालय ने अफजल को फांसी की सजा ‘कंसेंट आफ नेशन’ के आधार पर मुकर्रर की थी।

अफजल से ही जुड़ा एक दूसरा मसला ‘हंस’ में लेख प्रकाशित करने को लेकर हुआ। जाने माने पत्रकार और कश्मीर मामलों के जानकार एवं ‘हंस’ के सहयोगी गौतम नौलखा ने कहा कि, ‘अफजल मामले की सच्चाई हिंदी के प्रबुद्ध पाठकों तक पहुंचे इसके लिए जरूरी है कि ‘हंस’ में इस मसले पर लेख छपे।’ गौतम के इस सुझाव पर राजेंद्र यादव ने लेख आमंत्रित किया। लेख उन तक पहुंचा। उन्होंने तत्काल पढ़ा और लेख के बहुत अच्छा होने का वास्ता देकर अगले अंक में छापने की बात कही। मगर बात आयी-गयी और वह लेख नहीं छपा।

अब सवाल यह है कि पिछले छह वर्षों से सलवा जुडूम अभियान के तमाशबीन बने रहे राजेंद्र यादव कहीं इस तमाशायी उपक्रम के जरिये अपने होने का प्रमाण देने की तो कोशिश में नहीं लगे हैं। तमाशायी कार्यक्रम इसलिए कि लेखिका अरुंधति राय सलवा जुडूम अभियान, माओवादियों और सरकार के रवैये पर क्या सोचती हैं, उनके लेखन के जरिये हम सभी जान चुके हैं। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह के प्रिय डीजीपी विश्वरंजन ‘सलवा जुडूम’को एक जन अभियान मानते हैं,यह छुपी हुई बात नहीं है। याद होगा कि पिछले वर्ष दर्जनों जनपक्षधर बुद्धिजीवियों ने रायपुर में विश्वरंजन के इंतजाम से हो रहे ‘प्रमोद वर्मा स्मृति’कार्यक्रम में इसी आधार पर जाने से मना कर दिया था। इस बाबत विरोध में पहला पत्र विश्वरंजन के नाम कवि पंकज चतुर्वेदी ने लिखा था। विरोध का मजमून हिंदी पाक्षिक पत्रिका ‘द पब्लिक एजेंडा’में छपे विश्वरंजन के एक साक्षात्कार के आधार पर कवि ने लिखा था जिसमें डीजीपी ने सलवा जुडूम को जनता का अभियान बताया था।

ऐसे में फिर बाकी क्या है जिसके लिए राजेंद्र बाबू अरुंधति-विश्वरंजन मिलाप कराने को लेकर इतने उत्साहित हैं। क्या हजारों आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन से उजाड़े जाने, माओवादियों के सफाये के बहाने आदिवासियों को विस्थापित किये जाने की साजिशों से राजेंद्र बाबू वाकिफ नहीं हैं। राजेंद्र बाबू क्या आप माओवाद प्रभावित इलाकों में सैकड़ों हत्याएं,बलात्कार आदि मामलों से अनभिज्ञ हैं जो आपने विश्वरंजन को आत्मस्विकारोक्ति के लिए दिल्ली आने का बुलावा भेज दिया है। रही बात उन भले मानुषों की सोच का जो यह मानते हैं कि इस बहाने माओवाद के मसले पर बहस होगी और राष्ट्रीय मसला बनेगा फिर तो राजेंद्र बाबू आप ऐसे सेमीनारों की झड़ी लगा सकते हैं।

जैसे अभी विश्वरंजन को बुलाने की बजाय भोपाल गैस त्रासदी के मुख्य आरोपी एंडरसन को बुलाइये जिससे राष्ट्र के सामने वह अपना पक्ष रख सके कि उसने त्रासदी बुलायी थी या आयी थी। इसी तरह सिख दंगों के मुख्य आरोपियों और गुजरात मसले पर गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी को भी दंगे,हत्याओं और बलात्कारों की मजबूरियां गिनाने के लिए एक चांस आप ‘ऐवाने गालिब सभागार’में जरूर दीजिए। समय बचे तो निठारी हत्याकांड के सरगना पंधेर और कोली को बुलावा भिजवा दीजिए जिससे कि उसके साथ अन्याय न हो,कोई गलत राय न बनाये। राजेंद्र बाबू आप ऐसा नहीं करेंगे और मुझे अहमक कहेंगे क्योंकि इन सभी पर राज्य ने अपराधी होने या संदेह का ठप्पा लगा दिया है। तब हम पूछते हैं राजेंद्र बाबू आपसे कि जिसको जनता ने अपराधी मुकर्रर किया है,उसकी गवाहियों में मुंसिफ बनने की अनैतिकता आप कैसे कर सकते हैं?

राजेंद्र बाबू अगर आप कुछ बहस की मंशा रखते ही हैं तो गृहमंत्री पी.चिदंबरम को बुलवाने का जुगाड़ लगाइये। मगर शर्त यह रहेगी कि 5 मई को जेएनयू में जिस तरह की डेमोक्रेसी वहां के छात्रों को झेलनी पड़ी, जिसे वहां के छात्रों ने चिदंबरी डेमोक्रेसी कहा, इस बार उनके आगमन पर माहौल वैसा न हो। गर यह संभव नहीं है तो विश्वरंजन से क्या बहस करेंगे, वह कोई कानून बनाते हैं?

राजेंद्र बाबू आप बड़े साहित्यकार हैं। सुना है आपने दलितों-स्त्रियों को साहित्य में जगह दी है। इस भले काम के लिए मैं तहेदिल से आपको बधाई देता हूं। साथ ही सुझाव देता हूं कि साहित्य में पूरा जीवन लगा देने के बावजूद गर आप दण्डकारण्य को एक आदिवासी साहित्यकार नहीं दे सके तो,आदिवासियों के हत्यारों की जमात से आये प्रतिनिधियों को साहित्यकार बनाने का तो पाप मत ही कीजिए।

राजेंद्र बाबू आप भी जानते हैं कि साहित्यकारों की संवेदनशीलता और संघर्ष से इतिहास भरा पड़ा है। आज बाजार का रोगन चढ़ा है, मगर ऐसा भी नहीं है सब अपना पिछवाड़ा उघाड़े खडे़ हैं और फिर हमारे युवा मन का तो ख्याल कीजिए। हो सकता है उम्र के इस पड़ाव पर आप डीजीपी कवि की कविताओं को सुनने में ही सक्षम हों,मगर हमारी निगाहें तो उन खून से सने लथपथ हाथों को देखते ही ताड़ जायेंगी। एक बात कहें राजेंद्र बाबू, एक दिन आप अपने नाती-पोतों को वह हाथ दिखाइये, अच्छा ठीक है किस्सों में अहसास ही कराइये। यकीन मानिये आप बुद्धना, मंगरू, शुकू, सोमू, बुद्धिया को अपने घरों में पायेंगे जो पिछले छह वर्षों से दण्डकारण्य क्षेत्र में तबाह-बर्बाद हो रहे हैं। इन जैसे हजारों लोग जो आज मध्य भारत में युद्ध की चपेट में हैं, आपको एक झटके में पड़ोसी लगने लगेंगे और आप साहित्य के वितण्डावादी आयोजन की जगह एक सार्थक पहल को लेकर आगे बढ़ेंगे।

महोदय कवि हैं?
उम्मीद है कि अर्जी पर आप गौर करेंगे। गौर नहीं करने की स्थिति में हमें मजबूरन अरुंधति राय से अपील करनी पड़ेगी। फिर वही बात होगी कि देखो हिंदी से बड़ी अंग्रेजी है और न चाहते हुए भी सारा क्रेडिट अरुंधति के हिस्से जायेगा। हिंदीवालों की पोल खुलेगी सो अलग। इसलिए राजेंद्र बाबू घर की इज्जत घर में ही रखते हैं। कोशिश करते हैं कि हमारी भाषा में जनपक्षधरता को गहराई मिले। कम-से-कम अपने किये पर समाज के सबसे कमजोर तबके (आदिवासियों)के सामने तो शर्मसार न होना पड़े। खासकर तब जबकि उस तबके ने हमारे समाज और सरकार से सिवाय अपनी आजादी के किसी और चीज की उम्मीद ही न की हो।

मिट्टी में मिलाने में क्यों तुले हैं आप?


दिल्ली में होने जा रहे हंस के सालाना जलसे पर जनज्वार ने कुछ सवाल उठाये थे. उन सवालों पर ज्यादातर पाठकों ने सहमति जाहिर की. मसला जलसे पर न अटके और बात साहित्य के सरोकारों तक पहुंचे, इसके मद्देनज़र जनज्वार अगला लेख युवा पत्रकार  विश्वदीपक का प्रकाशित कर  रहा है. लेख के साथ एक तस्वीर भी प्रकाशित की जा रही है जो वामपंथी लेखकों के मौजूदा सरोकारों की घनीभूत अभिव्यक्ति है. उम्मीद है कि लेख और तस्वीर दोनों ही बहस को एक नए धरातल पर पहुंचाने का जरिया बनेंगी.


आदरणीय राजेंद्र जी,

पहले ‘जनज्वार’ से जानकारी मिली और फिर ‘समयांतर’ से इसकी पुष्टि हुई कि आप इस बार ‘हंस’ की सालाना गोष्ठी में छत्तीसगढ़ के डीजीपी विश्वरंजन को बोलने के लिए आमंत्रित कर रहे हैं। ‘हंस’ अपनी स्थापना की सिल्वर जुबली मना रहा है-ये हम सब के लिए खुशी की बात है, लेकिन अपनी पच्चीसवीं सालगिरह पर आप ‘हंस’ को ये तोहफा देंगे इसकी उम्मीद नहीं थी। अब जबकि ‘हंस’ अपनी भरी जवानी को महसूस कर सकता है इस तरह इसे ‘को-आप्ट’ होने की प्रक्रिया में ले जाने का क्या मतलब?


ऐसा करम करो ना भाई, परछाई ही करण लगे हंसाई.
‘प्रगतिशील चेतना के वाहक’ के तौर पर ‘हंस’ निश्चित रूप से आपका व्यक्तिगत प्रयास है, पर ये इस देश की संघर्षशील जनता की आकाक्षांओं का प्रतिबिंब भी है। इस पत्रिका के जरिए आप उन लाखों के संघर्ष से तादात्मय बिठाने में सफल रहे हैं जिन्हे हर समय की सत्ता ने हाशिए पर धकेल रखा है। यही वो बिंदु है जहां आपकी चेतना एक पहचान पाती हैं, लेकिन इस बार आपने ‘हंस’ की गोष्ठी में विश्वरंजन को आमंत्रित कर खुद को उन्ही लोगों की जमात में शामिल कर दिया है जो ये मानते हैं कि बीच का भी कोई रास्ता होता है, कि माओवादियों और सरकार के बीच संघर्ष का मुख्य मुद्दा ‘विकास’ है! सरकार पिछले साठ सालों से उपेक्षित हिस्से का विकास करना चाहती है और माओवादी विकास के खिलाफ हैं!

कमजोरों के खून से सने इन तर्कों के पीछे की मंशा आप नहीं समझते ऐसा नहीं है! फिर राज्य प्रायोजित हिंसा के सबसे बड़े कमांडर को मंच देकर आप क्या साबित करना चाहते हैं? क्या आपको लगता है कि सरकार के पास अभी भी अपनी सफाई में कुछ कहने को बाकी है? भारतीय राज्य की नेक नीयत पर अगर आपको इतना ही भरोसा है तो फिर आप जो चाहें कर सकते हैं, लेकिन सवाल ये है कि क्या विश्वरंजन जैसे लोगों को मंच देने के बाद आपकी साख यथावत रहेगी? जिस छवि को आपने व्यक्तिगत रिश्तों की कुर्बानी और साहित्य की स्थापित वैचारिक सत्ताओं के खिलाफ संघर्ष करके अर्जित किया है उसको मिट्टी में  मिलाने में क्यों तुले हैं आप?

संभवत: आप मानते हैं कि विश्वरंजन जैसे हत्यारों को मंच देकर आप राज्य प्रायोजित हिंसा के विरोधाभास को उजागर कर पाएंगे- तो ऐसा नहीं है। आप जानते हैं विश्वरंजन बीजेपी की फासीवादी सरकार के चहेते हैं, इसलिए नहीं कि वो बहुत काबिल अधिकारी हैं बल्कि इसलिए कि बीजेपी की नस्लवादी और बुनियादी तौर पर हिंसक सोच को अमल में लाने और वैधता प्रदान करवाने के लिए विश्वरंजन अधिकारी की सीमा से बाहर जाकर व्यक्तिगत प्रयास भी करते हैं। इसी तरह वो कांग्रेस के भी विश्वसनीय हैं। वजह यहां भी साफ हैं। मध्यवर्ग की राजनीति करते-करते कांग्रेस जिस हिंस्र-कॉर्पोरेट-डेमोक्रेसी को एक मॉडल के तौर पर स्थापित करने की कोशिश में है विश्वरंजन उसके लिए मैंदान साफ कर रहे हैं।

 ये अनायास नही है कि अरुंधति भारतीय राज्य को ‘बनाना रिपब्लिक’ की संज्ञा देती है। क्या आप भारतीय लोकतंत्र के क्लप्टोक्रेसी में तब्दील होने को नहीं समझ पा रहे हैं? या जानबूझकर इससे अनजान बने हुए हैं? भारतीय लोकतंत्र की इससे बड़ी त्रासदी क्या हो सकती है कि जिस संख्या बल के आधार पर ये दुनिया के सबसे बड़े और विविध लोकतंत्र होने का दंभ भरता है वही अब इसके निशाने पर है। भारतीय राज्य अब अपने ही आदमियों की हत्या पर आमादा है। और आप हत्यारों के सरदार को मंच देने के लिए बेताब हैं!


यारी देख ली, अब ईमान खोजें : दाहिने से खगेन्द्र ठाकुर,  नामवर सिंह,  किताब  विक्रेता अशोक  महेश्वरी, डीजीपी विश्वरंजन और आलोक धन्वा : चचा आलोक आप  गाय घाट पर  माला जपते,  तो भी अपने बुजुर्गों  हम शर्मिंदा न होते.

आप जानते हैं कि अमेरिकी कारपोरेट-साम्राज्यवाद के छोटे उस्ताद के तौर पर भारत ने कल्याणकारी राज्य होने की चाहत खो दी है। अब भारतीय राज्य की चिंता ये नहीं है कि हमारे जनगण का जीवन कैसा है, बल्कि उसकी चिंता अब ये है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के निवेश के लिए कैसे माहौल उपल्ब्ध कराया जाय, कैसे मिशन-चंद्रयान को पूरा किया जाय और कैसे अमेरिकी कंपनियों के लिए भारत के बाजार को हरम में तब्दील कर दिया जाय!

लेकिन इससे भी शातिराना मंशा ये है कि इस पूरी साजिश को विकास के लुभावने नारे की शक्ल में पेश किया जा रहा है। विश्वरंजन जैसे लोग आज २०१० में वही भूमिका अदा कर रहे हैं जिसकी कल्पना औपनिवेशिक काल में मैकाले ने की थी। अमेरिकी सैन्य साम्राज्यवाद के लिए अनुकूल माहौल तैयार करवाने वाले वर्ग के प्रतिनिधि के तौर पर हम विश्वरंजन को चिन्हित करते हैं। और आप इसे उस बौद्धिक सरकारी प्रतिनिधि के तौर पर स्थापित करने की कोशिश में हैं जो कवि है और इसीलिए प्रगतिशील भी है? सही भी है? आपकी भावभंगिमा से लगता है कि आप उस हिंसक और कठोर सामंत के साथ है जिसे कल्याण की मंशा के तहत जनता पर चाबुक चलाने का दैवी अधिकार प्राप्त होता है!

आप ये कह सकते हैं कि ‘लोकतंत्र’ की परंपरा में विरोधी को भी बोलने की आजादी है और विचारों का संघर्ष दरअसल एक स्वस्थ्य परंपरा है। ये तर्क ‘सुअरबाड़े’ (चिदंबरम ने दंतेवाड़ा की घटना के बाद माओवाद के मसले पर संसद में बयान देते वक्त इस शब्द को कोट किया था) में तब्दील हो चुकी संसद के बारे में भी कहा जाता है, लेकिन आजादी के वर्तमान ढांचे के अंदर सत्ता और विपक्ष जो खेल खेलता है उससे आप अच्छी तरह वाकिफ है।

सर, वक्त कम है और शिकायतें ज्यादा। नुकीली चुभती हड्डियों और आंसुओं के अलावा हमारे पास कुछ नहीं...इसी से हमारा प्रतिरोध खड़ा हो रहा है। मनमोहन और सोनिया के राज में जिस दलाल-हत्यारे वर्ग का उदय हुआ है उसे आप जस्टीफाई कैसे कर सकते हैं? सलवा जुडूम के दौर में हुई हत्याओं, बलात्कारों और मासूमों के कत्ल के बारे में विश्वरंजन की भूमिका को लेकर अगर अभी भी आपके मन में संदेह की गुंजाइश है तो फिर आपसे संवाद की कोई जमीन नहीं बचती है। (In Maoist Country, by Gautan Navlaka and John Myrdal, Economic and political weekly april 17-31, 2010 में गौतम नौलखा ने लिखा है कि सलवा जुडूम के दौर में सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 640 गांव बंदूक की नोंक पर खाली कराए गए, 3 लाख 50 हजार यानि दंतेवाड़ा जिले की आधी जनसंख्या अपना घर बार छोड़ने के लिए मजबूर हुई है, उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया, बहू बेटियों को मार दिया गया.

आप उन कुछ दुर्गों में  हैं जो अभी तक ढहे नहीं है. फिर भी आप ढहने को  तैयार हैं तो हमारे पास इस विध्वंस को  मंजूर करने के अलावा कोई विकल्प नहीं।


आपका
विश्वदीपक  
अग्रसारित- उन सुधीजनों को जिन्हें मुल्क के बेहतरी की चिंता है. 

मर गया देश, अरे, जीवित रह गये तुम

प्रिय अजय,

यह मेरी प्रतिक्रिया है ......... नीलाभ

प्रिय अजय प्रकाश और विश्वदीपक,

दोस्तो या तो तुम लोग बहुत भोले हो या फिर सब कुछ जानते-बूझते हुए मामले को व्यर्थ ही उलझा रहे हो.हंस ने अगर इस बार की सालाना गोष्ठी में विश्वरंजन और अरुन्धती राय दोनों को एक ही मंच पर लाने की योजना बनायी है तो इसके निहितार्थ साफ़ हैं. पहली बात तो यह है कि इस बार की गोष्ठी को "वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति" जैसा शीर्षक दे कर राजेन्द्र जी यह भ्रम देना चाहते हैं कि वे एक गम्भीर बहस का सरंजाम कर रहे हैं. वे यह भ्रम भी पैदा करना चाहते हैं कि हम एक लोकतान्त्रिक व्यवस्था में रह रहे हैं और इसमें सबको अपनी बात कहने का  अधिकार है.

दर असल, सत्ता की तरफ़ झुके लोगों का यह पुराना वतीरा है. ख़ून ख़्रराबा भी करते रहो और बहस भी चलाते रहो.अब तक राजेन्द्र जी ने झारखण्ड और छत्तीसगढ़ और उड़ीसा या फिर आन्ध्र और महाराष्ट्र में सरकार द्वारा की जा रही लूट-मार और ख़ून ख़्रराबे और आदिवासियों की हत्या पर कोई स्पष्ट स्टैण्ड नहीं लिया है,लेकिन बड़ी होशियारी से वे अण्डर डौग्ज़ के पक्षधर होने की छवि बनाये हुए हैं. इसके अलावा वे यह भी जानते हैं कि जब सभी कुछ ढह रहा हो,जब सभी लोग नंगे हो रहे हों तो एक चटपटा विवाद उन्हें कम से कम चर्चा में बनाये रखेगा और इतना हंस की दुकानदारी चलाने के लिए काफ़ी है,गम्भीर चर्चा से उन्हें क्या लड्डू मिलेंगे !अब यही देखिये कि बी जमालो तो भुस में तीली डाल कर काला चश्मा लगाये किनारे जा खड़ी हुई हैं और आप सब चीख़-पुकार मचाये हुए हैं.

उधर,हंस के मंच पर और वह भी अरुन्धती राय के साथ आने पर विश्व रंजन को जो विश्वसनीयता हासिल होगी वह नामवर सिंह,आलोक धन्वा,अरुण कमल और खगेन्द्र ठाकुर जैसे महारथियों से अपनी किताब का विमोचन कराने से कहीं ज़्यादा बैठेगी.साथ ही एक जन विरोधी पुलिस अफ़सर की काली छवि को कुछ ऊजर करने का कम भी करेगी. आख़िर हंस "प्रगतिशील चेतना का वाहक" जो ठहरा.

असली मुश्किल अरुन्धती की है.अगर वह शामिल होती है तो राजेन्द्र जी की चाल कामयाब हो जाती है और विश्व रंजन के भी पौ बारह हो जाते हैं. नहीं शामिल होती तो राजेन्द्र जी, विश्व रंजन और उनके होते-सोते हल्ला करेंगे कि देखिये, कितने खेद की बात है, इन लोगों में तो जवाब देने की भी हिम्मत नहीं, भाग गये, भाग गये, हो, हो, हो, हो !

इसलिए प्यारे भाइयो,इस सारे खेल को समझो.यह पूरा आयोजन कुल मिला कर सत्ताधारी वर्ग के हाथ मज़बूत करने की ही कोशिश है.

यारी देख ली, अब ईमान खोजें : दाहिने से खगेन्द्र ठाकुर, नामवर सिंह, किताब विक्रेता अशोक महेश्वरी, डीजीपी विश्वरंजन और आलोक धन्वा : चचा आलोक आप गाय घाट पर माला जपते, तो भी अपने बुजुर्गों पर हम शर्मिंदा न होते.



अब रहा सवाल हिन्दी साहित्य का --तो दोस्तो विश्व रंजन के कविता संग्रह के विमोचन में जो चेहरे दिख रहे हैं, उनसे हिन्दी साहित्य के गटर की,उसकी ग़लाज़त की,सड़ांध की सारी असलियत खुल कर सामने आ जाती है.वैसे इसकी शुरुआत मौजूदा दौर में करने का सेहरा भी आदरणीय राजेन्द्र जी के सिर बंधा था जब उन्होंने बथानी टोला हत्याकाण्ड के बाद बिहार के सारे लेखकों की बिनती ठुकरा कर लालू प्रसाद यादव से एक लाख का पुरस्कार ले लिया था.उनका पक्ष बिलकुल साफ़ है.यही वजह है कि वे किसी ऐसे स्थान पर नहीं नज़र आते जहां सत्ता के साथ उनका छत्तीस का आंकड़ा बनने की आशंका हो.वे किसी पत्रकार के बेटे की शादी की दावत में आई आई सी में " खाने-पीने" का न्योता नहीं ठुकराएंगे,लेकिन फ़र्ज़ी मुठ्भेड़ में जिसे कहते हैं "इन कोल्ड ब्लड"मार दिये गये युवा पत्रकार हेम चन्द्र पाण्डे की अन्त्येष्टि में शामिल होने का ख़तरा कभी नहीं मोल लेंगे.कहां जाना है कहां नहीं जाना इसे ये सभी लोग अच्छी तरह जानते हैं जिन्हें आप हिन्दी के पुरोधा और सामाजिक परिवर्तन के सूत्रधार बनाये हुए, कातर भाव से उनके कर्तव्यों की याद दिला रहे हैं.

इनमें से कौन नहीं जानता कि बड़े पूंजीपति घरानों के इशारे पर हमारी मौजूदा सरकार झारखण्ड, छत्तीसगढ़,उड़ीसा,आन्ध्र और महाराष्ट्र में कैसा ख़ूनी और बेशर्म खेल खेल रही है.लेकिन ये अपने अपने सुरक्षा के घेरे में सुकून से "साहित्य चर्या"में लीन हैं,इसी ख़ूनी सरकार के लोहे के पंजे के कविता संग्रह के क़सीदे पढ़ रहे हैं.क्या इन्हें माफ़ किया जा सकता है ?मत भूलिए कि जो समाज की बड़ी बड़ी बातें करते हैं उनका उतना ही पतन होता है.यह हमारे ही वक़्त की बदनसीबी है कि "गोली दागो पोस्टर" का रचनाकार उसी दारोग़ा के साथ है जिसके उत्पीड़न पर उसने सवाल उठाया था.ये वही अरुण कमल हैं जिन्हों ने लिखा था :"जिनके मुंह मॆं कौर मांस का उनको मगही पान". बाक़ियों की तो बात ही छोड़िए.

तो भी,मैं तुम दोनों को इस बात पर ज़रूर बधाई देना चाहता हूं कि इस चौतरफ़ा ख़ामोशी और गिरावट के माहौल में तुम दोनों ने इस ज़रूरी मुद्दे को उठाया है हालांकि चोट हलकी है साथियो,बहरों को सुनाने के लिए ज़ोरदार धमाका चाहिये.

अन्त में अपने एक प्रिय कवि का कवितांश जिसे हम अब धीरे-धीरे भूल रहे हैं :


ओ मेरे आदर्शवादी मन,
ओ मेरे सिद्धान्तवादी मन,
अब तक क्या किया ?
जीवन क्या जिया !!



उदरम्भरि बन अनात्म बन गये,
भूतों की शादी में कनात से तन गये,
किसी व्यभिचारी के बन गये बिस्तर,



दु:खों के दाग़ों को तमग़े सा पहना,
अपने ही ख़यालों में दिन-रात रहना,
असंग बुद्धि व अकेले में सहना,
ज़िन्दगी निष्क्रिय बन गयी तलघर,

अब तक क्य किया,
जीवन क्या जिया!!

................

भावना के कर्तव्य त्याग दिये,
हॄदय के मन्तव्य मर डाले!
बुद्धि का भाल ही फोड़ दिया,
तर्कों के हाथ ही उखाड़ दिये,
जम गये, जाम हुए फंस गये,
अपने ही कीचड़ में धंस गये !!
विवेक बघार डाला स्वार्थों के तेल में,
आदर्श खा गये.
अब तक क्या किया,
जीवन क्या जिया !!
बहुत-बहुत ज़्यादा लिया,दिया बहुत-बहुत कम
मर गया देश, अरे, जीवित रह गये तुम !

comments:


Anonymous said...
शायद ऐसे ही (राजेन्द्र यादव सरीखे) लोगों के लिए किसी ने ठीक ही लिखा है - ऐसी लचीली रीढ़ की हड्डी जो हवा के रुख पर अपनी पीठ बदल ले । शहर में रहने वाले ये बुद्धिवादी दो टांगोँ वाले ऐसे कीड़े - मकोड़े हैं , जो मौसम देखकर ही सैर को निकलते हैं ।
Rangnath Singh said...
बेहतर हो कि आप राजेन्द्र यादव और अरूंधती राय का स्टैण्ड लेकर प्रकाशित करें।
shirish said...
सबसे पहले जब आलोक मेहता के बिकने की खबर आई थी तो हैरत के साथ-साथ यह संदेह भी जताया गया था कि सत्ता द्वारा पूरे खेल में कई और मोहरों को भी आगे किया जा सकता है. मगर यहाँ तो उसके द्वारा बड़े-बड़े महारथियों को मोहरों की तरह खड़ा किया जा रहा है. अच्छे अच्छों के चाल चरित्र में आ रहा अचानक बदलाव किसी गहरी साजिश की तरफ़ संकेत कर रहा है. कहीं सत्ता द्वारा राजनेताओं कि तरह अब बुध्दिजीविओं की भी बड़े पैमाने पर ख़रीद फरोख्त तो नहीं की जा रही है ?
अशोक कुमार पाण्डेय said...
नीलाभ सही कह रहे हैं…आप देखिये न यहां भी स्टैण्ड कौन ले रहा है?
सचिन .......... said...
बढिया। जुबानी जमाखर्च अच्छा है। लेकिन विश्वदीपक, अजय और नीलाभ जी, आप सभी बहुत बेहतर ढंग से जानते हैं कि ऐसे छुटपुट लेखों को राजेन्द्र जी अपने काले चश्मे के कारण ठीक से पढ नहीं पाते। जिस तेज आवाज की आप बात कर रहे हैं वह राजेन्द्र जी को कार्यक्रम स्थल पर ही सुनाई दे पायेगी। सुना है कानों के कच्चे भी हैं। सत्ता ऐसे आयोजन करती रहेगी तो जन को भी उनके विरोध में उठ खडा होना होगा। अपील कीजिए समानधर्मा, समानचेता पत्रकार, लेखकों से कि कार्यक्रम वाले दिन धरना दें और राजेन्द्र जी को इस (कु)कृत्य के लिए माफी मांगने पर विवश करें। यह उनका निजी आयोजन नहीं है, हंस की प्रतिबद्धता भी साबित होनी चाहिए। अगर राजेन्द्र जी अपनी गलती नहीं मानते हैं तो वहीं प्रस्ताव धर लिया जाए। नीलाभ जी, आपके प्रिय कवि को ही याद करते हुए "सुलतानी जिरहबख्तर बना है सिर्फ मिट्टी का, वो-रेत का-सा ढेर-शाहंशाह, शाही धाक का अब सिर्फ सन्नाटा ! .......... .......... इतने में हमीं में से अजीब कराह सा कोई निकल भागा भरे दरबारे-आम में मैं भी सँभल जागा कतारों में खड़े खुदगर्ज-बा-हथियार बख्तरबंद समझौते सहमकर, रह गए, दिल में अलग जबड़ा, अलग दाढ़ी लिए, दुमुँहेपन के सौ तज़ुर्बों की बुज़ुर्गी से भरे, दढ़ियल सिपहसालार संजीदा सहमकर रह गये !ओ"
Hirawal Morcha said...
sachin ne theek kaha, lekin baat dharne vaghairah se aur aage ki hai. jo kutil jal ve rach rahe use klatne ki aur bhi tarkeeben sochni hongi -- yaad keejiye उधर उस ओर...वह बेनाम.. मुहैय्या कर रह लश्कर. हमारी हार का बद्ला चुकाने आयेगा

comments:

अशोक कुमार पाण्डेय said...
यह हिन्दी के 'क्रांतिकारी' लेखकों का असली चरित्र है मेरे भाई…
अवतन्स said...
बहुत खूब अजय...राजेन्द्र बाबू को शायद खुद की असलियत पता चल हो गई...उनके आगे पीछे पिछवाड़ा खोलने वालों से उम्मीद तो बेईमानी है....
Rangnath Singh said...
यानी इस बार भी हंस का सालाना जलसा हंगामाखेज होगा। राजेन्द्र जी को शायद यही चाहिए था। जबकि इसके बिना भी उनका कार्यक्रम सफल ही रहता।
Anonymous said...
ख़ूब परदाफ़ाश किया है भाई आपने अपने इस लेख में | --अनिल जनविजय
Anonymous said...
ख़ूब परदाफ़ाश किया है भाई आपने अपने इस लेख में | --अनिल जनविजय
चन्दन said...
यह सुविचारित लेख है. यह सही है कि सफाई देने के लिये सबके पास अपने तर्क होते हैं. पर हमें उसके काम से उसका पक्ष तय करना होगा. यह हिन्दी का सामान्य नियम बनता जा रहा है कि काम करने के बाद/अपने विचार रखने के बाद दुबारा अपना पक्ष रखने का मौका माँगा जा रहा है. अपने शब्दो या कार्यों पर लोगो को भरोसा नहीं रहा है यह गलत है. और आश्चर्य की हम सबका पक्ष सुनने को तैयार बैठे रहते हैं.. दुबारा ..तिबारा..
Uday Prakash said...
Wonderfully truthful and straight. Ethics and morality should be restored back in the left and civilian resistance.
pratibha said...
Bahut badhiya Ajay ji. sahi nas pakdi aapne...
दिलीप मंडल said...
विश्वरंजन को हंस का मंच दिया गया तो मैं इस कार्यक्रम का बहिष्कार करूंगा। इससे कितना फर्क पड़ेगा,मुझे नहीं मालूम। लेकिन यह गलत है, इस बारे में मुझे कोई संदेह नहीं है। विश्वरंजन एक पुलिस अधिकारी के तौर पर कुछ भी कहें, मुझे शिकायत नहीं हैं। इस काम के उन्हें पैसे मिलते हैं। उन्हें पूरी ईमानदारी के ग्रीन हंट का समर्थन करना चाहिए। मैं टीवी पर उनके तर्क सुन लूंगा कि आदिवासियों को मारना क्यों जरूरी है। लेकिन उनकी यही बात मैं हंस के मंच पर सुनने के लिए तैयार नहीं हूं।

comments:


shirish khare said...
राजेंद्र यादव जी अपनी सहूलियत हिस़ाब से तर्क भी निकाल लिया करते हैं. अब देखना है कि इस सवाल पर वह क्या कहते हैं.
अशोक कुमार पाण्डेय said...
उफ़ आलोक धन्वा भी!! वह पोस्टर अब सरकारी सामान बन गया…
Anonymous said...
अबकि बार हम सबसे ख़तरनाक हालातों के बीच खड़े हैं. इमरजेंसी के समय विरोधी पक्ष मजबूत था. मगर आदिवासियों के ख़िलाफ शुरू किए गए इस युद्ध में जिनसे विरोध के लिए आगे आने की उम्मीद थी, वह सत्ता पक्ष की तेल मालिश कर रहे हैं. एक ही सवाल है- सत्ता की चुनौती से इस बार कैसे निपटा जाएगा. क्योंकि इस बार हार जाने का मतलब होगा हमेशा के लिए हार जाना और पूरी तरह से हार जाना.
 
 
 
 

Friday, September 26, 2008

बाढ़ की जाति

भाई प्रमोद रंजन की यह रिपोर्ट २४ अक्टूबर को उनके चिट्ठे संशयात्मा पर छपी है। इसमें उन्होंने बिहार के जन संहार की कुछ नयी गुत्थियाँ खोली हैं। देशकाल पर दुबारा इसे छापने का लोभ नहीं छोड़ सका।
राज्‍य सत्‍ता की जाति
प्रमोद रंजन
जो कुछ बताने जा रहा हूं वह एकबारगी तो मुझे भी अविश्वसनीय लगा. ज्यों-ज्यों कड़ियां जुड़ती गयीं, तस्वीर साफ होती गयी. यह बाढ़ आयी नहीं, लाई गयी है. कुशहा तटबंध तोड़ा तो नहीं गया लेकिन उसे टूटने का भरपूर मौका दिया गया. विपदा के बाद राहत कार्यों में सरकारी मशीनरी खुद ब खुद अक्षम साबित नहीं हुई, उसे अक्षम बनाये रखा गया. जातिवाद के लिए चर्चित बिहार में अंजाम दी गयी यह कथित लापरवाही, वास्तव में कम से कम आजाद भारत की सबसे बड़ी सुव्यवस्थित जाति आधारित हिंसा है. वर्ष २००८ के १८ अगस्त को कासी क्षेत्र में आयी बाढ़ में सरकारी आकड़ों के अनुसार कम से कम २५ लाख लोग तबाह हुए हैं. एक पुख्ता अनुमान के अनुसार लगभग ५० हजार लोग मारे गये हैं.
कोसी अंचल के दलित जब बिल में पानी जाने के बाद बिलबिलाती चींटियों की तरह मर रहे थे; यादवों के पशु, घर, खेत सब कोसी की धार में बहे जा रहे थे, ऐसे समय में सत्ताधारी दल जनता यूनाइटेड के राष्टीय प्रवक्ता के बयान ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार ने इन्हें बचाने की कोशिश क्यों नहीं कर रही. जदयू के राष्टीय प्रवक्ता शिवानंद तिवारी ने विपक्षी राष्टीय जनता दल के सुप्रीमो लालू प्रसाद की सक्रियता पर टिप्पणी करते हुए कहा कि 'भाई का दर्द भाई ही समझता है'. प्रेस को जारी इस बयान में तिवारी ने कहा कि चूंकि इसके पहले आयी बाढ़ से सहरसा, मधेपुरा (यादव बहुल जिले) नहीं प्रभावित होते थे इसलिए लालू इतने सक्रिय नहीं होते थे. 'भाई' की पीड़ा ने उन्हें इतना संवदेनशील बना दिया है कि वे इसके बीच कूद पड़े हैं. इस फूहड़ बयान के निहितार्थ गंभीर हैं. यह सच है कि बाढ़ग्रस्त इलाका यादव बहुल है, इसके अलावा वहां बड़ी आबादी अत्यंत पिछड़ों और दलितों की है. (सहरसा, सुपौल और मधेपुरा के बाढ़ग्रस्त इलाकों से गुजरते हुए, राहत शिविरों में बातचीत करते हुए, मुझे महसूस हुआ कि यहां दलितों की आबादी भी बहुत ज्यादा है)
लगभग ३० विधान सभा सीटों वाला बाढ़ से प्रभावित हुआ यह क्षेत्र लालू प्रसाद को बिहार की सत्ता में बनाये रखने का एक बड़ा कारण रहा था. लेकिन पिछली बार पासा पलट गया. कहते हैं कि उस समय इलाके के यादव लालू से नाराज हो गये थे. राष्टीय जनता दल के एक कद्दावर नेता बताते हैं कि 'राजद को बिहार की सत्ता से बेदखल करने में बड़ी भूमिका इस क्षेत्र की रही'. पिछले विधान सभा चुनाव में इन जिलों की अधिकांश सीटें राजद हार गया. अभी इस क्षेत्र की कुल २८-३० सीटों में से २२-२३ विधायक जदयू अथवा भाजपा के हैं. इसके बावजूद राजग की ओर से यह बयान आया कि यादव होने के कारण लालू इस क्षेत्र के लिए चिंतित हैं. बयान बताता है कि इस विकराल आपदा के समय बिहार में सिर्फ घृणित राजनीति ही नहीं चल रही है. इसके पीछे जातिवाद का चरमावस्था है. ऐसा कुत्सित जातिवाद, जो यह हुंकार भरता फिर रहा है-यादवों, दलितों, अति पिछड़ों! तुम्हारे समर्थन का भी हमारे लिए कोई मोल नहीं है.
यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि बिहार में जाति-शत्रुओं के सफाये के लिए बाढ़ के रूप में सुव्यवस्थित हिंसा की नयी तकनीक लागू की गयी. इस तकनीक ने नरेंद्र मोदी के प्रयोगों को भी पीछे छोड़ दिया. नरेंद्र मोदी वंदे मातरम्‌ गाने वालों को बख्श देने की बात करते हैं. लेकिन यहां लाखों लोग राज्य सत्ता को समर्थन देने के बावजूद सिर्फ इसलिए अपने हाल पर छोड़ दिये गये क्योंकि वे यादव थे, दलित थे. उन्होंने राजग को वोट किया था तो क्या, वे अवधिया कुरमी अथवा भूमिहार तो न थे. इसे नीतीश कुमार के नेतृत्व में राज्यसत्ता में आयी एक सवर्ण जाति की कुंठा के विस्फोट के रूप में भी देखा जा सकता है. लालू प्रसाद के शासन काल में यादवों के मातहत रहने का दंश उन्हें १७-१८ वर्षों से सता रहा था. उन्हें यह 'सुख' है कि कीड़े-मकोड़ों की तरह बिलबिलाओं सालों, देखते हैं, कौन क्या कर लेता है!
नेपाल में कुशहा के पास तटबंध टूटने की सूचना भीमनगर बैराज के पास तैनात मुख्य अभियंता सत्यनारायण ने नौ अगस्त को ही बिहार सरकार को दे दी थी. यह एक पूर्णतः प्रमाणित हो चुका तथ्य है, जिसका खुलासा इस इंजीनियर को डिमोट कर स्थानांतरित कर देने के बाद हुआ. इसके अलावा अन्य श्रोतों से भी तटबंध में रिसाव होने सूचना बिहार के सत्ताधीशों को थी. लेकिन इसे रोकने की कोशिश करने की बजाय तटबंध मरम्मती नाम 'माल' बनाने की कोशिशें की जाती रहीं. परिणाम यह हुआ कि १८ अगस्त को तटबंध टूट गया. (कुछ लोग इसके टूटने की तारीख और पहले बताते हैं) पानी लाखों लोगों का आशियाना उजाड़ते, हजारों की जान लेते रोजाना नये इलाकों की ओर बढ़ता गया.
तटबंध टूटने से छूटे लगभग डेढ़ लाख क्यूसेक पानी से १८, १९ और २० अगस्त को जिन बस्तियों की सीधी टक्कर हुई, वे तो उसी समय नेस्तानाबूद हो गयीं. झुग्‍गी-झोपड़ियों, दलितों के टोलों में तो न कोई आशियाना बचा, न जानवर, न एक भी आदमी. अगले ७-८ दिनों तक पानी कोसी की नयी (मुख्य) धार के आसपास के गांवों की ओर बढ़ता गया. लोग अकबकाए चूहों की तरह, जिधर राह मिली, भागने लगे. सब ओर पानी ही पानी. रास्ते का अता-पता नहीं. कोसी की विकराल, हहराती, कुख्यात तेज धारा. डूब कर मरने वालों में-पैदल भाग रहे लोगों, केले के पेड़ों, लोहे डघमों, धान उसनने वाले कटौतों आदि का सहारा लेकर निकलना चाह रहे लोगों की संख्या कितनी रही, यह हम कभी नहीं जान पाएंगे. कितनी निजी नावें पलटीं, कितनों को स्थानीय अपराधियों ने पानी में फेंका, कितनी महिलाओं के जेवर छीने गये, कितनों ने अस्मत गंवायी. क्या कभी सामने आएगा इनका आंकड़ा?
उधर यादव-दलित डूबते जा रहे थे और इधर सत्ताधारी जनता दल युनाइटेड प्रधानमंत्री से मिलने के लिए ५०० पृष्ठों का दस्तावेज तैयार कर रहा था. लेकिन यह कागजात बाढ़ से संबंधित नहीं थे. यह कागजात थे रेलमंत्री द्वारा कुछ कट्ठा जमीनें लिखवा कर रेलवे की नौकरियां बांटने के. १८ अगस्त को तटबंघ टूटने,सैकड़ों बस्तियों के बह जाने, हजारों लोगों के मारे जाने की सूचनाओं के बीच ६ दिन गुजारने के बाद-२३ अगस्त को-जनता दल यूनाइटेड के राष्टीय अध्यक्ष शरद यादव, राष्टीय प्रवक्ता शिवानंद तिवारी, प्रदेश अध्यक्ष ललन सिंह व केसी त्यागी जब भाजपा के उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बाल नकवी की अगुवाई में प्रधानमंत्री से मिले तो उनके सामने बाढ़ कोई मसला नहीं था. वे सिर्फ यह चाहते थे कि लालू प्रसाद को केंद्रीय मंत्रीमंडल से बाहर कर दिया जाए. मुख्यमंत्री ने बाढ़ क्षेत्र का हवाई सर्वेक्षण पहले २० अगस्त को और फिर २४ अगस्त को किया. तब तक भारी तबाही हो चुकी थी. 20 अगस्‍त को ही उन्होंने देखा कि पानी सैकड़ों बस्तियों को लीलता बढा जा रहा है. हजारों लोग मारे जा चुके हैं. लेकिन उनका ग्लेशियर सा हिंसक ठंडापन बरकरार था. बिना हो-हंगामे के जितना डूब सकें, डूबें हरामी!
२४ अगस्त को हवाई अड्डा पर प्रेस कांफ्रेस में तथा २६ अगस्त को रेडियो से जनता के नाम 'संदेश' देते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि बिहार में प्रलय आ गया है. लोग दान देने के लिए आगे आएं. हजारों लोगों की मौत के बाद, बाढ़ के ९ वें दिन रेडियो पर मुख्यमंत्री द्वारा पढे गये इस संदेश की भाषा में 'भावुकता' कूट-कूट कर भरी गयी थी. मुख्यमंत्री ने अपील की कि लोग बाढ़ ग्रस्त क्षेत्रों से बाहर निकलें. सरकार सब व्यवस्था करेगी!
जाहिर है, राज्य सरकार न सिर्फ तटबंध की सुरक्षा बल्कि बचाव-राहत कार्य में भी सुस्त बनी रही. सरकार के खैरख्वाह समाचार माध्यमों के माध्यम से अपना तीन साल पुराना तकिया कलाम दुहराते रहे कि यह सब कुछ पिछली सरकार का किया-धरा है. लालू ने तटबंध मरम्मती के लिए कुछ किया ही नहीं.
रेलकर्मी का जातिवाद
राज्‍य सत्ता ने ऐसा किया तो जाहिर है, यह अनायास नहीं रहा होगा। जाति बिहार के रग-रग में कूट-कूट कर भरी है. बिहार में भारी तबाही की खबर सुनकर मेधा पाटकर बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों के दौरे पर पहुंचीं. उनके कार्यकर्ताओं द्वारा मुंबई से लायी जा रही राहत सामग्री (कपड़ों से भरी ३१ बोरियां) एक रेल कर्मी उदयशंकर सिंह ने बरौनी स्टेशन पर फेंक दी. ये कार्यकर्ता मेधा के नेतृत्व में मुंबई की झुग्गी-झोपड़ी वासियों के हित में चलने वाले 'घर बचाओ' आंदोलन से जुड़े थे और नीची जातियों से आते थे. कार्यकर्ता लाल बाबू राय, अतीक अहमद, बाबुलाल और राजाराम पटवा ने इस संबंध में की गयी शिकायत में लिखा है कि 'सभी सामान फेंकने के बाद कैपिटल एक्सप्रेस के गार्ड उदयशंकर सिंह ने अभद्र गालियां देते हुए कहा कि कहां से दलित हरिजन का कपड़ा उठा कर ले आया है. ऐसा बोलते उसने सफाई कर्मचारी से डिब्बे में झाड़ू लगवाया. उसके बाद गार्ड बॉक्स में रखे गोमूत्र एवं गंगाजल की शीशी निकाल कर गंगाजल एवं गोमूत्र का छिड़काव किया'.
मेधा पाटकर ने इस घटना की जानकारी मिलने के बाद इन पंक्तियों के लेखक से कहा कि वह इस सूचना से बेहद व्यथित हैं. बिहार के जातिवाद के बारे में उन्होंने सुना तो था लेकिन यह आज के समय में भी इतना विकराल होगा, इनका अनुमान उन्हें न था. मेधा के चाहने पर एक समाचार पत्र में 'सामान फेंके जाने' की सूचना देती छोटी सी खबर छपी. लेकिन उसमें इस बात का जिक्र न था कि सामान क्यों फेंका गया. लालू प्रसाद ने मेधा को फोन किया और रेलवे के एक उच्चाधिकारी को उनसे माफी मांगने को कहा. गार्ड उमाशंकर सिंह सस्पेंड किया गया. जब लालू प्रसाद का फोन आया मेधा के साथ हम सुपौल जिला के छुरछुरिया धार के पास से लौट रहे थे. वहां सेना द्वारा चलाए जा रहे रेस्क्यू ऑपरेशन के पास राहत सामग्री वितरित करते हुए मेधा ने ३५-४० मौतें (सिर्फ उसी स्थान पर) रिकार्ड की थीं, जबकि उस समय तक राज्य सरकार बाढ़ में मरने वालों की कुल संख्या महज २५ बता रही थी. मेधा इस सबसे बेहद विचलित थीं. लालू प्रसाद ने भी उन्हें फोन पर बताया कि कम से कम ५० हजार लोग मरे हैं, सरकार लगातार झूठ बोल रही है. उनका कहना था कि नीतीश पुनर्निर्माण कार्य जनवरी-फरवरी तक शुरू करेंगे ताकि लोकसभा चुनाव में इसका लाभ ले सकें. मेधा ने लालू प्रसाद को कहा कि राष्टीय आपदा घोषित हो जाने के बावजूद इसे लेकर अभी तक केंद्रीय मंत्रीमंडल की बैठक नहीं हुई है. जबकि नियमानुसार, राष्टीय आपदा को लेकर केंद्रीय मंत्रीमंडल की बैठक तुरंत होनी चाहिए थी, जिसमें पीड़ित क्षेत्रों के कृषि-स्वास्थ आदि मसलों पर निर्णय लिया जाता.
यह सब ५ सितंबर की बात है. 'घर बचाओ' आंदोलन के कार्यकर्ताओं से दुर्व्यवहार करने वाला सस्पेंड हो चुका था. ६ सितंबर को इससे संबंधित समाचार भी सभी अखबारों में छपा. लेकिन मेधा चाहतीं थीं कि उस रेलकर्मी का जातिवादी व्यवहार भी अखबारों के माध्यम से सामने आये. उन्होंने मुझसे कहा कि सामान फेंकने से बहुत ज्यादा गंभीर और धक्का पहुंचाने वाली वह जातिवदी प्रवृति है. इसे अखबारों को उठाना चाहिए.लेकिन मेधा को बिहार की सवर्ण मीडिया की बारीक बुद्धि की जानकारी न थी. सिर्फ मेधा ही क्यों, मैं भी तो लगभग इससे अन्जान ही था, तभी तो इसके लिए असफल कोशिश की.
सघा विहीन सवर्णों का दुःख
बाढ़ क्षेत्र के दौरा करते हुए मैं अपनी रिपोर्ट तैयार करने के लिए सहरसा में एक कायस्थ परिवार का कंप्यूटर इस्तेमाल करता रहा था. इस परिवार का मघेपुरा स्थित घर डूब चुका है, सहरसा में वे किराये पर रहते हैं. उनके सभी पड़ोसियों के गांवों में स्थित पैतृक मकान डूबे थे. इनमें अधिकांश कायस्थ थे. इन सबके अनेक परिजन सहरसा में ही राहत शिविरों में आश्रय लिये थे. अपनी छोटे-छोटे किराये के कमरों में वे कितनों को जगह देते? रोजाना दिन भर बाढ़ पीड़ितों का इनके यहां आना-जाना लगा रहता था.इनमें से कई परिवार ऐसे थे, जिनके मामा, चाचा, बहन या ससुराल के गांवों में लोग अब भी फंसे थे. उन्हें निकालने के लिए न कोई नाव पहुंच रही थी, न ही राहत सामग्री. वे चाहते थे कि मैं बतौर पत्रकार संबंधित जिले के जिलाधिकारी से बात कर उनके गांवों में नाव भिजवाने की व्यवस्था करूं. मैंने कोशिश भी की लेकिन नतीजा सिफर रहा. मुझे ऐसा तो नहीं लगा कि संबंधित जिलाधिकारी ने जानबूझ कर उन गांवों में नाव नहीं भेजी; पर मेरी असफलता पर उन किरायेदारों की राय रोचक थी. उनका कहना था कि कुछ भी कर लीजिये हम फारवडों के लिए यह सरकार कुछ भी नहीं करेगी.
९/११ बनाम ८/१८११ सितंबर
11 सितंबर को अमेरिका में हवाई हमले में लगभग ५ हजार लोग मारे गये थे. आज भी उनकी याद में मोमबत्तियां जलाई जाती हैं. भारतीय मीडिया भी इन तस्वीरों को प्रसारित करता है. क्या १८ अगस्त की याद में, जिसमें ५० हजार लोग मारे गये, भी मोमबत्तियां जलाई जाएंगी? क्या यह देश इसे एक काले दिन की तरह याद करेगा? उत्तर है-नहीं. कारण; हम-आप सब जानते हैं.
और अंत में
आज १२ सितंबर की सुबह है. दो दिन पहले ही बाढ़ क्षेत्र से पटना लौट आया हूं. अखबार देख रहा हूं. कई अखबारों में ११ सितंबर को अमेरिका में जलाई गयी मोमबत्तियों और उस हमले में मारे गये लोगों के परिजनों की व्थाएं छपीं हैं. पटना से प्रकाशित हिंदुस्तान में एक खबर है. 'केमिकल से नष्ट होंगे पशुओं के शव : सुशील मोदी'. सुशील कुमार मोदी भारतीय जनता पार्टी के राष्टीय उपाध्यक्ष व बिहार के उपमुख्यमंत्री हैं. खबर इस प्रकार है- 'उपमुख्यमंत्री ने बताया कि केमिकल की खेप गुजरात से चल चुकी है. इसके जरिए पशुओं के शवों को मिनटों में नष्ट किया जा सकता है. इससे बदबू और महामारी फैलने की आशंका नहीं रहेगी.. पहली बार राज्य सरकार की ओर से व्यवस्थित ढ़ंग से राहत कार्य चलाया जा रहा है'.
केमिकल, पशुओं के शव के लिए? और मनुष्यों के उन हजारों शवों के लिए क्या, जो झाड़ियों, बांसबाड़ियों व उंची मेड़ों के किनारे पड़े सड़ रहे हैं. बाढ़ आए लगभग एक माह होने को आ रहा है. राज्य सरकार की ओर से मनुष्यों के शवों की चिंता करता कोई बयान अभी तक नहीं आया है. सुशील मोदी बता रहे हैं कि केमिकल 'गुजरात' se आ रहा है.(और शायद 'आइडिया' भी). राज्य सरकार की ओर से पहली बार 'व्यवस्थित ढंग' से राहत कार्य चलाया जा रहा है. इसी केमिकल से व्यवस्थित ढंग से आदमियों के शवों को भी 'मिनटों' में ठिकाने लगाया जाएगा. न बदबू होगी, न आक्रोश फैलेगा. आखिर कुछ समय बाद ही वहां कई हजार करोड़ रुपयों का पुननिर्माण कार्य करने जाना है... और, मनुष्य मरे भी कहां हैं? मरे तो शूद्र हैं. भाजपा जिस मनुवाद में विश्वास करती है उसके अनुसार शूद्र और पशु एक समान होते हैं।

संशयात्मा से saabhar

Monday, September 15, 2008

बाँध बन रहा है.....

भाई >रियाज़-उल-हक बिहार के दुर्गम जिलों खासकर सुपौल, मधेपुरा और अररिया से लगातार रिपोर्ट भेज रहे हैं जिनसे वहां की त्रासदी और भयावह सच्चाइयों का हम जैसे लोग अन्दाज़ा लगा पा रहे हैं वरना अन्य माध्यमों ने जिस तरह अपनी विश्वसनीयता खो दी है और वे ब्रूनो को जलानेवालों और गैलीलियो को मर्मान्तक पीड़ा देने वालों के साथ गिरोहबंद होकर आडवाणी को हर कीमत पर इस देश का प्रधानमंत्री बनाने के तय एजेंडे पर चल रहे हैं, कोसीकनहा लोगों की कौन सुधि लेने वाला था ? प्रस्तुत रिपोर्ट में भी, जो उन्होंने कुशहा, नेपाल के पूर्वी एफ्लक्स बाँध पर चल रहे तथाकथित मरम्मत कार्य का जायजा लेने के बाद लिख कर भेजी है और जो >रविवार में छपी है, सरकारी-प्रशासनिक दावों के कपड़े उतारे हैं।
पूर्वी एफ्लक्स बांध पर बोल्डर लेकर कटान की ओर जानेवाले ट्रकों की कतार लगी हुई है. बांध पर चढ़ते ही एक सरकारी कर्मचारी बोल्डरों की माप करता है- एक फीट, दो फीट, तीन फीट...वह ट्रकों के नंबर दर्ज करता है और उन्हें आगे बढ़ने का इशारा करता है. ट्रक बहुत धीमे-धीमे सरकते हैं. पूरा बांध आने और जानेवाले ट्रकों-ट्रैक्टरों से भरा हुआ है. दायीं ओर साथ-साथ चलता है मधुबन जंगल... कोसी टापू वाइल्ड लाइफ रिजर्व. अपने दलदल, अरना भैंस और प्रवासी पक्षियों के लिए मशहूर संरक्षित अभयारण्य. पूरी दुनिया में यहां के अलावा सिर्फ असम के काजीरंगा नेशनल पार्क में ही मिलती है अरना भैंस-स्थानीय निवासी पूरे गर्व से बताते हैं. बांध इसी रिजर्व में बना है. ट्रकों का रेला देख कर एक नेपाली ग्रामीण हंसते हुए कहता है-लोगों को डुबा कर अब नींद खुली है भारतीय इंजीनियरों की. उनके सिर मानो भूत सवार है, अभी. हम तो पहले से ही कहते थे...
अब बांध के दोनों ओर बाढ़ में जान बचा कर आनेवाले शरणार्थियों के शिविर मिलने लगे हैं. नीले-काले तंबू. बीच-बीच में जालियां बुनते मजदूर भी दिख रहे हैं. नायलोन की पहले गोल चकती बनायी जाती है और फिर इस चकती से जाली बुनी जाती है. इसी बोरीनुमा जाली में बोल्डर भर कर कटान को बचाया जाता है, बांध पर दबाव कम किया जाता है. दाहिनी ओर सैकड़ों बोरियों में रेत भरी जा रही है. इनसे पाइलिंग की जायेगी. ...दाहिनी तरफ पेड़ों के उस पार चमकता हुआ कुछ दिखता है...कोसी! काफी चौड़ाई में फैली कोसी का वेग यहां उतना नहीं दिखता. लेकिन जैसे-जैसे आगे बढ़ते हैं, पश्चिम की ओर मुख्यधारा की दिशा में रेत दिखने लगती है. यह सिल्ट है, जिसे कोसी ने लाकर वर्षों से जमा किया है और जिसे कोसी प्रोजेक्ट और बिहार सरकार के इंजीनियर निकालना भूल गये हैं. कोसी अब अपने को एक संकरे गलियारे में पाती है और पूरब की ओर खिसकती हुई बांध से टकराती चलती है. इस हिस्से में उसका वेग बहुत तेज है.
अब ट्रकों का काफिला रुक गया है. आगे दूर तक गाड़ियां हैं. कटान तक पहुंची गाड़ियां जब बोल्डर उतार कर लौटेंगी, तो पीछेवाली गाड़ियां आगे बढ़ेंगी. अब आगे पैदल ही जाना होगा.13.60 आरडी. कोसी अपनी पूरी ताकत से स्पर पर चोट कर रही है. इस पर खतरा बना हुआ है. पचासेक मजदूर इसे बचाने में लगे हैं. क्रेटिंग की जा रही है. 12.90 आरडी से, बांध जहां से कटा है, 13.60 आरडी तक सबसे अधिक दबाव है. स्थानीय लोग दिखाते हैं, बांध पर जहां पहली बार पानी चढ़ा है-आज ही. शायद कंचनजंघा, महाभारत, वाराह क्षेत्र में कहीं बारिश हुई है. नदी में पानी बढ़ा है. वह कुसहा गांव के बचे हुए इलाकों में भी भर रहा है, कटे हुए हिस्से से निकल कर.कटान. डेढ़ से दो मीटर प्रति सेकेंड के वेग से बहता हुआ पानी कटे हुए बांध से निकल रहा है. अगले कुछ घंटों में वह वीरपुर, शंकरपुर, मुरलीगंज आदि से होता हुआ कुरसेला में गंगा से मिल जायेगा. कटान को देख कर ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि इसने कितनी तबाही मचायी होगी पिछले 22 दिनों में.
कटान का दूसरा हिस्सा सामने है-लगभग दो किमी दूर. वहां की गतिविधियां नहीं दिख रहीं यहां से. ठीक कटान पर 20-22 मजदूर कटान को बचाने के लिए कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उनकी गति भी झुंझला देने की हद तक धीमी है. नीचे पानी में रखी गयी जाली में एक-एक बोल्डर डाले जा रहे हैं. मजदूरों से पूछो, तो वे सामग्री की कमी इसकी वजह बताते हैं. वे शिकायत करते हैं कि उन्हें जाली नहीं मिल रही है. इसके अलावा वे रात में भी काम करना चाहते हैं, लेकिन शुरू के कुछ दिनों को छोड़ कर अब सिर्फ दिन में ही काम होता है. ग्रामीण कहते हैं-लगातार काम की जरूरत हैं. वे कहते है कि अपर्याप्त काम और धीमी गति के कारण धारा पर कोई असर नहीं पड़ रहा. वह सारी मेहनत बहा ले जाती है. प्राय: हर रोज नये सिरे से काम करना पड़ता है.
कट एंड को देखने से यह बात सही लगती है. पिछले कई दिनों से काम हो रहा है, लेकिन आज भी कटान पर अभी जाली-बोल्डर की पहली परत डालने का ही काम चल रहा है. मजदूरों का कहना है कि वे तो रात में काम करने के लिए आते हैं, लेकिन इंजीनियर-ठेकेदार नहीं रहते. सो काम कैसे हो? बांध के नीचे, कटान से थोड़ा पहले मिलते हैं प्रोजेक्ट इंजीनियर जेएन सिंह. वे नायलोन, बोल्डर की फर्जी सप्लाइ दिखानेवाले सप्लायर्स पर बिगड़ रहे हैं-ऐसा कैसे हो सकता है? आपने तो नायलोन की सप्लाई नहीं की. फिर आप डिलीवरी दिखा कैसे रहे हैं ?
उनके पास कुछ आंकड़े हैं. अब तक 5078 नायलोन क्रेटिंग की जा चुकी है. 1359 की संख्या में बोल्डर क्रेटिंग की गयी है. अब तक कुल 3729 घन मीटर बोल्डर सप्लाइ हुई है, जिसमें से 10 सितंबर की शाम तक 1150 घनमीटर बोल्डर बचा हुआ है. वे जल्दी-जल्दी कुछ सूचनाएं देते हैं- 13.60 स्पर पर खतरा था. उनकी क्रेटिंग जारी है. कट एंड को सुरक्षित कर लिया गया है. और काम? काम आप खुद देखिए. कितना हुआ है, आप देख ही रहे हैं. रात में काम न होने की शिकायतों को वे गलत ठहराते हैं. दिन-रात काम हो रहा है. कहने दीजिए मजदूरों को कुछ भी. प्रोजेक्ट इंजीनियर यहां कार्यरत कुल मजदूरों की संख्या 1000 बताते हैं. लेकिन ग्र्रामीण उनकी बात हंसी में उड़ा देते हैं.देवनारायण राउत कुशहा वार्ड नं 4 के हैं. कहते हैं-बहुत ज्यादा होंगे तब भी 400 से अधिक संख्या नहीं होगी मजदूरों की....दूसरे लोग उनकी तसदीक करते हैं. ...पश्चिम में सूरज डूब रहा है. बोल्डर गिरा कर गाड़ियां लौट रही हैं. ट्रक वापस लौटते हुए रसीद लेना नहीं भूलते. उनके बीच से जगह बनातीं जल संसाधन विभाग, बिहार सरकार की गाड़ियां तेजी से बांध से उतर रही हैं. ...वे सब लौट रहे हैं, संभवत:...ठेकेदार, इंजीनियर. तो क्या ग्रामीणों ने सही कहा था कि रात में काम नहीं होता?सुदूर उत्तर में घने बादल घिर आये हैं. शायद उधर बारिश हो रही है. काले बादल देख कर उस बूढ़े नेपाली मजदूर श्यामसुंदर की आंखों में भय छा जाता है- जाने क्या होने वाला है इस साल।

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Thursday, September 11, 2008

बाढ़ राहत कैंपः एक दृश्य

(भाई रेयाज़-उल-हक़ ने बथनाहा, फारबिसगंज से यह रिपोर्ट रविवार को भेजी है जो उसके १० सितम्बर के मुखपृष्ठ पर छपी है। रेयाज-उल ने इससे पहले भी बिहार के इस सरकार प्रायोजित जनसंहार की जीवंत तस्वीरें हमें दिखाई हैं और इसके लिए हमें उनका ऋणी होना ही चाहिए। पूरा मीडिया आज जिस किस्म की ठकुरसुहाती में संलिप्त है , इस घने अंधेरे वक़्त में ऐसे जीवट और साहसिक काम से रेयाज ने हमें सचमुच झकझोर दिया है। उनके साथ रविवार को भी साधुवाद सहित। )

२४ घंटे पहले एक बच्चे को जन्म देने के बाद से सविता देवी ने कुछ भी नहीं खाया है। दो घंटे पहले उसे चूडा-गुड़ दिया गया था खाने को, वह एक किनारे पड़ा हुआ है, अब भी –अछूता। बथनाहा के सशस्त्र सीमा बल कैंप के पास स्थित राहत शिविर मे यूनिसेफ व राज्य स्वास्थ्य समिति के तंबू में पड़ी सविता पसीने से नहाई हुई अपने बच्चे को चुप कराने का असफल प्रयास कर रही है।
उसके पास बैठी आंगनबाड़ी सेविका वंदना झा समझाती है- “ प्रसूता को खाने में कम से कम मसूर की दाल, चावल आदि तो मिलना ही चाहिए। यह भी नहीं मिला तो कैसे होगा ? खिचड़ी दी जा रही है, वह भी बिना दाल-सब्जी के। इस तरह तो ये लोग मार ही देंगे।”वंदना थोड़ी गुस्से में हैं और अपनी नाराज़गी शिविर का निरीक्षण करने आए जिलाधिकारी को भी दिखा चुकी हैं– थोड़ी देर पहले. और उनका गुस्सा वाजिब भी है. इतना समय बीत जाने पर भी मां-बच्चा को न कोई दवा मिली है और न ढंग का आहार. सविता में खून की कमी है– इसका भी शिविर में कोई उपाय नहीं है. वंदना जहां अपनी अन्य सहयोगियों के साथ दवा मांगने गयीं तो उन्हें डांट कर भगा दिया गया. मेडिकल कैंप प्रभारी कहते हैं कि उनके यहां कमी किसी चीज़ की नहीं है. तो फिर सविता को दवाएं क्य़ों नहीं दी जा रहीं ? वे इसका जवाब देना जरूरी नहीं समझते. कैंप प्रभारी कैलाश झा अपने तंबू में वाउचरों और लोगों में उलझे हुए हैं. वे कहते हैं – “ कैंप में कमी किसी चीज़ की नहीं है. जितना हो सकता है, हम कर रहे हैं.”.... तो फिर सिर्फ खिचड़ी और चूड़ा-गुड़ क्यों बंट रहा है ?वे कहते हैं– “ किसी ने हमसे इसकी मांग ही नहीं कि उसे दाल-चावल दिया जाए.”लेकिन किसी ने मांग नहीं की, सिर्फ इसीलिए उसे लगभग बिना दाल वाली खिचड़ी खिलायी जानी चाहिए ? लोग बताते हैं कि वे कई बार कह चुके हैं कि उन्हें सब्जी दी जाए, ढंग से चावल-दाल दिया जाए. लेकिन उनकी कोई सुनता नहीं है।
शंभू शर्मा सुपौल के छातापुर से आये हैं. सौभाग्य से उन्हें कैंप में काम मिल गया है स्टोर में. सुबह 6 से रात 11 बजे तक ड्यूटी करने के बाद वे 50 रुपये पाते हैं. उन्होंने दिहाड़ी बढ़ाने की बात की तो कहा गया कि काम करना है तो करो नहीं तो टेंट में जाकर बैठो. वे 'भीतर’ की बातें जानते हैं– कब, क्या, कितना आया और कितना बंटा.
दोपहर में बंटी मोटे चावल की खिचड़ी और बेस्वाद चोखा खाते हुए वे स्टोर की ओर हाथ उठाते हैं – “ देखिए, उसमें 20 बोरी चना रखा हुआ है। मैंने कल राशन इंचार्ज को कहा कि इसे खुला देते हैं, कल इसे भी बाटेंगे तो उसने मना कर दिया. सब कुछ आता है, लेकिन हमें सिर्फ खिचड़ी मिलती है. स्टोर में सब चीज़ है– फल है, एक क्विंटल बिस्कुट है. कोक का पैकेट है. लेकिन बंटता कुछ नहीं. वह सब अधिकारी और गार्ड लोग यूज़ करता है.” सुरक्षा ड्यूटी पर लगे अवर निरीक्षक राधाकृष्ण रजक इस सबको गलत बताते हैं. लेकिन आंगनबाड़ी सेविकाएं जो बताती हैं, उससे शंभु की बातें पुष्ट होती हैं. वंदना, सुमन व पार्वती समेत दूसरी सेविकाएं सुबह आठ बजे शिविर में आई हैं. अभी तक उन्हें खाने के लिए कुछ नहीं मिला है. वे कहती हैं– “हम यह नहीं चाहते के हमें खाना मिले. लेकिन बुरा तो तब लगता है जब गार्ड और अन्य अधिकारी पीड़ितों के लिए आये बिस्कुट और फल खुद खा जाते हैं.”सविता ने अपने बच्चे के सिराहने लोहे का हंसिया रख छोड़ा है – बुरी आत्माओं को दूर भगाने के लिए. काश ! यह इस तंत्र की संवेदनहीनता को भी दूर भगा पाता.
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Wednesday, September 10, 2008

कोसी की बाढ़ नहीं सरकार प्रायोजित जनसंहार

उत्तरी बिहार में पिछले १८ अगस्त से महाविनाश का जो तांडव चल रहा है उसे बाढ़ या प्राकृतिक आपदा कहने वाले या तो सरकारी मुलाजिम होंगे या फिर नीतिश के रिश्तेदार। मुख्यमंत्री ने जितने संगठित, सुनियोजित और दुर्लभ आक्रामकता के साथ इस भयावह जनसंहार को अंजाम दिया है उसका दूसरा उदाहरण इतिहास के बर्बर और जघन्य कालों में भी नहीं मिल सकता। क्या अब और ठहरकर सोचने का वक़्त है कि हम कैसे काल में जी रहे हैं ? क्या ऎसी सरकारों और इनके मुखियाओं के विरुद्ध आदिम ज़माने की बर्बर कार्रवाइयों के अलावा कोई विकल्प एक आम आदमी के पास बचता है ?
बिहार में पिछले १८ अगस्त से जनसंहार हो रहा है। आदमी के पास बचने का कोई रास्ता नहीं छोड़ा जा रहा, नहीं छोड़ा गया। या तो उसे डूबकर मरना है, या भूख से। अगर तब भी नहीं मरा तो सरकारी नावें बीच धार में उसे डुबो रही हैं। जितनी नावें लोगों को बचाने (मारने) में लगी हैं उससे ज़्यादा उनके खाली पड़े घरों को लूटने में लगी हैं। बिहार के सभी सामंतों, बाहुबलियों, अपहर्ताओं, डकैतों, लुटेरों, ठेकेदारों, बलात्कारियों को इस सरकारी महाअभियान में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गयी हैं और वे अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर रहे हैं। जितने व्यापक पैमाने पर सरकार अपने लक्ष्य हासिल कर पा रही है उससे पता चलता है कि सरकार ने इस महाजनसंहार को अंजाम देने के लिए गंभीर पूर्वाभ्यास किया था। तभी तो एक तरफ सरकार इतनी ढिठाई के साथ इस जनसंहार के मामले में ख़ुद को पाक-साफ़ बताने में लगी है और पूरा सरकारी अमला हरबे-हथियार लेकर इस मामले में अपने सिवाय हर दूसरे को जिम्मेदार बता रहा है - तो दूसरी तरफ सबकुछ गँवा चुके, उजड़े-विस्थापित, स्वजन-सम्बन्धियों के मृत्युशोक से भरे, भूखे-बीमार, असहाय-निराश्रित लोगों के साथ बर्बरतम सलूक किया जा रहा है। उनकी बहू-बेटियों को बेइज्जत किया जा रहा है, बीमार बच्चों के लिए दवाइयाँ नहीं दी जा रहीं, भूख से बिलबिलाते बुजुर्गों, महिलाओं और गरीब-लाचार लोगों को खाना नहीं दिया जा रहा। सरकारी राहत शिविरों के वधस्थलों से जान बचाकर जो लोग परिवार लेकर अपने घर-गाँव लौट जा रहे हैं सरकारी सेना ''हांका'' देकर उन्हें वहां से भगा रही है। इन राहत(!) शिविरों की इससे बढ़कर और क्या असलियत होगी कि लोगों को अपने डूबे हुए घर इनसे ज़्यादा निरापद लग रहे हैं। सेना कैसी हुआ करती है इसका कड़वा अनुभव नेपाल की सीमा से लगे जिलों के लोगों ने अटल बिहारी के समय से ही लिया है।
सशस्त्र सीमा बल (यानि एस एस बी) की पिछले लगभग ७-८ वर्षों से उपस्थिति ने यहाँ के सीधे-सादे और अत्यन्त शांतिप्रिय जनजीवन में जितना ज़हर घोला है उससे समस्त क्षेत्र पहले ही सशंकित-आतंकित था/है। न केवल सुपौल, अररिया या अन्य सीमावर्ती जिलों के, बल्कि नेपाल के लोगों का जीवन भी इन सुरक्षा बलों ने दूभर कर रखा है। तस्करी रोकने एवं आई एस आई के तंत्र को ध्वस्त करने के लिए तैनात किए गए इन बलों ने यहाँ के सामाजिक जीवन को ही ध्वस्त किया है और भोले-भाले, निरीह लोगों को धमकाया है, यातनाएं दी हैं। गौरतलब है कि सुपौल के इन सीमावर्ती इलाकों में मुस्लिम समुदाय के लोगों की बहुतायत है और इनमें से ज्यादातर या तो खेतिहर मजदूर हैं या फिर कारीगरी का काम करने वाले। मुस्लिम समुदाय के अनगिनत युवक और महिलाएं इन बलों की ज्यादतियों के शिकार हुए हैं, पर इसकी शिकायत वे कहाँ करें यह एक बड़ा सवाल है। विरोध करने का एक बड़ा खतरा तो यह भी है कि इससे इन्हें आई एस आई का पक्षधर बता दिया जाए, जो कि होना ही है, और बदले में दुगुनी प्रतिहिंसा इन्हें झेलनी पड़ेगी। देश भर में सुरक्षा बलों ने नागरिक समुदायों पर जितने ज़ुल्म ढाए हैं इसकी मिसाल देने की यहाँ कोई ज़रूरत नहीं है। एस एस बी का जितना आतंक और गुंडाराज यहाँ चल रहा है उसकी गवाही इस इलाके का हर बच्चा-बच्चा दे सकता है। जनता और सरकार के संसाधनों को लूटने की खुली छूट पाए इन सुरक्षा बलों ने खूब पैसा तो बनाया ही है, यहाँ की बहुमूल्य वन सम्पदा की भी ये खुले आम तस्करी कर रहे हैं। वीरपुर, छातापुर, नरपतगंज, राघोपुर, करजाइन, बलुआ आदि इलाकों के बहुमूल्य शीशम के लाखों पेंड़ जो वन-विभाग के अंतर्गत आते थे , इन सुरक्षा बलों द्वारा कटवाकर गायब कर दिए गए हैं और पूरा इलाका पेंड़ विहीन होता जा रहा है।
कहने का तात्पर्य यह कि जिन सुरक्षा बलों का यह रूप यहाँ के लोगों ने देखा-महसूस किया है आज उसीकी रहनुमाई में रहने के लिए भला कैसे लोग तैयार होंगे? बिहार के इन इलाकों के लोगों का नेपाल की तराई क्षेत्र के लोगों के साथ जितना अपनापा रहा था, शादी-ब्याह, मुंडन-उपनयन, हाट-बजार, नैहर-ससुराल का जो अभिन्न-प्रगाढ़ रिश्ता था उसे ख़त्म करने में इन बलों ने कोई कसर नहीं छोड़ी और यहाँ के जन जीवन में साम्प्रदायिकता का बीजारोपण किया। आज सरकार इन लोगों को फिर सुरक्षा बलों के हवाले कर रही है। दरअसल जिंदा बचे लोगों को पूरी तरह कुचलने का यह अमोघ अस्त्र है सरकार की यही सोच है।
देशभर के-दुनिया भर के लोग जो एक सरकार द्वारा प्रायोजित मुसीबत में फंसे लोगों की मदद करना चाह रहे हैं उनके सामने कोई चारा-कोई रास्ता नहीं है। उन्हें अपनी मदद उस सरकार के हवाले करने पर मजबूर होना पड़ रहा है जिसके बारे में अब हर कोई यह समझ रहा है कि यह नरमेध उसने ही रचा है। कैसे पहुचेगी कोई मदद, कौन पहुँचायेगा इन निरीह लोगों तक कोई मदद जब पूरी सरकार, सरकारी अमले, गुंडों-बलात्कारियों की पूरी सरकार समर्थित सेना चीलों-गिद्धों की तरह हर मदद पर बाज-झपट्टा मारने, अपने पैने दांत गाड़ने को तत्पर है।
सचमुच अब केवल भगवान के आसरे हैं ये लाखों-लाख लोग। आने वाले पांछ-छः महीनों में घर वापसी के कोई आसार नहीं। घर वापसी के बाद भी क्या होगा सब जानते हैं। क्या खाना है, कैसे जीना है किसी को पता नहीं। जो वापसी का सपना त्यागकर निकल पड़े हैं पटना, दिल्ली, मुंबई, पंजाब, हरियाणा और जाने कहाँ-कहाँ सचमुच में कहाँ जा रहे हैं ये लोग? इनके बच्चे, इनकी महिलाएं क्या करेंगी, क्या होगा इनका? सम्भव है इनमें से ज्यादातर बच्चे-औरतें देशी-विदेशी सेक्स-मंडियों में पहुच जायें, भीख मांगें, पुलिस के दैहिक मानसिक शोषण का शिकार बनें और ये मर्द नशा करें, अपराध करें, जेल जायें और इनका एनकाउंटर कर दिया जाए। बिल्कुल सम्भव है और यही तो इस देश के ग़रीबों का राजपथ है, इससे बचकर कहाँ जायेंगे?

Tuesday, September 9, 2008

संदिग्ध नहीं संधि

अवधेश कुमार

कोसी द्वारा जल प्लावन के विकराल रूप धारण करने की खबरें जैसे ही आनी लगी, नेपाल को खलनायक के रूप में पेश किया जाने लगा। कोसी का उद्गम स्रोत नेपाल है और बांध भी कुसहा में टूटा। इस नाते नेपाल की आ॓र उंगली उठनी अस्वाभाविक नहीं है। लेकिन क्या वाकई नेपाल इस प्रलय सदृश स्थिति के लिए जिम्मेदार है? केवल कोसी ही नहीं, बिहार खासकर उत्तर बिहार की बाढ़ का मुख्य स्रोत ही नेपाल है। चाहे वह बूढ़ी गंडक हो या बागमती, कमला हो या भूतही बलान, सभी का उद्गम स्थल नेपाल है। भारत-नेपाल के बीच इन नदियों के प्रयोग एवं परियोजनाओं पर अलग–अलग संधियाँ हैं। यहां हम कोसी पर ही ध्यान केंद्रित करेंगे तो दोनों देशों की नदी जल से जुड़ी सारी बातें स्पष्ट हो जाएंगी।

1954 की कोसी संधि में भारत ने कोसी परियोजना की रूपरेखा बनाने से लेकर निर्माण, संचालन, रख–रखाव आदि की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले रखी है। नेपाल तब बहुत कुछ करने की हालत में नहीं था और दोनों के बीच विश्वास इतने गहरे थे कि एक बार कोसी परियोजना तय हो गई तो फिर केवल औपचारिकता के लिए संधि की गई। यह आपसी सहयोग की भावना से की गई विश्वास पर आधारित संधि थी। कहा जाता है कि संधि के अनुसार नेपाल के लिए करने को बहुत कुछ बचता नहीं है। उसे व्यवहार में केवल भारत को काम करने की, वहां आवश्यक बोल्डर बगैरह रखने की अनुमति देनी है। यह पूरा सच नहीं है। बिहार सरकार बांधों की मरम्मत में कोताही बरत रही थी तो नेपाल ने पानी के बहाव की मॉनिटरिंग एवं बाढ़ की चेतावनी देने की जिम्मेदारी पूरी नहीं की है। उनकी सोच शायद यह थी कि यह उनके लिए बडा़ खतरा साबित नहीं होगा। नेपाल में लंबे समय तक के राजनीतिक गतिरोध के कारण समस्या गंभीर हुई। माआ॓वादियों की यंग कम्युनिस्ट लीग एवं जनशक्ति सेना ने इंजीनियरों व ठेकेदारों को मरम्मत का काम करने नहीं दिया। यानी माआ॓वादियों के उभार से भारत के ठेकदारों व इंजीनियरों के लिए काम करना मुश्किल हुआ है। किंतु इसमें बाधा संधि नहीं आपसी व्यवहार है।

दरअसल, सारी नदी परियोजनाएं, सिंचाई परियोजनाएं भ्रष्टाचार की शिकार हैं और वे नेपाल तक विस्तारित हैं। बिहार में सिंचाई विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार पर काम करने वालों ने स्वीकार किया है कि प्रतिवर्ष निर्माण एवं मरम्मती के नाम पर निर्गत होने वाली 250–300 करोड़ रूपये का 30 प्रतिशत से भी कम खर्च होता है और शेष इंजीनियरों, नेताओं व अधिकारियों की जेब में चला जाता है। नेपाल के दबंग लोगों ने भी इसमें हिस्सेदारी मांगनी शुरू की। माआ॓वादियों के उभार के बाद मांग इतनी बढ़ गई कि ठेकेदार के लिए इसे पूरा करना संभव नहीं हुआ। दूसरी आ॓र माआ॓वादी नदी परियोजनााओं के विरूद्ध अभियान भी चलाए हुए थे और उन्होंने जो थोडा़ बहुत बोल्डर वहां रखा था उसे हटवा दिया। किंतु सोचने वाली बात है कि मरम्मत का काम तो जनवरी से मार्च तक समाप्त हो जाना चाहिए। जुलाई-अगस्त में चिंता क्यों की गई? सिंचाई विभाग की यही कार्यशैली है। संधि के प्रावधान अपनी जगह हैं लेकिन व्यवहार में भ्रष्टाचार, लापरवाही एवं नेपाल के माआ॓वादियों के विरोध की ही मुख्य भूमिका है। संधि के अनुसार आपात स्थिति के लिए जितने बोल्डर एवं अन्य सामग्री वहां रहनी चाहिए, कभी नहीं रहती एवं कालाबाजार में बिक जाती है। ये कारण सभी परियोजनाओं पर लागू होती है। जाहिर है, भारत और नेपाल के बीच पुराने दौर की सद्भावना हो और दोनों के राजनीतिक प्रतिष्ठान तय करें तो मौजूदा संधियों के तहत भी ऐसी भयावह स्थिति को टाला जा सकता है। माआ॓वादियों के नेतृत्व में नई गठजोड़ सरकार के प्रधानमंत्री प्रचंड ने कोसी संधि को अन्यायपूर्ण कहकर इसकी समीक्षा की मांग की है। 1959 की गंडक संधि की समीक्षा की भी मांग है। 1996 की महाकाली पंचेश्वर परियोजना को ये नेपाल की तत्कालीन शेर बहादुर देउबा सरकार की भूल करार देते हैं। क्या संधियों की समीक्षा एवं इसमें बदलाव या इन्हें रद्द कर देने से इसका निदान निकल जाएगा? 19 दिसंबर 1966 को कोसी संधि में संशोधन करके नेपाल के लिए कोसी नदी, सन कोसी एवं उसकी अन्य सहायक नदियों के पानी का सिंचाई सहित अन्य प्रकार के उपयोगों के पूरे अधिकार का शब्द डाला गया। यानी नेपाल को इसका स्वामित्व मिल गया है। भारत को बैराज में उपलब्ध पानी को संतुलित करने का अधिकार मिला। इसलिए यह कहना सही नहीं है कि कोसी संधि नेपाल के लिए बिल्कुल अन्यायपूर्ण है। मूल बात व्यवहार की है। वाल्मिकी नगर गंडक परियोजना को देख लीजिए, उसमें भी नेपाल अधिकारविहीन नहीं है। किंतु वहां भी यही आलम है- भ्रष्टाचार, आपसी तनाव। भारत पर अन्याय करने का आरोप। प्रश्न है कि किया क्या जाए?

साफ है कि दोनों देशों की सहमति से ही नदी जल समस्याओं का निदान हो सकता है। दोनों जो भी निर्णय करें लेकिन मरम्मत, रख–रखाव एवं गाद की सफाई का संयुक्त माकूल तंत्र खडा़ नहीं होगा तो कुछ नहीं हो सकता। बैराज में गाद बढ़ेगा तो नदी धारा बदलेगी। नेपाल के लिए भी अतिरिक्त पानी छोड़ने की मजबूरी होगी एवं इसका परिणाम हमारे यहां बाढ़ ही होगा। इसे आप नहीं टाल सकते। कहा जा रहा है कि कोसी बांध की उंचाई बढा़ना इसका निदान है। यानी बांध ऊंचा होने से ज्यादा पानी रूकेगा, जिससे बिजली भी ज्यादा बनेगी एवं सिंचाई के लिए सुरक्षित जल उपलब्ध रहेगा तथा बाढ़ भी नहीं आएगी। 2004 के कोसी बाढ़ के बाद दोनों देशों ने कोसी बांध की ऊंचाई बढा़ने वाली महापरियोजना जिसे सप्तकोसी बहुद्देश्यीय परियोजना कहते हैं, पर तेजी से कम करने का निर्णय लिया था। इसके अनुसार नेपाल के आ॓खलाढुंगा जिले में सन कोसी नदी पर एक बांध बनेगा, जिसकी ऊंचाई 269 से 335 मीटर की जानी है। इसमें नेपाल एवं बिहार में 6 लाख हेक्टेयर से ज्यादा खेतों की सिंचाई होगी। स्वयं नेपाल ने इसमें एक डायवर्जन का प्रस्ताव रखा था जिसमें सन कोसी का जल एक नहर के माध्यम से मध्य नेपाल के कमला नदी में आनी है। इससे जुड़े अन्य नहरों से मध्य नेपाल में कोसी नदी के पूरब बागमती तक के खेतों की सिंचाई की योजना है। भारत सरकार ने 29 करोड़ रूपया इसके प्रोजेक्ट रिपोर्ट पर खर्च कर दिया है। संधि की समीक्षा का अर्थ इस परियोजना का खटाई में पड़ना है। शायद नेपाल की नई सरकार इसके लिए तैयार हो जाएगी।

नेपाल के विदेश मंत्री उपेंद्र यादव हाल में भारत में थे और उन्होंने कहा कि उनकी सरकार बड़ी बिजली परियोजनाओं के पक्ष में है। इनके अलावा तत्काल चार काम किया जाना चाहिए। एक, बीरपुर क्षेत्र के जो लोग नेपाल की आ॓र गए हैं, उनके पास भारत आने का एकमात्र विकल्प महेन्द्र राजमार्ग है। नेपाल अपने राहत शिविरों में इन्हें स्थान दे और इसका हिसाब रखे। भारत सरकार इसके लिए नेपाल से बात करे एवं अपने करीब 50–60 हजार नागरिकों के लिए उसे धन प्रदान कर दे। दूसरे, जो लोग उस रास्ते पुन: बिहार में प्रवेश करना चाहते हैं उन्हें आने दिया जाए। इसे स्थायी व्यवस्था का रूप मिले ताकि जब भी ऐसी स्थिति हो लोग उस मार्ग का उपयोग कर सकें। तीसरे, दोनों देशों के नदी जल विशेषज्ञों की सरकारी मॉनिटरिंग में बातचीत आरंभ की जाए और जो तय हो उसे लागू किया जाए। चौथे, नेपाल चाहता है तो नदी जल समझौतों की समीक्षा अवश्य होनी चाहिए।

http://www.rashtriyasahara.com/ से साभार

जल प्रलय या आपराधिक लापरवाही

राजीव रंजन
अगर सीमांचल के छह जिलों में कोसी नदी की उद्दंडता और तबाही का इतिहास लिखा जायेगा तब कटघरे में सिर्फ कोसी नदी नहीं होगी। उसके साथ खड़े होंगे राज्य और केंद्र सरकार के वे प्रशासनिक महकमे जिनके जिम्मे थी नेपाल में अवस्थित वह बांध, जिसके बंधे होने से महफूज थी बिहार के सीमांचल जिलों में रहने वाली कराड़ों की आबादी। यह आबादी पिछले साठ वर्षों में लगभग भूल चुकी थी बाढ़ की त्रासदी और कोसी के महाजलप्रलय की कहानियां। अगर कोसी के जलप्रलय का इतिहास लिखा जायेगा तब कटघरे में खड़े होंगे, वे अभियंता जिन्हें गत 6 अगस्त को नेपाल के कुसहा बराज के समीप कोसी नदी के बांध में हो रहे कटाव का जायजा लेने को भेजा गया था। इतिहास के पन्नों में कैद होगी पिछली सरकार की उदासीनता और कथित ईमानदारी भी, जिसके कारण राज्य सरकार के अभियंता कुसहा बराज और वहां बने बांध की रक्षा करना अब अपनी जिम्मेदारियों का हिस्सा नहीं मानते थे। साथ ही दर्ज होगा नेपाल के साथ बेटी और रोटी का वह रिश्ता जो न जाने पिछली कई सदियों से एक-दूसरे के पूरक बने हुए हैं।
इतिहास जब कोसी के महाजलप्रलय का अपराध लिखेगा तब लिखी जायेगी 21वीं सदी के भारत में आपदा प्रबंधन की सुस्त चाल। जब कोसी की प्रचंड जलधाराओं ने नेपाल भाग में कुसहा के समीप एफलेक्स बांध के 12.10 और 12.90 किमी के बंधन को तोड़कर सीमांचल के छह जिलों का रूख कर लिया तब बिहार सरकार और भारत सरकार का आपदा प्रबंधन तंत्र क्या कर रहा था? ऐसा नहीं है कि बिहार में ‘कोसी मैया’ कहकर पुकारी जाने वाली कोसी नदी ने अपनी प्रंचडता और जल प्रलय का यह मंजर दिखाने से पहले सीमांचल के छह जिलों में रहने वाली करोड़ों की आबादी और उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी लेने वाली सरकार को आगाह नहीं किया था।
कोसी के इस महाप्रलय की कहानी गत 5 अगस्त को ही शुरू हो गयी, जब वहां से अभियंताओं की टीम ने राज्य सरकार को पत्र लिखकर नेपाल भाग के कुसहा में बनी कोसी की बांध में टूटान की सूचना दी थी। इस सूचना के बाद 6 अगस्त को अभियंताओं की एक टीम कुसहा जाकर स्थिति का आकलन किया और सरकार को जानकारी दी कि कटाव तो हो रहा है लेकिन वह इतना बड़ा नहीं है जितना कि बताया गया है। इसके बाद बांध की मरम्मत के लिए नेपाल में निर्माण सामग्री भी गिराई गई पर सुरक्षा के अभाव में वहां के असामाजिक तत्वों ने निर्माण सामग्री गायब कर दी। नेपाल सरकार से सुरक्षा की गुहार भी लगायी गयी लेकिन तब नेपाल में राजनीतिक उथल-पुथल और प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ की ताजपोशी के बीच ये गुहार बेअसर साबित हुई। तब नेपाल में बदले राजनीतिक हालात और माआ॓वादियों की बढ़ी शक्ति के कारण बांध की मरम्मती के काम के लिए वहां के ठेकेदारों और मजदूरों ने बिहार सरकार से मेहनताने के रूप में उस रकम की मांग की जिसे मंजूर करने की इजाजत सरकार ने भी नहीं दे रखी थी। बता दें कि भारत-नेपाल में वर्ष 1956 में कोसी नदी पर बने बराज और तटबंध को लेकर हुए समझौते में यह तय हुआ था कि बराज और तटबंधों के रख-रखाव की पूरी जिम्मेवारी तो भारत व बिहार सरकार की होगी, अभियंता भी भारतीय होंगे लेकिन रख-रखाव और मरम्मती के काम में सिर्फ नेपाली ठेकेदारों और मजदूरों को लगाया जायेगा। समझौते की इसी बंदु के कारण तेजी से कट रहे एफलेक्स बांध की मरम्मती का काम शुरू नहीं हो सका। अगर बिहार सरकार के जल संसाधन विभाग के सूत्रों की मानें तो वर्ष 2003-04 तक कोसी नदी पर नेपाल भाग में बने कुसहा बराज पर पदस्थापना के लिए अभियंताओं की बोली लगती थी। वहां सालों भर चलने वाले मरम्मती के कार्यों में कमीशनखोरी का इतना बोलबाला था कि हर अभियंता अपनी पूरी सेवा में एक बार वहां तैनाती चाहता था। लेकिन पिछली सरकार के जल संसाधन मंत्री ने इसपर पूरी तरह रोक दिया जिसका परिणाम यह हुआ कि अभियंता यहां पदस्थापना को ही सजा मानने लगे। काम में दिलचस्पी लेने की पुरानी परम्परा खत्म हो गयी। नतीजा आज सबके सामने है।
जब पूरा देश 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस की वर्षगांठ मनाने में व्यस्त था तब कोसी नदी प्रलय की नयी कहानी गढ़ रही थी। इस पूरे प्रकरण में सबसे अजीब स्थिति तो बिहार सरकार के जल संसाधन विभाग की थी जिसने इतना सबकुछ होते हुए भी राजधानी पटना में बैठकर अपने अभियंताओं और अधिकारियों को इतनी छूट दिये रखा कि वहां तटबंध तेजी से कटते रहे और वे यहां बैठकर दावा करते रहे कि नेपाल के रास्ते बिहार में प्रवेश करने वाली नदियों के बराज, तटबंध और बांध पूरी तरह सुरक्षित हैं। लाखों-करोड़ों जिंदगियों के साथ लापरवाही का आलम यहीं खत्म नहीं होता। सूत्रों की मानें तो कोसी नदी के तटबंधों और बराज के रख-रखाव के लिए राज्य सरकार के खाते में अभी भी 80 करोड़ रूपये की राशि रखी हुई है लेकिन मरम्मती के नाम पर खर्च हुए महज 44 लाख रूपये।
जब गत 5 अगस्त को टूटान की सूचना मिली तब जाकर जल संसाधन विभाग ने कुल 6 लाख रूपये के निर्माण कार्य के लिए सामग्री मंगायी जिसे नेपाल के असामाजिक तत्व उठाकर अपने साथ ले गये। सीमांचल में रह रहे लोगों की जानमाल के साथ खिलवाड़ का यह सिलसिला आगे भी जारी रहा और तब आयी 18 अगस्त की वह दोपहर जब कोसी की बेलगाम जलधारा ने कुसहा के समीप एफलेक्स बांध की 12.10 तथा 12.90 किमी के बीच करीब 50 मीटर के बांध को तोड़कर फिर आ॓र अपना रूख कर लिया जिसे पिछले 60 सालों से सुरक्षित समझा जा रहा था। अब यह टूटान लगभग तीन किमी लंबी हो चुकी है। वैसे बाढ़ का पानी उत्तर बिहार के लिए कोई नयी त्रासदी नहीं है लेकिन इस बार कोसी का पानी सूबे के उन इलाकों को अपनी चपेट में लिया है जो अबतक सुरक्षित समझे जाते थे। त्रासदी का दंश यहां इसलिए भी अधिक तीखा है क्योंकि यहां की वर्तमान पीढ़ी पिछले साठ सालों से बाढ़ के कहर को भूल चुकी थी।

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सावधानी हटी दुर्घटना घटी

सुरेंद्र किशोर (वरिष्ठ पत्रकार)

बिहार सरकार, भारत सरकार, नेपाल सरकार और पक्ष- विपक्ष के अधिकतर नेतागण, कोशी बाढ़ विपदा को लेकर सब के सब पीड़ित जनता व अन्य जानकार लोगों के सवालों के कठघरे में हैं। सवाल यह है कि समय रहते और मौका मिलने पर कितने लोगों ने ईमानदारी व कार्य कुशलतापूर्वक अपनी भूमिका निभाई? सबको बारी-बारी से इसका जवाब देना है। पर अभी तो सब एक-दूसरे पर आरोप लगाने में लगे हुए हैं या फिर अपनी जिम्मेदारियों से बचने की कोशिश में हैं। उधर, पूर्वोत्तर बिहार के करीब 30 लाख बाढ़ पीड़ितों के रिलीफ व पुनर्वास का विशाल काम अभी लंबे समय तक जारी रहना है। यह विपदा इतनी बड़ी है कि इस तरह का कोई दूसरा उदाहरण इतिहास में खोजे नहीं मिल रहा है। यह विपदा कितनी दैवी है और कितनी मानवनिर्मित, इस पर भी बहस जारी है। पक्ष-विपक्ष के नेताओं की आ॓र से जो बना–बनाया बयान रोज ब रोज परोसा जा रहा है, वह यह है कि हम नहीं बल्कि हमारे राजनीतिक विरोधी ही इसके लिए जिम्मेदार हैं।

ऐसे बयान पढ़ और सुनकर लोग बाग हैरान हैं। कोसी तटबंध विध्वंस के लिए जिम्मेदार तत्वों को लेकर रोज ब रोज नए-नए तथ्य भी मीडिया में आ रहे हैं। अब तक मिली जानकारियों के आधार पर मोटा- मोटी इस दुर्घटना की जो तस्वीर उभरती है, उसके अनुसार कमोवेश सभी संबंधित पक्ष जिम्मेदार लग रहे हैं। हालांकि कुछ बातें इतनी तकनीकी और पेचीदगी भरी है कि उनके आधार पर कोई उच्चाधिकारप्राप्त आयोग ही जांच के बाद किसी ठोस नतीजे पर पहुंच सकता है। इतनी बड़ी दुर्घटना के लिए कौन-कौन से तत्व व पात्र जिम्मेदार रहे हैं, इसकी जांच जरूरी मानी जा रही है। अन्यथा ऐसी किसी अन्य दुर्घटना की आशंका से इनकार भी नहीं किया जा सकता।

मामला इतना संश्लिष्ट है कि एक ही सरकारी पत्र को आधार बना कर सत्ताधारी पक्ष अपना बचाव कर रहा है तो विरोध पक्ष कोसी तटबंध को टूटने से बचाने में विफल रहने के लिए सरकार पर बयानी हमला कर रहा है। वह पत्र वीरपुर, नेपाल स्थित जल संसाधन विभाग, बिहार सरकार के मुख्य अभियंता सत्यनारायण का है। नौ अगस्त 2008 को मुख्य अभियंता ने काठमांडू स्थित संपर्क पदाधिकारी अरूण कुमार को लिखा कि ‘सूचित करना है कि आरक्ष, बन टप्पू प्रक्षेत्र, कुशहा, जिला–सुनसरी(नेपाल)कार्यालय के समीप पूर्वी बहोत्थान बांध के स्पर किलोमीटर 12.90 पर कोशी नदी के तीव्र प्रवाह के कारण भीषण कटाव जारी है। अंतत: बांध वहीं टूटा। रात-दिन बाढ़ संघर्षात्मक कार्य कराए जा रहे हैं। इस स्पर पर भारतीय भूभाग से आवश्यक बाढ़ सामग्री नेपाल प्रभाग में ले जाने में भंटावारी कस्टम, सुनसरी (नेपाल)द्वारा अनावश्यक विलंब किया जा रहा है। साथ ही स्थल पर कार्यरत मजदूरों को बनटप्पू आरक्ष सेना, कुशहा द्वारा कार्यस्थल से भगा दिए जाने के कारण बाढ़ संघर्षात्मक कार्य प्रभावित हो रहे हैं।

’मुख्य अभियंता ने लिखा कि ‘अत: स्थल को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से नेपाल प्रशासन से सहयोग की अपेक्षा की जा रही है। अनुरोध है कि इस संदर्भ में उच्चस्तरीय सहयोग हेतु समुचित कार्रवाई करना चाहेंगे।’ इस पत्र की प्रतियां उन्होंने पटना स्थित अपने विभाग के अफसरों को भेजी या नहीं, यह बात इस पत्र की फोटो कापी देखने से साफ नहीं है। पर बाद में सत्यनारायण ने जो चिटि्ठयां उन्होंने 14, 15 और 16 अगस्त 2008 को भेजीं, उनकी प्रतियां उन्होंने पटना में अपने उच्चाधिकारियों को भी भेजीं। तब तक स्थिति काफी बिगड़ चुकी थी। तटबंध की रक्षा नहीं की जा सकी और इस बीच 18 अगस्त को तटबंध टूट गया। उससे बिहार के आधा दर्जन जिलों में जो प्रलयंकर बाढ़ आई, उसकी हृदय विदारक पीडा़ लोगबाग झेल रहे हैं। अनेकानेक पीड़ितों की दर्दनाक स्थिति टीवी पर देखकर देश-प्रदेश के अनेक लोग मर्माहत हैं।

इस बीच मुख्य अभियंता सत्यनारायण के पत्र को बिहार के सत्ताधारियों ने इस तरह अपने बचाव का हथियार बनाया कि उस पत्र के अनुसार मजदूरों को वहां काम नहीं करने दिया गया और कस्टम के लोगों ने भी आवश्यक बाढ़ सामग्री को स्थल पर ले जाने में अनावश्यक विलंब कराया। पर दूसरी आ॓र प्रतिपक्ष ने आरोप लगाया कि मुख्य अभियंता द्वारा बार-बार पत्र लिखे जाने के बावजूद बिहार सरकार ने समय रहते तटबंध को कटने से रोकने के लिए समुचित कदम नहीं उठाया। इसको लेकर राजद नेता और राज्य के पूर्व सिंचाई मंत्री जगदानंद ने कहा कि ‘बांध टूटा नहीं है बल्कि उसे तोडा़ गया है। उन्होंने कहा कि छह अगस्त से ही एफलक्स बांध में रिसाव शुरू हो जाने की जानकारी बिहार सरकार को थी। पर उसे रोकने के लिए कार्रवाई नहीं की गई। इसके लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार व उनकी सरकार कातिल है और उन्हें एक दिन जेल जाना पड़ेगा।’ बिहार जदयू के अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह ने कहा कि राजद गलतबयानी कर रहा है। राज्य सरकार ने पांच अगस्त से ही कोसी के कटाव वाले स्थल पर कटाव रोकने के लिए काम शुरू कर दिया था लेकिन नेपाल के स्थानीय लोगों और वहां के प्रशासन का सकरात्मक सहयोग नहीं मिल सका। नौ, चौदह, पंद्रह और सोलह अगस्त को नेपाल स्थित भारतीय दूतावास और केंद्र सरकार को पत्र लिखकर स्थिति से अवगत करा दिया गया था। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी से बातचीत की। फिर भी केंद्र सरकार की आ॓र से सकारात्मक पहल नहीं की जा सकी।

याद रहे कि जहां कोसी का तटबंध टूटा है, वह स्थल नेपाल में है। वहां मरम्मत व दूसरे कार्यों को लेकर आए दिन माआ॓वादियों के विरोध का सामना बिहार सरकार के सिंचाई विभाग के अफसरों को करना पडा़ है। हाल के महीनों में नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता का माहौल रहा, इस कारण भी तटबंध पर काम करने में नेपाल सरकार पहले जैसा सहयोग नहीं दे सकी। 1993 में भी उसी स्थल पर कटाव का खतरा उपस्थित हुआ था। तब के सिचाई मंत्री जगदानंद और सिंचाई सचिव विजय शंकर दुबे के अथक प्रयास से कटाव नहीं होने दिया गया था। तब आज के सिंचाई मंत्री विजेंद्र यादव लालू मंत्रिमंडल के सदस्य थे और उस स्थल पर जगदानंद के साथ गए भी थे। वे उस स्थल की नाजुक स्थिति को देख चुके थे। फिर भी इस बार वे भरपूर तत्परता नहीं दिखा सके, इसको लेकर आश्चर्य व्यक्त किया जा रहा है।

हाल में नेपाल के एक अखबार ‘सिंहनाद ’ में प्रकाशित एक खबर का शीर्षक था,‘ कोशी बाढ़ पर नेपाल सरकार द्वारा गलती स्वीकार’। उस खबर के अनुसार,‘माआ॓वादी के तमाम नेताओं और मंत्रियों द्वारा कोसी बांध के टूटने के पीछे भारत को दोषी ठहराने की होड़ चली लेकिन आज सरकार के प्रमुख अधिकारी ने स्वीकार किया कि बांध टूटने में भारत नहीं बल्कि नेपाल सरकार दोषी है। गृह मंत्रलय के प्रमुख सचिव उमेश कांत मैनाली ने कहा कि समय पर भारत सरकार और उनके अधिकारियों के साथ समन्वय नहीं किए जाने के कारण ही सप्त कोशी बांध टूट गया है। संविधान सभा के अध्यक्ष सुबास नेमांग द्वारा आयोजित सर्वदलीय बैठक में गृह सचिव ने अपनी सरकार की कमी– कमजोरी को स्वीकारा।’ यानी इस बांध को बचाने की जिम्मेदारी देश-विदेश के जिन जिन तत्वों पर थी, उन लोगों ने यदि दूरदर्शितापूर्ण काम किए होते तो शायद ऐसी विपदा सामने नहीं आती।

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हमने ही तैयार किया जल बम

राजेंद्र सिह (संरक्षक, जल बिरादरी )
बिहार में हर साल आने वाली बाढ़ का मुख्य कारण केंद्र और वहां की प्रदेश सरकार की अदूरदर्शी योजनाएं हैं। कोसी नदी जो 120 किलोमीटर के क्षेत्र में बहती है, उसे एक नाले में तब्दील कर दिया गया। नदी पर बिना सोचे-समझे तटबंध बनने से परमाणु बम की तरह जल बम का निर्माण कर दिया गया। अब यह जल बम भारी तबाही का कारण बना है। नेपाल और भारत सरकार की साझा योजना के तहत कोसी पर तटबंध का निर्माण हुआ था। इसके रख-रखाव की जिम्मेदारी बिहार सरकार पर थी और केन्द्र इसके लिए धनराशि मुहैया कराता था, लेकिन सरकारी अधिकारियों की लापरवाही के चलते यह तटबंध टूट गया और लाखों लोग बाढ़ के शिकार हो गए।
बिहार के राजनेता अभी तक हर साल आने वाली बाढ़ से कोई सबक नहीं ले सके हैं। वे बाढ़ में भी राजनीति करने का जरिया ढूंढ लेते हैं और अपना वोट बैंक पक्का करने की कोशिश करते हैं। देश के पूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय राजेंद्र प्रसाद ने बिहार में लोगों को बाढ़ से बचाने के लिए जगह-जगह तटबंधों का निर्माण करवाया था, लेकिन उनकी सुरक्षा, रख-रखाव और मरम्मत का कार्य वहां की कोई भी सरकार अभी तक नहीं कर सकी है। चाहे केंद्रीय रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव हों या बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, बाढ़ आपदा प्रबंधन के मामले में इनकी नाकामी उजागर हो गई है। अब ये लोग नेपाल सरकार के माथे ठीकरा फोड़ रहे हैं, जो अब बेकार है। देश के लोगों के साथ सरकार को भी चाहिए कि वे अब नदी के अस्तित्व के साथ जीना सीख लें और उससे ज्यादा छेड़छाड़ न करें।
प्रस्तुति : सत्येंद्र शुक्ल
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