विशाल बांध, दरकते पहाड़ और ढहते गांव. भारत की सबसे ताकतवर और उतनी ही पूजनीय नदी गंगा को उसके उद्गम के पास ही बांधकर उसे मानवनिर्मित सुरंगों में भेजा जा रहा है. क्या ऐसा करके महाविनाश को तो दावत नहीं दी जा रही? तुषा मित्तल की रिपोर्ट.
बरसात के मौसम में रात के वक्त भागीरथी घाटी में घुप्प अंधेरा नजर आता है. इसमें सुनाई देती है हिमालय की ढलानों से टकराने वाली तूफानी हवा और घनघोर बारिश के थपेड़ों की आवाज. और ऐसे में अगर आप भागीरथी के किनारे बसी किसी जगह पर हों तो नदी की भयानक गर्जना हर दूसरी आवाज को बौना कर देती है.
मगर दिन निकलने के साथ दृश्य भी बदलने लगता है और आवाजें भी. पहाडों को खोखला करती ड्रिलिंग मशीनों की कर्कश ध्वनि, पीले हेलमेट, कंक्रीट, खोखली सुरंगों में सांय-सांय बहती हवा और ऐसा बहुत कुछ जो बताता है कि यहां मनुष्य प्रकृति पर विजय पाने की लड़ाई लड़ रहा है. नदियों को बांधने की वो लड़ाई जिसका मकसद देश की आर्थिक तरक्की के लिए बिजली पैदा करना है.
भारत में 4,500 बड़े बांध हैं. हाल-फिलहाल तक उत्तरकाशी और गंगोत्री के बीच इनमें से सिर्फ एक यानी मनेरी भाली-1 हुआ करता था. मगर अब 125 किलोमीटर लंबे इस इलाके में पांच बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण अलग-अलग चरणों में है. अगर सब कुछ निर्धारित योजना के मुताबिक चला तो भागीरथी यानी गंगा को अपना वो रास्ता छोड़ना होगा जिस पर वह युगों-युगों से बहती आ रही है. 125 किलोमीटर की इस दूरी में उसे अधिकांश जगहों पर सुरंगों से होकर बहना होगा. गंगा के बारे में कहा जाता है कि वो मुक्तिदायनी है मगर विडंबना देखिए कि वही गंगा अपने ही जन्मस्थल में कैद होकर रह जाएगी.
भागीरथी घाटी में जो हो रहा है उसे अच्छी तरह से समझने के लिए आपको अपनी यात्रा विवादास्पद टिहरी बांध से शुरू करनी होगी जिससे जुलाई 2006 में विद्युत उत्पादन शुरू हुआ था. बांध से बनी झील की लंबाई करीब 60 किलोमीटर है और इसका पानी नीला और जड़ नजर आता है. गंगा की वह पुरानी जीवंतता फिर से वहीं पर नजर आती है जहां ये झील खत्म होती है. मगर यहां भी गंगा की जिंदगी थोड़े ही दिन की मेहमान है.
टिहरी से करीब 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित धरासू नाम की जगह मनेरी भाली जलविद्युत परियोजना का द्वितीय चरण है. यहां जनवरी 2008 से विद्युत उत्पादन शुरू हो चुका है. चूंकि 304 मेगावॉट बिजली बनाने के लिए पानी का टरबाइन पर एक निश्चित ऊंचाई से गिरना जरूरी है इसलिए इस ऊंचाई को हासिल करने के लिए गंगा को 24 किलोमीटर लंबी एक सुरंग से होकर गुजारा जाता है जो उत्तरकाशी से शुरू होती है. यानी 24 किलोमीटर की इस लंबाई में नदी का अस्तित्व लगभग खत्म हो चुका है.
इस क्षेत्र में परियोजनाएं कुछ इसी तर्ज पर बन रही हैं. एक परियोजना की पूंछ जहां पर खत्म होती है वहां से दूसरी परियोजना का मुंह शुरू हो जाता है. यानी नदी एक सुरंग से निकलती है और फिर दूसरी सुरंग में घुस जाती है. इसका मतलब ये है कि जब ये सारी परियोजनाएं पूरी हों जाएंगी तो इस पूरे क्षेत्र में अधिकांश जगहों पर गंगा अपना स्वाभाविक रास्ता छोड़कर सिर्फ सुरंगों में बह रही होगी.
ये बात अलग है कि मनेरी भाली द्वितीय चरण वर्तमान में अपनी निर्धारित क्षमता से काफी कम यानी सिर्फ 102 मेगावॉट बिजली का ही उत्पादन कर रहा है. ये भी गौरतलब है कि इस इलाके में स्थित तीनों बांध—टिहरी और मनेरी प्रथम और द्वितीय—कभी भी अपनी निर्धारित क्षमता के बराबर विद्युत उत्पादन नहीं कर पाए हैं. दिलचस्प है कि सभी जलविद्युत परियोजनाओं को मंजूरी ही इस आधार पर दी गई थी 90 प्रतिशत मौकों पर वे अपनी पूरी क्षमता के हिसाब से बिजली का उत्पादन करेंगे मगर दिल्ली स्थित एक गैरसरकारी संगठन साउथ एशियन नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपुल (एसएएनडीआरपी) के द्वारा जुटाए गए आंकड़े एक अलग ही तस्वीर पेश करते हैं. संगठन ने अपने अध्ययन में जिन 208 बांधों के आंकड़े जुटाए उनमें से 89 फीसदी निर्धारित क्षमता से कम विद्युत उत्पादन कर रहे हैं. 49 फीसदी में तो कुल क्षमता की आधी से भी कम बिजली बन रही है.
एसएएनडीआरपी के संस्थापक हिमांशु ठक्कर कहते हैं, “इससे पता चलता है कि बड़ी संख्या में अव्यावहारिक परियोजनाओं को मंजूरी दी जा रही है. हमें वास्तविक कीमत और वास्तविक लाभों का एक वास्तविक अध्ययन करने की जरूरत है. ये सुनिश्चित करने के लिए कोई भरोसेमंद तंत्र मौजूद नहीं है कि केवल न्यायसंगत परियोजनाओं को ही मंजूरी मिले.”
धरासू से उत्तरकाशी तक के सफर में नदी आपके साथ चलती है. बारिश के मौसम की वजह से आजकल इसमें काफी पानी है मगर स्थानीय लोगों के मुताबिक सर्दियों में ये पानी की एक पतली लकीर सरीखी नजर आती है क्योंकि तब अधिकांश पानी सुरंगों में चला जाता है. इस दौरान नदी को आसानी से पैदल ही पार किया जा सकता है.
भागीरथी घाटी में जो हो रहा है उसके महत्व को समझने के लिए आपको इस नदी की विशालता, इसकी पारिस्थिकी और इस पर निर्भर मानव जीवन के साथ हो रही छेड़छाड़ को समझना जरूरी है.
वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड ने गंगा को दुनिया की उन 10 बड़ी नदियों में रखा है जिनके अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है. गंगा मछलियों की 140 और उभयचरों की 90 प्रजातियों को आश्रय देती है. इसमें पांच ऐसे इलाके हैं जिनमें पाई जाने वाली पक्षियों की किस्में दुनिया के किसी अन्य हिस्से में नहीं मिलतीं. इसके किनारों पर पाई जाने वाली वनस्पति और जंतुओं की इसके पोषण और जल संरक्षण में अहम भूमिका है और ये भूक्षरण को भी नियंत्रण में रखते हैं. गंगा के बेसिन में बसने वाले करीब 45 करोड़ लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इसपर निर्भर हैं.
पर्यावरणविद कहते हैं कि गंगा के पानी में अनूठे बैक्टीरिया प्रतिरोधी गुण हैं. यही वजह है कि दुनिया की किसी भी नदी के मुकाबले इसके पानी में आक्सीजन का स्तर 25 फीसदी ज्यादा होता है. ये अनूठा गुण तब नष्ट हो जाता है जब गंगा को सुरंगों में धकेल दिया जाता है जहां न ऑक्सीजन होती है और न सूरज की रोशनी. ये जलविद्युत परियोजनाएं नदी के रास्ते का बुनियादी स्वरूप भी बदल देती हैं जिससे पानी में जैविक बदलाव आ जाते हैं. उदाहरण के लिए मनेरी भाली प्रथम चरण के लिए जहां से पानी जलाशय में दाखिल होता है वहां पर इसके नमूने बताते हैं कि गुणवत्ता के हिसाब से इसे साफ कहा जा सकता है. मगर जलाशय के आखिर में पानी के नमूने बताते हैं कि ये बुरी तरह से प्रदूषित है. केंद्रीय औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा पिछले साल मई में जारी एक रिपोर्ट बताती है कि भागीरथी में पारे का स्तर भी बढ़ रहा है.
लेकिन ये तो संकट का सिर्फ छोटा सा हिस्सा है. नोबेल पुरस्कार जीतने वाले इंटरनेशनल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज की रिपोर्ट के मुताबिक 2030 तक गंगोत्री ग्लेशियर के आकार में 80 फीसदी तक की कमी आ जाएगी जिससे गंगा, सदानीरा से एक मौसमी नदी में तब्दील हो जाएगी. इसका मतलब है कि सिर्फ 20 साल में इतना पानी ही नहीं बचेगा कि इन बांधों की टरबाइंस चलाई जा सकें.
इसके बावजूद सरकार इन विशाल परियोजनाओं पर अड़ी हुई है. जब तहलका ने पानी की उपलब्धता और व्यावहारिकता से संबंधित डाटा के बारे में केंद्रीय जल आयोग के अध्यक्ष ए के बजाज से जानकारी मांगी तो उनका जवाब था, “गंगा जल से संबंधित डाटा गोपनीय है.”
भागीरथी को सुरंगों और बांधों के जरिये कैद करने का विरोध तो स्थानीय लोग छह साल पहले तभी से कर रहे हैं जब इन परियोजनाओं को मंजूरी दी गई थी. मगर इस विरोध को राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां तब मिलीं जब जाने-माने पर्यावरणविद और आईआईटी कानपुर के पूर्व प्रोफेसर जी डी अग्रवाल ने इसके विरोध में उत्तरकाशी में अनिश्चतकालीन भूखहड़ताल की घोषणा की. पर्यावरण की गहरी समझ रखने वाले अग्रवाल ने इन परियोजनाओं को मातृहत्या जैसा बताया. लोग और साधु-संत उनके समर्थन में उमड़ पड़े और नतीजा ये हुआ कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी दो परियोजनाओं को अस्थाई रूप से रोकने पर सहमत हो गए.
बाद में अग्रवाल दिल्ली आ गए और लोहारीनाग पाला में एनटीपीसी की 600 मेगावॉट की परियोजना के विरोध में उनकी भूख हड़ताल जारी रही. कुछ दिन पहले उन्होंने अपना अनशन तब तोड़ा जब ऊर्जा मंत्रालय ने उन्हें आश्वासन दिया कि गंगा के अविरल प्रवाह को सुनिश्चित करने के लिए एक कमेटी बनाई जाएगी.
मगर मुद्दा अभी सुलझने से काफी दूर है. तहलका से बात करते हुए केंद्रीय ऊर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंदे कहते हैं, “हमने फैसला किया है कि पानी का बहाव अविरल रहना चाहिए. मगर परियोजनाएं भी चलनी चाहिए. तकनीकी रूप से हमें ऐसा करने का रास्ता खोजना होगा. इसलिए हमने तीन महीने का समय मांगा है. एक कमेटी बनाई जा रही है. भागीरथी के साथ भारत के लोगों की भावनाएं जुड़ी हैं. मैं लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहता. यही वजह है कि हम कोई रास्ता खोजने के लिए सहमत हो गए हैं.”
मगर ये केवल भावनाओं की बात नहीं है और रास्ता खोजना आसान नहीं होगा. शिंदे कहते हैं कि 600 मेगावॉट की परियोजना को पूरी तरह से रद्द नहीं किया जा सकता और विशेषज्ञ कमेटी के साथ निर्माण कार्य भी जारी रहेगा. वे कहते हैं, “2000 करोड़ रुपये की अग्रिम मंजूरी हो चुकी है. अब आप इसे रोकने के लिए कह रहे हैं. जब छह साल पहले ये परियोजनाएं शुरू हुई थीं तो मैं मंत्री नहीं था. जब भाजपा ने इनका शिलान्यास किया था. तब तो किसी ने इनका विरोध नहीं किया.”
विडंबना ये भी है कि भारत में बड़े बांधों की योजनाओं को उस दौर में आगे बढ़ाया जा रहा है जब दुनिया भर में बड़े बांधों को हटाया जा रहा है. अकेले अमेरिका में ही 654 बांध खत्म किए जा चुके हैं और 58 दूसरे बांधों के साथ भी ऐसा ही किया जाना है. इनमें से कई ऐसे हैं जिन्हें इसलिए हटाया जा रहा है ताकि सामन मछलियों के निवास को बहाल किया जा सके. गौरतलब है कि सामन मछलियां प्रजनन के लिए समुद्र से नदी के उद्गम की तरफ जाती हैं. बांध उनके इस सफर को रोककर उनकी प्रजाति को संकट में डालते हैं. दरअसल देखा जाए तो सामन मछलियों की घटती संख्या अमेरिका में कई ऐतिहासिक अदालती फैसलों का कारण बनी है. इनमें से सबसे प्रभावशाली उदाहरण है एलव्हा और ग्लाइंस कैन्यन बांध को खत्म किया जाना जो देश के सबसे ऊंचे बांधों में से एक था. इसे हटाने में 10 करोड़ डालर खर्च हुए.
अमेरिकन रिवर्स नामक एक गैरसरकारी संगठन से जुड़ीं एमी कोबर कहती हैं, “इन बड़े बांधों को हटाया जाना इस बात का सूचक है कि अपनी नदियों को लेकर देश के नजरिये में महत्वपूर्ण बदलाव आया है. इस मुल्क को ये अहसास हो गया है कि एक स्वस्थ, अविरल नदी एक समुदाय के लिए सबसे कीमती संपत्तियों में से एक हो सकती है.”
मगर भारत का ऊर्जा मंत्रालय इस बात को समझने के लिए तैयार नहीं है. सवाल ये है कि आखिर जब सारी दुनिया में बड़े बांधों के खिलाफ आंदोलन हो रहा है तो भारत में इन पर अब भी क्यों जोर दिया जा रहा है? शिंदे से पूछिए और जवाब आता है, “भारत में 30 हजार मेगावॉट बिजली की कमी है. हम इतनी बिजली कहां से लाएंगे? चीन को देखिए. उनके थ्री गॉर्जेज डैम को देखिए. जब चीन ये कर रहा है तो हम क्यों नहीं कर सकते? टिहरी में 1000 मेगावॉट की परियोजना के लिए हमें इतनी आलोचना झेलनी पड़ी. अगर आप बिजली चाहते हैं तो आपको कुछ न कुछ बलिदान तो करना ही होगा.”
दरअसल देखा जाए तो टिहरी इसका एक सटीक उदाहरण है कि अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को लेकर भारत की समझ में कितना धुंधलापन है. भारत में किसी भी बांध परियोजना का इसके पूरा होने के बाद मूल्यांकन नहीं किया गया है. टिहरी दुनिया का आठवां सबसे ऊंचा बांध है. मार्च 2008 तक बांध पर कुल 8,298 करोड़ रुपये खर्च हो चुके थे जो उस अनुमानित लागत से कहीं ज्यादा है जो परियोजना के प्रारंभ में तय की गई थी. इसकी प्रस्तावित विद्युत उत्पादन क्षमता 2,400 मेगावॉट थी मगर वर्तमान में यह केवल 1000 मेगावॉट बिजली का उत्पादन कर रहा है. यानी क्षमता के आधे से भी कम.
भागीरथी घाटी में घट रही इस त्रासदी का एक मानवीय पहलू भी है. उसे समझने के लिए आपको प्रेम दत्त जुयाल जैसे किसी व्यक्ति से मिलना होगा. जुयाल के पास धुंधले पड़ते जा रहे कागजों का एक गट्ठर है. ये वो दस्तावेज हैं जिन्हें वे तब से इकट्ठा कर रहे हैं जब से उनके घर के नीचे की जमीन धंसनी शुरू हुई. जुयाल जलवाल गांव के निवासी हैं जो उस जगह से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर है जहां कभी पुराना टिहरी शहर हुआ करता था. जलवाल और इसके आसपास के गांवों को पुनर्वास योजना का हिस्सा इसलिए नहीं बनाया गया क्योंकि ये टिहरी झील के 840 मीटर ऊंचाई के स्तर से ऊपर स्थित थे. पिछले साल से उनके खेत दरक रहे हैं और गांववालों की जान लगातार हो रहे भूस्खलन से खतरे में है. ये सब इसलिए हो रहा है क्योंकि टिहरी झील का पानी लगातार उस बुनियाद को कमजोर कर रहा है जिस पर ये गांव बसा है. इससे भी बड़ी त्रासदी ये है कि जिस बाजार में ये लोग अपनी सब्जियां बेचते थे और जिन स्कूलों में इनके बच्चे पढ़ने जाते थे, वे सब झील में दफन हो गए हैं. नये टिहरी शहर जाने के लिए इन्हें 250 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है. यानी इनकी जिंदगी पूरी तरह से अलग-थलग पड़ गई है. मगर उनके पुनर्वास की मांग पर ध्यान देने वाला कोई नहीं है.
भारतीय लोक प्रशासन संस्थान द्वारा 54 बांधों पर कराया गया एक विस्तृत अध्ययन बताता है कि एक बड़े बांध से विस्थापित होने वाले लोगों की औसत संख्या 44,182 है. भारत में 4,500 बड़े बांध हैं. अगर माना जाए कि एक बांध से कम से कम 10,000 लोग भी विस्थापित होते हैं तो इसका मतलब ये है कि बड़े बांधों के कारण अब तक करीब साढ़े चार करोड़ लोगों को अपनी जड़ों से उखड़ना पड़ा है. उत्तरकाशी के नजदीक बसे जोशियाड़ा और कनसैण नामक गांवों के लोगों को भी अब ये अहसास होने लगा है कि उनकी नियति भी कुछ ऐसी ही होने वाली है.
जोशियाड़ा में मुख्य सड़क पर बद्री सेमवाल अपना हार्डवेयर की दुकान चलाते हैं. दुकान की ऊपरी मंजिल पर ही उनका निवास भी है. उनकी छत से साफ देखा जा सकता है कि मनेरी भाली द्वितीय चरण की झील का पानी धीरे-धीरे उनके घर को निगलने बढ़ा आ रहा है. सेमवाल कहते हैं, “टरबाइन चलाने के बाद ही अचानक उन्हें अहसास हुआ कि हम भी डूब क्षेत्र में आ रहे हैं. अब वे कहीं पहाड़ में हमारे पुनर्वास की बात कर रहे हैं. मगर वहां दुकान कैसे चलेगी. मैं जिंदगी कैसे चलाऊंगा?” जोशियाड़ा के दूसरे परिवारों की भी यही व्यथा है.
उत्तरकाशी से मनेरी भाली प्रथम चरण के लिए जाते हुए हमारी मुलाकात अतर सिंह पंवार से होती है. फैशनेबल जींस और टी शर्ट पहने इस व्यक्ति को देखकर कहीं से भी नहीं लगता कि उसके 38 साल पहाड़ में ही गुजरे हैं. पंवार के हाथ में कुरकुरे का पैकेट और बिसलेरी की बोतल है और वे किसी शहरी बाशिंदे जैसे ही लगते हैं. उन्होंने हाल ही में एनटीपीसी में अनुबंध पर मजदूरी शुरू की है. कभी वे पशु चराते थे और आलू व राजमा की खेती करते थे. वे कहते हैं, “मैं तब कहीं ज्यादा खुश था जब मेरे पास अपनी जमीन थी. तब मैं आजाद था. अब मुआवजे में भले ही लाखों रूपये मिल गए हों मगर जल्द ही ये खत्म हो जाएंगे. पैसा तो आता है और चला जाता है. जमीन हमेशा आपके पास रहती है.”
थोड़ा और आगे चलने पर हम पाला गांव पहुंचते हैं जहां विनाश की शुरुआत हो चुकी है. एक किलोमीटर दूर ही पाला-मनेरी सुरंग की खुदाई की जा रही है. यहां के घरों में दरारें पड़नी शुरू हो गई हैं. पानी के स्रोत सूख रहे हैं क्योंकि सुरंग के मलबे ने प्राकृतिक झरनों का रास्ता रोक दिया है.
अतर सिंह पंवार को कोई ऐसी शक्ति एक शहरी व्यक्ति के रूप में बदल रही है जिस पर उनका बस नहीं चल रहा. अपने जैसे सैकड़ों लोगों की तरह वे शहरी नहीं बनना चाहते. वे गंगा को अविरल बहते देखना चाहते हैं. ठीक वैसे ही जैसे उनकी पीढ़ियां सदियों से देखती आई हैं. मगर उनके लिए ऊर्जा मंत्रालय का जवाब है कि उत्तरी ग्रिड को और भी ज्यादा बिजली चाहिए. भले ही उनके जैसे लोगों को आसानी से पीने का पानी तक न मिले मगर शहरों के शापिंग मॉल्स का दिन-रात रोशनी में नहाना जरूरी है.
www.tehelkahindi.com से साभार
तुम पूछते हो कि मेरी कविताएं क्यों नहीं करतीं फूलों और पत्तियों की बातें मेरे साथ आओ और देखो सड़कों पर बहता हुआ लहू ...पाब्लो नेरुदा.
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Friday, July 25, 2008
सामाजिक नियंत्रण के गैरपारंपरिक नुस्खे
सुभाष गाताडे
क्या आप ऐसे दृश्य की कल्पना कर सकते हैं कि मुल्क का मशहूर मजदूर नेता फैक्टरी गेट पर हड़ताली मजदूरों के हक में भाषण दे रहा है और अचानक बेहोश होकर गिरता है? इतना ही नहीं, नेता को सुनने एकत्रित भीड़ में से कई लोग उसी वक्त अपनी जगह पर खड़े-खड़े धड़ाम से गिर जाते हैं? अंदाजा लगाया जा सकता है कि आभासी लगनेवाला यह दृश्य अगर हकीकत में बदल जाए तो किस किस्म की भगदड़ मच सकती है और जीत के करीब पहुंची लड़ाई कभी अचानक हार में बदल सकती है।वैसे इन दिनों अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन में सामाजिक नियंत्रण के जिन गैरपारंपरिक और गैरप्राणघातक हथियारों पर जोरशोर से काम हो रहा है, उसे देखते हुए आनेवाले कुछ दिनों में ऐसी संभावना से हम रू-ब-रू भी हो सकते हैं। विज्ञान पर चर्चित पत्रिका ‘न्यू साइंटिस्ट’ के कुछ समय पहले प्रकाशित अंक में ऐसे हथियारों की चर्चा थी (3 जुलाई, 2008)। इसके मुताबिक, पूंजीपति उघमियों का एक हिस्सा इन दिनों एक ऐसी माइक्रोवेव किरण गन तैयार करने में जुटा है, जो सीधे लोगों के सिर में आवाज पहुंचा देगी। इस उत्पाद को अमेरिका सेना द्वारा ‘युद्ध के अलावा अन्य कामों में’ भीड़ नियंत्रण हेतु इस्तेमाल किया जाएगा। इसमें माइक्रोवेव ऑडिआ॓ इफेक्ट का इस्तेमाल होता है, जिसमें छोटे माइक्रोवेव लहरें/पल्सेस तेजी से टिशू को गर्म करते हैं और सिर में एक शॉकवेव पैदा करते हैं। पेंटागन प्रसन्न है कि इस किरण को इलेक्ट्रॉनिक पद्धति से संचालित किया जाता है जो एक साथ कई निशानों तक पहुंच सकती है!साफ है कि इस माइक्रोवेव गन से किरणें फेंकी जाएगी तो पता चला, भाषण देते–देते मजदूर नेता वहीं बेहोश होकर गिर गया और उसके इर्दगिर्द खड़े मजदूर इसी तरह धराशायी हुए। इस बात के मद्देनजर रखते हुए कि ऐसी गन का विरोध होगा और उसे मानवाधिकारों का हनन बताया जाएगा, इसे स्वीकार्य बनाने की कवायद भी चल रही है। यह कहा जा रहा है कि इसके गैरसैनिक उपयोग भी हो सकते हैं, जैसे कहीं टिड्डी दल का हमला हो जाए तो ऐसे कीड़ों को भगाया जा सकता है। इतना ही नहीं, यह बात भी रेखांकित की जा रही है कि ऐसी तकनीक से उन लोगों को लाभ हो सकता है जिनकी सुनने की क्षमता ठीक नहीं है। पेंटागन में इसके लिए एक महकमा तैयार किया गया है, जो इस दिशा में नए–नए उपकरणों/हथियारों की खोज में जुटा है। इसका नाम है ‘ज्वाइंट नान–लेथल वेपन्स डायरेक्टोरेट’ अर्थात ‘गैरप्राणघातक हथियार निदेशालय’। यहां विकसित किए जा रहे अकोस्टिक माइक्रोवेव हथियार, लेसर चालित प्लाज्मा चैनल्स या वोर्टेक्स रिंग गंस जैसे उपकरणों से लोगों को बोध हो सकता है कि ये किसी विज्ञान कथा के हिस्से तो नहीं हैं। एक तरह से कहें, तो यहां सबसे महत्वपूर्ण काम रेथोन्स एक्टिव डिनॉयल सिस्टम पर हो रहा है जो एक तरह का संदेश ऊर्जा हथियार है जिसे भीड़ को काबू करने में हो सकता है। इसके इस्तेमाल के बारे में मशहूर है कि यह मनुष्य की त्वचा को 130 डिग्री फारेनहाइट तक गर्मा देती है। देख सकते हैं कि माइक्रोवेव किरण गन इसी का बहुत सुधरा रूप है। अमन पसंद वैज्ञानिकों में इन गैरपारंपरिक हथियारों को लेकर जागरूकता बढ़ रही है। चर्चित विश्लेषक टॉम बुर्गहार्ड के मुताबिक ‘यह नया फासीवाद जैव निर्धारणवादी विचारधारा और अग्रगामी तकनीकी साधनों का इस्तेमाल करते हुए शरीर पर हमला करता है।’ इन गैरपारम्परिक हथियारों के आविष्कार के जरिए अमेरिकी सैन्यवाद मानवाधिकार उल्लंघन की ऊंचाइयों पर पहुंच रहा है। अब लोगों को ‘शांत’ करने की अपनी योजनाओं के तहत सीधे मानवीय शरीर और मन की सीमाओं का उल्लंघन कर रहा है। इस नयी किस्म की ‘युद्धभूमि’ पर अपना वर्चस्व कायम करने में अकादमिक जगत न केवल केन्द्रीय भूमिका निभा रहे हैं। दमन के खास मकसद के लिए पेशेवर वैज्ञानिकों की विशष्टि सेवाएं ली जा रही हैं। ‘गैरप्राणघातक’ हथियारों के निर्माण के काम को सरकारों या निजी कॉरपोरेट प्रतिष्ठानोें की तरफ से धड़ल्ले से आगे बढ़ाया रहा है, जिसमें अग्रणी शिक्षा संस्थान जुड़े हैं। अपनी चर्चित किताब ‘द कॉम्प्लेक्स’ में निक टर्स नामक अनुसंधानकर्ता बताते हैं कि किस तरह दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिकी अकादमिक जगत अनुसंधान एवं विकास की परियोजनाओं के लिए पेंटागन के पैसे पर निर्भर रहने लगा है, जिसके अंदर ‘उच्च शिक्षा के परिदृश्य को बदलने, रिसर्च एजेंडे को प्रभावित करने, पाठ्यक्रमों की अन्तर्वस्तु बदलने’ की क्षमता दिखती है। इसी के अंतर्गत एमआईटी जैसे विश्वविख्यात संस्थान द्वारा स्थापित अपनी रिसर्च इंस्टीट्यूट ‘द मितर कॉरपोरेशन को 88 करोड़ डॉलर का अनुदान मिला!
www.rashtriyasahara.com से साभार
क्या आप ऐसे दृश्य की कल्पना कर सकते हैं कि मुल्क का मशहूर मजदूर नेता फैक्टरी गेट पर हड़ताली मजदूरों के हक में भाषण दे रहा है और अचानक बेहोश होकर गिरता है? इतना ही नहीं, नेता को सुनने एकत्रित भीड़ में से कई लोग उसी वक्त अपनी जगह पर खड़े-खड़े धड़ाम से गिर जाते हैं? अंदाजा लगाया जा सकता है कि आभासी लगनेवाला यह दृश्य अगर हकीकत में बदल जाए तो किस किस्म की भगदड़ मच सकती है और जीत के करीब पहुंची लड़ाई कभी अचानक हार में बदल सकती है।वैसे इन दिनों अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन में सामाजिक नियंत्रण के जिन गैरपारंपरिक और गैरप्राणघातक हथियारों पर जोरशोर से काम हो रहा है, उसे देखते हुए आनेवाले कुछ दिनों में ऐसी संभावना से हम रू-ब-रू भी हो सकते हैं। विज्ञान पर चर्चित पत्रिका ‘न्यू साइंटिस्ट’ के कुछ समय पहले प्रकाशित अंक में ऐसे हथियारों की चर्चा थी (3 जुलाई, 2008)। इसके मुताबिक, पूंजीपति उघमियों का एक हिस्सा इन दिनों एक ऐसी माइक्रोवेव किरण गन तैयार करने में जुटा है, जो सीधे लोगों के सिर में आवाज पहुंचा देगी। इस उत्पाद को अमेरिका सेना द्वारा ‘युद्ध के अलावा अन्य कामों में’ भीड़ नियंत्रण हेतु इस्तेमाल किया जाएगा। इसमें माइक्रोवेव ऑडिआ॓ इफेक्ट का इस्तेमाल होता है, जिसमें छोटे माइक्रोवेव लहरें/पल्सेस तेजी से टिशू को गर्म करते हैं और सिर में एक शॉकवेव पैदा करते हैं। पेंटागन प्रसन्न है कि इस किरण को इलेक्ट्रॉनिक पद्धति से संचालित किया जाता है जो एक साथ कई निशानों तक पहुंच सकती है!साफ है कि इस माइक्रोवेव गन से किरणें फेंकी जाएगी तो पता चला, भाषण देते–देते मजदूर नेता वहीं बेहोश होकर गिर गया और उसके इर्दगिर्द खड़े मजदूर इसी तरह धराशायी हुए। इस बात के मद्देनजर रखते हुए कि ऐसी गन का विरोध होगा और उसे मानवाधिकारों का हनन बताया जाएगा, इसे स्वीकार्य बनाने की कवायद भी चल रही है। यह कहा जा रहा है कि इसके गैरसैनिक उपयोग भी हो सकते हैं, जैसे कहीं टिड्डी दल का हमला हो जाए तो ऐसे कीड़ों को भगाया जा सकता है। इतना ही नहीं, यह बात भी रेखांकित की जा रही है कि ऐसी तकनीक से उन लोगों को लाभ हो सकता है जिनकी सुनने की क्षमता ठीक नहीं है। पेंटागन में इसके लिए एक महकमा तैयार किया गया है, जो इस दिशा में नए–नए उपकरणों/हथियारों की खोज में जुटा है। इसका नाम है ‘ज्वाइंट नान–लेथल वेपन्स डायरेक्टोरेट’ अर्थात ‘गैरप्राणघातक हथियार निदेशालय’। यहां विकसित किए जा रहे अकोस्टिक माइक्रोवेव हथियार, लेसर चालित प्लाज्मा चैनल्स या वोर्टेक्स रिंग गंस जैसे उपकरणों से लोगों को बोध हो सकता है कि ये किसी विज्ञान कथा के हिस्से तो नहीं हैं। एक तरह से कहें, तो यहां सबसे महत्वपूर्ण काम रेथोन्स एक्टिव डिनॉयल सिस्टम पर हो रहा है जो एक तरह का संदेश ऊर्जा हथियार है जिसे भीड़ को काबू करने में हो सकता है। इसके इस्तेमाल के बारे में मशहूर है कि यह मनुष्य की त्वचा को 130 डिग्री फारेनहाइट तक गर्मा देती है। देख सकते हैं कि माइक्रोवेव किरण गन इसी का बहुत सुधरा रूप है। अमन पसंद वैज्ञानिकों में इन गैरपारंपरिक हथियारों को लेकर जागरूकता बढ़ रही है। चर्चित विश्लेषक टॉम बुर्गहार्ड के मुताबिक ‘यह नया फासीवाद जैव निर्धारणवादी विचारधारा और अग्रगामी तकनीकी साधनों का इस्तेमाल करते हुए शरीर पर हमला करता है।’ इन गैरपारम्परिक हथियारों के आविष्कार के जरिए अमेरिकी सैन्यवाद मानवाधिकार उल्लंघन की ऊंचाइयों पर पहुंच रहा है। अब लोगों को ‘शांत’ करने की अपनी योजनाओं के तहत सीधे मानवीय शरीर और मन की सीमाओं का उल्लंघन कर रहा है। इस नयी किस्म की ‘युद्धभूमि’ पर अपना वर्चस्व कायम करने में अकादमिक जगत न केवल केन्द्रीय भूमिका निभा रहे हैं। दमन के खास मकसद के लिए पेशेवर वैज्ञानिकों की विशष्टि सेवाएं ली जा रही हैं। ‘गैरप्राणघातक’ हथियारों के निर्माण के काम को सरकारों या निजी कॉरपोरेट प्रतिष्ठानोें की तरफ से धड़ल्ले से आगे बढ़ाया रहा है, जिसमें अग्रणी शिक्षा संस्थान जुड़े हैं। अपनी चर्चित किताब ‘द कॉम्प्लेक्स’ में निक टर्स नामक अनुसंधानकर्ता बताते हैं कि किस तरह दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिकी अकादमिक जगत अनुसंधान एवं विकास की परियोजनाओं के लिए पेंटागन के पैसे पर निर्भर रहने लगा है, जिसके अंदर ‘उच्च शिक्षा के परिदृश्य को बदलने, रिसर्च एजेंडे को प्रभावित करने, पाठ्यक्रमों की अन्तर्वस्तु बदलने’ की क्षमता दिखती है। इसी के अंतर्गत एमआईटी जैसे विश्वविख्यात संस्थान द्वारा स्थापित अपनी रिसर्च इंस्टीट्यूट ‘द मितर कॉरपोरेशन को 88 करोड़ डॉलर का अनुदान मिला!
www.rashtriyasahara.com से साभार
Tuesday, July 1, 2008
एक दर्द का नाम है हरसूद
दयाशंकर मिश्र
भोपाल से
कीमत तो चुकानी पड़ती है !
इंदिरा सागर बांध परियोजना से प्रभावित 250 गांवों और उनके दर्द के प्रतीक बने एक खंडवा जिले के हरसूद के विस्थापितों के बारे में नजदीकी जिलों और राजधानी के नेताओं, अफसरों से लेकर आम जनता तक यही राय रखते हैं.
30 जून को हरसूद डूबने के चार साल बाद विस्थापितों की बस्ती नया छनेरा में बड़ी संख्या में ऐसे परिवार आपको मिल जाएंगे, जिनके लिए दो जून की रोटी दुनिया का सबसे बड़ा सवाल है. एक ऐसा सवाल जो हर रोज उनके घरों में सुबह होने के साथ जागता है और पूरा घर हर रोज उससे जुझता रहता है.
मंगल ग्रह जैसी सुर्ख लाल जमीन पर बसाए गए लोगों की आजीविका का कोई साधन नहीं है. मुआवजे का पैसा धीरे-धीरे खत्म होता गया और अब हालात भुखमरी के हो रहे हैं. उन चंद लोगों की बात छोड़ दें जिन्होंने अलग-अलग तरीकों से मोटा मुआवजा हड़पा तो 250 गांवों के 25000 से अधिक लोग 1000 मेगावाट बिजली की कीमत अपनी जड़ों से कटकर, बेरोजगार होकर चुका रहे हैं. बरस दर बरस हरसूद सरकार और सरकारी योजनाओं के केंद्र से हाशिए पर जा रहा है. लापरवाही की हद है कि अभी भी लोग खतरे के निशान की जद में है. ऐसे लोग मुआवजे की आस में अपने परिवारों को संकट में डाले हुए हैं. हर साल की तरह इस साल भी यहां जड़ों से खदेड़े गए लोग अपने प्यारे शहर को याद करने एकजुट हुए और नम आंखों से खंडहर में तब्दील हो चुके शहर में जाकर उसे याद किया.
हरसूद का मूल पेशा खेती-किसानी तो हरसूद डूबने के साथ ही खत्म हो गया. इसके साथ ही उस तबके की परेशानियां भी बढ़ गईं जो मजदूरी करके अपने परिवारों का पेट पालता था. इसी लिए नए छनेरा में तेजी से विस्थापन बढ़ा. आलम यह है कि हरसूद से विस्थापित किए गए 5600 परिवारों में से न्यू हरसूद में बमुश्किल हजार परिवार ही बचे हैं. बाकी कहां गए, विस्थापित बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य किस कदर प्रभावित हुई है, इसका आंकड़ा किसी के पास नहीं है. कम से कम सरकार के पास तो नहीं ही है, जिसके जिम्मे इन विस्थापितों का पुनर्वास था.
दलितों की स्थिति तो और भी बदतर है. नए हरसूद में पचास से अधिक दलितों के घर हैं, जिनमें से अधिकांश घरों के बच्चों की पढ़ाई दम तोड़ चुकी है. स्वास्थ्य सेवा की हालत खराब है.
कौन देगा विस्थापन का सूद
जून 2004 में विस्थापित की गई ऐतिहासिक हरसूद नगरी को 1815 में राजा हर्षवर्धन द्वारा बसाया गया था. आधुनिक समय का हरसूद दरबदर होने से पहले तहसील का दर्जा पाने वाला ऐसा नगर था, जो कि अनेक गांवों से घिरा हुआ था. वहां लोगों के पुश्तैनी कारोबार थे. किसानों के लिए खेती थी तो मजदूरों के लिए मजदूरी. कुल मिलाकर सबके लिए कुछ न कुछ जरूर था, जो अब नहीं रहा.
बिजली के लिए इस नगर को विस्थापित होना पड़ा और जो यहां से विस्थापित हुए उनके हिस्से रोशनी नहीं थी, केवल अंधेरा था.मध्यप्रदेश में ऐसी दूसरी जगह खोजना मुश्किल है, जहां लोगों के पास रहने के लिए पक्के मकान तो हैं, लेकिन खाने के लिए रोटी नहीं है. इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि ज्यादातर लोग मकान बनवाते-बनवाते ही कंगाल हो गए. नया हरसूद जिसे उस समय की मुख्यमंत्री रहीं साध्वी उमा भारती ने विस्थापितों का आदर्श नगर बनाने की घोषणा की थी, वास्तव में बेहद बंजर और कठोर जमीन का इलाका था. जिसमें नींव खुदवाने में ही लोगों को बहुत अधिक पैसा खर्च करना पड़ा. जब किसी की बसी बसाई गृहस्थी उजाड़ दी जाए तो उसकी सबसे पहली जरूरत ठिकाना तलाशना होता है. इसी कमजोरी का सबसे अधिक लाभ नये हरसूद में बसने वालों से ठेकेदारों, सीमेंट, रेत और लोहे के व्यापारियों ने उठाया.
उन्होंने अमूमन 2300 रूपए प्रति क्विंटल में बिकने वाले लोहे और हजार-पंद्रह सौ की रेत-गिट्टी के लिए मजबूर लोगों से क्रमश: चार हजार और तीन हजार रूपए वसूले. इस तरह खदेड़े गए लोगों की मुआवजे की रकम घर बनवाने में ही खर्च हो गई.
2004 में हरसूद के लोगों ने अपने ही हाथों से घरों पर रोते हुए हथौड़े चलाए थे और बरसात की आहट के बीच मंगल ग्रह सरीखी लाल और कठोर जमीन पर खुले आसमान के नीचे आ बैठे थे, उनके लिए सबसे पहली जरूरत घर थे, इसलिए उनके पास जो कुछ था, वह सब कुछ उन्होंने अपना घर बनाने में लगा दिया.
घर के भीतर का सच
अब हालत यह है कि उनके पास घर और केवल घर ही हैं. सरकार के नुमाइंदे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में पक्के मकानों के विहंगम दृश्य दिखाकर अदालतों को यह बताने में कामयाब हो जाते हैं कि लोगों के पुनर्वास के समूचे इंतजाम हैं, जबकि यह केवल एक छल है. सरकारी छल !
नए हरसूद के सरकारी रिकार्ड में वाणिज्य केंद्र के आगे यह दावा किया गया है कि भूखंड विकसित हैं और कार्य प्रगति पर है. जबकि सच्चाई तो यह है कि महज खाली भूखंडों वाला यह वाणिज्य केंद्र अपनी स्थापना के साथ ही नाकाम हो चुका है. क्योंकि न तो नये हरसूद में बस स्टैंड है, न ही मंडी और ही ऋण देने वाले बैंक. हां विकास दिखाने के लिए कांक्रीट की नालियां और अधचुपड़ी डामर की सड़कें जरूर मौजूद हैं.
विस्थापितों की मांगों के लिए लंबी लड़ाई लड़ने वाले डॉ. अशोक श्रीवास्तव कहते हैं कि यहां डामर की सड़कें और नालियां इसलिए हैं, क्योंकि सरकार को हाईकोर्ट में यह बताना होता है कि लोगों के लिए कायदे का पुनर्वास किया गया है.
डॉ.श्रीवास्तव कहते हैं “ हरसूद अपने में एक कंप्लीट एकोनॉमिक जोन था. जहां किसानों की बड़ी मंडी थी, लगभग 200 गांवों की सीधी पहुंच थी, जिससे वहां हर किसी के लिए काम था. जबकि यहां हालत बिल्कुल ही बदले हुए हैं. यहां पक्के मकानों, सरकारी परियोजनाओं के अफसरों के कार्यालयों के अलावा कुछ भी नहीं है.” नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़े आलोक अग्रवाल के अनुसार अभी तक नए हरसूद में बसाए गए लोगों को प्लाट के स्वामित्व तक नहीं दिए गए हैं. जिसके कारण उन लोगों को किसी भी तरह के रोजगार के लिए ऋण नहीं मिल सका है.
आलोक कहते हैं “ बीते तीन सालों में यहां अपराध का ग्राफ तेजी से बढ़ा है। लोगों के पास रोजगार के साधन नहीं हैं, उनके परंपरागत बाजार खत्म हो गए हैं और घरों में भूख तेजी से पांव पसारती जा रही है, इसलिए यहां अपराधिक गतिविधियां तेजी से बढ़ती जा रही हैं.”
बराबर का दुख
ऐसा नहीं कि हरसूद के विस्थापन ने केवल गरीब तबके की आंखों में आंसू दिए. हरसूद के पास छनेरा में किराने के बड़े व्यापारी त्रिलोक भंडारी बताते हैं कि वह अपने शहर हरसूद में भी किराने की दुकान चलाते थे, लेकिन वहां कभी यह संकट नहीं आता था कि परिवार का पेट कैसे भरें ? लेकिन यहां हम अपनी पूरी पूंजी दांव पर लगाने के बाद भी अभी तक खुद को स्थापित नहीं कर सके हैं क्योंकि यहां क्रयशक्ति पहले की तुलना में आधी भी नहीं रह गई है. दलितों की कौन सुने: नए हरसूद के सेक्टर सात जिसे दलित सेक्टर भी कहा जाता है; के पचास घरों में से ज्यादातर के बच्चे अब अपनी पीठ पर से स्कूली बस्तों को उतार कर गैंती-फावड़ा उठा रहे हैं.
राहुल जो हरसूद उजड़ने के समय दसवीं की पढ़ाई कर रहा था, यहां बस्ते को खूंटी पर टांग चुका है क्योंकि पढ़ाई से अधिक जरूरी है, उसके परिवार के लिए रोटी.
विस्थापितों के इस नए डेरे नया छनेरा में दो जून की रोटी का जुगाड़ मुश्किल हो चला है, लेकिन सबको रोजगार की गारंटी देने वाली योजना का यहां अता-पता नहीं है। लोगों का आरोप है कि विस्थापन के समय स्थानीय लोगों द्वारा असुविधाओं और भ्रष्टाचार के कारण यहां के लोगों का तीखा विरोध झेलने वाले कुछ प्रभावशाली नेता और मंत्री अब यहां के लोगों को उस विरोध की सजा दे रहे हैं। विपक्षी नेताओं के लिए भी हरसूद अब पुराना मुद्दा है, पुराना और ग़ैरजरुरी. जाहिर है, नए हरसूद का वोट बैंक इतना बड़ा नहीं है, जो चुनाव में कोई बड़ी भूमिका निभाए.
अब भी फंसे हैं लोग
कालीमाचक नदी को डूब चुके हरसूद की जीवनदायिनी कहा जाता था. यह बात और है कि इंदिरा सागर बांध का जलस्तर बढ़ने पर इसके बैकवाटर ने ही हरसूद को डुबोने का काम किया. अब जबकि हरसूद एक बड़े खंडहर में तब्दील हो चुका है. बावजूद इसके हरसूद के वार्ड क्रमांक 9 मोही रैयत के लगभग 30-35 लोग यहां से जाने को तैयार नहीं हैं, क्योंकि उनको अभी तक मुआवजे की रकम नहीं मिली है. इन परिवारों में से ही एक मोहन गेंदालाल कहते हैं- “ सरकार द्वारा घोषित धारा 4 के प्रावधानों को पूरा करने के बाद भी हम लोग अब तक मुआवजा नहीं पा सके हैं.” मोहन इस बात से परेशान हैं कि उनका मुआवजा कहां गया. वैसे यहां ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जिनको उनका हक नहीं मिला. उनके हिस्से का मुआवजा या तो सरकारी अफसर डकार गए या फिर दूसरे दबंग. टीबी की मरीज पूनम बताती हैं कि पटवारी और अन्य सरकारी अफसरों ने उनसे रिश्वत की मांग की. पूनम पूछती हैं- “ जिसके पास खाने को ही न हो, वह भला कैसे रिश्वत देगा.”और हरसूद में सब कुशल हैकलेक्टर से लेकर सरकार के मंत्री तक हरसूद पर कोई शिकायत सुनने को तैयार नहीं होते. आपको बताया जाएगा कि वहां सब कुछ ठीक है. कलेक्टर को बताइए तो वह कहेंगे –“ आपके बताने से ही यह नई सूचना हमें मिली. इस पर त्वरित कार्रवाई की जाएगी.”
विस्थापितों की मांगों के लिए लंबी लड़ाई लड़ने वाले डॉ. अशोक श्रीवास्तव कहते हैं कि यहां डामर की सड़कें और नालियां इसलिए हैं, क्योंकि सरकार को हाईकोर्ट में यह बताना होता है कि लोगों के लिए कायदे का पुनर्वास किया गया है.
डॉ.श्रीवास्तव कहते हैं “ हरसूद अपने में एक कंप्लीट एकोनॉमिक जोन था. जहां किसानों की बड़ी मंडी थी, लगभग 200 गांवों की सीधी पहुंच थी, जिससे वहां हर किसी के लिए काम था. जबकि यहां हालत बिल्कुल ही बदले हुए हैं. यहां पक्के मकानों, सरकारी परियोजनाओं के अफसरों के कार्यालयों के अलावा कुछ भी नहीं है.” नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़े आलोक अग्रवाल के अनुसार अभी तक नए हरसूद में बसाए गए लोगों को प्लाट के स्वामित्व तक नहीं दिए गए हैं. जिसके कारण उन लोगों को किसी भी तरह के रोजगार के लिए ऋण नहीं मिल सका है.
आलोक कहते हैं “ बीते तीन सालों में यहां अपराध का ग्राफ तेजी से बढ़ा है. लोगों के पास रोजगार के साधन नहीं हैं, उनके परंपरागत बाजार खत्म हो गए हैं और घरों में भूख तेजी से पांव पसारती जा रही है, इसलिए यहां अपराधिक गतिविधियां तेजी से बढ़ती जा रही हैं.”बराबर का दुख
ऐसा नहीं कि हरसूद के विस्थापन ने केवल गरीब तबके की आंखों में आंसू दिए. हरसूद के पास छनेरा में किराने के बड़े व्यापारी त्रिलोक भंडारी बताते हैं कि वह अपने शहर हरसूद में भी किराने की दुकान चलाते थे, लेकिन वहां कभी यह संकट नहीं आता था कि परिवार का पेट कैसे भरें ? लेकिन यहां हम अपनी पूरी पूंजी दांव पर लगाने के बाद भी अभी तक खुद को स्थापित नहीं कर सके हैं क्योंकि यहां क्रयशक्ति पहले की तुलना में आधी भी नहीं रह गई है. दलितों की कौन सुने: नए हरसूद के सेक्टर सात जिसे दलित सेक्टर भी कहा जाता है; के पचास घरों में से ज्यादातर के बच्चे अब अपनी पीठ पर से स्कूली बस्तों को उतार कर गैंती-फावड़ा उठा रहे हैं.
राहुल जो हरसूद उजड़ने के समय दसवीं की पढ़ाई कर रहा था, यहां बस्ते को खूंटी पर टांग चुका है क्योंकि पढ़ाई से अधिक जरूरी है, उसके परिवार के लिए रोटी.
विस्थापितों के इस नए डेरे नया छनेरा में दो जून की रोटी का जुगाड़ मुश्किल हो चला है, लेकिन सबकोरोजगार की गारंटी देने वाली योजना का यहां अता-पता नहीं है. लोगों का आरोप है कि विस्थापन के समय स्थानीय लोगों द्वारा असुविधाओं और भ्रष्टाचार के कारण यहां के लोगों का तीखा विरोध झेलने वाले कुछ प्रभावशाली नेता और मंत्री अब यहां के लोगों को उस विरोध की सजा दे रहे हैं. विपक्षी नेताओं के लिए भी हरसूद अब पुराना मुद्दा है, पुराना और ग़ैरजरुरी. जाहिर है, नए हरसूद का वोट बैंक इतना बड़ा नहीं है, जो चुनाव में कोई बड़ी भूमिका निभाए.अब भी फंसे हैं लोगकालीमाचक नदी को डूब चुके हरसूद की जीवनदायिनी कहा जाता था. यह बात और है कि इंदिरा सागर बांध का जलस्तर बढ़ने पर इसके बैकवाटर ने ही हरसूद को डुबोने का काम किया. अब जबकि हरसूद एक बड़े खंडहर में तब्दील हो चुका है. बावजूद इसके हरसूद के वार्ड क्रमांक 9 मोही रैयत के लगभग 30-35 लोग यहां से जाने को तैयार नहीं हैं, क्योंकि उनको अभी तक मुआवजे की रकम नहीं मिली है. इन परिवारों में से ही एक मोहन गेंदालाल कहते हैं- “ सरकार द्वारा घोषित धारा 4 के प्रावधानों को पूरा करने के बाद भी हम लोग अब तक मुआवजा नहीं पा सके हैं.” मोहन इस बात से परेशान हैं कि उनका मुआवजा कहां गया. वैसे यहां ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जिनको उनका हक नहीं मिला. उनके हिस्से का मुआवजा या तो सरकारी अफसर डकार गए या फिर दूसरे दबंग. टीबी की मरीज पूनम बताती हैं कि पटवारी और अन्य सरकारी अफसरों ने उनसे रिश्वत की मांग की. पूनम पूछती हैं- “ जिसके पास खाने को ही न हो, वह भला कैसे रिश्वत देगा।”
और हरसूद में सब कुशल है
कलेक्टर से लेकर सरकार के मंत्री तक हरसूद पर कोई शिकायत सुनने को तैयार नहीं होते. आपको बताया जाएगा कि वहां सब कुछ ठीक है. कलेक्टर को बताइए तो वह कहेंगे –“ आपके बताने से ही यह नई सूचना हमें मिली. इस पर त्वरित कार्रवाई की जाएगी।”
www.raviwar.com से साभार
भोपाल से
कीमत तो चुकानी पड़ती है !
इंदिरा सागर बांध परियोजना से प्रभावित 250 गांवों और उनके दर्द के प्रतीक बने एक खंडवा जिले के हरसूद के विस्थापितों के बारे में नजदीकी जिलों और राजधानी के नेताओं, अफसरों से लेकर आम जनता तक यही राय रखते हैं.
30 जून को हरसूद डूबने के चार साल बाद विस्थापितों की बस्ती नया छनेरा में बड़ी संख्या में ऐसे परिवार आपको मिल जाएंगे, जिनके लिए दो जून की रोटी दुनिया का सबसे बड़ा सवाल है. एक ऐसा सवाल जो हर रोज उनके घरों में सुबह होने के साथ जागता है और पूरा घर हर रोज उससे जुझता रहता है.
मंगल ग्रह जैसी सुर्ख लाल जमीन पर बसाए गए लोगों की आजीविका का कोई साधन नहीं है. मुआवजे का पैसा धीरे-धीरे खत्म होता गया और अब हालात भुखमरी के हो रहे हैं. उन चंद लोगों की बात छोड़ दें जिन्होंने अलग-अलग तरीकों से मोटा मुआवजा हड़पा तो 250 गांवों के 25000 से अधिक लोग 1000 मेगावाट बिजली की कीमत अपनी जड़ों से कटकर, बेरोजगार होकर चुका रहे हैं. बरस दर बरस हरसूद सरकार और सरकारी योजनाओं के केंद्र से हाशिए पर जा रहा है. लापरवाही की हद है कि अभी भी लोग खतरे के निशान की जद में है. ऐसे लोग मुआवजे की आस में अपने परिवारों को संकट में डाले हुए हैं. हर साल की तरह इस साल भी यहां जड़ों से खदेड़े गए लोग अपने प्यारे शहर को याद करने एकजुट हुए और नम आंखों से खंडहर में तब्दील हो चुके शहर में जाकर उसे याद किया.
हरसूद का मूल पेशा खेती-किसानी तो हरसूद डूबने के साथ ही खत्म हो गया. इसके साथ ही उस तबके की परेशानियां भी बढ़ गईं जो मजदूरी करके अपने परिवारों का पेट पालता था. इसी लिए नए छनेरा में तेजी से विस्थापन बढ़ा. आलम यह है कि हरसूद से विस्थापित किए गए 5600 परिवारों में से न्यू हरसूद में बमुश्किल हजार परिवार ही बचे हैं. बाकी कहां गए, विस्थापित बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य किस कदर प्रभावित हुई है, इसका आंकड़ा किसी के पास नहीं है. कम से कम सरकार के पास तो नहीं ही है, जिसके जिम्मे इन विस्थापितों का पुनर्वास था.
दलितों की स्थिति तो और भी बदतर है. नए हरसूद में पचास से अधिक दलितों के घर हैं, जिनमें से अधिकांश घरों के बच्चों की पढ़ाई दम तोड़ चुकी है. स्वास्थ्य सेवा की हालत खराब है.
कौन देगा विस्थापन का सूद
जून 2004 में विस्थापित की गई ऐतिहासिक हरसूद नगरी को 1815 में राजा हर्षवर्धन द्वारा बसाया गया था. आधुनिक समय का हरसूद दरबदर होने से पहले तहसील का दर्जा पाने वाला ऐसा नगर था, जो कि अनेक गांवों से घिरा हुआ था. वहां लोगों के पुश्तैनी कारोबार थे. किसानों के लिए खेती थी तो मजदूरों के लिए मजदूरी. कुल मिलाकर सबके लिए कुछ न कुछ जरूर था, जो अब नहीं रहा.
बिजली के लिए इस नगर को विस्थापित होना पड़ा और जो यहां से विस्थापित हुए उनके हिस्से रोशनी नहीं थी, केवल अंधेरा था.मध्यप्रदेश में ऐसी दूसरी जगह खोजना मुश्किल है, जहां लोगों के पास रहने के लिए पक्के मकान तो हैं, लेकिन खाने के लिए रोटी नहीं है. इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि ज्यादातर लोग मकान बनवाते-बनवाते ही कंगाल हो गए. नया हरसूद जिसे उस समय की मुख्यमंत्री रहीं साध्वी उमा भारती ने विस्थापितों का आदर्श नगर बनाने की घोषणा की थी, वास्तव में बेहद बंजर और कठोर जमीन का इलाका था. जिसमें नींव खुदवाने में ही लोगों को बहुत अधिक पैसा खर्च करना पड़ा. जब किसी की बसी बसाई गृहस्थी उजाड़ दी जाए तो उसकी सबसे पहली जरूरत ठिकाना तलाशना होता है. इसी कमजोरी का सबसे अधिक लाभ नये हरसूद में बसने वालों से ठेकेदारों, सीमेंट, रेत और लोहे के व्यापारियों ने उठाया.
उन्होंने अमूमन 2300 रूपए प्रति क्विंटल में बिकने वाले लोहे और हजार-पंद्रह सौ की रेत-गिट्टी के लिए मजबूर लोगों से क्रमश: चार हजार और तीन हजार रूपए वसूले. इस तरह खदेड़े गए लोगों की मुआवजे की रकम घर बनवाने में ही खर्च हो गई.
2004 में हरसूद के लोगों ने अपने ही हाथों से घरों पर रोते हुए हथौड़े चलाए थे और बरसात की आहट के बीच मंगल ग्रह सरीखी लाल और कठोर जमीन पर खुले आसमान के नीचे आ बैठे थे, उनके लिए सबसे पहली जरूरत घर थे, इसलिए उनके पास जो कुछ था, वह सब कुछ उन्होंने अपना घर बनाने में लगा दिया.
घर के भीतर का सच
अब हालत यह है कि उनके पास घर और केवल घर ही हैं. सरकार के नुमाइंदे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में पक्के मकानों के विहंगम दृश्य दिखाकर अदालतों को यह बताने में कामयाब हो जाते हैं कि लोगों के पुनर्वास के समूचे इंतजाम हैं, जबकि यह केवल एक छल है. सरकारी छल !
नए हरसूद के सरकारी रिकार्ड में वाणिज्य केंद्र के आगे यह दावा किया गया है कि भूखंड विकसित हैं और कार्य प्रगति पर है. जबकि सच्चाई तो यह है कि महज खाली भूखंडों वाला यह वाणिज्य केंद्र अपनी स्थापना के साथ ही नाकाम हो चुका है. क्योंकि न तो नये हरसूद में बस स्टैंड है, न ही मंडी और ही ऋण देने वाले बैंक. हां विकास दिखाने के लिए कांक्रीट की नालियां और अधचुपड़ी डामर की सड़कें जरूर मौजूद हैं.
विस्थापितों की मांगों के लिए लंबी लड़ाई लड़ने वाले डॉ. अशोक श्रीवास्तव कहते हैं कि यहां डामर की सड़कें और नालियां इसलिए हैं, क्योंकि सरकार को हाईकोर्ट में यह बताना होता है कि लोगों के लिए कायदे का पुनर्वास किया गया है.
डॉ.श्रीवास्तव कहते हैं “ हरसूद अपने में एक कंप्लीट एकोनॉमिक जोन था. जहां किसानों की बड़ी मंडी थी, लगभग 200 गांवों की सीधी पहुंच थी, जिससे वहां हर किसी के लिए काम था. जबकि यहां हालत बिल्कुल ही बदले हुए हैं. यहां पक्के मकानों, सरकारी परियोजनाओं के अफसरों के कार्यालयों के अलावा कुछ भी नहीं है.” नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़े आलोक अग्रवाल के अनुसार अभी तक नए हरसूद में बसाए गए लोगों को प्लाट के स्वामित्व तक नहीं दिए गए हैं. जिसके कारण उन लोगों को किसी भी तरह के रोजगार के लिए ऋण नहीं मिल सका है.
आलोक कहते हैं “ बीते तीन सालों में यहां अपराध का ग्राफ तेजी से बढ़ा है। लोगों के पास रोजगार के साधन नहीं हैं, उनके परंपरागत बाजार खत्म हो गए हैं और घरों में भूख तेजी से पांव पसारती जा रही है, इसलिए यहां अपराधिक गतिविधियां तेजी से बढ़ती जा रही हैं.”
बराबर का दुख
ऐसा नहीं कि हरसूद के विस्थापन ने केवल गरीब तबके की आंखों में आंसू दिए. हरसूद के पास छनेरा में किराने के बड़े व्यापारी त्रिलोक भंडारी बताते हैं कि वह अपने शहर हरसूद में भी किराने की दुकान चलाते थे, लेकिन वहां कभी यह संकट नहीं आता था कि परिवार का पेट कैसे भरें ? लेकिन यहां हम अपनी पूरी पूंजी दांव पर लगाने के बाद भी अभी तक खुद को स्थापित नहीं कर सके हैं क्योंकि यहां क्रयशक्ति पहले की तुलना में आधी भी नहीं रह गई है. दलितों की कौन सुने: नए हरसूद के सेक्टर सात जिसे दलित सेक्टर भी कहा जाता है; के पचास घरों में से ज्यादातर के बच्चे अब अपनी पीठ पर से स्कूली बस्तों को उतार कर गैंती-फावड़ा उठा रहे हैं.
राहुल जो हरसूद उजड़ने के समय दसवीं की पढ़ाई कर रहा था, यहां बस्ते को खूंटी पर टांग चुका है क्योंकि पढ़ाई से अधिक जरूरी है, उसके परिवार के लिए रोटी.
विस्थापितों के इस नए डेरे नया छनेरा में दो जून की रोटी का जुगाड़ मुश्किल हो चला है, लेकिन सबको रोजगार की गारंटी देने वाली योजना का यहां अता-पता नहीं है। लोगों का आरोप है कि विस्थापन के समय स्थानीय लोगों द्वारा असुविधाओं और भ्रष्टाचार के कारण यहां के लोगों का तीखा विरोध झेलने वाले कुछ प्रभावशाली नेता और मंत्री अब यहां के लोगों को उस विरोध की सजा दे रहे हैं। विपक्षी नेताओं के लिए भी हरसूद अब पुराना मुद्दा है, पुराना और ग़ैरजरुरी. जाहिर है, नए हरसूद का वोट बैंक इतना बड़ा नहीं है, जो चुनाव में कोई बड़ी भूमिका निभाए.
अब भी फंसे हैं लोग
कालीमाचक नदी को डूब चुके हरसूद की जीवनदायिनी कहा जाता था. यह बात और है कि इंदिरा सागर बांध का जलस्तर बढ़ने पर इसके बैकवाटर ने ही हरसूद को डुबोने का काम किया. अब जबकि हरसूद एक बड़े खंडहर में तब्दील हो चुका है. बावजूद इसके हरसूद के वार्ड क्रमांक 9 मोही रैयत के लगभग 30-35 लोग यहां से जाने को तैयार नहीं हैं, क्योंकि उनको अभी तक मुआवजे की रकम नहीं मिली है. इन परिवारों में से ही एक मोहन गेंदालाल कहते हैं- “ सरकार द्वारा घोषित धारा 4 के प्रावधानों को पूरा करने के बाद भी हम लोग अब तक मुआवजा नहीं पा सके हैं.” मोहन इस बात से परेशान हैं कि उनका मुआवजा कहां गया. वैसे यहां ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जिनको उनका हक नहीं मिला. उनके हिस्से का मुआवजा या तो सरकारी अफसर डकार गए या फिर दूसरे दबंग. टीबी की मरीज पूनम बताती हैं कि पटवारी और अन्य सरकारी अफसरों ने उनसे रिश्वत की मांग की. पूनम पूछती हैं- “ जिसके पास खाने को ही न हो, वह भला कैसे रिश्वत देगा.”और हरसूद में सब कुशल हैकलेक्टर से लेकर सरकार के मंत्री तक हरसूद पर कोई शिकायत सुनने को तैयार नहीं होते. आपको बताया जाएगा कि वहां सब कुछ ठीक है. कलेक्टर को बताइए तो वह कहेंगे –“ आपके बताने से ही यह नई सूचना हमें मिली. इस पर त्वरित कार्रवाई की जाएगी.”
विस्थापितों की मांगों के लिए लंबी लड़ाई लड़ने वाले डॉ. अशोक श्रीवास्तव कहते हैं कि यहां डामर की सड़कें और नालियां इसलिए हैं, क्योंकि सरकार को हाईकोर्ट में यह बताना होता है कि लोगों के लिए कायदे का पुनर्वास किया गया है.
डॉ.श्रीवास्तव कहते हैं “ हरसूद अपने में एक कंप्लीट एकोनॉमिक जोन था. जहां किसानों की बड़ी मंडी थी, लगभग 200 गांवों की सीधी पहुंच थी, जिससे वहां हर किसी के लिए काम था. जबकि यहां हालत बिल्कुल ही बदले हुए हैं. यहां पक्के मकानों, सरकारी परियोजनाओं के अफसरों के कार्यालयों के अलावा कुछ भी नहीं है.” नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़े आलोक अग्रवाल के अनुसार अभी तक नए हरसूद में बसाए गए लोगों को प्लाट के स्वामित्व तक नहीं दिए गए हैं. जिसके कारण उन लोगों को किसी भी तरह के रोजगार के लिए ऋण नहीं मिल सका है.
आलोक कहते हैं “ बीते तीन सालों में यहां अपराध का ग्राफ तेजी से बढ़ा है. लोगों के पास रोजगार के साधन नहीं हैं, उनके परंपरागत बाजार खत्म हो गए हैं और घरों में भूख तेजी से पांव पसारती जा रही है, इसलिए यहां अपराधिक गतिविधियां तेजी से बढ़ती जा रही हैं.”बराबर का दुख
ऐसा नहीं कि हरसूद के विस्थापन ने केवल गरीब तबके की आंखों में आंसू दिए. हरसूद के पास छनेरा में किराने के बड़े व्यापारी त्रिलोक भंडारी बताते हैं कि वह अपने शहर हरसूद में भी किराने की दुकान चलाते थे, लेकिन वहां कभी यह संकट नहीं आता था कि परिवार का पेट कैसे भरें ? लेकिन यहां हम अपनी पूरी पूंजी दांव पर लगाने के बाद भी अभी तक खुद को स्थापित नहीं कर सके हैं क्योंकि यहां क्रयशक्ति पहले की तुलना में आधी भी नहीं रह गई है. दलितों की कौन सुने: नए हरसूद के सेक्टर सात जिसे दलित सेक्टर भी कहा जाता है; के पचास घरों में से ज्यादातर के बच्चे अब अपनी पीठ पर से स्कूली बस्तों को उतार कर गैंती-फावड़ा उठा रहे हैं.
राहुल जो हरसूद उजड़ने के समय दसवीं की पढ़ाई कर रहा था, यहां बस्ते को खूंटी पर टांग चुका है क्योंकि पढ़ाई से अधिक जरूरी है, उसके परिवार के लिए रोटी.
विस्थापितों के इस नए डेरे नया छनेरा में दो जून की रोटी का जुगाड़ मुश्किल हो चला है, लेकिन सबकोरोजगार की गारंटी देने वाली योजना का यहां अता-पता नहीं है. लोगों का आरोप है कि विस्थापन के समय स्थानीय लोगों द्वारा असुविधाओं और भ्रष्टाचार के कारण यहां के लोगों का तीखा विरोध झेलने वाले कुछ प्रभावशाली नेता और मंत्री अब यहां के लोगों को उस विरोध की सजा दे रहे हैं. विपक्षी नेताओं के लिए भी हरसूद अब पुराना मुद्दा है, पुराना और ग़ैरजरुरी. जाहिर है, नए हरसूद का वोट बैंक इतना बड़ा नहीं है, जो चुनाव में कोई बड़ी भूमिका निभाए.अब भी फंसे हैं लोगकालीमाचक नदी को डूब चुके हरसूद की जीवनदायिनी कहा जाता था. यह बात और है कि इंदिरा सागर बांध का जलस्तर बढ़ने पर इसके बैकवाटर ने ही हरसूद को डुबोने का काम किया. अब जबकि हरसूद एक बड़े खंडहर में तब्दील हो चुका है. बावजूद इसके हरसूद के वार्ड क्रमांक 9 मोही रैयत के लगभग 30-35 लोग यहां से जाने को तैयार नहीं हैं, क्योंकि उनको अभी तक मुआवजे की रकम नहीं मिली है. इन परिवारों में से ही एक मोहन गेंदालाल कहते हैं- “ सरकार द्वारा घोषित धारा 4 के प्रावधानों को पूरा करने के बाद भी हम लोग अब तक मुआवजा नहीं पा सके हैं.” मोहन इस बात से परेशान हैं कि उनका मुआवजा कहां गया. वैसे यहां ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जिनको उनका हक नहीं मिला. उनके हिस्से का मुआवजा या तो सरकारी अफसर डकार गए या फिर दूसरे दबंग. टीबी की मरीज पूनम बताती हैं कि पटवारी और अन्य सरकारी अफसरों ने उनसे रिश्वत की मांग की. पूनम पूछती हैं- “ जिसके पास खाने को ही न हो, वह भला कैसे रिश्वत देगा।”
और हरसूद में सब कुशल है
कलेक्टर से लेकर सरकार के मंत्री तक हरसूद पर कोई शिकायत सुनने को तैयार नहीं होते. आपको बताया जाएगा कि वहां सब कुछ ठीक है. कलेक्टर को बताइए तो वह कहेंगे –“ आपके बताने से ही यह नई सूचना हमें मिली. इस पर त्वरित कार्रवाई की जाएगी।”
www.raviwar.com से साभार
Monday, June 16, 2008
गर्म ग्रह का अभिशाप
चंद्रभूषण
देश में खाद्यान्नों की पैदावार इस साल औसत से ज्यादा होने की पुष्टि की जा चुकी है, फिर भी गेहूं, चावल, दलहन, तिलहन और मोटे अनाजों की कीमतें काबू में नहीं आ रही हैं। अन्य बातों के अलावा इसकी एक बड़ी वजह पूरी दुनिया पर मंडरा रहा खाद्यान्न संकट है। दक्षिण अमेरिकी देश हैती और अफ्रीकी देश सेनेगल के बाजारों में खाने के लिए भड़के दंगों में कई लोगों की जानें जा चुकी हैं। कई और छोटे देशों में भयंकर तनाव की स्थिति बनी हुई है। विश्व बैंक ने एक आधिकारिक बयान जारी करके कहा है कि खाद्यान्न संकट के चलते लगभग 50 देशों में इस साल दंगे-फसाद की स्थिति पैदा हो सकती है।
अपनी जरूरत से ज्यादा चावल उपजाने वाले फिलीपीन्स, म्यांमार और विएतनाम जैसे दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों ने संभावित खाद्य संकट को ध्यान में रखते हुए चावल निर्यात करने से मना कर दिया है। चावल के निर्यातकों में गिने जाने वाले भारत ने निर्यात पर औपचारिक रोक भले न लगाई हो लेकिन निर्यात शुल्क बढ़ाकर और 50 रूपये किलो से कम कीमत वाले चावल के निर्यात को प्रतिबंधित करके इसे बहुत मामूली स्तर पर ला दिया है। उधर गेहूं के अंतरराष्ट्रीय व्यापार की हालत भी अच्छी नहीं है। यूरोपीय देशों में गेहूं की उपज गिर जाने के कारण वहां से इसका निर्यात पिछले कई वर्षों से अत्यंत निचले स्तर पर चल रहा है।
सचमुच आश्चर्यजनक है कि जिस ग्लोबल वार्मिंग को हम अभी तक बौद्धिक हलकों में बहसियाई जाने वाली एक अकादमिक समस्या मानते आए हैं, वह अचानक लाखों लोगों का जीना-मरना निर्धारित करने लगी है। अपने यहां उपजने वाले चावल का 98 प्रतिशत हिस्सा निर्यात करके कई देशों का पेट भरने वाले ऑस्ट्रेलिया के मरे-डालग बेसिन में पिछले दस वर्षों से पड़ा सूखा अंतरराष्ट्रीय चावल संकट का सबसे बड़ा कारण है। दरअसल, धान काफी ज्यादा पानी की मांग करने वाला एक उष्णकटिबंधीय फसल है, और दुनिया के बहुत कम देश ही अपना चावल बड़ी मात्रा में बेच पाने में सक्षम माने जाते हैं। सरप्लस चावल उपजाने वालों में ऑस्ट्रेलिया की जगह अव्वल मानी जाती रही है, लेकिन उसके धनहर खेतों में तो पिछले कई वर्षों से धूल उड़ रही है।
सन् 2003 में यूरोप में 48 डिग्री सेल्सियस तक चले गए तापमान और अगस्त के महीने में लगातार एक हफ्ते चली जबर्दस्त लू में 35 हजार लोगों की जान जाने की खबर हम सभी को होगी, लेकिन इस असाधारण स्थिति को एक तरफ रख दें तो भी 1990 के दशक से वहां लगातार बढ़े तापमान ने यूरोपीय खेती का क्या हाल किया है, इस तथ्य से शायद ज्यादा लोगों की वाकफियत नहीं है। गेहूं और अंगूर यूरोप के ज्यादातर इलाकों की बुनियादी फसलें मानी जाती हैं और इन दोनों का उत्पादन वहां तेजी से गिरा है।
अमेरिका के पूर्व उप-राष्ट्रपति और पिछले साल के नोबेल शांति पुरस्कार विजेता अल गोर की बनाई फिल्म ‘डे आफ्टर टुमारो’ में अंटार्कटिका के लार्सन बी आइस शेल्फ के पिघल जाने से गल्फ स्ट्रीम धारा का बहना बंद हो जाते दिखाया गया है। इसके चलते इधर इंग्लैंड के तटीय शहरों में तबाही आ जाती है तो उधर न्यूयॉर्क स्थायी रूप से बर्फ में जमकर रह जाता है। फिल्म के माध्यम के मुताबिक चुनी गई ये कुछ आश्चर्यजनक आशंकाएं हैं, जिन्हें फिल्म में सच होते दिखाया गया है। ये इतनी आश्चर्यजनक हैं कि इनके कभी सचमुच सही साबित हो जाने पर एकबारगी यकीन नहीं होता। लेकिन जैसी कहावत है, हकीकत हमेशा कल्पना से ज्यादा आश्चर्यजनक होती है।
दक्षिणी-पूर्वी आस्ट्रेलिया में लंबा सुखाड़ हो जाने से दसियों हजार किलोमीटर दूर हैती और सेनेगल में दंगे भड़क उठना, या यहां भारत में ही अपनी कार्यकुशलता का ढोल पीट रही केंद्र सरकार का अचानक संकटग्रस्त दिखने लगना हकीकत का सिर्फ एक पहलू है। बहुत सारी अन्य छोटी-छोटी चीजें भी हैं, जिनका महत्व पहली बार महसूस किया जा रहा है। ब्रिटिश जीवविज्ञानी रोनाल्ड रॉस ने सौ साल पहले भारत में मलेरिया पर अपना ऐतिहासिक काम इसे एक पराई बीमारी मानकर किया था। यूरोप में मच्छरों के होने की कल्पना ही नहीं की जाती थी, लिहाजा मलेरिया से वहां के डॉक्टरों या जीवविज्ञानियों का सीधे कोई साबका पड़ने का सवाल ही नहीं पैदा होता था। लेकिन आज गर्म होते यूरोप और उत्तारी अमेरिका में न सिर्फ मच्छर और पिस्सू हैं बल्कि मलेरिया, हैजा, प्लेग और कई अन्य उष्ण-कटिबंधीय बीमारियों के मरीज वहां दर्ज किए जाने लगे हैं।
जितनी हिकारत अमेरिकी हुक्मरानों ने ग्लोबल वार्मिंग से मुकाबले के लिए तय किए गए क्योटो प्रोटोकॉल के प्रति बरती थी, वैसी पिछले साल पेरिस में हुए आईपीसीसी सम्मेलन के प्रति उनसे नहीं बरती गई। बल्कि आईपीसीसी के निष्कर्षों पर अपनी मोहर लगाते हुए ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ कमर कसकर उतर पड़ने का जुबानी जमाखर्च भी उन्होंने किया तो इसकी अकेली वजह यही थी कि सन् 2005 में वहां आए असाधारण चक्रवातीय तूफानों ने न सिर्फ एक समूचे शहर न्यू र्ऑिलएंस को नेस्तनाबूद कर दिया था बल्कि ग्लोबल वामग की प्रस्थापना को अमेरिका विरोधी साजिश बताते आए रिपब्लिक नेतृत्व की कमर तोड़कर रख दी थी।
बीच-बीच में तेल कंपनियों और वाहन निर्माताओं के पे-रोल पर काम करने वाले वैज्ञानिक और पर्यावरणविद आज भी ऐसे सुर्रे छोड़ते रहते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग से ज्यादा चितित होने की जरूरत नहीं है। ऐसा ही सुर्रा इन दिनों यह छूटा हुआ है कि अगले दस वर्षों में ग्लोबल वार्मिंग को लेकर चितित होने की जरूरत नहीं है क्योंकि उत्तरी ध्रुव की एक पर्यावरणिक परिघटना अगले कुछ समय तक धरती के बढ़ते तापमान की लगाम थामे रहेगी। कुछ-कुछ ऐसी ही प्रस्थापनाएं टाइटनिक जहाज के डूबने से ऐन पहले तक उसके इंजीनियर और मैनेजर वगैरह भी देते रहे होंगे।
एक तरफ तेल, गैस और कोयले के दिनोंदिन रीतते भंडार इन सारी चीजों की कीमतें आसमान पर चढ़ाए जा रहे हैं, दूसरी आ॓र धरती का दम घोंट रहा इनका धुआं हजार तरीकों से इस ग्रह की जान लेने पर आमादा है। फिर भी विद्वज्जन न जाने किस अदालत से ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ दस वर्षों का ‘स्टे-ऑर्डर’ लेते आए हैं। समय आ गया है कि ऐसे खयाली उपायों के जरिए वास्तविक समस्याओं से निपट लेने का मोह हम छोड़ दें। पहली बार हमारी संसद में अगले बीस-बाइस वर्षों में गंगा नदी के सूख जाने की आशंका को लेकर चर्चा हुई है। यह मामला सिर्फ चर्चा तक ही सिमटकर न रह जाए, इसके लिए हमें बहस इस बात पर करनी होगी कि राष्ट्रीय स्तर पर ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ कुछ सार्थक करने के लिए हम क्या-क्या कदम उठाने के लिए, ठोस तौर पर कहें तो किस हद तक माली नुकसान बर्दाश्त करने के लिए तैयार हैं।
www.rashtriyasahara.com से साभार
देश में खाद्यान्नों की पैदावार इस साल औसत से ज्यादा होने की पुष्टि की जा चुकी है, फिर भी गेहूं, चावल, दलहन, तिलहन और मोटे अनाजों की कीमतें काबू में नहीं आ रही हैं। अन्य बातों के अलावा इसकी एक बड़ी वजह पूरी दुनिया पर मंडरा रहा खाद्यान्न संकट है। दक्षिण अमेरिकी देश हैती और अफ्रीकी देश सेनेगल के बाजारों में खाने के लिए भड़के दंगों में कई लोगों की जानें जा चुकी हैं। कई और छोटे देशों में भयंकर तनाव की स्थिति बनी हुई है। विश्व बैंक ने एक आधिकारिक बयान जारी करके कहा है कि खाद्यान्न संकट के चलते लगभग 50 देशों में इस साल दंगे-फसाद की स्थिति पैदा हो सकती है।
अपनी जरूरत से ज्यादा चावल उपजाने वाले फिलीपीन्स, म्यांमार और विएतनाम जैसे दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों ने संभावित खाद्य संकट को ध्यान में रखते हुए चावल निर्यात करने से मना कर दिया है। चावल के निर्यातकों में गिने जाने वाले भारत ने निर्यात पर औपचारिक रोक भले न लगाई हो लेकिन निर्यात शुल्क बढ़ाकर और 50 रूपये किलो से कम कीमत वाले चावल के निर्यात को प्रतिबंधित करके इसे बहुत मामूली स्तर पर ला दिया है। उधर गेहूं के अंतरराष्ट्रीय व्यापार की हालत भी अच्छी नहीं है। यूरोपीय देशों में गेहूं की उपज गिर जाने के कारण वहां से इसका निर्यात पिछले कई वर्षों से अत्यंत निचले स्तर पर चल रहा है।
सचमुच आश्चर्यजनक है कि जिस ग्लोबल वार्मिंग को हम अभी तक बौद्धिक हलकों में बहसियाई जाने वाली एक अकादमिक समस्या मानते आए हैं, वह अचानक लाखों लोगों का जीना-मरना निर्धारित करने लगी है। अपने यहां उपजने वाले चावल का 98 प्रतिशत हिस्सा निर्यात करके कई देशों का पेट भरने वाले ऑस्ट्रेलिया के मरे-डालग बेसिन में पिछले दस वर्षों से पड़ा सूखा अंतरराष्ट्रीय चावल संकट का सबसे बड़ा कारण है। दरअसल, धान काफी ज्यादा पानी की मांग करने वाला एक उष्णकटिबंधीय फसल है, और दुनिया के बहुत कम देश ही अपना चावल बड़ी मात्रा में बेच पाने में सक्षम माने जाते हैं। सरप्लस चावल उपजाने वालों में ऑस्ट्रेलिया की जगह अव्वल मानी जाती रही है, लेकिन उसके धनहर खेतों में तो पिछले कई वर्षों से धूल उड़ रही है।
सन् 2003 में यूरोप में 48 डिग्री सेल्सियस तक चले गए तापमान और अगस्त के महीने में लगातार एक हफ्ते चली जबर्दस्त लू में 35 हजार लोगों की जान जाने की खबर हम सभी को होगी, लेकिन इस असाधारण स्थिति को एक तरफ रख दें तो भी 1990 के दशक से वहां लगातार बढ़े तापमान ने यूरोपीय खेती का क्या हाल किया है, इस तथ्य से शायद ज्यादा लोगों की वाकफियत नहीं है। गेहूं और अंगूर यूरोप के ज्यादातर इलाकों की बुनियादी फसलें मानी जाती हैं और इन दोनों का उत्पादन वहां तेजी से गिरा है।
अमेरिका के पूर्व उप-राष्ट्रपति और पिछले साल के नोबेल शांति पुरस्कार विजेता अल गोर की बनाई फिल्म ‘डे आफ्टर टुमारो’ में अंटार्कटिका के लार्सन बी आइस शेल्फ के पिघल जाने से गल्फ स्ट्रीम धारा का बहना बंद हो जाते दिखाया गया है। इसके चलते इधर इंग्लैंड के तटीय शहरों में तबाही आ जाती है तो उधर न्यूयॉर्क स्थायी रूप से बर्फ में जमकर रह जाता है। फिल्म के माध्यम के मुताबिक चुनी गई ये कुछ आश्चर्यजनक आशंकाएं हैं, जिन्हें फिल्म में सच होते दिखाया गया है। ये इतनी आश्चर्यजनक हैं कि इनके कभी सचमुच सही साबित हो जाने पर एकबारगी यकीन नहीं होता। लेकिन जैसी कहावत है, हकीकत हमेशा कल्पना से ज्यादा आश्चर्यजनक होती है।
दक्षिणी-पूर्वी आस्ट्रेलिया में लंबा सुखाड़ हो जाने से दसियों हजार किलोमीटर दूर हैती और सेनेगल में दंगे भड़क उठना, या यहां भारत में ही अपनी कार्यकुशलता का ढोल पीट रही केंद्र सरकार का अचानक संकटग्रस्त दिखने लगना हकीकत का सिर्फ एक पहलू है। बहुत सारी अन्य छोटी-छोटी चीजें भी हैं, जिनका महत्व पहली बार महसूस किया जा रहा है। ब्रिटिश जीवविज्ञानी रोनाल्ड रॉस ने सौ साल पहले भारत में मलेरिया पर अपना ऐतिहासिक काम इसे एक पराई बीमारी मानकर किया था। यूरोप में मच्छरों के होने की कल्पना ही नहीं की जाती थी, लिहाजा मलेरिया से वहां के डॉक्टरों या जीवविज्ञानियों का सीधे कोई साबका पड़ने का सवाल ही नहीं पैदा होता था। लेकिन आज गर्म होते यूरोप और उत्तारी अमेरिका में न सिर्फ मच्छर और पिस्सू हैं बल्कि मलेरिया, हैजा, प्लेग और कई अन्य उष्ण-कटिबंधीय बीमारियों के मरीज वहां दर्ज किए जाने लगे हैं।
जितनी हिकारत अमेरिकी हुक्मरानों ने ग्लोबल वार्मिंग से मुकाबले के लिए तय किए गए क्योटो प्रोटोकॉल के प्रति बरती थी, वैसी पिछले साल पेरिस में हुए आईपीसीसी सम्मेलन के प्रति उनसे नहीं बरती गई। बल्कि आईपीसीसी के निष्कर्षों पर अपनी मोहर लगाते हुए ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ कमर कसकर उतर पड़ने का जुबानी जमाखर्च भी उन्होंने किया तो इसकी अकेली वजह यही थी कि सन् 2005 में वहां आए असाधारण चक्रवातीय तूफानों ने न सिर्फ एक समूचे शहर न्यू र्ऑिलएंस को नेस्तनाबूद कर दिया था बल्कि ग्लोबल वामग की प्रस्थापना को अमेरिका विरोधी साजिश बताते आए रिपब्लिक नेतृत्व की कमर तोड़कर रख दी थी।
बीच-बीच में तेल कंपनियों और वाहन निर्माताओं के पे-रोल पर काम करने वाले वैज्ञानिक और पर्यावरणविद आज भी ऐसे सुर्रे छोड़ते रहते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग से ज्यादा चितित होने की जरूरत नहीं है। ऐसा ही सुर्रा इन दिनों यह छूटा हुआ है कि अगले दस वर्षों में ग्लोबल वार्मिंग को लेकर चितित होने की जरूरत नहीं है क्योंकि उत्तरी ध्रुव की एक पर्यावरणिक परिघटना अगले कुछ समय तक धरती के बढ़ते तापमान की लगाम थामे रहेगी। कुछ-कुछ ऐसी ही प्रस्थापनाएं टाइटनिक जहाज के डूबने से ऐन पहले तक उसके इंजीनियर और मैनेजर वगैरह भी देते रहे होंगे।
एक तरफ तेल, गैस और कोयले के दिनोंदिन रीतते भंडार इन सारी चीजों की कीमतें आसमान पर चढ़ाए जा रहे हैं, दूसरी आ॓र धरती का दम घोंट रहा इनका धुआं हजार तरीकों से इस ग्रह की जान लेने पर आमादा है। फिर भी विद्वज्जन न जाने किस अदालत से ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ दस वर्षों का ‘स्टे-ऑर्डर’ लेते आए हैं। समय आ गया है कि ऐसे खयाली उपायों के जरिए वास्तविक समस्याओं से निपट लेने का मोह हम छोड़ दें। पहली बार हमारी संसद में अगले बीस-बाइस वर्षों में गंगा नदी के सूख जाने की आशंका को लेकर चर्चा हुई है। यह मामला सिर्फ चर्चा तक ही सिमटकर न रह जाए, इसके लिए हमें बहस इस बात पर करनी होगी कि राष्ट्रीय स्तर पर ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ कुछ सार्थक करने के लिए हम क्या-क्या कदम उठाने के लिए, ठोस तौर पर कहें तो किस हद तक माली नुकसान बर्दाश्त करने के लिए तैयार हैं।
www.rashtriyasahara.com से साभार
Friday, June 13, 2008
आतंक की खिलाफत का आतंक
सलिल त्रिपाठी
आतंकवाद के खिलाफ विश्व स्तर पर जारी जंग में निर्दोषों को प्रताड़ित करने के कई खौफनाक उदाहरण देखने को मिले हैं। इन घटनाओं से साबित हुआ है कि कई देशों के अधिकारी आतंकवाद के खिलाफ जंग में अपनी उपयोगिता साबित करने के लिए कितने उतावले है। 2002 में अमेरिकी अधिकारियों ने न्यूयॉर्क के जॉन एफ केनेडी हवाई अड्डे से एक टेलीकॉम इंजीनियर माहेर अरार को अल-कायदा से संबंधों के आरोप में गिरफ्तार किया और उसे उसके घर कनाडा की बजाय सीरिया भेज दिया(अरार का जन्म सीरिया में हुआ था और वो कनाडियाई नागरिक है)। सीरिया में उन्हें कठोर यातनाएं दी गई। बाद में अरार को कनाडियन सरकार से मुआवज़े के रूप में एक करोड़ डॉलर की रकम मिली क्योंकि कनाडा के अधिकारियों ने अमेरिका को इस मामले में सही जानकारियां नहीं दी थीं। अरार ने अब अमेरिकी सरकार के खिलाफ दावा किया है जो कि उसे लगातार वांछितों की सूची में रखे हुए है।
अधिकारियों के इस तरह के अति उत्साह और उससे जाने-अनजाने में हुई गलतियों के पीड़ितों की सूची में भारतीय डॉक्टर मोहम्मद हनीफ भी शामिल है जिसे साल भर पहले ऑस्ट्रेलिया में गिरफ्तार किया गया था। इसकी वजह थी उसके कुछ रिश्तेदारों द्वारा इंग्लैंड में एक असफल आत्मघाती हमला। डॉ. हनीफ के खिलाफ आरोप की वजह बना था उनका वो सिम कार्ड जो धमाकों के एक संदिग्ध के पास से बरामद हुआ था और हनीफ द्वारा बुक करवाया गया भारत की यात्रा का एक तरफ का टिकट। उसके पास हर बात का सही जवाब था लेकिन पूर्व ऑस्ट्रेलियन प्रधानमंत्री जॉन हावर्ड के प्रशासन के राजनेता ये दिखाने के लिए बहुत उत्सुक थे कि अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद से निपटने में उनकी भूमिका सबसे बड़ी है। इसकी परिणति निर्दोष डॉक्टर के खिलाफ अदालती कार्रवाई के रूप में हुई।
आंकड़ो ने ऑस्ट्रेलियाई राजनेताओं के बारे में चौंकाने वाले तथ्यों को उजागर कर दिया। ऑस्ट्रेलियाई प्रशासन द्वारा अपने सैनिकों की विदेश में तैनाती के खिलाफ देश में लगातार बढ़ रहे विरोध को खत्म करने और इसके लिए समर्थन हासिल करने के लिए हताशा में ये चाल चली गई थी।
हावर्ड की हार के बाद अधिकारियों ने सूचना के अधिकार के तहत किए गए आवेदन पर हनीफ मामले से जुड़े आंकड़ों का जखीरा जारी किया। इन आंकड़ो ने ऑस्ट्रेलियाई राजनेताओं के बारे में चौंकाने वाले तथ्यों को उजागर कर दिया। ऑस्ट्रेलियाई प्रशासन द्वारा अपने सैनिकों की विदेश में तैनाती के खिलाफ देश में लगातार बढ़ रहे विरोध को खत्म करने और इसके लिए समर्थन हासिल करने के लिए हताशा में ये चाल चली गई थी। सरकारी अधिकारियों ने अभियोजन और नौकरशाहों पर कानून के साथ खिलवाड़ करने के लिए दबाव डाला। मंशा ये थी कि यदि वो डॉ. हनीफ के ऊपर आतंकवाद के आरोप साबित कर देंगे तो इससे हॉवर्ड की आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में मज़बूती साबित होगी जिसका फायदा उन्हें आगामी चुनावों में हो सकता था।
डॉ. हनीफ को ब्रिस्बेन हवाई अड्डे पर 2 जुलाई 2007 को गिरफ्तार किया गया था। ऑस्ट्रेलियाई क़ानूनों के तहत अगर ऑस्ट्रेलियाई फेडरल पुलिस (एएफपी) किसी को जेल में रखने के पर्याप्त कारण न दिखा सके तो 72 घंटे के बाद उसे रिहा करना पड़ता है। जज को संतुष्ट कर सकने वाले पुख्ता प्रमाणों के अभाव में एएफपी ने प्रिवेंटिव डिटेंशन ऑर्डर (पीडीओ) की संभावना तलाशी। हावर्ड प्रशासन द्वारा पारित किए गए आतंकवाद विरोधी कानूनों ने इसे संभव बनाया मगर ये कानून काफी विवादित हैं और मानवाधिकारवादियों ने इसका जमकर विरोध किया था। पीडीओ के तहत किसी व्यक्ति को भी हिरासत में लिया जा सकता है भले ही उसके खिलाफ कोई मामला दर्ज न हो।
जारी कागज़ातों, जो अब इंटरनेट पर भी मौजूद हैं, से साफ पता चलता है कि एएफपी को 3 जुलाई को ही पता चल गया था कि उसे किसी तरह के सबूतों और सबूतों की सुरक्षा के लिए हनीफ को गिरफ्तार करने की कोई आवश्यकता नहीं है। मगर एक सप्ताह बाद भी डॉ. हनीफ सलाखों के पीछे थे।
11 जुलाई को एक फेडरल पुलिस अधिकारी ने दावा किया कि डॉ. हनीफ को अभी भी नज़रबंद रखने की जरूरत है क्योंकि ये सबूतों को सुरक्षित रखने, हासिल करने और जांच पूरी करने के लिए जरूरी है। 14 जुलाई को एक दूसरे अधिकारी ने दावा किया कि अगर हनीफ को आजा़द कर दिया गया तो वो खुद को अपराधी साबित कर सकने वाले प्रमाणों को नष्ट कर देगा, जिसे पुलिस अभी तक नहीं हासिल कर पायी है। कुछ दिनों के भीतर ही ऑस्ट्रेलिया के तत्कालीन अप्रवासी मामलों के मंत्री केविन एंड्र्यूज़ ने पुलिस द्वारा उपलब्ध करवाई गई जानकारियों का "बारीक विश्लेषण" कर हनीफ का वीसा रद्द कर दिया। ताज़ा जारी हुए दस्तावेजों से साफ हुआ है कि पुलिस ने उस वक्त हनीफ का वीसा रद्द करने की कोई राय ही नहीं दी थी।
हनीफ के खिलाफ लगातार कमज़ोर पड़ते जा रहे मामले के बाद न्यायपालिका ने उन्हें छोड़ने का हुक्म दे दिया जिससे सरकार की खासी किरकिरी हुई--डॉ. हनीफ का सिमकार्ड ग्लासगो की बजाय लिवरपूल में मिला था और वो वन-वे टिकट पर भारत अपने नवजात बच्चे को देखने के लिए आ रहा था। सीधी-साधी सफाई अक्सर सबसे सही तरीका होता है, लेकिन उन लोगों के लिए नहीं जो षडयंत्र खोजने पर ही तुले हों।
अति तो तब हो गई जब एएफपी ने डॉ. हनीफ के मामले की जांच में 600 अधिकारियों को तैनात कर दिया। सरकार को इसमें 75 लाख डॉलर की चपत लगी। उन्होंने 300 गवाहों के बयान लिए, 349 नमूने इकट्ठे किए। इस अभियान में 249 संघीय अधिकारी शामिल थे, 22 जांच वारंट जारी किए गए, टेलीफोन कॉल्स टेप की गई, इलेक्ट्रॉनिक निगरानी मशीनें स्थापित की गई और साथ ही सैंकड़ो गीगाबाइट आंकड़े कंप्यूटर पर इकट्ठा किए गए। ऑस्ट्रेलिया की खुफिया सेवा से लेकर तमाम शीर्षस्थ विभाग इस काम में लगे रहे।
एएफपी ने डॉ. हनीफ के मामले की जांच में 600 अधिकारियों को तैनात कर दिया। सरकार को इसमें 75 लाख डॉलर की चपत लगी। उन्होंने 300 गवाहों के बयान लिए, 349 नमूने इकट्ठे किए।
इसके बावजूद अधिकारियों के हाथ, हनीफ को सूली पर टांगने का कोई सबूत नहीं लग सका। उनका वीसा निरस्त किए जाने के पीछे भी एक कुटिल सोच छिपी थी- ये प्रशासन को उसे अवैध प्रवास के लिए हिरासत में लेने की छूट दे देता। (2002 में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार संगठन के उच्चायुक्त की तरफ से जस्टिस भगवती को ऑस्ट्रेलिया के बंदीगृहों की जांच के लिए नियुक्त किया गया था और उन्होंने इन्हें अपमानजनक और अमानवीय करार दिया था।)
किस चीज़ ने हावर्ड प्रशासन को इस तरह से बर्ताव करने के लिए प्रेरित किया? उन्हें कठिन चुनावों का सामना करना था (इसमें उन्हें बुरी तरह मात खानी पड़ी) और अगर एक भारतीय मुस्लिम डॉक्टर को जेल में रख कर चुनाव जीता जा सकता है तो फिर इसमें बुराई ही क्या है? वैसे भी हावर्ड सालों से बुश समर्थक रहे हैं तो उनका कुछ तो असर उन पर होगा ही। 11 सितंबर 2001 को वो वाशिंगटन में थे और जॉर्ज बुश के साथ आतंकवाद से टक्कर लेने की खबरों में जगह पा गए जिसने एकाएक ही उन्हें आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष में अमेरिका का एक मुख्य समर्थक बना दिया था। अपने प्रधानमंत्रित्वकाल में हावर्ड, बुश प्रशासन के विदेशों में सैनिक अभियानों के पक्ष में सिर्फ दृढ़ता से खड़े ही नहीं रहे बल्कि पर्यावरण से जुड़े जलवायु परिवर्तन, क्योटो प्रोटोकॉल जैसे मुद्दों पर भी बुश प्रशासन की नीतियों के अंध समर्थक बने रहे।
उनको अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों से भी कोई खास लगाव नहीं रहा है। न्यूयॉर्क और वाशिंगटन में हमलों से पहले भी हॉवर्ड इन्हें तोड़ने मरोडने की कोशिशें करते रहे हैं। 2001 में नार्वे के एक जहाज जिसका नाम ताम्पा था, ने एक इंडोनेशियन नौका मिली जिसमें 400 अफगानी शरणार्थी सवार थे। ये घटना ऑस्ट्रेलियाई तट के पास की थी। अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के तहत ऑस्ट्रेलिया इन शरणार्थियों के लिए जिम्मेदार था। लेकिन हॉवर्ड ने उन्हें प्रवेश करने से ही रोक दिया। नॉर्वे के अधिकारियों के दबाव के बावजूद उन्होंने ऐसा किया।
ऑस्ट्रेलिया औसतन साल भर में 10,000 शरणार्थियों को शरण देता है, लेकिन कुछ नेताओं को ये बात पसंद नहीं है। वन नेशन पार्टी की नेता पॉलिन हैन्सन का कहना है कि अप्रवास से जुड़े मुद्दों पर ऑस्ट्रेलिया का रुख लंबे समय से बहुत नर्म रहा है। पूर्व में फिश-एंड-चिप्स की दुकान चलाने वाली हैन्सन को 1990 में उस समय कुख्याति मिली जब उन्होंने एशिया से आने वाले विस्थापितों के खिलाफ एक अभियान छेड़ा। हालांकि वो अपने अभियान में असफल रहीं लेकिन दक्षिण पूर्व एशिया के चतुर नेताओं ने उनके कथनों का उपयोग ऑस्ट्रेलिया को एक नस्लवादी देश साबित करने के लिए किया।
केविन रूड ने देश की कमान संभालने के बाद इसमें बदलाव का वादा किया था। लेकिन हनीफ के मामले में शर्मिंदगी उठाने के बाद भी फेडरल पुलिस का अभी भी यही मानना है कि इस तरह के मामलों से निपटने के लिए उन्हें किसी बुनियादी बदलाव की कोई जरूरत नहीं है। शुरुआती संकेत भी उत्साहजनक नहीं है- रूड की लेबर पार्टी ने इलेक्शन से ठीक पहले कहा था कि वह हनीफ मामले की दुबारा से जांच कराएगी। लेकिन अब अटॉर्नी जनरल ने हनीफ को किसी भी तरह का मुआवजा दिए जाने से इनकार किया है।
हनीफ के पीछे पड़ने की वजह बिल्कुल साफ थीं- किसी को फंसाओं, उसके खिलाफ केस बनाओ फिर सबूतों का ढेर लगाकर ऐसा माहौल तैयार करो जिससे राज्य की निगरानी, नज़रबंदी, पूछताछ और धमकाने की ताकतों में बढ़ोत्तरी संभव हो सके। लेकिन भारत इस मामले में खुद कुछ भी कैसे कह सकता है जब इसका अपना रिकॉर्ड भी कुछ अलग नहीं है। बिनायक सेन का उदाहरण हम सबके सामने ही है।
www.tehelkahindi.com से साभार
आतंकवाद के खिलाफ विश्व स्तर पर जारी जंग में निर्दोषों को प्रताड़ित करने के कई खौफनाक उदाहरण देखने को मिले हैं। इन घटनाओं से साबित हुआ है कि कई देशों के अधिकारी आतंकवाद के खिलाफ जंग में अपनी उपयोगिता साबित करने के लिए कितने उतावले है। 2002 में अमेरिकी अधिकारियों ने न्यूयॉर्क के जॉन एफ केनेडी हवाई अड्डे से एक टेलीकॉम इंजीनियर माहेर अरार को अल-कायदा से संबंधों के आरोप में गिरफ्तार किया और उसे उसके घर कनाडा की बजाय सीरिया भेज दिया(अरार का जन्म सीरिया में हुआ था और वो कनाडियाई नागरिक है)। सीरिया में उन्हें कठोर यातनाएं दी गई। बाद में अरार को कनाडियन सरकार से मुआवज़े के रूप में एक करोड़ डॉलर की रकम मिली क्योंकि कनाडा के अधिकारियों ने अमेरिका को इस मामले में सही जानकारियां नहीं दी थीं। अरार ने अब अमेरिकी सरकार के खिलाफ दावा किया है जो कि उसे लगातार वांछितों की सूची में रखे हुए है।
अधिकारियों के इस तरह के अति उत्साह और उससे जाने-अनजाने में हुई गलतियों के पीड़ितों की सूची में भारतीय डॉक्टर मोहम्मद हनीफ भी शामिल है जिसे साल भर पहले ऑस्ट्रेलिया में गिरफ्तार किया गया था। इसकी वजह थी उसके कुछ रिश्तेदारों द्वारा इंग्लैंड में एक असफल आत्मघाती हमला। डॉ. हनीफ के खिलाफ आरोप की वजह बना था उनका वो सिम कार्ड जो धमाकों के एक संदिग्ध के पास से बरामद हुआ था और हनीफ द्वारा बुक करवाया गया भारत की यात्रा का एक तरफ का टिकट। उसके पास हर बात का सही जवाब था लेकिन पूर्व ऑस्ट्रेलियन प्रधानमंत्री जॉन हावर्ड के प्रशासन के राजनेता ये दिखाने के लिए बहुत उत्सुक थे कि अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद से निपटने में उनकी भूमिका सबसे बड़ी है। इसकी परिणति निर्दोष डॉक्टर के खिलाफ अदालती कार्रवाई के रूप में हुई।
आंकड़ो ने ऑस्ट्रेलियाई राजनेताओं के बारे में चौंकाने वाले तथ्यों को उजागर कर दिया। ऑस्ट्रेलियाई प्रशासन द्वारा अपने सैनिकों की विदेश में तैनाती के खिलाफ देश में लगातार बढ़ रहे विरोध को खत्म करने और इसके लिए समर्थन हासिल करने के लिए हताशा में ये चाल चली गई थी।
हावर्ड की हार के बाद अधिकारियों ने सूचना के अधिकार के तहत किए गए आवेदन पर हनीफ मामले से जुड़े आंकड़ों का जखीरा जारी किया। इन आंकड़ो ने ऑस्ट्रेलियाई राजनेताओं के बारे में चौंकाने वाले तथ्यों को उजागर कर दिया। ऑस्ट्रेलियाई प्रशासन द्वारा अपने सैनिकों की विदेश में तैनाती के खिलाफ देश में लगातार बढ़ रहे विरोध को खत्म करने और इसके लिए समर्थन हासिल करने के लिए हताशा में ये चाल चली गई थी। सरकारी अधिकारियों ने अभियोजन और नौकरशाहों पर कानून के साथ खिलवाड़ करने के लिए दबाव डाला। मंशा ये थी कि यदि वो डॉ. हनीफ के ऊपर आतंकवाद के आरोप साबित कर देंगे तो इससे हॉवर्ड की आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में मज़बूती साबित होगी जिसका फायदा उन्हें आगामी चुनावों में हो सकता था।
डॉ. हनीफ को ब्रिस्बेन हवाई अड्डे पर 2 जुलाई 2007 को गिरफ्तार किया गया था। ऑस्ट्रेलियाई क़ानूनों के तहत अगर ऑस्ट्रेलियाई फेडरल पुलिस (एएफपी) किसी को जेल में रखने के पर्याप्त कारण न दिखा सके तो 72 घंटे के बाद उसे रिहा करना पड़ता है। जज को संतुष्ट कर सकने वाले पुख्ता प्रमाणों के अभाव में एएफपी ने प्रिवेंटिव डिटेंशन ऑर्डर (पीडीओ) की संभावना तलाशी। हावर्ड प्रशासन द्वारा पारित किए गए आतंकवाद विरोधी कानूनों ने इसे संभव बनाया मगर ये कानून काफी विवादित हैं और मानवाधिकारवादियों ने इसका जमकर विरोध किया था। पीडीओ के तहत किसी व्यक्ति को भी हिरासत में लिया जा सकता है भले ही उसके खिलाफ कोई मामला दर्ज न हो।
जारी कागज़ातों, जो अब इंटरनेट पर भी मौजूद हैं, से साफ पता चलता है कि एएफपी को 3 जुलाई को ही पता चल गया था कि उसे किसी तरह के सबूतों और सबूतों की सुरक्षा के लिए हनीफ को गिरफ्तार करने की कोई आवश्यकता नहीं है। मगर एक सप्ताह बाद भी डॉ. हनीफ सलाखों के पीछे थे।
11 जुलाई को एक फेडरल पुलिस अधिकारी ने दावा किया कि डॉ. हनीफ को अभी भी नज़रबंद रखने की जरूरत है क्योंकि ये सबूतों को सुरक्षित रखने, हासिल करने और जांच पूरी करने के लिए जरूरी है। 14 जुलाई को एक दूसरे अधिकारी ने दावा किया कि अगर हनीफ को आजा़द कर दिया गया तो वो खुद को अपराधी साबित कर सकने वाले प्रमाणों को नष्ट कर देगा, जिसे पुलिस अभी तक नहीं हासिल कर पायी है। कुछ दिनों के भीतर ही ऑस्ट्रेलिया के तत्कालीन अप्रवासी मामलों के मंत्री केविन एंड्र्यूज़ ने पुलिस द्वारा उपलब्ध करवाई गई जानकारियों का "बारीक विश्लेषण" कर हनीफ का वीसा रद्द कर दिया। ताज़ा जारी हुए दस्तावेजों से साफ हुआ है कि पुलिस ने उस वक्त हनीफ का वीसा रद्द करने की कोई राय ही नहीं दी थी।
हनीफ के खिलाफ लगातार कमज़ोर पड़ते जा रहे मामले के बाद न्यायपालिका ने उन्हें छोड़ने का हुक्म दे दिया जिससे सरकार की खासी किरकिरी हुई--डॉ. हनीफ का सिमकार्ड ग्लासगो की बजाय लिवरपूल में मिला था और वो वन-वे टिकट पर भारत अपने नवजात बच्चे को देखने के लिए आ रहा था। सीधी-साधी सफाई अक्सर सबसे सही तरीका होता है, लेकिन उन लोगों के लिए नहीं जो षडयंत्र खोजने पर ही तुले हों।
अति तो तब हो गई जब एएफपी ने डॉ. हनीफ के मामले की जांच में 600 अधिकारियों को तैनात कर दिया। सरकार को इसमें 75 लाख डॉलर की चपत लगी। उन्होंने 300 गवाहों के बयान लिए, 349 नमूने इकट्ठे किए। इस अभियान में 249 संघीय अधिकारी शामिल थे, 22 जांच वारंट जारी किए गए, टेलीफोन कॉल्स टेप की गई, इलेक्ट्रॉनिक निगरानी मशीनें स्थापित की गई और साथ ही सैंकड़ो गीगाबाइट आंकड़े कंप्यूटर पर इकट्ठा किए गए। ऑस्ट्रेलिया की खुफिया सेवा से लेकर तमाम शीर्षस्थ विभाग इस काम में लगे रहे।
एएफपी ने डॉ. हनीफ के मामले की जांच में 600 अधिकारियों को तैनात कर दिया। सरकार को इसमें 75 लाख डॉलर की चपत लगी। उन्होंने 300 गवाहों के बयान लिए, 349 नमूने इकट्ठे किए।
इसके बावजूद अधिकारियों के हाथ, हनीफ को सूली पर टांगने का कोई सबूत नहीं लग सका। उनका वीसा निरस्त किए जाने के पीछे भी एक कुटिल सोच छिपी थी- ये प्रशासन को उसे अवैध प्रवास के लिए हिरासत में लेने की छूट दे देता। (2002 में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार संगठन के उच्चायुक्त की तरफ से जस्टिस भगवती को ऑस्ट्रेलिया के बंदीगृहों की जांच के लिए नियुक्त किया गया था और उन्होंने इन्हें अपमानजनक और अमानवीय करार दिया था।)
किस चीज़ ने हावर्ड प्रशासन को इस तरह से बर्ताव करने के लिए प्रेरित किया? उन्हें कठिन चुनावों का सामना करना था (इसमें उन्हें बुरी तरह मात खानी पड़ी) और अगर एक भारतीय मुस्लिम डॉक्टर को जेल में रख कर चुनाव जीता जा सकता है तो फिर इसमें बुराई ही क्या है? वैसे भी हावर्ड सालों से बुश समर्थक रहे हैं तो उनका कुछ तो असर उन पर होगा ही। 11 सितंबर 2001 को वो वाशिंगटन में थे और जॉर्ज बुश के साथ आतंकवाद से टक्कर लेने की खबरों में जगह पा गए जिसने एकाएक ही उन्हें आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष में अमेरिका का एक मुख्य समर्थक बना दिया था। अपने प्रधानमंत्रित्वकाल में हावर्ड, बुश प्रशासन के विदेशों में सैनिक अभियानों के पक्ष में सिर्फ दृढ़ता से खड़े ही नहीं रहे बल्कि पर्यावरण से जुड़े जलवायु परिवर्तन, क्योटो प्रोटोकॉल जैसे मुद्दों पर भी बुश प्रशासन की नीतियों के अंध समर्थक बने रहे।
उनको अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों से भी कोई खास लगाव नहीं रहा है। न्यूयॉर्क और वाशिंगटन में हमलों से पहले भी हॉवर्ड इन्हें तोड़ने मरोडने की कोशिशें करते रहे हैं। 2001 में नार्वे के एक जहाज जिसका नाम ताम्पा था, ने एक इंडोनेशियन नौका मिली जिसमें 400 अफगानी शरणार्थी सवार थे। ये घटना ऑस्ट्रेलियाई तट के पास की थी। अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के तहत ऑस्ट्रेलिया इन शरणार्थियों के लिए जिम्मेदार था। लेकिन हॉवर्ड ने उन्हें प्रवेश करने से ही रोक दिया। नॉर्वे के अधिकारियों के दबाव के बावजूद उन्होंने ऐसा किया।
ऑस्ट्रेलिया औसतन साल भर में 10,000 शरणार्थियों को शरण देता है, लेकिन कुछ नेताओं को ये बात पसंद नहीं है। वन नेशन पार्टी की नेता पॉलिन हैन्सन का कहना है कि अप्रवास से जुड़े मुद्दों पर ऑस्ट्रेलिया का रुख लंबे समय से बहुत नर्म रहा है। पूर्व में फिश-एंड-चिप्स की दुकान चलाने वाली हैन्सन को 1990 में उस समय कुख्याति मिली जब उन्होंने एशिया से आने वाले विस्थापितों के खिलाफ एक अभियान छेड़ा। हालांकि वो अपने अभियान में असफल रहीं लेकिन दक्षिण पूर्व एशिया के चतुर नेताओं ने उनके कथनों का उपयोग ऑस्ट्रेलिया को एक नस्लवादी देश साबित करने के लिए किया।
केविन रूड ने देश की कमान संभालने के बाद इसमें बदलाव का वादा किया था। लेकिन हनीफ के मामले में शर्मिंदगी उठाने के बाद भी फेडरल पुलिस का अभी भी यही मानना है कि इस तरह के मामलों से निपटने के लिए उन्हें किसी बुनियादी बदलाव की कोई जरूरत नहीं है। शुरुआती संकेत भी उत्साहजनक नहीं है- रूड की लेबर पार्टी ने इलेक्शन से ठीक पहले कहा था कि वह हनीफ मामले की दुबारा से जांच कराएगी। लेकिन अब अटॉर्नी जनरल ने हनीफ को किसी भी तरह का मुआवजा दिए जाने से इनकार किया है।
हनीफ के पीछे पड़ने की वजह बिल्कुल साफ थीं- किसी को फंसाओं, उसके खिलाफ केस बनाओ फिर सबूतों का ढेर लगाकर ऐसा माहौल तैयार करो जिससे राज्य की निगरानी, नज़रबंदी, पूछताछ और धमकाने की ताकतों में बढ़ोत्तरी संभव हो सके। लेकिन भारत इस मामले में खुद कुछ भी कैसे कह सकता है जब इसका अपना रिकॉर्ड भी कुछ अलग नहीं है। बिनायक सेन का उदाहरण हम सबके सामने ही है।
www.tehelkahindi.com से साभार
Wednesday, June 11, 2008
विश्लेषण : साम्प्रदायिक हमलों के नए पहलू
अनिल चमड़िया
सत्ता से न्याय के लिए न्यायाधीश होसबेट सुरेश, न्यायाधीश कोलसे पाटिल, गुजरात में हाल तक पुलिस प्रमुख रहे आर। बी. श्रीकुमार, पत्रकार जॉन दयाल एवं तिस्ता सितलवाड़ 13 से 17 मई तक उड़ीसा के कंधमाल में लोगों की आपबीती सुनते रहे जिन्हें दिसंबर के आखिरी हफ्ते में कई दिनों तक लगातार मारा-पीटा गया, लूटा गया। उनके घर-द्वार उजाड़े गए। भारतीय लोकतंत्र के सामने एक बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि क्या देश में अल्पसंख्यकों को सत्ता प्रतिष्ठानों द्वारा न्याय नहीं मिल सकेगा और जिनके खिलाफ उन पर हमले के आरोप हैं क्या उन्हें सजा नहीं मिल सकेगी? पिछले साठ वषा में ऐसे हमलों की फेहरिस्त लगातार लंबी होती जा रही है। पहले चरण में यह देखा गया कि अल्पसंख्यकों के न्याय के लिए लोगों ने सत्ता की न्यायिक व्यवस्था से उम्मीदें बांधे रखीं। प्रशासन पर भरोसा किया। लेकिन जब प्रशासन और न्यायपालिका से उम्मीदें लगातार कम होती चली गई तो अल्पसंख्यकों के खिलाफ हमले की जांच और न्याय के लिए स्वतंत्र समितियां बनने लगी। इधर हाल के दौर में तो लगभग ऐसी हर घटना के बाद स्वतंत्र समितियों की जांच होती है। कारण स्पष्ट है कि ऐसी घटनाओं में प्रशासन की संलिप्तता आम होती जा रही है। न्यायपालिका की भूमिका न्यायिक दायरे से बाहर निकलती प्रतीत होती है।साम्प्रदायिक हमलों के संदर्भ में गुजरात के मुसलमान और उड़ीसा के ईसाइयों में एक जैसी स्थिति है। गुजरात में हिन्दुत्ववादियों ने मुसलमानों के खिलाफ अपनी प्रयोगशाला बनाई तो उडीसा में ईसाइयों के खिलाफ यह प्रयोगशाला बनी हुई है। 22 जनवरी 1999 को ग्राहम स्टुअर्स और उनके बच्चों को जिदा जलाया गया। देश में सर्वाधिक आदिवासी आबादी वाले इस राज्य में ईसाई बने आदिवासियों के साथ जिस नृशंसता से साम्प्रदायिक गुंडे पेश आए हैं वह भी कम दिल दहला देने वाला नहीं है। मंजूक्ता कांदी और ऐसी दर्जनों महिलाएं मिल जाएंगी जिनके जबरन बाल काटे गए और उन्हें ईसाई के बदले हिन्दू धर्म अपनाने के लिए बाध्य किया गया। यह सिलसिला आगे बढ़ता गया। 24 दिसंबर 2007 से लगातार कई दिनों तक कंधमाल में ईसाइयों पर न तो हमलों को रोका गया और न ही अब तक पीडितों को न्याय मिल सका है। यह एक स्थिति बनी हुई है कि अल्पसंख्यकों के खिलाफ हमले की तैयारी की जानकारी सरकार को दी जाती है लेकिन हमले रूक नहीं पाते हैं। हमले इस तरह से होते हैं जैसे लगता है कि उसे सरकारी मशीनरी का समर्थन हासिल है। इसीलिए हमले जल्दी खत्म नहीं होते हैं। कंधमाल में यही हुआ था। आर्श्चजनक है कि इतने महीनों के बाद भी पीडितों के पास उनके लिए जरूरी सामान अब तक नहीं पहुंच पाया है। न्यायाधीश कोलसे पाटिल ने ट्रिब्यूनल की तरफ से बताया कि गिरजा घर, हॉस्टल और अस्पताल जैसे बर्बाद किए गए थे, वे अब भी वैसे ही हैं। सैकड़ों के पास मकान नहीं है। वे कैंपों में रह रहे हैं या फिर अपने रिश्तेदारों के यहां शरण ले रखी है। उनका मानना है कि यदि पन्द्रह दिनों के अंदर यहां कोई सहायता नहीं पहुंची तो मानसून के दौरान कुछ भी पहुंचाना संभव नहीं होगा। कंधमाल में प्रशासन खुद यह मान रहा है कि बाराखामा में ही केवल दो सौ मकान बनाए जाने की जरूरत है। और सबसे पहले उसने छतों के लिए एस्बेस्ट्स की खरीदकारी की प्रक्रिया शुरू की है।प्रशासन और सरकार द्वारा हमलों के बाद पीडितों के पक्ष में मदद का फैसला तो राजनीतिक होता है। लेकिन न्यायालय ने पीडितों को मदद पहुंचाने से ईसाई संगठनों को क्यों रोका? पहले 11 जनवरी 2008 को कंधमाल के कलक्टर ने ईसाई संगठनों को पीडितों की मदद करने से रोका। कलक्टर के इस आदेश के खिलाफ जब कटक स्थित उच्च न्यायालय में गुहार लगायी गई तो वहां से भी कहा गया कि कलक्टर ने ठीक किया है। बाद में यह मामला दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उस पर घटना के लगभग तीन महीने के बाद सुनवाई हो सकी और कलक्टर के आदेश को उचित नहीं माना गया। ईसाइयों के संगठनों को ईसाइयों के बीच ही मदद से नहीं रोका गया बल्कि जब उड़ीसा में चक्रवात आया था तब भी ईसाई संगठनों को मदद करने से रोका गया। कहा गया कि वे सहायता की आड़ में धर्म परिवर्तन कराते हैं। लेकिन ये बात हिन्दुत्ववादी संगठनों पर लागू नहीं होती है। एक पहलू न्यायाधीश कोलसे बताते हैं। उडीसा में ये जो समस्या है वह केवल धर्म से नहीं जुड़ी है। यह र्आिथक क्रियाकलापों से ज्यादा जुड़ी है। जो समुदाय संसाधनों और सम्पदा के मामले में अमीर हंै उसका तरह-तरह से दोहन किया जाता है। हर छह महीने और साल भर में दंगे या हमले की वजह यहां आदिवासियों के पास अपार प्राकृतिक संपदा का होना है। दूसरे पहलू को तिस्ता बताती हैं। इस ट्रिब्यूनल के सामने कई महिलाएं पेश हुई। उनके अनुसार उडीसा में 1970 से पहले वे पूरी तरह से आजाद थी। अपनी परंपराएं थी। अपनी संस्कृति थी और उसमें भरपूर आजादी का अहसास था। लेकिन र्धािमक, राजनीतिक और उघोग धंधों में लगी ताकतों ने उनकी खुशियों को धीरे-धीरे खत्म कर दिया। तीसरा पहलू यह है कि इस इलाके में मिलजुल कर रहने और शांति बनाए रखने की क्षमता है। 1994 में विभिा आदिवासी जातियों की महिलाओं के नेतृत्व में ये देखा भी गया। लेकिन सरकार और उसकी मशीनरी अब इसमें जरा भी ध्यान देने को तैयार नहीं। हिन्दुत्ववादियों की संस्कृति को बढ़ने का पूरा मौका दिया जाता है। अब सवाल है कि हमलों के खिलाफ न्याय पाने के लिए अल्पसंख्यक क्या करें? राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग जैसी संस्थाओं को हाशिये पर लाकर खड़ा कर दिया गया है। उड़ीसा में हुए हमले की रिपोर्ट तैयार की गई लेकिन राज्य और केन्द्र में बंटी सरकारों ने कुछ नहीं किया। अपने समाज में कई स्तरों पर अंर्तिवरोधी और विरोधाभासी स्थिति देखी जाती है। जैसे धर्म निरपेक्षता की राजनीति करने वाले हिन्दुत्व की दो छाया तैयार कर लेते हैं। एक को कर बता देते हंै और दूसरे को नरम। लेकिन जब सवर्णवाद पर बात होती है तो उसमें नरम और कर दो छाया नहीं दिखती हंै। इसी तरह वामपंथियों और समाजवादियों से पूछें कि उनकी सक्रियता वाले राज्यों में जातिवाद की क्या भूमिका है तो वे अपने राज्यों को बिल्कुल भिा बताते हैं। प. बंगाल के बारे में वामपंथी कहते हंै तो उड़ीसा के बारे में रवि राय जैसे समाजवादी भी यही कहते रहे हैं। लेकिन सच यह है कि वहां जातिवाद पर जब चोट की जाती है तो साम्प्रदायिकता का घाव निकल आता है।
www.rashtriyasahara.com से साभार
सत्ता से न्याय के लिए न्यायाधीश होसबेट सुरेश, न्यायाधीश कोलसे पाटिल, गुजरात में हाल तक पुलिस प्रमुख रहे आर। बी. श्रीकुमार, पत्रकार जॉन दयाल एवं तिस्ता सितलवाड़ 13 से 17 मई तक उड़ीसा के कंधमाल में लोगों की आपबीती सुनते रहे जिन्हें दिसंबर के आखिरी हफ्ते में कई दिनों तक लगातार मारा-पीटा गया, लूटा गया। उनके घर-द्वार उजाड़े गए। भारतीय लोकतंत्र के सामने एक बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि क्या देश में अल्पसंख्यकों को सत्ता प्रतिष्ठानों द्वारा न्याय नहीं मिल सकेगा और जिनके खिलाफ उन पर हमले के आरोप हैं क्या उन्हें सजा नहीं मिल सकेगी? पिछले साठ वषा में ऐसे हमलों की फेहरिस्त लगातार लंबी होती जा रही है। पहले चरण में यह देखा गया कि अल्पसंख्यकों के न्याय के लिए लोगों ने सत्ता की न्यायिक व्यवस्था से उम्मीदें बांधे रखीं। प्रशासन पर भरोसा किया। लेकिन जब प्रशासन और न्यायपालिका से उम्मीदें लगातार कम होती चली गई तो अल्पसंख्यकों के खिलाफ हमले की जांच और न्याय के लिए स्वतंत्र समितियां बनने लगी। इधर हाल के दौर में तो लगभग ऐसी हर घटना के बाद स्वतंत्र समितियों की जांच होती है। कारण स्पष्ट है कि ऐसी घटनाओं में प्रशासन की संलिप्तता आम होती जा रही है। न्यायपालिका की भूमिका न्यायिक दायरे से बाहर निकलती प्रतीत होती है।साम्प्रदायिक हमलों के संदर्भ में गुजरात के मुसलमान और उड़ीसा के ईसाइयों में एक जैसी स्थिति है। गुजरात में हिन्दुत्ववादियों ने मुसलमानों के खिलाफ अपनी प्रयोगशाला बनाई तो उडीसा में ईसाइयों के खिलाफ यह प्रयोगशाला बनी हुई है। 22 जनवरी 1999 को ग्राहम स्टुअर्स और उनके बच्चों को जिदा जलाया गया। देश में सर्वाधिक आदिवासी आबादी वाले इस राज्य में ईसाई बने आदिवासियों के साथ जिस नृशंसता से साम्प्रदायिक गुंडे पेश आए हैं वह भी कम दिल दहला देने वाला नहीं है। मंजूक्ता कांदी और ऐसी दर्जनों महिलाएं मिल जाएंगी जिनके जबरन बाल काटे गए और उन्हें ईसाई के बदले हिन्दू धर्म अपनाने के लिए बाध्य किया गया। यह सिलसिला आगे बढ़ता गया। 24 दिसंबर 2007 से लगातार कई दिनों तक कंधमाल में ईसाइयों पर न तो हमलों को रोका गया और न ही अब तक पीडितों को न्याय मिल सका है। यह एक स्थिति बनी हुई है कि अल्पसंख्यकों के खिलाफ हमले की तैयारी की जानकारी सरकार को दी जाती है लेकिन हमले रूक नहीं पाते हैं। हमले इस तरह से होते हैं जैसे लगता है कि उसे सरकारी मशीनरी का समर्थन हासिल है। इसीलिए हमले जल्दी खत्म नहीं होते हैं। कंधमाल में यही हुआ था। आर्श्चजनक है कि इतने महीनों के बाद भी पीडितों के पास उनके लिए जरूरी सामान अब तक नहीं पहुंच पाया है। न्यायाधीश कोलसे पाटिल ने ट्रिब्यूनल की तरफ से बताया कि गिरजा घर, हॉस्टल और अस्पताल जैसे बर्बाद किए गए थे, वे अब भी वैसे ही हैं। सैकड़ों के पास मकान नहीं है। वे कैंपों में रह रहे हैं या फिर अपने रिश्तेदारों के यहां शरण ले रखी है। उनका मानना है कि यदि पन्द्रह दिनों के अंदर यहां कोई सहायता नहीं पहुंची तो मानसून के दौरान कुछ भी पहुंचाना संभव नहीं होगा। कंधमाल में प्रशासन खुद यह मान रहा है कि बाराखामा में ही केवल दो सौ मकान बनाए जाने की जरूरत है। और सबसे पहले उसने छतों के लिए एस्बेस्ट्स की खरीदकारी की प्रक्रिया शुरू की है।प्रशासन और सरकार द्वारा हमलों के बाद पीडितों के पक्ष में मदद का फैसला तो राजनीतिक होता है। लेकिन न्यायालय ने पीडितों को मदद पहुंचाने से ईसाई संगठनों को क्यों रोका? पहले 11 जनवरी 2008 को कंधमाल के कलक्टर ने ईसाई संगठनों को पीडितों की मदद करने से रोका। कलक्टर के इस आदेश के खिलाफ जब कटक स्थित उच्च न्यायालय में गुहार लगायी गई तो वहां से भी कहा गया कि कलक्टर ने ठीक किया है। बाद में यह मामला दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उस पर घटना के लगभग तीन महीने के बाद सुनवाई हो सकी और कलक्टर के आदेश को उचित नहीं माना गया। ईसाइयों के संगठनों को ईसाइयों के बीच ही मदद से नहीं रोका गया बल्कि जब उड़ीसा में चक्रवात आया था तब भी ईसाई संगठनों को मदद करने से रोका गया। कहा गया कि वे सहायता की आड़ में धर्म परिवर्तन कराते हैं। लेकिन ये बात हिन्दुत्ववादी संगठनों पर लागू नहीं होती है। एक पहलू न्यायाधीश कोलसे बताते हैं। उडीसा में ये जो समस्या है वह केवल धर्म से नहीं जुड़ी है। यह र्आिथक क्रियाकलापों से ज्यादा जुड़ी है। जो समुदाय संसाधनों और सम्पदा के मामले में अमीर हंै उसका तरह-तरह से दोहन किया जाता है। हर छह महीने और साल भर में दंगे या हमले की वजह यहां आदिवासियों के पास अपार प्राकृतिक संपदा का होना है। दूसरे पहलू को तिस्ता बताती हैं। इस ट्रिब्यूनल के सामने कई महिलाएं पेश हुई। उनके अनुसार उडीसा में 1970 से पहले वे पूरी तरह से आजाद थी। अपनी परंपराएं थी। अपनी संस्कृति थी और उसमें भरपूर आजादी का अहसास था। लेकिन र्धािमक, राजनीतिक और उघोग धंधों में लगी ताकतों ने उनकी खुशियों को धीरे-धीरे खत्म कर दिया। तीसरा पहलू यह है कि इस इलाके में मिलजुल कर रहने और शांति बनाए रखने की क्षमता है। 1994 में विभिा आदिवासी जातियों की महिलाओं के नेतृत्व में ये देखा भी गया। लेकिन सरकार और उसकी मशीनरी अब इसमें जरा भी ध्यान देने को तैयार नहीं। हिन्दुत्ववादियों की संस्कृति को बढ़ने का पूरा मौका दिया जाता है। अब सवाल है कि हमलों के खिलाफ न्याय पाने के लिए अल्पसंख्यक क्या करें? राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग जैसी संस्थाओं को हाशिये पर लाकर खड़ा कर दिया गया है। उड़ीसा में हुए हमले की रिपोर्ट तैयार की गई लेकिन राज्य और केन्द्र में बंटी सरकारों ने कुछ नहीं किया। अपने समाज में कई स्तरों पर अंर्तिवरोधी और विरोधाभासी स्थिति देखी जाती है। जैसे धर्म निरपेक्षता की राजनीति करने वाले हिन्दुत्व की दो छाया तैयार कर लेते हैं। एक को कर बता देते हंै और दूसरे को नरम। लेकिन जब सवर्णवाद पर बात होती है तो उसमें नरम और कर दो छाया नहीं दिखती हंै। इसी तरह वामपंथियों और समाजवादियों से पूछें कि उनकी सक्रियता वाले राज्यों में जातिवाद की क्या भूमिका है तो वे अपने राज्यों को बिल्कुल भिा बताते हैं। प. बंगाल के बारे में वामपंथी कहते हंै तो उड़ीसा के बारे में रवि राय जैसे समाजवादी भी यही कहते रहे हैं। लेकिन सच यह है कि वहां जातिवाद पर जब चोट की जाती है तो साम्प्रदायिकता का घाव निकल आता है।
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Tuesday, June 10, 2008
पश्चिमी देशों ने बोये विनाश के बीज
अवधेश कुमार
पर्यावरण अब गोष्ठियों , सेमिनारों से बाहर निकलकर अगर व्यावहारिक चिंता का विषय बना है तो यह स्वाभाविक है। वास्तव में अब दुनिया के सामने पूरी पृथ्वी के साथ इससे जुड़े वायुमंडल को बचाने की चुनौती खड़ी है। लेकिन हमारा दुर्भाग्य यह है कि खतरे को समझने एवं उसके समाधान की ईमानदार चिंता के बावजूद मूल कारणों को समझने की कोशिश ही नहीं हो रही है। जब मूल कारणों की ही अनदेखी होगी तो फिर वास्तविक समाधान हो ही नहीं सकता। धरती के बढ़ते बुखार को दूर करने के लिए जितने आयोजन हुए हैं उनमें धीरे–धीरे शिरकत करने वाले देशों की संख्या बढ़ रही है और वातावरण में परिलक्षित हो रहे भयानक परिवर्तनों के लक्षण के प्रति सामूहिक भय एवं इससे बचने की सर्वसम्मत इच्छा भी अभिव्यक्त हुई है। कुछ समय पहले तक यह स्थिति नहीं थी। पिछले वर्ष दिसंबर में इंडोनेशिया की राजधानी बाली में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के पूर्व अनेक प्रकार की आशंकाएं व्यक्त की गईं थीं। किंतु 190 देशों के प्रतिनिधियों द्वारा करीब दो सप्ताह तक तपती धरती पर विचार करके सर्वसम्मत निष्कर्ष तक पहुंचना ही दुनिया के लिए महत्वपूर्ण परिघटना है। सबसे बड़ी बात अमेरिका का बाली कार्ययोजना पर राजी होना था। जो अमेरिका पहले नाक पर मक्खी नहीं बैठने दे रहा था वह 190 देशों की कतार में खड़ा हो गया यह साधारण परिवर्तन नहीं है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि पर्यावरण के उग्र स्वरूप के विनाशकारी प्रभावों को सभी ने समझा है एवं इसे दूर करने या कम करने के प्रति आम सहमति जैसी बन चुकी है।लेकिन क्या इससे दुनिया के मंडराते भयावह पर्यावरण संकट के खतरे से मुक्त होने की संभावना भी बन रही है? धरती के बढ़ते बुखार के लिए कार्बन सहित अन्य हानिकारक गैसों के उत्सर्जन को मुख्य खलनायक माना गया है। अभी तक न इसके स्तर को निश्चित सीमा तक कम करने के प्रति सहमति बनी है और न इसके लिए समय सीमा ही निर्धारित हुई है। 2009 के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की आ॓र सबकी नजर लगी हुई है। किंतु वहां से किसी प्रकार की चमत्कार की उम्मीद बेमानी है। इंटरनेशनल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज के वैज्ञानिक विश्लेषणों में भविष्य की जैसी भयानक तस्वीर प्रस्तुत की गई है उसके बाद किसी भी देश द्वारा वातावरण में आ रहे खतरनाक परिवर्तनों को अस्वीकार करने का कोई कारण नहीं है, पर मूल बात इससे अलग है। आखिर ये विषैले गैस उत्सर्जित क्यों हो रहे हैं? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इनके लिए जिम्मेवार वही बातें हैं जिन्हें हम विकास का मानक बना चुके हैं। विकास के इन मानकों को दोषी मानने को कोई तैयार नहीं है। जब विकास के लिए चारों आ॓र उद्योग लगेंगे तो उनसे धुंआ, अवशिष्ट ,कचरा आदि तो बाहर आएगा ही। जब नदियों पर बड़े–बड़े बांध बनेंगे, जब चमचमाती चौड़ी पक्की सड़कों के जाल बिछेंगे, जब हवाई अड्डों का संजाल खड़ा होगा, जब रेलवे का विस्तार होता रहेगा, जब अत्यधिक फसल के लिए रासायनिक खादों का प्रयोग होगा तब तक कोई पर्यावरण को समस्त जीव मंडल के बिल्कुल अनुकूल बनाने की सोच भी नहीं सकता। भारत एवं चीन में बढ़ता ऊर्जा खपत एवं कार्बन उत्सर्जन दुनिया भर के लिए मुद्दा बना हुआ है लेकिन इन दोनों का तर्क है कि पश्चिमी देशों ने लंबे समय से आर्थिक विकास के नाम पर उत्सर्जन किया है, इसलिए वे ज्यादा कटौती करें एवं उन्हें समय दिया जाए। भारत एवं चीन की जगह दूसरा विकासशील देश होता तो उसका तर्क भी यही होता एवं दुनिया के लिए उसे बिल्कुल अस्वीकार करने का कोई कारण नहीं हो सकता है। आखिर विकास का हक सबको है। आपने विकास कर लिया और दूसरे को नसीहत दीजिए कि पर्यावरण के लिए आप विकास की गति पर विराम लगा दो तो कैान इसे स्वीकार करेगा! बाली कार्ययोजना में कहा गया है कि आर्थिक एवं सामाजिक विकास तथा गरीबी में कमी विश्व की प्राथमिकतायें हैं। लेकिन वहां गठित कार्यसमूह इसके लिए विकास का कोई नया ढांचा लाएंगे जिसमें वातवारण बिल्कुल प्रकृति के हवाले रहेगा एवं मनुष्य के द्वारा उसके साथ छेड़छाड़ नहीं होगी ऐसी आशा नहीं की जा सकती है। 1992 के वायुमंडल परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्रसंघ ढ़ांचे (युनाइटेड नेशन फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज) में ग्रीनहाउस गैसों को स्थिरांक पर लाने का निर्णय हुआ था।कहा गया था कि इससे वायुमंडल प्रणाली में मनुष्य के अन्यायपूर्ण हस्तक्षेप का अंत होगा। आज तक यह लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सका। दुनिया के लिए विकास एवं संपन्नता का मानक निर्धारित करने वाले पश्चिमी देश यह स्वीकार ही नहीं कर रहे कि वर्तमान आर्थिक विकास एवं वातावरण को प्रकृति निर्धारित अवस्था में लाने का लक्ष्य एक साथ पाया ही नहीं जा सकता है। कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि विकास एवं सुविधाओं की वर्तमान तकनीकों की जगह नई तकनीकों एवं सामग्रियां लाने से यह हो सकता है। यह नितांत ही अनैतिक एवं अव्यावहारिक दलील है। पृथ्वी एवं इससे जुड़े पूरे वायुमंडल को बचाने के लिए प्रमुख चुनौती तेल, प्राकृतिक गैस एवं कोयले से निकलने वाले कार्बन डाईऑक्साइड का अंत करना है। वर्तमान विकास प्रणाली इन ईंधनों पर ही टिकी है। आज विश्व की कुल वाणिज्यिक ऊर्जा खपत में इनका अंशदान 80 प्रतिशत है। इनकी बजाए वैकल्पिक ऊर्जा प्रयोग करने की बात हम सालों से सुन रहे हैं। बिजली पैदा करने या बिजली प्रतिष्ठानों में ताप पैदा करने में, मोटरगाड़ी एवं उघोगों में इस ऊर्जा का 75 प्रतिशत खपत हो जाता है। दूसरी तकनीकों का प्रयोग करके या कम ईंधन पर चलने वाली मोटरगाड़ियों का निर्माण करके हम कार्बन उत्सर्जन में थोड़ी बहुत कमी ला सकते हेंैं सम्पूर्ण पर्यावरण को बचा नहीं सकते।वास्तव में संकट की जड़ तो पश्चिमी देशों द्वारा निर्धारित विकास मानकों एवं उन पर आधारित जीवन प्रणाली मे निहित है। मनुष्य के संदर्भ में पश्चिम की पूरी विचारधारा उसके शरीर सुख के इर्द–गिर्द ही घूमती है। इसी से औघोगिक क्रांति की उत्पत्ति हुई और उसके बाद पूंजीवाद एवं बाजार पैदा हुआ। इसने जीवन शैली के रूप में अत्यधिक भोग साधन एकत्रित करने और उसका प्रयोग करने का सूत्र दिया। पूरी विकास प्रक्रिया इसी दुष्चक्र का शिकार है। अगर पृथ्वी एवं पूरे पर्यावरण को बचाना है तो फिर इस जीवन शैली को अस्वीकार करना होगा। उसकी जगह मनुष्य के तौर पर जो लक्ष्य भारतीय सभ्यता ने लंबी चिंतन प्रक्रिया के बाद निर्धारित किए उनको पुनर्स्थापित करना होगा। दुर्भाग्य यह है कि जीवन को शरीर तक सीमित न मानने वाली भारतीय सभ्यता के मानक इसकी चकाचौंध में हाशिए पर चले गए हैं। भारतीय सभ्यता ने शरीर को नश्वर मानकर केवल उसके सुख को त्याज्य करार दिया है। इसमें मनुष्य के लिए ऐसी जीवन प्रणाली अपनाने की स्थापित परंपरा थी जिसमें उसका प्रकृति के साथ पूर्ण साहचर्य कायम रहे। प्रकृति के तांडव से लटकते विनाश खतरे के अंत का सूत्र तो इस जीवन प्रणाली में निहित है किंतु जब भारत के नीति निर्माता ही अपनी महान सभ्यता से आत्मग्लानिबोध से ग्रस्त इन विनाशकारी पश्चिमी मानकों को स्वीकार कर पूरा विकास ढ़ांचा उसी दिशा में सशक्त करने की कोशिश कर रहे हैं तो फिर इसकी आ॓र किसी का ध्यान जाएगा तो कैसे?
http://www.rashtriyasahara.com/ से साभार
पर्यावरण अब गोष्ठियों , सेमिनारों से बाहर निकलकर अगर व्यावहारिक चिंता का विषय बना है तो यह स्वाभाविक है। वास्तव में अब दुनिया के सामने पूरी पृथ्वी के साथ इससे जुड़े वायुमंडल को बचाने की चुनौती खड़ी है। लेकिन हमारा दुर्भाग्य यह है कि खतरे को समझने एवं उसके समाधान की ईमानदार चिंता के बावजूद मूल कारणों को समझने की कोशिश ही नहीं हो रही है। जब मूल कारणों की ही अनदेखी होगी तो फिर वास्तविक समाधान हो ही नहीं सकता। धरती के बढ़ते बुखार को दूर करने के लिए जितने आयोजन हुए हैं उनमें धीरे–धीरे शिरकत करने वाले देशों की संख्या बढ़ रही है और वातावरण में परिलक्षित हो रहे भयानक परिवर्तनों के लक्षण के प्रति सामूहिक भय एवं इससे बचने की सर्वसम्मत इच्छा भी अभिव्यक्त हुई है। कुछ समय पहले तक यह स्थिति नहीं थी। पिछले वर्ष दिसंबर में इंडोनेशिया की राजधानी बाली में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के पूर्व अनेक प्रकार की आशंकाएं व्यक्त की गईं थीं। किंतु 190 देशों के प्रतिनिधियों द्वारा करीब दो सप्ताह तक तपती धरती पर विचार करके सर्वसम्मत निष्कर्ष तक पहुंचना ही दुनिया के लिए महत्वपूर्ण परिघटना है। सबसे बड़ी बात अमेरिका का बाली कार्ययोजना पर राजी होना था। जो अमेरिका पहले नाक पर मक्खी नहीं बैठने दे रहा था वह 190 देशों की कतार में खड़ा हो गया यह साधारण परिवर्तन नहीं है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि पर्यावरण के उग्र स्वरूप के विनाशकारी प्रभावों को सभी ने समझा है एवं इसे दूर करने या कम करने के प्रति आम सहमति जैसी बन चुकी है।लेकिन क्या इससे दुनिया के मंडराते भयावह पर्यावरण संकट के खतरे से मुक्त होने की संभावना भी बन रही है? धरती के बढ़ते बुखार के लिए कार्बन सहित अन्य हानिकारक गैसों के उत्सर्जन को मुख्य खलनायक माना गया है। अभी तक न इसके स्तर को निश्चित सीमा तक कम करने के प्रति सहमति बनी है और न इसके लिए समय सीमा ही निर्धारित हुई है। 2009 के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की आ॓र सबकी नजर लगी हुई है। किंतु वहां से किसी प्रकार की चमत्कार की उम्मीद बेमानी है। इंटरनेशनल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज के वैज्ञानिक विश्लेषणों में भविष्य की जैसी भयानक तस्वीर प्रस्तुत की गई है उसके बाद किसी भी देश द्वारा वातावरण में आ रहे खतरनाक परिवर्तनों को अस्वीकार करने का कोई कारण नहीं है, पर मूल बात इससे अलग है। आखिर ये विषैले गैस उत्सर्जित क्यों हो रहे हैं? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इनके लिए जिम्मेवार वही बातें हैं जिन्हें हम विकास का मानक बना चुके हैं। विकास के इन मानकों को दोषी मानने को कोई तैयार नहीं है। जब विकास के लिए चारों आ॓र उद्योग लगेंगे तो उनसे धुंआ, अवशिष्ट ,कचरा आदि तो बाहर आएगा ही। जब नदियों पर बड़े–बड़े बांध बनेंगे, जब चमचमाती चौड़ी पक्की सड़कों के जाल बिछेंगे, जब हवाई अड्डों का संजाल खड़ा होगा, जब रेलवे का विस्तार होता रहेगा, जब अत्यधिक फसल के लिए रासायनिक खादों का प्रयोग होगा तब तक कोई पर्यावरण को समस्त जीव मंडल के बिल्कुल अनुकूल बनाने की सोच भी नहीं सकता। भारत एवं चीन में बढ़ता ऊर्जा खपत एवं कार्बन उत्सर्जन दुनिया भर के लिए मुद्दा बना हुआ है लेकिन इन दोनों का तर्क है कि पश्चिमी देशों ने लंबे समय से आर्थिक विकास के नाम पर उत्सर्जन किया है, इसलिए वे ज्यादा कटौती करें एवं उन्हें समय दिया जाए। भारत एवं चीन की जगह दूसरा विकासशील देश होता तो उसका तर्क भी यही होता एवं दुनिया के लिए उसे बिल्कुल अस्वीकार करने का कोई कारण नहीं हो सकता है। आखिर विकास का हक सबको है। आपने विकास कर लिया और दूसरे को नसीहत दीजिए कि पर्यावरण के लिए आप विकास की गति पर विराम लगा दो तो कैान इसे स्वीकार करेगा! बाली कार्ययोजना में कहा गया है कि आर्थिक एवं सामाजिक विकास तथा गरीबी में कमी विश्व की प्राथमिकतायें हैं। लेकिन वहां गठित कार्यसमूह इसके लिए विकास का कोई नया ढांचा लाएंगे जिसमें वातवारण बिल्कुल प्रकृति के हवाले रहेगा एवं मनुष्य के द्वारा उसके साथ छेड़छाड़ नहीं होगी ऐसी आशा नहीं की जा सकती है। 1992 के वायुमंडल परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्रसंघ ढ़ांचे (युनाइटेड नेशन फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज) में ग्रीनहाउस गैसों को स्थिरांक पर लाने का निर्णय हुआ था।कहा गया था कि इससे वायुमंडल प्रणाली में मनुष्य के अन्यायपूर्ण हस्तक्षेप का अंत होगा। आज तक यह लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सका। दुनिया के लिए विकास एवं संपन्नता का मानक निर्धारित करने वाले पश्चिमी देश यह स्वीकार ही नहीं कर रहे कि वर्तमान आर्थिक विकास एवं वातावरण को प्रकृति निर्धारित अवस्था में लाने का लक्ष्य एक साथ पाया ही नहीं जा सकता है। कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि विकास एवं सुविधाओं की वर्तमान तकनीकों की जगह नई तकनीकों एवं सामग्रियां लाने से यह हो सकता है। यह नितांत ही अनैतिक एवं अव्यावहारिक दलील है। पृथ्वी एवं इससे जुड़े पूरे वायुमंडल को बचाने के लिए प्रमुख चुनौती तेल, प्राकृतिक गैस एवं कोयले से निकलने वाले कार्बन डाईऑक्साइड का अंत करना है। वर्तमान विकास प्रणाली इन ईंधनों पर ही टिकी है। आज विश्व की कुल वाणिज्यिक ऊर्जा खपत में इनका अंशदान 80 प्रतिशत है। इनकी बजाए वैकल्पिक ऊर्जा प्रयोग करने की बात हम सालों से सुन रहे हैं। बिजली पैदा करने या बिजली प्रतिष्ठानों में ताप पैदा करने में, मोटरगाड़ी एवं उघोगों में इस ऊर्जा का 75 प्रतिशत खपत हो जाता है। दूसरी तकनीकों का प्रयोग करके या कम ईंधन पर चलने वाली मोटरगाड़ियों का निर्माण करके हम कार्बन उत्सर्जन में थोड़ी बहुत कमी ला सकते हेंैं सम्पूर्ण पर्यावरण को बचा नहीं सकते।वास्तव में संकट की जड़ तो पश्चिमी देशों द्वारा निर्धारित विकास मानकों एवं उन पर आधारित जीवन प्रणाली मे निहित है। मनुष्य के संदर्भ में पश्चिम की पूरी विचारधारा उसके शरीर सुख के इर्द–गिर्द ही घूमती है। इसी से औघोगिक क्रांति की उत्पत्ति हुई और उसके बाद पूंजीवाद एवं बाजार पैदा हुआ। इसने जीवन शैली के रूप में अत्यधिक भोग साधन एकत्रित करने और उसका प्रयोग करने का सूत्र दिया। पूरी विकास प्रक्रिया इसी दुष्चक्र का शिकार है। अगर पृथ्वी एवं पूरे पर्यावरण को बचाना है तो फिर इस जीवन शैली को अस्वीकार करना होगा। उसकी जगह मनुष्य के तौर पर जो लक्ष्य भारतीय सभ्यता ने लंबी चिंतन प्रक्रिया के बाद निर्धारित किए उनको पुनर्स्थापित करना होगा। दुर्भाग्य यह है कि जीवन को शरीर तक सीमित न मानने वाली भारतीय सभ्यता के मानक इसकी चकाचौंध में हाशिए पर चले गए हैं। भारतीय सभ्यता ने शरीर को नश्वर मानकर केवल उसके सुख को त्याज्य करार दिया है। इसमें मनुष्य के लिए ऐसी जीवन प्रणाली अपनाने की स्थापित परंपरा थी जिसमें उसका प्रकृति के साथ पूर्ण साहचर्य कायम रहे। प्रकृति के तांडव से लटकते विनाश खतरे के अंत का सूत्र तो इस जीवन प्रणाली में निहित है किंतु जब भारत के नीति निर्माता ही अपनी महान सभ्यता से आत्मग्लानिबोध से ग्रस्त इन विनाशकारी पश्चिमी मानकों को स्वीकार कर पूरा विकास ढ़ांचा उसी दिशा में सशक्त करने की कोशिश कर रहे हैं तो फिर इसकी आ॓र किसी का ध्यान जाएगा तो कैसे?
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Wednesday, January 2, 2008
सुलगता ज्वालामुखी

हाशिये पर जी रहे हर तरह से शोषित और जातीय हिंसा के शिकार असम के आदिवासी अब कुछ भी चुपचाप सहने को तैयार नहीं दिखते...टेरेसा रहमान की रिपोर्ट...
पूर्वोत्तर के बड़े उग्रवादी संगठनों का एक कमजोर बंधु आदिवासी नेशनल लिबरेशन आर्मी (एएनएलए) ने खुद को असम के दबे-कुचले आदिवासियों का रहनुमा बना लिया है. इस संगठन ने कथित रूप से 13 दिसंबर को दिल्ली-डिब्रूगढ़ राजधानी एक्सप्रेस में हुए एक विस्फोट को अंजाम दिया था और सरकार इसी वजह से अब इसे प्रतिबंधित करने पर विचार कर रही है. विस्फोट की घटना में पांच लोगों की मौत हो गई थी और कई घायल हुए थे. कहा जा रहा है कि ये पिछले महीने गुवाहाटी में स्थानीय लोगों द्वारा आदिवासियों को पीटने और एक आदिवासी महिला को नग्न करके घुमाए जाने की घटना का जवाब था.
असम में आदिवासी दरअसल उन मजदूरों के वंशजों को कहा जाता है जिन्हें करीब 160 साल पहले अंग्रेज़ चाय बागानों में काम करने के लिए यहां लाए थे. तभी से शांतिप्रिय आदिवासी समुदाय राज्य की आर्थिक तरक्की में चुपचाप अपना योगदान देते रहा है. बावजूद इसके ये हमेशा उपेक्षा का शिकार ही रहे. 1996 में बोडोलैंड इलाके में बोडो जनजाति और आदिवासियों के बीच हुए जातीय संघर्ष ने कई आदिवासियों को बेघर कर दिया. इनमें से कुछ अभी भी सहायता शिविरों में रहने को मजबूर हैं. इसके बाद आत्मरक्षा के लिए दो उग्रवादी संगठन बने- आदिवासी कोबरा मिलिट्री ऑफ असम (एसीएमए) और बिरसा कमांडो फोर्स(बीसीएफ). दोनों का इस समय सरकार के साथ संघर्षविराम समझौता चल रहा है.
हालिया बम धमाका इनका पहला बड़ा अभियान था मगर पिछले कुछ समय से इनकी मौजूदगी के निशान कोकराझार, उदलगुड़ी, शिवसागर और सोनितपुर ज़िलों में भी मिलते रहे हैं.
इस समय एएनएलए एक मात्र सक्रिय आदिवासी संगठन है जिसकी कैडर संख्या 150-200 है. कथित रूप से एनएससीएन-आईएम के साथ नजदीकी रिश्ते वाले इस संगठन ने कर्बी, अंगलॉन्ग और गोलघाट ज़िलों में हत्या, अपहरण और चौथ वसूली की घटनाओं को अंजाम दिया है. हालिया बम धमाका इनका पहला बड़ा अभियान था मगर पिछले कुछ समय से इनकी मौजूदगी के निशान कोकराझार, उदलगुड़ी, शिवसागर और सोनितपुर ज़िलों में भी मिलते रहे हैं.
कहा जाता है कि एएनएलए के ज्यादातर कार्यकर्ता पढ़े-लिखे हैं. एसीएमए का चीफ कमांडर कानू मुर्मू भी स्नातक है. उसने तहलका को बताया, "1996 के जातीय दंगो के बाद हमें सरकार से कोई सहायता नहीं मिली. सभी आदिवासी गांवों को खत्म कर दिया गया. यहां तक कि हमें सहायता शिविरों में भी कोई सुरक्षा नहीं मिली थी और बोडो उग्रवादी अक्सर हमें निशाना बनाया करते थे. हम भ्रमित थे. अपनी रक्षा करने के लिए मजबूरी में हमने हथियार उठाए और 500 लोगों का मजबूत समूह खड़ा किया"
बीसीएफ का चीफ कमांडर बीर सिंह मुंडा, मुर्मू से सहमत है. वो ज़ोर देकर कहता है कि आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों के प्रति सरकार के उदासीन रवैए ने लोगों में असंतोष बढ़ाया, ये भावना पूरे भारत में फैल गई है. "हम आदिम जनजाति हैं और लगभग सभी राज्यों में हमें एसटी का दर्जा प्राप्त है. लेकिन असम में वो हमें आदिवासी का दर्जा देने के लिए ही तैयार नहीं हैं," वो कहता है.
चाय जनजातियों के पहले छात्र संगठन "छोटा नागपुरी छात्र सम्मेलन" की स्थापना 1950 में हुई थी जिसका मकसद समुदाय की परेशानियों का हल तलाशना था. आगे चलकर इसका नाम "असम चाय जनजाति छात्र एसोसिएशन" हो गया. इसके महासचिव पल्लब लोचन दास कहते हैं, "हम अपने अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक तरीकों से लड़ने में यकीन रखते हैं. हमारे समुदाय की इच्छाएं बहुत लंबी-चौड़ी नहीं हैं. अगर किसी ने हथियार उठाया है तो इसकी वजह आत्मरक्षा है, किसी को प्रताड़ित करना नहीं. हम इन आतंकी संगठनो से कोई बड़ी उम्मीद भी नहीं करते हैं"
समाज विज्ञानी अमलेंदु गुहा कहते हैं कि जातीय गुटों की स्वायत्तता की मांग धीरे-धीरे अस्तित्व में आई है एकदम से नहीं. "हम एक ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठे हुए हैं मगर कोई कुछ नहीं कर रहा." वो आगे जोड़ते हैं, "शायद करने के लिए पहले ही देर हो चुकी है."
तहलका हिन्दी से साभार
पूर्वोत्तर के बड़े उग्रवादी संगठनों का एक कमजोर बंधु आदिवासी नेशनल लिबरेशन आर्मी (एएनएलए) ने खुद को असम के दबे-कुचले आदिवासियों का रहनुमा बना लिया है. इस संगठन ने कथित रूप से 13 दिसंबर को दिल्ली-डिब्रूगढ़ राजधानी एक्सप्रेस में हुए एक विस्फोट को अंजाम दिया था और सरकार इसी वजह से अब इसे प्रतिबंधित करने पर विचार कर रही है. विस्फोट की घटना में पांच लोगों की मौत हो गई थी और कई घायल हुए थे. कहा जा रहा है कि ये पिछले महीने गुवाहाटी में स्थानीय लोगों द्वारा आदिवासियों को पीटने और एक आदिवासी महिला को नग्न करके घुमाए जाने की घटना का जवाब था.
असम में आदिवासी दरअसल उन मजदूरों के वंशजों को कहा जाता है जिन्हें करीब 160 साल पहले अंग्रेज़ चाय बागानों में काम करने के लिए यहां लाए थे. तभी से शांतिप्रिय आदिवासी समुदाय राज्य की आर्थिक तरक्की में चुपचाप अपना योगदान देते रहा है. बावजूद इसके ये हमेशा उपेक्षा का शिकार ही रहे. 1996 में बोडोलैंड इलाके में बोडो जनजाति और आदिवासियों के बीच हुए जातीय संघर्ष ने कई आदिवासियों को बेघर कर दिया. इनमें से कुछ अभी भी सहायता शिविरों में रहने को मजबूर हैं. इसके बाद आत्मरक्षा के लिए दो उग्रवादी संगठन बने- आदिवासी कोबरा मिलिट्री ऑफ असम (एसीएमए) और बिरसा कमांडो फोर्स(बीसीएफ). दोनों का इस समय सरकार के साथ संघर्षविराम समझौता चल रहा है.
हालिया बम धमाका इनका पहला बड़ा अभियान था मगर पिछले कुछ समय से इनकी मौजूदगी के निशान कोकराझार, उदलगुड़ी, शिवसागर और सोनितपुर ज़िलों में भी मिलते रहे हैं.
इस समय एएनएलए एक मात्र सक्रिय आदिवासी संगठन है जिसकी कैडर संख्या 150-200 है. कथित रूप से एनएससीएन-आईएम के साथ नजदीकी रिश्ते वाले इस संगठन ने कर्बी, अंगलॉन्ग और गोलघाट ज़िलों में हत्या, अपहरण और चौथ वसूली की घटनाओं को अंजाम दिया है. हालिया बम धमाका इनका पहला बड़ा अभियान था मगर पिछले कुछ समय से इनकी मौजूदगी के निशान कोकराझार, उदलगुड़ी, शिवसागर और सोनितपुर ज़िलों में भी मिलते रहे हैं.
कहा जाता है कि एएनएलए के ज्यादातर कार्यकर्ता पढ़े-लिखे हैं. एसीएमए का चीफ कमांडर कानू मुर्मू भी स्नातक है. उसने तहलका को बताया, "1996 के जातीय दंगो के बाद हमें सरकार से कोई सहायता नहीं मिली. सभी आदिवासी गांवों को खत्म कर दिया गया. यहां तक कि हमें सहायता शिविरों में भी कोई सुरक्षा नहीं मिली थी और बोडो उग्रवादी अक्सर हमें निशाना बनाया करते थे. हम भ्रमित थे. अपनी रक्षा करने के लिए मजबूरी में हमने हथियार उठाए और 500 लोगों का मजबूत समूह खड़ा किया"
बीसीएफ का चीफ कमांडर बीर सिंह मुंडा, मुर्मू से सहमत है. वो ज़ोर देकर कहता है कि आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों के प्रति सरकार के उदासीन रवैए ने लोगों में असंतोष बढ़ाया, ये भावना पूरे भारत में फैल गई है. "हम आदिम जनजाति हैं और लगभग सभी राज्यों में हमें एसटी का दर्जा प्राप्त है. लेकिन असम में वो हमें आदिवासी का दर्जा देने के लिए ही तैयार नहीं हैं," वो कहता है.
चाय जनजातियों के पहले छात्र संगठन "छोटा नागपुरी छात्र सम्मेलन" की स्थापना 1950 में हुई थी जिसका मकसद समुदाय की परेशानियों का हल तलाशना था. आगे चलकर इसका नाम "असम चाय जनजाति छात्र एसोसिएशन" हो गया. इसके महासचिव पल्लब लोचन दास कहते हैं, "हम अपने अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक तरीकों से लड़ने में यकीन रखते हैं. हमारे समुदाय की इच्छाएं बहुत लंबी-चौड़ी नहीं हैं. अगर किसी ने हथियार उठाया है तो इसकी वजह आत्मरक्षा है, किसी को प्रताड़ित करना नहीं. हम इन आतंकी संगठनो से कोई बड़ी उम्मीद भी नहीं करते हैं"
समाज विज्ञानी अमलेंदु गुहा कहते हैं कि जातीय गुटों की स्वायत्तता की मांग धीरे-धीरे अस्तित्व में आई है एकदम से नहीं. "हम एक ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठे हुए हैं मगर कोई कुछ नहीं कर रहा." वो आगे जोड़ते हैं, "शायद करने के लिए पहले ही देर हो चुकी है."
तहलका हिन्दी से साभार
आर्थिक मंदी से जूझेगा अमेरिका

आनंद प्रधान
अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए वर्ष 2008 अच्छे संकेत लेकर नहीं आ रहा है। इस बात की आशंका लगातार प्रबल होती जा रही है कि दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को मंदी की चपेट में आने से रोकना संभव नहीं रह गया है। उन अर्थशास्त्रियों और विश्लेषकों की तादाद दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है जो मंदी को निश्चित बता रहे हैं और जो मंदी की भविष्यवाणी से सहमत नहीं हैं, वे भी यह स्वीकार कर रहे हैं कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था की गति धीमी पड़ जाएगी।अर्थशास्त्रियों में मतभेद की एक बड़ी वजह मंदी की परिभाषा को लेकर है। लोकप्रिय मान्यता यह है कि लगातार दो तिमाही में जीडीपी की वृद्धि दर में गिरावट का अर्थ अर्थव्यवस्था का मंदी की चपेट में आना है। माना जा रहा है कि 2007 के मध्य में हाउसिंग क्षेत्र के बुलबुले के फूटने के बाद अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था जिस सब-प्राइम कर्ज और मार्गेज संकट से जूझ रही है, उसका वास्तविक असर 2008 में दिखेगा। वॉल स्ट्रीट के विश्लेषकों का अनुमान है कि अमेरिकी जीडीपी चौथी तिमाही में लुढ़ककर सिर्फ 1।5 फीसदी की चींटी की गति से बढ़ेगी। विश्लेषक उसके बाद कुछ और कमजोर तिमाहियों की आशंका से इनकार नहीं करते हैं। इसके बावजूद वाल स्ट्रीट मंदी की आसन्न सचाई स्वीकार करने को तैयार नहीं है। वह मंदी की आशंका को 50 प्रतिशत से अधिक वजन या चांस देने के लिए तैयार नहीं है। जाहिर है वॉल स्ट्रीट के लिए मंदी एक ऐसी कड़वी सच्चाई है जिसे वह आखिरी क्षण तक नकारता रहता है। यह कोई पहली बार नहीं है। इससे पहले 1990 और 2001 की मंदी के समय भी वॉल स्ट्रीट अर्थव्यवस्था के अच्छे स्वास्थ्य और ठीक-ठीक विकास दर के दावे कर रहा था लेकिन हकीकत कुछ और ही निकली, इसलिए वर्ष 2008 में अमेरिकी अर्थव्यवस्था की गति में थोड़ा धीमापन आने के बावजूद उसकी अच्छी सेहत के दावों को स्वीकार करना मुश्किल है। यह सच है कि बुश प्रशासन खासकर केन्द्रीय बैंक फेडरल रिजर्व के चेयरमैन बर्नानके और वित्तमंत्री पाल्सन अमेरिकी वित्तीय बाजार में फैली घबराहट, उथल-पुथल और गहराते संकट को दूर करने के लिए हर संभव मदद कर रहे हैं लेकिन उनके सभी प्रयास इस संकट के ‘ब्लैक होल’ में गुम हो जा रहे हैं।दरअसल, हाउसिंग बुलबुले के फूटने के बाद वित्तीय बाजार में सब प्राइम और मार्गेज लोन के संकट के कारण हुए नुकसान को लेकर अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है। उसका आकार कितना बड़ा है, इसको लेकर लगाए जा रहे कयासों का दौर जारी है। खुद फेडरल रिजर्व के चेयरमैन बर्नानके ने संकट की शुरूआत में सब प्राइम और मार्गेज लोन के कारण 50 से 100 अरब डॉलर के नुकसान की आशंका जाहिर की थी लेकिन अब उन्होंने माना है कि यह नुकसान 150 अरब डॉलर से अधिक का हो सकता है। हालांकि यह अनुमान भी बहुत कम माना जा रहा है। ड्यूश बैंक के आकलन के अनुसार सब-प्राइम संकट से जुड़ा कुल नुकसान 400 अरब डॉलर से अधिक का हो सकता है जिसमें लगभग 130 अरब डॉलर का नुकसान बैंको के खाते में जाने का अनुमान है।आश्चर्य नहीं कि इस संकट के कारण कल तक वित्तीय बाजार के चमकते सितारे माने जाने वाले बैंक और वित्तीय संस्थाएं धूल-धूसरित नजर आ रही हैं। जाना-माना इन्वेस्टमेंट बैंक मेरिल लिंच, अमेरिका का सबसे बड़ा बैंक सिटी ग्रुप और दुनिया की सबसे बड़ी वित्तीय संस्थाओं में से एक मार्गन स्टेनली और यूबीएस, सभी संकट में त्राहिमाम करती नजर आ रही हैं। मेरिल लिंच को अपने 93 वर्षों के इतिहास में इतना बड़ा नुकसान कभी नहीं हुआ। उसने अपनी तीसरी तिमाही में 8.4 अरब डॉलर के नुकसान का एलान किया है और विश्लेषकों का अनुमान है कि चौथी तिमाही में भी उसे 8.6 अरब डॉलर गंवाने पड़ेंगे। मार्गन स्टेनली ने मार्गेज लोन डूबने के कारण लगभग 9.4अरब डॉलर के नुकसान की बात स्वीकार की है।इस वित्तीय संकट के कारण बैंको और वित्तीय संस्थाओं ने नए कर्ज देने और कर्ज की शर्तों को सख्त कर दिया है। इससे बाजार में काफी हद तक कजोर्ं के मामले में सूखे की स्थिति पैदा हो गई है। जाहिर है इस सबका असर उन अमेरिकी उपभोक्ताओं पर जरूर पड़ेगा, जिन्हें अपने भारी उपभोग के कारण विश्व अर्थव्यवस्था का ड्राइवर माना जाता है। हाल के सर्वेक्षणों में उपभोक्ताओं के विश्वास में अच्छी-खासी गिरावट देखी गयी है जिसका अर्थ है कि वे खरीददारी और उपभोग कम करेंगे और इसका सीधा असर वस्तुओं और सेवाओं की मांग पर पड़ेगा। मांग में गिरावट के कारण न सिर्फ घरेलू कंपनियों और अमेरिकी बाजार में अपना माल निर्यात करने वाले देशों की आय पर बुरा असर पड़ेगा बल्कि इसके कारण कंपनियां नया निवेश नहीं करेंगी। इससे रोजगार के नए अवसर पैदा नहीं होंगे। छंटनी होगी और बेरोजगारी बढ़ेगी। इससे वस्तुओं और सेवाओं की मांग और घट जाएगी। इस तरह अर्थव्यवस्था मंदी में फंस जाएगी।यह किसी काल्पनिक स्थिति का बयान नहीं है। अमेरिकी हाउसिंग संकट सचमुच बहुत व्यापक और गहरा है। अमेरिका में कुल आवासीय हाउसिंग संपत्ति लगभग 21 अरब डॉलर की है जो कुल अमेरिकी पारिवारिक संपत्ति के एक तिहाई से अधिक है। इस आवासीय हाउसिंग संपत्ति की कीमत में 10 फीसदी की भी गिरावट अमेरिकी उपभोक्ताओं की खरीददारी को काफी प्रभावित कर सकती है। हाउसिंग बुलबुले के फूटने के बाद प्रॉपर्टी बाजार की स्थिति यह हो गई है कि नए मकानों के निर्माण की शुरूआत की दर में अपने चरम स्तर से करीब 47 फीसदी की गिरावट दर्ज की गयी है और जहां 2005 में आवासीय प्रापर्टी कुल जीडीपी का 6.3 प्रतिशत थी, वह घटकर 4.4 प्रतिशत रह गई है। नए मकानों की मांग घटने के कारण निर्माण उघोग को गहरा झटका लगा है। रही-सही कसर कच्चे तेल की रिकार्ड छूती कीमतों ने पूरी कर दी है।साफ है कि अमेरिका मंदी के जुकाम के वायरस की चपेट में आ चुका है और उसके लक्षण दिखने लगे हैं। ऐसे में, भारत जैसी विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था को मंदी का संक्रमण भले न हो लेकिन छींकने से कौन रोक सकता है। भूमंडलीकरण अर्थव्यवस्था का हिस्सा होने के कारण संभावित अमेरिकी मंदी का असर भारत पर भी जरूर पड़ेगा। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में इस आ॓र इशारा किया है। यूपीए सरकार 11 वीं पंचवर्षीय योजना में 9 से 10 फीसदी विकास दर हासिल करने के दावे जरूर कर रही है लेकिन इस बात के आसार अधिक हैं कि अगले साल विकास दर चालू वर्ष के 8.5 फीसदी के अनुमान से गिरकर 7 से 7.5 प्रतिशत तक पहुंच जाए। हालांकि इससे आसमान नहीं गिर पड़ेगा लेकिन अमेरिकी हाउंिसंग बुलबुले के फूटने के बाद भारत को अपने प्रॉपर्टी और रीयल एस्टेट बाजार के साथ शेयर और कुछ हद तक जिंस बाजार की ‘अतार्किक उत्साह’ सें भरी तेजी में बन रहे बुलबुले को लेकर जरूर सतर्क हो जाना चाहिए। भारतीय अर्थव्यवस्था को बाहर से ज्यादा खतरा अंदर से है। 2008 में भारतीय शेयर बाजार और रीयल एस्टेट पर सबकी निगाहें होंगी।
अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए वर्ष 2008 अच्छे संकेत लेकर नहीं आ रहा है। इस बात की आशंका लगातार प्रबल होती जा रही है कि दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को मंदी की चपेट में आने से रोकना संभव नहीं रह गया है। उन अर्थशास्त्रियों और विश्लेषकों की तादाद दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है जो मंदी को निश्चित बता रहे हैं और जो मंदी की भविष्यवाणी से सहमत नहीं हैं, वे भी यह स्वीकार कर रहे हैं कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था की गति धीमी पड़ जाएगी।अर्थशास्त्रियों में मतभेद की एक बड़ी वजह मंदी की परिभाषा को लेकर है। लोकप्रिय मान्यता यह है कि लगातार दो तिमाही में जीडीपी की वृद्धि दर में गिरावट का अर्थ अर्थव्यवस्था का मंदी की चपेट में आना है। माना जा रहा है कि 2007 के मध्य में हाउसिंग क्षेत्र के बुलबुले के फूटने के बाद अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था जिस सब-प्राइम कर्ज और मार्गेज संकट से जूझ रही है, उसका वास्तविक असर 2008 में दिखेगा। वॉल स्ट्रीट के विश्लेषकों का अनुमान है कि अमेरिकी जीडीपी चौथी तिमाही में लुढ़ककर सिर्फ 1।5 फीसदी की चींटी की गति से बढ़ेगी। विश्लेषक उसके बाद कुछ और कमजोर तिमाहियों की आशंका से इनकार नहीं करते हैं। इसके बावजूद वाल स्ट्रीट मंदी की आसन्न सचाई स्वीकार करने को तैयार नहीं है। वह मंदी की आशंका को 50 प्रतिशत से अधिक वजन या चांस देने के लिए तैयार नहीं है। जाहिर है वॉल स्ट्रीट के लिए मंदी एक ऐसी कड़वी सच्चाई है जिसे वह आखिरी क्षण तक नकारता रहता है। यह कोई पहली बार नहीं है। इससे पहले 1990 और 2001 की मंदी के समय भी वॉल स्ट्रीट अर्थव्यवस्था के अच्छे स्वास्थ्य और ठीक-ठीक विकास दर के दावे कर रहा था लेकिन हकीकत कुछ और ही निकली, इसलिए वर्ष 2008 में अमेरिकी अर्थव्यवस्था की गति में थोड़ा धीमापन आने के बावजूद उसकी अच्छी सेहत के दावों को स्वीकार करना मुश्किल है। यह सच है कि बुश प्रशासन खासकर केन्द्रीय बैंक फेडरल रिजर्व के चेयरमैन बर्नानके और वित्तमंत्री पाल्सन अमेरिकी वित्तीय बाजार में फैली घबराहट, उथल-पुथल और गहराते संकट को दूर करने के लिए हर संभव मदद कर रहे हैं लेकिन उनके सभी प्रयास इस संकट के ‘ब्लैक होल’ में गुम हो जा रहे हैं।दरअसल, हाउसिंग बुलबुले के फूटने के बाद वित्तीय बाजार में सब प्राइम और मार्गेज लोन के संकट के कारण हुए नुकसान को लेकर अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है। उसका आकार कितना बड़ा है, इसको लेकर लगाए जा रहे कयासों का दौर जारी है। खुद फेडरल रिजर्व के चेयरमैन बर्नानके ने संकट की शुरूआत में सब प्राइम और मार्गेज लोन के कारण 50 से 100 अरब डॉलर के नुकसान की आशंका जाहिर की थी लेकिन अब उन्होंने माना है कि यह नुकसान 150 अरब डॉलर से अधिक का हो सकता है। हालांकि यह अनुमान भी बहुत कम माना जा रहा है। ड्यूश बैंक के आकलन के अनुसार सब-प्राइम संकट से जुड़ा कुल नुकसान 400 अरब डॉलर से अधिक का हो सकता है जिसमें लगभग 130 अरब डॉलर का नुकसान बैंको के खाते में जाने का अनुमान है।आश्चर्य नहीं कि इस संकट के कारण कल तक वित्तीय बाजार के चमकते सितारे माने जाने वाले बैंक और वित्तीय संस्थाएं धूल-धूसरित नजर आ रही हैं। जाना-माना इन्वेस्टमेंट बैंक मेरिल लिंच, अमेरिका का सबसे बड़ा बैंक सिटी ग्रुप और दुनिया की सबसे बड़ी वित्तीय संस्थाओं में से एक मार्गन स्टेनली और यूबीएस, सभी संकट में त्राहिमाम करती नजर आ रही हैं। मेरिल लिंच को अपने 93 वर्षों के इतिहास में इतना बड़ा नुकसान कभी नहीं हुआ। उसने अपनी तीसरी तिमाही में 8.4 अरब डॉलर के नुकसान का एलान किया है और विश्लेषकों का अनुमान है कि चौथी तिमाही में भी उसे 8.6 अरब डॉलर गंवाने पड़ेंगे। मार्गन स्टेनली ने मार्गेज लोन डूबने के कारण लगभग 9.4अरब डॉलर के नुकसान की बात स्वीकार की है।इस वित्तीय संकट के कारण बैंको और वित्तीय संस्थाओं ने नए कर्ज देने और कर्ज की शर्तों को सख्त कर दिया है। इससे बाजार में काफी हद तक कजोर्ं के मामले में सूखे की स्थिति पैदा हो गई है। जाहिर है इस सबका असर उन अमेरिकी उपभोक्ताओं पर जरूर पड़ेगा, जिन्हें अपने भारी उपभोग के कारण विश्व अर्थव्यवस्था का ड्राइवर माना जाता है। हाल के सर्वेक्षणों में उपभोक्ताओं के विश्वास में अच्छी-खासी गिरावट देखी गयी है जिसका अर्थ है कि वे खरीददारी और उपभोग कम करेंगे और इसका सीधा असर वस्तुओं और सेवाओं की मांग पर पड़ेगा। मांग में गिरावट के कारण न सिर्फ घरेलू कंपनियों और अमेरिकी बाजार में अपना माल निर्यात करने वाले देशों की आय पर बुरा असर पड़ेगा बल्कि इसके कारण कंपनियां नया निवेश नहीं करेंगी। इससे रोजगार के नए अवसर पैदा नहीं होंगे। छंटनी होगी और बेरोजगारी बढ़ेगी। इससे वस्तुओं और सेवाओं की मांग और घट जाएगी। इस तरह अर्थव्यवस्था मंदी में फंस जाएगी।यह किसी काल्पनिक स्थिति का बयान नहीं है। अमेरिकी हाउसिंग संकट सचमुच बहुत व्यापक और गहरा है। अमेरिका में कुल आवासीय हाउसिंग संपत्ति लगभग 21 अरब डॉलर की है जो कुल अमेरिकी पारिवारिक संपत्ति के एक तिहाई से अधिक है। इस आवासीय हाउसिंग संपत्ति की कीमत में 10 फीसदी की भी गिरावट अमेरिकी उपभोक्ताओं की खरीददारी को काफी प्रभावित कर सकती है। हाउसिंग बुलबुले के फूटने के बाद प्रॉपर्टी बाजार की स्थिति यह हो गई है कि नए मकानों के निर्माण की शुरूआत की दर में अपने चरम स्तर से करीब 47 फीसदी की गिरावट दर्ज की गयी है और जहां 2005 में आवासीय प्रापर्टी कुल जीडीपी का 6.3 प्रतिशत थी, वह घटकर 4.4 प्रतिशत रह गई है। नए मकानों की मांग घटने के कारण निर्माण उघोग को गहरा झटका लगा है। रही-सही कसर कच्चे तेल की रिकार्ड छूती कीमतों ने पूरी कर दी है।साफ है कि अमेरिका मंदी के जुकाम के वायरस की चपेट में आ चुका है और उसके लक्षण दिखने लगे हैं। ऐसे में, भारत जैसी विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था को मंदी का संक्रमण भले न हो लेकिन छींकने से कौन रोक सकता है। भूमंडलीकरण अर्थव्यवस्था का हिस्सा होने के कारण संभावित अमेरिकी मंदी का असर भारत पर भी जरूर पड़ेगा। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में इस आ॓र इशारा किया है। यूपीए सरकार 11 वीं पंचवर्षीय योजना में 9 से 10 फीसदी विकास दर हासिल करने के दावे जरूर कर रही है लेकिन इस बात के आसार अधिक हैं कि अगले साल विकास दर चालू वर्ष के 8.5 फीसदी के अनुमान से गिरकर 7 से 7.5 प्रतिशत तक पहुंच जाए। हालांकि इससे आसमान नहीं गिर पड़ेगा लेकिन अमेरिकी हाउंिसंग बुलबुले के फूटने के बाद भारत को अपने प्रॉपर्टी और रीयल एस्टेट बाजार के साथ शेयर और कुछ हद तक जिंस बाजार की ‘अतार्किक उत्साह’ सें भरी तेजी में बन रहे बुलबुले को लेकर जरूर सतर्क हो जाना चाहिए। भारतीय अर्थव्यवस्था को बाहर से ज्यादा खतरा अंदर से है। 2008 में भारतीय शेयर बाजार और रीयल एस्टेट पर सबकी निगाहें होंगी।
राष्ट्रीय सहारा से साभार
Monday, November 12, 2007
ज़्यादा घातक है आज का साम्राज्यवाद
ज्यादा घातक है आज का साम्राज्यवाद
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अष्टभुजा शुक्ल
अब डेढ़ सौ साल का कोई आदमी इस दुनिया में सदेह नहीं बचा है जिससे पूछा जाय कि 1857 के स्वाधीनता संग्राम का आंखों देखा हाल सुनाओ। अब वह मुकम्मल तौर पर इतिहास है जिसके बहुत सारे लिखित-अलिखित बयान पिछली तारीखों में दर्ज हैं। फिर भी वह हिन्दुस्तान का स्वाभिमान वर्ष है जिसमें किसी देश और समाज का मुक्तिकामी तुमुलनाद सुनाई देता है। मुट्ठीभर परजीवी उपनिवेशवादी शक्तियों की अजगरी जकड़न में कोई महादेश किस तरह पिसता चला गया और क्यों चला गया, इसकी शिनाख्त और आत्मालोचन के लिए 2007 भी आने वाले भविष्य में एक इतिहास की ही तरह रेखांकित किया जाएगा। 1857 की राष्ट्रीय क्रांति की हकीकत और फसाने को लेकर आज की तारीख में पुनर्मूल्यांकन या पुनर्पाठ का दौर जारी है तथा विचारकों का बौध्दिक संग्राम छिड़ा हुआ है। इस घमासान में 1857 से 1947 तक की रील का फ्लैशबैक विभिन्न पहलुओं को उजागर कर रहा है जिसे लेकर बुध्दिजीवियों के अपने-अपने पक्ष, तर्क एवं निहितार्थ हैं। एक वर्ग जहां इसे तत्कालीन सामंतवादी शक्तियों की निजी हितरक्षा का विक्षोभ मान रहा है तो दूसरा वर्ग जनसाधारण के राष्ट्रीय प्रतिरोध का उत्कट बलिदान। अन्य प्रकार के बुध्दिजीवी इस मूल्यांकन में ब्रिटिश हुकूमत की वकालत में उस स्तर की सोच तक पहुंच गए हैं जहां 'अंग्रेज देर से आए और पहले ही चले गए', का हाय-हाय और पश्चाताप प्रकट हो रहा है।
जो भी हो अलग-अलग ढपली का एक सामूहिक और सुखद राग यह है कि 1857 पूरी गंभीरता के साथ बहस एवं चर्चा के केंद्र में है। यह स्वाधीनता की कामना और ऊर्जा के साथ किसी भी राष्ट्र की संजीदा धड़कन का जीवंत प्रमाण है। इसके सापेक्ष 1947 की 50वीं स्वर्ण जयंती की बहसें सिर्फ इश्तिहार और चूं-चूं मुरब्बा साबित हुईं। इसके कारण सुस्पष्ट हैं। जो सत्ता की आजादी होती है, वही जनता की आजादी नहीं होती एवं जो सत्ताओं के संग्राम हैं, वहीं जनसंग्राम नहीं होते। संदेहास्पद आजादी को पाकर भी जनसाधारण उतना उल्लसित नहीं हो सकता जितना कि मुक्ति संग्राम के स्मरण मात्र से वह रोमांचित हो उठता है। इस विमर्श में जहां गदर के गद्दारों को भी याद रखने पर बल दिया जा रहा है वहीं राजनैतिक गुलामी के चोले में निहित सामाजिक गुलामी को भी उधेड़कर प्रतिगामी ताकतों को चिन्हित किया जा रहा है। नायकों और खलनायकों की पहचान के क्रम में 1857 का इतिहास सचमुच हमारी पिछली आंख का काम कर रहा है।
इसमें रत्ती भर संदेह नहीं कि भारत का विपुल जन समुदाय दोहरी गुलामी की प्रतारणा झेल रहा ता। ब्रिटिश गुलामी की भीतरी पर्तों में वर्ण व्यवस्था की व्याधि भी कम यातनाप्रद नहीं रही। मनुष्य की सामाजिक हिकारत और घृणा किसी कोढ़ से कम न थी। इसके फलस्वरूप जो लोक जीवन के जनविद्रोह और बलिदान रहे, वे वर्चस्वशाली वर्ग की प्रभुता के आगे ठीक से रेखांकित ही नहीं हो सके। फिर भी 1857 की ज्वाला और राष्ट्रीय स्वाभिमान को साहित्य में जो सबसे जोरदार और लोकप्रिय स्वर मिला वह 'चमक उठी सन् सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी' वाला ही था। यह हो सकता है कि अंग्रेजी उपनिवेश का प्रतिरोध समाज की फुटकर अस्मिताओं द्वारा अपने-अपने स्वार्थों के नाते ही हुआ हो किंतु भिन्न मन्तव्यों एवं स्थानों से उठी हुईं चिनगारियां संपूर्ण राष्ट्रीय विप्लव की शक्ल में घटित हो सकीं। इस ऐतिहासिक राज्य क्रांति में स्त्री, दलित, सामंत, सवर्ण, हिन्दू , मुस्लिम 'एक प्रान, दुई गात' थे। 1957 में ही जन्में हिन्दी साहित्य के एक ऐतिहासिक व्यक्ति बाबू अयोध्या प्रसाद खत्री का भी जन्म हुआ जिन्होंने गद्य-पद्य (खड़ी बोली और ब्रजभाषा) की एक भाषा अर्थात खड़ी बोली करने का आह्वान किया था। जिसका ग्रियर्सन के साथ भारतेन्दु मंडल के अनेक लेखकों ने प्रतिवाद किया तो फ्रेडरिक पिन्काट ने समर्थन। इस दृष्टि से यह भाषा, धर्म, जाति, राज्य आदि क्षेत्रीयताओं के सामूहिक उद्धोष का नवजागरण था 1857। लेकिन लक्ष्मीबाई के मर्दाने व्यक्तित्व के पीछे ऊदा देवी, झलकारी बाई आदि वंचित समूहों की क्रांति नेत्रियों का अवदान काफी बाद में आंकने की बाध्यता तभी हुई जब अवर्णों के भीतर अपनी अस्मिता का तीव्र राजनैतिक, सामाजिक और शैक्षणिक बोध हुआ। उपनिवेशवाद के विरूध्द मुक्ति संग्राम में उनकी जितनी बढ़-चढ़कर भागीदारी थी उससे कम लोहा उन्हें अपने समाज की वर्ण व्यवस्था से भी नहीं लेना पड़ा। पूर्व में पेरियार के सामाजिक विद्रोह को आत्मसात करके बेशक डॉ. भीमराव अंबेडकर ने जिस वैचारिक चेतना का सूत्रपात किया उससे भारतीय समाज के दलित और वंचित वर्ग में एक नई जागृति आई। किंतु इसका सामाजिक सत्यापन एवं क्रियान्वयन स्व. कांशीराम की प्रेरणा, सूझबूझ और राजनीतिक सक्रियता से ही संभव हो सका। आरंभ में उन्होंने सवर्ण मानसिकता के विरूध्द आवश्यक आक्रोश पैदा करके दलितों का जैसा ध्रुवीकरण किया, उसके अतिरिक्त इस चिर-रूढ़ समाज को आंदोलित करने का कोई दूसरा चारा ही न था।
विधिक रूप से स्वाधीन हो जाने के बावजूद दलितों और दलितों में भी दलित स्त्रियों की सामाजिक स्थिति भारतीय वर्ण-व्यवस्था की शिकार रही। किंतु तेजी से घटित हो रहे परिवर्तनों ने न केवल इन समूहों को मुखर बनाया बल्कि उनके भीतर अपनी अस्मिता के प्रति ऐसी अदमनीय कामना उत्पन्न की कि संदेहास्पद आजादी बहुत कुछ चरितार्थ होने लगी। कांशीराम की उसी प्रेरणा से लैस होकर अपनी राजनैतिक दूरदर्शिता और आत्मबल की बदौलत मायावती ने तताम पुरूष-सत्ताओं के सिंहनाद को फुस्स कर दिया और पूर्ण बहुमत के साथ उत्तर प्रदेश की सत्ता पर आरूढ़ होकर तमाम अटकलों को 2007 में नकार दिया। 2007 में ही आजाद भारत राष्ट्रपति चुनाव के लिए भी उल्लेखनीय हो गया। महामहिम पद के लिए पहली बार ऐसी गर्दिश मची। यहां यह भी ध्यातव्य है कि पिछले राष्ट्रपति चुनाव में नेताजी सुभाषचंद्र बोस की एक कमांडर कैप्टन लक्ष्मी सहगल का भी नाम तेजी के साथ उभरा था, तथापि डॉ. कलाम एक सम्मानित और लोकप्रिय राष्ट्रपति सिध्द हुए। 2007 के राष्ट्रपति चुनाव में मल्ल-प्रतिमल्ल जैसे आरोप-प्रत्यारोप तो खूब हुए लेकिन युगल प्रत्याशियों के सपनों को गौर से नहीं देखा गया। संप्रति महामहिम प्रतिभा पाटिल ने चुनाव पूर्व जिक्र किया था कि स्वामी लेखराज ने उनसे सपने में कहा था कि 'तुम्हें आने वाले समय में देश के लिए महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व निभाना है।' आश्चर्य कि उनके ऐसे इलहाम पर तत्वदर्शी वामपंथियों को भी कोई एतराज नहीं हुआ। फिलहाल, प्रतिभा जी का सपना पूरा हो गया है। उन्हें यह भी जानना चाहिए कि देश की हर स्त्री का सपना राष्ट्रपति बनने का ही नहीं होता। अत: उनके छोटे-छोटे सपने यदि टूटने, रौंदने और बिखरने से बच सकें तो महिला राष्ट्रपति का पद और गौरवान्वित होगा। इसके बरक्स स्त्री-चेतना का विस्फोट इस कदर भी हो रहा है कि कुछ तथाकथित महिला संगठनों ने 'राष्ट्रपति' शब्द को पुरूष मानसिकता की देन बताते हुए इसे बदलने के लिए हल्ला मचाया है। दरअसल ये महिलाएं खुद पति-परंपरा से उपजी जान पड़ती हैं अन्यथा कोई भी पद लिंग, जाति अथवा धर्म वाहक नहीं होता।
उदारीकरण, बाजारीकरण और प्रचारीकरण की महालीला के बीच कन्या भू्रण हत्या, दहेज हत्या, यौन उत्पीड़न, शोषण, आत्महत्या जैसी शर्मनाक घटनाओं में लगातार इजाफा हो रहा है। तो दूसरी ओर नई पीढ़ी के बीच शिल्पा शेट्टियां, सहस्राब्दि के महानायकों, मास्टर ब्लास्टरों आदि की दीवानगी ने मुक्ति संग्राम के नायकों और योध्दाओं के त्याग और बलिदान को लगभग नजरअंदाज कर दिया है। अपने इतिहास की यह आत्महंता विस्मृति चिंताजनक है। स्वतंत्र हिन्दुस्तान के 2007 में हमें 1857 का एक नया चश्मा मिला है। देखने, परखने, पुनर्विचारने और प्रगतिशील भारत के निर्माण में हमें इसका सदुपयोग करना चाहिए। यह देखते हुए कि 1857 के एकांगी साम्राज्यवाद की तुलना में आज का साम्राज्यवाद बहुआयामी और ज्यादा घातक है।
मीडिया विमर्श से साभार
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अष्टभुजा शुक्ल
अब डेढ़ सौ साल का कोई आदमी इस दुनिया में सदेह नहीं बचा है जिससे पूछा जाय कि 1857 के स्वाधीनता संग्राम का आंखों देखा हाल सुनाओ। अब वह मुकम्मल तौर पर इतिहास है जिसके बहुत सारे लिखित-अलिखित बयान पिछली तारीखों में दर्ज हैं। फिर भी वह हिन्दुस्तान का स्वाभिमान वर्ष है जिसमें किसी देश और समाज का मुक्तिकामी तुमुलनाद सुनाई देता है। मुट्ठीभर परजीवी उपनिवेशवादी शक्तियों की अजगरी जकड़न में कोई महादेश किस तरह पिसता चला गया और क्यों चला गया, इसकी शिनाख्त और आत्मालोचन के लिए 2007 भी आने वाले भविष्य में एक इतिहास की ही तरह रेखांकित किया जाएगा। 1857 की राष्ट्रीय क्रांति की हकीकत और फसाने को लेकर आज की तारीख में पुनर्मूल्यांकन या पुनर्पाठ का दौर जारी है तथा विचारकों का बौध्दिक संग्राम छिड़ा हुआ है। इस घमासान में 1857 से 1947 तक की रील का फ्लैशबैक विभिन्न पहलुओं को उजागर कर रहा है जिसे लेकर बुध्दिजीवियों के अपने-अपने पक्ष, तर्क एवं निहितार्थ हैं। एक वर्ग जहां इसे तत्कालीन सामंतवादी शक्तियों की निजी हितरक्षा का विक्षोभ मान रहा है तो दूसरा वर्ग जनसाधारण के राष्ट्रीय प्रतिरोध का उत्कट बलिदान। अन्य प्रकार के बुध्दिजीवी इस मूल्यांकन में ब्रिटिश हुकूमत की वकालत में उस स्तर की सोच तक पहुंच गए हैं जहां 'अंग्रेज देर से आए और पहले ही चले गए', का हाय-हाय और पश्चाताप प्रकट हो रहा है।
जो भी हो अलग-अलग ढपली का एक सामूहिक और सुखद राग यह है कि 1857 पूरी गंभीरता के साथ बहस एवं चर्चा के केंद्र में है। यह स्वाधीनता की कामना और ऊर्जा के साथ किसी भी राष्ट्र की संजीदा धड़कन का जीवंत प्रमाण है। इसके सापेक्ष 1947 की 50वीं स्वर्ण जयंती की बहसें सिर्फ इश्तिहार और चूं-चूं मुरब्बा साबित हुईं। इसके कारण सुस्पष्ट हैं। जो सत्ता की आजादी होती है, वही जनता की आजादी नहीं होती एवं जो सत्ताओं के संग्राम हैं, वहीं जनसंग्राम नहीं होते। संदेहास्पद आजादी को पाकर भी जनसाधारण उतना उल्लसित नहीं हो सकता जितना कि मुक्ति संग्राम के स्मरण मात्र से वह रोमांचित हो उठता है। इस विमर्श में जहां गदर के गद्दारों को भी याद रखने पर बल दिया जा रहा है वहीं राजनैतिक गुलामी के चोले में निहित सामाजिक गुलामी को भी उधेड़कर प्रतिगामी ताकतों को चिन्हित किया जा रहा है। नायकों और खलनायकों की पहचान के क्रम में 1857 का इतिहास सचमुच हमारी पिछली आंख का काम कर रहा है।
इसमें रत्ती भर संदेह नहीं कि भारत का विपुल जन समुदाय दोहरी गुलामी की प्रतारणा झेल रहा ता। ब्रिटिश गुलामी की भीतरी पर्तों में वर्ण व्यवस्था की व्याधि भी कम यातनाप्रद नहीं रही। मनुष्य की सामाजिक हिकारत और घृणा किसी कोढ़ से कम न थी। इसके फलस्वरूप जो लोक जीवन के जनविद्रोह और बलिदान रहे, वे वर्चस्वशाली वर्ग की प्रभुता के आगे ठीक से रेखांकित ही नहीं हो सके। फिर भी 1857 की ज्वाला और राष्ट्रीय स्वाभिमान को साहित्य में जो सबसे जोरदार और लोकप्रिय स्वर मिला वह 'चमक उठी सन् सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी' वाला ही था। यह हो सकता है कि अंग्रेजी उपनिवेश का प्रतिरोध समाज की फुटकर अस्मिताओं द्वारा अपने-अपने स्वार्थों के नाते ही हुआ हो किंतु भिन्न मन्तव्यों एवं स्थानों से उठी हुईं चिनगारियां संपूर्ण राष्ट्रीय विप्लव की शक्ल में घटित हो सकीं। इस ऐतिहासिक राज्य क्रांति में स्त्री, दलित, सामंत, सवर्ण, हिन्दू , मुस्लिम 'एक प्रान, दुई गात' थे। 1957 में ही जन्में हिन्दी साहित्य के एक ऐतिहासिक व्यक्ति बाबू अयोध्या प्रसाद खत्री का भी जन्म हुआ जिन्होंने गद्य-पद्य (खड़ी बोली और ब्रजभाषा) की एक भाषा अर्थात खड़ी बोली करने का आह्वान किया था। जिसका ग्रियर्सन के साथ भारतेन्दु मंडल के अनेक लेखकों ने प्रतिवाद किया तो फ्रेडरिक पिन्काट ने समर्थन। इस दृष्टि से यह भाषा, धर्म, जाति, राज्य आदि क्षेत्रीयताओं के सामूहिक उद्धोष का नवजागरण था 1857। लेकिन लक्ष्मीबाई के मर्दाने व्यक्तित्व के पीछे ऊदा देवी, झलकारी बाई आदि वंचित समूहों की क्रांति नेत्रियों का अवदान काफी बाद में आंकने की बाध्यता तभी हुई जब अवर्णों के भीतर अपनी अस्मिता का तीव्र राजनैतिक, सामाजिक और शैक्षणिक बोध हुआ। उपनिवेशवाद के विरूध्द मुक्ति संग्राम में उनकी जितनी बढ़-चढ़कर भागीदारी थी उससे कम लोहा उन्हें अपने समाज की वर्ण व्यवस्था से भी नहीं लेना पड़ा। पूर्व में पेरियार के सामाजिक विद्रोह को आत्मसात करके बेशक डॉ. भीमराव अंबेडकर ने जिस वैचारिक चेतना का सूत्रपात किया उससे भारतीय समाज के दलित और वंचित वर्ग में एक नई जागृति आई। किंतु इसका सामाजिक सत्यापन एवं क्रियान्वयन स्व. कांशीराम की प्रेरणा, सूझबूझ और राजनीतिक सक्रियता से ही संभव हो सका। आरंभ में उन्होंने सवर्ण मानसिकता के विरूध्द आवश्यक आक्रोश पैदा करके दलितों का जैसा ध्रुवीकरण किया, उसके अतिरिक्त इस चिर-रूढ़ समाज को आंदोलित करने का कोई दूसरा चारा ही न था।
विधिक रूप से स्वाधीन हो जाने के बावजूद दलितों और दलितों में भी दलित स्त्रियों की सामाजिक स्थिति भारतीय वर्ण-व्यवस्था की शिकार रही। किंतु तेजी से घटित हो रहे परिवर्तनों ने न केवल इन समूहों को मुखर बनाया बल्कि उनके भीतर अपनी अस्मिता के प्रति ऐसी अदमनीय कामना उत्पन्न की कि संदेहास्पद आजादी बहुत कुछ चरितार्थ होने लगी। कांशीराम की उसी प्रेरणा से लैस होकर अपनी राजनैतिक दूरदर्शिता और आत्मबल की बदौलत मायावती ने तताम पुरूष-सत्ताओं के सिंहनाद को फुस्स कर दिया और पूर्ण बहुमत के साथ उत्तर प्रदेश की सत्ता पर आरूढ़ होकर तमाम अटकलों को 2007 में नकार दिया। 2007 में ही आजाद भारत राष्ट्रपति चुनाव के लिए भी उल्लेखनीय हो गया। महामहिम पद के लिए पहली बार ऐसी गर्दिश मची। यहां यह भी ध्यातव्य है कि पिछले राष्ट्रपति चुनाव में नेताजी सुभाषचंद्र बोस की एक कमांडर कैप्टन लक्ष्मी सहगल का भी नाम तेजी के साथ उभरा था, तथापि डॉ. कलाम एक सम्मानित और लोकप्रिय राष्ट्रपति सिध्द हुए। 2007 के राष्ट्रपति चुनाव में मल्ल-प्रतिमल्ल जैसे आरोप-प्रत्यारोप तो खूब हुए लेकिन युगल प्रत्याशियों के सपनों को गौर से नहीं देखा गया। संप्रति महामहिम प्रतिभा पाटिल ने चुनाव पूर्व जिक्र किया था कि स्वामी लेखराज ने उनसे सपने में कहा था कि 'तुम्हें आने वाले समय में देश के लिए महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व निभाना है।' आश्चर्य कि उनके ऐसे इलहाम पर तत्वदर्शी वामपंथियों को भी कोई एतराज नहीं हुआ। फिलहाल, प्रतिभा जी का सपना पूरा हो गया है। उन्हें यह भी जानना चाहिए कि देश की हर स्त्री का सपना राष्ट्रपति बनने का ही नहीं होता। अत: उनके छोटे-छोटे सपने यदि टूटने, रौंदने और बिखरने से बच सकें तो महिला राष्ट्रपति का पद और गौरवान्वित होगा। इसके बरक्स स्त्री-चेतना का विस्फोट इस कदर भी हो रहा है कि कुछ तथाकथित महिला संगठनों ने 'राष्ट्रपति' शब्द को पुरूष मानसिकता की देन बताते हुए इसे बदलने के लिए हल्ला मचाया है। दरअसल ये महिलाएं खुद पति-परंपरा से उपजी जान पड़ती हैं अन्यथा कोई भी पद लिंग, जाति अथवा धर्म वाहक नहीं होता।
उदारीकरण, बाजारीकरण और प्रचारीकरण की महालीला के बीच कन्या भू्रण हत्या, दहेज हत्या, यौन उत्पीड़न, शोषण, आत्महत्या जैसी शर्मनाक घटनाओं में लगातार इजाफा हो रहा है। तो दूसरी ओर नई पीढ़ी के बीच शिल्पा शेट्टियां, सहस्राब्दि के महानायकों, मास्टर ब्लास्टरों आदि की दीवानगी ने मुक्ति संग्राम के नायकों और योध्दाओं के त्याग और बलिदान को लगभग नजरअंदाज कर दिया है। अपने इतिहास की यह आत्महंता विस्मृति चिंताजनक है। स्वतंत्र हिन्दुस्तान के 2007 में हमें 1857 का एक नया चश्मा मिला है। देखने, परखने, पुनर्विचारने और प्रगतिशील भारत के निर्माण में हमें इसका सदुपयोग करना चाहिए। यह देखते हुए कि 1857 के एकांगी साम्राज्यवाद की तुलना में आज का साम्राज्यवाद बहुआयामी और ज्यादा घातक है।
मीडिया विमर्श से साभार
Friday, September 14, 2007
भूगोल
पन्ने पर एक तरफ
कभी लिखी थी एक कविता समय सत्य
और उसमे लिखा था
सबसे अहम सवालों के बारे में।
पन्ने पर दूसरी तरफ
पत्नी ने लिखी एक और ज़रूरी कविता-
धनियाँ का पत्ता, मिर्च, अदरक,
लहसुन, जीरा, प्याज और एक किलो आलू ।
अब जबकि समय भी बदल गया है और उसका सत्य भी
और तमाम ज़रूरी सवाल
हाशियों पर चुटकुला बन रहे हैं,
ऊब और अनास्था के बीच
छिपाते हुए थोडी-सी आंच
और गढ़ते हुए जीने का कोई माकूल तर्क
दोनों कविताओं के बीच का भूगोल
हाँफते हुए नाप रहा हूँ।
राजेश चन्द्र
कभी लिखी थी एक कविता समय सत्य
और उसमे लिखा था
सबसे अहम सवालों के बारे में।
पन्ने पर दूसरी तरफ
पत्नी ने लिखी एक और ज़रूरी कविता-
धनियाँ का पत्ता, मिर्च, अदरक,
लहसुन, जीरा, प्याज और एक किलो आलू ।
अब जबकि समय भी बदल गया है और उसका सत्य भी
और तमाम ज़रूरी सवाल
हाशियों पर चुटकुला बन रहे हैं,
ऊब और अनास्था के बीच
छिपाते हुए थोडी-सी आंच
और गढ़ते हुए जीने का कोई माकूल तर्क
दोनों कविताओं के बीच का भूगोल
हाँफते हुए नाप रहा हूँ।
राजेश चन्द्र
Friday, September 7, 2007
फिर लौटेंगे तालिबान
यह मानसून फिर से
बीजों के बंद कपाट खोलेगानवांकुर फूटेंगे
धीरे-धीरे पसर जायेगी सांस की धूप
झमाझम बारिश की तर्ज़ पर झूमते हुए
इन्द्रधनुषी अलंकारों से सुसज्जित
दिशाओं से उतरेंगे
केसर के रंग के ध्वजारोही
और आतंकित होने का अवकाश दिए बिना ही
वामन डग भरते नांप लेंगे
ज़्यादा से ज़्यादा उजास ।
साँसों को पहली अचरज से ताकतीं अबोध आँखें
जान भी नहीं पाएंगी
कि कब उनके सामने खडी हो गयी
एक दुर्भेद्य दीवार और जब तन्द्रा टूटेगी
उन अनभ्यस्त हाथों मेँ होगी
अनुशासन की कोई प्रावेशिक किताब
धीरे-धीरे जो उन्हें भूलभुलैयों की तरफ ले जायेगी
पहले उन्हें सड़क की बाईं या दाईं तरफ चलना सिखाया जायेगा
फिर रंगों की सुरक्षित परिभाषा दी जायेगी
इस तरह जब तैयार कर लेंगे वे अपनी चारदीवारियां
और गले मिलते हुए हरियाली गायेंगे
दबे पाँव , चौकन्ने
संसद, विधानसभाओं ,मठों, मंदिरों
अकादमियों, सम्मेलनों, परिषदों और सभा भवनों की
आरामदेह कुर्सियों से कूदेंगे
कई-कई १०८,१००८ प्रख्यात, सुकीर्त
मार्त्तंड , प्रचंड
स्वामी,आचार्य ,जोशी , मोदी और वाजपेयी
और लीलते -चरते सारी हरियाली को
प्रमुदित मन से आप्त वाक्यों मेँ डकारेंगे-
जो अमरीका के साथ नहीं है-आतंकवादी है
जो भाजपा के साथ नहीं है-देशद्रोही है
जो हिंदू नहीं है-विदेशी जासूस है
फिर वे स्त्रियों से कहेंगे-घर के अन्दर जाओ
घरों से फौरन हटा ली जायेंगी खिड़कियाँ
और दरवाजे बाहर से बंद रहेंगे
फिर वे शूद्रों के गले मेँ ढोल बांधकर कहेंगे
गाँव से बाहर जाओ
और तब मौत की तरह के ख़ुफ़िया सन्नाटे को तोड़ता
तेजोमय चिर-प्रतीक्षित अटल रामराज्य आएगा
दुंदुभी बजाता, शंखनाद करता, जयघोष कराता
और तब एक गौरवमय अतीत वाले
आध्यात्मिक और सांस्कृतिक हिंदू राष्ट्र की
कटी हुई जीभ वाली भूखी भीड़
या तो पूंछ हिलायेगी, या फिर झंडी
और लाउडस्पीकर की गगनभेदी चिल्लाहट
"जय श्री राम " के साथ
पीठ पर कोड़े खाता
एक पूरा का पूरा देश सुर मिलाएगा-
गों-गों-गों ।
राजेश चन्द्र
१७-०१-२००२
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