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Friday, July 25, 2008

कैसे नियंत्रित होगी महंगाई

भारत डोगरा
महंगाई के बारे में सरकारी स्तर पर यह बार-बार कहा गया है कि यह विश्व बाजार में आई तेल व खाघ उत्पादों की कीमत में वृद्धि जैसे बाहरी मुद्दों से अधिक प्रभावित है। यह सच है कि तेल व खाघ उत्पादों की वृद्धि विश्व स्तर हुई है पर इसका अर्थ यह कतई नही है कि महंगाई व उसके दुष्परिणामों को नियंत्रित करना हमारे हाथ में नहीं है। सच्चाई तो यह है कि यदि खाघ ऊर्जा व्यापार व वित्त नीतियों में पहले से सुधार किए जाते तो महंगाई को काफी हद तक रोका जा सकता था। पर सरकार ने दीर्घकालीन अनुचित नीतियां अपनाई और वह काफी देर तक महंगाई के खतरे के प्रति उदासीन रही। इस वर्ष फरवरी में वार्षिक आर्थिक सर्वेक्षण प्रस्तुत करते समय तक महंगाई के खतरे के प्रति सरकार अनभिज्ञ बनी रही और उसने बहुत विश्वास से कहा कि महंगाई के तेज होने की संभावना नहीं है। ध्यान रहे कि इस समय तक विश्व में तेल व खाघ संकट की विकटता स्पष्ट हो चुकी थी। आज जब सरकार महंगाई के लिए बाहरी दबावों को जिम्मेदार बताती है तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि सरकार इस विषय पर समय पर सचेत क्यों नहीं हुई और उसने जरूरी कदम क्यों नहीं उठाए।महंगाई नियंत्रण को लेकर जिस कठिनाई की या जादू की छड़ी उपलब्ध न होने की बात जो कि प्राय: की जाती है, वह चर्चा केवल अल्पकालीन नीतियों के सन्दर्भ में होने के कारण है। यदि दीर्घकालीन नीतियां सही हैं तो ऐसी कठिनाई नहीं आएंगी क्योंकि बाहर से आने वाले किसी संकट का सामना करने के लिए भी हमारा रक्षा कवच तैयार होगा। हमारे देश ने जो दीर्घकालीन नीतियां सही दिशा में अपनाई हैं, उनका लाभ हमें आज भी मिलता है। हमने अनाज के बफर स्टाक रखने की नीति अपनाई, गोदामों में पर्याप्त अनाज रखा, सार्वजनिक वितरण प्रणाली का विस्तार देश भर में किया, सबसे गरीब परिवारों को विशेष तौर पर अधिक सस्ते अनाज के राशन कार्ड दिए। इन नीतियों का कुछ न कुछ लाभ आज भी मिलता है। यही कारण है कि आज हमारा खाघ संकट उतना विकट नहीं है और खाघ कीमतें उतनी नहीं बढ़ी हैं जितनी कि कई अन्य देशों में।पर दुख की बात यह है कि खाघ सुरक्षा की दिशा में हमारी तैयारी कभी पूरी नहीं हुई। एक मुख्य कमी यह रही है कि खाघ उत्पादन बढ़ाने के खर्चीले तौर-तरीके अपनाए गए। ये तकनीकें टिकाऊ नहीं थीं और इनके निरंतर अधिक महंगे होते जाने की संभावना थी। दूसरी कमी यह बनी रही कि खाघान्न उत्पादन बढ़ाने के प्रयास कुछ विशेष स्थानों पर केन्द्रित रहे। इस तरह एक आ॓र तो खाघान्न उत्पादन महंगा हुआ तथा दूसरी आ॓र इसे कुछ अधिक उत्पादन के स्थानों से देशभर में पहुंचाने का खर्चा बढ़ गया। इस तरह किसान को विशेष लाभ दिए बिना ही खाघान्न की कीमत महंगी होने लगी। पर सरकार ने अरबों रूपए की सब्सिडी देकर यह प्रयास किया कि खाघान्न की कीमत आम लोगों के लिए सहनीय रहे। इस प्रयास में भी तीन कारणों से छेद होने लगे। पहली समस्या तो यह थी कि सरकारी सब्सिडी पर आधारित सार्वजनिक वितरण प्रणाली में भ्रष्टाचार बहुत बढ़ गया और जो लाभ सरकार आम लोगों, विशेषकर सबसे गरीब परिवारों को देना चाहती थी उस लाभ को असरदार लोग हड़पने लगे। दूसरी कठिनाई यह आई कि सरकार पर सब्सिडी कम करने या एक सीमा से आगे न बढ़ने देने का दबाव भी पड़ने लगा। तीसरी समस्या यह हुई कि सरकार की अनुचित नीतियों के कारण अनाज की सरकारी खरीद कम होने लगी और निजी कंपनियों की खरीद बढ़ने लगी। अत: सरकारी गोदामों में अनाज कम होने लगा।हाल के समय में कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खेती में वर्चस्व बढ़ने से बीज, कीटनाशक दवाओं आदि पर खर्च और तेजी से बढ़ा। उधर तेल तथा गैस की कीमत विश्व बाजार में तेजी से बढ़ी तो इनसे उत्पादित रासायनिक खाद, पंपसेट व ट्रैक्टर के लिए जरूरी डीजल का खर्च भी बढ़ा। विश्व स्तर पर बहुत सी खाघ उत्पादन करने वाली भूमि का उपयोग बायोडीजल की फसलों के लिए होने लगा तथा तैयार खाघ फसलों को खाघ के रूप में बेचने के स्थान पर उन्हें बायोडीजल बनाने की फैक्ट्रियों में भेजा जाने लगा। इन मिले-जुले कारणों से अनेक खाघ उत्पादों के बाजार में जबरदस्त तेजी आई। जरूरत इस बात की थी कि सरकार खाघ उत्पादन बढ़ाने के लिए सस्ती व आत्मनिर्भर तकनीकों पर ध्यान केन्द्रित करती व उत्पादन बढ़ाने के प्रयासों को अधिक पिछड़े व गरीब क्षेत्रों में अधिक सशक्त करती। इस तरह एक आ॓र तो खाघ उत्पादन की लागत कम होती, साथ ही खाघ वितरण की लागत भी कम होती। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए अधिकांश अनाज स्थानीय स्तर पर ही उचित कीमत पर खरीदा जाता और उसे गरीब परिवारों तक पहुंचाने के कार्य को सरकार व सजग नागरिकों की निगरानी में किया जाता। वैसे तो पूरी सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार जरूरी है पर गरीबी की रेखा के नीचे के (बी।पी।एल।) व सबसे निर्धन (अंत्योदय) परिवारों के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली सुधारना और भी जरूरी है। अनाज की सरकारी खरीद और गोदामों में पर्याप्त भंडार रखने को उच्चतम प्राथमिकता दी जानी चाहिए थी ताकि उसमें कमी की कोई शिकायत उपलब्ध न हो। तिलहन व दलहन में देश को आत्मनिर्भर बनाना निश्चित तौर पर संभव है। इस पर पर्याप्त ध्यान देकर दालों व खाघ तेलों की कीमत वृद्धि को रोका जा सकता था। इस समय भी बहुत देर नहीं हुई है। यदि सरकार उचित प्राथमिकताओं को अपनाए तथा साथ ही मुनाफाखोरों-सट्टेबाजों जैसे तत्त्वों पर कड़ा नियंत्रण रखे तो देश के सभी लोगों के लिए उचित कीमत पर खाघ उपलब्ध करवाना संभव है।इसी तरह तेल के आयात पर अधिक निर्भरता को देखते हुए हमें तेल बचाने वाली नीतियों पर अधिक जोर देना चाहिए था। विकास का ऐसा माडल अपनाना चाहिए था जो तेल की कम खपत करे, उस पर कम आश्रित हो। फिलहाल जो स्थिति है उसके आधार पर तो यही स्वीकार करना होगा कि हम तेल के आयात पर बहुत निर्भर हैं और तेल की कीमतें बहुत तेजी से बढ़ रही हैं। अत: तेल की खपत को कम करने व वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोत विकसित करने पर हमें अधिक ध्यान देना चाहिए।महंगाई के बढ़ते दौर में इस आ॓र पहले से भी अधिक ध्यान देने की जरूरत है कि गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों तथा समाज के विभिन्न जरूरतमंद वर्गों को राहत देने वाली परियोजनाओं के क्रियान्वयन को बेहतर किया जाए, विशेषकर गांवों में रोजगार गारंटी योजना में भ्रष्टाचार दूर करने व इसे बेहतर बनाने पर विशेष ध्यान देना जरूरी है ताकि बढ़ती महंगाई के समय में गरीब लोग अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा कर सकें।
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Tuesday, July 22, 2008

ग्लोबल वार्मिंग के लिए कार्बन तत्व कितने जिम्मेदार

भगवती प्रसाद डोभाल
हाल ही में पश्चिमी देशों ने एक स्वर से भारत और चीन को मौसम परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग का मुख्य कारण माना है, लेकिन इसके ठीक विपरीत रूसी वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन के कुछ और ही कारण मानते हैं। वे कार्बन डायऑक्साइड को किसी भी रूप में ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार नहीं मानते हैं। क्यूटो संधि में धरती की तपन का कारण कार्बन डायआक्साइड उर्त्सजन ही माना गया। लेकिन रूसी वैज्ञानिकों का मानना है कि बिना वैज्ञानिक तथ्यों का परीक्षण किये कार्बन को इसके लिए दोष देना उचित नहीं है। रूसी वैज्ञानिक आंद्रे कापिस्ता कहते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से कार्बन डाइआक्साइड वातावरण में है न कि कार्बन डाइआक्साइड की वजह से ग्लोबल वार्मिंग।
रूसी अनुसंधानवेत्ता अपने इस परिणाम पर तब पहुंचे, जब वे अंटाकर्टिका में साढ़े तीन किलो मीटर बर्फ के अंदर गहराई में विभिन्न पर्तों के नमूने इकठ्ठा कर रहे थे। प्राचीन काल में बर्फ गिरते और जमते समय हवा के बुलबुले ग्लेशियर के भीतर कैद हो गये थे, जो उस काल के पृथ्वी के वातावरण की सही जानकारी देते हैं। इन बुलबुलों के अध्ययन से बहुत सारी जानकारियां सामने आई हैं। यह अध्ययन धरती के पिछले चालीस हजार वर्षों की वातावरण की पूरी जानकारी देता है। इसमें उन्होंने पाया कि वातावरण में कार्बन की मात्रा समय-समय पर भिन्न-भिन्न रही है। पूरे इतिहास में पांच सौ से छह सौ वर्षों के बाद वातावरण गर्म होने पर कार्बन डाइआक्साइड की मात्रा बढ़ी है। इसलिए वे मानते हैं कि ग्रीन हाउस गैसों की वातावरण में सांद्रता ही मुख्य कारण है ग्लोबल वार्मिंग का।वे यह भी मानते हैं कि ग्रीन हाउस प्रभाव का मुख्य कारण पानी का वाष्पन ही है जो वातावरण में कार्बन डाइआक्साइड से दस गुणा अधिक है। यदि धरती से पूरी कार्बन डाइआक्साइड हटा दी जाए, तब भी धरती का तापमान इतना गिर नहीं सकता कि धरती ठंडी हो जाए। इस बात पर भैतिकविज्ञानी ब्लादिमिर बाशकृतसेव का विशेष मत है। रूसी विज्ञान संस्थान के आ॓लेग सोरोख्तिन, जो सागर विशेषज्ञ हैं के साथ–साथ अन्य वैज्ञानिकों का भी मानना है कि पृथ्वी का मौसम परिवर्तन एक प्राकृतिक कारण है। जैसे सौर गतिविधि, पृथ्वी के अक्ष में हलचल, सागर की तरंगों में बदलाव, समुद्र की सतह पर नमक के पानी की विरलता और सघनता का होना। ऐसे बहुत से कारण हैं ग्लोबल वार्मिंग के। औघोगिक उर्त्सजन इस स्थिति में मौसम परिवर्तन पर कोई विशेष प्रभाव नहीं डालता। पृथ्वी पर कार्बन डाइआक्साइड की मात्रा का बढ़ना पृथ्वी में जीवन के लिए अच्छा है। डा। सोरोख्तिन तर्क देते हैं कि इससे फसलों की पैदावार अच्छी होती है और वनों की वृद्धि भी तेजी से होती है।
इतिहास में बहुत समय ऐसा भी रहा जब कार्बन डाइआक्साइड की मत्रा पृथ्वी पर आज से लाखों गुणा अधिक रही, और जीवन का विकास सफलतापूर्वक चलता रहा। इस बात को रूस के रसायन भौतिकी विज्ञान के अरूत्यानोव ने भी स्वीकार किया है।
चार वर्ष पहले रूसी वैज्ञानिकों ने सलाह दी थी कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर राष्ट्रपति पुतिन इस बात को दुनिया के बतायें कि पृथ्वी को गर्म करने में कार्बन तत्व जिम्मेदार नहीं है। लेकिन पुतिन ने इस बात को राजनीतिक कारणों से अनसुना कर रूस की संसद में क्यूटो संधि के पक्ष में वातावरण बनाया इसके पीछे तर्क यह था कि यदि मास्को संधि का समर्थन करेगा, तभी यूरोपियन यूनियन डब्लूटीआ॓ में सदस्यता के लिए समर्थन करेगी। रूस को इसकी आवश्यकता थी क्योंकि सोवियत संघ के बिखरने से वह बुरी तरह पस्त था, उसे मुक्त व्यापार में शामिल होने से अपनी अर्थव्यवस्था सुधारनी थी। इस रास्ते पर चलने के लिए उसे वैज्ञानिकों द्वारा दिये सुझावों को ठुकराना पड़ा।
डॉक्टर सोरोख्तिन का कहना है कि पृथ्वी के वातावरण में स्वयं एक स्व नियंत्रण प्रणाली है। उसी से तापमान घटता-बढ़ता रहता है। जब तापमान बढ़ता है, तब सागर का पानी तेजी से वाष्पित होकर घने बादलों को बनाता है और इतना बनाता है कि सूर्य की किरणें पृथ्वी तक पहुंचने से रूक जाती हैं , फलस्वरूप पृथ्वी की सतह का तापमान घटने लगता है। शिक्षा शास्त्री कपिस्ता तो क्यूटो संधि को सबसे बड़ा वैज्ञानिक घोटाला मानते हैं। रूसी वैज्ञानिकों का मानना है कि मंच से 1995 में मेड्रिड संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन से उन वैज्ञानिकों के दस्तावेजों को गायब किया गया जो भिन्न मत रखते थे। हां, सल्फर डाइआक्साइड, नइट्रोजन आक्साइड, भारी धातुओं और अन्य जहरीले पदार्थों के उत्सर्जन पर जरूर रोक लगानी चाहिए न कि कार्बन के उर्त्सजन पर, जिसके असर को सिद्ध भी नहीं किया गया।
यदि एक बार 1970 के वर्ष में चलें तब पता चला कि पृथ्वी का तापमान घट रहा है। सावधान किया गया कि हमें हिम युग की चुनौतियां झेलनी पड़ेगी।
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Monday, July 21, 2008

ये नावों को डुबाने वाले

विभांशु दिव्याल
जी हां, हमारा लोकतंत्र मंडी में है। नीलामी की खुली मंडी में। आइए, बतियाइए, जुतियाइए, झिंझोड़िए, फींचिए, फटकारिए, जो चाहे करिए मगर बोली लगाइए- एक गैरतन मरी हुई सरकार को जिंदा रखने के लिए उसके पक्ष में या फिर सारे नियम-तकाजों, सिद्धांत-मर्यादाओं-वैचारिकताओं को लात मार अवसर लाभ लेने के लिए एकजुट हुए सरकार गिराऊ मजमे के साथ खड़े होकर उसके विपक्ष में। जो भौंडा प्रहसन उद्घाटित हो रहा है उसमें अमेरिकी डील गायब है और अगर है भी तो सिर्फ एक बहाना बनकर। अन्यथा हर कोई अपनी-अपनी टुच्ची, आ॓छी, निजी डील के साथ डुल रहा है।
सरकार के प्रति विश्वास-अविश्वास के ये दिन बेशर्मी, झूठ, पाखंड, अवसरवाद, लालच, व्यक्तिगत लाभ, सत्तालोलुपता, सौदेबाजी और सट्टेबाजी से ऊब-चूब होते दिन हैं। जिन्हें लगता है कि संसद में शक्ति परीक्षण होते ही ये दिन अपनी वर्तमान लंपटता के कारण अतीत बन जाएंगे, वे गलत हैं। इन दिनों का असर भारतीय राजनीति और समाज पर काले साये की तरह दूर तक और देर तक मंडराता रहेगा। आखिर इस समय सांसदों को अपने-अपने पक्ष में खींचने की बेलगाम कोशिश में क्या कुछ ऐसा नहीं घट रहा जो इस देश की ईमानदार जनता को खटक नहीं रहा और उसे कचोट नहीं रहा?
एक पार्टी का सांसद मीडिया के सामने खुलकर कहता है कि उसके वोट के लिए उसे पच्चीस करोड़ का प्रस्ताव दिया गया है। हाल ही में पक्ष छोड़कर विपक्ष बनी पार्टी का एक सूत्रधार भरे मंच पर दुहराता है कि एक-एक सांसद की बोली पच्चीस करोड़ लगाई जा रही है। इसके उत्तर में लगभग विपक्ष से पाला बदल पक्ष में आये दल का प्रवक्ता कहता है कि उनके सांसदों को तीस करोड़ में खरीदा जा रहा है और केवल इतना ही नहीं गुंडों और माफियाओं द्वारा धमकाया भी जा रहा है। अब कौन तय करे कि कौन सही है कौन गलत, कौन सच कह रहा है और कौन झूठ? जनता और कुछ जाने या नहीं जाने, पच्चीस या तीस करोड़ को माने या नहीं माने, मगर वह पक्के तौर पर जानती है कि ऐसा होता रहा है और अब भी हो रहा है। जब इतने बड़े-बड़े माननीय, देश और लोकतंत्र को इतने कद्दावर भाग्यविधाता इतने भरोसे और विश्वास से यह बात कह रहे हैं तो उनकी बात पर अविश्वास करने का कारण?
अगर चर्चा इस पर हो कि मुसलमान इस अमेरिकी डील से खुश हैं या नहीं और हमारे दिग्गज राजनेता भारत के हित के बजाय डील को मुसलमान बनाम गैर-मुसलमान हित का डील बनाने पर उतर आयें तो अमेरिका क्या करे? अगर सांसदों का एक गुट इस आशय के साथ विचार करे कि सिख प्रधानमंत्री के पक्ष में जाना है या विरोध में तो इसमें देश का हित-अहित कहां दिखता है? अगर एक पार्टी का रहनुमा सीधे-सीधे कहे कि जो पार्टी उसकी अलग राज्य की मांग को स्वीकार कर लेगी वह उसी के पक्ष में हो जाएगा, तो इसमें भारत की अमेरिका परस्ती किस तरह प्रमाणित होती है? अगर छोटी-बड़ी पार्टियां पक्ष-विपक्ष में जाने के लिए पदों से लेकर प्रशासनिक तंत्र में पैठ बनाने की सौदेबाजी करें तो परमाणु करार के अच्छा या बुरा होने का मसला कैसे तय होता है?
और अब बात करें 543 की लोकसभा में चंद लघुदलिया, निर्दलिया और जेलिया सांसदों की। ये सब के सब तराजू के पासंग यकायक संसद शिरोमणि हो गये हैं। इनमें से कौन किसके पक्ष में पलड़ा झुकाने की कोशिश करेगा और क्यों, यह कोई नहीं जानता। लेकिन यह सब जानते हैं कि इनके फैसले में परमाणु करार के गुण-दोष दूर-दूर तक नहीं होंगे। आपको याद होंगे अपने गुरूजी शिबू सोरेन। ये वही गुरूजी हैं जिन्होंने मुद्रा सिद्धांत के आधार पर नरसिम्हा राव की सरकार बचाई थी। तब थोड़े नासमझ थे इसलिए पकड़ में आ गये थे, लेकिन तब से अब तक गंगा में कई साल बह गये हैं। अब फिर गुरूजी उसी भूमिका में हैं और उनके पत्ते निश्चित तौर पर जिस सोच-समझ के साथ खुलेंगे, उसमें यह कहीं नहीं होगा कि परमाणु करार की कौन सी धारा सही है और कौन सी गलत।
परमाणु करार पीछे छूट गया है। अब सत्ता बचाने और सत्ता छीनने का नंगा खेल जारी है। इस खेल में कोई भी पार्टी ऐसी नहीं है जो साबुत बची है। किसी भी पार्टी के सांसदों की निष्ठा खरी नहीं निकली। सब में अश्लील टूट-फूट हुई है। जिस सूत्रधार मार्क्सवादी पार्टी ने इस खेल की शुरूआत की वह टूटी भले न हो मगर दरार उसमें भी आ गई है। राष्ट्रवादी पार्टी को अपने कुनबे को एकजुट रखने के लिए बार-बार कोड़ा फटकारना पड़ रहा है, मगर कभी इस कोने से किसी के बिदकने की खबर उड़ जाती है तो कभी उस कोने से। और यह सब करार के समर्थन या विरोध के लिए नहीं हो रहा, अपने खुद के खाते-खजाने, गैर-ठिकाने साधने के लिए हो रहा है। देश, लोकतंत्र और देश की जनता के लिए नहीं अपने नंगे स्वार्र्थों के लिए हो रहा है। इसे वे भी जानते हैं जो यह खेल-खेल रहे हैं और वे भी जानते हैं जो यह खेल खिला रहे हैं। मीडिया लगातार डुगडुगी बजाकर यही बता रहा है।
जिस देश के लोकतंत्र को ऐसी आत्महंता राजनीति संचालित कर रही हो उसे अपने विनाश के लिए किसी अमेरिकी करार की क्या जरूरत? यहां तो भस्मासुर अपने सर पर हाथ रखकर नाच रहा है। हजार अमेरिका इस विशाल राष्ट्र की अस्मिता को इतनी चोट नहीं पहुंचा सकते जितनी कि स्वयं इसके कर्णधार पहुंचा रहे हैं। हां, इस भारत-अमेरिका परमाणु करार ने इस देश की लोकतांत्रिक नंगई को एक बार फिर पूरी तरह नंगा कर दिया है। करार हो या न हो मगर इस नंगई के चलते इस देश को डूबने से कौन बचा सकता है। एक सुप्रसिद्ध उर्दू शेर का भौंडा हिंदी अनुवाद यूं है
-इन्हें कौन रोकेगा डूब जाने से
ये वे हैं जो नावों में डूब जाते हैं।
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Thursday, July 17, 2008

बढ़ रहा है अर्थव्यवस्था के क्रैश करने का खतरा

आनंद प्रधान
अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों से आ रहे संकेतों से साफ है कि कुछ महीनों पहले तक नवें आसमान पर कुलांचे भर रही अर्थव्यवस्था की रफ्तार न सिर्फ धीमी पड़ने लगी है बल्कि वह अपने ही बोझ से थककर हांफने लगी है। चिंता की बात यह है कि केंद्र में सरकार गिराने और बचाने के खेल के शोर में कोई अर्थव्यवस्था की इस कराह को सुन नहीं रहा है। इससे यह आशंका जोर पकड़ने लगी है कि अर्थव्यवस्था नवें आसमान से उतरते हुए ‘साफ्ट लैंडिंग’ के बजाय कहीं क्रैश न कर जाए। राजनीतिक अस्थिरता के कारण यह खतरा और बढ़ गया है।
यह कोई बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जा रहा खतरा नहीं है। अर्थव्यवस्था से आ रहे संकेतों से बिल्कुल स्पष्ट है कि अगर उसे पूरी सक्रियता और समझदारी के साथ संभाला नहीं गया तो उसे क्रैश होने से बचाना मुश्किल हो जाएगा। पिछले कुछ दिनों में दो अंतरराष्ट्रीय क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों -स्टैंडर्ड एंड पुअर और फिच- ने भारतीय अर्थव्यवस्था की लड़खड़ाहट और बिगड़ती वित्तीय स्थिति का हवाला देते हुए भारत की रेटिंग घटा दी है। निश्चय ही इसका नकारात्मक असर भारतीय शेयर बाजार से लेकर मुद्रा बाजार में सक्रिय अंतरराष्ट्रीय निवेशकों विशेषकर विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) के सेन्टिमेंट पर पड़ा है। इसका तात्कालिक नतीजा काले मंगलवार के रूप में सामने आया जब मुंबई शेयर बाजार का संवेदी सूचकांक ‘सेंसेक्स’ 654 अंकों तक लुढ़क गया। सेंसेक्स की मौजूदा मरियल स्थिति का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि वह पिछले 15 महीनों के अपने सबसे न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया है। सेंसेक्स को भारतीय अर्थव्यवस्था की सेहत का संकेतक मानने वालों के लिए यह सचमुच बड़ी चिंता का विषय होना चाहिए कि बाजार 21200 अंकों के एवरेस्ट से लुढ़कता हुआ 12700 अंकों तक पहुंच गया है। सिर्फ साढ़े छह महीनों में सेंसेक्स में लगभग 30 खरब रूपए की पूंजी इस गिरावट के साथ स्वाहा हो चुकी है।
कहने की जरूरत नहीं है कि शेयर बाजार में इस भारी गिरावट और अफरातफरी की सबसे बड़ी वजह वे विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) हैं जिन्होंने पिछले वर्षों में सेंसेक्स को एवरेस्ट पर चढ़ाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई थी लेकिन पिछले कुछ महीनों से भारतीय अर्थव्यवस्था की डगमगाती नैया से कूद– कूदकर भागने में लगे हुए हैं। तथ्य यह है कि पिछले वर्ष एफआईआई ने भारतीय शेयर बाजारों में लगभग 17।36 अरब डालर (लगभग 75000 करोड़ रूपए) का निवेश किया था लेकिन इस साल वे पिछले साढ़े छह महीनों में लगभग 7 अरब डालर की रकम निकाल ले गए हैं।
शेयर बाजार से एफआईआई के पलायन का असर डालर के मुकाबले रूपए की कीमत पर भी पड़ा है। काफी अरसे तक डालर के मुकाबले मजबूत बने रहने के बाद एक बार फिर रूपया कमजोर पड़ने लगा है क्योंकि भारतीय बाजारों से डालर निकाल रहे विदेशी निवेशकों के बीच डालर की मांग बढ़ गई है। इस कारण डालर के मुकाबले रूपए की कीमत गिरकर प्रति डालर 43।22 रूपए तक पहुंच गई है जबकि कुछ महीनों पहले तक कमजोर डालर के मुकाबले रूपया मजबूत होकर प्रति डालर 39 रूपया पहुंच गया था।
भारतीय बाजारों में एफआईआई के पलायन के कारण शेयर बाजार के लुढ़कने और रूपए के कमजोर होने से भी अधिक चिंता की बात यह है कि इससे भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में एक ‘नकारात्मक सेन्टिमेंट’ बनता है जिसका असर घरेलू निवेशकों पर भी पड़ता हैै। वे भी बाजार से हाथ खींचने लगते हैं और इसका असर अर्थव्यवस्था में नए निवेश पर पड़ता है। नया निवेश न होने से अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर मंद पड़ने लगती है जिससे कंपनियों के मुनाफे पर असर पड़ता है। नए रोजगार के अवसर नहीं बढ़ते हैं, उल्टे छंटनी और तालाबंदी का दौर शुरू हो जाता है। इससे निवेश और प्रभावित होता है। इस तरह एक दुष्चक्र बन जाता है और अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में आ जाती है।
सवाल यह है कि क्या भारतीय अर्थव्यवस्था उसी दुष्चक्र की आ॓र बढ़ रही है? इस बारे में अभी कोई बिल्कुल सटीक घोषणा करना जल्दबाजी होगी लेकिन अर्थव्यवस्था से आ रही कई नकारात्मक खबरें इसी आ॓र इशारा कर रही हैं। पहली बुरी खबर यह है कि मई में औघोगिक उत्पादन सूचकांक ‘आइपीपी’ गिरकर 3।8 प्रतिशत पर पहुंच गया है जो पिछले छह वषार्र्ें में सबसे न्यूनतम दर है। इससे साफ जाहिर है कि औघोगिक विकास की दर लगभग धराशायी हो चुकी है। उससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि पूंजीगत वस्तुओं (कैपिटल गुड्स) के उत्पादन की दर लुढ़ककर मात्र 2।5 प्रतिशत रह गयी है जो पिछले वर्ष मई में 22 प्रतिशत थी। कैपिटल गुड्स के उत्पादन में इतनी भारी गिरावट इस बात की सूचक है कि अर्थव्यवस्था में नया निवेश कम या नहीं हो रहा है । जाहिर है कि इसका सीधा असर अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर पर पड़ेगा। यही कारण है कि कुछ महीनों पहले तक जीडीपी की 9 से 10 प्रतिशत की वृद्धि दर के दावे करने वाले आर्थिक मैनेजर और विश्लेषक भी अब दबी जुबान से स्वीकार करने लगे हैं कि मौजूदा स्थितियों में जी डी पी की 7 से 8 प्रतिशत की दर भी बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। यह 7 से 8 प्रतिशत की वृद्धि दर भी अच्छे मानसून और कृषि क्षेत्र के बेहतर प्रदर्शन के आसरे टिकी है। अन्यथा अर्थव्यवस्था खासकर औघोगिक क्षेत्र जिस तरह से लुढ़क रहा है, उसके कारण जी डी पी की 6 से 7 प्रतिशत की विकास दर को भी हासिल करना टेढ़ी खीर साबित होगी । असल में, अर्थव्यवस्था को आसमान छूती मुद्रास्फीति की दर ने पटरी से उतार दिया है। मुद्रास्फीति ने पिछले चार महीनों में जिस तरह से सुरसा की तरह अपना बदन बढ़ाया है और तेरह वर्र्षों का रिकार्ड तोड़ती हुई 11।89 प्रतिशत की बेचैन कर देने वाली ऊंचाई पर पहुंच गयी है, उससे अर्थव्यवस्था के मैनेजरों के हाथ–पांव फूले हुए हैं। मुद्रास्फीति की बेकाबू रफ्तार को थामने के लिए पिछले कुछ सप्ताहों में रिर्जव बैंक और वित्त मंत्रालय ने जो भी उपाय किए, वे न सिर्फ नाकाफी साबित हुए हैं बल्कि उनका उल्टा असर अर्थव्यवस्था की गति को धीमा करने के रूप में सामने आ रहा है। हताशा में अब अर्थव्यवस्था के मैनेजरों ने मुद्रास्फीति की सुरसा के आगे घुटने टेक दिए हैं और कहने लगे हैं कि महंगाई पर नियंत्रण का असर नवम्बर–दिसंबर से दिखेगा। जाहिर है कि यह सिर्फ दिलासा है ।
सच यह है कि मुद्रास्फीति का जिन्न बोतल से बाहर आ चुका है और अर्थव्यवस्था को अपनी चपेट में ले चुका है। कोढ़ में खाज की तरह मौजूदा राजनीतिक अस्थिरता का असर यह हो रहा है कि यूपीए सरकार का सारा ध्यान अर्थव्यवस्था को संभालने के बजाय सरकार का अस्तित्व बचाने में जाया हो रहा है। इस अनिश्चितता के कारण अर्थव्यवस्था की गति तो मंद पड़ती ही जा रही है, वह दिशाहीनता का शिकार भी हो गई है। दिशाहीनता के साथ हमेशा क्रैश करने का खतरा जुड़ा रहता है। शेयर बाजार के साथ-साथ अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों से आ रही खतरे की घंटी इसी क्रैश की पूर्व चेतावनी है। उम्मीद है कि अर्थव्यवस्था के मैनेजर इसे सुन रहे होंगे।
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Thursday, July 3, 2008

एक करोड़ लोगों का एक साल का निवाला सड़ाया

नई दिल्ली (एजेंसी)

पिछले एक दशक के दौरान भारतीय खाघ निगम (एफसीआई) के गोदामों में सैकड़ों करोड़ रूपए मूल्य का 10 लाख टन से ज्यादा अनाज सड़ गया जो एक करोड़ से अधिक लोगों की एक साल तक पेट की आग बुझाने के लिए काफी था। यह स्थिति तब है जब संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में रेखांकित है कि भारत के 63 फीसदी बच्चे भूखे पेट सोने के लिए मजबूर हैं।अनाज को भंडारण के समय नुकसान से बचाने के लिए निगम द्वारा 245 करोड़ रूपए खर्च किए जाने के बावजूद यह स्थिति है। यह विडंबना है कि अनाज के सड़ जाने के बाद उन्हें निपटाने के लिए भी निगम को 2।59 करोड़ खर्च करने पड़े। अनाजों के भंडारण से संबंधित ये सनसनीखेज तथ्य सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत दिल्ली निवासी देवाशीष भट्टाचार्य के आवेदन पर सामने आए। श्री भट्टाचार्य के सवाल पर निगम ने उन्हें सूचित किया कि देश भर में अनाजों की खरीदारी व वितरण की जिम्मेदारी निभा रही सरकारी एजेंसी के भंडारों में पिछले एक दशक के दौरान 10 लाख टन अनाज सड़ गए। निगम की सूचना के अनुसार 1997 से 2007 के बीच 1.83 लाख टन गेहूं, 3.95 लाख टन चावल, 22 हजार टन धान और 110 टन मक्का सड़ गए। निगम ने बताया कि उत्तरी क्षेत्र के तहत आने वाले उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, पंजाब, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश व दिल्ली में सात लाख टन अनाज सड़ गए। निगम ने 86.15 करोड़ रूपए अनाज को नुकसान से बचाने के लिए खर्च किया जबकि 60 लाख रूपए सड़े अनाज को निबटाने में गए। भट्टाचार्य ने बताया कि एफसीआई ने अपने गोदामों में अनाजों के संरक्षण के लिए जितनी रकम खर्च की उसे देखते हुए यह नुकसान विशाल है। क्या यह राष्ट्रीय शर्म नहीं है। निगम के अनुसार पूर्व क्षेत्र-असम, नगालैंड, मणिपुर, उड़ीसा, बिहार, झारखंड, और पश्चिम बंगाल में 1.5 लाख टन अनाज सड़ा। निगम ने यहां अनाजों को सड़ने से बचाने के लिए 122 करोड़ रूपए खर्च किए जबकि सड़े अनाज को निबटाने के लिए 1.65 करोड़ रूपए खर्च किए गए। दक्षिण क्षेत्र-आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल में 25 करोड़ रूपए खर्च करने के बावजूद 43069.023 टन अनाज सड़ गए। सड़े अनाज को निपटाने के लिए 34867 रूपए खर्च किए गए। महाराष्ट्र व गुजरात में 73814 टन अनाज को नुकसान पहुंचा। एफसीआई ने अनाजों को सड़ने से बचाने के लिए 2.78 करोड़ रूपए खर्च किए। सड़े अनाज को ठिकाने लगाने के लिए 24 लाख रूपए खर्च किए गए। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 23323.57 टन अनाज सड़ गए। अनाजों को सड़ने से बचाने के लिए वहां साढ़े पांच करोड़ रूपए खर्च किए गए। यहां मामला दूसरे राज्यों के गोदामों से भिन्न नहीं है। एफसीआई को सड़े अनाज निबटाने के लिए वहां 10.64 लाख रूपए खर्च करने पड़े। भट्टाचार्य ने कहा कि एफसीआई के आंकड़ों में उलटफेर प्रतीत होता है।

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Tuesday, July 1, 2008

मौत की फसल

देविंदर शर्मा
सभा कक्ष में स्तब्धकारी चुप्पी छाई हुई थी. कुछ देर के लिए किसी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की. वे सभी बस मुझे घूरे जा रहे थे. शायद उनमें से ज्यादातर लोगों को मेरी बात पर विश्वास नहीं था. ऐसा लगा कि जैव विविधता वाली फसलों (जीएम क्राप्स) के नाम की कसमें खाने वाले जैव विशेषज्ञ और वैज्ञानिक गलत काम करते हुए पकड़े गए हों.

वास्तव में उन्होंने कभी ऐसा सुना ही नहीं था. जीएम बीज के बिना फसल उगाना और कीटनाशकों के इस्तेमाल के बगैर उससे बंपर पैदावार हासिल करना ऐसी ही बात है, जिस पर वैज्ञानिकों को भरोसा न करना सिखाया जाता है. हाल ही में तिरुअनंतपुरम में राजीव गांधी सेंटर फार बायोटेक्निक द्वारा जीएम फसलों पर आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में मैंने बताया कि बंपर पैदावार हासिल करने के वैकल्पिक और स्थायी उपाय हैं. देश में लाखों किसान जीएम बीजों और रासायनिक कीटनाशकों के बिना ही छोटी जोतों में भरपूर पैदावार हासिल कर लेते हैं.
यह सुनते ही वैज्ञानिकों ने मुझ पर खेती के रोमानीकरण का आरोप जड़ दिया. जब उन्हें बताया गया कि आंध्र प्रदेश के लगभग प्रत्येक जिले में लाखों किसान 70 लाख हेक्टेयर भूमि पर टिकाऊ खेती व्यवस्था के अनुरूप खेती कर रहे हैं. इस व्यवस्था में घातक कीटों और रोगों पर स्वत: ही नियंत्रण पा लिया जाता है और फसल की पैदावार में कमी भी नहीं आती. इसके बाद जब मैंने कहा कि कीटनाशक रहित प्रबंधन का क्षेत्र एक करोड़ बीस लाख हेक्टेयर हो गया है और दो-तीन साल में बढ़कर दो करोड़ पचास लाख हेक्टेयर हो जाएगा तो जो प्रतिरोध करने की वे तैयारी कर रहे थे, वह फूट पड़ा.

पौध जैवप्रौद्योगिकी केंद्र के निदेशक डा. पी आनंद कुमार ने पहल की. उन्होंने कहा कि अगर मेरी बातें सत्य हैं तो वह जीएम फसल अनुसंधान छोड़कर इन किसानों के साथ काम करेंगे. उन्होंने कहा कि अगर मरीज स्वस्थ हैं तो दवाइयों की कोई जरूरत ही नहीं है. जीएम फसलों को प्रचारित-प्रसारित करने वाली कंपनी मोनसैंटो के बीज अनुसंधान के पूर्व निदेशक डा. टीएम मंजुनाथ ने भी सहमति जताई.

अनेक दूसरे वैज्ञानिक भी स्वस्थ कृषि व्यवस्था को प्रोत्साहित करने के लिए आगे आए. इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि जो लोग जीएम फसलों की संभावनाओं की बातें करते हैं, वे इतना भी नहीं जानते कि यही लक्ष्य पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना और मानव, पशु तथा पौधों के स्वास्थ्य को बनाए रखते हुए हासिल किया जा सकता है. जो काम जीएम फसल बीमारियां परोस कर करती हैं, वही काम टिकाऊ कृषि व्यवहार अपनाकर न केवल आंध्र प्रदेश के लाखों किसान, बल्कि देश भर के करोड़ों किसान कर रहे हैं. वैज्ञानिक इस कम खर्चीले और पर्यावरण के रक्षक विकल्पों को मान्यता प्रदान क्यों नहीं करते?

आंध्र प्रदेश के खम्मम जिले के रामचंद्रपुरम गांव का उदाहरण सामने है. रासायनिक कीटनाशकों के नियमित प्रयोग या दुरुपयोग के कारण पूरे गांव की समस्त भूमि गिरवी रखनी पड़ी. कुछ साल तक कीटनाशक रहित प्रबंधन अपनाने के बाद गांववासियों ने पूरा ऋण चुकता कर अपनी जमीन छुड़वा ली. दूसरी तरफ जब से भारत में बीटी काटन की शुरुआत हुई तब से तकनीक फीस के नाम पर गरीब किसानों की जेब से बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने दस हजार करोड़ रुपये निकाल लिए. कोई आश्चर्य नहीं कि कृषि पर आए संकट ने दानवी रूप धारण कर लिया.

प्रौद्योगिकी मात्र ब्रांडेड उत्पाद के रूप में ही नहीं आती. अगर मोनसैंटो की बीटी काटन प्रौद्योगिकी है तो इसी प्रकार समय की कसौटी पर खरी उतरने वाली परंपरागत प्रौद्योगिकी भी हैं, जिन्हें परिष्कृत करने में किसानों को सैकड़ों-हजारों साल लग गए. वैज्ञानिक सुरक्षित, भरोसेमंद, लाभदायक, टिकाऊ और स्वस्थ प्रौद्योगिकी मुहैया क्यों नहीं कराते? केवल इसलिए कि ये किसी परियोजना के तहत विकसित नहीं की गई और इनका वित्तीय पोषण नहीं हुआ है, पर इसका मतलब यह नहीं कि इनकी अवहेलना कर दी जाए. पहले ही हरित क्रांति प्रौद्योगिकी ने जमीन, भूमिगत जल और पर्यावरण को इस कदर विषैला बना दिया है कि इसकी क्षतिपूर्ति संभव नहीं. आधुनिक विज्ञान पर्यावरण और मानव शरीर को और कितना प्रदूषित करना चाहता है?

इस परिप्रेक्ष्य में जीएम फसल के लिए अनुमति हासिल करने के लिए राष्ट्रीय जैव तकनीक नियामक प्राधिकरण के रूप में एकल खिड़की के जरिए अनापत्ति जारी करने के प्रयास महत्वपूर्ण नजर आते हैं, जिन पर ध्यान देने की जरूरत है. यह पूरी कवायद बायोटेक्नोलाजी कंसोर्टियम द्वारा की गई, जो बायोटेक्नोलाजी उद्योग का एक उपक्रम है. एनबीआरए के साथ विचार-विमर्श के नाम पर जिन्हें आमंत्रित किया जाता है वे मुख्य रूप से उद्योग जगत के लोग होते हैं या पौध जैवविज्ञानियों में से किसी को आमंत्रित किया जाता है. अलग-अलग तरह के दृष्टिकोण को सही ठहराने के लिए कुछ गैर-सरकारी संगठनों और किसानों को भी आमंत्रित कर लिया जाता है.

नि:संदेह इस प्रकार की बातचीत का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि इस पूरी कवायद का परिणाम पहले से पता होता है. जीएम फसलों को संस्तुति प्रदान करने वाली तथा उनका नियमन करने वाली सर्वोच्च संस्था जेनेटिक इंजीनियरिंग एप्रूवल कमेटी पहले ही जैव-तकनीक के वैज्ञानिकों से भरी हुई है. जाहिर है, इन स्थितियों में इस समिति की पूरी कवायद एक प्रकार का छलावा ही साबित होती है. जीईएसी वास्तव में जैव तकनीक उद्योग के लिए एक रबर स्टांप की तरह साबित हो रही है. प्रस्तावित एनबीआरए के संदर्भ में इस धारणा को मजबूत होने से रोका नहीं जा सकता कि यह संस्था अनिवार्य रूप से जैव तकनीक उद्योग के लिए, जैव तकनीक उद्योग द्वारा और जैव तकनीक उद्योग की है.

क्या यह विचित्र नहीं कि भारत में मानव समाज द्वारा इस्तेमाल की गई सर्वाधिक खतरनाक तकनीकों में से एक जीएम प्रोद्योगिकी के लिए एकल खिड़की अनुमति की व्यवस्था लागू करने के प्रति इतना अधिक उत्साह और रुचि प्रदर्शित की जा रही है, वहीं दूसरी ओर ऐसी फसलों का मक्का माने जाने वाले अमेरिका में इनके लिए तीन नियामक संस्थाएं गठित की गई हैं? इसके बाद भी वहां नियमन प्रक्रिया की विश्वसनीयता को लेकर सवाल खड़े किए जाते रहते हैं. फिर क्या वजह है कि भारत में जीएम फसलों के लिए इतनी हड़बड़ी दिखाई जा रही है?

एक ऐसे समय में जब विश्व का अधिकांश भाग जीएम फसलों से सुरक्षा को लेकर चिंतित है और तरह-तरह के सवाल खड़े कर रहा है तब क्या यह जरूरी नहीं कि हम इसकी प्रक्रिया लागू करते समय चौकन्ना रहें? मूलभूत प्रश्न अभी भी शेष है. भारतीय वैज्ञानिक टिकाऊ खेती की तकनीकों को क्यों प्रोत्साहित नहीं करते? क्यों वे खतरनाक फसलों के स्थान पर पर्यावरण की दृष्टि से व्यवहारिक कृषि के तौर-तरीकों के साथ सामने नहीं आ रहे?

उत्तर आसान है। पिछले अनेक वर्षो में वे कृषक समुदाय से कट गए हैं. वे उस मूक क्रांति से अपरिचित हैं जो देश के खेतों में प्रवाहित हो रही है. यदि भारत खतरनाक जीएम फसलों के स्थान पर आंध्र प्रदेश के किसानों द्वारा आजमाए जा रहे कीटनाशक रहित कृषि प्रबंधन को प्रोत्साहित करे तो वह बड़ी आसानी से विश्व में टिकाऊ खेती और स्वस्थ जीवन का रोल माडल बनकर उभर सकता है.
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Monday, June 16, 2008

पाखंड से उबरें विकसित देश

वंदना शिवा
पर्यावरणविद् एवं सामाजिक कार्यकर्ता
ग्लोबल वार्मिंग का मुद्दा अभी भी आम लोगों के बीच अपनी जगह नहीं बना पाया है। इसे लेकर आम लोगों में जागरूकता फैलाने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय मंचों से सचमुच कुछ करने की जरूरत है। अभी तक पर्यावरण चिंतन के लिए जो भी बैठकें हुई हैं उनमें ग्लोबल वार्मिंग के परिणाम की भयावहता पर ही अधिक चर्चा होती है। सुधार के प्रयास कम किए जाते हैं। क्योटो एग्रीमेंट जैसे प्रयास विकसित देशों और विश्व बैंक का ढ़कोसला मात्र बन कर रह गई है। इस समझौते पर दस्तखत करने वाले देशों के लिए एक खास समय सीमा में प्रदूषण के स्तर को कम करने की शर्त है लेकिन विकसित देशों ने कार्बन ट्रेडिंग के नाम पर इससे बचने का रास्ता निकाल लिया है। विकसित देश कार्बन ट्रेडिंग के नाम पर विकासशील देशों में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को बढ़ावा देने में जुटे हैं। उदाहरण के लिए ब्रिटिश पेट्रोलियम और शेल जैसी कंपनियां भारत में आकर जैट्रोफा के बायोडीजल प्लांट लगा रही हैं। मैं ग्लोबल वार्मिग के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार विकसित देशों की दोमुंही नीतियों को ही मानती हूं। देखने वाली बात है कि वे अपने हित में विकासशील व गरीब देशों में ऑटो व थर्मल प्लांट लगाने तथा अन्य ऐसे कई उघोगों को बढ़ावा देने में जुटे रहते है। इनसे काफी प्रदूषण फैलता है। विश्व बैंक व अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष भी ऐसी कई योजनाओं के लिए पैसे उपलब्ध करा रही हैं जिनसे ग्लोबल वार्मिंग का खतरा है।
मौसम में आ रहे बदलावों की जानकारी, प्रभाव और उससे निबटने को लेकर किसी भी तरह के रिपोर्ट को हमें गंभीरता से लेने की आदत बनानी चाहिए। रिपोर्टों पर चाहे वे संयुक्त राष्ट्र की हो या किसी अन्य संस्था की, गहन विचार विमर्श होने चाहिए। दरअसल ग्लोबल वार्मिंग को लेकर हमारी जानकारियां तो विगत दिनों में काफी बढ़ी है, फिर भी अपेक्षित जागरूकता न तो शासकीय स्तर पर बना है और न ही आम लोगों में सचेतता आर्ई है। देशों के शीर्ष राजनीतिक स्तर पर तो इसे लेकर हमेशा उहापोह की स्थिति सी बनी रहती है। होना तो यह चाहिए कि वहां से पर्यावरण को बचाने के लिए आदर्श माहौल की व्यवस्था के सूत्न निकले। अभी तो देखने में यही आता है कि राजनीतिक नेतृत्व ही सुधार प्रक्रिया में रोड़े अटकाने में जुटा है। अमेरिका को ही लें, बुश प्रशासन क्योटो संधि पर हस्ताक्षर करने से बचता है। उनकी दलील है कि इससे अमेरिका के आर्थिक हितों को नुकसान पहुंचेगा। जाहिर है बुश के जाने के बाद नीतियों में परिवर्तन हो सकता है, इसलिए हमें आशान्वित रहना चाहिए। आखिर बुश की ही पार्टी के अर्नाल्ड श्वार्जनेगर जो अभी कैलीफोर्निया के गवर्नर हैं, ने अपने स्टेट में पर्यावरण रक्षण की शानदार नीतियां बनाई हैं, जिनसे अर्थव्यवस्था को भी कोई नुकसान नहीं पहुंच रहा।
दरअसल मौसम में आ रहा बदलाव आज की सबसे बड़ी समस्या है। निर्विवाद तौर पर धरती का तापमान बढ़ रहा है। मौसम तंत्र के तीव्र गति से गड़बड़ाने के अंदेशे हैं। रिपोर्ट बताती है कि अगर ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम नहीं किया गया तो अगली सदी तक तापमान में औसतन 3 दशमलव 5 डिग्री सेल्शियस की बढा़ेत्तरी हो सकती है। इससे ग्लेशियर पिघलेंगे और समुद्र तटीय शहरों के अस्तित्व पर खतरा हो जाएगा। प्रशांत महासागर के तो कई द्वीप पूरी तरह से डूब जाएंगे। फिर पेयजल में करीब 10 प्रतिशत की कमी हो जाएगी और 20 से 30 फीसदी पशु–पौधों की प्रजातियां विलुप्त हो जाएगी। खाघ उत्पादन में भी भारी कमी आएगी और बाढ़, तूफान, सूखे तथा बीमारियों में वृद्धि होगी। कुल मिला कर पूरा तंत्र चौपट हो जाएगा और हम क्रमश: विलुप्तता की आ॓र बढ़ेंगे। खैर इन आशंकाओं को हकीकत बनने से रोकने की जुगत हमारे हाथों में है बशर्ते कि खतरे को हम शिद्दत से समझें। विकसित, विकासशील व पिछड़े देशों को एक दूसरे पर दोषारोपण करने से बचते हुए मिलजुल कर गंभीर प्रयास करना होगा। जाहिर है जहां एनर्जी कंजम्शन अधिक हैं प्रयास भी उन्हें ही अधिक करने होंगे। भारत हो भी चाहिए कि वो आपने कार्बन उत्सर्जन में हर हालत में 2050 तक 4 प्रतिशत की कटौती लाए। ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को रोकना ही आज सबसे बड़ी चुनौती है। क्योटो प्रोटॉकाल से लेकर पर्यावरण को लेकर जितने भी सम्मेलन हुए हैं सब में यही बात उभर सामने आई है कि ऊर्जा की खपत पर लगाम लगाया जाए और ऐसे तकनीकों का विकास हो जो ऊर्जा संरक्षण पर जोर देता हो। इसके लिए कम बिजली खपत करने वाले लाइटिंग उपकरण और कम ईंधन वाली गाड़ियों का निर्माण होना चाहिए। कंप्यूटर, एयर कंडीशनर, रेफ्रीजरेटर जैसे 20 सर्वाधिक बिजली खाने वाले उपकरणों की जगह कम खपत वाले विकल्पों को अनिवार्य करने संबंधी कानून बनाए जाएं। क्लोरोफ्लोरो कार्बन गैस का विकल्प हाइड्रोजन को ईंधन स्रोत के रूप में बढ़ावा देना हो सकता है। हमें फॉसिल फ्यूल के इस्तेमाल पर तुरंत रोक लगाकर ऊर्जा के दूसरे विकल्पों पर गौर करना होगा। निसंदेह इस मुद्दे पर जरा सी भी ढ़िलसिलाई अपनी तबाही को निमंत्रण देने जैसा ही साबित होगा। भारत जैसे जैव विविधता वाले देश को तो ग्लोबल वार्मिंग से काफी खतरे हैं। गंगा, हिमालय, सुंदरवन, तटीय शहर कुछ भी सुरक्षित नहीं है। अगर हम नहीं चेते तो दिन प्रतिदिन विनाश की आ॓र ही बढ़ेंगे।प्रस्तुति: प्रेम चंद यादव

36 साल में कितने कोस

* 1972 में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहाम में संयुक्त राष्ट्र का पहला जलवायु सम्मेलन आयोजित किया गया। इसके बाद ही पर्यावरण प्रदूषण अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बना। सम्मेलन में सरकारों से मानव के क्रियाकलापों से हो रहे परिवर्तन को रोकने की अपील की गई। सम्मेलन के बाद विश्व मौसम संगठन और वैज्ञानिक संघों के संयुक्त तत्वावधान में विश्व जलवायु कार्यक्रम की शुरूआत की गई।
* 1988 में वैश्विक पर्यावरण में हो रहे परिवर्तन के अध्ययन के उद्देश्य से आईपीसीसी (इंटर गवर्मेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज)का गठन किया गया।
* आइपीसीसी ने अपनी पहली रिपोर्ट 1990 में दी। इसमें वैज्ञानिक सबूतों के आधार पर जलवायु परिवर्तन की बात स्वीकार की गई।
* 1990 में ही द्वितीय विश्व सम्मेलन हुआ। जलवायु परिवर्तनों पर एक मसौदे का ढ़ांचा तैयार करने की बात की गई। विभिन्न देशों के लिए विकास प्रक्रिया के अलग स्तरों पर जिम्मेदारी निश्चित की गई।
* 1992 में रियो डी जिनेरो में संयुक्त राष्ट्र का पर्यावरण और विकास सम्मेलन (पृथ्वी सम्मेलन) हुआ। शिखर वार्ता में 154 देशों ने संयुक्त राष्ट्र द्वारा तैयार किए गए मसौदे पर हस्ताक्षर किया। एजेंडा–21 को लागू करने संबंधी कार्यक्रम पर आम सहमति बनी। एजेंडे के अनुसार 2000 तक ग्रीन हाउस गैसों को 90 के स्तर पर लाने की बात की गई।
* 1995 में आईपीसीसी ने 2000 वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों द्वारा तैयार की गई दूसरी रिपोर्ट पेश की। रिपोर्ट में कार्बन उत्सर्जन पर लगाम कसने पर खासा जोर दिया गया।* 1997 में जलवायु समस्या पर विचार करने के लिए संयुक्त राष्ट्र आम सभा का विशेष सत्र बुलाया गया और रियो डी जिनेरो सम्मेलन के बाद की स्थिति की समीक्षा भी की गई।
* 1987 में ही क्योटो में विभिन्न राष्ट्रों के प्रतिनिधियों का सम्मेलन हुआ। इसमें ग्रीन हाउस उत्सर्जन के संबंध में बनाए गए अंतरराष्ट्रीय मापदंडों को कानूनी रूप से बांधने हेतु समझौता हुआ। संधि के अनुसार औघोगिक देशों को 2012 तक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को 5 प्रतिशत कम करना था। विश्व के 55 प्रतिशत ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार 55 देशों से औपचारिक स्वीकृति देने को कहा गया। संधि पूरी तरह से 16 फरवरी 2005 से लागू हुई। इसमें 141 देशों के हस्ताक्षर हैं। अस्ट्रेलिया व अमेरिका ने इस पर हस्ताक्षर नहीं किया है। भारत और चीन संधि से अलग हैं।
* आईपीसीसी ने 2001 में तिसरी रिपोर्ट पेश की।
* 2001 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा 5 क्षेत्रीय बैठकें हुईं। इसमें संयुक्त राष्ट्र के तत्कालीन महासचिव कोफी अन्नान ने एक महती आकलन रिपोर्ट जारी की जिसमें पिछले 10 सालों के दौरान टिकाऊ विकास को प्राप्त करने की दिशा में हुई प्रगति और अड़चनों की समीक्षा की गई थी।
* 2002 में जोहांसबर्ग सम्मेलन हुआ (दूसरा पृथ्वी सम्मेलन) यह अब तक के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में सबसे महत्वपूर्ण था। आयोजन अब तक के विभिन्न सम्मेलनों में निर्धारित लक्ष्यों को फलीभूत करने हेतु कार्य पद्धति बनाने के लिए किया गया था। किंतु विकसित और विकासशील देशों के बीच के टकराव के कारण सम्मेलन का लक्ष्य पूरा न हो सका।
* 2003 में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन के सदस्य देशों की बैठक जर्मनी के बॉन में हुई। इसमें ग्रीन हाउस गैसों को कम करने के बारे में विस्तार से योजना बनी तथा क्योटो समझौते में आ रही अड़चनों पर विचार किया गया।
* 2004 में ब्यूनस आयर्स में जलवायु परिवर्तन पर सम्मेलन। गलोबल वार्मिंग के विषय पर दीर्घावधि योजनाओं को लेकर अमरीका और यूरोपीय संघ के बीच गहरे मतभेद।
* अप्रैल 2007 में बैंकॉक में जलवायु परिवर्तन पर एक अहम सम्मेलन हुआ। सम्मेलन में 120 देशों के 400 वैज्ञानिकों ने हिस्सा लिया। अस्ट्रेलिया व अमेरिका ने सम्मेलन में भारत और चीन के लिए कार्बन उत्सर्जन के लिए लक्ष्य निर्धारित करने की बात कही। प्रस्ताव के प्रारूप को लेकर धनी और गरीब देशों में खींचतान।
* वर्ष 2007 में ही आईपीसीसी की चौथी रिपोर्ट जारी।
* 2007 के दिसंबर में जलवायु परिवर्तन पर बाली सम्मेलन। इसमें 2012 के बाद का रोडमैप तैयार करना था। सम्मेलन में अमेरिका द्वारा ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती के लिए लक्ष्य निर्धारित करने का विरोध। पूर्व अमरीकी उप राष्ट्रपति अल गोर ने बुश प्रशासन की आलोचना की। भारत और चीन ने मसौदे पर आपत्ति की।
* अप्रैल 2008 में बैंकॉक में सम्मेलन। अंतरराष्ट्रीय समझौते की दीर्घकालिक योजना के साथ बैठक संपन्न। इस कार्ययोजना को अंतिम रूप 2009 में कोपेनहेगेन में होने वाली बैठक में दिया जाएगा।
प्रस्तुति: प्रवीण कुमार
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Monday, March 31, 2008

सोया, साम्राज्यवाद और पर्यावरण : संस्कृति तथा स्वास्थ्य का खतरनाक खेल


वंदना शिवा
मनुष्यत्व के विकास से लेकर अब तक खाद्यान्न प्रजाति के 80000 से अधिक पौधों का स्वाद हमने चखा है. इनमें से तीन हज़ार से ज्यादा मनुष्य के लगातार इस्तेमाल में आ रहे हैं. बहरहाल, अब हम विश्व की खाद्य जरुरतों को पूरा करने के लिए सिर्फ आठ फसलों पर निर्भर हैं जो कि इस जरुरत का 75 प्रतिशत पूरा करती हैं. लेकिन अब अनुवांशिक अभियांत्रिकी ने उत्पादन को तीन फसलों – सोया, मक्का और राई के बीच समेट दिया है.मोनोकल्चर हमारी जैव विविधता, हमारे स्वास्थ्य और खाद्यान्न की गुणवत्ता और बहुविविधता को नष्ट कर रहे हैं. मोनोकल्चर को औद्योगिक निर्वासन और कृषि के वैश्वीकरण के जरूरी घटक के जैसा देखा जाता रहा है. उन्हें ज्यादा खाद्यान्न पैदा करने वाला समझा जाता है. हालांकि वे सिर्फ मोनसांटो, कारगिल और ए.डी.एम के लिए ज्यादा प्रभुत्व और मुनाफा कमाने वाले साबित हो रहे हैं. वे जैव विविधता, स्थानीय खाद्यान्न प्रणाली और खाद्यान्न संस्कृति को खत्म करके फर्जी आधिक्य और असल अभाव पैदा कर रहे हैं. सरसों, नारियल, मूंगफली, तिल, अलसी आदि से बनाए जाने वाले भारतीय देसी खाद्य तेल जिनका प्रसंस्करण विशिष्ट मिलों में किया जाता था, उन्हें “खाद्यान्न सुरक्षा” के बहाने प्रतिबंधित कर दिया गया.इसके साथ ही साथ सोया तेल पर लगे हुए आयात प्रतिबंध को हटा लिया गया. इसने एक करोड़ किसानों की आजीविका पर संकट पैदा कर दिया. गाँवों में दस लाख तेल मिलें बंद हो गईं. भारतीय बाजारों को सोया सो पाट दिए जाने के कारण स्थानीय खाद्यान्न तेल के दामों में गिरावट आ रही थी. इसके विरोध प्रदर्शन के दौरान बीस से ज्यादा किसानों की जाने गईं. कई लाख टन कृत्रिम रुप से सस्ता जीएमओ सोया तेल भारतीय बाजार में उतार दिया गया.जंगलों का विनाशसोया को इस तरह बाजार में डंप करने के विरोध और सरसों तेल की वापसी के लिए दिल्ली की झोपड़ पट्टियों में रहने वाली महिलाओं ने एक आंदोलन शुरु किया और “सरसों बचाओ, सोयाबीन भगाओ” के नारे के साथ दिल्ली की सड़कों पर निकल आई. इस “सरसों सत्याग्रह” से हमें सरसों को वापस लाने में सफलता मिली. कुछ दिनों पहले अमेज़न में थी. जहां कारगिल और एडीएम, वो ही कंपनियां जो भारत में सोया का डंप कर रहीं थी; सोया का उत्पादन करने के लिए अमेज़न को बरबाद करने में तुली हुई थी. निर्यात योग्य सोया उगाने के लिए लाखों एकड़ में फैला बारामासी अमेज़न जंगल, जो कि वैश्विक जलवायु का जिगर, फेफड़ा और दिल है; जलाया जा रहा है. कारगिल ने तो पारा में, सांतारेन नामक जगह में एक अवैध बंदरगाह बना रखा है जिससे वह बारामासी अमेज़न जंगल में सोया का विस्तार कर रहा है. हथियारबंद गिरोह जंगल में कब्जा कर लेते हैं और गुलामों से सोया की खेती कराते हैं. और जब सिस्टर डोरोथी स्टैंग जैसे लोग जंगलों के विनाश का विरोध करते हैं तो उनकी हत्या करा दी जाती है. ब्राज़ील और भारत में लोगों को डरा-धमका कर कृषि व्यवसाय को फायदा पहुँचाने वाले मोनोकल्चर को बढ़ावा दिया जा रहा है. यूरोप और अमेरिकी लोग अप्रत्यक्ष रुप से खतरे में हैं, क्योंकि वहां 80 % सोया पशुचारे के रुप में उपयोग किया जा रहा है, जिससे सस्ता गोश्त उपलब्ध हो सके.सस्ता प्रोटीन जो कि फैक्ट्री-फार्मों में पाले जाने वाले पशुओं का चारे जैसा इस्तेमाल होता है, बारामासी अमेज़न जंगल और संपन्न देशों के लोगों के स्वास्थ्य, दोनों को नुकसान पहुँचा रहा है. एक अरब लोगों के पास खाद्यान्न इसलिए नहीं हैं क्योंकि मोनोकल्चर ने उनकी कृषि और अन्य खाद्यन्न आधारित रोज़गार छीन लिया है. खतरे और भी हैंलगभग 1.7 अरब अन्य लोग मोटापे और अन्य खाद्य से जुड़े रोगों से प्रभावित हैं. मोनोकल्चर जरुरत से अधिक भोजन करने वाले और जरुरत से कम भोजन करने वाले, दोनो प्रकार के लोगों के लिए कुपोषण का कारण बनता जा रहा है.सहकारी संस्थाएं हमें जी.एम.ओ जैसे अपरीक्षित खाद्य पदार्थ खाने पर मजबूर कर रहे हैं. सोया, जो कि आज हमारे पूरे प्रसंस्कृत खाद्य प्रदार्थों में मौजूद है, किसी भी संस्कृति में आज से 50 साल पहले तक नहीं खाया जाता था. इसमें उच्च मात्रा में “इसोफ्लावोन” और “फोटो-ऑस्ट्रीजंस” होते हैं जो मनुष्यों में हार्मोन असंतुलन पैदा करते हैं. चीन और जापानी संस्कृति में पारंपरिक रुप से मौजूद खमीर उठाने की विधि से इसोफ्लावोन के स्तर में गिरावट आती है. खाद्यान्न में सोया को बढावा देना एक बहुत बड़ा प्रयोग है, जो कि 1998 से 2004 के बीच अमेरीकी सरकार द्वारा 13 अरब डालर के, और अमेरिकी सोया उद्योग के 8 करोड़ डालर सालाना के अनुदान के साथ शुरु किया गया था. प्रकृति, संस्कृति और मानव स्वास्थ सबका ह्रास हो रहा है. स्थानीय खाद्यान्न संस्कृति में सोया से ज्यादा समृद्ध और विभन्न प्रकार के विकल्प मौजूद हैं. प्रोटीन के लिए हमारे पास हजारों प्रकार की सेमों और दलहनों की किस्में मौजूद हैं जैसे – अरहर, बरबट्टी, मूंग, चना भाजी, उड़द फली, धान, खैरी चना, राजमा, मोठ फली, मटर, लाल चना, दालें, छोले, ग्वारफली, कमरख आदि. खाद्य तेलों में हमारे पास– तिल, सरसों, अलसी, सूर्यमुखी, मूंगफली और नाइगर सफोला हैं. हमारी खाद्य प्रणाली को सुधारने के लिए अपने मोनोकल्चर मनोविज्ञान से उबरना हमारी आवश्यकता है. छोटे जैवविविधता युक्त खेतों में ज्यादा उत्पादकता होती है और वो किसानों के लिए ज्यादा आमदनी का जरिया हो सकता है. साथ ही जैवविवध खुराक ज्यादा पोषक और स्वादिष्ट होती हैं.खेतों में जैवविविधता की वापसी और छोटे किसानों की खेतों में वापसी साथ-साथ होगी. कॉरपोरेट घरानों का फैलना, फूलना, पनपना मोनोकल्चर पर निर्भर है. इससे उबरना हमारी जरुरत भी है और मज़बूरी भी।
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Monday, December 10, 2007

श्मशान में लाल झंडा

यह शांति का लाल सूरज नहीं है _ मेधा पाटकर
पश्चिम बंगाल की माकपा सरकार ने बार-बार सवाल उठाया कि मेधा पाटकर नंदीग्राम क्यों गईं? मेरा कहना है कि जहां भी अन्याय होगा, मानवीय मूल्यों पर हमला होगा, वहां जाने का हमारा हक़ बनता है. नंदीग्राम पश्चिम बंगाल में ज़रुर है पर भारत में भी है. एक भारतीय नागरिक को देश के किसी भी हिस्से में आने-जाने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है. ऐसा ही सवाल हमसे सिंगूर की राह में भी पूछा गया था और कोलकाता हाईकोर्ट ने उन्हें ऐसा करने से मना किया था.नंदीग्राम में हम पर हमला करने वाले आम आदमी नहीं थे, वे किसी खास पार्टी के कैडर थे. वे किस पार्टी के कैडर थे, यह दुनिया को मालूम हो चुका है. 12 नवंबर को जब दूसरी बार हम नंदीग्राम प्रवेश की राह में सीपीएम कैडरों के एक-एक अवरोधक से जूझ रहे थे तो उनके स्टेट चेयरमैन का मीडिया में बयान आ रहा था-हम मेधा पाटकर को किसी भी कीमत पर घुसने नहीं देंगे. किसी संगठन के कैडर और चेयरमैन के बीच इस तरह का संवाद , अनुशासन आप पश्चिम बंगाल में ही देख सकते हैं. 8 नवंबर को हमला सिर्फ हमारे ऊपर हुआ, यह सही नहीं है. पश्चिम बंगाल के वयोवृद्ध बुद्धीजीवी तरुण सान्याल, मशहूर शिक्षाविद सुनंद सान्याल, जाने-माने वैज्ञानिक डॉ. मैहर इंजीनियर और अनुराधा तलवार जैसे मानवाधिकार कार्यकर्ता भी इस हमले के शिकार हुए. हमारे साथ-साथ सफर कर रहे मीडिया के साथियों पर भी हमला हुआ और मुझे अपने से अधिक मीडिया पर हुए हमले का दुख है. हमारे साथ मार खाने वाले मीडियाकर्मी भी हमारी ही तरह निर्दोष थे.नंदीग्राम में मीडिया को लगातार रोकने की कोशिश की गई. देश में पहली बार ऐसा नहीं हुआ है. गुजरात में भी मीडिया का प्रवेश कुछ समय के लिए रोक दिया गया था. पहले प्रवेश बंद करना, फिर निषेध हटा लेना, एक मक़सद से ही ऐसा किया गया होगा. मीडिया को इस तरह प्रवेश से रोकना, देश की आंख पर परदा डालना है. क़ानून को अपने हाथ में लेकर प्रवेश रोकना औऱ प्रवेश करने की कोशिश करने पर हमले करना, इमरजेंसी घोषित न करते हुए भी अघोषित राजनीतिक आपातकाल मैंने देश में पहली बार देखा है. कुछ दृश्य तो गुजरात से भी ज्यादा भयानक, ज्यादा खतरनाक दिखे.सीपीएम की योजनाबद्ध हिंसाविमान बोस बार-बार हमें रोकने की वजह, नंदीग्राम में हमारे जाने से, उन्माद फैलने की आशंका बता रहे था. जबकि गांव में सीपीएम समर्थकों ने कहा- आप पहले क्यों नहीं आईं, पहले आने से नंदीग्राम जलने से बच जाता. विमान बोस उन्माद के बारे में ज्यादा जानते हैं. हमारे पास तो सत्य, शांति और अहिंसा का हथियार ही है. हिंसात्मक तरीके से दखल कब्जा अभियान को वे शांति स्थापना कह रहे हैं. शांति और हिंसा की परिभाषा पश्चिम बंगाल में बदल नहीं सकती. वे कह रहे हैं- 11 माह बाद नंदीग्राम में शांति का लाल सूरज उगा है. ध्वस्त, बर्बाद, जले हुए घरों पर लहराते हुए लाल झंडे की श्मशानी सूरज को हम शांति का लाल सूरज तो नहीं कह सकते.नवंबर में नंदीग्राम में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई है. इस बार पुलिस की भूमिका हमले से अलग रखने की रही. सब कुछ राज्यसत्ता ने और साफ-साफ कहें, पश्चिम बंगाल की वाममोर्चा ने नहीं, सीपीएम ने योजनाबद्ध तरीके से पूरा किया है. हम सरकार से ज़्यादा उन पर यकीन करते हैं, जिन हजारों-हजार लोगों के घर-बार, चास-बास सब बर्बाद हो गये हैं. अपनी ज़िंदगी से उजड़े-बर्बाद हुए लोग झूठ बोल रहे हैं और सरकार सच बोल रही है, इसकी जांच सीबीआई ही कर सकती है.कोलकाता हाईकोर्ट ने 14 मार्च के हमले को असंवैधानिक कहा है लेकिन नवंबर महीने का दखल-कब्जा भी उतना ही असंवैधानिक और अमानवीय है. नंदीग्राम में सेज की परियोजना रद्द होने के बाद सीपीएम सरकार के खिलाफ संग्राम करने वाले गांव-समाज को खत्म कर बदला लेना, यह राजनीतिक अपराधीकरण और अमानवीयता की हद है. निहत्थे लोगों पर हो रहे हमले की फोन से पल-पल की सूचना, बहनों पर अत्याचार के किस्से, लापता और मृतकों के बारे में भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति के अपुष्ट दावे, यह सब जनसंहार का साक्ष्य ही तो है.पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने राष्ट्रपति शासन लगाने और सरकार को गिराने की मांग की है. हमने पहले भी धारा 355 का विरोध किया था लेकिन सरकार गिराने की मांग हम बेहतर विकल्प के आधार पर ही कर सकते हैं. राष्ट्रपति शासन या धारा 355 की मांग एक तरह से प्रदेश की जनता पर आपातकाल थोपना है. आपातकाल लगा कर नागरिक अधिकारों को कुचलने की मांग हमें पसंद नहीं है.बगदाद बचाने जैसी गुहार और बुश की इच्छाभूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति ने नवंबर महीने के हमले की पूर्व सूचना देश के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, सोनिया गांधी को दी थी. फिर भी नंदीग्राम की हिफाजत नहीं हुई. देश के सर्वोच्च सत्ता का समाज के सबसे कमजोर वर्ग की हिफाजत के प्रति असंवेदनहीनता लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है. इससे नंदीग्राम के आहत, बर्बाद ग्रामेर मानुष की लोकतांत्रिक आस्था कमजोर पड़ी है. कोलकाता से देर रात सोनिया गांधी से लेकर मंत्रियों तक, मै, इस तरह फोन करती रही, जैसे बगदाद को बचा लेने की यह आख़री रात है. लेकिन हुआ वही, जैसा बुश ने चाहा.बुद्धदेव ने कहा-जैसे को तैसा. नंदीग्राम बर्बाद हो गया. यूपीए गठबंधन की भूमिका भी नंदीग्राम के सवाल पर संदिग्ध रही. किसी प्रदेश में राज्य-पोषित हिंसा को रोकने में नकारा साबित होना, यूपीए गठबंधन की नियत पर सवाल उठाता है.नंदीग्राम, न्यूक्लियर डील और माओवादीनंदीग्राम ने परमाणु डील को प्रभावित किया है और किसी तरह का आंतरिक समझौता कांग्रेस और वाम के बीच हुआ है, ऐसा कहा जा रहा है. लेकिन इसके कोई मज़बूत आधार नहीं हैं. परमाणु समझौते के सवाल पर हम नंदीग्राम से ज्यादा भाजपा को सत्ता से रोकने की जिद को महत्वपूर्ण मानते हैं. हमें सीपीएम की पश्चिम बंगाल की भूमिका से ज़रुर ऐतराज है पर इसी सीपीएम की परमाणु समझौते के सवाल पर मजबूती के साथ अकड़ने से साम्राज्यवादी ताक़तों को कड़ी चुनौती मिली है. परमाणु के मुद्दे पर डटे रहने से देश ही नहीं, दुनिया भर में परमाणु के खिलाफ एक तरह की हवा बनी और बहस शुरु हुई. सीपीएम की इस भूमिका की तारीफ़ होनी चाहिए.नंदीग्राम में मार्च से लेकर अब तक माओवादियों की उपस्थिति के हमें कोई चिन्ह दिखाई नहीं पड़े. भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति में शामिल तृणमूल कांग्रेस, एसयूसीआई, जमायत-उलाम-ए-हिंद सहित सभी घटक दल माओवादी राजनीति के धुर विरोधी हैं. फिर माओवादियों का प्रवेश किस तरह हो सकता है?मार्च से नवंबर तक निहत्थे किसान-मज़दूरों पर हमला हुआ, सशस्त्र माओवादियों पर नहीं. माओवादियों ने 14 मार्च और 10-11 नवंबर को ज़रुर सशस्त्र संघर्ष किया होता, अगर वे वहां उपस्थित होते.नंदीग्राम में हथियारों की राजनीति को थोड़ी और गंभीरता से देखने की जरुरत है. नंदीग्राम में सेज का विरोध करने वाले भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति के समर्थक भी 11 महीने पहले सीपीएम के ही समर्थक थे. सेज की किसान विरोधी नीति ने गांव के किसानों को संग्राम के लिए प्रेरित किया. पहले लोगों को टुकड़े में बांटिए, फिर हथियार बांटकर हिंसक माहौल तैयार करिये. 14 मार्च के जनसंहार के बाद भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति के समर्थकों ने भी बदले के भाव में हिंसा का सहारा लिया था, जिसे हम उचित नहीं ठहरा सकते. हिंसा हर हाल में बुरी है, चाहे इधर की हो या उधर की. लेकिन हम अच्छी तरह से जानते हैं कि हिंसा को बढ़ावा किसने दिया! गांव के भोले-भाले किसानों को हथियारों से लैस करना, यह लोकतांत्रिक राजनीति नहीं है तो वामपंथी भी नहीं हो सकती. राजनीति को अपराधीकरण से बचाने के लिए सबसे ज्यादा ज़रुरी है कि राजनीतिक दलों का निःशस्त्रीकरण किया जाये. हथियार सिर्फ पश्चिम बंगाल में सीपीएम के पास ही नहीं है, देश में दूसरे राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के पास भी सशस्त्र दस्ते हैं. चुनाव लड़ने वाली किसी भी राजनीतिक दल को सशस्त्र दस्ते रखने का हक़ नहीं होना चाहिए.गांधीवाद से आगे की राजनीतिआलोचक कहते हैं कि मुझे गांधीवाद से आगे की राजनीति का ज्ञान नहीं है, इसलिए मैं मार्क्सवादी सरकार के खिलाफ खड़ी हुई हूं. हमें लगता है कि मार्क्स और गांधी दोनों ने समाज के सबसे कमज़ोर मेहनतकश को श्रम के उचित दाम और उनके हक़-न्याय की बात की थी. हमें गांधी विरुद्ध अंबेडकर, मार्क्स विरुद्ध गांधी के विवाद से अलग रखा जाए तो अच्छा है. सब जानते हैं, हमारे विश्वास की अवधारणा अपने निजी चिंतन पर नहीं, मार्क्स, गांधी, अंबेडकर की विचारधारा के आधार पर तय होती है. देश के वरिष्ठ वामपंथी, मार्क्सवादी जो हमारे साथ ऐनरॉन से लेकर नर्मदा के मुद्दे पर साथ खड़े हुए, उन्होंने हमें कभी भी मार्क्स विरोधी नहीं माना.नंदीग्राम राजनीतिक अपराधीकरण के खिलाफ सत्य, न्याय और शांति के अहिंसात्मक विकल्पों को चुनने का संदेश देता है. हमें सीपीएम से अपेक्षा थी कि सेज के सवाल पर जो भूमिका वे महाराष्ट्र के रायगढ़ में लेते हैं, वही भूमिका नंदीग्राम में लेंगे. पूंजीपति सत्ता और राजनीति को प्रभावित कर रहे हैं. वामपंथियों को इस गठजोड़ से बचना होगा.सत्ता राजनीति को पहले भ्रष्ट करती है, फिर अपने मूल्यों से गिराती है. आज पूंजीकरण और बाज़ारीकरण ने राजनीति का चित्र औऱ चरित्र ही बदल दिया है. मुनाफे का बाज़ार ही नहीं, मुनाफे की राजनीति, राजनीतिक दलों का उद्देश्य हो गया है. वामपंथी राजनीति भी अगर मुनाफे से प्रभावित हो रही है तो लोकतंत्र के बचाने की ज़िम्मेवारी किसकी है ?धार्मिक संप्रदायवाद की तरह भाषा और प्रदेशवाद भी एक तरह की सांप्रदायिकता है. गुजरात की राज्यसत्ता ने भाषावाद और प्रांतवाद को ख़ूब इस्तेमाल किया है. बंगाल के बुद्धीजीवी नंदीग्राम के सवाल पर किसी भी राजनीतिक दल से ज़्यादा सक्रिय हैं. हमें लगता है कि बंगाल के बुद्धीजीवी संप्रदायवाद के जाल को काटना जानते हैं. हमें बंगाल के एक-एक ग्रामेर मानुष, कलाजीवी, बुद्धीवीजी, शिल्पकार समाज पर पूरा भरोसा है, वे बंगाल को बदलकर दम लेंगे.(प्रस्तुतिः पुष्पराज)

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Friday, December 7, 2007

किस्सा कैडर का


विचारधारा के लिए लड़ने वाले सिपाही या राजनीतिक गुंडे ? पश्चिम बंगाल में पिछले तीन दशक से सीपीएम के अबाध राज का राज़ कैडर ही रहे हैं. कैसे कैडर सीपीएम की मदद करते हैं और इसमें उनका क्या फायदा है बता रहे हैं शांतनु गुहा रे...
भास्वती सरकार कार्ल मार्क्स के केवल नाम से ही परिचित हैं, मगर मार्क्स के सिद्धांत क्या हैं ये जानने के लिए उन्होंने उनकी किताबों को कभी नहीं खंगाला. 34 वर्षीय ये स्कूल शिक्षिका अपने पति(राज्य परिवहन निगम में क्लर्क) के साथ कोलकाता के दक्षिणी इलाके में रहती हैं. समर्पित सीपीएम कैडरों की तरह ये दोनों पति-पत्नी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी(मार्क्सवादी) की गढ़िया से निकलने वाली रैलियों का एक अभिन्न हिस्सा होते हैं. सरकार पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे के शासन पर बात तो करती हैं लेकिन अपनी तस्वीर छपवाने के सवाल पर पीछे हट जाती हैं. हालांकि उनके पड़ोसी बताते हैं कि सरकार को रैलियों में नारे लगाने के बदले पैसे मिलते हैं, लेकिन वो इस बारे में कुछ भी कहने को तैयार नहीं.
गौरतलब है कि ये महिला कैडर, पार्टी में और पांच साल बिताने के बाद नेता के रूप में अपनी पदोन्नति का सपना संजोए हुए है. सरकार का पार्टी से जुड़ाव छात्र जीवन में ही हो गया था. तब वो स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया(एसएफआई) की एक सामान्य सदस्य थीं और उसी दौरान उन्होंने पहली बार सीपीएम की रैली में भी हिस्सा लिया था. कैडर सत्ता का उतना आनंद नहीं ले पाते. लिहाजा सरकार सहित राज्य के लाखों कैडर राज्य के शीर्ष पार्टी नेताओं के संपर्क में आने की अपनी बारी के इंतजार में हैं. पश्चिम बंगाल में सीपीएम से जुड़ने के बाद किसी भी कैडर के लिए नेता की स्थिति तक पहुंचना एक स्वर्णिम अवसर होता है, जिसका वे बेसब्री से इंतजार करते हैं. इससे न सिर्फ उन्हें ज्यादा आजादी मिल जाती है बल्कि बड़े पैसे बनाने के खेल में भी उनकी पैठ हो जाती है.
पश्चिम बंगाल में सीपीएम से जुड़ने के बाद किसी भी कैडर के नेता की स्थिति तक पहुंचना एक स्वर्णिम अवसर होता है, जिसका वे बेसब्री से इंतजार करते हैं. इससे न सिर्फ उन्हें ज्यादा आजादी मिल जाती है बल्कि बड़े पैसे बनाने के खेल में भी उनकी पैठ हो जाती है.
अब जरा ये देखें कि पार्टी के प्रति इस अंधभक्ति के फलस्वरूप सरकार जैसे लोगों को मिलता क्या है.
पहले राज्य में सरकारी नियुक्तियों की प्रक्रिया राज्य सरकार के हाथ में होती थी और इनमें से 90 प्रतिशत तक नौकरियां प. बंगाल में सीपीएम कैडरों की झोली में ही जाती थीं. नौकरियों से योग्यता का कोई लेना-देना नहीं था और वामपंथ से थोड़ा-सा जुड़ाव ही पर्याप्त योग्यता मानी जाती थी. कुछ साल पहले केंद्र सरकार ने इस प्रक्रिया को कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी) के जिम्मे कर दिया मगर अब भी सैकड़ों अस्थाई नियुक्तियां स्थानीय नेताओं के निर्देशों पर ही होती हैं. चाहे सरकारी नौकरी हो, नगर परिषद् की या फिर किसी निजी संस्थान की - पार्टी का संदेश स्पष्ट हैः यदि आप हमारे साथ हैं, तो हम भी आपका ध्यान रखेंगे.
बहरहाल, कैडर के सवाल पर सरकार कहती हैं, “मैं एक कैडर हूं और पार्टी के लिए काम करती हूं. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि कोई गुंडा-बदमाश हूं.” वो एक सीधा-सा सिद्धांत जानती हैं - पार्टी के प्रति अंधभक्ति कैडर के जीवन और उसकी प्रगति की अनिवार्य शर्त है. यानी कैडर को हर हाल में पार्टी के पक्ष में खड़ा होना है, पार्टी के बचाव का रास्ता तलाशना है. वह इसे पलटवार का सिद्धांत कहती हैं. उनका मानना है कि विरोधी हर कदम पर पार्टी पर कीचड़ उछालते रहते हैं, लिहाजा कैडरों को उसके जवाब के लिए हमेशा तैयार रहना पड़ता है.
उदाहरण के तौर पर जिस दिन फिल्मकार अपर्णा सेन ने नंदीग्राम विरोधी रैली में हिस्सा लेने का निर्णय किया, कैडर पहले से तैयार थे कि मीडिया में उन्हें क्या कहना है. सेन के इस कदम पर कैडरों ने ये प्रचारित करना शुरू किया कि कोलकाता में हाल में संपन्न हुए फिल्म समारोह में अध्यक्ष न बनाए जाने को लेकर वो सरकार से नाराज थीं. जिन तक ये कहानी नहीं पहुंच पाई थी, उन्होंने दूसरा कारण गढ़ा: सेन इसलिए नाराज थीं क्योंकि राज्य सरकार ने सेन की अगली फिल्म को वित्तीय सहायता देने से इनकार कर दिया था.
पश्चिम बंगाल में यदि आप एक कैडर हैं, तो आपको न केवल इस सिद्धांत में विश्वास करना होगा, बल्कि इसे प्रचारित-प्रसारित भी करना होगा. यानी जमीनी स्तर पर व्यावहारिक मार्क्सवादी सिद्धांत यही है.
स्थानीय न्यूज चैनल तारा बंगला की संपादक सुमन चट्टोपाध्याय कहती हैं कि “पश्चिम बंगाल में कैडर की कोई तय परिभाषा नहीं है. ये सिस्टम के एक हिस्से के रूप में हर जगह मौजूद रहते हैं. वो पार्टी के दैनिक पत्र गणशक्ति को दीवारों पर चिपकाने वाला कोई लड़का भी हो सकता है. गली के नुक्कड़ पर होने वाली सभा में वक्ता के रूप में कोई प्राध्यापक भी हो सकता है. किसी सार्वजनिक सभा में भीड़ जुटाने वाला संयोजक हो सकता है. पास-पड़ोस के तलाक, किराएदारी, असफल प्रेम प्रसंग जैसे मामलों को सुलझाने के प्रयास करता कोई कार्यकर्ता भी हो सकता है और विरोधियों के खिलाफ क्रूर कार्रवाई करने वाला कोई क्षेत्रीय गुंडा भी हो सकता है, जिसे सरकार का पूरा समर्थन प्राप्त होता है.”
चट्टोपाध्याय अपने स्टूडियो में घटी एक घटना का उदाहरण देती हैं. एक प्राइमटाइम शो के खत्म होने के बाद उन्होंने स्टूडियो में मौजूद और सत्ताधारी पार्टी से निकटता रखने वाले गार्डन रीच इलाके के डॉन झुनू अंसारी से पूछा कि क्या उन्होंने अपने आदमियों को नंदीग्राम में जवाबी कार्रवाई के लिए भेजा था. अंसारी ने ऐसा करने से तो इनकार किया लेकिन ये जरूर बताया कि ज्यादातर कैडर बंगाल के बाहर से आए थे.
सुमन चट्टोपाध्याय कहती हैं कि “पश्चिम बंगाल में कैडर की कोई तय परिभाषा नहीं है. ये सिस्टम के एक हिस्से के रूप में हर जगह मौजूद रहते हैं. वो पार्टी के दैनिक पत्र गणशक्ति को दीवारों पर चिपकाने वाला कोई लड़का भी हो सकता है.
जानकार बताते हैं कि ज्यादातर माकपाई कैडर बेरोजगार हैं और सीपीएम से उनके जुड़ाव के कई कारण हैं. एक तो इससे उनकी कुछ आमदनी की गारंटी हो जाती है, दूसरे, उनका एक सामाजिक स्तर बन जाता है और साथ ही प्रसिद्धि की राह पर पहला कदम भी पड़ जाता है.
सीपीआई(एमएल) के वरिष्ठ नेता अरिंदम पाल स्वीकारते हैं कि “पार्टी के कई कार्यकर्ता मुश्किलें खड़ी कर देने वाले हैं. शीर्ष कामरेड इसे महसूस भी करते हैं लेकिन उन्हें पता है कि राजनीति में आपको बुद्धिजीवियों की नहीं, ऐसे ही तत्वों की जरूरत पड़ती है.” उन्होंने हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर घटी घटना का हवाला दिया, जहां कैडरों ने एयरपोर्ट यूनियन के चुनाव प्रचार के दौरान एक तरह से इस पर कब्जा कर लिया था. इस उपद्रव के कारण एयरपोर्ट्स अथॉरिटी के लगभग 55 प्रतिशत कर्मचारी काम पर आए ही नहीं. हॉवड़ा स्टेशन पर होने वाले रेलवे इम्प्लाइज यूनियन के चुनाव में भी इसी नजारे की उम्मीदें लगाई जा रही है. “ये तो राष्ट्रीय चुनाव है, और मुंबई व दिल्ली के मतदाता भी वोट देने आएंगे. लेकिन मुंबई में विक्टोरिया टर्मिनस के पोस्टरों से पटे होने और कामकाज ठप्प होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती. दरअसल, ये सब सिर्फ बंगाल में ही संभव है, क्योंकि सत्ताधारी पार्टी इस तरह के चुनावों को अपने जनाधार से जुड़ाव का आदर्श रास्ता मानती है. यही दरअसल कैडर हैं”, कहते हैं सीपीआई(एमएल) के ही कार्तिक सेन.
शहर के जादवपुर विश्वविद्यालय में इस मुद्दे पर चर्चा के दौरान छात्रा सोहिनी मजुमदार कहती हैं, “सभी पार्टियों की तरह वाम मोर्चे में और सीपीएम में भी इस तरह के लोग इसलिए हैं, क्योंकि आप खुद इस तरह के लोगों का समर्थन चाहते हैं. लेकिन उनके बारे में नकारात्मक सोच इसलिए बन गई है क्योंकि ज्यादातर घटनाओं में उनके बुरे पक्ष को ही सामने लाया जाता है.” इस तरह की शुरुआती घटनाओं में से एक 1990 में उत्तरी कोलकाता के विधानसभा चुनाव में हुई थी जहां स्थानीय डॉन नंदा के नेतृत्व में अपराधियों ने सुबह 10 बजे ही बूथ पर कब्जा कर लिया था. स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया से सक्रिय रूप से जुड़ी मजुमदार स्वीकारती हैं, “वहां नंदा का खुलेआम रिवाल्वर लहराना निश्चितरूप से परेशान करने वाली बात थी.” लेकिन वो ये भी कहती हैं कि अब परिस्थिति बदल रही है और हाल ही में पार्टी ने इस तरह के 12 हजार लोगों को पार्टी से निकाल बाहर कर दिया है.
प्रेसीडेंसी कॉलेज के पूर्व प्राचार्य अमाल मुखर्जी कहते हैं, “कैडर ब्रिगेड, कार्यकर्ता बनने के लिए मौका देख कर सुविधानुसार अपने रंग बदलता है. चूंकि उनके पास आरएसएस की शाखा की तरह कोई नियमित अड्डा नहीं होता और उन्हें रोज सुबह परेड नहीं करनी पड़ती, लिहाजा उन्हें पहचानना मुश्किल होता है.”
पास के ही सरकारी स्कूल में पार्टी की स्थानीय शाखा की एक बैठक चल रही है जहां कार्ल मार्क्स, लेनिन, प्रमोद दासगुप्ता व ज्योति बसु जैसे नेताओं के कटआउट लगे हुए हैं. पूछे जाने पर सभा के आयोजक अनिरबन रॉय चौधरी कहते हैं, “यहां ऐसी कोई गलत चीजें नहीं है. किसी के पास कोई गोली-बंदूक नहीं होती. ये तो पश्चिम बंगाल के बारे में मीडिया की अपनी कपोल कल्पना है. कैडर तो अनुशासित कार्यकर्ता मात्र होते हैं जो पार्टी हित में जमीनी जनाधार जुटाने का काम करते हैं.”
वामपंथी विचारधारा के कट्टर समर्थक, केंद्रीय कर्मचारी उत्पल मित्रा कहते हैं, “कोई राजनीतिक पार्टी किसी राज्य में तीन दशक तक सिर्फ इस वजह से सत्ता में नहीं रह सकती, क्योंकि उसके पास कैडर के रूप में असामाजिक तत्व हैं.” मित्रा नंदीग्राम के प्रेत को दफन करने के लिए शहर भर में निकाली जा रही रैलियों का नियमित हिस्सा होते हैं.
वाममोर्चा को इस बात का अहसास है कि नंदीग्राम की घटना ने उसकी अच्छी-खासी छवि को कलंकित कर दिया है. गौरतलब है कि भारतीय राजनीति के गलियारों में वामपंथियों की छवि सार्वजनिक शुचिता, गरीबों की पक्षधर व संवैधानिक मूल्यों के रक्षक की रही है.
अब सवाल ये उठता है कि राज्य भर में कैडरों की वृद्धि को आखिर प्रोत्साहित किसने किया है और उनकी संख्या इतनी कैसे हो गई जिसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है? विश्लेषक कहते हैं कि शुरुआत 1977 में सीपीएम के सत्ता में आने के साथ हुई. पश्चिम बंगाल में रीयल एस्टेट कारोबार में तेजी की शुरुआत ही हुई थी. इससे जुड़े हर तरह के फायदे पार्टी से जुड़े लोगों को दिए जाने लगे. देखादेखी और लोग भी बहती गंगा में हाथ धोने को सीपीएम से जुड़ने लगे. भूमि सुधारों ने भी लोगों की पार्टी के प्रति अंधस्वामिभक्ति सुनिश्चित की.
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता निरबेद रे कहते हैं, “वास्तव में सीपीएम में कैडरों की भीड़ 1990 में आनी शुरू हुई और ये आज तक जारी है.” रे आगे जोड़ते हैं, “इन कैडरों ने राज्य के मतदाताओं का विस्तृत डाटाबेस तैयार किया, जो चुनावों के दौरान पार्टी के काम आया और क्षेत्र पर पकड़ बनाने में उनकी मदद की. कैडरों के पास अपने पास-पड़ोस के बारे में जो सूक्ष्म जानकारी होती है, वो अन्य पार्टियों के पास नहीं होती और ये जानकारी उन्हें बड़ी मदद पहुंचाती है.” रे की मानें तो वाममोर्चा को इस बात का अहसास है कि नंदीग्राम की घटना ने उसकी अच्छी-खासी छवि को कलंकित कर दिया है. गौरतलब है कि भारतीय राजनीति के गलियारों में वामपंथियों की छवि सार्वजनिक शुचिता, गरीबों की पक्षधर व संवैधानिक मूल्यों के रक्षक की रही है. “लेकिन आज अपराधीकरण, भ्रष्टाचार, पूंजीपतियों व नव उदारवादी नीतियों का समर्थन, बाहुबलियों पर भरोसा और अपने सहयोगियों के प्रति उपेक्षापूर्ण बरताव वामपंथी राजनीति का शगल बन गया है.” रे आगे कहते हैं, “आज तो कैडर नंदीग्राम में लोगों को धमकाने, उन्हें वहां से बेदखल करने या फिर उन्हें अपने प्रभाव में लेने संबंधी पार्टी के अभियान का एक अहम हिस्सा बन गए हैं.”
कैडरों की क्रूरता की पहली घटना 1978 में तब सामने आई थी जब उन्होंने बीरभूमि जिले के मारिचझापी में असहाय बांग्लादेशी शरणार्थियों पर फायरिंग में पुलिस का साथ दिया था. रे कहते हैं कि “उसके बाद तो इस तरह की घटनाओं का सिलसिला सा चल पड़ा. शहर के एक पुल से गुजर रहे 17 आनंदमार्गियों की सरेआम हत्या इसी तरह की एक जघन्य घटना थी, लेकिन नंदीग्राम आज इन सभी घटनाओं को पीछे छोड़ते हुए शीर्ष पर पहुंच गया है क्योंकि सभी को ऐसा लग रहा है कि हथियारबंद कैडरों की वहां उपस्थिति व उनके द्वारा की गई हिंसा को पार्टी खुद ही जायज ठहरा रही है.”
वरिष्ट स्तंभकार प्रभाष जोशी भी सच की पड़ताल में एक दल के साथ नंदीग्राम गए थे. उनका कहना है कि कैडर नजर न आने वाली ऐसी इकाई है जिसमें अनवरत बढ़ोतरी हो रही है. “ये तो आप भाग्यशाली थे जो नंदीग्राम में इनमें से कुछ को देख पाए, वरना ग्रामीण इलाकों में जिन कैडरों को बाइक वाहिनी के रूप में जाना जाता है, उनके बारे में तो शायद ही किसी को पता हो.”
राजस्थान उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश एस.एन. भार्गव कहते हैं कि कैडर एक ऐसी विध्वंशक सेना हैं जिसकी ताकत पुलिस की मिलीभगत से बनती है. भार्गव कहते हैं, “नंदीग्राम के कैडर पश्चिमी मिदनापुर, बांकुरा व 24-परगना जिलों से आए थे और वे स्वचालित आग्नेयास्त्रों के इस्तेमाल में पूर्ण प्रशिक्षित थे.”
कुछ भी हो कैडर तो इन सब चर्चाओं से बेखबर अपनी प्राथमिकता वाले कामों में आज भी व्यस्त हैं. और ये काम हैं--नंदीग्राम की हिंसा की लीपापोती और सरकारी तंत्र के पार्टी हितों के आगे घुटने टेकने के आरोपों को खारिज करना.
तहलका हिन्दी से साभार

Wednesday, November 7, 2007

धान की जीन संशोधित क़िस्म पर चेतावनी



रामदत्त त्रिपाठी , लखनऊ
ग़ैरसरकारी संगठन ग्रीनपीस ने धान की जीन संशोधित क़िस्म का प्रयोग भारत में किए जाने के ख़तरों के प्रति गंभीर चेतावनी दी है.
पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करने वाले अंतरराष्ट्रीय ग़ैर सरकारी संगठन ग्रीनपीस की भारत शाखा ने आगाह किया है कि अगर लोगों ने जैनेटिकली इंजीनियर्ड यानी जीन में संशोधन करके बनाए गए धान की क़िस्म को अपने खेतों में आज़माया तो उन्हें भी अमरीका के चावल उद्योग की ही तरह अरबों रुपए के नुक़सान का सामना करना पड़ सकता है.
ग्रीनपीस का कहना है कि अमरीका में साल 2006 में इसी तरह के धान की क़िस्म आज़माई गई थी जिसने चावल उद्योग को एक अरब 20 करोड़ डॉलर का नुक़सान उठाना पड़ा था. ऐसे आरोप थे कि बेयर्स कंपनी के खेतों में आज़माई गई यह क़िस्म दूषित हो गई थी.
ग्रीनपीस ने 'रिस्की बिज़नेस-1' यानी 'जोखिमभरा कारोबार-1' नामक रिपोर्ट मंगलवार को लखनऊ में जारी की है जिसमें आगाह किया गया है कि उस क़िस्म को लखनऊ से क़रीब 25 किलोमीटर दूर महूरा कलाँ गाँव में बोया गया है जिसके ख़तरनाक परिणाम हो सकते हैं.
ग्रीनपीस के कार्यकर्ताओं और भारतीय किसान यूनियन के किसानों ने उस गाँव में लगभग 7500 वर्गफुट धान खेत को एक वैनर से ढक दिया जिस पर लिखा था, "धान बचाओ". उस बैनर पर बीच में जीई लिखा हुआ है जिसे लाल घेरे से काटा गया है जिसका मतलब लगाया जाता है कि उसका इस्तेमाल न करें.
ग्रीनपीस ने आहवान किया है कि भारत में जीई की चावल क़िस्म को बिल्कुल नहीं आज़माया जाना चाहिए.
ग्रीनपीस ने चावल की खेती को इस तरह की जीई क़िस्म से होने वाले ख़तरे के प्रति ख़बरदार करने के लिए यह रिपोर्ट तैयार की है और जागरूकता अभियान चलाया है.
एलएल601
वर्ष 2006 में अमरीका में बेयर्स की जीई चावल क़िस्म - एलएल601 के कुछ निशान चावलों में पाए गए थे और वह क़िस्म दूषित थी. दरअसल इस क़िस्म को प्रयोग के तौर पर 2001 में कुछ खेतों में बोया गया था और वहीं से यह दूषण फैल गया था.
इस दूषण की वजह से अमरीका के चावल उद्योग के इतिहास में सबसे बड़ा संकट आ गया था और उस दूषित क़िस्म की वजह से कम से कम तीस देशों पर इसका असर पड़ा था. बहुत से देशों ने अमरीकी चावल के लिए अपने दरवाज़े बंद कर दिए थे जिनमें यूरोपीय संघ, जापान और फ़िलीपींस जैसे बड़े आयातक भी शामिल थे.
ग्रीनपीस के एक वरिष्ठ पदाधिकारी राजेश कृष्णन - जीई मुक्त भारत - नामक अभियान की देखरेख कर रहे हैं. उनका कहना है, "यह भारत सरकार के लिए आँख खोलने वाली एक चेतावनी है जिसने जीई क़िस्मों को अपने यहाँ आने देने के लिए सारे दरवाज़े खुले छोड़ दिए हैं."
राजेश कृष्णन का कहना है, "चावल की उस जीई क़िस्म के एक छोटे से प्रयोग की वजह से अमरीका के चावल उद्योग में इतना बड़ा भूचाल आ गया था और उसकी वजह से बहुत से अमरीकी किसान फिर से संभल नहीं सके. भारत में इस तरह के संकट से बचने का बस यही एक रास्ता है कि इस तरह के फ़सल प्रयोग या उनकी पैदावार नहीं होने दी जाए."
जोखिम
ग्रीनपीस की इस रिपोर्ट में अमरीका के उस चावल उद्योग संकट का ज़िक्र किया गया है जिसमें अमरीका भर में चावल की आपूर्ति प्रभावित हुई थी और धान उगाने वाले किसानों, मिलों, कारोबारियों और दुकानों पर चावल बेचने वाले सभी कारोबारियों को बड़ा नुक़सान हुआ था.
इस संकट से अमरीका का लगभग 63 प्रतिशत चावल निर्यात प्रभावित हुआ था और चावल उद्योग को लगभग एक अरब बीस करोड़ डॉलर का नुक़सान होने का अनुमान लगाया गया था.
भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत का कहना था, "भारत में बासमती चावल के उत्पादक जीई तकनीक से मुक्त रहना चाहते हैं लेकिन जीई क़िस्मों का प्रयोग तो उन्हीं खेतों में होगा जिनके पास वाले खेतों में बासमती क़िस्म उगाई जाती है जिससे बासमती की क़िस्में दूषित होने का ख़तरा है और अगर ऐसा होता है तो देश का लगभग 7035 करोड़ रुपए का निर्यात बाज़ार प्रभावित हो सकते हैं और अंततः नुक़सान हमारे किसानों को भुगतना पड़ेगा."
भारत सरकार ने साल 2007 में देश में 12 स्थानों पर धान की जीई क़िस्मों का प्रयोग करने की इजाज़त दी है जिनमें से एक ऑउत्तर प्रदेश के लखनऊ के पास का एक गाँव भी है.
उस इलाक़े को हालाँकि बासमती के लिए मशहूर माना जाता है. सुप्रीम कोर्ट के एक अंतरिम आदेश की वजह से उस क़िस्म की रोपाई करने में ज़रा देरी हुई है लेकिन वह अगले महीने तक भी हो सकती है।
बीबीसी हिन्दी से साभार

Monday, October 15, 2007

कालाहांडी का एक और सच


राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना यानी सरकारी लूट
परशुराम राय

आजादी के 6 दशक बाद भी भूख और गरीबी देश के एजेंडा पर ऊपर नहीं आ सके हैं. बेशक एक जमाने में गरीबी हटाओं का एक नारा चला और अब राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना इस दिशा में एक बड़ा कदम है. लेकिन जिस मकसद को लेकर यह योजना लागू की गई, वह पूरा नहीं हो सका है. और कहीं नहीं, पलायन और भूखमरी का पर्याय बन गए कालाहांडी में यह योजना सबसे बड़ा छलावा साबित हुई है. इसकी आड़ में करोड़ों रुपए की हेराफेरी का मामला सामने आया है. इस मद की 90 फीसदी से ज्यादा रकम गरीबों ओर जरुरतमंदों तक पहुंची ही नहीं. पेश है, सेंटर फार एन्वायरमेंट एंड फुड सिक्योरिटी के निदेशक परशुराम राय की एक खास रिपोर्टराष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (एनआरइजीए) को स्वतंत्र भारत के इतिहास में गरीबों के सबसे अनुकूल, ग्रामीणों के हक में और सबसे स्वाभाविक अधिनियम बताया जा रहा है. यदि इस ऐतिहासिक अधिनियम को ईमानदारी से शब्दशः लागू किया जाता तो यह ग्रामीण भारत का भविष्य और किस्मत बदल सकता था. एनआरइजीए ने देश के ग्रामीण गरीबों को भारत के देहात में जीवन यापन की सुरक्षा और पर्यावरणीय संतुलन कायम करने में सक्रिय हिस्सेदारी निभाने का मौका उपलब्ध कराया है. ग्रामीण रोजगार योजना के लाभार्थी न तो कल्याणकारी राज्य द्वारा दिए जाने वाला दान ग्रहण कर रहे हैं और न ही वे राष्ट्रीय कोष पर किसी तरह का वित्तीय बोझ हैं. वास्तव में वे संपत्ति के निर्माण, पारिस्थितिक के पुनर्निर्माण के सक्रिय कारक के साथ ही राष्ट्रीय विकास में सक्रिय भागीदारी करने वाले मानवीय इंजन है. लेकिन इन सभी उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए जरूरी है कि इस अधिनियम पर ईमानदारी से अमल हो. लेकिन यह एक महान त्रासदी साबित होगी यदि एनआरइजीए सरकारी बाबूओं के लिए पैसा उगाहने की मशीन बन जाए. उड़ीसा देश का सबसे गरीब राज्य है, जहां घोर गरीबी और भुखमरी के साथ जीवन यापन करने वाले गरीबों का प्रतिशत में आंकड़ा सबसे ज्यादा है. लिहाजा कोष के आवंटन के मामले में इस राज्य को सर्वोच्च प्राथमिकता में होना चाहिए. एनआरइजीए के तहत वर्ष 2006-07 में उड़ीसा को कुल 890 करोड़ रु की राशि आवंटित की गई, जिसमें से उसने 733 करोड़ रु खर्च भी कर डाले. उड़ीसा सरकार के आंकड़ों के मुताबिक उसने 2006-07 के दौरान 13,94,169 परिवारों के लिए 7.99 करोड़ श्रम दिवसों का सृजन किया था. दूसरे शब्दों में प्रत्येक जरूरतमंद और इच्छुक परिवारों को इस साल औसतन 57 दिन काम उपलब्ध कराया गया और एनआरइजीए के दायरे में आने वाले 19 जिलों में से एक भी जरूरतमंद परिवार को काम देने से इंकार नहीं किया गया. उड़ीसा सरकार का यह भी दावा है कि वर्ष 2006-07 के दौरान 1,54,118 परिवारों ने सौ दिन रोजगार हासिल किया. दुर्भाग्य से उड़ीसा के 100 गांवों में किए गए एक सर्वेक्षण से यह सनसनीखेज जानकारी सामने आई है कि सरकार के ये सभी दावे झूठे हैं और एनआरइजीए के कोष के धन की हेराफेरा के लिए सरकारी रिकॉर्डों में फर्जी तरीके से दर्ज किए गए हैं. उड़ीसा के छह सबसे गरीब जिलों में किए गए एक सर्वेक्षण में यह जानकारी सामने आ रही है कि एनआरइजीए के तहत जो 733 करोड़ रु खर्च किए गए थे, उसमें से 500 करोड़ से भी ज्यादा की राशि सरकारी अधिकारियों ने हड़प ली या इसका दुरुपयोग किया. यह सर्वेक्षण दिल्ली के सेंटर फार एन्वायरमेंट एंड फुड सिक्योरिटी (सीईएफएस) द्वारा केबीके यानी कालाहांडी-बोलांगीर-कोरापुट क्षेत्र के छह जिलों बोलांगीर, नुआपाड़ा, कालाहांडी, कोरापुट नबरंगपुर और रायगड़ा के 100 गांवों में किया गया.फर्जी काम, फर्जी भुगतानहमारा आकलन बताता है कि जमीन पर 2 करोड़ से भी कम श्रम दिवसों के रोजगार का सृजन किया गया, जबकि 6 करोड़ से भी अधिक के श्रम दिवसों के रोजगार फर्जी जॉब कार्ड और फर्जी मस्टर रोल के जरिए कागजों में दिखाए गए. सीइएफएस के सर्वेक्षण ने खुलासा किया कि वास्तव में एनआरइजीए के दायरे में आने वाले राज्य के 19 जिलों में जरूरतमंद परिवारों को औसतन पांच दिन से अधिक का रोजगार उपलब्ध नहीं कराया गया और बड़ी संख्या में जरूरतमंद परिवारों को रोजगार देने से इंकार कर दिया गया.इन 100 गांवों में हम एक भी ऐसा परिवार नहीं तलाश पाए जिसे 100 दिन का रोजगार मिला हो. हमें बहुत कम ऐसे परिवार मिले, जिन्हें वास्तव में 40 से 60 दिन का रोजगार मिल पाया था. और बाकी के परिवारों का हाल यह था कि यदि उन्हें रोजगार मिला भी था तो बस 5 से 21 दिन के लिए. हालांकि इन सभी परिवारों का ऑनलाइन जॉब कार्ड फर्जी था या उससे छेड़छाड़ की गई थी और उनमें 111 दिन, 108 दिन, 104 दिन, 102 दिन, 100 दिन, 96 दिन, 84 दिन, 72 दिन, 65 दिन, 60 दिन, 52 दिन और इसी तरह की प्रविशिष्टियां दर्ज थीं. उड़ीसा ने इस तरह से 733 करोड़ रु खर्च किए और 8 करोड़ श्रम दिवसों का सृजन किया. यों भी उड़ीसा के कालाहांडी जिले को देश की भूख की राजधानी के रूप में जाना जाता है. 2006-07 के दौरान इस जिले को एनआरइजीए पर अमल के लिए 111 करोड़ रु का आवंटन किया गया था. सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक जिले ने 72 करोड़ रु खर्च कर जिले के 121517 परिवारों के लिए 61.76 लाख श्रम दिवसों के रोजगार का सृजन किया. दूसरे शब्दों में इन 121517 परिवारों को औसतन 50 दिन का रोजगार उपलब्ध कराया गया. सरकारी दावों के मुताबिक इस वर्ष जिले में 100 दिन का रोजगार हासिल करने वाले परिवारों की संख्या 9074 थी. लेकिन जिले के 18 गांवों के हमारे सर्वेक्षण से यह जानकारी सामने आ रही है कि ये सारे दावे फर्जी हैं और यह सिर्फ सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हैं न कि कालाहांडी के गांवों में.कालाहांडी जिले के भवानीपटना ब्लाक के तालबेलगांव पंचायत में आने वाला पाल्सीपाड़ा घोर आदिवासी गांव है. यह गांव कालाहांडी जिले के मुख्यालय भवानीपटना से बमुश्किल 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. इस गांव का हरेक परिवार घोर गरीबी और भुखमरी के साथ जीने को अभिशप्त है. बच्चों के बेतरतीबी से फूले पेट, सूखी आंखें और पिचके हुए गाल वाकई रोंगटे खड़े कर देते हैं. राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत इस गांव के अधिकांश घरों को जॉब कार्ड और काम मिल चुके है. लेकिन इनमें से ज्यादातर रोजगार सिर्फ ऑनलाइन जॉब कार्ड और फर्जी मस्टर रोल में ही दर्ज हैं हकीकत में उन्हें कोई काम नहीं मिला है.किस्से सैकड़ों हैंपाल्सीपाड़ा गांव के गरीब आदिवासी रूपा मांझी को 2006-07 के दौरान वास्तव में 21 दिन का रोजगार दिया गया और उसे इसके एवज में 600 रुपए का भुगतान किया गया. रूपा मांझी को यह काम गरीबी उन्मूलन के बहुचर्चित एनआरइजीएस के अंतर्गत सड़क निर्माण की एक परियोजना के तहत उपलब्ध कराया गया. लेकिन उसके जॉब कार्ड में गलत तरीके से दर्ज किया गया कि उसने 336 दिनों तक काम किया. जबकि एनआरइजीएस की वेबसाइट में रूपा मांझी के ऑन लाइन जॉब कार्ड में दावा किया गया है कि उसे 102 दिनों का रोजगार दिया गया और 6310 रुपए का भुगतान किया गया. लेकिन इस 6310 रुपए में से वास्तव में सिर्फ 600 रुपए ही रूपा मांझी के हाथ में आए. रूपा मांझी के नाम के बाकी के 5710 रुपए जो कि कुल पारिश्रमिक के 90 फीसदी से भी ज्यादा है, को सरकारी अधिकारी हड़प गए. रूपा मांझी का मामला पाल्सीपाड़ा में एनआरइजीएस के फंड की हेराफेरी से जुड़ा अकेला मामला नहीं है. कालाहांडी के इस गरीब आदिवासी गांव में रूपा मांझी जैसे और लोग भी मौजूद है. इसी गांव के चंद्रा मांझी को ग्रामीण रोजगार योजना के तहत कोई काम नहीं मिला. लेकिन उसके जॉब कार्ड में फर्जी तरीके से 126 दिन का रोजगार दर्ज है. इसी तरह एनआरइजीएस की वेबसाइट में फर्जी तरीके से चंद्रा मांझी के नाम पर 108 दिनों का रोजगार और 5940 रुपए का भुगतान दर्ज है. इस मामले में तो सरकारी अधिकारी पारिश्रमिक की 100 फीसदी राशि हड़प गए. पाल्सीपाड़ा के एक और गरीब आदिवासी सुकला मांझी ने वास्तव में सड़क मरम्मत का 21 दिन का काम किया था और उसे इसके एवज में 600 रुपए का भुगतान किया गया था. लेकिन उसके जॉब कार्ड में फर्जी तरीके से दर्ज है कि उसे 126 दिन का रोजगार दिया गया. और जब हमने एनआरइजीएस की वेबसाइट पर सुकला मांझी के काम और भुगतान की पड़ताल की तो हमें इस गोरखधंधे का एक और ही संस्करण देखने को मिला. एनआरइजीएस में दर्ज फर्जी प्रविष्टि के मुताबिक सुकला मांझी को 104 दिनों तक काम दिया गया और 55 रुपए रोज की दर से 5720 रुपए का भुगतान किया गया. यानी सुकला मांझी के मामले में बाकी के 5120 रुपए सीधे तालबेलगांव पंचायत के विलेज लेवल वर्कर (ग्रामीण स्तर के कार्यकर्त) की जेब में चला गए. एनआरइजीएस की वेबसाइट में जनकिया मांझी के नाम पर 108 दिन का रोजगार और 5940 रुपए का भुगतान दर्ज है. लेकिन वास्तव में जनकिया मांझी ने सिर्फ 15 दिन काम किया और उसे सिर्फ 450 रुपए का भुगतान किया गया. इस मामले में पारिश्रमिक की 92 फीसदी राशि अधिकारियों के जेब में चले गए और लाभार्थी को सिर्फ 8 फीसदी राशि ही मिल पाई.दुर्योधन मुंड का ऑन लाइन जॉब कार्ड बताता है कि उसके परिवार को 108 दिन का रोजगार उपलब्ध कराया गया और इसके एवज में 5940 रुपए का भुगतान किया गया. लेकिन वास्तव में उसके परिवार को सिर्फ 21 दिन काम मिला और इसके बदले 650 रुपए का भुगतान किया गया. सरकारी अधिकारियों ने दुर्योधन मुंड को दो बार लूटा. इसी तरह जगत मांझी के जॉब और भुगतान संबंधी ऑन लाइन ब्यौरे के मुताबिक उसके परिवार को 108 दिन का रोजगार दिया गया और इसके बदले 5940 रुपए का भुगतान किया गया. लेकिन वास्तव में उसके परिवार को 15 दिन ही काम मिला और 700 रुपए का भुगतान किया गया. इस मामले में 5240 रुपए सीधे अधिकारियों की जेब में चले गए.लूट, लूट और लूटये तो पाल्सीपाड़ा के कुछ परिवारों के ही ब्यौरे है. इस गरीब आदिवासी गांव के और कई परिवारों को इसी तरह से छला गया. हमने इसी गांव के 18 और परिवारों का पता लगाया जिनके जॉब कार्ड में 108 दिन, 96 दिन और 72 दिन का रोजगार दर्ज है लेकिन इनमें से किसी भी परिवार को बमुश्किल 15 से 20 दिन का ही रोजगार उपलब्ध कराया गया. हमारा आकलन बताता है कि पाल्सीपाड़ा में एनआरइजीएस के तहत खर्च की गई 90 फीसदी राशि सरकारी अधिकारियों ने हड़प ली. घोर गरीबी और भुखमरी के बावजूद इस वंचित गांव के आधे से अधिक परिवारों को ग्रामीण रोजगार योजना के तहत कोई काम नहीं मिला. कालाहांडी जिले में पोखरी घाट एक और गांव है जहां ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना लागू है लेकिन आवंटित राशि के 95 फीसदी से भी अधिक का हिस्सा इस योजना को लागू करने वाले अधिकारियों की जेबों में चला गया. भवानीपटना के चांचेर पंचायत के इस गरीब गांव में 100 घर हैं, जिनमें 60 गोंड आदिवासी और 40 दलित हैं. घोर गरीबी और भुखमरी इस गांव में सहज ही देखी जा सकती है. मानव विकास सूचकांक में यह गांव निश्चित रूप से सबसे नीचे होगा. पोखरी घाट गांव के सिर्फ आधे परिवारों को ही जॉब कार्ड मिले हैं. इस गांव में 2006-07 के दौरान सिर्फ दो काम हुए. पहला है 3 लाख की लागत से बना नया तालाब और दूसरा है 4 लाख की लागत से तालपिपली से उप्परपिपली तक की सड़क का निर्माण. पोखरी घाट में ग्रामीण रोजगार योजना से संबंधित हर दस्तावेज फर्जी मिला. यहां एक भी जॉब कार्ड में दर्ज काम और उसके बदले किया गया भुगतान हकीकत में किए काम और किए गए भुगतान से मेल नहीं खाता. यहां तक कि जॉब कार्ड में दर्ज काम और भुगतान ऑन लाइन जॉब कार्ड में दर्ज प्रविशिष्टियों से मेल नहीं खाते. और जब हमने ग्रामीणों को बताया कि जाब कार्ड के मुताबिक उन्होंने दो से तीन महीने तक काम किया है, तो वे आवाक रह गए !चाबी मांझी पोखरी घाट का एक गोंड आदिवासी है और उसके परिवार को ग्रामीण रोजगार योजना के तहत एक भी दिन काम नहीं मिला. लेकिन चाबी मांझी के ऑन लाइन जॉब कार्ड में गलत तरीके से दर्शाया गया है कि उसके परिवार को 108 दिन का रोजगार दिया गया और इसके बदले 5940 रुपए का भुगतान किया गया. यानी चाबी मांझी के नाम की 5940 रुपए की पूरी राशि सरकारी अधिकारी डकार गए.बेदा मांझी पोखर घाट का एक और गोंड आदिवासी है जिसके परिवार को राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत कोई काम नहीं मिला. लेकिन बेदा मांझी का ऑन लाइन जॉब कार्ड बताता है कि उसके परिवार को 102 दिन का काम मिला और इसके बदले 5610 रुपए का भुगतान किया गया. यानी इस मामले में भी सौ फीसदी राशि प्रभारी अधिकारी डकार गए.काम नहीं, फिर भी ऑन लाइन भुगतानसीतापति पुजारी ने भी एनआरइजीएस के तहत कोई काम नहीं किया. लेकिन उसके ऑन लाइन जॉब कार्ड में दिखाया गया है कि उसे 72 दिन का काम उपलब्ध कराया गया और 3960 रुपए का भुगतान किया गया. इस मामले में भी सौ फीसदी राशि अधिकारी हड़प गए. अर्खिता पुजारी का ऑन लाइन जॉब कार्ड दिखाता है कि उसके परिवार को 108 दिन का रोजगार दिया गया और इसके बदले 5940 रुपए का भुगतान किया गया. लेकिन हकीकत में उसके परिवार को सिर्फ 8 दिन काम मिला और सिर्फ 500 रुपए का भुगतान किया गया. यानी अर्खिता पुजारी के नाम पर 92 फीसदी की राशि हड़प ली गई.इलामा नाइक के ऑन लाइन जॉब कार्ड में भी वही कहानी दोहराई गई है. इसके मुताबिक उसके परिवार को 108 दिन का रोजगार दिया गया और 5940 रुपए का भुगतान किया गया. लेकिन हकीकत में उसके परिवार को सिर्फ 20 दिन का काम और 500 रुपए का भुगतान किया गया. वास्तव में इलिमा को दो तरह से ठगा गया. पहला यह कि 55 रुपए रोज के हिसाब से 108 दिन के 1100 रुपए होते हैं लेकिन उसे सिर्फ 600 रु दिए गए. दूसरा यह कि अधिकारी उसके नाम का 90 फीसदी पारिश्रमिक खा गए.बुदु नाइक पोखरी घाट गांव का एक और गरीब आदिवासी है जिसके काम के अधिकार को संबंधित अधिकारियों ने छीन लिया. उसके परिवार ने वास्तव में 10 दिन ही काम किया और उसे 500 रुपए दिए गए लेकिन ऑन लाइन जॉब कार्ड में दिखाया गया है कि उसके परिवार को 108 दिन काम दिया गया और 5940 रुपए का भुगतान किया गया. इस मामले में भी 90 फीसदी राशि हड़प ली गई.इदाइ पुजारी के परिवार ने वास्तव में 8 दिन काम किया और उसे 400 रुपए दिए गए लेकिन उसके ऑन लाइन जॉब कार्ड की प्रविशिष्टियां बताती हैं कि उसके परिवार को 36 दिनों का काम उपलब्ध कराया गया और 1980 रुपए का भुगतान किया गया. यानी उसके नाम की 80 फीसदी राशि हड़प ली गई.पोखरी घाट में मची खुली लूट के ये कुछ उदाहरण हैं. वास्तव में इस गांव के किसी भी परिवार को 15-20 दिनों से ज्यादा काम नहीं मिला और 500-600 रुपए से ज्यादा का भुगतान नहीं किया गया. इसी गांव के 26 परिवारों के रोजगार और भुगतान की प्रविशिष्टियां बताती हैं कि उन्हें 2-3 महीने का काम दिया गया. इसके अलावा 12 से अधिक जॉब कार्ड में फर्जी तरीके से दर्शाया गया है कि संबंधित परिवारों को 108 दिन का रोजगार दिया गया. तीन कॉर्ड में 102 दिन और 4 कॉर्ड में 96 दिन के रोजगार की प्रविशिष्टि दर्ज हैं. कालाहांडी जिले के पाल्सीपाड़ा और पोखरी घाट गांवों की कहानी भ्रष्टाचार और वित्तीय गड़बड़ियों की अनूठी मिसाल नहीं हैं. यह कहानी है उड़ीसा के 5000 गांवों की जहां एनआरइजीएस लागू है. आप इसे क्या कहेंगे भ्रष्टाचार और वित्तीय गड़बड़ी या सरकारी बाबूओं की खुली लूट? और क्या एनआरइजीएस फंड का यह घोटाला राज्य की सरकारी मशीनरी के बिना संभव है?
www.raviwar.com से साभार

Saturday, August 18, 2007

Poor in India hard hit by floods

By Amelia Gentleman
International Herald Tribune
Thursday, August 16, 2007

Losing everything he owns has become a routine disaster for Shankar, 25, a landless laborer in the northeastern state of Bihar, who this month saw his home and belongings destroyed in some of the worst floods to hit north India in decades."This is the third time I've lost my house in the rains," he said, standing in water, peering into the shell of his home, hopeful of salvaging something from the ruins. "This year the rains were worse, and the waters are deeper. But in the end it's the same. I have nothing left."Only the roof of his thatch house was visible above the muddy green waters that turned his village of Malinagar into a lagoon two weeks ago. Beneath the rippling surface, the straw walls have slipped over and his stock of grain for the winter, his clothes, furniture and children's possessions are slowly rotting.The monsoon rains in India are a democratic force. When the skies open, the water pours on the homes of rich and poor alike. But after the deluge, the poor always suffer most.Bihar is the most backward state in India, barely touched by the soaring growth and new economic confidence of the major cities. Yet there are gradations within this poverty, and sub-classes of richer and poorer co-exist. The richer residents of Malinagar still have their homes, made from sturdy brick and concrete. Some managed to shelter on their flat roofs, when the flood came at the start of the month. The poorer, living in shacks without electricity, at the exposed edges of the village, had to flee to roughly made shelters on higher land.
Those with a few hundred rupees to spare were able to buy plastic sheeting from the market, which they slung between bamboo poles to protect their families against the lashing rain. Others had only the scant cover offered by saris and stitched-together sacks. The most ill-prepared huddled beneath plantain leaves. Later they witnessed their own flimsy homes sink beneath the waters, disintegrating in the currents.This week the flood began receding, replaced by a stinking, stagnating sludge, but villages remain cut off, and many of those houses that have re-emerged are uninhabitable. Hundreds of thousands of people are still sheltering beneath bed sheets along the raised highways crisscrossing the state, just inches away from the traffic, which grinds past, splattering them with mud. Life cannot yet begin again for most of the 14 million that the United Nations estimates have been affected by the crisis in Bihar.Unicef officials said Thursday that about 2,800 people in India, Bangladesh, Nepal and Pakistan have died since the monsoon season began from drowning, waterborne illnesses, snakebites or hunger. But for most, the real endurance test is just beginning. With crops destroyed and fields bloated with water, there will be no agricultural work for millions of landless laborers here for many months, leaving them to rely on the sporadic support of aid agencies and government relief organizations. Unicef said it was concerned by the prospect of worsening child malnutrition.In a certain light, in the lull between the storms, Malinagar becomes a mirage of watery beauty. Beyond the shells of drowned houses, the floodwaters from the burst Bagmati River stretch as far as the eye can see. A month ago, the lake was a parched wheat field. Now village girls sit like mermaids, combing their hair, half-submerged beneath the calm lake waters, cooling themselves; children shriek with excitement as they splash by the shores.But Shankar, who goes by only one name, finds nothing to rejoice at. He is familiar with the deprivation that follows the flood. His wife and two daughters, 6 and 1, live on the wages he earns as a laborer in the fields.
Those with a few hundred rupees to spare were able to buy plastic sheeting from the market, which they slung between bamboo poles to protect their families against the lashing rain. Others had only the scant cover offered by saris and stitched-together sacks. The most ill-prepared huddled beneath plantain leaves. Later they witnessed their own flimsy homes sink beneath the waters, disintegrating in the currents.This week the flood began receding, replaced by a stinking, stagnating sludge, but villages remain cut off, and many of those houses that have re-emerged are uninhabitable. Hundreds of thousands of people are still sheltering beneath bed sheets along the raised highways crisscrossing the state, just inches away from the traffic, which grinds past, splattering them with mud. Life cannot yet begin again for most of the 14 million that the United Nations estimates have been affected by the crisis in Bihar.Unicef officials said Thursday that about 2,800 people in India, Bangladesh, Nepal and Pakistan have died since the monsoon season began from drowning, waterborne illnesses, snakebites or hunger. But for most, the real endurance test is just beginning. With crops destroyed and fields bloated with water, there will be no agricultural work for millions of landless laborers here for many months, leaving them to rely on the sporadic support of aid agencies and government relief organizations. Unicef said it was concerned by the prospect of worsening child malnutrition.In a certain light, in the lull between the storms, Malinagar becomes a mirage of watery beauty. Beyond the shells of drowned houses, the floodwaters from the burst Bagmati River stretch as far as the eye can see. A month ago, the lake was a parched wheat field. Now village girls sit like mermaids, combing their hair, half-submerged beneath the calm lake waters, cooling themselves; children shriek with excitement as they splash by the shores.But Shankar, who goes by only one name, finds nothing to rejoice at. He is familiar with the deprivation that follows the flood. His wife and two daughters, 6 and 1, live on the wages he earns as a laborer in the fields.
Those with a few hundred rupees to spare were able to buy plastic sheeting from the market, which they slung between bamboo poles to protect their families against the lashing rain. Others had only the scant cover offered by saris and stitched-together sacks. The most ill-prepared huddled beneath plantain leaves. Later they witnessed their own flimsy homes sink beneath the waters, disintegrating in the currents.This week the flood began receding, replaced by a stinking, stagnating sludge, but villages remain cut off, and many of those houses that have re-emerged are uninhabitable. Hundreds of thousands of people are still sheltering beneath bed sheets along the raised highways crisscrossing the state, just inches away from the traffic, which grinds past, splattering them with mud. Life cannot yet begin again for most of the 14 million that the United Nations estimates have been affected by the crisis in Bihar.Unicef officials said Thursday that about 2,800 people in India, Bangladesh, Nepal and Pakistan have died since the monsoon season began from drowning, waterborne illnesses, snakebites or hunger. But for most, the real endurance test is just beginning. With crops destroyed and fields bloated with water, there will be no agricultural work for millions of landless laborers here for many months, leaving them to rely on the sporadic support of aid agencies and government relief organizations. Unicef said it was concerned by the prospect of worsening child malnutrition.In a certain light, in the lull between the storms, Malinagar becomes a mirage of watery beauty. Beyond the shells of drowned houses, the floodwaters from the burst Bagmati River stretch as far as the eye can see. A month ago, the lake was a parched wheat field. Now village girls sit like mermaids, combing their hair, half-submerged beneath the calm lake waters, cooling themselves; children shriek with excitement as they splash by the shores.But Shankar, who goes by only one name, finds nothing to rejoice at. He is familiar with the deprivation that follows the flood. His wife and two daughters, 6 and 1, live on the wages he earns as a laborer in the fields.
"There is no work, so there is no money," he said. "I\'m worried about how the children will eat. Even now we are eating dry bread with salt. It\'s very sad for the children to live like that."The village leader, Vijay Sharma, said those with the least to lose had lost the most. "The richer villagers have ways of working things out. The poorest will not get any work for months more. I don\'t know how they are going to survive," he said.At a national level, the plight of these flood victims attracts little compassion. Early this month, when the United Nations declared these floods the worst in living memory, the miserable condition of the 31 million affected in India was widely covered internationally but was neither front-page news in Delhi newspapers nor featured on national news channels. Instead, bulletins were dominated by the sentencing of a Bollywood star to jail. In one paper, flood coverage was restricted to a short piece on animals being evacuated from a wildlife park.Such apathy is not unusual. English-language newspapers in India often neglect the suffering of the rural poor, more preoccupied with the triumphs of the emerging India than the familiar stories of extreme hardship experienced by hundreds of millions of Indians living on the land.Even within the government, attempts to implement a national flood prevention policy have been half-hearted. The official Web site for the Water Resources Ministry states that a National Flood Commission was established in 1976 to draw up a "coordinated" and "scientific" approach to the problem, but added: "Though the report was submitted in 1980 and accepted by government, not much progress has been made in the implementation of its recommendations."Saifuddin Soz, the Indian water resources minister, said that the suggestions of a more recent 2004 task force on flood prevention had also not been implemented because of funding shortages. He said he was hopeful that more resources might be granted as a result of the severe flooding this year. "Once the crisis is over I will be calling on the cabinet to create a national commission for flood management," he said."There is no work, so there is no money," he said. "I'm worried about how the children will eat. Even now we are eating dry bread with salt. It's very sad for the children to live like that."The village leader, Vijay Sharma, said those with the least to lose had lost the most. "The richer villagers have ways of working things out. The poorest will not get any work for months more. I don't know how they are going to survive," he said.At a national level, the plight of these flood victims attracts little compassion. Early this month, when the United Nations declared these floods the worst in living memory, the miserable condition of the 31 million affected in India was widely covered internationally but was neither front-page news in Delhi newspapers nor featured on national news channels. Instead, bulletins were dominated by the sentencing of a Bollywood star to jail. In one paper, flood coverage was restricted to a short piece on animals being evacuated from a wildlife park.Such apathy is not unusual. English-language newspapers in India often neglect the suffering of the rural poor, more preoccupied with the triumphs of the emerging India than the familiar stories of extreme hardship experienced by hundreds of millions of Indians living on the land.Even within the government, attempts to implement a national flood prevention policy have been half-hearted. The official Web site for the Water Resources Ministry states that a National Flood Commission was established in 1976 to draw up a "coordinated" and "scientific" approach to the problem, but added: "Though the report was submitted in 1980 and accepted by government, not much progress has been made in the implementation of its recommendations."Saifuddin Soz, the Indian water resources minister, said that the suggestions of a more recent 2004 task force on flood prevention had also not been implemented because of funding shortages. He said he was hopeful that more resources might be granted as a result of the severe flooding this year. "Once the crisis is over I will be calling on the cabinet to create a national commission for flood management," he said.
Among the homeless, waiting for the waters to dry up, there was less optimism.Across Bihar, memories remain fresh of Gautam Goswami, a government official named as one of "Asia's heroes" by Time magazine for his "brilliant" coordination relief operations after the 2004 floods, who later was accused of embezzling $2 million in flood relief money. The state's reputation for official corruption is well-entrenched, and local journalists question whether money allocated for repairing the river banks was ever spent.Victims say the government response this year was slow. When the floods broke, the Bihar chief minister, Nitish Kumar, was touring Mauritius. When he returned a week later he was pelted with stones by flood victims, furious at his extended absence. This week there was rioting at two distribution camps in Bihar as the homeless fought for food aid. The police beat one flood survivor to death.Manohar Paswan, 45, stared across the water at the rubble that used to be his house, his head shaven out of respect for the youngest of his seven children, a 6-month-old boy, Nitish, who died a week ago.Thursday after being bitten by one of the poisonous snakes that thrive in the floodwaters. Marooned, there was no way of getting help and Nitish soon died. Now, with no prospect of work, Paswan is concerned at how his family will eat in the months to come."Government help is nowhere to be seen," he said Among the homeless, waiting for the waters to dry up, there was less optimism.Across Bihar, memories remain fresh of Gautam Goswami, a government official named as one of "Asia's heroes" by Time magazine for his "brilliant" coordination relief operations after the 2004 floods, who later was accused of embezzling $2 million in flood relief money. The state's reputation for official corruption is well-entrenched, and local journalists question whether money allocated for repairing the river banks was ever spent.Victims say the government response this year was slow. When the floods broke, the Bihar chief minister, Nitish Kumar, was touring Mauritius. When he returned a week later he was pelted with stones by flood victims, furious at his extended absence. This week there was rioting at two distribution camps in Bihar as the homeless fought for food aid. The police beat one flood survivor to death.Manohar Paswan, 45, stared across the water at the rubble that used to be his house, his head shaven out of respect for the youngest of his seven children, a 6-month-old boy, Nitish, who died a week ago Thursday after being bitten by one of the poisonous snakes that thrive in the floodwaters. Marooned, there was no way of getting help and Nitish soon died. Now, with no prospect of work, Paswan is concerned at how his family will eat in the months to come."Government help is nowhere to be seen," he said.

Friday, August 17, 2007

भारत को एनपीटी जैसी ही शर्तों का पालन करना होगा : हावर्ड

मेलबर्न (भाषा)। आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री जान हावर्ड ने आज कहा कि भारत ने हालांकि परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं लेकिन कैनबरा से यूरेनियम हासिल करने के लिए उसे इस संधि जैसी ही शर्तों का पालन करना होगा।हावर्ड ने आज एबीसी रेडियो से कहा मैं आपके श्रोताओं को आश्वस्त कर सकता हूं कि समझौते पर एनपीटी जैसे ही सुरक्षा मानकों का पालन होगा। यह भारत को परमाणु हथियारों के विकास में ईंधन के प्रयोग से रोकेगा। भारत एनपीटी पर हस्ताक्षर न करने वाले चार देशों में से एक है लेकिन इसके बावजूद हावर्ड कल रात अपने भारतीय समकक्ष मनमोहन सिंह के साथ एक सैद्धांतिक समझौते पर पहुंच गए।हावर्ड ने कहा यह एक अलग मामला है और भारत ने एनपीटी पर दस्तखत नहीं किए हैं लेकिन हमारा विश्वास है कि यह व्यवस्था एनपीटी जैसे मानकों वाली ही होगी। उन्होंने कहा कि दोनों देश द्विपक्षीय सुरक्षा मानक समझौते में प्रवेश करेंगे और भारत को ऐसा ही समझौता अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के साथ करना होगा।हावर्ड ने कहा भारत पर ठीक वैसी ही शर्तें लगने जा रही हैं जैसी कि रूस और चीन पर लगी हैं तथा मेरा मानना है कि फ्रांस पर भी और हम फ्रांस को सालों से यूरेनियम बेच रहे हैं। आस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री ने कहा मैंने कल रात भारतीय प्रधानमंत्री से बातचीत की और मैंने उन्हें सभी शर्तों से अवगत कराया। मैं आगामी कुछ दिनों में उन्हें लिखित रूप से यह पुष्टि करने जा रहा हूं कि समझौते के लिए सभी शर्तों का पालन किया जाए।उल्लेखनीय है कि आस्ट्रेलिया यूरेनियम का एक बहुत बड़ा उत्पादक देश है और इसके दक्षिणी क्षेत्र में विश्व के सबसे बड़े माने जाने वाले कुछ भंडारण केंद्र हैं।
Last Updated[ 8/17/2007 11:18:06 AM]
राष्ट्रीय सहारा से साभार