राजकिशोर
पतन का एक लक्षण यह है कि हर चीज अपनी उल्टी स्थिति में दिखाई पड़ती है। किसान किसान नहीं रह जाता, व्यापारी हो जाता है। व्यापारी अपने उत्पादों के लिए कच्चा माल जुटाने के लिए जमीन खरीदता है और खेती करवाने लगता है। कवि-लेखक पैसेवालों का गुणगान करने लगते हैं और पैसेवाले देश को बताने लगते हैं कि उसे किस दिशा में जाना चाहिए। शासन करनेवाले बुद्धिजीवी को नौकर रखते हैं और बुद्धिजीवी वही कहने लगते हैं जो उन्हें रोजगार देनेवाले सुनना चाहते हैं। ऐसी स्थिति में शिक्षा मात्र शिक्षा कैसे रह सकती है? उसकी खरीद-बिक्री शुरू हो जाती है। स्कूल-कॉलेजों में शिक्षक की हैसियत सबसे नीचे चली जाती है और प्रबंधक तय करने लगते हैं कि उनके संस्थान में किसे प्रवेश मिलेगा और किन शर्तों पर मिलेगा।
दिल्ली में आजकल नर्सरी कक्षाओं में प्रवेश चल रहा है। अनेक स्कूलों ने अपने दरवाजे पर नोटिस टांग दिया है : एडमिशन फुल। जहां प्रवेश चल रहे हैं, वहां जितनी कार्यवाही खुले में हो रही है, उससे ज्यादा कार्यवाही गोपन में । जब से न्यायालय ने आदेश दिया है कि नर्सरी कक्षाओं में प्रवेश के लिए बच्चों का इंटरव्यू नहीं लिया जाएगा और प्रवेश "पहले आओ पहले पाओ के आधार पर होगा, तब से स्कूल प्रबंधकों ने बच्चों का चयन करने के बदले अभिभावकों का चयन करना शुरू कर दिया है। प्रतिष्ठित स्कूलों में यह पहले भी होता था, पर अब सभी प्रबंधक इस उत्पादक विधि से काम लेने लगे हैं। वे छात्रों को नहीं मापते (पहले भी कहां मापा जाता था -- यह एक ढोंग था, ताकि कम अमीर परिवारों के बच्चों को ठुकराया जा सके), सीधे अभिभावकों को मापते हैं। जिन बच्चों को नर्सरी के लिए लेना है, उनकी प्रतिभा और ज्ञान में उन्नीस-बीस का भी फर्क नहीं होता। ईश्वर के कारखाने में इतना ऊंचा-नीचा नहीं है। लेकिन संसार में आ चुकने के बाद बच्चे की सांसारिक हैसियत उसके माता-पिता (ज्यादातर पिता, क्योंकि माता की हैसियत खुद पिता की हैसियत से तय होती है) से निर्धारित होती है।
इसलिए अभिभावक की परीक्षा लेने के लिए एक अंक पत्र बना लिया जाता है -- उसने कितनी पढ़ाई की है, उसका वित्तीय स्तर क्या है, वह किस पेशे में है, उसकी पत्नी की शैक्षणिक स्थिति क्या है, घर में अंग्रेजी बोली जाती है या मातृभाषा, चार चक्के वाला वाहन है या नहीं और है तो कौन-सा वाहन है आदि-आदि पूछा जाता है तथा प्रत्येक वर्ग के लिए अंक निर्धारित कर दिए जाते हैं। जिस अभिभावक को अच्छे अंक मिलते हैं, उसके बच्चे को ले लिया जाता है। इसके द्वारा प्रबंधक का आशय यह होता है कि हम सफल और शिक्षित परिवारों के बच्चों को ही पढ़ाएंगे, ताकि हमारे स्कूल का नाम रोशन हो। इन अभिभावकों से भी अच्छे-खासे पैसे वसूल किए जाते हैं। ये अपने बच्चों के प्रवेश की खुशी में दे भी देते हैं। पचीस-तीस हजार के लिए क्या किसी को दुखी करना। इतना तो एक बर्थडे पर खर्च हो जाता है।
उनका क्या होता है जिनके बच्चों को प्रवेश नहीं मिलता? यह किस्सा ज्यादा मजेदार है। सही व्यवस्था में हर आदमी का एक भविष्य होता है, गलत व्यवस्था में भविष्य की खरीद-बिक्री की प्रतिद्वंद्विता होती है। जो अभिभावक फेल हो जाता है, वह मुख्य सड़क से निकल कर अंधेरी-बंद गलियों में टहलने लगता है। यहां उसे बताया जाता है कि ढाई लाख रुपए देने से काम बन जाएगा। जिनकी जेब फूली हुई होती है और मुट्ठी खुली हुई, वे ऐसे किसी प्रस्ताव की प्रतीक्षा करते ही होते हैं। चट मंगनी पट ब्याह। उनके बच्चों को दाखिला मिल जाता है। मुश्किल उनके सामने पेश आती है जो इतना खर्च करना नहीं चाहते या जिनकी इतनी सामर्थ्य नहीं है। वे स्कूल-दर-स्कूल भटकते हैं, सोर्स की खोज करते हैं फिर अंतत: किसी ऐसे-तैसे स्कूल में बच्चे को प्रवेश दिला कर भारी मन से घर लौटते हैं। सुना है, तक्षशिला विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर एक विद्वान बैठता था। जिस विद्यार्थी को विश्वविद्यालय में प्रवेश लेना होता था, उसकी परीक्षा वह विद्वान ही लेता था। विद्वान द्वारा प्रमाणित विद्यार्थी को प्रवेश मिल जाता था। यह तरीका इसलिए निकाला गया होगा कि सिर्फ उन्हीं छात्रों को लिया जाए जो वाकई पढ़ना चाहते हैं। इसी का आधुनिक रूप है, इंट्रेन्स टेस्ट। मतलब हम तक्षशिला विश्वविद्यालय के दिनों से थोड़ा भी आगे नहीं बढ़े हैं, इसके बावजूद कि तब शिक्षा पर होनेवाला खर्च बहुत नगण्य था और आज लगभग हर देश के पास इतने संसाधन हैं कि वह अपने हर बच्चे को नौनिहाल बना सके। क्या यह बाजिब है कि आगे पढ़ने का अधिकार उन्हें ही दिया जाए जो पहले से ही पढ़ने में आगे हैं? मैं ऐसे कॉलेजों को आदर की दृष्टि से नहीं देखता जहां सिर्फ होनहार बच्चों को लिया जाता है और उन्हें रगड़-रगड़ कर चमकाया जाता हैं। मैं ऐसे कॉलेजों के खुलने का इंतजार कर रहा हूं जहां सबसे कमजोर विद्यार्थी को सबसे पहले लिया जाएगा और उसे योग्य से योग्य बनाने की कोशिश होगी। हर सोना कीमती है, पर पत्थर होते हुए भी पारस सोने से ज्यादा कीमती है जो लोहे को भी सोना बना देता है। पारस पत्थर एक मिथक है। प्रकृति की सीमा है। वह अपने नियमों को तोड़ नहीं सकती। लेकिन मनुष्य रोज एक नियम बना सकता है और अगले दिन उसमें सुधार कर सकता है। जिस व्याकरण के तहत यह होता है, उसका नाम है संस्कृति। शिक्षा संस्कृति का अंग है।
संस्कृति की मांग यह है कि हर बच्चे को विकसित होने का एक जैसा अधिकार मिले। इसी नीयत से नर्सरी में प्रवेश के लिए बच्चों की परीक्षा लेना बंद कर दिया गया है। लेकिन न्यायालय ने अभिभावकों की परीक्षा लेने पर रोक नहीं लगाई। सो स्कूलों के प्रबंधक इस तरह आचरण कर रहे हैं जैसे इन अभिभावकों का ही प्रवेश होगा और ये ही कक्षा में पढ़ने आएंगे। यह बच्चों के साथ अन्याय है। उन्हें तो किसी ने यह अधिकार नहीं दिया कि वे अपने अभिभावक चुन लें। फिर अभिभावक की किसी कमी के कारण वे क्यों भुगतें?
शिक्षा व्यवस्था के इन अनैतिक हठों के परिणामस्वरूप ही शिक्षा का प्रसार बढ़ने के बावजूद समाज में सचमुच के शिक्षित लोग कम दिखाई देते हैं। जेब में कोई भारी डिग्री होने से ही दिमाग के बंधन नहीं खुल जाते। बल्कि अक्सर देखा जाता है कि शिक्षित लोग अनपढ़ लोगों से ज्यादा संकीर्ण और स्वार्थी होते हैं। गांधी जी ने कहा था कि मुझे सबसे अधिक निराशा भारत के बौद्धिक वर्ग से हुई है। आज का गांधी कहेगा कि इस देश के शिक्षित लोग समाज पर सबसे बड़ा बोझ हैं।
व्व्व.राष्ट्रीयसहारा.कॉम से साभार
तुम पूछते हो कि मेरी कविताएं क्यों नहीं करतीं फूलों और पत्तियों की बातें मेरे साथ आओ और देखो सड़कों पर बहता हुआ लहू ...पाब्लो नेरुदा.
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Tuesday, January 27, 2009
Friday, July 25, 2008
स्पीकर का लोभ या पार्टी की तानाशाही
राजकिशोर
लोकसभा की कार्यवाही और सांसदों के आचरण के स्तर पर आई भयावह गिरावट की चर्चा बहुत हो रही है, लेकिन स्पीकर सोमनाथ चटर्जी के व्यवहार पर सार्वजनिक चर्चा बहुत कम देखने में आई। ऐसा मान लिया गया था कि यह स्पीकर और उनकी पार्टी सीपीएम के बीच का मामला है। लेकिन अब जबकि सोमनाथ को पार्टी से निकाल दिया गया है, यह मामला निश्चय ही विवादास्पद बन गया है। कुछ लोगों को पार्टी के इस निर्णय में तानाशाही की बू आ रही है, तो कुछ स्पीकर की मनमानी को पचा नहीं पा रहे हैं। हमारी लोकसभा के छोटे-से इतिहास में यह अपने ढंग की पहली घटना है। इसलिए इस पर संजीदगी से विचार होना चाहिए, ताकि स्पीकर पद की कुछ मर्यादाएं निश्चित हो सकें। अराजकता के वर्तमान माहौल में कोई ऐसा बिन्दु नहीं छोड़ना चाहिए, जहां अराजकता को पनपने का अवसर मिल सके - यह अराजकता स्वयं स्पीकर की हो या उसकी पार्टी की। कायदे से स्पीकर ही सदन का नेता होता है। दिलचस्प है कि लोकसभा के अध्यक्ष को ‘स्पीकर’ कहा जाता है, पर वह सिवाय सदन को संचालित करने के अपनी आ॓र से कुछ भी ‘स्पीक’ नहीं करता। जब इंग्लैंड की संसद का, जिसे दुनिया की सभी ‘संसदों की मां’ कहा जाता है, विकास हो रहा था, उस समय संसदीय शासन नहीं था। संसद थी, पर विचार-विमर्श के लिए। वह न कानून बना सकती थी, न यह तय कर सकती थी कि सरकार की नीतियां क्या होंगी। यह सारा काम सम्राट ही करता था। उन दिनों स्पीकर ही सदन की आ॓र से सदन का प्रतिवेदन सम्राट के सामने रखता था। इस तरह वास्तविक जगह पर बोलने वाला सांसद स्पीकर ही था। जैसे-जैसे शासन की संसदीय प्रणाली का विकास होने लगा, स्पीकर की भूमिका कम होती गई। अब उसका रोल सिर्फ इतना रह गया है कि वह सदन की कार्यवाही का संचालन करे तथा उसकी मर्यादाओं की रक्षा करे।संसदीय प्रणाली दलों के आधार पर चलती है। बहुत-से सांसद स्वतंत्र और निर्दलीय भी होते हैं। जिस व्य‡ि को स्पीकर की भूमिका निभानी है, उसे लोकसभा का सदस्य तो होना ही चाहिए। कायदे से किसी निर्दलीय को स्पीकर बनाया जाए, तो सबसे अच्छा हो। लेकिन ऐसा हो नहीं पाता है, क्योंकि सभी सत्ताारूढ़ दल या गठबंधन चाहते हैं कि स्पीकर उनका अपना प्रतिनिधि हो। इसलिए कि स्पीकर अपने दल या गठबंधन का हुआ, तो संसदीय कामकाज संपन्न करने में सरकार को आसानी होती है। हमारे देश में स्पीकर को एक और महत्वपूर्ण काम दिया गया है-- दलबदल विरोधी कानून के प्रावधानों के तहत यह निर्णय करने का कि दलबदल हुआ कि नहीं और हुआ, तो दलबदल करने वाले की संसदीय सदस्यता को रद्द करना। इसलिए भी स्पीकर का राजनीतिक मूल्य बढ़ गया है। हम जानते हैं कि हमारे अनेक स्पीकरों ने दलबदल के मामले में पक्षपातपूर्ण फैसले किए हैं और अपने से संबंधित दलों को फायदा पहुंचाया है। इसके बावजूद माना यही जाता है कि किसी खास दल का सदस्य होने के बावजूद जब कोई सांसद स्पीकर चुन लिया जाता है, तो वह वास्तव में दलविहीन हो जाता है। दलविहीन हो जाने से उसके हितों को क्षति न पहुंचे, इसलिए कई देशों में परंपरा है कि स्पीकर की सीट पर कोई भी दल अपना उम्मीदवार खड़ा नहीं करता, ताकि वह दुबारा र्नििववाद चुना जा सके। हमारे देश में ऐसी कोई परंपरा नहीं बन पाई है। इसलिए यह श्य भी देखने में आता है कि स्पीकर का पद संभाल चुकने के बाद भी कोई सांसद बाद में मंत्रिमंडल का सदस्य हो जाता है या कहीं का राज्यपाल बना दिया जाता है। वर्तमान गृह मंत्री शिवराज पाटिल लोकसभा के स्पीकर रह चुके हैं। सोमनाथ चटर्जी एक आदर्श स्पीकर साबित हुए हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है। ‘लोकसभा’ चैनल शुरू कर उन्होंने निश्चय ही एक खास काम किया है, लेकिन वह स्पीकर चुने जाते समय सीपीएम के सदस्य थे। स्पीकर बनने के बाद उन्होंने अपनी पार्टी से इस्तीफा नहीं दिया। इसलिए सीपीएम के शीर्ष नेताओं ने राष्ट्रपति को अपने सांसदों की सूची देते समय सोमनाथ चटर्जी का नाम भी जोड़ लिया, तो तकनीकी तौर पर वे गलत नहीं थे। बेशक, वह भूल गए कि सोमनाथ चटर्जी सिर्फ सीपीएम के सांसद नहीं हैं, बल्कि लोकसभा के अध्यक्ष भी है। यह कोई मामूली भूल नहीं थी। इससे पता चलता है कि पार्टी में न्यूनतम संवेदनशीलता भी नहीं बची है। चूंकि स्पीकर को निर्दलीय माना जाता है, इसलिए पार्टी पॉलिटिक्स में खींचने के पहले उनसे संवाद तो करना ही चाहिए था और उनकी सहमति के बिना उनका नाम सूची में शामिल नहीं करना चाहिए था। यह दुख की बात है कि सीपीएम नेतृत्व ने अपनी इस त्रुटि के लिए सोमनाथ चटर्जी और लोकसभा से माफी भी नहीं मांगी, न ही किसी प्रकार का खेद ही व्यक्त किया। सिक्के का दूसरा पहलू भी है। सोमनाथ चटर्जी के इस ष्टिकोण की भी प्रशंसा नहीं की जा सकती कि सीपीएम के प्रति मेरी कोई प्रतिबद्धता नहीं है और यह फैसला मुझे करना है कि स्पीकर पद से इस्तीफा देना है या नहीं। स्पीकर को फूंक-फूंक कर कदम रखना चाहिए-- खासतौर से पतनशीलता के इस दौर में। जब उनकी पार्टी ने फैसला कर लिया कि उन्हें परमाणु करार के विरोध में स्पीकर के पद से इस्तीफा दे देना चाहिए, तो उनके लिए विचार-पुर्निवचार की कोई बात ही नहीं बचती। संसद के प्रति वफादारी और पार्टी के प्रति वफादारी में विरोधाभास नहीं होना चाहिए। सोमनाथ चटर्जी भी कम्युनिस्ट हैं। उनकी विचारधारा वही है, जो सीपीएम की विचारधारा है। इसलिए यह कैसे हो सकता है कि जब पार्टी परमाणु करार के मुद्दे पर यूपीए सरकार से समर्थन वापस लेने जैसा कठोर कदम उठा चुकी हो, तब सोमनाथ चटर्जी जैसे वरिष्ठ मार्क्सवादी नेता का अंत:करण अविचलित रहे और वे निष्पक्षता के आवरण में अपने विचार से संसद को और देश को वंचित रखें? उन्हें अपनी पार्टी के निर्णय को शिरोधार्य कर लोकसभा अध्यक्ष के पद से तत्काल इस्तीफा दे देना चाहिए था और इस प्रकार वे अन्य सांसदों से जिस प्रतिबद्धता, मर्यादा, अनुशासन और शील की अपेक्षा करते हैं, उसका एक उदाहरण अपने निजी आचरण से प्रस्तुत करना चाहिए था।
www.rashtriyasahara.com से साभार
लोकसभा की कार्यवाही और सांसदों के आचरण के स्तर पर आई भयावह गिरावट की चर्चा बहुत हो रही है, लेकिन स्पीकर सोमनाथ चटर्जी के व्यवहार पर सार्वजनिक चर्चा बहुत कम देखने में आई। ऐसा मान लिया गया था कि यह स्पीकर और उनकी पार्टी सीपीएम के बीच का मामला है। लेकिन अब जबकि सोमनाथ को पार्टी से निकाल दिया गया है, यह मामला निश्चय ही विवादास्पद बन गया है। कुछ लोगों को पार्टी के इस निर्णय में तानाशाही की बू आ रही है, तो कुछ स्पीकर की मनमानी को पचा नहीं पा रहे हैं। हमारी लोकसभा के छोटे-से इतिहास में यह अपने ढंग की पहली घटना है। इसलिए इस पर संजीदगी से विचार होना चाहिए, ताकि स्पीकर पद की कुछ मर्यादाएं निश्चित हो सकें। अराजकता के वर्तमान माहौल में कोई ऐसा बिन्दु नहीं छोड़ना चाहिए, जहां अराजकता को पनपने का अवसर मिल सके - यह अराजकता स्वयं स्पीकर की हो या उसकी पार्टी की। कायदे से स्पीकर ही सदन का नेता होता है। दिलचस्प है कि लोकसभा के अध्यक्ष को ‘स्पीकर’ कहा जाता है, पर वह सिवाय सदन को संचालित करने के अपनी आ॓र से कुछ भी ‘स्पीक’ नहीं करता। जब इंग्लैंड की संसद का, जिसे दुनिया की सभी ‘संसदों की मां’ कहा जाता है, विकास हो रहा था, उस समय संसदीय शासन नहीं था। संसद थी, पर विचार-विमर्श के लिए। वह न कानून बना सकती थी, न यह तय कर सकती थी कि सरकार की नीतियां क्या होंगी। यह सारा काम सम्राट ही करता था। उन दिनों स्पीकर ही सदन की आ॓र से सदन का प्रतिवेदन सम्राट के सामने रखता था। इस तरह वास्तविक जगह पर बोलने वाला सांसद स्पीकर ही था। जैसे-जैसे शासन की संसदीय प्रणाली का विकास होने लगा, स्पीकर की भूमिका कम होती गई। अब उसका रोल सिर्फ इतना रह गया है कि वह सदन की कार्यवाही का संचालन करे तथा उसकी मर्यादाओं की रक्षा करे।संसदीय प्रणाली दलों के आधार पर चलती है। बहुत-से सांसद स्वतंत्र और निर्दलीय भी होते हैं। जिस व्य‡ि को स्पीकर की भूमिका निभानी है, उसे लोकसभा का सदस्य तो होना ही चाहिए। कायदे से किसी निर्दलीय को स्पीकर बनाया जाए, तो सबसे अच्छा हो। लेकिन ऐसा हो नहीं पाता है, क्योंकि सभी सत्ताारूढ़ दल या गठबंधन चाहते हैं कि स्पीकर उनका अपना प्रतिनिधि हो। इसलिए कि स्पीकर अपने दल या गठबंधन का हुआ, तो संसदीय कामकाज संपन्न करने में सरकार को आसानी होती है। हमारे देश में स्पीकर को एक और महत्वपूर्ण काम दिया गया है-- दलबदल विरोधी कानून के प्रावधानों के तहत यह निर्णय करने का कि दलबदल हुआ कि नहीं और हुआ, तो दलबदल करने वाले की संसदीय सदस्यता को रद्द करना। इसलिए भी स्पीकर का राजनीतिक मूल्य बढ़ गया है। हम जानते हैं कि हमारे अनेक स्पीकरों ने दलबदल के मामले में पक्षपातपूर्ण फैसले किए हैं और अपने से संबंधित दलों को फायदा पहुंचाया है। इसके बावजूद माना यही जाता है कि किसी खास दल का सदस्य होने के बावजूद जब कोई सांसद स्पीकर चुन लिया जाता है, तो वह वास्तव में दलविहीन हो जाता है। दलविहीन हो जाने से उसके हितों को क्षति न पहुंचे, इसलिए कई देशों में परंपरा है कि स्पीकर की सीट पर कोई भी दल अपना उम्मीदवार खड़ा नहीं करता, ताकि वह दुबारा र्नििववाद चुना जा सके। हमारे देश में ऐसी कोई परंपरा नहीं बन पाई है। इसलिए यह श्य भी देखने में आता है कि स्पीकर का पद संभाल चुकने के बाद भी कोई सांसद बाद में मंत्रिमंडल का सदस्य हो जाता है या कहीं का राज्यपाल बना दिया जाता है। वर्तमान गृह मंत्री शिवराज पाटिल लोकसभा के स्पीकर रह चुके हैं। सोमनाथ चटर्जी एक आदर्श स्पीकर साबित हुए हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है। ‘लोकसभा’ चैनल शुरू कर उन्होंने निश्चय ही एक खास काम किया है, लेकिन वह स्पीकर चुने जाते समय सीपीएम के सदस्य थे। स्पीकर बनने के बाद उन्होंने अपनी पार्टी से इस्तीफा नहीं दिया। इसलिए सीपीएम के शीर्ष नेताओं ने राष्ट्रपति को अपने सांसदों की सूची देते समय सोमनाथ चटर्जी का नाम भी जोड़ लिया, तो तकनीकी तौर पर वे गलत नहीं थे। बेशक, वह भूल गए कि सोमनाथ चटर्जी सिर्फ सीपीएम के सांसद नहीं हैं, बल्कि लोकसभा के अध्यक्ष भी है। यह कोई मामूली भूल नहीं थी। इससे पता चलता है कि पार्टी में न्यूनतम संवेदनशीलता भी नहीं बची है। चूंकि स्पीकर को निर्दलीय माना जाता है, इसलिए पार्टी पॉलिटिक्स में खींचने के पहले उनसे संवाद तो करना ही चाहिए था और उनकी सहमति के बिना उनका नाम सूची में शामिल नहीं करना चाहिए था। यह दुख की बात है कि सीपीएम नेतृत्व ने अपनी इस त्रुटि के लिए सोमनाथ चटर्जी और लोकसभा से माफी भी नहीं मांगी, न ही किसी प्रकार का खेद ही व्यक्त किया। सिक्के का दूसरा पहलू भी है। सोमनाथ चटर्जी के इस ष्टिकोण की भी प्रशंसा नहीं की जा सकती कि सीपीएम के प्रति मेरी कोई प्रतिबद्धता नहीं है और यह फैसला मुझे करना है कि स्पीकर पद से इस्तीफा देना है या नहीं। स्पीकर को फूंक-फूंक कर कदम रखना चाहिए-- खासतौर से पतनशीलता के इस दौर में। जब उनकी पार्टी ने फैसला कर लिया कि उन्हें परमाणु करार के विरोध में स्पीकर के पद से इस्तीफा दे देना चाहिए, तो उनके लिए विचार-पुर्निवचार की कोई बात ही नहीं बचती। संसद के प्रति वफादारी और पार्टी के प्रति वफादारी में विरोधाभास नहीं होना चाहिए। सोमनाथ चटर्जी भी कम्युनिस्ट हैं। उनकी विचारधारा वही है, जो सीपीएम की विचारधारा है। इसलिए यह कैसे हो सकता है कि जब पार्टी परमाणु करार के मुद्दे पर यूपीए सरकार से समर्थन वापस लेने जैसा कठोर कदम उठा चुकी हो, तब सोमनाथ चटर्जी जैसे वरिष्ठ मार्क्सवादी नेता का अंत:करण अविचलित रहे और वे निष्पक्षता के आवरण में अपने विचार से संसद को और देश को वंचित रखें? उन्हें अपनी पार्टी के निर्णय को शिरोधार्य कर लोकसभा अध्यक्ष के पद से तत्काल इस्तीफा दे देना चाहिए था और इस प्रकार वे अन्य सांसदों से जिस प्रतिबद्धता, मर्यादा, अनुशासन और शील की अपेक्षा करते हैं, उसका एक उदाहरण अपने निजी आचरण से प्रस्तुत करना चाहिए था।
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Tuesday, July 22, 2008
विकासवादी होने के खतरे
अनिल चमड़िया
भारत में जातिवाद और सम्प्रदायवाद से समाज के टूटने का खतरा जाहिर किया जाता है। यह खतरा इसीलिए है कि समाज के विविधता के ढांचे और चरित्र को बचाए रखना चाहते हैं। समाज को उन लड़ाइयों से दूर रखना चाहते हैं जिससे आखिरकार समाज के बड़े हिस्से का हर स्तर पर नुकसान ही होना है। ये धर्म और जाति पुरानी व्यवस्थाओं के आधार रहे हैं जिन्हें आधुनिक व्यवस्था से दूर करने का लक्ष्य होता है। आधुनिक व्यवस्थाएं ये लक्ष्य राजनीतिक विचारधाराओं के आधार पर निर्धारित करती हैं लेकिन पुरानी व्यवस्थाओं के जो आधार रहे हैं उनसे जुड़े वगा के हित उसमें सुरक्षित होते हैं इसीलिए वे किसी भी स्तर पर उसे बनाए रखना चाहते हैं। वे उन आधारों को एक विचारधारा में परिर्वितत करने और उसे स्थापित करने की कोशिश लगातार करते हैं। लेकिन दूसरी तरफ आधुनिक व्यवस्थाओं की भी अपनी टकराहट होती है। वे नई-नई विचारधाराओं की जगह बनाने की कोशिश करती हंै। आधुनिकतम होती व्यवस्थाओं में विचारधाराओं का आधार जाति, लिग, धर्म और क्षेत्र से बदल जाता है। उस समय लगता है कि जातियां समानता ग्रहण कर रही हैं। धर्म की भूमिका कम हो रही है। पूरी दुनिया ही एक क्षेत्र में बदल गई है। शोषित, पीडित आबादी को मुक्ति मिल रही है। लेकिन एक उदाहरण से समझने की ये कोशिश की जा सकती है कि जो आधुनिक व्यवस्था में बदलने और विकास का अहसास है वह दूसरी तरफ कैसे एक अधीनता और असमानता को बनाए रखने की कोशिश आधुनिकतम कहलाने वाली विचारधाराएं करती रहती हैं।
सन 1660 का एक तथ्य है। उस समय दिल्ली की आबादी लगभग पांच लाख थी। उसमें आधी से ज्यादा आबादी झुग्गी-झोपडियों में रहती थी। इस संख्या का अनुमान 1661 में दिल्ली में आग लगने की एक घटना के तथ्यों से भी लगाया जा सकता है। उसमें 60 हजार झुग्गियां और झोपडियां जलकर राख हो गई थी। दूसरा तथ्य खेत में अनाज पैदा करने वालों से जुड़ा है। दिल्ली और आगरा के इलाके में गेहूं का उत्पादन करने वाले खेतिहरों की स्थिति ऐसी नहीं थी कि वे गेहूं खरीद सकें। तीसरा तथ्य औरंगजेब के बाद के इतिहास में उल्लेख मिलता है कि 1770 के आरम्भ में जितनी मौतें हुई और अनाज की जिस तरह से किल्लत देखी गई उतनी अतीत में न कभी देखी गई थी और न ही सुनी गई थीं। इन साढ़े तीन सौ वषा में व्यवस्थाएं आधुनिकतम होती चली गई हंै लेकिन ये कहने की जरूरत नहीं होगी कि व्यवस्थाएं कहां खड़ी रही हैं और आज भी हैं।
उपरोक्त स्थितियों के आलोक में कहा जा सकता है कि राजनीतिक विचारधाराओं ने नई व्यवस्थाओं में विकास को एक ऐसा आधार बनाया जिसे केन्द्र में रखकर असमानताओं के पुराने आधारों को खत्म किया जा सकता है। इसीलिए विकास की अवधारणा के अंदर तमाम तरह की राजनीतिक विचारधाराओं के बीच तीखे संघर्ष होते रहे हैं। विकास की धुरी पर राजनीतिक सत्तााएं बनती-बिगड़ती रही हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि विकास अपने आप में एक विचारधारा है पर विकास को एक ऐसी विचारधारा के रूप में विकसित किया गया है। पुरानी व्यवस्थाओं के आधार जातिवादी, सम्प्रदायवादी आदि रहे हैं उसी तर्ज पर विकासवादी जुड़ जाता है। भूमंडलीकरण की प्रक्रिया ने जाति और धर्म की तरह इसे एक विचारधारा के रूप में विकसित करने की कोशिश की है। भारतीय समाज को जातिवाद और सम्प्रदायवाद के मनोविज्ञान, मानसिक अवस्था और उसकी आक्रामकता के बारे में बताने की जरूरत नहीं है। लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि भारत जैसे देशों में विकासवाद और विकासवादियों का वही चरित्र है। भूमंडलीकरण की नई र्आिथक नीतियों के लागू करने के फैसले सरकार ने जितने चरणों में लिए हंै वे उस विचारधारा को करपंथी के रूप में विस्तार करने के चरण रहे हैं। इस विचारधारा के करपंथी होने के कम से कम दो लक्षण यहां देखे जा सकते हैं। पहला लक्षण शाइनिग इंडिया या भारत 2020 का नारा बनना है। यानी ये देखा जा रहा है कि लोग अपनी पहले की स्थिति में ही हैं लेकिन सत्तााएं विकासवादी कहलाती हैं। इसमें आवाज पैदा की जाती है कि दूरदराज कहीं सपने पूरे हो रहे हैं। दूसरे विकास के सवाल उठाने वाले आक्रमण के शिकार होते हैं। दिल्ली में लाखों की तादाद में झुग्गियों के गिराए जाने से लेकर छत्ताीसगढ़ में नदियों को बेच देने तक पर कोई सत्ताा का बाल बांका नहीं कर सका और न ही लाख से ऊपर की तादाद में किसानों की मौत को कोई देख पाया। जातिवाद और सम्प्रदायवाद की भयावहता इसी तरह की तो देखी जाती है। विकासवाद भी उपरोक्त तथ्यों के आधार पर कम से कम साढ़े तीन सौ वषा पुरानी स्थिति में हमें खड़ा किए हुए है। वहां अनाज का अभाव और गेहूं के ऊंचे भाव से भुखमरी और मौत, और कर्ज से किसानों की मौत में क्या अंतर है। पुराने विचार वहां और यहां केवल जाति, धर्म की तलाश करेंगे लेकिन नई विचारधारा ने विकासवादी एक नई जाति और धर्म को विकसित कर लिया है उसकी शिनाख्त कैसे होगी। व्यवस्था आधार के रूपों का भी आधुनिकीकरण कर देती है।
समाज ने जिन तमाम तरह की बहसों को जन्म दिया और वैचारिक लड़ाइयां लड़ी वे उसकी सांस्कृतिक पूंजी हैं। उनकी उपलब्धियों के तौर पर उसे देखा जा सकता है। लेकिन विकासवाद ने तमाम उन उपलब्धियों और सांस्कृतिक पूंजी पर अपना आक्रमण जमा लिया है। यदि भारतीय समाज और राजनीतिक व्यवस्थाओं में इस विचारधारा के प्रभावों का अध्ययन किया जाए तो ये बेहद गहरे स्तर पर सक्रिय और सूक्ष्म स्तर पर आक्रामक दिखाई देगा। इसने अपनी भाषा विकसित की है और दूसरी तरफ बेजुबां करने के लिए भाषा ही छीन ली है। यह अब अक्सर सुना जाता है कि अजीब सा लग रहा है या वह अजीब सा है। क्या कभी किसी समाज में ऐसा होता है कि उसके बीच कुछ खड़ा हो और वह अजीब सा लगे। यदि आश्चर्यजनक चीजें अचानक खड़ी होती हों तो ऐसा हो सकता है। लेकिन यहां तो अजीबों की कड़ी तैयार दिख रही है और समाज उसे व्यक्त करने के लिए भाषा भी तैयार नहीं कर पा रहा है। सारे संबंध विघटन के दौर से गुजर रहे हैं। विकास जब तक एक योजना और कार्यक्रम है वह आक्रमणकारी नहीं हो सकता है लेकिन जैसे ही वह विकासवादी होता है उसके खतरे शुरू हो जाते हैं। विकासवाद ने तमाम और खासतौर से समानता मूलक राजनीतिक विचारों को रक्षात्मक स्थिति में कर दिया है। इसने व्यक्ति की हरेक इकाई को अपने प्रभाव में कर रखा है। हमें और आपको इसके बारे में सोचना होगा।
www.rashtriyasahara.com से साभार
भारत में जातिवाद और सम्प्रदायवाद से समाज के टूटने का खतरा जाहिर किया जाता है। यह खतरा इसीलिए है कि समाज के विविधता के ढांचे और चरित्र को बचाए रखना चाहते हैं। समाज को उन लड़ाइयों से दूर रखना चाहते हैं जिससे आखिरकार समाज के बड़े हिस्से का हर स्तर पर नुकसान ही होना है। ये धर्म और जाति पुरानी व्यवस्थाओं के आधार रहे हैं जिन्हें आधुनिक व्यवस्था से दूर करने का लक्ष्य होता है। आधुनिक व्यवस्थाएं ये लक्ष्य राजनीतिक विचारधाराओं के आधार पर निर्धारित करती हैं लेकिन पुरानी व्यवस्थाओं के जो आधार रहे हैं उनसे जुड़े वगा के हित उसमें सुरक्षित होते हैं इसीलिए वे किसी भी स्तर पर उसे बनाए रखना चाहते हैं। वे उन आधारों को एक विचारधारा में परिर्वितत करने और उसे स्थापित करने की कोशिश लगातार करते हैं। लेकिन दूसरी तरफ आधुनिक व्यवस्थाओं की भी अपनी टकराहट होती है। वे नई-नई विचारधाराओं की जगह बनाने की कोशिश करती हंै। आधुनिकतम होती व्यवस्थाओं में विचारधाराओं का आधार जाति, लिग, धर्म और क्षेत्र से बदल जाता है। उस समय लगता है कि जातियां समानता ग्रहण कर रही हैं। धर्म की भूमिका कम हो रही है। पूरी दुनिया ही एक क्षेत्र में बदल गई है। शोषित, पीडित आबादी को मुक्ति मिल रही है। लेकिन एक उदाहरण से समझने की ये कोशिश की जा सकती है कि जो आधुनिक व्यवस्था में बदलने और विकास का अहसास है वह दूसरी तरफ कैसे एक अधीनता और असमानता को बनाए रखने की कोशिश आधुनिकतम कहलाने वाली विचारधाराएं करती रहती हैं।
सन 1660 का एक तथ्य है। उस समय दिल्ली की आबादी लगभग पांच लाख थी। उसमें आधी से ज्यादा आबादी झुग्गी-झोपडियों में रहती थी। इस संख्या का अनुमान 1661 में दिल्ली में आग लगने की एक घटना के तथ्यों से भी लगाया जा सकता है। उसमें 60 हजार झुग्गियां और झोपडियां जलकर राख हो गई थी। दूसरा तथ्य खेत में अनाज पैदा करने वालों से जुड़ा है। दिल्ली और आगरा के इलाके में गेहूं का उत्पादन करने वाले खेतिहरों की स्थिति ऐसी नहीं थी कि वे गेहूं खरीद सकें। तीसरा तथ्य औरंगजेब के बाद के इतिहास में उल्लेख मिलता है कि 1770 के आरम्भ में जितनी मौतें हुई और अनाज की जिस तरह से किल्लत देखी गई उतनी अतीत में न कभी देखी गई थी और न ही सुनी गई थीं। इन साढ़े तीन सौ वषा में व्यवस्थाएं आधुनिकतम होती चली गई हंै लेकिन ये कहने की जरूरत नहीं होगी कि व्यवस्थाएं कहां खड़ी रही हैं और आज भी हैं।
उपरोक्त स्थितियों के आलोक में कहा जा सकता है कि राजनीतिक विचारधाराओं ने नई व्यवस्थाओं में विकास को एक ऐसा आधार बनाया जिसे केन्द्र में रखकर असमानताओं के पुराने आधारों को खत्म किया जा सकता है। इसीलिए विकास की अवधारणा के अंदर तमाम तरह की राजनीतिक विचारधाराओं के बीच तीखे संघर्ष होते रहे हैं। विकास की धुरी पर राजनीतिक सत्तााएं बनती-बिगड़ती रही हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि विकास अपने आप में एक विचारधारा है पर विकास को एक ऐसी विचारधारा के रूप में विकसित किया गया है। पुरानी व्यवस्थाओं के आधार जातिवादी, सम्प्रदायवादी आदि रहे हैं उसी तर्ज पर विकासवादी जुड़ जाता है। भूमंडलीकरण की प्रक्रिया ने जाति और धर्म की तरह इसे एक विचारधारा के रूप में विकसित करने की कोशिश की है। भारतीय समाज को जातिवाद और सम्प्रदायवाद के मनोविज्ञान, मानसिक अवस्था और उसकी आक्रामकता के बारे में बताने की जरूरत नहीं है। लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि भारत जैसे देशों में विकासवाद और विकासवादियों का वही चरित्र है। भूमंडलीकरण की नई र्आिथक नीतियों के लागू करने के फैसले सरकार ने जितने चरणों में लिए हंै वे उस विचारधारा को करपंथी के रूप में विस्तार करने के चरण रहे हैं। इस विचारधारा के करपंथी होने के कम से कम दो लक्षण यहां देखे जा सकते हैं। पहला लक्षण शाइनिग इंडिया या भारत 2020 का नारा बनना है। यानी ये देखा जा रहा है कि लोग अपनी पहले की स्थिति में ही हैं लेकिन सत्तााएं विकासवादी कहलाती हैं। इसमें आवाज पैदा की जाती है कि दूरदराज कहीं सपने पूरे हो रहे हैं। दूसरे विकास के सवाल उठाने वाले आक्रमण के शिकार होते हैं। दिल्ली में लाखों की तादाद में झुग्गियों के गिराए जाने से लेकर छत्ताीसगढ़ में नदियों को बेच देने तक पर कोई सत्ताा का बाल बांका नहीं कर सका और न ही लाख से ऊपर की तादाद में किसानों की मौत को कोई देख पाया। जातिवाद और सम्प्रदायवाद की भयावहता इसी तरह की तो देखी जाती है। विकासवाद भी उपरोक्त तथ्यों के आधार पर कम से कम साढ़े तीन सौ वषा पुरानी स्थिति में हमें खड़ा किए हुए है। वहां अनाज का अभाव और गेहूं के ऊंचे भाव से भुखमरी और मौत, और कर्ज से किसानों की मौत में क्या अंतर है। पुराने विचार वहां और यहां केवल जाति, धर्म की तलाश करेंगे लेकिन नई विचारधारा ने विकासवादी एक नई जाति और धर्म को विकसित कर लिया है उसकी शिनाख्त कैसे होगी। व्यवस्था आधार के रूपों का भी आधुनिकीकरण कर देती है।
समाज ने जिन तमाम तरह की बहसों को जन्म दिया और वैचारिक लड़ाइयां लड़ी वे उसकी सांस्कृतिक पूंजी हैं। उनकी उपलब्धियों के तौर पर उसे देखा जा सकता है। लेकिन विकासवाद ने तमाम उन उपलब्धियों और सांस्कृतिक पूंजी पर अपना आक्रमण जमा लिया है। यदि भारतीय समाज और राजनीतिक व्यवस्थाओं में इस विचारधारा के प्रभावों का अध्ययन किया जाए तो ये बेहद गहरे स्तर पर सक्रिय और सूक्ष्म स्तर पर आक्रामक दिखाई देगा। इसने अपनी भाषा विकसित की है और दूसरी तरफ बेजुबां करने के लिए भाषा ही छीन ली है। यह अब अक्सर सुना जाता है कि अजीब सा लग रहा है या वह अजीब सा है। क्या कभी किसी समाज में ऐसा होता है कि उसके बीच कुछ खड़ा हो और वह अजीब सा लगे। यदि आश्चर्यजनक चीजें अचानक खड़ी होती हों तो ऐसा हो सकता है। लेकिन यहां तो अजीबों की कड़ी तैयार दिख रही है और समाज उसे व्यक्त करने के लिए भाषा भी तैयार नहीं कर पा रहा है। सारे संबंध विघटन के दौर से गुजर रहे हैं। विकास जब तक एक योजना और कार्यक्रम है वह आक्रमणकारी नहीं हो सकता है लेकिन जैसे ही वह विकासवादी होता है उसके खतरे शुरू हो जाते हैं। विकासवाद ने तमाम और खासतौर से समानता मूलक राजनीतिक विचारों को रक्षात्मक स्थिति में कर दिया है। इसने व्यक्ति की हरेक इकाई को अपने प्रभाव में कर रखा है। हमें और आपको इसके बारे में सोचना होगा।
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Tuesday, July 15, 2008
वामपंथी दलों का आत्मघाती कदम
राजकिशोर
भारत के वामपंथी दल अपने आपको सबसे बुद्धिमान समझते हैं। लेकिन संप्रग सरकार से समर्थन वापस लेकर उन्होंने न केवल भारतीय राजनीति को एक कदम पीछे कर दिया है, बल्कि अपने भविष्य पर भी प्रश्नचिह्न लगा लिया है। जो दल पश्चिम बंगाल और केरल में गठबंधन की राजनीति सफलतापूर्वक चलाते रहे हैं, उन्होंने केंद्र के गठबंधन को एक ऐसी ठोकर मारी है जिससे बहुत कुछ तहस-नहस होगा। लेकिन वाम दलों को इसकी फिक्र शायद इसलिए नहीं है कि राष्ट्रीय राजनीति में उनकी कोई महत्वाकांक्षा नहीं है और न ही वे कोई महत्वाकांक्षा पालना चाहते हैं। शायद वे अपनी क्षेत्रीय हैसियत से ही खुश हैं। लेकिन यह क्षेत्रीय हैसियत भी तभी बरकरार रह पाएगी जब वे अपनी राजनीति को गत्यात्मक बनाएं और व्यावहारिक राजनीति की चुनौतियों को समझने की कोशिश करें।वामपंथ अपनी सैद्धांतिक प्रतिबद्धताओं पर कुछ ज्यादा ही मुग्ध है।
आजकल राजनीति में सिद्धांतवादिता जिस तरह घटती जा रही है या कहिए विलुप्त हो रही है, उसे देखते हुए इस घटना पर खुश हुआ जा सकता है कि चलो, कोई तो राजनीतिक समूह है जो अपनी मान्यताओं पर अडिग है। लेकिन सिर्फ एक मान्यता पर इतना बल देना कि उसके परिणामस्वरूप केंद्र सरकार संकट में पड़ जाए और बाकी मान्यताओं को भूल जाना सिद्धांत प्रेम नहीं, महज हठ है- एक ऐसा हठ, जिसका कोई रचनात्मक पहलू नहीं है। मनमोहन सिह जिस तरह परमाणु करार पर अड़े हुए थे, उसे महसूस करते हुए भी वाम दलों द्वारा अपनी जिद पर अड़े रहना बताता है कि वे अपनी नाक कटा कर भी इतिहास में अपनी जगह बनाना चाहते हैं। राजनीति का मामला इतना किताबी नहीं होता। खासकर उस समय जब देश एक भारी संक्रमण से गुजर रहा हो।
दरअसल, संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन में वामपंथी जिस तरह शामिल हुए, वह एक समस्यामूलक घटना थी। इस गठबंधन का तात्पर्य क्या था? सभी का मानना है कि यह गठबंधन सांप्रदायिक शक्तियों को सत्ता में न आने देने और उनकी स्थिति कमजोर करने के लिए बनाया गया था। लेकिन सिर्फ कुछ धर्मनिरपेक्ष दलों के निकट आ जाने से यह उद्देश्य सिद्ध होनेवाला नहीं है, यह बात जिसे मालूम न हो, उसे राजनीति से बाहर हो जाना चाहिए। धर्मनिरपेक्षता बनाम सांप्रदायिकता एक बड़ी बहस है, लेकिन यह बहस इस व्यापक बहस का हिस्सा है कि देश को किस तरह चलाया जाए। भाजपा के गठबंधन ने देश को जिस तरह चलाया, उससे लोगों को संतोष नहीं हुआ। इसीलिए भाजपा की सीटें कम हुईं, न कि इस कारण कि भाजपा ने सत्ताा में जाने के बाद भी अपना सांप्रदायिक नजरिया नहीं छोड़ा। गुजरात में नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री बनने के बाद सांप्रदायिकता बढ़ी है, लेकिन इससे नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई। इसका एक बड़ा कारण लोगों का यह महसूस करना है कि गुजरात का प्रशासन सुधर रहा है और सरकार विकास को बढ़ावा देने के लिए जरूरी और उपयुक्त कदम उठा रही है। वामपंथियों की मौजूदगी से केंद्र सरकार की छवि भी कुछ इस तरह की बनती, तो संप्रग के गठबंधन में उनके होने का सार्थक और प्रगतिशील मतलब निकलता। वामपंथियों को पता था कि गठबंधन में उनकी ऐसी हैसियत नहीं है। वे अपनी यह हैसियत बनाना भी नहीं चाहते थे। इसके बावजूद समय-समय पर वे ऐसे आग्रह करते रहे जिनसे लगता था कि मनमोहन सिह की सरकार उनकी बंदी है। यह ब्लैकमेल था, कोई स्वस्थ राजनीति नहीं।
वाम दलों के सामने दो ही विकल्प थे। एक विकल्प यह था कि वे संप्रग में शामिल होने के बाद उसे अपनी सैद्धांतिक जमीन की आ॓र मोड़ने की कोशिश करते। गठबंधन सिर्फ़ सत्ता के लिए नहीं, सिद्धांत के लिए भी होना चाहिए। वाम दल इसके लिए तैयार नहीं थे। आज भी वे तैयार नहीं हैं, क्योंकि समर्थन वापस लेने के बाद वे कोई और ज्यादा प्रगतिशील गठबंधन बनाने की कोशिश नहीं करेंगे और न ही वाम दलों के प्रभाव क्षेत्र को राष्ट्रीय स्तर पर ले जाने की मेहनत करेंगे। इसके बजाय वे अपने सुरक्षित बाड़ों में सिमट जाएंगे। अभी तक उनकी बातों को गौर से सुना भी जाता था, क्योंकि वे सरकार का अनौपचारिक अंग थे। अब यह भी नहीं होगा। वाम दलों के सामने दूसरा विकल्प यह था कि वे मनमोहन सिह की सरकार को अपने रास्ते चलने देते और बाहर से उसका समर्थन करते रहते। ऐसी स्थिति में वे यह दावा कर सकते थे कि सरकार की नीतियों से उनका कुछ भी लेना-देना नहीं है और उनका समर्थन तभी तक है जब तक यह सरकार कोई बड़ा जन विरोधी कदम नहीं उठाती। इससे वामपंथियों की नैतिक छवि बनी रहती और कोई यह दावा नहीं कर सकता था कि वे सांप्रदायिक श‡ियों को सत्ताा में आने से रोकने में सहयोग नहीं कर रहे हैं। लेकिन वामपंथियों ने अपने लिए एक ऐसा विकल्प चुना जो इन दोनों विकल्पों का अवसरवादी घालमेल था। इसीलिए उनके मौजूदा फैसले से कोई प्रसा नहीं है।परमाणु करार का मामला एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, लेकिन इसका संबंध हमारी परमाणु नीति से ज्यादा और अमेरिका से कम है। अगर हम परमाणु शक्ति के अपने कार्यक्रम को बनाए रखना चाहते हैं, तो अमेरिका या रूस या फ्रांस- यह सवाल गौण हो जाता है। लेकिन वाम दलों ने देश के परमाणु कार्यक्रम पर आपत्ति नहीं की, न उन्हें कोई वास्तविक आपत्ति है। उनकी आपत्ति यह है कि अमेरिका से यह करार क्यों किया जा रहा है। यह अंध अमेरिका-विरोध शीत युद्ध के वर्षों की एक बेजान दुम है। इस दुम को पकड़ कर वैतरणी पार करने की आशा तब और हास्यास्पद हो जाती है जब हम पाते हैं कि वाम दलों ने आर्थिक मोर्चे पर पूरी तरह समझौता कर लिया है और अपने द्वारा शासित राज्यों को उसी दिशा में ले जा रहे हैं जो मनमोहन सिह सरकार की आर्थिक दिशा है। वाम दलों को वास्तविक ग्लानि इस पर होनी चाहिए कि समर्थन वापसी के लिए उन्होंने आर्थिक मोर्चे पर सरकार की विफलताओं को क्यों नहीं चुना। अगर वे ऐसा करते, तो उनकी वामपंथी छवि कुछ उज्ज्वल ही होती। लेकिन समर्थन वापसी के लिए उन्होंने एक ऐसा मुद्दा चुना जिसके प्रति देश की अधिकांश जनता उदासीन है। अमेरिका से परमाणु करार होता है या नहीं, इस सवाल पर कोई उद्वेलित नहीं है। फिर वामपंथी इस कदर उद्वेलित क्यों हुए कि उन्होंने चार वर्ष से ज्यादा का साथ क्यों छोड़ दिया? क्या इसीलिए कि वे अतीत के बंदी और भविष्य की चुनौतियों से लापरवाह हैं? आत्मघात और किसे कहते हैं?
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भारत के वामपंथी दल अपने आपको सबसे बुद्धिमान समझते हैं। लेकिन संप्रग सरकार से समर्थन वापस लेकर उन्होंने न केवल भारतीय राजनीति को एक कदम पीछे कर दिया है, बल्कि अपने भविष्य पर भी प्रश्नचिह्न लगा लिया है। जो दल पश्चिम बंगाल और केरल में गठबंधन की राजनीति सफलतापूर्वक चलाते रहे हैं, उन्होंने केंद्र के गठबंधन को एक ऐसी ठोकर मारी है जिससे बहुत कुछ तहस-नहस होगा। लेकिन वाम दलों को इसकी फिक्र शायद इसलिए नहीं है कि राष्ट्रीय राजनीति में उनकी कोई महत्वाकांक्षा नहीं है और न ही वे कोई महत्वाकांक्षा पालना चाहते हैं। शायद वे अपनी क्षेत्रीय हैसियत से ही खुश हैं। लेकिन यह क्षेत्रीय हैसियत भी तभी बरकरार रह पाएगी जब वे अपनी राजनीति को गत्यात्मक बनाएं और व्यावहारिक राजनीति की चुनौतियों को समझने की कोशिश करें।वामपंथ अपनी सैद्धांतिक प्रतिबद्धताओं पर कुछ ज्यादा ही मुग्ध है।
आजकल राजनीति में सिद्धांतवादिता जिस तरह घटती जा रही है या कहिए विलुप्त हो रही है, उसे देखते हुए इस घटना पर खुश हुआ जा सकता है कि चलो, कोई तो राजनीतिक समूह है जो अपनी मान्यताओं पर अडिग है। लेकिन सिर्फ एक मान्यता पर इतना बल देना कि उसके परिणामस्वरूप केंद्र सरकार संकट में पड़ जाए और बाकी मान्यताओं को भूल जाना सिद्धांत प्रेम नहीं, महज हठ है- एक ऐसा हठ, जिसका कोई रचनात्मक पहलू नहीं है। मनमोहन सिह जिस तरह परमाणु करार पर अड़े हुए थे, उसे महसूस करते हुए भी वाम दलों द्वारा अपनी जिद पर अड़े रहना बताता है कि वे अपनी नाक कटा कर भी इतिहास में अपनी जगह बनाना चाहते हैं। राजनीति का मामला इतना किताबी नहीं होता। खासकर उस समय जब देश एक भारी संक्रमण से गुजर रहा हो।
दरअसल, संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन में वामपंथी जिस तरह शामिल हुए, वह एक समस्यामूलक घटना थी। इस गठबंधन का तात्पर्य क्या था? सभी का मानना है कि यह गठबंधन सांप्रदायिक शक्तियों को सत्ता में न आने देने और उनकी स्थिति कमजोर करने के लिए बनाया गया था। लेकिन सिर्फ कुछ धर्मनिरपेक्ष दलों के निकट आ जाने से यह उद्देश्य सिद्ध होनेवाला नहीं है, यह बात जिसे मालूम न हो, उसे राजनीति से बाहर हो जाना चाहिए। धर्मनिरपेक्षता बनाम सांप्रदायिकता एक बड़ी बहस है, लेकिन यह बहस इस व्यापक बहस का हिस्सा है कि देश को किस तरह चलाया जाए। भाजपा के गठबंधन ने देश को जिस तरह चलाया, उससे लोगों को संतोष नहीं हुआ। इसीलिए भाजपा की सीटें कम हुईं, न कि इस कारण कि भाजपा ने सत्ताा में जाने के बाद भी अपना सांप्रदायिक नजरिया नहीं छोड़ा। गुजरात में नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री बनने के बाद सांप्रदायिकता बढ़ी है, लेकिन इससे नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई। इसका एक बड़ा कारण लोगों का यह महसूस करना है कि गुजरात का प्रशासन सुधर रहा है और सरकार विकास को बढ़ावा देने के लिए जरूरी और उपयुक्त कदम उठा रही है। वामपंथियों की मौजूदगी से केंद्र सरकार की छवि भी कुछ इस तरह की बनती, तो संप्रग के गठबंधन में उनके होने का सार्थक और प्रगतिशील मतलब निकलता। वामपंथियों को पता था कि गठबंधन में उनकी ऐसी हैसियत नहीं है। वे अपनी यह हैसियत बनाना भी नहीं चाहते थे। इसके बावजूद समय-समय पर वे ऐसे आग्रह करते रहे जिनसे लगता था कि मनमोहन सिह की सरकार उनकी बंदी है। यह ब्लैकमेल था, कोई स्वस्थ राजनीति नहीं।
वाम दलों के सामने दो ही विकल्प थे। एक विकल्प यह था कि वे संप्रग में शामिल होने के बाद उसे अपनी सैद्धांतिक जमीन की आ॓र मोड़ने की कोशिश करते। गठबंधन सिर्फ़ सत्ता के लिए नहीं, सिद्धांत के लिए भी होना चाहिए। वाम दल इसके लिए तैयार नहीं थे। आज भी वे तैयार नहीं हैं, क्योंकि समर्थन वापस लेने के बाद वे कोई और ज्यादा प्रगतिशील गठबंधन बनाने की कोशिश नहीं करेंगे और न ही वाम दलों के प्रभाव क्षेत्र को राष्ट्रीय स्तर पर ले जाने की मेहनत करेंगे। इसके बजाय वे अपने सुरक्षित बाड़ों में सिमट जाएंगे। अभी तक उनकी बातों को गौर से सुना भी जाता था, क्योंकि वे सरकार का अनौपचारिक अंग थे। अब यह भी नहीं होगा। वाम दलों के सामने दूसरा विकल्प यह था कि वे मनमोहन सिह की सरकार को अपने रास्ते चलने देते और बाहर से उसका समर्थन करते रहते। ऐसी स्थिति में वे यह दावा कर सकते थे कि सरकार की नीतियों से उनका कुछ भी लेना-देना नहीं है और उनका समर्थन तभी तक है जब तक यह सरकार कोई बड़ा जन विरोधी कदम नहीं उठाती। इससे वामपंथियों की नैतिक छवि बनी रहती और कोई यह दावा नहीं कर सकता था कि वे सांप्रदायिक श‡ियों को सत्ताा में आने से रोकने में सहयोग नहीं कर रहे हैं। लेकिन वामपंथियों ने अपने लिए एक ऐसा विकल्प चुना जो इन दोनों विकल्पों का अवसरवादी घालमेल था। इसीलिए उनके मौजूदा फैसले से कोई प्रसा नहीं है।परमाणु करार का मामला एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, लेकिन इसका संबंध हमारी परमाणु नीति से ज्यादा और अमेरिका से कम है। अगर हम परमाणु शक्ति के अपने कार्यक्रम को बनाए रखना चाहते हैं, तो अमेरिका या रूस या फ्रांस- यह सवाल गौण हो जाता है। लेकिन वाम दलों ने देश के परमाणु कार्यक्रम पर आपत्ति नहीं की, न उन्हें कोई वास्तविक आपत्ति है। उनकी आपत्ति यह है कि अमेरिका से यह करार क्यों किया जा रहा है। यह अंध अमेरिका-विरोध शीत युद्ध के वर्षों की एक बेजान दुम है। इस दुम को पकड़ कर वैतरणी पार करने की आशा तब और हास्यास्पद हो जाती है जब हम पाते हैं कि वाम दलों ने आर्थिक मोर्चे पर पूरी तरह समझौता कर लिया है और अपने द्वारा शासित राज्यों को उसी दिशा में ले जा रहे हैं जो मनमोहन सिह सरकार की आर्थिक दिशा है। वाम दलों को वास्तविक ग्लानि इस पर होनी चाहिए कि समर्थन वापसी के लिए उन्होंने आर्थिक मोर्चे पर सरकार की विफलताओं को क्यों नहीं चुना। अगर वे ऐसा करते, तो उनकी वामपंथी छवि कुछ उज्ज्वल ही होती। लेकिन समर्थन वापसी के लिए उन्होंने एक ऐसा मुद्दा चुना जिसके प्रति देश की अधिकांश जनता उदासीन है। अमेरिका से परमाणु करार होता है या नहीं, इस सवाल पर कोई उद्वेलित नहीं है। फिर वामपंथी इस कदर उद्वेलित क्यों हुए कि उन्होंने चार वर्ष से ज्यादा का साथ क्यों छोड़ दिया? क्या इसीलिए कि वे अतीत के बंदी और भविष्य की चुनौतियों से लापरवाह हैं? आत्मघात और किसे कहते हैं?
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Monday, June 30, 2008
दलित मुक्ति और धर्म परिवर्तन की राह
मुद्राराक्षस
पिछले हफ्ते उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में एक कट्टरपंथी हिन्दू संगठन का एक उत्तेजक सम्मेलन हुआ जिसका सबसे बड़ा मुद्दा यह था कि केन्द्र सरकार को सख्त कानून बनाकर भारत में धर्मान्तरण पर रोक लगानी चाहिए। हमारे संविधान के अनुसार यह देश धर्मनिरपेक्ष है यानी सरकार किसी खास धर्म के पक्ष में या किसी धर्म के विरोध में कोई काम न करने को प्रतिबद्ध है। इसी के अनुसार इस देश में रहने वाले किसी भी व्यक्ति को अपनी पसंद के किसी भी धर्म को स्वीकार करने या उस धर्म को छोड़ने की आजादी मिली हुई है जिसे वह नापसंद करता हो। पिछली आधी सदी में स्थिति कुछ बदल गयी है वरना अमरीका में साठ के दशक में अपनी अस्मिता और सामाजिक बराबरी के लिए आन्दोलनकारी अश्वेतों ने बड़ी संख्या में ईसाइयत छोड़कर इस्लाम धर्म स्वीकार किया था जिसमें विख्यात मुक्केबाज कैसियस क्ले ने अपना नाम मुहम्मद अली रख लिया था। हमें ध्यान देना चाहिए कि बड़ी संख्या में हुए इन धर्म परिवर्तनों पर न तो अमरीकी सरकार को कोई असुविधा हुई और न ही ईसाई समुदाय ने इस धर्म परिवर्तन को लेकर कोई नाराजगी जाहिर की। कोई भी सभ्य देश और सभ्य समाज अपने सदस्यों को इस बात की आजादी खुशी से देता है कि वह अपनी पसंद के धर्म को चुन ले या जिस धर्म में वह असुविधा महसूस कर रहा हो उसे छोड़ भी दे। भारत इतना पिछड़ा तो नहीं ही है कि वह किसी के द्वारा धर्म परिवर्तन को सहन न करे।धर्म परिवर्तन के दो कारण हमें समझ लेने चाहिए। कोई व्यक्ति धर्म तब छोड़ता है जब उसे उस धर्म में तकलीफ हो रही है जिससे वह जन्म से जुड़ा रहा हो। या कोई व्यक्ति तब धर्म छोड़ता है जब उसे कोई दूसरा धर्म अपने से बेहतर लग रहा हो। पिछली सहस्राब्दि में भारत के करोड़ों दलितों, पिछड़ों ने इस्लाम धर्म अपनाया था क्योंकि हिन्दू धर्म व्यवस्था में हो रहे भेदभाव और अत्याचारों से वे तंग आ चुके थे। वे सवर्णोें के खुले और शर्मनाक अत्याचारों से मुक्त होने के लिए हिन्दुत्व छोड़कर इस्लाम की शरण में गये थे। यह उनकी मजबूरी थी कि या तो जिन्दा जलें या मुसलमान बनें। यही युक्ति दलितों-पिछड़ों को ईसाइयत में भी दिखाई दी थी इसलिए बहुतों ने ईसाई धर्म स्वीकार किया। लड़कियों को शिक्षित करने की कोशिश में ज्योतिबा फुले और उनकी पत्नी का कड़ा विरोध ही नहीं किया गया था बल्कि हिंसक अत्याचार भी किये गये थे। अगर अंग्रेज की मदद न मिली होती तो न वे खुद शिक्षित हो पाते न शिक्षा के अपने अभियान को चला पाते। डा। अम्बेडकर ने बहुत दिन बर्दाश्त किया। आखिर में उन्हें भी हिन्दुत्व छोड़ना पड़ा और उन्होंने धर्म परिवर्तन का देशव्यापी अभियान चलाया। उत्तर प्रदेश और बिहार में राम स्वरूप वर्मा और ललई सिंह यादव ने बड़े पैमाने पर हिन्दुत्व से मुक्ति का लम्बा अभियान चलाया था। यह उन्हीं का प्रभाव था कि दलितों-पिछड़ों की सभाओं में नारे लगाए जाते रहे हैं - मारेंगे मर जाएंगे हिंदू नहीं कहाएंगे। मेरे परम मित्र उत्तर प्रदेश पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष अपनी हर जनसभा में यह नारा लगवाते रहे हैं। आखिर क्यों? कट्टरपंथी हिन्दू संगठनों को यह सोचना चाहिए था कि जिन्हें हजारों बरस से वे बांध कर रहते रहे हैं वे क्यों मुक्ति के लिए छटपटाने लगे? आखिर आज भी तो दुलीना झज्जर जैसी दर्दनाक हिंसक घटनाएं होती ही जा रही हैं। दलित पिछड़े इसीलिए दूसरे धर्म की शरण लेते रहे हैं।हमने देखा पिछले कुछ दिनों से हिन्दू संगठन भगत सिंह का नाम भी लेने लगे हैं। भगत सिंह का सम्मान अगर नेकनीयत से किया जा रहा है तो भगत सिंह ने जो लिखा है उसे भी पढ़ा जाना चाहिए। धर्म परिवर्तन को भगत सिंह ने दलितों की मुक्ति का रास्ता माना था-तुम्हारी कुछ हानि न होगी, बस गुलामी की जंजीरें कट जाएंगी।भगत सिंह यह मानते थे- जब उन्हें तुम इस तरह पशुओं से भी गया बीता समझोगे तो वे जरूर ही दूसरे धर्मों में शामिल हो जाएंगे जिनमें उन्हें अधिक अधिकार मिलेंगे। अंग्रेजों ने जिस कम्युनल एवार्ड और सेपरेट इलेक्टोरेट द्वारा दलितों को हिन्दुओं से अलग संप्रदाय बनाना चाहा था और जिसे गांधी ने आमरण अनशन करके रूकवाया था, भगत सिंह तो उसी के पक्ष में थे- या तो साम्प्रदायिक भेद का झंझट ही खत्म करो या फिर उनके अलग अधिकार उन्हें दे दो।धर्म परिवर्तन का मुद्दा यूं भी बहुत उलझा हुआ है। धर्म परिवर्तन करने कराने वालों का हिंसक विरोध कट्टरपंथी हिन्दू संगठन तो करते ही रहे हैं, देश की पुलिस भी कम पक्षपाती रवैया नहीं अपनाती। अक्सर वह यह आरोप लगाकर धर्म परिवर्तन कराने वालों को ही गिरफ्तार करती है कि वे जबरन या लालच देकर धर्म परिवर्तन करा रहे थे। जबरन धर्म परिवर्तन एक असंभव काम है। जबरन किसी को धर्म परिवर्तन करने से रोकने की घटनाएं ही ज्यादा देखी जाती रही हैं। जबरदस्ती धर्म परिवर्तन किया जाय तो आज के लोकतांत्रिक समाज में वह ठहर नहीं सकता। मुसलमानों या अंग्रेजों ने अपने राज में अगर जोर जबरदस्ती की होती तो आज कोई हिन्दू बाकी नहीं होता। संस्कृत काव्यशास्त्री पंडितराज जगन्नाथ तो औरंगजेब का दरबारी था और मुस्लिम शहजादी से उसने प्रेम किया था। उसका धर्म तो औरंगजेब ने नहीं बदला था। जरूरत धर्म परिवर्तन रोकने के कानून बनाने की नहीं है। धर्म परिवर्तन कैसे आसान और बिना बाधा और रोकटोक के हो सके इसकी व्यवस्था की जानी चाहिए।
www.rashtriyasahara.com से साभार
पिछले हफ्ते उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में एक कट्टरपंथी हिन्दू संगठन का एक उत्तेजक सम्मेलन हुआ जिसका सबसे बड़ा मुद्दा यह था कि केन्द्र सरकार को सख्त कानून बनाकर भारत में धर्मान्तरण पर रोक लगानी चाहिए। हमारे संविधान के अनुसार यह देश धर्मनिरपेक्ष है यानी सरकार किसी खास धर्म के पक्ष में या किसी धर्म के विरोध में कोई काम न करने को प्रतिबद्ध है। इसी के अनुसार इस देश में रहने वाले किसी भी व्यक्ति को अपनी पसंद के किसी भी धर्म को स्वीकार करने या उस धर्म को छोड़ने की आजादी मिली हुई है जिसे वह नापसंद करता हो। पिछली आधी सदी में स्थिति कुछ बदल गयी है वरना अमरीका में साठ के दशक में अपनी अस्मिता और सामाजिक बराबरी के लिए आन्दोलनकारी अश्वेतों ने बड़ी संख्या में ईसाइयत छोड़कर इस्लाम धर्म स्वीकार किया था जिसमें विख्यात मुक्केबाज कैसियस क्ले ने अपना नाम मुहम्मद अली रख लिया था। हमें ध्यान देना चाहिए कि बड़ी संख्या में हुए इन धर्म परिवर्तनों पर न तो अमरीकी सरकार को कोई असुविधा हुई और न ही ईसाई समुदाय ने इस धर्म परिवर्तन को लेकर कोई नाराजगी जाहिर की। कोई भी सभ्य देश और सभ्य समाज अपने सदस्यों को इस बात की आजादी खुशी से देता है कि वह अपनी पसंद के धर्म को चुन ले या जिस धर्म में वह असुविधा महसूस कर रहा हो उसे छोड़ भी दे। भारत इतना पिछड़ा तो नहीं ही है कि वह किसी के द्वारा धर्म परिवर्तन को सहन न करे।धर्म परिवर्तन के दो कारण हमें समझ लेने चाहिए। कोई व्यक्ति धर्म तब छोड़ता है जब उसे उस धर्म में तकलीफ हो रही है जिससे वह जन्म से जुड़ा रहा हो। या कोई व्यक्ति तब धर्म छोड़ता है जब उसे कोई दूसरा धर्म अपने से बेहतर लग रहा हो। पिछली सहस्राब्दि में भारत के करोड़ों दलितों, पिछड़ों ने इस्लाम धर्म अपनाया था क्योंकि हिन्दू धर्म व्यवस्था में हो रहे भेदभाव और अत्याचारों से वे तंग आ चुके थे। वे सवर्णोें के खुले और शर्मनाक अत्याचारों से मुक्त होने के लिए हिन्दुत्व छोड़कर इस्लाम की शरण में गये थे। यह उनकी मजबूरी थी कि या तो जिन्दा जलें या मुसलमान बनें। यही युक्ति दलितों-पिछड़ों को ईसाइयत में भी दिखाई दी थी इसलिए बहुतों ने ईसाई धर्म स्वीकार किया। लड़कियों को शिक्षित करने की कोशिश में ज्योतिबा फुले और उनकी पत्नी का कड़ा विरोध ही नहीं किया गया था बल्कि हिंसक अत्याचार भी किये गये थे। अगर अंग्रेज की मदद न मिली होती तो न वे खुद शिक्षित हो पाते न शिक्षा के अपने अभियान को चला पाते। डा। अम्बेडकर ने बहुत दिन बर्दाश्त किया। आखिर में उन्हें भी हिन्दुत्व छोड़ना पड़ा और उन्होंने धर्म परिवर्तन का देशव्यापी अभियान चलाया। उत्तर प्रदेश और बिहार में राम स्वरूप वर्मा और ललई सिंह यादव ने बड़े पैमाने पर हिन्दुत्व से मुक्ति का लम्बा अभियान चलाया था। यह उन्हीं का प्रभाव था कि दलितों-पिछड़ों की सभाओं में नारे लगाए जाते रहे हैं - मारेंगे मर जाएंगे हिंदू नहीं कहाएंगे। मेरे परम मित्र उत्तर प्रदेश पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष अपनी हर जनसभा में यह नारा लगवाते रहे हैं। आखिर क्यों? कट्टरपंथी हिन्दू संगठनों को यह सोचना चाहिए था कि जिन्हें हजारों बरस से वे बांध कर रहते रहे हैं वे क्यों मुक्ति के लिए छटपटाने लगे? आखिर आज भी तो दुलीना झज्जर जैसी दर्दनाक हिंसक घटनाएं होती ही जा रही हैं। दलित पिछड़े इसीलिए दूसरे धर्म की शरण लेते रहे हैं।हमने देखा पिछले कुछ दिनों से हिन्दू संगठन भगत सिंह का नाम भी लेने लगे हैं। भगत सिंह का सम्मान अगर नेकनीयत से किया जा रहा है तो भगत सिंह ने जो लिखा है उसे भी पढ़ा जाना चाहिए। धर्म परिवर्तन को भगत सिंह ने दलितों की मुक्ति का रास्ता माना था-तुम्हारी कुछ हानि न होगी, बस गुलामी की जंजीरें कट जाएंगी।भगत सिंह यह मानते थे- जब उन्हें तुम इस तरह पशुओं से भी गया बीता समझोगे तो वे जरूर ही दूसरे धर्मों में शामिल हो जाएंगे जिनमें उन्हें अधिक अधिकार मिलेंगे। अंग्रेजों ने जिस कम्युनल एवार्ड और सेपरेट इलेक्टोरेट द्वारा दलितों को हिन्दुओं से अलग संप्रदाय बनाना चाहा था और जिसे गांधी ने आमरण अनशन करके रूकवाया था, भगत सिंह तो उसी के पक्ष में थे- या तो साम्प्रदायिक भेद का झंझट ही खत्म करो या फिर उनके अलग अधिकार उन्हें दे दो।धर्म परिवर्तन का मुद्दा यूं भी बहुत उलझा हुआ है। धर्म परिवर्तन करने कराने वालों का हिंसक विरोध कट्टरपंथी हिन्दू संगठन तो करते ही रहे हैं, देश की पुलिस भी कम पक्षपाती रवैया नहीं अपनाती। अक्सर वह यह आरोप लगाकर धर्म परिवर्तन कराने वालों को ही गिरफ्तार करती है कि वे जबरन या लालच देकर धर्म परिवर्तन करा रहे थे। जबरन धर्म परिवर्तन एक असंभव काम है। जबरन किसी को धर्म परिवर्तन करने से रोकने की घटनाएं ही ज्यादा देखी जाती रही हैं। जबरदस्ती धर्म परिवर्तन किया जाय तो आज के लोकतांत्रिक समाज में वह ठहर नहीं सकता। मुसलमानों या अंग्रेजों ने अपने राज में अगर जोर जबरदस्ती की होती तो आज कोई हिन्दू बाकी नहीं होता। संस्कृत काव्यशास्त्री पंडितराज जगन्नाथ तो औरंगजेब का दरबारी था और मुस्लिम शहजादी से उसने प्रेम किया था। उसका धर्म तो औरंगजेब ने नहीं बदला था। जरूरत धर्म परिवर्तन रोकने के कानून बनाने की नहीं है। धर्म परिवर्तन कैसे आसान और बिना बाधा और रोकटोक के हो सके इसकी व्यवस्था की जानी चाहिए।
www.rashtriyasahara.com से साभार
समाज : भ्रष्टाचार और भारत
विभांशु दिव्याल
एक अंतरराष्ट्रीय स्वतंत्र एजेंसी है ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल। यह एजेंसी अपने सर्वेक्षण के आधार पर प्रतिवर्ष समूचे विश्व का भ्रष्टाचार सूचकांक जारी करती है। इस बार इसने अभ्रष्ट, भ्रष्ट, अतिभ्रष्ट 180 देशों की सूची जारी की है। इनमें यूरोप, अमेरिका, एशिया, अफ्रीका सभी महाद्वीपों के देश शामिल हैं। महाद्वीपों के हिसाब से यूरोप सबसे कम भ्रष्ट है तो एशिया, अफ्रीका सबसे अधिक भ्रष्ट। अधिक समृद्ध देश कम भ्रष्ट हैं तो समृद्धि विहीन देश सर्वाधिक भ्रष्ट। यानी गरीबी और भ्रष्टाचार प्रतिबद्ध पति-पत्नी की तरह दिखाई देते हैं जो एक-दूसरे को जिंदा रखने के लिए एक-दूसरे को कस कर पकड़े रहते हैं। डेनमार्क, फिनलैंड, न्यूजीलैंड, सिंगापुर और स्वीडन जैसे देश सूची में शीर्ष स्थान प्राप्त कर लगभग भ्रष्टाचार रहित देशों में हैं तो अफ्रीका का सोमालिया और एशिया का म्यांमार सबसे निचली पायदान पर आकर भ्रष्टतम देशों में से हंै।इस सूची में भारत और चीन जैसी एशिया की महाशक्तियां लगभग मध्य में हैं- क्रमश: 74वें और 71वें स्थान पर। पिछले वर्ष दोनों 72वें स्थान पर थे। यानी चीन ने एक स्थान ऊपर चढ़कर सुधार दर्ज किया है तो भारत ने दो स्थान नीचे उतर कर गिरावट दर्ज की है। भारत के अन्य पड़ोसियों की स्थिति भी किसी भी तरह संतोषजनक नहीं है। केवल भूटान अपवाद है जो 41वें स्थान पर है, अन्यथा मालदीव 90वें, श्रीलंका 96वें, नेपाल 135वें स्थान पर है और पाकिस्तान इन सबसे आगे जाकर 140वें स्थान पर हैं। पाकिस्तान को पछाड़ने वाले देशों में रूस भी है जो 145वें स्थान पर है जबकि उसका शीतयुद्ध कालीन प्रबल प्रतिद्वंद्वी अमेरिका 20वें स्तान पर है।भ्रष्टाचार मापने के सामान्य पैमानों में राजनेताओं, सैन्य और नागर अधिकारियों, प्रशासनिक अभिकरणों, सार्वजनिक विभागों, जनसंस्थानों, निकायों और निजी प्रतिष्ठानों के कार्य-व्यवहार के तौर तरीके तथा जनता के प्रति उनके दायित्व के निर्वाह को नियंत्रित करने वाले कारक आदि आते हैं। जाहिर है कि भ्रष्टाचार सार्वजनिक या सामान्य व्यक्ति के हित और अधिकार की कीमत पर निजी हित, स्वार्थ या लिप्सा की पूर्ति के लिए की गई कुचेष्टा है जो समूचे एशिया और अफ्रीका में गहराई तक परिव्याप्त है। भ्रष्टाचार सर्वाधिक उन देशों में है जहां सार्वजनिक हित स्पष्टत: परिभाषित नहीं है या उन्हें सत्ता समूहों के हितों का पर्याय मान लिया गया है। यानी जहां नियामक शक्तियां सत्ता समूहों की सनकों से संचालित होती हैं। दरअसल, ऐसी व्यवस्थाओं में सत्ता और संपत्ति पर कब्जे की लड़ाई ही व्यक्ति के मूल व्यवहार को नियंत्रित करती है। और क्योंकि इनके पास सार्वस्वीकृत तथा व्यक्ति के अधिकार और कर्त्तव्यों को निर्धारित करने वाले सामाजिक तौर पर स्थापित मूल्य नहीं होते इसलिए व्यक्ति या हित समूह किसी भी नियम-कानून को धता बताने या फिर उसका मनमाने तरीके से इस्तेमाल करने से नहीं चूकते।अब अगर देशों के भ्रष्टाचार सूचकांक का सरसरी तौर पर विश्लेषण करें तो इस स्थिति को पैदा करने वाले या बनाए रखने वाले कारकों को देखा-समझा जा सकता है। इनमें से कुछ हैं राजनीतिक तौर पर वैचारिक अस्पष्टता या वैचारिक संक्रमण, धर्म का आधुनिक राज्य व्यवस्था में दखल, कबीलाई सांस्कृतिक समूहों के आपसी टकराव, पारंपरिक व्यवस्थाओं की आधुनिक सांस्कृतिक-आर्थिक परिवर्तनों से तालमेल बिठाने में असफलता आदि और सर्वोपरि दुनिया की कथित आर्थिक महाशक्तियों द्वारा अपने हित में ऐसी सभी परिस्थितियों का दोहन। दुनिया के एक बड़े हिस्से की गरीबी और उससे सीधा जुड़ा भ्रष्टाचार आर्थिक महाशक्तियों के क्रूर सैन्य और आर्थिक शोषण की पैदाइश है।सोवियत संघ वाला रूस एक राज शैली से दूसरी कथित पेरेस्त्रोइका और ग्लासनोस्त शैली में संक्रमित होने के दंश से अभी तक नहीं उबर पाया है। वहां अचानक लागू हुए खुलेपन ने जहां एक आ॓र व्यवस्थाबद्ध सामान्य जन को हतप्रभ किया तो दूसरी आ॓र दबे-ढके हित समूहों को खुलकर खेलने का औचक-अवसर उपलब्ध कर दिया। आज ये हित समूह इतने धृष्ट हो गये हैं कि इन पर लगाम लगाने में सरकारी तंत्र के हाथ पैर फूल रहे हैं। वैचारिक संक्रमण के कारण इन पर लगाम लगाए रखने वाला जन प्रतिरोध ठंडा पड़ गया है। इसी तरह पाकिस्तान, ईरान जैसे देशों में अत्यधिक भ्रष्टाचार इस्लामी और इस्लाम प्रेरित सैनिक या असैनिक सत्ताओं में आधुनिक जीवन की मांगों के प्रति एक स्पष्ट वैचारिक अवधारणा के न होने के कारण हैं। यहां भी विभिन्न हित समूह अपने-अपने हितों के अनुसार राज्य शक्ति की व्याख्या करते हैं और उसी के अनुसार अपने संघर्ष की दिशा तय करते हैं जो अंतत: भ्रष्टाचार को उनके जीवन का हिस्सा बना देता है और भ्रष्टाचार नियंत्रक शक्ति का स्खलन कर देता है।भारत के संदर्भ में रिपोर्ट में भारतीय सर्वोच्च न्यायालय की प्रशंसा की गई है जो संविधान के मूलभूत ढांचे को बनाये रखने तथा इस ढांचे के विरूद्ध कार्य करने वाली किसी भी भ्रष्टाचार पोषक ताकत को दंडित करने का काम बखूबी कर रहा है। लेकिन वास्तविकता यह है कि सर्वोच्च न्यायालय की पैठ भ्रष्टाचार नियंत्रण में बहुत सीमित है और दूसरी आ॓र लोकतांत्रिक व्यवस्था दिनोंदिन भ्रष्ट स्वार्थ समूहों की गिरफ्त में आ रही है। भारत में भ्रष्टाचार अगर पाकिस्तान से कम प्रतीत होता है तो उसका एक कारण यह है कि भारत की साठ प्रतिशत जनता को भ्रष्टाचार में शामिल होने का अवसर ही उपलब्ध नहीं है। यह जनता केवल भ्रष्टाचार की शिकार है। सूरत यही रही तो आगामी वर्षों में गिरावट और तेज होगी। भारत डेनमार्क के करीब नहीं, पाकिस्तान के करीब किसकेगा।
www.rashtriyasahara.com से साभार
एक अंतरराष्ट्रीय स्वतंत्र एजेंसी है ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल। यह एजेंसी अपने सर्वेक्षण के आधार पर प्रतिवर्ष समूचे विश्व का भ्रष्टाचार सूचकांक जारी करती है। इस बार इसने अभ्रष्ट, भ्रष्ट, अतिभ्रष्ट 180 देशों की सूची जारी की है। इनमें यूरोप, अमेरिका, एशिया, अफ्रीका सभी महाद्वीपों के देश शामिल हैं। महाद्वीपों के हिसाब से यूरोप सबसे कम भ्रष्ट है तो एशिया, अफ्रीका सबसे अधिक भ्रष्ट। अधिक समृद्ध देश कम भ्रष्ट हैं तो समृद्धि विहीन देश सर्वाधिक भ्रष्ट। यानी गरीबी और भ्रष्टाचार प्रतिबद्ध पति-पत्नी की तरह दिखाई देते हैं जो एक-दूसरे को जिंदा रखने के लिए एक-दूसरे को कस कर पकड़े रहते हैं। डेनमार्क, फिनलैंड, न्यूजीलैंड, सिंगापुर और स्वीडन जैसे देश सूची में शीर्ष स्थान प्राप्त कर लगभग भ्रष्टाचार रहित देशों में हैं तो अफ्रीका का सोमालिया और एशिया का म्यांमार सबसे निचली पायदान पर आकर भ्रष्टतम देशों में से हंै।इस सूची में भारत और चीन जैसी एशिया की महाशक्तियां लगभग मध्य में हैं- क्रमश: 74वें और 71वें स्थान पर। पिछले वर्ष दोनों 72वें स्थान पर थे। यानी चीन ने एक स्थान ऊपर चढ़कर सुधार दर्ज किया है तो भारत ने दो स्थान नीचे उतर कर गिरावट दर्ज की है। भारत के अन्य पड़ोसियों की स्थिति भी किसी भी तरह संतोषजनक नहीं है। केवल भूटान अपवाद है जो 41वें स्थान पर है, अन्यथा मालदीव 90वें, श्रीलंका 96वें, नेपाल 135वें स्थान पर है और पाकिस्तान इन सबसे आगे जाकर 140वें स्थान पर हैं। पाकिस्तान को पछाड़ने वाले देशों में रूस भी है जो 145वें स्थान पर है जबकि उसका शीतयुद्ध कालीन प्रबल प्रतिद्वंद्वी अमेरिका 20वें स्तान पर है।भ्रष्टाचार मापने के सामान्य पैमानों में राजनेताओं, सैन्य और नागर अधिकारियों, प्रशासनिक अभिकरणों, सार्वजनिक विभागों, जनसंस्थानों, निकायों और निजी प्रतिष्ठानों के कार्य-व्यवहार के तौर तरीके तथा जनता के प्रति उनके दायित्व के निर्वाह को नियंत्रित करने वाले कारक आदि आते हैं। जाहिर है कि भ्रष्टाचार सार्वजनिक या सामान्य व्यक्ति के हित और अधिकार की कीमत पर निजी हित, स्वार्थ या लिप्सा की पूर्ति के लिए की गई कुचेष्टा है जो समूचे एशिया और अफ्रीका में गहराई तक परिव्याप्त है। भ्रष्टाचार सर्वाधिक उन देशों में है जहां सार्वजनिक हित स्पष्टत: परिभाषित नहीं है या उन्हें सत्ता समूहों के हितों का पर्याय मान लिया गया है। यानी जहां नियामक शक्तियां सत्ता समूहों की सनकों से संचालित होती हैं। दरअसल, ऐसी व्यवस्थाओं में सत्ता और संपत्ति पर कब्जे की लड़ाई ही व्यक्ति के मूल व्यवहार को नियंत्रित करती है। और क्योंकि इनके पास सार्वस्वीकृत तथा व्यक्ति के अधिकार और कर्त्तव्यों को निर्धारित करने वाले सामाजिक तौर पर स्थापित मूल्य नहीं होते इसलिए व्यक्ति या हित समूह किसी भी नियम-कानून को धता बताने या फिर उसका मनमाने तरीके से इस्तेमाल करने से नहीं चूकते।अब अगर देशों के भ्रष्टाचार सूचकांक का सरसरी तौर पर विश्लेषण करें तो इस स्थिति को पैदा करने वाले या बनाए रखने वाले कारकों को देखा-समझा जा सकता है। इनमें से कुछ हैं राजनीतिक तौर पर वैचारिक अस्पष्टता या वैचारिक संक्रमण, धर्म का आधुनिक राज्य व्यवस्था में दखल, कबीलाई सांस्कृतिक समूहों के आपसी टकराव, पारंपरिक व्यवस्थाओं की आधुनिक सांस्कृतिक-आर्थिक परिवर्तनों से तालमेल बिठाने में असफलता आदि और सर्वोपरि दुनिया की कथित आर्थिक महाशक्तियों द्वारा अपने हित में ऐसी सभी परिस्थितियों का दोहन। दुनिया के एक बड़े हिस्से की गरीबी और उससे सीधा जुड़ा भ्रष्टाचार आर्थिक महाशक्तियों के क्रूर सैन्य और आर्थिक शोषण की पैदाइश है।सोवियत संघ वाला रूस एक राज शैली से दूसरी कथित पेरेस्त्रोइका और ग्लासनोस्त शैली में संक्रमित होने के दंश से अभी तक नहीं उबर पाया है। वहां अचानक लागू हुए खुलेपन ने जहां एक आ॓र व्यवस्थाबद्ध सामान्य जन को हतप्रभ किया तो दूसरी आ॓र दबे-ढके हित समूहों को खुलकर खेलने का औचक-अवसर उपलब्ध कर दिया। आज ये हित समूह इतने धृष्ट हो गये हैं कि इन पर लगाम लगाने में सरकारी तंत्र के हाथ पैर फूल रहे हैं। वैचारिक संक्रमण के कारण इन पर लगाम लगाए रखने वाला जन प्रतिरोध ठंडा पड़ गया है। इसी तरह पाकिस्तान, ईरान जैसे देशों में अत्यधिक भ्रष्टाचार इस्लामी और इस्लाम प्रेरित सैनिक या असैनिक सत्ताओं में आधुनिक जीवन की मांगों के प्रति एक स्पष्ट वैचारिक अवधारणा के न होने के कारण हैं। यहां भी विभिन्न हित समूह अपने-अपने हितों के अनुसार राज्य शक्ति की व्याख्या करते हैं और उसी के अनुसार अपने संघर्ष की दिशा तय करते हैं जो अंतत: भ्रष्टाचार को उनके जीवन का हिस्सा बना देता है और भ्रष्टाचार नियंत्रक शक्ति का स्खलन कर देता है।भारत के संदर्भ में रिपोर्ट में भारतीय सर्वोच्च न्यायालय की प्रशंसा की गई है जो संविधान के मूलभूत ढांचे को बनाये रखने तथा इस ढांचे के विरूद्ध कार्य करने वाली किसी भी भ्रष्टाचार पोषक ताकत को दंडित करने का काम बखूबी कर रहा है। लेकिन वास्तविकता यह है कि सर्वोच्च न्यायालय की पैठ भ्रष्टाचार नियंत्रण में बहुत सीमित है और दूसरी आ॓र लोकतांत्रिक व्यवस्था दिनोंदिन भ्रष्ट स्वार्थ समूहों की गिरफ्त में आ रही है। भारत में भ्रष्टाचार अगर पाकिस्तान से कम प्रतीत होता है तो उसका एक कारण यह है कि भारत की साठ प्रतिशत जनता को भ्रष्टाचार में शामिल होने का अवसर ही उपलब्ध नहीं है। यह जनता केवल भ्रष्टाचार की शिकार है। सूरत यही रही तो आगामी वर्षों में गिरावट और तेज होगी। भारत डेनमार्क के करीब नहीं, पाकिस्तान के करीब किसकेगा।
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Tuesday, June 10, 2008
धर्म परिवर्तनः एक राजनैतिक हथियार

राम पुनियानी
इन दिनों ईसाई मिश्नरियों द्वारा कराए जा रहे तथाकथित धर्मपरिवर्तनों की चर्चा देशभर के मीडिया में हो रही है. ऐसा कहा जा रहा है कि आदिवासियों द्वारा एक ''विदेशी धर्म'' को अपनाए जाने से हिंदू राष्ट्र को खतरा है. इस आधारहीन आशंका की सामाजिक स्वीकार्यता में भारी वृध्दि हुई है. महाराष्ट्र के अलीबाग में मार्च महीने में ननों पर हमला और गत 27 अप्रैल को मुबई में बडे पैमाने पर हुआ शुध्दि यज्ञ भी धर्मपरिवर्तन की राजनीति का हिस्सा है. शुध्दि यज्ञ में बड़ी संख्या में ईसाई आदिवासियों को हिंदू बनाया गया.
ननो पर हमले और शुध्दि यज्ञ के पीछे एक ही व्यक्ति था. ननों पर हमले के लिए रामानंदाचार्य पीठ के सद्गुरू नरेन्द्र महाराज के शिष्य जिम्मेदार थे और शुध्दि यज्ञ का नेतृत्व स्वयं नरेन्द्र महाराज ने किया. इस अवसर पर बोलते हुए नरेन्द्र महाराज ने कहा कि ईसाई मिश्नरियों की गतिविधियों के कारण हिंदू अपने ही देश में अल्पसंख्यक बनने की ओर बढ़ रहे हैं. उन्होंने केन्द्र सरकार की इस बात के लिए कड़ी आलोचना की कि उसने धर्मपरिवर्तन पर रोक लगाने वाला कानून अब तक नहीं बनाया है और महाराष्ट्र सरकार के अंधविश्वास- विरोधी कानून की निंदा की. उनके अनुसार ये दोनों ही कदम हिंदू विरोधी हैं.
नरेन्द्र महाराज का यह दावा कि हिंदू इस देश में अल्पसंख्यक बनते जा रहे हैं, हास्यास्पद और तथ्यहीन है. सच यह है कि भारत की कुल जनसंख्या में हिंदुओं का प्रतिशत लगभग स्थिर बना हुआ है. कई राज्यों में जो धर्मपरिवर्तन-विरोधी विधेयक पास किए गए हैं, वे हमारे संविधान की अनेक धाराओं के खिलाफ हैं. हमारा संविधान तार्किक सोच को प्रोत्साहन देने की बात करता है और इस सिलसिले में महाराष्ट्र सरकार द्वारा पारित अंधविश्वास-विरोधी विधेयक एक प्रशंसनीय कदम है.
इस विधेयक का विरोध करने वाले शायद यह चाहते हैं कि समाज में अंधविश्वास बने रहें और उनका सामाजिक और राजनैतिक वर्चस्व कायम रहे. गुरूजी ने यह बात स्पष्ट शब्दों में कही. इन्हीं गुरूजी के समर्थक हिंसा करने से नहीं चूकते. अलीबाग में ननों पर हमला उस दौरान किया गया जब एड्स पर एक लेक्चर सुनने के लिए लोग इकट्ठा थे.
आदिवासी इलाकों में ईसाईयों पर हमले की घटनाओं में वृध्दि का कारण समझना मुश्किल नहीं है. पिछले साल क्रिसमस के आसपास उड़ीसा के कंधारमल और फूलबनी जिलों में व्यापक हिंसा हुई थी. गुजरात के डांग, मध्यप्रदेश के झाबुआ और उड़ीसा के अनेक जिलों सहित आदिवासी इलाकों में हिंसा का एक अंतहीन सिलसिला चल रहा है. ये वे इलाके हैं जहां आदिवासियों के ''हिंदूकरण'' का अभियान भी चलाया जा रहे हैं. यहां यह स्पष्ट कर देना उपयोगी होगा कि आदिवासी मूलत: प्रकृति-पूजक हैं. वे न तो ईसाई हैं और न ही हिंदू.
कुछ आदिवासी समय-समय पर ईसाई धर्म को अपनाते रहे हैं परंतु यह कोई नई बात नहीं है. आदिवासियों का ईसाई धर्म से परिचय सदियो पुराना है. पिछले कुछ दशकों में भारत की ईसाई आबादी में हल्की गिरावट दर्ज की गई है. सन् 1971 में ईसाईयों का आबादी में प्रतिशत 2.60 था जो 1981 में घटकर 2.44 प्रतिशत और 1991 में 2.34 प्रतिशत रह गया. सन् 2001 की जनगणना के अनुसार भारत में ईसाई, आबादी का 2.30 प्रतिशत हैं. यह भी सच है कि कुछ ईशाई मिश्नरियां धर्मपरिवर्तन कराने में विश्वास करती हैं और उन्होंने आदिवासियों का धर्मपरिवर्तन कराया भी है.
आदिवासी इलाकों में आर.एस.एस. की घुसपैठ लगभग दो दशक पहले शुरू हुई जब वनवासी कल्याण आश्रम ने इन इलाकों में अपनी गतिविधियां चलाना शुरू कीं. इन इलाकों में ईसाईयों और ईसाई धर्म के खिलाफ जहरीला प्रचार किया गया जिससे हिंसा भड़की. चूंकि ये घटनाएं दूरदराज के इलाकों में होती हैं इसलिए अपराधी अक्सर बच निकलते हैं. सांप्रदायिक हो चुका शासकीय तंत्र भी इस मामलें में कुछ खास नहीं करता. आदिवासी इलाके में आर.एस.एस. से सीधे या अपरोक्ष रूप से जुडे धर्मगुरू अपने आश्रम स्थापित कर रहे है और अपनी गतिविधियां बढ़ा रहे हैं. डांग क्षेत्र में असीमानंद, उडीसा में लखानंद, झाबुआ में आसाराम बापू और महाराष्ट्र में नरेन्द्र महाराज इनमें प्रमुख हैं.
ईसाई मिशनरियों को आतंकित करने के अलावा आदिवासियों को सांस्कृतिक रूप से हिंदू बनाने की कोशिशें भी जारी हैं. इसके लिए हिंदू संगम और शबरी कुंभ आयोजित किए जाते हैं. दिलीप सिंह जूदेव मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में लंबे समय से आदिवासियों को हिंदू बनाने के अभियान में लगे हुए हैं. इस अभियान को घरवापसी और शुध्दिकरण कहा जाता है. स्पष्ट है कि आदिवासियों को हिंदू मानकर चला जा रहा है. यह इस तथ्य के बावजूद की आदिवासी प्रकृति-पूजक हैं और हिंदू धर्म, इस्लाम या ईसाई धर्म से उनका कोई वास्ता नहीं है.
आदिवासी इस देश के सबसे वंचित समूहों में से एक हैं और उनका लंबे समय से राजनैतिक रोटियां सेंकने के लिए शोषण किया जाता रहा है. सन् 1920 के दशक की शुरूआत में ''तन्जीम'' (मुस्लिम सांप्रदायिक) अभियान के प्रतिउत्तर में ''शुध्दि'' (हिंदू सांप्रदायिक) अभियान चलाया गया था. अब शुध्दि अभियान एक बार फिर लौट आया है. इस अभियान को घरवापसी का नाम देने के पीछे की मंशा स्पष्ट है. जहां ईसाई मिश्नरियों को धर्मपरिवर्तन के लिए कटघरे में खड़ा किया जा रहा है, वहीं संघ परिवार की संस्थाओं द्वारा कराए जा रहे धर्मपरिवर्तन को घरवापसी का नाम दे दिया गया है. प्रचार यह किया जाता है कि आदिवासी वे हिन्दू हैं जो मुस्लिम राजाओं द्वारा जबरदस्ती मुसलमान बनाए जाने के डर से जंगलों में भाग गए थे. कई सदियों तक जंगलों में रहने के कारण उनका हिंदू सामाजिक मुख्यधारा से संपर्क कट गया.
इस मिथक को फैलाए जाने के दो फायदे हैं. पहला तो यह कि इससे इस गलतफहमी को बढ़ावा मिलता है कि इस्लाम को तलवार की नोंक पर फैलाया गया था. दूसरे, इससे आदिवासियों का यह दावा गलत सिध्द होता है कि वे इस देश के मूल निवासी हैं. इस प्रकार भारत के हिंदू राष्ट्र होने की परिकल्पना को मजबूती मिलती है क्योंकि उसके मूल रहवासी भी हिंदू हैं.
सांप्रदायिक ताकतें यह अच्छी तरह से जानती हैं कि भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए चुनावों में सफलता जरूरी है. इसके लिए आदिवासियों का हिंदूकरण करना फायदेमंद है. आदिवासी देश की आबादी का लगभग 8 प्रतिशत हैं और अगर दक्षिणपंथी राजनैतिक दलों को उनका समर्थन मिल जाता है तो इन दलों के जनाधार में भारी वृध्दि होगी. दूसरा फायदा यह है कि आदिवासियों का हिंदूकरण करने के बाद उनका उपयोग हिंदू राष्ट्र के अन्य शत्रुओं, जैसे मुसलमानों के खिलाफ भी किया जा सकता है. गुजरात में हमने देखा था कि किस तरह आदिवासियों का उपयोग हिंदू राष्ट्र के सैनिकों की तरह किया गया था.
चाहे वह रामकृष्ण मिशन हो या ईसाई मिशनरियां- शांतिपूर्वक आदिवासी क्षेत्रों में इनके काम करने से किसी को कोई परेशानी नहीं है. परंतु धर्म के नाम पर अंधविश्वास और दूसरे धर्मो के प्रति घृणा फैलाना निश्चित रूप से राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए बड़ा खतरा है.
इन दिनों ईसाई मिश्नरियों द्वारा कराए जा रहे तथाकथित धर्मपरिवर्तनों की चर्चा देशभर के मीडिया में हो रही है. ऐसा कहा जा रहा है कि आदिवासियों द्वारा एक ''विदेशी धर्म'' को अपनाए जाने से हिंदू राष्ट्र को खतरा है. इस आधारहीन आशंका की सामाजिक स्वीकार्यता में भारी वृध्दि हुई है. महाराष्ट्र के अलीबाग में मार्च महीने में ननों पर हमला और गत 27 अप्रैल को मुबई में बडे पैमाने पर हुआ शुध्दि यज्ञ भी धर्मपरिवर्तन की राजनीति का हिस्सा है. शुध्दि यज्ञ में बड़ी संख्या में ईसाई आदिवासियों को हिंदू बनाया गया.
ननो पर हमले और शुध्दि यज्ञ के पीछे एक ही व्यक्ति था. ननों पर हमले के लिए रामानंदाचार्य पीठ के सद्गुरू नरेन्द्र महाराज के शिष्य जिम्मेदार थे और शुध्दि यज्ञ का नेतृत्व स्वयं नरेन्द्र महाराज ने किया. इस अवसर पर बोलते हुए नरेन्द्र महाराज ने कहा कि ईसाई मिश्नरियों की गतिविधियों के कारण हिंदू अपने ही देश में अल्पसंख्यक बनने की ओर बढ़ रहे हैं. उन्होंने केन्द्र सरकार की इस बात के लिए कड़ी आलोचना की कि उसने धर्मपरिवर्तन पर रोक लगाने वाला कानून अब तक नहीं बनाया है और महाराष्ट्र सरकार के अंधविश्वास- विरोधी कानून की निंदा की. उनके अनुसार ये दोनों ही कदम हिंदू विरोधी हैं.
नरेन्द्र महाराज का यह दावा कि हिंदू इस देश में अल्पसंख्यक बनते जा रहे हैं, हास्यास्पद और तथ्यहीन है. सच यह है कि भारत की कुल जनसंख्या में हिंदुओं का प्रतिशत लगभग स्थिर बना हुआ है. कई राज्यों में जो धर्मपरिवर्तन-विरोधी विधेयक पास किए गए हैं, वे हमारे संविधान की अनेक धाराओं के खिलाफ हैं. हमारा संविधान तार्किक सोच को प्रोत्साहन देने की बात करता है और इस सिलसिले में महाराष्ट्र सरकार द्वारा पारित अंधविश्वास-विरोधी विधेयक एक प्रशंसनीय कदम है.
इस विधेयक का विरोध करने वाले शायद यह चाहते हैं कि समाज में अंधविश्वास बने रहें और उनका सामाजिक और राजनैतिक वर्चस्व कायम रहे. गुरूजी ने यह बात स्पष्ट शब्दों में कही. इन्हीं गुरूजी के समर्थक हिंसा करने से नहीं चूकते. अलीबाग में ननों पर हमला उस दौरान किया गया जब एड्स पर एक लेक्चर सुनने के लिए लोग इकट्ठा थे.
आदिवासी इलाकों में ईसाईयों पर हमले की घटनाओं में वृध्दि का कारण समझना मुश्किल नहीं है. पिछले साल क्रिसमस के आसपास उड़ीसा के कंधारमल और फूलबनी जिलों में व्यापक हिंसा हुई थी. गुजरात के डांग, मध्यप्रदेश के झाबुआ और उड़ीसा के अनेक जिलों सहित आदिवासी इलाकों में हिंसा का एक अंतहीन सिलसिला चल रहा है. ये वे इलाके हैं जहां आदिवासियों के ''हिंदूकरण'' का अभियान भी चलाया जा रहे हैं. यहां यह स्पष्ट कर देना उपयोगी होगा कि आदिवासी मूलत: प्रकृति-पूजक हैं. वे न तो ईसाई हैं और न ही हिंदू.
कुछ आदिवासी समय-समय पर ईसाई धर्म को अपनाते रहे हैं परंतु यह कोई नई बात नहीं है. आदिवासियों का ईसाई धर्म से परिचय सदियो पुराना है. पिछले कुछ दशकों में भारत की ईसाई आबादी में हल्की गिरावट दर्ज की गई है. सन् 1971 में ईसाईयों का आबादी में प्रतिशत 2.60 था जो 1981 में घटकर 2.44 प्रतिशत और 1991 में 2.34 प्रतिशत रह गया. सन् 2001 की जनगणना के अनुसार भारत में ईसाई, आबादी का 2.30 प्रतिशत हैं. यह भी सच है कि कुछ ईशाई मिश्नरियां धर्मपरिवर्तन कराने में विश्वास करती हैं और उन्होंने आदिवासियों का धर्मपरिवर्तन कराया भी है.
आदिवासी इलाकों में आर.एस.एस. की घुसपैठ लगभग दो दशक पहले शुरू हुई जब वनवासी कल्याण आश्रम ने इन इलाकों में अपनी गतिविधियां चलाना शुरू कीं. इन इलाकों में ईसाईयों और ईसाई धर्म के खिलाफ जहरीला प्रचार किया गया जिससे हिंसा भड़की. चूंकि ये घटनाएं दूरदराज के इलाकों में होती हैं इसलिए अपराधी अक्सर बच निकलते हैं. सांप्रदायिक हो चुका शासकीय तंत्र भी इस मामलें में कुछ खास नहीं करता. आदिवासी इलाके में आर.एस.एस. से सीधे या अपरोक्ष रूप से जुडे धर्मगुरू अपने आश्रम स्थापित कर रहे है और अपनी गतिविधियां बढ़ा रहे हैं. डांग क्षेत्र में असीमानंद, उडीसा में लखानंद, झाबुआ में आसाराम बापू और महाराष्ट्र में नरेन्द्र महाराज इनमें प्रमुख हैं.
ईसाई मिशनरियों को आतंकित करने के अलावा आदिवासियों को सांस्कृतिक रूप से हिंदू बनाने की कोशिशें भी जारी हैं. इसके लिए हिंदू संगम और शबरी कुंभ आयोजित किए जाते हैं. दिलीप सिंह जूदेव मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में लंबे समय से आदिवासियों को हिंदू बनाने के अभियान में लगे हुए हैं. इस अभियान को घरवापसी और शुध्दिकरण कहा जाता है. स्पष्ट है कि आदिवासियों को हिंदू मानकर चला जा रहा है. यह इस तथ्य के बावजूद की आदिवासी प्रकृति-पूजक हैं और हिंदू धर्म, इस्लाम या ईसाई धर्म से उनका कोई वास्ता नहीं है.
आदिवासी इस देश के सबसे वंचित समूहों में से एक हैं और उनका लंबे समय से राजनैतिक रोटियां सेंकने के लिए शोषण किया जाता रहा है. सन् 1920 के दशक की शुरूआत में ''तन्जीम'' (मुस्लिम सांप्रदायिक) अभियान के प्रतिउत्तर में ''शुध्दि'' (हिंदू सांप्रदायिक) अभियान चलाया गया था. अब शुध्दि अभियान एक बार फिर लौट आया है. इस अभियान को घरवापसी का नाम देने के पीछे की मंशा स्पष्ट है. जहां ईसाई मिश्नरियों को धर्मपरिवर्तन के लिए कटघरे में खड़ा किया जा रहा है, वहीं संघ परिवार की संस्थाओं द्वारा कराए जा रहे धर्मपरिवर्तन को घरवापसी का नाम दे दिया गया है. प्रचार यह किया जाता है कि आदिवासी वे हिन्दू हैं जो मुस्लिम राजाओं द्वारा जबरदस्ती मुसलमान बनाए जाने के डर से जंगलों में भाग गए थे. कई सदियों तक जंगलों में रहने के कारण उनका हिंदू सामाजिक मुख्यधारा से संपर्क कट गया.
इस मिथक को फैलाए जाने के दो फायदे हैं. पहला तो यह कि इससे इस गलतफहमी को बढ़ावा मिलता है कि इस्लाम को तलवार की नोंक पर फैलाया गया था. दूसरे, इससे आदिवासियों का यह दावा गलत सिध्द होता है कि वे इस देश के मूल निवासी हैं. इस प्रकार भारत के हिंदू राष्ट्र होने की परिकल्पना को मजबूती मिलती है क्योंकि उसके मूल रहवासी भी हिंदू हैं.
सांप्रदायिक ताकतें यह अच्छी तरह से जानती हैं कि भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए चुनावों में सफलता जरूरी है. इसके लिए आदिवासियों का हिंदूकरण करना फायदेमंद है. आदिवासी देश की आबादी का लगभग 8 प्रतिशत हैं और अगर दक्षिणपंथी राजनैतिक दलों को उनका समर्थन मिल जाता है तो इन दलों के जनाधार में भारी वृध्दि होगी. दूसरा फायदा यह है कि आदिवासियों का हिंदूकरण करने के बाद उनका उपयोग हिंदू राष्ट्र के अन्य शत्रुओं, जैसे मुसलमानों के खिलाफ भी किया जा सकता है. गुजरात में हमने देखा था कि किस तरह आदिवासियों का उपयोग हिंदू राष्ट्र के सैनिकों की तरह किया गया था.
चाहे वह रामकृष्ण मिशन हो या ईसाई मिशनरियां- शांतिपूर्वक आदिवासी क्षेत्रों में इनके काम करने से किसी को कोई परेशानी नहीं है. परंतु धर्म के नाम पर अंधविश्वास और दूसरे धर्मो के प्रति घृणा फैलाना निश्चित रूप से राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए बड़ा खतरा है.
http://www.raviwar.com/ से साभार
Thursday, August 16, 2007
भारत अमेरिका परमाणु करार का सच
The truth behind the Indo-U.S. nuclear deal
by Siddharth Varadarajan
Global Research, July 29, 2005
The Hindu
In opening the door to nuclear commerce with India, Washington has confirmed how much an alliance with New Delhi is worth to it. But is anybody on the Indian side doing the math?IN THE fullness of time, last week's nuclear agreement between India and the United States will be seen as one of those decisive moments in international politics when two powers who have been courting each other for some time decide finally to cross the point of no return. The U.S. and India have `come out', so to speak, and the world will never be the same again.Every world order needs rules in order to sustain itself but sometimes the rules can become a hindrance to the hegemonic strength of the power that underpins that order. Following India's nuclear tests in 1998, the U.S. had two options: continuing to believe the Indian nuclear genie could be put back, or harnessing India's evident strategic weight for its own geopolitical aims before that power grows too immense or is harnessed by others like Europe or China. The U.S. has chosen the latter option, and the joint statement released by President George W. Bush and Prime Minister Manmohan Singh on July 18 is the most dramatic textual manifestation of what Washington is attempting to do.India too, had a choice. It could use its nuclear weapons status as a lever to push for a multipolar world system as well as for global restraints on the development of weapons of mass destruction. Or it could use its status as an instrument to help perpetuate an order based on the production of insecurity and violence in which it eventually hoped to be accommodated as a junior partner. The erstwhile Vajpayee Government was never interested in the former option and longed desperately for the latter. The fact that Dr. Singh has managed this is the real source of the BJP's bitterness, not the fact that India's nuclear weapons capability is to be capped (which it is not). Those in India who marvel at how Mr. Bush could blithely walk away from 40 years of non-proliferation policy do not understand the tectonic shift that is taking place in the bilateral relationship as a result of increasing fears in U.S. business and strategic circles about China. Giving India anything less, or insisting that it cap or scrap its nuclear weapons, is seen by Washington's neo-conservatives as tantamount to strengthening China in the emerging balance of power in Asia. "By integrating India into the non-proliferation order at the cost of capping the size of its eventual nuclear deterrent," Ashley Tellis argued in a recent monograph, "[the U.S. would] threaten to place New Delhi at a severe disadvantage vis-à-vis Beijing, a situation that could not only undermine Indian security but also U.S. interests in Asia in the face of the prospective rise of Chinese power over the long term" (India as a New Global Power: An Action Agenda for the United States, Carnegie Endowment for International Peace, 2005). This, then, is the real value of the deal in American eyes and the Indian public should be aware of it.Predictably, critics in the U.S. have raised objections of one type or another. The non-proliferation lobby argues that President Bush's decision to sell nuclear technology and equipment to India will encourage other countries to go down the nuclear path. Not so say the advocates. Mr. Tellis — a former RAND Corporation analyst who served as an advisor to Robert Blackwill when he was U.S. Ambassador to India — is most forthright. He acknowledges the contradiction between the two goals of U.S. foreign policy — building India up as a counter to China and upholding the non-proliferation regime — but says the circle can be squared. His solution: don't jettison the regime "but, rather, selectively [apply] it in practice." In other words, different countries should be treated differently "based on their friendship and value to the U.S." With one stroke of the Presidential pen, India has become something more than a `major non-Nato ally' of the U.S. It has joined the Free World. It has gone from being a victim of nuclear discrimination to a beneficiary. India is not alone. Israel is already there to give it company.From a strategic perspective, one of the most puzzling aspects of the joint statement was the inclusion of a reiteration by India of its unilateral moratorium on nuclear testing without the U.S. making an explicit reciprocal commitment to abide by its own 1992 moratorium. At stake is not a formal question of protocol but the very real danger that the U.S. might go down the path of testing at some point in the future.The 2002 Nuclear Posture Review was quite explicit on this point: "The United States has not conducted nuclear tests since 1992 and supports the continued observance of the testing moratorium. While the U.S. is making every effort to maintain the stockpile without additional nuclear testing, this may not be possible for the indefinite future." Stockpile safety is, of course, a ruse, given the fact that the U.S. is running active research programmes on a new generation of smaller and `smarter' nuclear weapons like `mini-nukes' and deep earth penetrators. Earlier this month, in fact, the U.S. Senate voted to keep alive the bunker-buster programme in the face of demands that it be scrapped.The development of deadly new nuclear weapons by the U.S. should be a matter of great concern to India for their eventual deployment will degrade the security environment in the world and Asia. The same is true of the U.S. missile defence programme, which India, regrettably, will continue to remain engaged with. The Pentagon's goal in developing a missile shield is 'full-spectrum dominance,' including the weaponisation of space. Preventing this has been a major goal of most countries at the Conference on Disarmament (CD), with China insisting that a treaty on the prevention of an arms race in outer space (PAROS) is as important as the fissile material cut-off treaty (FMCT) , which would place no effective constraint on the U.S. or Russian arsenal because of their huge stockpiles of fissile material. In agreeing to "work with the U.S." on an FMCT, India has accorded primacy to this treaty over PAROS and other long-standing Indian goals at the CD such as negative security assurances and comprehensive disarmament where the U.S. is dragging its feet.Hidden costsOf all the misgivings present in the public mind, it is the fear of a quid pro quo on some other front that the Prime Minister most needs to dispel. Mr. Tellis, whose report on India-U.S. relations formed a valuable input to the Bush administration's thinking, argued, inter alia, that allowing India access to U.S. nuclear material and equipment would make New Delhi more likely to help further American strategic goals in the region. "[It] would buttress [India's] potential utility as a hedge against a rising China, encourage it to pursue economic and strategic policies aligned with U.S. interests, and shape its choices in regard to global energy stability... "When it comes to "global energy stability" are India's interests in alignment with those of the U.S.? Clearly not. It is not a coincidence that the two "American concerns" a Wall Street Journal editorial demanded the Prime Minister address during his visit were India's relations with Myanmar and Iran. Both these countries have gas reserves that are vital for our energy security. Addressing the Africa-Asia summit in Jakarta in April this year, the Prime Minister had said : "While our continents include both major producers and consumers of energy, the framework within which we produce and consume energy is determined elsewhere. We must end this anomaly." And yet, in baldly stating that no international bank would want to underwrite the Iran gas pipeline, Dr. Singh would appear to have strengthened the very outside "framework" he once spoke against.In addition to facing pressure on Iran, India is likely to be asked to let its Navy operate more frequently alongside the U.S. Navy in Asia. The purpose of these joint operations is essentially military and the U.S. wants India to also sign up for the Proliferation Security Initiative. Mr. Tellis's report had predicted that a nuclear deal would "increase [India's] enthusiasm for taking part in counter-proliferation activity in the Indian Ocean." The joint statement makes no direct mention of such cooperation though it speaks of a new "U.S.-India Disaster Relief Initiative that builds on the experience of the Tsunami core group." The real purpose of this initiative is revealed by the apparently inappropriate sub-heading under which it finds mention: `For Non-Proliferation and Security.'All told, the deal signed in Washington raises a number of questions about the Manmohan Singh Government's policies in the field of nuclear energy, disarmament, `promotion of democracy,' energy security and strategic stability in Asia. No doubt the Government has answers. Spinning euphoric reports in the mass media is not the way of providing them. The Government owes it to the people to provide a detailed account of its nuclear policy in the form of a White Paper. Let the details of the Strobe Talbott-Jaswant Singh negotiations be made public. Let the Government place on record its estimate of how much the proposed separation of civilian and military nuclear facilities will cost and what the benefits of last week's agreement will be. And let it say openly that nuclear deal or not, India will continue to work for global disarmament and has no desire to play the role of a `hedge', fence or `tether' in the U.S. plan to contain China.
Global Research Articles by Siddharth Varadarajan
by Siddharth Varadarajan
Global Research, July 29, 2005
The Hindu
In opening the door to nuclear commerce with India, Washington has confirmed how much an alliance with New Delhi is worth to it. But is anybody on the Indian side doing the math?IN THE fullness of time, last week's nuclear agreement between India and the United States will be seen as one of those decisive moments in international politics when two powers who have been courting each other for some time decide finally to cross the point of no return. The U.S. and India have `come out', so to speak, and the world will never be the same again.Every world order needs rules in order to sustain itself but sometimes the rules can become a hindrance to the hegemonic strength of the power that underpins that order. Following India's nuclear tests in 1998, the U.S. had two options: continuing to believe the Indian nuclear genie could be put back, or harnessing India's evident strategic weight for its own geopolitical aims before that power grows too immense or is harnessed by others like Europe or China. The U.S. has chosen the latter option, and the joint statement released by President George W. Bush and Prime Minister Manmohan Singh on July 18 is the most dramatic textual manifestation of what Washington is attempting to do.India too, had a choice. It could use its nuclear weapons status as a lever to push for a multipolar world system as well as for global restraints on the development of weapons of mass destruction. Or it could use its status as an instrument to help perpetuate an order based on the production of insecurity and violence in which it eventually hoped to be accommodated as a junior partner. The erstwhile Vajpayee Government was never interested in the former option and longed desperately for the latter. The fact that Dr. Singh has managed this is the real source of the BJP's bitterness, not the fact that India's nuclear weapons capability is to be capped (which it is not). Those in India who marvel at how Mr. Bush could blithely walk away from 40 years of non-proliferation policy do not understand the tectonic shift that is taking place in the bilateral relationship as a result of increasing fears in U.S. business and strategic circles about China. Giving India anything less, or insisting that it cap or scrap its nuclear weapons, is seen by Washington's neo-conservatives as tantamount to strengthening China in the emerging balance of power in Asia. "By integrating India into the non-proliferation order at the cost of capping the size of its eventual nuclear deterrent," Ashley Tellis argued in a recent monograph, "[the U.S. would] threaten to place New Delhi at a severe disadvantage vis-à-vis Beijing, a situation that could not only undermine Indian security but also U.S. interests in Asia in the face of the prospective rise of Chinese power over the long term" (India as a New Global Power: An Action Agenda for the United States, Carnegie Endowment for International Peace, 2005). This, then, is the real value of the deal in American eyes and the Indian public should be aware of it.Predictably, critics in the U.S. have raised objections of one type or another. The non-proliferation lobby argues that President Bush's decision to sell nuclear technology and equipment to India will encourage other countries to go down the nuclear path. Not so say the advocates. Mr. Tellis — a former RAND Corporation analyst who served as an advisor to Robert Blackwill when he was U.S. Ambassador to India — is most forthright. He acknowledges the contradiction between the two goals of U.S. foreign policy — building India up as a counter to China and upholding the non-proliferation regime — but says the circle can be squared. His solution: don't jettison the regime "but, rather, selectively [apply] it in practice." In other words, different countries should be treated differently "based on their friendship and value to the U.S." With one stroke of the Presidential pen, India has become something more than a `major non-Nato ally' of the U.S. It has joined the Free World. It has gone from being a victim of nuclear discrimination to a beneficiary. India is not alone. Israel is already there to give it company.From a strategic perspective, one of the most puzzling aspects of the joint statement was the inclusion of a reiteration by India of its unilateral moratorium on nuclear testing without the U.S. making an explicit reciprocal commitment to abide by its own 1992 moratorium. At stake is not a formal question of protocol but the very real danger that the U.S. might go down the path of testing at some point in the future.The 2002 Nuclear Posture Review was quite explicit on this point: "The United States has not conducted nuclear tests since 1992 and supports the continued observance of the testing moratorium. While the U.S. is making every effort to maintain the stockpile without additional nuclear testing, this may not be possible for the indefinite future." Stockpile safety is, of course, a ruse, given the fact that the U.S. is running active research programmes on a new generation of smaller and `smarter' nuclear weapons like `mini-nukes' and deep earth penetrators. Earlier this month, in fact, the U.S. Senate voted to keep alive the bunker-buster programme in the face of demands that it be scrapped.The development of deadly new nuclear weapons by the U.S. should be a matter of great concern to India for their eventual deployment will degrade the security environment in the world and Asia. The same is true of the U.S. missile defence programme, which India, regrettably, will continue to remain engaged with. The Pentagon's goal in developing a missile shield is 'full-spectrum dominance,' including the weaponisation of space. Preventing this has been a major goal of most countries at the Conference on Disarmament (CD), with China insisting that a treaty on the prevention of an arms race in outer space (PAROS) is as important as the fissile material cut-off treaty (FMCT) , which would place no effective constraint on the U.S. or Russian arsenal because of their huge stockpiles of fissile material. In agreeing to "work with the U.S." on an FMCT, India has accorded primacy to this treaty over PAROS and other long-standing Indian goals at the CD such as negative security assurances and comprehensive disarmament where the U.S. is dragging its feet.Hidden costsOf all the misgivings present in the public mind, it is the fear of a quid pro quo on some other front that the Prime Minister most needs to dispel. Mr. Tellis, whose report on India-U.S. relations formed a valuable input to the Bush administration's thinking, argued, inter alia, that allowing India access to U.S. nuclear material and equipment would make New Delhi more likely to help further American strategic goals in the region. "[It] would buttress [India's] potential utility as a hedge against a rising China, encourage it to pursue economic and strategic policies aligned with U.S. interests, and shape its choices in regard to global energy stability... "When it comes to "global energy stability" are India's interests in alignment with those of the U.S.? Clearly not. It is not a coincidence that the two "American concerns" a Wall Street Journal editorial demanded the Prime Minister address during his visit were India's relations with Myanmar and Iran. Both these countries have gas reserves that are vital for our energy security. Addressing the Africa-Asia summit in Jakarta in April this year, the Prime Minister had said : "While our continents include both major producers and consumers of energy, the framework within which we produce and consume energy is determined elsewhere. We must end this anomaly." And yet, in baldly stating that no international bank would want to underwrite the Iran gas pipeline, Dr. Singh would appear to have strengthened the very outside "framework" he once spoke against.In addition to facing pressure on Iran, India is likely to be asked to let its Navy operate more frequently alongside the U.S. Navy in Asia. The purpose of these joint operations is essentially military and the U.S. wants India to also sign up for the Proliferation Security Initiative. Mr. Tellis's report had predicted that a nuclear deal would "increase [India's] enthusiasm for taking part in counter-proliferation activity in the Indian Ocean." The joint statement makes no direct mention of such cooperation though it speaks of a new "U.S.-India Disaster Relief Initiative that builds on the experience of the Tsunami core group." The real purpose of this initiative is revealed by the apparently inappropriate sub-heading under which it finds mention: `For Non-Proliferation and Security.'All told, the deal signed in Washington raises a number of questions about the Manmohan Singh Government's policies in the field of nuclear energy, disarmament, `promotion of democracy,' energy security and strategic stability in Asia. No doubt the Government has answers. Spinning euphoric reports in the mass media is not the way of providing them. The Government owes it to the people to provide a detailed account of its nuclear policy in the form of a White Paper. Let the details of the Strobe Talbott-Jaswant Singh negotiations be made public. Let the Government place on record its estimate of how much the proposed separation of civilian and military nuclear facilities will cost and what the benefits of last week's agreement will be. And let it say openly that nuclear deal or not, India will continue to work for global disarmament and has no desire to play the role of a `hedge', fence or `tether' in the U.S. plan to contain China.
Global Research Articles by Siddharth Varadarajan
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