Monday, March 31, 2008

सोया, साम्राज्यवाद और पर्यावरण : संस्कृति तथा स्वास्थ्य का खतरनाक खेल


वंदना शिवा
मनुष्यत्व के विकास से लेकर अब तक खाद्यान्न प्रजाति के 80000 से अधिक पौधों का स्वाद हमने चखा है. इनमें से तीन हज़ार से ज्यादा मनुष्य के लगातार इस्तेमाल में आ रहे हैं. बहरहाल, अब हम विश्व की खाद्य जरुरतों को पूरा करने के लिए सिर्फ आठ फसलों पर निर्भर हैं जो कि इस जरुरत का 75 प्रतिशत पूरा करती हैं. लेकिन अब अनुवांशिक अभियांत्रिकी ने उत्पादन को तीन फसलों – सोया, मक्का और राई के बीच समेट दिया है.मोनोकल्चर हमारी जैव विविधता, हमारे स्वास्थ्य और खाद्यान्न की गुणवत्ता और बहुविविधता को नष्ट कर रहे हैं. मोनोकल्चर को औद्योगिक निर्वासन और कृषि के वैश्वीकरण के जरूरी घटक के जैसा देखा जाता रहा है. उन्हें ज्यादा खाद्यान्न पैदा करने वाला समझा जाता है. हालांकि वे सिर्फ मोनसांटो, कारगिल और ए.डी.एम के लिए ज्यादा प्रभुत्व और मुनाफा कमाने वाले साबित हो रहे हैं. वे जैव विविधता, स्थानीय खाद्यान्न प्रणाली और खाद्यान्न संस्कृति को खत्म करके फर्जी आधिक्य और असल अभाव पैदा कर रहे हैं. सरसों, नारियल, मूंगफली, तिल, अलसी आदि से बनाए जाने वाले भारतीय देसी खाद्य तेल जिनका प्रसंस्करण विशिष्ट मिलों में किया जाता था, उन्हें “खाद्यान्न सुरक्षा” के बहाने प्रतिबंधित कर दिया गया.इसके साथ ही साथ सोया तेल पर लगे हुए आयात प्रतिबंध को हटा लिया गया. इसने एक करोड़ किसानों की आजीविका पर संकट पैदा कर दिया. गाँवों में दस लाख तेल मिलें बंद हो गईं. भारतीय बाजारों को सोया सो पाट दिए जाने के कारण स्थानीय खाद्यान्न तेल के दामों में गिरावट आ रही थी. इसके विरोध प्रदर्शन के दौरान बीस से ज्यादा किसानों की जाने गईं. कई लाख टन कृत्रिम रुप से सस्ता जीएमओ सोया तेल भारतीय बाजार में उतार दिया गया.जंगलों का विनाशसोया को इस तरह बाजार में डंप करने के विरोध और सरसों तेल की वापसी के लिए दिल्ली की झोपड़ पट्टियों में रहने वाली महिलाओं ने एक आंदोलन शुरु किया और “सरसों बचाओ, सोयाबीन भगाओ” के नारे के साथ दिल्ली की सड़कों पर निकल आई. इस “सरसों सत्याग्रह” से हमें सरसों को वापस लाने में सफलता मिली. कुछ दिनों पहले अमेज़न में थी. जहां कारगिल और एडीएम, वो ही कंपनियां जो भारत में सोया का डंप कर रहीं थी; सोया का उत्पादन करने के लिए अमेज़न को बरबाद करने में तुली हुई थी. निर्यात योग्य सोया उगाने के लिए लाखों एकड़ में फैला बारामासी अमेज़न जंगल, जो कि वैश्विक जलवायु का जिगर, फेफड़ा और दिल है; जलाया जा रहा है. कारगिल ने तो पारा में, सांतारेन नामक जगह में एक अवैध बंदरगाह बना रखा है जिससे वह बारामासी अमेज़न जंगल में सोया का विस्तार कर रहा है. हथियारबंद गिरोह जंगल में कब्जा कर लेते हैं और गुलामों से सोया की खेती कराते हैं. और जब सिस्टर डोरोथी स्टैंग जैसे लोग जंगलों के विनाश का विरोध करते हैं तो उनकी हत्या करा दी जाती है. ब्राज़ील और भारत में लोगों को डरा-धमका कर कृषि व्यवसाय को फायदा पहुँचाने वाले मोनोकल्चर को बढ़ावा दिया जा रहा है. यूरोप और अमेरिकी लोग अप्रत्यक्ष रुप से खतरे में हैं, क्योंकि वहां 80 % सोया पशुचारे के रुप में उपयोग किया जा रहा है, जिससे सस्ता गोश्त उपलब्ध हो सके.सस्ता प्रोटीन जो कि फैक्ट्री-फार्मों में पाले जाने वाले पशुओं का चारे जैसा इस्तेमाल होता है, बारामासी अमेज़न जंगल और संपन्न देशों के लोगों के स्वास्थ्य, दोनों को नुकसान पहुँचा रहा है. एक अरब लोगों के पास खाद्यान्न इसलिए नहीं हैं क्योंकि मोनोकल्चर ने उनकी कृषि और अन्य खाद्यन्न आधारित रोज़गार छीन लिया है. खतरे और भी हैंलगभग 1.7 अरब अन्य लोग मोटापे और अन्य खाद्य से जुड़े रोगों से प्रभावित हैं. मोनोकल्चर जरुरत से अधिक भोजन करने वाले और जरुरत से कम भोजन करने वाले, दोनो प्रकार के लोगों के लिए कुपोषण का कारण बनता जा रहा है.सहकारी संस्थाएं हमें जी.एम.ओ जैसे अपरीक्षित खाद्य पदार्थ खाने पर मजबूर कर रहे हैं. सोया, जो कि आज हमारे पूरे प्रसंस्कृत खाद्य प्रदार्थों में मौजूद है, किसी भी संस्कृति में आज से 50 साल पहले तक नहीं खाया जाता था. इसमें उच्च मात्रा में “इसोफ्लावोन” और “फोटो-ऑस्ट्रीजंस” होते हैं जो मनुष्यों में हार्मोन असंतुलन पैदा करते हैं. चीन और जापानी संस्कृति में पारंपरिक रुप से मौजूद खमीर उठाने की विधि से इसोफ्लावोन के स्तर में गिरावट आती है. खाद्यान्न में सोया को बढावा देना एक बहुत बड़ा प्रयोग है, जो कि 1998 से 2004 के बीच अमेरीकी सरकार द्वारा 13 अरब डालर के, और अमेरिकी सोया उद्योग के 8 करोड़ डालर सालाना के अनुदान के साथ शुरु किया गया था. प्रकृति, संस्कृति और मानव स्वास्थ सबका ह्रास हो रहा है. स्थानीय खाद्यान्न संस्कृति में सोया से ज्यादा समृद्ध और विभन्न प्रकार के विकल्प मौजूद हैं. प्रोटीन के लिए हमारे पास हजारों प्रकार की सेमों और दलहनों की किस्में मौजूद हैं जैसे – अरहर, बरबट्टी, मूंग, चना भाजी, उड़द फली, धान, खैरी चना, राजमा, मोठ फली, मटर, लाल चना, दालें, छोले, ग्वारफली, कमरख आदि. खाद्य तेलों में हमारे पास– तिल, सरसों, अलसी, सूर्यमुखी, मूंगफली और नाइगर सफोला हैं. हमारी खाद्य प्रणाली को सुधारने के लिए अपने मोनोकल्चर मनोविज्ञान से उबरना हमारी आवश्यकता है. छोटे जैवविविधता युक्त खेतों में ज्यादा उत्पादकता होती है और वो किसानों के लिए ज्यादा आमदनी का जरिया हो सकता है. साथ ही जैवविवध खुराक ज्यादा पोषक और स्वादिष्ट होती हैं.खेतों में जैवविविधता की वापसी और छोटे किसानों की खेतों में वापसी साथ-साथ होगी. कॉरपोरेट घरानों का फैलना, फूलना, पनपना मोनोकल्चर पर निर्भर है. इससे उबरना हमारी जरुरत भी है और मज़बूरी भी।
www.raviwar.com से साभार

Thursday, January 17, 2008

दूर तक जायेगी एक रोशनी उसके साथ


इस कविता के कवि हालाँकि इतने चर्चित नहीं रहे हैं कि उनका नाम सुनकर ही कविता पढ़ने की इच्छा जग जाये। एक अत्यंत प्रतिभावान कवि और उससे भी ज़्यादा संवेदनशील शख्सियत वाले युवा श्री राजीव झा आज गुमनामी झेल रहे हैं और हममें से अधिकांश साथी शायद ही उनका अता-पता बता सकें। इतनी प्रतिभा के बावजूद यदि वे नटरंग प्रतिष्ठान जैसे संगठन में पिछले कई सालों से दो-तीन हजार रुपये में काम कर रहे हैं , जहाँ भरपूर फंड्स रहने के बाद भी ज़रूरतमंद युवाओं से पांच सौ, हजार रुपये देकर महीने भर आठ घंटों तक काम करवाया जाता है तो यह हमारी भी संवेदनहीनता का परिचायक है। गौरतलब है कि यह संस्थान जिसके संस्थापक स्व.नेमिचंद्र जैन थे ,अब उनके परिवार के दूसरे सदस्य इसे अशोक वाजपेयी के सहयोग से चला रहे हैं। इस प्रतिष्ठान के बारे में फिर कभी बात करेंगे , आइये पहले राजीव की यह कविता पढ़ें-


कुछ दृश्य
अकेलेपन
में कौंधते हैं
स्वप्न में नहीं
सुबह नहाने के बाद
आइने से
वह आज फिर नहीं पोंछ पाई
उस चेहरे को
गुमसुम कोई चेहरा
किसी को कुछ कहता है
एक पुकार को सुनता हुआ

वह ऑफिस जा रही है
कुछ
सोचते हुए
काफी दूर तक जायेगी
एक रोशनी उसके साथ
यह याददाश्त है
जिसमें वह खुद को
ठीक से पहचानती है।

Tuesday, January 15, 2008

थिएटर मेरा पहला प्यार है: पंकज कपूर


रामकिशोर पारचा
फ़िल्म समीक्षक

पंकज कपूर का मानना है कि वो हमेशा अपनी तरह काम करने की कोशिश करते हैं
वरिष्ठ अभिनेता पंकज कपूर के करियर की कोई भी फ़िल्म देखें तो वही भूमिका उनकी अब तक की सर्वश्रेष्ठ भूमिका लगेगी, पर पंकज ऐसा नही मानते.
वे चाहे धर्म जैसी फ़िल्म करें, व्यावसायिक सिनेमा की 'दस' या इसी हफ्ते रिलीज़ हुई फ़िल्म 'हल्ला बोल', वो हर चरित्र को सर्वश्रेष्ठ बना देते हैं.
हल्ला बोल की रिलीज़ और विशाल भारद्वाज की फ़िल्म ब्लू अम्ब्रेला के लिए सर्वश्रेष्ठ खलनायक का स्क्रीन अवार्ड दिए जाने पर उनसे हुई बातचीत के अंश.
ब्लू अम्ब्रेला के लिए आपको सर्वश्रेष्ठ खलनायक का अवार्ड मिलना सही है?
यह मुझे भी समझ नही आया कि यह किस कैटेगरी के तहत दिया गया है. वह तो नंदू नाम का सपने देखता सीधा इंसान है. मक़बूल और दस की भूमिकाएँ पूरी तरह नकारात्मक थीं.
अवार्ड का मतलब है आपके काम का सम्मान. पर उसका वर्गीकरण होना चाहिए. मैं नही जानता कि जूरी की क्या मजबूरियां होती होंगी. हम यूरोपीय या पश्चिम के सिनेमा या पुरस्कारों की बात करते हैं पर नही जानते सच्चाई क्या है.
हल्ला बोल से पहले आपके करियर की सर्वश्रेष्ठ कौन सी भूमिका है?
नहीं बता सकता. मेरे लिए मेरी हर भूमिका बच्चे की तरह है. मैं चाहे 'धर्म' करूँ या 'सहर', मैं हमेशा अपनी तरह काम करने की कोशिश करता हूँ.
पंकज कपूर ने हल्ला बोल में एक अलग तरह की भूमिका निभाई है
हल्ला बोल के सिद्धू की भूमिका ऐसे ही एक पूर्व डकैत मगर रंगकर्मी की है. मैं लोगों का शुक्रगुजार हूँ कि मैं उनकी तरह का काम कर पा रहा हूँ.
मैंने जब राजश्री की 'मैं प्रेम दीवानी' की तो लोगों ने कहा कि हिन्दी सिनेमा को एक नया पिता मिल गया है. हल्ला बोल में सिद्धू को देखकर लोग मेरी तुलना प्रेमनाथ से कर रहे हैं पर मैं अपनी तरह का काम ही कर रहा हूँ.
क्या यह मशहूर नुक्कड़ नाटककर्मी सफ़दर हाशमी या मॉडल जेसिका लाल की हत्याओं से प्रेरित कहानी है?
नहीं. फ़िल्म हमारे समाज का ही प्रतिबिम्ब हैं, उनमे अगर हमारे समाज और दुनिया के चेहरे नज़र आते हैं तो यह हमारे सिनेमा की कामयाबी है.
पर सतर के दशक में शुरू हुआ ऐसा नया सिनेमा आन्दोलन क्यों मर गया?
सत्तर का दशक सिनेमा के प्रयोगों के दौर था. उस समय हम फ्रांस, इटली के त्रुफो जैसा सिनेमा बनने कि कोशिश कर रहे थे पर अस्सी के दशक में तेज़ी से पनपा टीवी हमारे नए सिनेमा को खा गया.
इसमे पैसा नहीं था. टीवी ने पैसा और नाम दोनों दिया. अब वैसा टीवी भी नही रहा. तमाम चीजों और बाज़ारवाद के बावजूद उस समय वह आधार और रचनात्मकता के स्तर पर साहित्य और जड़ों से जुडा था.
यह फंतासी किस्म की ऐसी दुनिया दिखाता है जो हमसे नही मिलती. हाँ फ़िल्मों के मामले में हम आर्थिक और सामाजिक रूप से ज़रूर बदल गए हैं. इसे पूरी दुनिया देख और समझ रही है.
जब आप किसी साहित्यिक कृति पर बनने वाली फ़िल्म या शो में काम करते हैं तो इतने नेचुरल कैसे हो जाते हैं?
मेरे लिए मेरी हर भूमिका बच्चे की तरह है. मैं चाहे 'धर्म' करूँ या 'सहर', मैं हमेशा अपनी तरह काम करने की कोशिश करता हूँ
मकबूल शेक्सपीयर के मकबेथ और ब्लू अम्ब्रेला रस्किन बोंड की कृतियों पर आधारित फ़िल्में थीं.
मैंने कोशिश की कि उनकी मौलिकता को हानि न पहुँचे. मैं कोई तकनीक इस्तेमाल नहीं करता.
मैं किसी एक्टिंग स्कूल की नकल नही करता. फ़िल्मकार मुझे जो चारित्रिक आधार देते हैं, बस मैं उन्हें विकसित कर लेता हूँ. चाहे वे मेरे करमचंद का चरित्र हो या ऑफिस ऑफिस का मुसद्दी लाल.
मैं जब एक रूका हुआ फ़ैसला, खामोश और हल्ला बोल जैसे फ़िल्में कर रहा था तब भी मैंने यही अप्रोच रखी.
आपके और शाहिद के साथ काम करने को लेकर आजकल बहुत बातें हो रही रही हैं ?
मैंने अपनी जिन्दगी में कभी किसी से कुछ नहीं कहा और न शिकायत की. मैं नहीं चाहता कि आप जैसे वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकारों को ऐसे प्रकरणों और अफ़वाहों पर ध्यान देना चाहिए.
जहाँ तक हमारे साथ काम करने की बात हैं तो यदि कोई अच्छी पटकथा होगी तो ज़रूर करेंगे. पर मैं उनके साथ कोई फ़िल्म इसलिए नही करूंगा कि लोग मुझे उनके पिता की भूमिका में देखना चाहते हैं.
सुप्रिया के साथ भी मैंने 'धर्म' तभी की जब हमे लगा कि कोई कहानी और पटकथा वैसी है.
अब कौन सी फ़िल्म आएगी और थियेटर में वापसी कब होगी ?
फिलहाल एक फ़िल्म है गुड शर्मा. मैं थोड़ा चूजी हो गया हूँ. अब नए नाटक नहीं लिखे जा रहे हैं. लेकिन थियेटर मेरा पहला प्रेम है.


Wednesday, January 2, 2008

बिनायक सेन की कैद के मायने


अपूर्वानन्द
इसी महीने 10 दिसंबर को एक तरफ अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस मनाया जा रहा था तो दूसरी तरफ नागरिक अधिकारों के लिए लड़ने वाले एक शख्स की कैद लंबी हो रही थी. ये शख्स हैं इस साल मई से छत्तीसगढ़ की रायपुर जेल में बंद पीयूसीएल नेता डॉ. बिनायक सेन जिन्हें उच्चतम न्यायालय ने जमानत देने से इनकार कर दिया. 45 मिनट चली सुनवाई वहां मौजूद लोगों के लिए एक भयावह अनुभव था. अभियोजन पक्ष का दावा था कि सेन माओवादी हैं और उन्हें छोड़ने का मतलब होगा सरकार की जड़ें खोदने के लिए उन्हें खुली आजादी देना. परेशान करने वाली बात ये थी कि इस दावे की प्रामाणिकता जांचने की जरूरत ही नहीं समझी गई. डॉ सेन के कंप्यूटर रिकॉर्डों को तोड़मरोड़ कर पेश करते हुए सरकारी वकील ने अदालत को बताया कि इसमें वे पत्र हैं जिनसे ये पता लगता है कि किस तरह डॉ सेन ने नागपुर में हथियारों का प्रशिक्षण कैंप आयोजित करने में मदद पहुंचाई. बचाव पक्ष के वकील राजीव धवन ने इस ओर ध्यान खींचने की कोशिश की कि पत्रों को तोड़मरोड़ कर पेश किया जा रहा है और डॉ सेन खैरलांजी में एक दलित परिवार की हत्या से जुड़े तथ्यों की पड़ताल के लिए नागपुर गए थे. लेकिन अदालत का मानना था कि धवन का तर्क ट्रायल कोर्ट में देखेगा और उसके पास डॉ सेन को जमानत न देने के पर्याप्त कारण मौजूद हैं.
इससे भी ज्यादा परेशान करने वाली बात थी हमारे कुछ अनुभवी मित्रों का यह कहना कि अभियोजन पक्ष का काम ही है कि वह झूठ बोले और इसमें कुछ भी नया या अनोखा नहीं है कि सरकारी वकील ने डॉ सेन के बारे में तथ्यों को तोड़मरोड़ कर पेश किया.
जब सरकार ही झूठ बोलने पर उतर आए तो आप क्या करेंगे? क्या देश के उच्चतम न्यायालय ने ये सिद्धांत नहीं दिया है कि किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता सर्वोपरि है और जमानत से तब तक इनकार नहीं किया जाना चाहिए जब तक ये स्वतंत्रता दूसरों के लिए खतरा न बन जाए? क्या फैसला सुनाने वाली खंडपीठ ने ये महसूस किया कि डॉ सेन के एक भी दिन जेल में रहने का मतलब है, छत्तीसगढ़ के धमतारी जिले में रहने वाले आदिवासियों के लिए मुसीबत और पीड़ा? वो आदिवासी जिनके लिए डॉ सेन ही एकमात्र मेडिकल सुविधा थे. क्या खंडपीठ ने ये सोचा कि डॉ सेन की गिरफ्तारी के फलस्वरूप धमतारी अस्पताल बंद हो गया है? और इसके साथ ही पढ़ने में आता है अदालत ने किसी फिल्म स्टार को सिर्फ इसलिए जमानत दे दी कि उसके ऊपर फिल्म उद्योग के करोड़ों रुपये लगे हुए हैं.
आम आदमी सीधे सवाल पूछता है : क्या जमानत दिए जाने पर डॉ सेन के भूमिगत होने का खतरा था? ये एक तथ्य है कि बंगाल में अपनी छुट्टियां बिताने के बाद डॉ सेन मई में रायपुर लौटे थे, ये पता होने के बावजूद कि स्थानीय मीडिया के सहयोग से छत्तीसगढ पुलिस उनके बारे में दुष्प्रचार कर रही है. उनके भाई ने उन्हें एक पत्र भी भेजा था जिसमें आशंका व्यक्त की गई थी कि लौटने पर उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है. लेकिन वह वापस आए और जैसी कि आशंका थी उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. अगर छत्तीसगढ़ पुलिस अदालत को जैसा बता रही थी वैसा होता तो डॉ सेन मई में ही भूमिगत हो जाते. उनका वापस आने और कानून का सामना करने का फैसला पर्याप्त आधार होना चाहिए था कि कोई भी अदालत उन्हें जमानत दे देती. केस की जानकारी रखने वालों के मुताबिक सरकार द्वारा ट्रायल कोर्ट में मामले को लटकाए रखने के लिए अपनाई गई चालबाजियां इस बात का सबूत हैं कि सरकार की दिलचस्पी केवल डॉ सेन को लंबे समय तक कैद रखने में है. इसका नतीजा ये हुआ कि सलवा जुडूम के नाम पर हो रहे सरकारी अत्याचारों का पर्दाफाश करने वाली एक ताकतवर और भरोसेमंद जुबान खामोश हो गई है. इसका मतलब ये भी है कि मानवाधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले समुदाय के सारे संसाधन अब अपने नेता को आजादी दिलाने में लग जाएंगे. नतीजतन सरकार को निर्बाध दूसरी ज्यादतियां करने की छूट मिल जाएगी.
छत्तीसगढ़ की सरकार के लिए यह जरूरी है कि वह हर उस आवाज को खामोश कर दे जो पूंजीपतियों से उसके गठजोड़ को रोशनी में लाती हो. वह गठजोड़ जो गरीबों के संसाधनों को लूटने के लिए बना है. जब डॉ सेन ने छत्तीसगढ़ सरकार की जनविरोधी प्रकृति का भांडाफोड़ करना शुरू किया, जब उन्होंने सलवा जुडूम और एनकाउंटर के नाम पर होने वाले अत्याचार के खिलाफ आवाज उठानी शुरू की तो सरकार उसे बर्दाश्त न कर सकी. उसने डॉ सेन की जुबान बंद करने का फैसला कर लिया. सबसे आसान तरीका था उन्हें माओवादी घोषित कर देना.
डॉ सेन कितने दिन जेल में रहेंगे कहा नहीं जा सकता। जो निश्चित रूप से कहा जा सकता है वह ये है कि डॉ बिनायक सेन जैसे लोगों के जेल में बिताये गये हर दिन का मतलब है भारत में लोकतंत्र और आजादी के एक दिन का कम हो जाना. हमें ये जानने की आवश्यकता है कि छत्तीसगढ़ की जेलें डॉ सेन जैसे सैकड़ों लोगों से भरी हैं. ऐसे कई सीपीआई कार्यकर्ता हैं जिन्हें सिर्फ इस अपराध में माओवादी करार देकर जेल में ठूंस दिया गया कि उन्होंने सलवा जुडूम का विरोध किया था. माओवादियों की हिंसावादी राजनीति का समर्थन नहीं किया जा सकता लेकिन जब राज्य में किसी भी विपक्ष को माओवादी बता जेल में ठूंसा जाने लगे तो ऐसा उनकी राजनीति को निश्चित तौर पर थोड़ी सी वैधता प्रदान करता है. क्या सरकार ऐसा जानबूझकर कर रही है? क्या ये सरकार खुद भारत का अलोकतंत्रीकरण कर रही है?

तहलका हिन्दी से साभार

सुलगता ज्वालामुखी


हाशिये पर जी रहे हर तरह से शोषित और जातीय हिंसा के शिकार असम के आदिवासी अब कुछ भी चुपचाप सहने को तैयार नहीं दिखते...टेरेसा रहमान की रिपोर्ट...
पूर्वोत्तर के बड़े उग्रवादी संगठनों का एक कमजोर बंधु आदिवासी नेशनल लिबरेशन आर्मी (एएनएलए) ने खुद को असम के दबे-कुचले आदिवासियों का रहनुमा बना लिया है. इस संगठन ने कथित रूप से 13 दिसंबर को दिल्ली-डिब्रूगढ़ राजधानी एक्सप्रेस में हुए एक विस्फोट को अंजाम दिया था और सरकार इसी वजह से अब इसे प्रतिबंधित करने पर विचार कर रही है. विस्फोट की घटना में पांच लोगों की मौत हो गई थी और कई घायल हुए थे. कहा जा रहा है कि ये पिछले महीने गुवाहाटी में स्थानीय लोगों द्वारा आदिवासियों को पीटने और एक आदिवासी महिला को नग्न करके घुमाए जाने की घटना का जवाब था.
असम में आदिवासी दरअसल उन मजदूरों के वंशजों को कहा जाता है जिन्हें करीब 160 साल पहले अंग्रेज़ चाय बागानों में काम करने के लिए यहां लाए थे. तभी से शांतिप्रिय आदिवासी समुदाय राज्य की आर्थिक तरक्की में चुपचाप अपना योगदान देते रहा है. बावजूद इसके ये हमेशा उपेक्षा का शिकार ही रहे. 1996 में बोडोलैंड इलाके में बोडो जनजाति और आदिवासियों के बीच हुए जातीय संघर्ष ने कई आदिवासियों को बेघर कर दिया. इनमें से कुछ अभी भी सहायता शिविरों में रहने को मजबूर हैं. इसके बाद आत्मरक्षा के लिए दो उग्रवादी संगठन बने- आदिवासी कोबरा मिलिट्री ऑफ असम (एसीएमए) और बिरसा कमांडो फोर्स(बीसीएफ). दोनों का इस समय सरकार के साथ संघर्षविराम समझौता चल रहा है.
हालिया बम धमाका इनका पहला बड़ा अभियान था मगर पिछले कुछ समय से इनकी मौजूदगी के निशान कोकराझार, उदलगुड़ी, शिवसागर और सोनितपुर ज़िलों में भी मिलते रहे हैं.
इस समय एएनएलए एक मात्र सक्रिय आदिवासी संगठन है जिसकी कैडर संख्या 150-200 है. कथित रूप से एनएससीएन-आईएम के साथ नजदीकी रिश्ते वाले इस संगठन ने कर्बी, अंगलॉन्ग और गोलघाट ज़िलों में हत्या, अपहरण और चौथ वसूली की घटनाओं को अंजाम दिया है. हालिया बम धमाका इनका पहला बड़ा अभियान था मगर पिछले कुछ समय से इनकी मौजूदगी के निशान कोकराझार, उदलगुड़ी, शिवसागर और सोनितपुर ज़िलों में भी मिलते रहे हैं.
कहा जाता है कि एएनएलए के ज्यादातर कार्यकर्ता पढ़े-लिखे हैं. एसीएमए का चीफ कमांडर कानू मुर्मू भी स्नातक है. उसने तहलका को बताया, "1996 के जातीय दंगो के बाद हमें सरकार से कोई सहायता नहीं मिली. सभी आदिवासी गांवों को खत्म कर दिया गया. यहां तक कि हमें सहायता शिविरों में भी कोई सुरक्षा नहीं मिली थी और बोडो उग्रवादी अक्सर हमें निशाना बनाया करते थे. हम भ्रमित थे. अपनी रक्षा करने के लिए मजबूरी में हमने हथियार उठाए और 500 लोगों का मजबूत समूह खड़ा किया"
बीसीएफ का चीफ कमांडर बीर सिंह मुंडा, मुर्मू से सहमत है. वो ज़ोर देकर कहता है कि आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों के प्रति सरकार के उदासीन रवैए ने लोगों में असंतोष बढ़ाया, ये भावना पूरे भारत में फैल गई है. "हम आदिम जनजाति हैं और लगभग सभी राज्यों में हमें एसटी का दर्जा प्राप्त है. लेकिन असम में वो हमें आदिवासी का दर्जा देने के लिए ही तैयार नहीं हैं," वो कहता है.
चाय जनजातियों के पहले छात्र संगठन "छोटा नागपुरी छात्र सम्मेलन" की स्थापना 1950 में हुई थी जिसका मकसद समुदाय की परेशानियों का हल तलाशना था. आगे चलकर इसका नाम "असम चाय जनजाति छात्र एसोसिएशन" हो गया. इसके महासचिव पल्लब लोचन दास कहते हैं, "हम अपने अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक तरीकों से लड़ने में यकीन रखते हैं. हमारे समुदाय की इच्छाएं बहुत लंबी-चौड़ी नहीं हैं. अगर किसी ने हथियार उठाया है तो इसकी वजह आत्मरक्षा है, किसी को प्रताड़ित करना नहीं. हम इन आतंकी संगठनो से कोई बड़ी उम्मीद भी नहीं करते हैं"
समाज विज्ञानी अमलेंदु गुहा कहते हैं कि जातीय गुटों की स्वायत्तता की मांग धीरे-धीरे अस्तित्व में आई है एकदम से नहीं. "हम एक ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठे हुए हैं मगर कोई कुछ नहीं कर रहा." वो आगे जोड़ते हैं, "शायद करने के लिए पहले ही देर हो चुकी है."

तहलका हिन्दी से साभार

आर्थिक मंदी से जूझेगा अमेरिका


आनंद प्रधान
अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए वर्ष 2008 अच्छे संकेत लेकर नहीं आ रहा है। इस बात की आशंका लगातार प्रबल होती जा रही है कि दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को मंदी की चपेट में आने से रोकना संभव नहीं रह गया है। उन अर्थशास्त्रियों और विश्लेषकों की तादाद दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है जो मंदी को निश्चित बता रहे हैं और जो मंदी की भविष्यवाणी से सहमत नहीं हैं, वे भी यह स्वीकार कर रहे हैं कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था की गति धीमी पड़ जाएगी।अर्थशास्त्रियों में मतभेद की एक बड़ी वजह मंदी की परिभाषा को लेकर है। लोकप्रिय मान्यता यह है कि लगातार दो तिमाही में जीडीपी की वृद्धि दर में गिरावट का अर्थ अर्थव्यवस्था का मंदी की चपेट में आना है। माना जा रहा है कि 2007 के मध्य में हाउसिंग क्षेत्र के बुलबुले के फूटने के बाद अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था जिस सब-प्राइम कर्ज और मार्गेज संकट से जूझ रही है, उसका वास्तविक असर 2008 में दिखेगा। वॉल स्ट्रीट के विश्लेषकों का अनुमान है कि अमेरिकी जीडीपी चौथी तिमाही में लुढ़ककर सिर्फ 1।5 फीसदी की चींटी की गति से बढ़ेगी। विश्लेषक उसके बाद कुछ और कमजोर तिमाहियों की आशंका से इनकार नहीं करते हैं। इसके बावजूद वाल स्ट्रीट मंदी की आसन्न सचाई स्वीकार करने को तैयार नहीं है। वह मंदी की आशंका को 50 प्रतिशत से अधिक वजन या चांस देने के लिए तैयार नहीं है। जाहिर है वॉल स्ट्रीट के लिए मंदी एक ऐसी कड़वी सच्चाई है जिसे वह आखिरी क्षण तक नकारता रहता है। यह कोई पहली बार नहीं है। इससे पहले 1990 और 2001 की मंदी के समय भी वॉल स्ट्रीट अर्थव्यवस्था के अच्छे स्वास्थ्य और ठीक-ठीक विकास दर के दावे कर रहा था लेकिन हकीकत कुछ और ही निकली, इसलिए वर्ष 2008 में अमेरिकी अर्थव्यवस्था की गति में थोड़ा धीमापन आने के बावजूद उसकी अच्छी सेहत के दावों को स्वीकार करना मुश्किल है। यह सच है कि बुश प्रशासन खासकर केन्द्रीय बैंक फेडरल रिजर्व के चेयरमैन बर्नानके और वित्तमंत्री पाल्सन अमेरिकी वित्तीय बाजार में फैली घबराहट, उथल-पुथल और गहराते संकट को दूर करने के लिए हर संभव मदद कर रहे हैं लेकिन उनके सभी प्रयास इस संकट के ‘ब्लैक होल’ में गुम हो जा रहे हैं।दरअसल, हाउसिंग बुलबुले के फूटने के बाद वित्तीय बाजार में सब प्राइम और मार्गेज लोन के संकट के कारण हुए नुकसान को लेकर अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है। उसका आकार कितना बड़ा है, इसको लेकर लगाए जा रहे कयासों का दौर जारी है। खुद फेडरल रिजर्व के चेयरमैन बर्नानके ने संकट की शुरूआत में सब प्राइम और मार्गेज लोन के कारण 50 से 100 अरब डॉलर के नुकसान की आशंका जाहिर की थी लेकिन अब उन्होंने माना है कि यह नुकसान 150 अरब डॉलर से अधिक का हो सकता है। हालांकि यह अनुमान भी बहुत कम माना जा रहा है। ड्यूश बैंक के आकलन के अनुसार सब-प्राइम संकट से जुड़ा कुल नुकसान 400 अरब डॉलर से अधिक का हो सकता है जिसमें लगभग 130 अरब डॉलर का नुकसान बैंको के खाते में जाने का अनुमान है।आश्चर्य नहीं कि इस संकट के कारण कल तक वित्तीय बाजार के चमकते सितारे माने जाने वाले बैंक और वित्तीय संस्थाएं धूल-धूसरित नजर आ रही हैं। जाना-माना इन्वेस्टमेंट बैंक मेरिल लिंच, अमेरिका का सबसे बड़ा बैंक सिटी ग्रुप और दुनिया की सबसे बड़ी वित्तीय संस्थाओं में से एक मार्गन स्टेनली और यूबीएस, सभी संकट में त्राहिमाम करती नजर आ रही हैं। मेरिल लिंच को अपने 93 वर्षों के इतिहास में इतना बड़ा नुकसान कभी नहीं हुआ। उसने अपनी तीसरी तिमाही में 8.4 अरब डॉलर के नुकसान का एलान किया है और विश्लेषकों का अनुमान है कि चौथी तिमाही में भी उसे 8.6 अरब डॉलर गंवाने पड़ेंगे। मार्गन स्टेनली ने मार्गेज लोन डूबने के कारण लगभग 9.4अरब डॉलर के नुकसान की बात स्वीकार की है।इस वित्तीय संकट के कारण बैंको और वित्तीय संस्थाओं ने नए कर्ज देने और कर्ज की शर्तों को सख्त कर दिया है। इससे बाजार में काफी हद तक कजोर्ं के मामले में सूखे की स्थिति पैदा हो गई है। जाहिर है इस सबका असर उन अमेरिकी उपभोक्ताओं पर जरूर पड़ेगा, जिन्हें अपने भारी उपभोग के कारण विश्व अर्थव्यवस्था का ड्राइवर माना जाता है। हाल के सर्वेक्षणों में उपभोक्ताओं के विश्वास में अच्छी-खासी गिरावट देखी गयी है जिसका अर्थ है कि वे खरीददारी और उपभोग कम करेंगे और इसका सीधा असर वस्तुओं और सेवाओं की मांग पर पड़ेगा। मांग में गिरावट के कारण न सिर्फ घरेलू कंपनियों और अमेरिकी बाजार में अपना माल निर्यात करने वाले देशों की आय पर बुरा असर पड़ेगा बल्कि इसके कारण कंपनियां नया निवेश नहीं करेंगी। इससे रोजगार के नए अवसर पैदा नहीं होंगे। छंटनी होगी और बेरोजगारी बढ़ेगी। इससे वस्तुओं और सेवाओं की मांग और घट जाएगी। इस तरह अर्थव्यवस्था मंदी में फंस जाएगी।यह किसी काल्पनिक स्थिति का बयान नहीं है। अमेरिकी हाउसिंग संकट सचमुच बहुत व्यापक और गहरा है। अमेरिका में कुल आवासीय हाउसिंग संपत्ति लगभग 21 अरब डॉलर की है जो कुल अमेरिकी पारिवारिक संपत्ति के एक तिहाई से अधिक है। इस आवासीय हाउसिंग संपत्ति की कीमत में 10 फीसदी की भी गिरावट अमेरिकी उपभोक्ताओं की खरीददारी को काफी प्रभावित कर सकती है। हाउसिंग बुलबुले के फूटने के बाद प्रॉपर्टी बाजार की स्थिति यह हो गई है कि नए मकानों के निर्माण की शुरूआत की दर में अपने चरम स्तर से करीब 47 फीसदी की गिरावट दर्ज की गयी है और जहां 2005 में आवासीय प्रापर्टी कुल जीडीपी का 6.3 प्रतिशत थी, वह घटकर 4.4 प्रतिशत रह गई है। नए मकानों की मांग घटने के कारण निर्माण उघोग को गहरा झटका लगा है। रही-सही कसर कच्चे तेल की रिकार्ड छूती कीमतों ने पूरी कर दी है।साफ है कि अमेरिका मंदी के जुकाम के वायरस की चपेट में आ चुका है और उसके लक्षण दिखने लगे हैं। ऐसे में, भारत जैसी विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था को मंदी का संक्रमण भले न हो लेकिन छींकने से कौन रोक सकता है। भूमंडलीकरण अर्थव्यवस्था का हिस्सा होने के कारण संभावित अमेरिकी मंदी का असर भारत पर भी जरूर पड़ेगा। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में इस आ॓र इशारा किया है। यूपीए सरकार 11 वीं पंचवर्षीय योजना में 9 से 10 फीसदी विकास दर हासिल करने के दावे जरूर कर रही है लेकिन इस बात के आसार अधिक हैं कि अगले साल विकास दर चालू वर्ष के 8.5 फीसदी के अनुमान से गिरकर 7 से 7.5 प्रतिशत तक पहुंच जाए। हालांकि इससे आसमान नहीं गिर पड़ेगा लेकिन अमेरिकी हाउंिसंग बुलबुले के फूटने के बाद भारत को अपने प्रॉपर्टी और रीयल एस्टेट बाजार के साथ शेयर और कुछ हद तक जिंस बाजार की ‘अतार्किक उत्साह’ सें भरी तेजी में बन रहे बुलबुले को लेकर जरूर सतर्क हो जाना चाहिए। भारतीय अर्थव्यवस्था को बाहर से ज्यादा खतरा अंदर से है। 2008 में भारतीय शेयर बाजार और रीयल एस्टेट पर सबकी निगाहें होंगी।

राष्ट्रीय सहारा से साभार

An Open Appeal!!!

२९-१२-२००७
Dear friends and comrades ,

This is to inform you of the recent arrest of Prashant Rahi, a senior journalist of Uttarakhand, by the state police. Prashant was arrested on 15 th of this month in Dehradun and was allegedly charged of being a Maoist commander. The police secretly confined him for five days after which he was shown arrested from the forests of Hanspur Khatta on 21 st December. The police have charged him with various sections of IPC including 121, 121A, 124A, 153B, 120B. All the media carried the same version as stated by the police.

Just to give you a background, Prashant Rahi had been working in close association with the local people's struggles in Uttarakhand since last 17 years. He has been a journalist by profession. Started his career from Himachal Times, moved on to The Statesman and worked many years covering people's issues. He is a native of Maharashtra and pursued his education from Banaras Hindu University.

This incident is in continuance of the trend set by many innocent arrests in the last few months including that of Binayak Sen and some journalists in Kerala and Andhra Pradesh of targeting pro-people intellegentsia. The trend has become increasingly apparent in those parts of the country where people's movement is strong.

We firmly believe that this state action is a part of the efforts being carried out by the various state governments to secure hefty amount of funds from the central government in the name of combating naxalism. For this, it becomes imperative for them to prove that the state is inflicted with this insurgency.

We, the undersigned, strongly condemn the arrest of Prashant Rahi and call upon all the concerned individuals, civil society organisations, journalist unions, writers unions, people's movements and struggling groups to join hands in solidarity and support.


Rajendra Dhasmana (President, PUCL, Uttarakhand)
Manglesh Dabral (Poet and Journalist)
Pankaj Bisht (Editor, Samayantar)
Anand Swaroop Verma (Journalist and Human Rights Activist)
P.C. Tiwari (National Secretary, Indian Federation of Working Journalists)
Suresh Nautiyal (General Secretary, Uttarakhand Patrakar Parishad)
Anil Chaudhary (President, INSAF)
Jagdish Yadav (Photo Editor, Pioneer)
Harsh Dobhal (Managing Editor, Combat Law)
Gautam Navlakha (Consulting Editor, Economic and Political Weekly)
Ashish Gupta (Asamiya Pratidin)
Anil Chamadia (Journalist)
Jaspal Singh Siddhu (UNI)
A.K. Arun (Editor, Yuva Samwad)
Madan Kashyap (Poet)
Pankaj Singh (Poet and Journalist)
Karuna Madan (Journalist)
Piyush Pant (Editor, Lok Samwad)
Sarvesh (Photo Journalist)
Panini Anand (Journalist, BBC Hindi)
Avinash (Journalist, NDTV India)
Bhupen Singh (Journalist, STAR News)
Sukla Sen (CNDP India)
Aanchal Kapur (Kriti Team)
Vijayan MJ (Delhi Forum)
Sanjay Mishra (Special Correspondent, Dainik Bhaskar)
Prem Piram (Director, Jagar Uttarakhand)
Ashok Pandey (Poet)
Arvind Gaur (Director, Asmita Theatre Group)
Pankaj Chaturvedi (Poet)
Satyam Verma (Rahul Foundation)
Ranjit Verma (Advocate)
Bishambhar (Secretary, Roji Roti Bachao Morcha)
Ajay Prakash (Journalist, The Public Agenda)
Swatantra Mishra (Journalist, IANS)
Vandana (Special Correspondent, Nai Dunia)
Shree Prakash (INSAF)
Abhishek Srivastava (Freelance Journalist)
Rajeshwar Ojha (Asha Pariwar)
Raju (Human Rights Law Network)
Rajesh Arya (Journalist)
Kamta Prasad (Linguist and Translator)
Abhishek Kashyap (Writer)
Thakur Prasad (Managing Editor, Samprati Path)
Rajiv Ranjan Jha (Writer)
Srikant Dube (Journalist)
Rishikant (Journalist)
Pankaj Narayan(Journalist)
Rajesh Chandra (Poet & Cultural Activist)

Monday, December 10, 2007

श्मशान में लाल झंडा

यह शांति का लाल सूरज नहीं है _ मेधा पाटकर
पश्चिम बंगाल की माकपा सरकार ने बार-बार सवाल उठाया कि मेधा पाटकर नंदीग्राम क्यों गईं? मेरा कहना है कि जहां भी अन्याय होगा, मानवीय मूल्यों पर हमला होगा, वहां जाने का हमारा हक़ बनता है. नंदीग्राम पश्चिम बंगाल में ज़रुर है पर भारत में भी है. एक भारतीय नागरिक को देश के किसी भी हिस्से में आने-जाने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है. ऐसा ही सवाल हमसे सिंगूर की राह में भी पूछा गया था और कोलकाता हाईकोर्ट ने उन्हें ऐसा करने से मना किया था.नंदीग्राम में हम पर हमला करने वाले आम आदमी नहीं थे, वे किसी खास पार्टी के कैडर थे. वे किस पार्टी के कैडर थे, यह दुनिया को मालूम हो चुका है. 12 नवंबर को जब दूसरी बार हम नंदीग्राम प्रवेश की राह में सीपीएम कैडरों के एक-एक अवरोधक से जूझ रहे थे तो उनके स्टेट चेयरमैन का मीडिया में बयान आ रहा था-हम मेधा पाटकर को किसी भी कीमत पर घुसने नहीं देंगे. किसी संगठन के कैडर और चेयरमैन के बीच इस तरह का संवाद , अनुशासन आप पश्चिम बंगाल में ही देख सकते हैं. 8 नवंबर को हमला सिर्फ हमारे ऊपर हुआ, यह सही नहीं है. पश्चिम बंगाल के वयोवृद्ध बुद्धीजीवी तरुण सान्याल, मशहूर शिक्षाविद सुनंद सान्याल, जाने-माने वैज्ञानिक डॉ. मैहर इंजीनियर और अनुराधा तलवार जैसे मानवाधिकार कार्यकर्ता भी इस हमले के शिकार हुए. हमारे साथ-साथ सफर कर रहे मीडिया के साथियों पर भी हमला हुआ और मुझे अपने से अधिक मीडिया पर हुए हमले का दुख है. हमारे साथ मार खाने वाले मीडियाकर्मी भी हमारी ही तरह निर्दोष थे.नंदीग्राम में मीडिया को लगातार रोकने की कोशिश की गई. देश में पहली बार ऐसा नहीं हुआ है. गुजरात में भी मीडिया का प्रवेश कुछ समय के लिए रोक दिया गया था. पहले प्रवेश बंद करना, फिर निषेध हटा लेना, एक मक़सद से ही ऐसा किया गया होगा. मीडिया को इस तरह प्रवेश से रोकना, देश की आंख पर परदा डालना है. क़ानून को अपने हाथ में लेकर प्रवेश रोकना औऱ प्रवेश करने की कोशिश करने पर हमले करना, इमरजेंसी घोषित न करते हुए भी अघोषित राजनीतिक आपातकाल मैंने देश में पहली बार देखा है. कुछ दृश्य तो गुजरात से भी ज्यादा भयानक, ज्यादा खतरनाक दिखे.सीपीएम की योजनाबद्ध हिंसाविमान बोस बार-बार हमें रोकने की वजह, नंदीग्राम में हमारे जाने से, उन्माद फैलने की आशंका बता रहे था. जबकि गांव में सीपीएम समर्थकों ने कहा- आप पहले क्यों नहीं आईं, पहले आने से नंदीग्राम जलने से बच जाता. विमान बोस उन्माद के बारे में ज्यादा जानते हैं. हमारे पास तो सत्य, शांति और अहिंसा का हथियार ही है. हिंसात्मक तरीके से दखल कब्जा अभियान को वे शांति स्थापना कह रहे हैं. शांति और हिंसा की परिभाषा पश्चिम बंगाल में बदल नहीं सकती. वे कह रहे हैं- 11 माह बाद नंदीग्राम में शांति का लाल सूरज उगा है. ध्वस्त, बर्बाद, जले हुए घरों पर लहराते हुए लाल झंडे की श्मशानी सूरज को हम शांति का लाल सूरज तो नहीं कह सकते.नवंबर में नंदीग्राम में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई है. इस बार पुलिस की भूमिका हमले से अलग रखने की रही. सब कुछ राज्यसत्ता ने और साफ-साफ कहें, पश्चिम बंगाल की वाममोर्चा ने नहीं, सीपीएम ने योजनाबद्ध तरीके से पूरा किया है. हम सरकार से ज़्यादा उन पर यकीन करते हैं, जिन हजारों-हजार लोगों के घर-बार, चास-बास सब बर्बाद हो गये हैं. अपनी ज़िंदगी से उजड़े-बर्बाद हुए लोग झूठ बोल रहे हैं और सरकार सच बोल रही है, इसकी जांच सीबीआई ही कर सकती है.कोलकाता हाईकोर्ट ने 14 मार्च के हमले को असंवैधानिक कहा है लेकिन नवंबर महीने का दखल-कब्जा भी उतना ही असंवैधानिक और अमानवीय है. नंदीग्राम में सेज की परियोजना रद्द होने के बाद सीपीएम सरकार के खिलाफ संग्राम करने वाले गांव-समाज को खत्म कर बदला लेना, यह राजनीतिक अपराधीकरण और अमानवीयता की हद है. निहत्थे लोगों पर हो रहे हमले की फोन से पल-पल की सूचना, बहनों पर अत्याचार के किस्से, लापता और मृतकों के बारे में भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति के अपुष्ट दावे, यह सब जनसंहार का साक्ष्य ही तो है.पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने राष्ट्रपति शासन लगाने और सरकार को गिराने की मांग की है. हमने पहले भी धारा 355 का विरोध किया था लेकिन सरकार गिराने की मांग हम बेहतर विकल्प के आधार पर ही कर सकते हैं. राष्ट्रपति शासन या धारा 355 की मांग एक तरह से प्रदेश की जनता पर आपातकाल थोपना है. आपातकाल लगा कर नागरिक अधिकारों को कुचलने की मांग हमें पसंद नहीं है.बगदाद बचाने जैसी गुहार और बुश की इच्छाभूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति ने नवंबर महीने के हमले की पूर्व सूचना देश के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, सोनिया गांधी को दी थी. फिर भी नंदीग्राम की हिफाजत नहीं हुई. देश के सर्वोच्च सत्ता का समाज के सबसे कमजोर वर्ग की हिफाजत के प्रति असंवेदनहीनता लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है. इससे नंदीग्राम के आहत, बर्बाद ग्रामेर मानुष की लोकतांत्रिक आस्था कमजोर पड़ी है. कोलकाता से देर रात सोनिया गांधी से लेकर मंत्रियों तक, मै, इस तरह फोन करती रही, जैसे बगदाद को बचा लेने की यह आख़री रात है. लेकिन हुआ वही, जैसा बुश ने चाहा.बुद्धदेव ने कहा-जैसे को तैसा. नंदीग्राम बर्बाद हो गया. यूपीए गठबंधन की भूमिका भी नंदीग्राम के सवाल पर संदिग्ध रही. किसी प्रदेश में राज्य-पोषित हिंसा को रोकने में नकारा साबित होना, यूपीए गठबंधन की नियत पर सवाल उठाता है.नंदीग्राम, न्यूक्लियर डील और माओवादीनंदीग्राम ने परमाणु डील को प्रभावित किया है और किसी तरह का आंतरिक समझौता कांग्रेस और वाम के बीच हुआ है, ऐसा कहा जा रहा है. लेकिन इसके कोई मज़बूत आधार नहीं हैं. परमाणु समझौते के सवाल पर हम नंदीग्राम से ज्यादा भाजपा को सत्ता से रोकने की जिद को महत्वपूर्ण मानते हैं. हमें सीपीएम की पश्चिम बंगाल की भूमिका से ज़रुर ऐतराज है पर इसी सीपीएम की परमाणु समझौते के सवाल पर मजबूती के साथ अकड़ने से साम्राज्यवादी ताक़तों को कड़ी चुनौती मिली है. परमाणु के मुद्दे पर डटे रहने से देश ही नहीं, दुनिया भर में परमाणु के खिलाफ एक तरह की हवा बनी और बहस शुरु हुई. सीपीएम की इस भूमिका की तारीफ़ होनी चाहिए.नंदीग्राम में मार्च से लेकर अब तक माओवादियों की उपस्थिति के हमें कोई चिन्ह दिखाई नहीं पड़े. भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति में शामिल तृणमूल कांग्रेस, एसयूसीआई, जमायत-उलाम-ए-हिंद सहित सभी घटक दल माओवादी राजनीति के धुर विरोधी हैं. फिर माओवादियों का प्रवेश किस तरह हो सकता है?मार्च से नवंबर तक निहत्थे किसान-मज़दूरों पर हमला हुआ, सशस्त्र माओवादियों पर नहीं. माओवादियों ने 14 मार्च और 10-11 नवंबर को ज़रुर सशस्त्र संघर्ष किया होता, अगर वे वहां उपस्थित होते.नंदीग्राम में हथियारों की राजनीति को थोड़ी और गंभीरता से देखने की जरुरत है. नंदीग्राम में सेज का विरोध करने वाले भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति के समर्थक भी 11 महीने पहले सीपीएम के ही समर्थक थे. सेज की किसान विरोधी नीति ने गांव के किसानों को संग्राम के लिए प्रेरित किया. पहले लोगों को टुकड़े में बांटिए, फिर हथियार बांटकर हिंसक माहौल तैयार करिये. 14 मार्च के जनसंहार के बाद भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति के समर्थकों ने भी बदले के भाव में हिंसा का सहारा लिया था, जिसे हम उचित नहीं ठहरा सकते. हिंसा हर हाल में बुरी है, चाहे इधर की हो या उधर की. लेकिन हम अच्छी तरह से जानते हैं कि हिंसा को बढ़ावा किसने दिया! गांव के भोले-भाले किसानों को हथियारों से लैस करना, यह लोकतांत्रिक राजनीति नहीं है तो वामपंथी भी नहीं हो सकती. राजनीति को अपराधीकरण से बचाने के लिए सबसे ज्यादा ज़रुरी है कि राजनीतिक दलों का निःशस्त्रीकरण किया जाये. हथियार सिर्फ पश्चिम बंगाल में सीपीएम के पास ही नहीं है, देश में दूसरे राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के पास भी सशस्त्र दस्ते हैं. चुनाव लड़ने वाली किसी भी राजनीतिक दल को सशस्त्र दस्ते रखने का हक़ नहीं होना चाहिए.गांधीवाद से आगे की राजनीतिआलोचक कहते हैं कि मुझे गांधीवाद से आगे की राजनीति का ज्ञान नहीं है, इसलिए मैं मार्क्सवादी सरकार के खिलाफ खड़ी हुई हूं. हमें लगता है कि मार्क्स और गांधी दोनों ने समाज के सबसे कमज़ोर मेहनतकश को श्रम के उचित दाम और उनके हक़-न्याय की बात की थी. हमें गांधी विरुद्ध अंबेडकर, मार्क्स विरुद्ध गांधी के विवाद से अलग रखा जाए तो अच्छा है. सब जानते हैं, हमारे विश्वास की अवधारणा अपने निजी चिंतन पर नहीं, मार्क्स, गांधी, अंबेडकर की विचारधारा के आधार पर तय होती है. देश के वरिष्ठ वामपंथी, मार्क्सवादी जो हमारे साथ ऐनरॉन से लेकर नर्मदा के मुद्दे पर साथ खड़े हुए, उन्होंने हमें कभी भी मार्क्स विरोधी नहीं माना.नंदीग्राम राजनीतिक अपराधीकरण के खिलाफ सत्य, न्याय और शांति के अहिंसात्मक विकल्पों को चुनने का संदेश देता है. हमें सीपीएम से अपेक्षा थी कि सेज के सवाल पर जो भूमिका वे महाराष्ट्र के रायगढ़ में लेते हैं, वही भूमिका नंदीग्राम में लेंगे. पूंजीपति सत्ता और राजनीति को प्रभावित कर रहे हैं. वामपंथियों को इस गठजोड़ से बचना होगा.सत्ता राजनीति को पहले भ्रष्ट करती है, फिर अपने मूल्यों से गिराती है. आज पूंजीकरण और बाज़ारीकरण ने राजनीति का चित्र औऱ चरित्र ही बदल दिया है. मुनाफे का बाज़ार ही नहीं, मुनाफे की राजनीति, राजनीतिक दलों का उद्देश्य हो गया है. वामपंथी राजनीति भी अगर मुनाफे से प्रभावित हो रही है तो लोकतंत्र के बचाने की ज़िम्मेवारी किसकी है ?धार्मिक संप्रदायवाद की तरह भाषा और प्रदेशवाद भी एक तरह की सांप्रदायिकता है. गुजरात की राज्यसत्ता ने भाषावाद और प्रांतवाद को ख़ूब इस्तेमाल किया है. बंगाल के बुद्धीजीवी नंदीग्राम के सवाल पर किसी भी राजनीतिक दल से ज़्यादा सक्रिय हैं. हमें लगता है कि बंगाल के बुद्धीजीवी संप्रदायवाद के जाल को काटना जानते हैं. हमें बंगाल के एक-एक ग्रामेर मानुष, कलाजीवी, बुद्धीवीजी, शिल्पकार समाज पर पूरा भरोसा है, वे बंगाल को बदलकर दम लेंगे.(प्रस्तुतिः पुष्पराज)

www.raviwar.com से साभार

Friday, December 7, 2007

नंदीग्राम से खुलती मार्क्सवादी भूमिसुधारों की पोल

डरावनी कहानियों का रंग उतरना शुरू हो गया हैं. ऐसे में इस तूफान के पीछे के कारणों को जानना महत्वपूर्ण है.
पहेली जैसा प्रश्न ये है कि सीपीएम ने नंदीग्राम मामले में जो हुआ वो क्यों होने किया? शायद वे उस चीनी नेतृत्व के पदचिन्हों पर चलने का प्रयास कर रहे रहे थे, जिसने खुलेआम थिआनानमेन चौक पर छात्रों के प्रदर्शन का दमन किया था और उसके बाद इतना कड़ा रुख अपनाया गया कि बीजिंग के महाशक्ति के रूप में तेज़ी से उभरने की वजह से अब इस बारे में कोई बात भी नहीं करना चाहता.
हालांकि, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी विशेष आर्थिक क्षेत्रों की जरूरत के सवाल पर एक मत नहीं हैं. पार्टी के ज्यादातर सदस्य इण्डोनेशियाई भागीदारी को लेकर सशंकित हैं. पार्टी का एक दूसरा बड़ा खेमा किसानों की जमीनें अधिग्रहित करने के मुद्दे पर खुश नहीं है. फिर ऐसा क्या है कि पार्टी नेता भूमि अधिग्रहण के खिलाफ किसानों के आंदोलन को दबाने की कोशिशें कर रहे थे? इसका जवाब साफ है. दरअसल नंदीग्राम में पश्चिम बंगाल के भूमिसुधार की कई कड़वी सच्चाईयां दफन हैं.
भूमि वितरण के मामले में पार्टी ने अल्पसंख्यकों के साथ, जिसमें बांग्लादेश से आए मुसलमान भी शामिल थे, बड़ा पक्षपात किया. लाभार्थियों को जमीनों पर कब्जा तो दे दिया गया, लेकिन उनके मालिकाना हक देने वाले कागजात उन्हें नहीं दिए गए. ये कागजात आज तक सीपीएम के दफ्तरों में हैं.
इससे अलग दूसरा कारण ये कि पार्टी के बहुत से कैडरों की निगाहें उस सूत्र पर भी गड़ी हुई हैं, जिसके तहत वे करोड़ों की सेज परियोजना में अपने लाभ का गणित हल कर सकते हैं.
पूरा मिदनापुर जिला और खासतौर से नंदीग्राम क्षेत्र मार्क्सवादियों का गढ़ माना जाता रहा है. वहां भूमि सुधारों की प्रक्रिया के दौरान बड़ा उत्साह देखा गया क्योंकि ज़मींदारों से अपनी खुन्नस निकालना, उन्हें चिढ़ाना उस समय पार्टी समर्थकों का एक पसंदीदा सिद्धांत बन गया था. दूसरी ओर भूमि वितरण के मामले में पार्टी ने अल्पसंख्यकों के साथ, जिसमें बांग्लादेश से आए मुसलमान भी शामिल थे, बड़ा पक्षपात किया. लाभार्थियों को जमीनों पर कब्जा तो दे दिया गया, लेकिन उनके मालिकाना हक देने वाले कागजात उन्हें नहीं दिए गए. ये कागजात आज तक सीपीएम के दफ्तरों में हैं. यानी जमीनों पर कागजी कब्जा एक तरह से सीपीएम के पास है. कागजातों का सीपीएम के पास होना ही वो राज़ है, जिसके कारण सीपीएम अचानक उस क्षेत्र के 80 प्रतिशत तक वोट झटकने की स्थिति में पहुंच गई. लोग अपनी ज़मीन छिन जाने के डर से सीपीएम का हर हाल में साथ देने के लिए मजबूर थे. जब सेज का प्रस्ताव आया तो इस क्षेत्र को चुना भी इसीलिए गया. सीपीएम नेता इस अतिविश्वास में थे कि यहां के लोग इस मुद्दे पर ज़्यादा विरोध करने की स्थिति में नहीं हैं क्योंकि जमीनों के कागजात तो पार्टी के कब्जे में थे.
लेकिन, जिस बिंदु पर सीपीएम गौर नहीं कर पाई, वो ये कि बिना कागजातों के भी भूमि नंदीग्राम के लोगों के लिए जीवन-मरण का प्रश्न बन चुकी थी. बस पहले से ही पक्षपात के शिकार किसानों ने छाछ भी फूंक-फूंक कर पीने का निर्णय लिया. उन्होंने भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति(बीयूपीसी) के बैनर तले अपने को संगठित किया और राज्य पुलिस, प्रशासन और सीपीएम के अनधिकृत बाहुबलियों से जमकर लोहा लिया. 14 मार्च, 2007 को हुए संघर्ष में 140 से ज्यादा किसान मारे गए, सैकड़ों घायल हो गए. नतीजा ये निकला कि सीपीएम समर्थकों का उस क्षेत्र के गांवों में रह पाना मुश्किल हो गया. भाग कर सभी ने खेजुरी के शरणार्थी शिविर में शरण ली.
नवम्बर से पहले अधिग्रहण का विरोध कर रहे बिना कागजातों की ज़मीन वाले लोगों को सबक सिखाना ज़रूरी हो गया. सीपीएम की योजना के मुताबिक अब तक इन किसानों द्वारा जोती जा रही भूमि पर पार्टी के कार्यकर्ताओं द्वारा कब्जा किया जाना था. केवल कागजी कब्जे से तो कोई मकसद हासिल होने वाला था नहीं जब जमीन पर असल कब्जा अधिग्रहण का विरोध कर रहे किसानों का था. और ज्यादा दिन अगर ये सब चलता तो ये बात भी दुनिया के सामने आ जाती कि भूमि सुधारों में दी गयी ज़मीनों के कागजात सीपीएम के ऑफिसों में रखे हुए हैं.
दुख इस बात का है कि कई राज्यों में कांग्रेस भी कुछ ऐसी ही कार्य-प्रणाली अपना रही है. आपात भूमि सुधार के दौरान जिन लोगों ने जमीनें पाईं थीं, उनमें से बहुत-से लोग अब खेती में रुचि नहीं रखते. बहुत सारे जो पिछड़ी जातियों से संबंधित हैं, आरक्षण के तहत नौकरी पा गए और शहरों में चले गए गए. लिहाजा वे बस नाम के ही भूस्वामी रह गए. स्थानीय दबंग नेता अनपढ़ गरीब किसानों को इन नाममात्र के भूस्वामियों के रूप में दिखा कर पावर ऑफ़ अटॉर्नी अपने किसी आदमी के नाम करवा देते हैं. बाद में इन जमीनों को किसी अनजान अप्रवासी भारतीय को बेच दिया जाता है. ये लोग जमीनों को एक लाभकारी निवेश के रूप में देखते हैं. यानी कि जो काम महाराष्ट्र में कांग्रेस कर रही है वही काम नंदीग्राम में वामपंथी कर रहे हैं.
शरद जोशी
(लेखक राज्य सभा सदस्य और किसानों के मुद्दों से जुड़ी संस्था शेतकरी संगठना के संस्थापक हैं)

तहलका हिन्दी से साभार

किस्सा कैडर का


विचारधारा के लिए लड़ने वाले सिपाही या राजनीतिक गुंडे ? पश्चिम बंगाल में पिछले तीन दशक से सीपीएम के अबाध राज का राज़ कैडर ही रहे हैं. कैसे कैडर सीपीएम की मदद करते हैं और इसमें उनका क्या फायदा है बता रहे हैं शांतनु गुहा रे...
भास्वती सरकार कार्ल मार्क्स के केवल नाम से ही परिचित हैं, मगर मार्क्स के सिद्धांत क्या हैं ये जानने के लिए उन्होंने उनकी किताबों को कभी नहीं खंगाला. 34 वर्षीय ये स्कूल शिक्षिका अपने पति(राज्य परिवहन निगम में क्लर्क) के साथ कोलकाता के दक्षिणी इलाके में रहती हैं. समर्पित सीपीएम कैडरों की तरह ये दोनों पति-पत्नी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी(मार्क्सवादी) की गढ़िया से निकलने वाली रैलियों का एक अभिन्न हिस्सा होते हैं. सरकार पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे के शासन पर बात तो करती हैं लेकिन अपनी तस्वीर छपवाने के सवाल पर पीछे हट जाती हैं. हालांकि उनके पड़ोसी बताते हैं कि सरकार को रैलियों में नारे लगाने के बदले पैसे मिलते हैं, लेकिन वो इस बारे में कुछ भी कहने को तैयार नहीं.
गौरतलब है कि ये महिला कैडर, पार्टी में और पांच साल बिताने के बाद नेता के रूप में अपनी पदोन्नति का सपना संजोए हुए है. सरकार का पार्टी से जुड़ाव छात्र जीवन में ही हो गया था. तब वो स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया(एसएफआई) की एक सामान्य सदस्य थीं और उसी दौरान उन्होंने पहली बार सीपीएम की रैली में भी हिस्सा लिया था. कैडर सत्ता का उतना आनंद नहीं ले पाते. लिहाजा सरकार सहित राज्य के लाखों कैडर राज्य के शीर्ष पार्टी नेताओं के संपर्क में आने की अपनी बारी के इंतजार में हैं. पश्चिम बंगाल में सीपीएम से जुड़ने के बाद किसी भी कैडर के लिए नेता की स्थिति तक पहुंचना एक स्वर्णिम अवसर होता है, जिसका वे बेसब्री से इंतजार करते हैं. इससे न सिर्फ उन्हें ज्यादा आजादी मिल जाती है बल्कि बड़े पैसे बनाने के खेल में भी उनकी पैठ हो जाती है.
पश्चिम बंगाल में सीपीएम से जुड़ने के बाद किसी भी कैडर के नेता की स्थिति तक पहुंचना एक स्वर्णिम अवसर होता है, जिसका वे बेसब्री से इंतजार करते हैं. इससे न सिर्फ उन्हें ज्यादा आजादी मिल जाती है बल्कि बड़े पैसे बनाने के खेल में भी उनकी पैठ हो जाती है.
अब जरा ये देखें कि पार्टी के प्रति इस अंधभक्ति के फलस्वरूप सरकार जैसे लोगों को मिलता क्या है.
पहले राज्य में सरकारी नियुक्तियों की प्रक्रिया राज्य सरकार के हाथ में होती थी और इनमें से 90 प्रतिशत तक नौकरियां प. बंगाल में सीपीएम कैडरों की झोली में ही जाती थीं. नौकरियों से योग्यता का कोई लेना-देना नहीं था और वामपंथ से थोड़ा-सा जुड़ाव ही पर्याप्त योग्यता मानी जाती थी. कुछ साल पहले केंद्र सरकार ने इस प्रक्रिया को कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी) के जिम्मे कर दिया मगर अब भी सैकड़ों अस्थाई नियुक्तियां स्थानीय नेताओं के निर्देशों पर ही होती हैं. चाहे सरकारी नौकरी हो, नगर परिषद् की या फिर किसी निजी संस्थान की - पार्टी का संदेश स्पष्ट हैः यदि आप हमारे साथ हैं, तो हम भी आपका ध्यान रखेंगे.
बहरहाल, कैडर के सवाल पर सरकार कहती हैं, “मैं एक कैडर हूं और पार्टी के लिए काम करती हूं. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि कोई गुंडा-बदमाश हूं.” वो एक सीधा-सा सिद्धांत जानती हैं - पार्टी के प्रति अंधभक्ति कैडर के जीवन और उसकी प्रगति की अनिवार्य शर्त है. यानी कैडर को हर हाल में पार्टी के पक्ष में खड़ा होना है, पार्टी के बचाव का रास्ता तलाशना है. वह इसे पलटवार का सिद्धांत कहती हैं. उनका मानना है कि विरोधी हर कदम पर पार्टी पर कीचड़ उछालते रहते हैं, लिहाजा कैडरों को उसके जवाब के लिए हमेशा तैयार रहना पड़ता है.
उदाहरण के तौर पर जिस दिन फिल्मकार अपर्णा सेन ने नंदीग्राम विरोधी रैली में हिस्सा लेने का निर्णय किया, कैडर पहले से तैयार थे कि मीडिया में उन्हें क्या कहना है. सेन के इस कदम पर कैडरों ने ये प्रचारित करना शुरू किया कि कोलकाता में हाल में संपन्न हुए फिल्म समारोह में अध्यक्ष न बनाए जाने को लेकर वो सरकार से नाराज थीं. जिन तक ये कहानी नहीं पहुंच पाई थी, उन्होंने दूसरा कारण गढ़ा: सेन इसलिए नाराज थीं क्योंकि राज्य सरकार ने सेन की अगली फिल्म को वित्तीय सहायता देने से इनकार कर दिया था.
पश्चिम बंगाल में यदि आप एक कैडर हैं, तो आपको न केवल इस सिद्धांत में विश्वास करना होगा, बल्कि इसे प्रचारित-प्रसारित भी करना होगा. यानी जमीनी स्तर पर व्यावहारिक मार्क्सवादी सिद्धांत यही है.
स्थानीय न्यूज चैनल तारा बंगला की संपादक सुमन चट्टोपाध्याय कहती हैं कि “पश्चिम बंगाल में कैडर की कोई तय परिभाषा नहीं है. ये सिस्टम के एक हिस्से के रूप में हर जगह मौजूद रहते हैं. वो पार्टी के दैनिक पत्र गणशक्ति को दीवारों पर चिपकाने वाला कोई लड़का भी हो सकता है. गली के नुक्कड़ पर होने वाली सभा में वक्ता के रूप में कोई प्राध्यापक भी हो सकता है. किसी सार्वजनिक सभा में भीड़ जुटाने वाला संयोजक हो सकता है. पास-पड़ोस के तलाक, किराएदारी, असफल प्रेम प्रसंग जैसे मामलों को सुलझाने के प्रयास करता कोई कार्यकर्ता भी हो सकता है और विरोधियों के खिलाफ क्रूर कार्रवाई करने वाला कोई क्षेत्रीय गुंडा भी हो सकता है, जिसे सरकार का पूरा समर्थन प्राप्त होता है.”
चट्टोपाध्याय अपने स्टूडियो में घटी एक घटना का उदाहरण देती हैं. एक प्राइमटाइम शो के खत्म होने के बाद उन्होंने स्टूडियो में मौजूद और सत्ताधारी पार्टी से निकटता रखने वाले गार्डन रीच इलाके के डॉन झुनू अंसारी से पूछा कि क्या उन्होंने अपने आदमियों को नंदीग्राम में जवाबी कार्रवाई के लिए भेजा था. अंसारी ने ऐसा करने से तो इनकार किया लेकिन ये जरूर बताया कि ज्यादातर कैडर बंगाल के बाहर से आए थे.
सुमन चट्टोपाध्याय कहती हैं कि “पश्चिम बंगाल में कैडर की कोई तय परिभाषा नहीं है. ये सिस्टम के एक हिस्से के रूप में हर जगह मौजूद रहते हैं. वो पार्टी के दैनिक पत्र गणशक्ति को दीवारों पर चिपकाने वाला कोई लड़का भी हो सकता है.
जानकार बताते हैं कि ज्यादातर माकपाई कैडर बेरोजगार हैं और सीपीएम से उनके जुड़ाव के कई कारण हैं. एक तो इससे उनकी कुछ आमदनी की गारंटी हो जाती है, दूसरे, उनका एक सामाजिक स्तर बन जाता है और साथ ही प्रसिद्धि की राह पर पहला कदम भी पड़ जाता है.
सीपीआई(एमएल) के वरिष्ठ नेता अरिंदम पाल स्वीकारते हैं कि “पार्टी के कई कार्यकर्ता मुश्किलें खड़ी कर देने वाले हैं. शीर्ष कामरेड इसे महसूस भी करते हैं लेकिन उन्हें पता है कि राजनीति में आपको बुद्धिजीवियों की नहीं, ऐसे ही तत्वों की जरूरत पड़ती है.” उन्होंने हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर घटी घटना का हवाला दिया, जहां कैडरों ने एयरपोर्ट यूनियन के चुनाव प्रचार के दौरान एक तरह से इस पर कब्जा कर लिया था. इस उपद्रव के कारण एयरपोर्ट्स अथॉरिटी के लगभग 55 प्रतिशत कर्मचारी काम पर आए ही नहीं. हॉवड़ा स्टेशन पर होने वाले रेलवे इम्प्लाइज यूनियन के चुनाव में भी इसी नजारे की उम्मीदें लगाई जा रही है. “ये तो राष्ट्रीय चुनाव है, और मुंबई व दिल्ली के मतदाता भी वोट देने आएंगे. लेकिन मुंबई में विक्टोरिया टर्मिनस के पोस्टरों से पटे होने और कामकाज ठप्प होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती. दरअसल, ये सब सिर्फ बंगाल में ही संभव है, क्योंकि सत्ताधारी पार्टी इस तरह के चुनावों को अपने जनाधार से जुड़ाव का आदर्श रास्ता मानती है. यही दरअसल कैडर हैं”, कहते हैं सीपीआई(एमएल) के ही कार्तिक सेन.
शहर के जादवपुर विश्वविद्यालय में इस मुद्दे पर चर्चा के दौरान छात्रा सोहिनी मजुमदार कहती हैं, “सभी पार्टियों की तरह वाम मोर्चे में और सीपीएम में भी इस तरह के लोग इसलिए हैं, क्योंकि आप खुद इस तरह के लोगों का समर्थन चाहते हैं. लेकिन उनके बारे में नकारात्मक सोच इसलिए बन गई है क्योंकि ज्यादातर घटनाओं में उनके बुरे पक्ष को ही सामने लाया जाता है.” इस तरह की शुरुआती घटनाओं में से एक 1990 में उत्तरी कोलकाता के विधानसभा चुनाव में हुई थी जहां स्थानीय डॉन नंदा के नेतृत्व में अपराधियों ने सुबह 10 बजे ही बूथ पर कब्जा कर लिया था. स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया से सक्रिय रूप से जुड़ी मजुमदार स्वीकारती हैं, “वहां नंदा का खुलेआम रिवाल्वर लहराना निश्चितरूप से परेशान करने वाली बात थी.” लेकिन वो ये भी कहती हैं कि अब परिस्थिति बदल रही है और हाल ही में पार्टी ने इस तरह के 12 हजार लोगों को पार्टी से निकाल बाहर कर दिया है.
प्रेसीडेंसी कॉलेज के पूर्व प्राचार्य अमाल मुखर्जी कहते हैं, “कैडर ब्रिगेड, कार्यकर्ता बनने के लिए मौका देख कर सुविधानुसार अपने रंग बदलता है. चूंकि उनके पास आरएसएस की शाखा की तरह कोई नियमित अड्डा नहीं होता और उन्हें रोज सुबह परेड नहीं करनी पड़ती, लिहाजा उन्हें पहचानना मुश्किल होता है.”
पास के ही सरकारी स्कूल में पार्टी की स्थानीय शाखा की एक बैठक चल रही है जहां कार्ल मार्क्स, लेनिन, प्रमोद दासगुप्ता व ज्योति बसु जैसे नेताओं के कटआउट लगे हुए हैं. पूछे जाने पर सभा के आयोजक अनिरबन रॉय चौधरी कहते हैं, “यहां ऐसी कोई गलत चीजें नहीं है. किसी के पास कोई गोली-बंदूक नहीं होती. ये तो पश्चिम बंगाल के बारे में मीडिया की अपनी कपोल कल्पना है. कैडर तो अनुशासित कार्यकर्ता मात्र होते हैं जो पार्टी हित में जमीनी जनाधार जुटाने का काम करते हैं.”
वामपंथी विचारधारा के कट्टर समर्थक, केंद्रीय कर्मचारी उत्पल मित्रा कहते हैं, “कोई राजनीतिक पार्टी किसी राज्य में तीन दशक तक सिर्फ इस वजह से सत्ता में नहीं रह सकती, क्योंकि उसके पास कैडर के रूप में असामाजिक तत्व हैं.” मित्रा नंदीग्राम के प्रेत को दफन करने के लिए शहर भर में निकाली जा रही रैलियों का नियमित हिस्सा होते हैं.
वाममोर्चा को इस बात का अहसास है कि नंदीग्राम की घटना ने उसकी अच्छी-खासी छवि को कलंकित कर दिया है. गौरतलब है कि भारतीय राजनीति के गलियारों में वामपंथियों की छवि सार्वजनिक शुचिता, गरीबों की पक्षधर व संवैधानिक मूल्यों के रक्षक की रही है.
अब सवाल ये उठता है कि राज्य भर में कैडरों की वृद्धि को आखिर प्रोत्साहित किसने किया है और उनकी संख्या इतनी कैसे हो गई जिसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है? विश्लेषक कहते हैं कि शुरुआत 1977 में सीपीएम के सत्ता में आने के साथ हुई. पश्चिम बंगाल में रीयल एस्टेट कारोबार में तेजी की शुरुआत ही हुई थी. इससे जुड़े हर तरह के फायदे पार्टी से जुड़े लोगों को दिए जाने लगे. देखादेखी और लोग भी बहती गंगा में हाथ धोने को सीपीएम से जुड़ने लगे. भूमि सुधारों ने भी लोगों की पार्टी के प्रति अंधस्वामिभक्ति सुनिश्चित की.
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता निरबेद रे कहते हैं, “वास्तव में सीपीएम में कैडरों की भीड़ 1990 में आनी शुरू हुई और ये आज तक जारी है.” रे आगे जोड़ते हैं, “इन कैडरों ने राज्य के मतदाताओं का विस्तृत डाटाबेस तैयार किया, जो चुनावों के दौरान पार्टी के काम आया और क्षेत्र पर पकड़ बनाने में उनकी मदद की. कैडरों के पास अपने पास-पड़ोस के बारे में जो सूक्ष्म जानकारी होती है, वो अन्य पार्टियों के पास नहीं होती और ये जानकारी उन्हें बड़ी मदद पहुंचाती है.” रे की मानें तो वाममोर्चा को इस बात का अहसास है कि नंदीग्राम की घटना ने उसकी अच्छी-खासी छवि को कलंकित कर दिया है. गौरतलब है कि भारतीय राजनीति के गलियारों में वामपंथियों की छवि सार्वजनिक शुचिता, गरीबों की पक्षधर व संवैधानिक मूल्यों के रक्षक की रही है. “लेकिन आज अपराधीकरण, भ्रष्टाचार, पूंजीपतियों व नव उदारवादी नीतियों का समर्थन, बाहुबलियों पर भरोसा और अपने सहयोगियों के प्रति उपेक्षापूर्ण बरताव वामपंथी राजनीति का शगल बन गया है.” रे आगे कहते हैं, “आज तो कैडर नंदीग्राम में लोगों को धमकाने, उन्हें वहां से बेदखल करने या फिर उन्हें अपने प्रभाव में लेने संबंधी पार्टी के अभियान का एक अहम हिस्सा बन गए हैं.”
कैडरों की क्रूरता की पहली घटना 1978 में तब सामने आई थी जब उन्होंने बीरभूमि जिले के मारिचझापी में असहाय बांग्लादेशी शरणार्थियों पर फायरिंग में पुलिस का साथ दिया था. रे कहते हैं कि “उसके बाद तो इस तरह की घटनाओं का सिलसिला सा चल पड़ा. शहर के एक पुल से गुजर रहे 17 आनंदमार्गियों की सरेआम हत्या इसी तरह की एक जघन्य घटना थी, लेकिन नंदीग्राम आज इन सभी घटनाओं को पीछे छोड़ते हुए शीर्ष पर पहुंच गया है क्योंकि सभी को ऐसा लग रहा है कि हथियारबंद कैडरों की वहां उपस्थिति व उनके द्वारा की गई हिंसा को पार्टी खुद ही जायज ठहरा रही है.”
वरिष्ट स्तंभकार प्रभाष जोशी भी सच की पड़ताल में एक दल के साथ नंदीग्राम गए थे. उनका कहना है कि कैडर नजर न आने वाली ऐसी इकाई है जिसमें अनवरत बढ़ोतरी हो रही है. “ये तो आप भाग्यशाली थे जो नंदीग्राम में इनमें से कुछ को देख पाए, वरना ग्रामीण इलाकों में जिन कैडरों को बाइक वाहिनी के रूप में जाना जाता है, उनके बारे में तो शायद ही किसी को पता हो.”
राजस्थान उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश एस.एन. भार्गव कहते हैं कि कैडर एक ऐसी विध्वंशक सेना हैं जिसकी ताकत पुलिस की मिलीभगत से बनती है. भार्गव कहते हैं, “नंदीग्राम के कैडर पश्चिमी मिदनापुर, बांकुरा व 24-परगना जिलों से आए थे और वे स्वचालित आग्नेयास्त्रों के इस्तेमाल में पूर्ण प्रशिक्षित थे.”
कुछ भी हो कैडर तो इन सब चर्चाओं से बेखबर अपनी प्राथमिकता वाले कामों में आज भी व्यस्त हैं. और ये काम हैं--नंदीग्राम की हिंसा की लीपापोती और सरकारी तंत्र के पार्टी हितों के आगे घुटने टेकने के आरोपों को खारिज करना.
तहलका हिन्दी से साभार