Friday, June 13, 2008

आतंक की खिलाफत का आतंक

सलिल त्रिपाठी
आतंकवाद के खिलाफ विश्व स्तर पर जारी जंग में निर्दोषों को प्रताड़ित करने के कई खौफनाक उदाहरण देखने को मिले हैं। इन घटनाओं से साबित हुआ है कि कई देशों के अधिकारी आतंकवाद के खिलाफ जंग में अपनी उपयोगिता साबित करने के लिए कितने उतावले है। 2002 में अमेरिकी अधिकारियों ने न्यूयॉर्क के जॉन एफ केनेडी हवाई अड्डे से एक टेलीकॉम इंजीनियर माहेर अरार को अल-कायदा से संबंधों के आरोप में गिरफ्तार किया और उसे उसके घर कनाडा की बजाय सीरिया भेज दिया(अरार का जन्म सीरिया में हुआ था और वो कनाडियाई नागरिक है)। सीरिया में उन्हें कठोर यातनाएं दी गई। बाद में अरार को कनाडियन सरकार से मुआवज़े के रूप में एक करोड़ डॉलर की रकम मिली क्योंकि कनाडा के अधिकारियों ने अमेरिका को इस मामले में सही जानकारियां नहीं दी थीं। अरार ने अब अमेरिकी सरकार के खिलाफ दावा किया है जो कि उसे लगातार वांछितों की सूची में रखे हुए है।
अधिकारियों के इस तरह के अति उत्साह और उससे जाने-अनजाने में हुई गलतियों के पीड़ितों की सूची में भारतीय डॉक्टर मोहम्मद हनीफ भी शामिल है जिसे साल भर पहले ऑस्ट्रेलिया में गिरफ्तार किया गया था। इसकी वजह थी उसके कुछ रिश्तेदारों द्वारा इंग्लैंड में एक असफल आत्मघाती हमला। डॉ. हनीफ के खिलाफ आरोप की वजह बना था उनका वो सिम कार्ड जो धमाकों के एक संदिग्ध के पास से बरामद हुआ था और हनीफ द्वारा बुक करवाया गया भारत की यात्रा का एक तरफ का टिकट। उसके पास हर बात का सही जवाब था लेकिन पूर्व ऑस्ट्रेलियन प्रधानमंत्री जॉन हावर्ड के प्रशासन के राजनेता ये दिखाने के लिए बहुत उत्सुक थे कि अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद से निपटने में उनकी भूमिका सबसे बड़ी है। इसकी परिणति निर्दोष डॉक्टर के खिलाफ अदालती कार्रवाई के रूप में हुई।
आंकड़ो ने ऑस्ट्रेलियाई राजनेताओं के बारे में चौंकाने वाले तथ्यों को उजागर कर दिया। ऑस्ट्रेलियाई प्रशासन द्वारा अपने सैनिकों की विदेश में तैनाती के खिलाफ देश में लगातार बढ़ रहे विरोध को खत्म करने और इसके लिए समर्थन हासिल करने के लिए हताशा में ये चाल चली गई थी।
हावर्ड की हार के बाद अधिकारियों ने सूचना के अधिकार के तहत किए गए आवेदन पर हनीफ मामले से जुड़े आंकड़ों का जखीरा जारी किया। इन आंकड़ो ने ऑस्ट्रेलियाई राजनेताओं के बारे में चौंकाने वाले तथ्यों को उजागर कर दिया। ऑस्ट्रेलियाई प्रशासन द्वारा अपने सैनिकों की विदेश में तैनाती के खिलाफ देश में लगातार बढ़ रहे विरोध को खत्म करने और इसके लिए समर्थन हासिल करने के लिए हताशा में ये चाल चली गई थी। सरकारी अधिकारियों ने अभियोजन और नौकरशाहों पर कानून के साथ खिलवाड़ करने के लिए दबाव डाला। मंशा ये थी कि यदि वो डॉ. हनीफ के ऊपर आतंकवाद के आरोप साबित कर देंगे तो इससे हॉवर्ड की आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में मज़बूती साबित होगी जिसका फायदा उन्हें आगामी चुनावों में हो सकता था।
डॉ. हनीफ को ब्रिस्बेन हवाई अड्डे पर 2 जुलाई 2007 को गिरफ्तार किया गया था। ऑस्ट्रेलियाई क़ानूनों के तहत अगर ऑस्ट्रेलियाई फेडरल पुलिस (एएफपी) किसी को जेल में रखने के पर्याप्त कारण न दिखा सके तो 72 घंटे के बाद उसे रिहा करना पड़ता है। जज को संतुष्ट कर सकने वाले पुख्ता प्रमाणों के अभाव में एएफपी ने प्रिवेंटिव डिटेंशन ऑर्डर (पीडीओ) की संभावना तलाशी। हावर्ड प्रशासन द्वारा पारित किए गए आतंकवाद विरोधी कानूनों ने इसे संभव बनाया मगर ये कानून काफी विवादित हैं और मानवाधिकारवादियों ने इसका जमकर विरोध किया था। पीडीओ के तहत किसी व्यक्ति को भी हिरासत में लिया जा सकता है भले ही उसके खिलाफ कोई मामला दर्ज न हो।
जारी कागज़ातों, जो अब इंटरनेट पर भी मौजूद हैं, से साफ पता चलता है कि एएफपी को 3 जुलाई को ही पता चल गया था कि उसे किसी तरह के सबूतों और सबूतों की सुरक्षा के लिए हनीफ को गिरफ्तार करने की कोई आवश्यकता नहीं है। मगर एक सप्ताह बाद भी डॉ. हनीफ सलाखों के पीछे थे।
11 जुलाई को एक फेडरल पुलिस अधिकारी ने दावा किया कि डॉ. हनीफ को अभी भी नज़रबंद रखने की जरूरत है क्योंकि ये सबूतों को सुरक्षित रखने, हासिल करने और जांच पूरी करने के लिए जरूरी है। 14 जुलाई को एक दूसरे अधिकारी ने दावा किया कि अगर हनीफ को आजा़द कर दिया गया तो वो खुद को अपराधी साबित कर सकने वाले प्रमाणों को नष्ट कर देगा, जिसे पुलिस अभी तक नहीं हासिल कर पायी है। कुछ दिनों के भीतर ही ऑस्ट्रेलिया के तत्कालीन अप्रवासी मामलों के मंत्री केविन एंड्र्यूज़ ने पुलिस द्वारा उपलब्ध करवाई गई जानकारियों का "बारीक विश्लेषण" कर हनीफ का वीसा रद्द कर दिया। ताज़ा जारी हुए दस्तावेजों से साफ हुआ है कि पुलिस ने उस वक्त हनीफ का वीसा रद्द करने की कोई राय ही नहीं दी थी।
हनीफ के खिलाफ लगातार कमज़ोर पड़ते जा रहे मामले के बाद न्यायपालिका ने उन्हें छोड़ने का हुक्म दे दिया जिससे सरकार की खासी किरकिरी हुई--डॉ. हनीफ का सिमकार्ड ग्लासगो की बजाय लिवरपूल में मिला था और वो वन-वे टिकट पर भारत अपने नवजात बच्चे को देखने के लिए आ रहा था। सीधी-साधी सफाई अक्सर सबसे सही तरीका होता है, लेकिन उन लोगों के लिए नहीं जो षडयंत्र खोजने पर ही तुले हों।
अति तो तब हो गई जब एएफपी ने डॉ. हनीफ के मामले की जांच में 600 अधिकारियों को तैनात कर दिया। सरकार को इसमें 75 लाख डॉलर की चपत लगी। उन्होंने 300 गवाहों के बयान लिए, 349 नमूने इकट्ठे किए। इस अभियान में 249 संघीय अधिकारी शामिल थे, 22 जांच वारंट जारी किए गए, टेलीफोन कॉल्स टेप की गई, इलेक्ट्रॉनिक निगरानी मशीनें स्थापित की गई और साथ ही सैंकड़ो गीगाबाइट आंकड़े कंप्यूटर पर इकट्ठा किए गए। ऑस्ट्रेलिया की खुफिया सेवा से लेकर तमाम शीर्षस्थ विभाग इस काम में लगे रहे।
एएफपी ने डॉ. हनीफ के मामले की जांच में 600 अधिकारियों को तैनात कर दिया। सरकार को इसमें 75 लाख डॉलर की चपत लगी। उन्होंने 300 गवाहों के बयान लिए, 349 नमूने इकट्ठे किए।
इसके बावजूद अधिकारियों के हाथ, हनीफ को सूली पर टांगने का कोई सबूत नहीं लग सका। उनका वीसा निरस्त किए जाने के पीछे भी एक कुटिल सोच छिपी थी- ये प्रशासन को उसे अवैध प्रवास के लिए हिरासत में लेने की छूट दे देता। (2002 में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार संगठन के उच्चायुक्त की तरफ से जस्टिस भगवती को ऑस्ट्रेलिया के बंदीगृहों की जांच के लिए नियुक्त किया गया था और उन्होंने इन्हें अपमानजनक और अमानवीय करार दिया था।)
किस चीज़ ने हावर्ड प्रशासन को इस तरह से बर्ताव करने के लिए प्रेरित किया? उन्हें कठिन चुनावों का सामना करना था (इसमें उन्हें बुरी तरह मात खानी पड़ी) और अगर एक भारतीय मुस्लिम डॉक्टर को जेल में रख कर चुनाव जीता जा सकता है तो फिर इसमें बुराई ही क्या है? वैसे भी हावर्ड सालों से बुश समर्थक रहे हैं तो उनका कुछ तो असर उन पर होगा ही। 11 सितंबर 2001 को वो वाशिंगटन में थे और जॉर्ज बुश के साथ आतंकवाद से टक्कर लेने की खबरों में जगह पा गए जिसने एकाएक ही उन्हें आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष में अमेरिका का एक मुख्य समर्थक बना दिया था। अपने प्रधानमंत्रित्वकाल में हावर्ड, बुश प्रशासन के विदेशों में सैनिक अभियानों के पक्ष में सिर्फ दृढ़ता से खड़े ही नहीं रहे बल्कि पर्यावरण से जुड़े जलवायु परिवर्तन, क्योटो प्रोटोकॉल जैसे मुद्दों पर भी बुश प्रशासन की नीतियों के अंध समर्थक बने रहे।
उनको अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों से भी कोई खास लगाव नहीं रहा है। न्यूयॉर्क और वाशिंगटन में हमलों से पहले भी हॉवर्ड इन्हें तोड़ने मरोडने की कोशिशें करते रहे हैं। 2001 में नार्वे के एक जहाज जिसका नाम ताम्पा था, ने एक इंडोनेशियन नौका मिली जिसमें 400 अफगानी शरणार्थी सवार थे। ये घटना ऑस्ट्रेलियाई तट के पास की थी। अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के तहत ऑस्ट्रेलिया इन शरणार्थियों के लिए जिम्मेदार था। लेकिन हॉवर्ड ने उन्हें प्रवेश करने से ही रोक दिया। नॉर्वे के अधिकारियों के दबाव के बावजूद उन्होंने ऐसा किया।
ऑस्ट्रेलिया औसतन साल भर में 10,000 शरणार्थियों को शरण देता है, लेकिन कुछ नेताओं को ये बात पसंद नहीं है। वन नेशन पार्टी की नेता पॉलिन हैन्सन का कहना है कि अप्रवास से जुड़े मुद्दों पर ऑस्ट्रेलिया का रुख लंबे समय से बहुत नर्म रहा है। पूर्व में फिश-एंड-चिप्स की दुकान चलाने वाली हैन्सन को 1990 में उस समय कुख्याति मिली जब उन्होंने एशिया से आने वाले विस्थापितों के खिलाफ एक अभियान छेड़ा। हालांकि वो अपने अभियान में असफल रहीं लेकिन दक्षिण पूर्व एशिया के चतुर नेताओं ने उनके कथनों का उपयोग ऑस्ट्रेलिया को एक नस्लवादी देश साबित करने के लिए किया।
केविन रूड ने देश की कमान संभालने के बाद इसमें बदलाव का वादा किया था। लेकिन हनीफ के मामले में शर्मिंदगी उठाने के बाद भी फेडरल पुलिस का अभी भी यही मानना है कि इस तरह के मामलों से निपटने के लिए उन्हें किसी बुनियादी बदलाव की कोई जरूरत नहीं है। शुरुआती संकेत भी उत्साहजनक नहीं है- रूड की लेबर पार्टी ने इलेक्शन से ठीक पहले कहा था कि वह हनीफ मामले की दुबारा से जांच कराएगी। लेकिन अब अटॉर्नी जनरल ने हनीफ को किसी भी तरह का मुआवजा दिए जाने से इनकार किया है।
हनीफ के पीछे पड़ने की वजह बिल्कुल साफ थीं- किसी को फंसाओं, उसके खिलाफ केस बनाओ फिर सबूतों का ढेर लगाकर ऐसा माहौल तैयार करो जिससे राज्य की निगरानी, नज़रबंदी, पूछताछ और धमकाने की ताकतों में बढ़ोत्तरी संभव हो सके। लेकिन भारत इस मामले में खुद कुछ भी कैसे कह सकता है जब इसका अपना रिकॉर्ड भी कुछ अलग नहीं है। बिनायक सेन का उदाहरण हम सबके सामने ही है।
www.tehelkahindi.com से साभार

लोकतांत्रीकरण का पूरक है शहरीकरण

इम्तियाज अहमद
ऐतिहासिक दृष्टिकोण से शहर और संस्कृति का गहरा संबंध रहा है। ऐसी अवधारणा रही है की शहर की संस्कृति उच्च स्तर की होती है और गांव की संस्कृति सामान्य होती है। यदि इस दृष्टिकोण से देखें तो निश्चय ही शहर का संस्कृति के विकास में बहुत बड़ा योगदान रहा है। इसी कारण शहर को संस्कृति का स्रोत माना जाता है। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की संस्कृति के विकास में गांवों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। लेकिन दोनों सभ्यताओं ने गांवों के प्रभाव को समाहित कर उनको नया रूप दिया जो धीरे–धीरे वापस गांव पहुंचा। आधुनिक दौर में शहरीकरण की प्रक्रिया के तीव्र होने के कारण आज गांव की संस्कृति आसानी से शहर में पहुंच पाई है और उसी के साथ शहरों का प्रभाव गांवों पर भी उसी तेजी से बढ़ा है। आर्थिक विकास का प्रक्रिया और उदारीकरण के बाद रफ्तार और ज्यादा तेज हुई है जिसका नतीजा यह हुआ है कि शहरों की वस्तुएं और फैशन भी तेजी से गांवों तक पहुंच रही है। आज गांव के सामान्य युवा और युवतियां शहर से इतने प्रभावित हैं कि लेकमे जैसी सौन्दर्य के साधन बनाने वाली कंपनियां गांवों में अपना बाजार तलाश रही है। शहरीकरण के कुछ दुष्प्रभाव भी नजर आने लगे हैं। संयुक्त परिवार की व्यवस्था का पतन हुआ है। इसके कारण सामाजिक सुरक्षा का आधार टूटा है। इसका सबसे गहरा प्रभाव वृद्धावस्था के लोगों पर पड़ा है। एकाकी परिवार के कारण उन्हें सामाजिक असुरक्षा और अकेलेपन का सामना करना पड़ रहा है।
ऐसा नहीं है कि गांव में कत्ल या डकैती की वारदातें नहीं होती है। लेकिन शहर में अपराधीकरण की प्रक्रिया व्यापक होने के कारण प्रौढ़ अवस्था के लोगों को खास तौर से निशाना बनना पड़ता हैं शहरीकरण की प्रक्रिया प्रबल होने के कारण सामाजिक रिश्तों में घोर परिवर्तन आया है। पारंपरिक सामाज में व्यक्ति को सामाजिक रिश्तों से सहारा ही नहीं बल्कि प्रतिकूल परिस्थितयों का सामना करने में मदद भी मिलती थी। शहरीकरण के कारण रिश्तों में परिवर्तन के कारण आज व्यक्ति सामाजिक सहारा घर में नहीं ढूंढ पाता है। ऐसे में व्यक्ति दोस्तों का सहारा तलाश करता है या फिर संस्थानों के पास जाता है। जिसका कि सामाज में अभाव है। कुल मिला के नतीजा यह हुआ है की शहर आकर्षण का केन्द्र तो बना है लेकिन अकेलेपन के स्रोत के रूप में भी सामने आया है। शहरीकरण के संस्कृति पर प्रभाव को समझने के लिए दो बातों पर ध्यान देना जरूरी है। पारंपरिक रूप से लोग गांव से छोटे शहरों या कस्बों में पलायन करते थे और बाद में बड़े शहरों की आ॓र रूख किया जाता था। लेकिन उदारीकरण के कारण जिस तरह से जीवन साधन कमजोर हुए हैं, लोगों को सीधे बड़े शहरों की आ॓र पलायन करना पड़ रहा है। इसका परिणाम यह हुआ है कि आज बड़े शहरों में जनसंख्या का बहुत बड़ा हिस्सा पहचानहीन हो गया है। इसी कारण यदि एक तरफ शहरी जिन्दगी में अराजकता बढ़ी है तो दूसरी आ॓र धार्मिकता प्रबल हुई है। अपनी पहचानहीनता और अकेलेपन पर काबू पाने के लिए आदमी धार्मिक संस्थाओं से अपने को जोड़ लेता है।
दूसरी आ॓र शहर की संस्कृति का गांव और छोटे–छोटे कस्बों में पहुंचने के कारण गांव और कस्बे के लोग भी उन क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। जहां पहले शहरियों का दबदबा था। इसका सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण क्रिकेट की दुनिया में मिलता है। पहले मुम्बई, दिल्ली या दूसरे शहरों से ही क्रिकेट की दुनिया में लोग आते थे। यह परिस्थिति बदल गयी है। इसमें कितनी भूमिका राजनीति की है और कितनी शहरीकरण की, कहना संभव नहीं है। लेकिन यह इस बात का प्रतीक जरूर है कि शहरों की संस्कृति सार्वजनिक हो रही है। लोकतांत्रीकरण की प्रक्रिया को इससे मदद ही मिलेगी।
प्रस्तुति :कुमार विजय
http://www.rashtriyasahara.com/ से साभार

जारी है शहर का संघर्ष

अभय कुमार दुबे
आज़ादी के बाद से ही भारतीय समाज को अपने जिस शहर की तलाश थी, उसका एक अंश अब उसे मिल गया है। समाज के केंद्र पर नजर डालने से यह बात और अधिक साफ हो सकती है। इससे पहले ही नहीं बल्कि हमेशा से भारत गांवों का देश था और शहर के साथ उसका संवाद ज्यादा से ज्यादा दोयम दर्जे पर चला करता था। अपेक्षाकृत स्वायत्त और एक-दूसरे से कटी हुई जातिगत इकाइयों में बंटे ग्रामीण समाज का भारतीय शहरों से केवल कामकाजी रिश्ता ही हो सकता था। इसी सामाजिक हकीकत के कारण हमारी आधुनिकता के गांधी और अन्य वाहकों ने नए गांव की स्थापना और विकास को राष्ट्र-निर्माण की परियोजना का मुख्य कार्यभार निर्धारित किया। जाहिर है कि नया गांव बनाने के लिए जाति और धर्म की संस्थागत अभिव्यक्तियों का आधुनिकीकरण बहुत जरूरी था। यह भी आवश्यक था कि जाति-धर्म के साथ-साथ संयुक्त परिवार भी छोटे और एकक परिवारों में टूट जाए। आज उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन की पीढ़ी के राष्ट्र-निर्माता अगर होते तो उन्हें दिखाई देता कि वे जैसा चाहते थे वैसा होने का सिलसिला शुरू हो चुका है, लेकिन समाज का यह परिवर्तन गांव नहीं बल्कि शहर की जमीन पर घटित हो रहा है। बजाय इसके कि गांव हमारे शहरों की औपनिवेशिक आधुनिकता को बदलते, आजादी के बाद परवान चढ़ी हमारी अपनी औघोगिक आधुनिकता ने धीरे-धीरे ही सही पर निश्चित रूप से राष्ट्रीय और सामाजिक कल्पनाशीलता के केंद्र से गांव को प्रतिस्थापित करके उसकी जगह शहर को बिठा दिया। बजाय इसके कि गांव शहर का स्वप्न बनता, शहर ने गांव के सपने की जगह ले ली। नया गांव उपलब्ध नहीं हुआ, लेकिन इस प्रक्रिया में नया शहर उपलब्ध होने लगा जिसकी सार्वदेशिकता के आग्रह जाति, धर्म और परिवार को पहले जैसा नहीं रहने दे रहे हैं। जिस तरह गांव कभी शहर को अपने ढंग से छू कर नागरिकता के आधुनिक रूपों को अपने मुकाबले नाकाफी साबित कर देता था, उसी तरह शहर अब न केवल गांव को अपनी आ॓र खींच रहे हैं बल्कि खुद गांव की तरफ हाथ बढ़ाते हुए दिखने लगे हैं।
कहना न होगा कि शहर ने इस मुकाम तक आने के लिए बहुत संघर्ष भी किया है। उसका यह संक्रमण आसान नहीं रहा है। आजादी के बाद के पहले तीन दशकों में तो ऐसा लग रहा था कि भारतीय शहर गांवों को एक अधिक बेरहम और कंक्रीट का संस्करण बन कर रह जाएंगे। चूंकि शहर औघोगिक आधुनिकता की दावेदारियों के केंद्र थे, इसलिए गांव से रोजगार या शिक्षा की तलाश में आए निचली और अछूत जातियों के पुत्नों ने यहां की पक्की सड़कें नापते हुए कोशिश की कि उत्पीड़नकारी जातिगत अनुभव से उनका पीछा छूट जाए। इस प्रयास के पहले दौर के नतीजे बहुत तकलीफदेह निकले। बाबूराव बागुल के आम्बेडकरवादी दलित नायक ने जब बंबई की जमीन पर राष्ट्रीय नागरिकता का दावा करते हुए उसकी आड़ में अपनी जाति छिपाने की कोशिश की तो उसे बेभाव की खानी पड़ी। ऐसा लगा कि मनुपुत्नों ने शहरों में भी अपनी चौकियां गांव जैसी मजबूती से ही स्थापित कर रखी हैं। इसी तरह कम से कम अस्सी के दशक की शुरूआत तक शहरी आबादी और बसावट धार्मिक आधार पर विकसित बस्तियों में ही अपनी सामुदायिकता प्राप्त करती रही। चाहे अहमदाबाद का अपेक्षाकृत देशी स्थापत्य हो, या कलकत्ता का औपनिवेशिक विन्यास हो, हर जगह मुसलमानों के घेटो अपने अंधेरों में अलग रहे, और उनकी निगाहों ने हिंदू बस्तियों और मुहल्लों को राष्ट्रीय विकास के ज्यादा बड़े हिस्सों का उपभोग करते देखा। इन दोनों मुख्तलिफ सामाजिक वजूदों एक लगभग तयशुदा बारंबारता के साथ आपस में टकरा कर सांप्रदायिकता की राजनीति को खूब पानी दिया। परिवार की संस्था ने शहरी प्रभावों से बेअसर रहने के लिए एक अनूठा हथकंडा अपनाया। वह सिर्फ दिखावे के लिए छोटी-छोटी न्यूक्लियर इकाइयों में टूटा, और बड़ी चालाकी से संयुक्त परिवार के सरअंजाम ने एक विस्तारित परिवार की शक्ल ले ली। नातेदारियों की कौटुम्बिक व्यवस्था की जकड़ कायम रही।
यह पूरा दौर शहर पर गांव की विकृतियों के बोलबाले का दौर था। इस अफसोसनाक हालात में बदलाव की शुरूआत तब हुई जब नब्बे के दशक में भूमंडलीकरण की आहटें सुनाई दीं और वैश्विक पूंजी के दबाव में ग्रामीण समाज की शहरी अभिव्यक्तियों को भारतीय औघोगिक आधुनिकता के नए चरण का साक्षात्कार करने के लिए मजबूर होना पडा़। औघोगिक विकास में आए जबरदस्त उछाल ने शहरों को पहली बार वास्तव में नए अवसरों का केंद्र बनाया और जीवन-स्थितियों के लिहाज से गांव और शहर के बीच बहुत बड़ा फर्क लगने लगा। औघोगिक विकास को अपना भौगोलिक प्रसार करने के लिए गांवों की जमीनों की जरूरत हुई। कांट्रेक्ट फार्मिंग, लीज़ फार्मिंग से लेकर एसईज़ेड तक तरह-तरह के नए रूपों के तहत औघोगिक प्रबंधन ने हाथ बढ़ा कर गांव को छूना प्रारंभ कर दिया। ग्रामीण समाज का खेती की जमीन से पारंपरिक रिश्ता टूटने लगा।
शहर में आए इस परिवर्तन से जाति, धर्म और परिवार की संरचनाएं अछूती नहीं रह सकती थीं। आम्बेडकर के मूक नायक ने महसूस किया कि अब उसके लिए अपनी जाति छिपाना जरूरी नहीं है, क्योंकि जातिसूचकता के कारण उसे उस तरह के नुकसान नहीं हैं जिनका अंदेशा उसे गांव में या गांव से प्रभावित शहर में दिखाई महसूस होता था। यही वह दौर था जब हिंदी फिल्मों में पहली बार दलित जातिसूचक नामों के नायक की उपस्थिति दर्ज हुई। यह नायक बागुल के नायक की तरह नागरिकता की तलाश में शहर नहीं आया था, बल्कि वह नए बनते हुए शहर में नागरिकता का स्वाभाविक धारक था। यही वह समय था जब अहमदाबाद जैसे शहर के मुसलमान घेटो ने मुद्दतों बाद अपनी चारदीवारियों के पार झांकने की कोशिश की। यही वह समय था जब भारतीय परिवार ने पहली बार सच्चे न्यूक्लियर परिवार की आहटें सुनी, क्योंकि विस्तारित परिवार की परंपरा का वाहक बनी हुई स्त्नी भूमंडलीकृत अर्थव्यवस्था की मांगों को पूरा करने के लिए पहले के मुकाबले कहीं बड़ी मात्ना में बाजार की तरफ निकल गई थी। मोबाइल क्रांति, ऑटोमोबाइल क्रांति और मनोरंजन क्रांति के संचारी पहलुओं ने परिवार के बाहर इतने प्राइवेट स्पेस बना दिए कि रिश्तों की बुनियादी संरचनाओं को भी परिवर्तन के दौर से गुजरने के लिए मजबूर होना पड़ा।
अभी भारत को उसके हिस्से के शहर का एक हिस्सा ही मिला है। अभी शहर का बहुत बड़ा, तकरीबन दो तिहाई हिस्सा उपलब्ध होना बाकी है। आज के शहर में परिवर्तन है तो उसके खिलाफ ब्राह्मणवाद, पितृसत्ता और बहुसंख्यकवादी राजनीति के विकृत रूपों की हिंसक प्रतिक्रिया भी बार-बार अपना सिर उठती है। सामुदायिकता के परंपरागत रूपों को ऐसे समुदाय से प्रतिस्थापित करने का कार्यभार सम्पूर्ण नहीं हुआ है जो आधुनिक और सेकुलर होने के साथ-साथ जेंडर लोकतंत्न की अभिव्यक्तियों से सम्पन्न होंगे। इस सामुदायिकता की उपलब्धि के लिए शहर का संघर्ष अभी जारी है। वह नए चरण में पहुंचने की तैयारी कर रहा है।
लेखक विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) के भारतीय भाषा कार्यक्रम में सम्पादक हैं।
www.rashtriyasahara.com से sabhar

Wednesday, June 11, 2008

विश्लेषण : साम्प्रदायिक हमलों के नए पहलू

अनिल चमड़िया
सत्ता से न्याय के लिए न्यायाधीश होसबेट सुरेश, न्यायाधीश कोलसे पाटिल, गुजरात में हाल तक पुलिस प्रमुख रहे आर। बी. श्रीकुमार, पत्रकार जॉन दयाल एवं तिस्ता सितलवाड़ 13 से 17 मई तक उड़ीसा के कंधमाल में लोगों की आपबीती सुनते रहे जिन्हें दिसंबर के आखिरी हफ्ते में कई दिनों तक लगातार मारा-पीटा गया, लूटा गया। उनके घर-द्वार उजाड़े गए। भारतीय लोकतंत्र के सामने एक बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि क्या देश में अल्पसंख्यकों को सत्ता प्रतिष्ठानों द्वारा न्याय नहीं मिल सकेगा और जिनके खिलाफ उन पर हमले के आरोप हैं क्या उन्हें सजा नहीं मिल सकेगी? पिछले साठ वषा में ऐसे हमलों की फेहरिस्त लगातार लंबी होती जा रही है। पहले चरण में यह देखा गया कि अल्पसंख्यकों के न्याय के लिए लोगों ने सत्ता की न्यायिक व्यवस्था से उम्मीदें बांधे रखीं। प्रशासन पर भरोसा किया। लेकिन जब प्रशासन और न्यायपालिका से उम्मीदें लगातार कम होती चली गई तो अल्पसंख्यकों के खिलाफ हमले की जांच और न्याय के लिए स्वतंत्र समितियां बनने लगी। इधर हाल के दौर में तो लगभग ऐसी हर घटना के बाद स्वतंत्र समितियों की जांच होती है। कारण स्पष्ट है कि ऐसी घटनाओं में प्रशासन की संलिप्तता आम होती जा रही है। न्यायपालिका की भूमिका न्यायिक दायरे से बाहर निकलती प्रतीत होती है।साम्प्रदायिक हमलों के संदर्भ में गुजरात के मुसलमान और उड़ीसा के ईसाइयों में एक जैसी स्थिति है। गुजरात में हिन्दुत्ववादियों ने मुसलमानों के खिलाफ अपनी प्रयोगशाला बनाई तो उडीसा में ईसाइयों के खिलाफ यह प्रयोगशाला बनी हुई है। 22 जनवरी 1999 को ग्राहम स्टुअर्स और उनके बच्चों को जिदा जलाया गया। देश में सर्वाधिक आदिवासी आबादी वाले इस राज्य में ईसाई बने आदिवासियों के साथ जिस नृशंसता से साम्प्रदायिक गुंडे पेश आए हैं वह भी कम दिल दहला देने वाला नहीं है। मंजूक्ता कांदी और ऐसी दर्जनों महिलाएं मिल जाएंगी जिनके जबरन बाल काटे गए और उन्हें ईसाई के बदले हिन्दू धर्म अपनाने के लिए बाध्य किया गया। यह सिलसिला आगे बढ़ता गया। 24 दिसंबर 2007 से लगातार कई दिनों तक कंधमाल में ईसाइयों पर न तो हमलों को रोका गया और न ही अब तक पीडितों को न्याय मिल सका है। यह एक स्थिति बनी हुई है कि अल्पसंख्यकों के खिलाफ हमले की तैयारी की जानकारी सरकार को दी जाती है लेकिन हमले रूक नहीं पाते हैं। हमले इस तरह से होते हैं जैसे लगता है कि उसे सरकारी मशीनरी का समर्थन हासिल है। इसीलिए हमले जल्दी खत्म नहीं होते हैं। कंधमाल में यही हुआ था। आर्श्चजनक है कि इतने महीनों के बाद भी पीडितों के पास उनके लिए जरूरी सामान अब तक नहीं पहुंच पाया है। न्यायाधीश कोलसे पाटिल ने ट्रिब्यूनल की तरफ से बताया कि गिरजा घर, हॉस्टल और अस्पताल जैसे बर्बाद किए गए थे, वे अब भी वैसे ही हैं। सैकड़ों के पास मकान नहीं है। वे कैंपों में रह रहे हैं या फिर अपने रिश्तेदारों के यहां शरण ले रखी है। उनका मानना है कि यदि पन्द्रह दिनों के अंदर यहां कोई सहायता नहीं पहुंची तो मानसून के दौरान कुछ भी पहुंचाना संभव नहीं होगा। कंधमाल में प्रशासन खुद यह मान रहा है कि बाराखामा में ही केवल दो सौ मकान बनाए जाने की जरूरत है। और सबसे पहले उसने छतों के लिए एस्बेस्ट्स की खरीदकारी की प्रक्रिया शुरू की है।प्रशासन और सरकार द्वारा हमलों के बाद पीडितों के पक्ष में मदद का फैसला तो राजनीतिक होता है। लेकिन न्यायालय ने पीडितों को मदद पहुंचाने से ईसाई संगठनों को क्यों रोका? पहले 11 जनवरी 2008 को कंधमाल के कलक्टर ने ईसाई संगठनों को पीडितों की मदद करने से रोका। कलक्टर के इस आदेश के खिलाफ जब कटक स्थित उच्च न्यायालय में गुहार लगायी गई तो वहां से भी कहा गया कि कलक्टर ने ठीक किया है। बाद में यह मामला दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उस पर घटना के लगभग तीन महीने के बाद सुनवाई हो सकी और कलक्टर के आदेश को उचित नहीं माना गया। ईसाइयों के संगठनों को ईसाइयों के बीच ही मदद से नहीं रोका गया बल्कि जब उड़ीसा में चक्रवात आया था तब भी ईसाई संगठनों को मदद करने से रोका गया। कहा गया कि वे सहायता की आड़ में धर्म परिवर्तन कराते हैं। लेकिन ये बात हिन्दुत्ववादी संगठनों पर लागू नहीं होती है। एक पहलू न्यायाधीश कोलसे बताते हैं। उडीसा में ये जो समस्या है वह केवल धर्म से नहीं जुड़ी है। यह र्आिथक क्रियाकलापों से ज्यादा जुड़ी है। जो समुदाय संसाधनों और सम्पदा के मामले में अमीर हंै उसका तरह-तरह से दोहन किया जाता है। हर छह महीने और साल भर में दंगे या हमले की वजह यहां आदिवासियों के पास अपार प्राकृतिक संपदा का होना है। दूसरे पहलू को तिस्ता बताती हैं। इस ट्रिब्यूनल के सामने कई महिलाएं पेश हुई। उनके अनुसार उडीसा में 1970 से पहले वे पूरी तरह से आजाद थी। अपनी परंपराएं थी। अपनी संस्कृति थी और उसमें भरपूर आजादी का अहसास था। लेकिन र्धािमक, राजनीतिक और उघोग धंधों में लगी ताकतों ने उनकी खुशियों को धीरे-धीरे खत्म कर दिया। तीसरा पहलू यह है कि इस इलाके में मिलजुल कर रहने और शांति बनाए रखने की क्षमता है। 1994 में विभिा आदिवासी जातियों की महिलाओं के नेतृत्व में ये देखा भी गया। लेकिन सरकार और उसकी मशीनरी अब इसमें जरा भी ध्यान देने को तैयार नहीं। हिन्दुत्ववादियों की संस्कृति को बढ़ने का पूरा मौका दिया जाता है। अब सवाल है कि हमलों के खिलाफ न्याय पाने के लिए अल्पसंख्यक क्या करें? राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग जैसी संस्थाओं को हाशिये पर लाकर खड़ा कर दिया गया है। उड़ीसा में हुए हमले की रिपोर्ट तैयार की गई लेकिन राज्य और केन्द्र में बंटी सरकारों ने कुछ नहीं किया। अपने समाज में कई स्तरों पर अंर्तिवरोधी और विरोधाभासी स्थिति देखी जाती है। जैसे धर्म निरपेक्षता की राजनीति करने वाले हिन्दुत्व की दो छाया तैयार कर लेते हैं। एक को कर बता देते हंै और दूसरे को नरम। लेकिन जब सवर्णवाद पर बात होती है तो उसमें नरम और कर दो छाया नहीं दिखती हंै। इसी तरह वामपंथियों और समाजवादियों से पूछें कि उनकी सक्रियता वाले राज्यों में जातिवाद की क्या भूमिका है तो वे अपने राज्यों को बिल्कुल भिा बताते हैं। प. बंगाल के बारे में वामपंथी कहते हंै तो उड़ीसा के बारे में रवि राय जैसे समाजवादी भी यही कहते रहे हैं। लेकिन सच यह है कि वहां जातिवाद पर जब चोट की जाती है तो साम्प्रदायिकता का घाव निकल आता है।
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Tuesday, June 10, 2008

पश्चिमी देशों ने बोये विनाश के बीज

अवधेश कुमार
पर्यावरण अब गोष्ठियों , सेमिनारों से बाहर निकलकर अगर व्यावहारिक चिंता का विषय बना है तो यह स्वाभाविक है। वास्तव में अब दुनिया के सामने पूरी पृथ्वी के साथ इससे जुड़े वायुमंडल को बचाने की चुनौती खड़ी है। लेकिन हमारा दुर्भाग्य यह है कि खतरे को समझने एवं उसके समाधान की ईमानदार चिंता के बावजूद मूल कारणों को समझने की कोशिश ही नहीं हो रही है। जब मूल कारणों की ही अनदेखी होगी तो फिर वास्तविक समाधान हो ही नहीं सकता। धरती के बढ़ते बुखार को दूर करने के लिए जितने आयोजन हुए हैं उनमें धीरे–धीरे शिरकत करने वाले देशों की संख्या बढ़ रही है और वातावरण में परिलक्षित हो रहे भयानक परिवर्तनों के लक्षण के प्रति सामूहिक भय एवं इससे बचने की सर्वसम्मत इच्छा भी अभिव्यक्त हुई है। कुछ समय पहले तक यह स्थिति नहीं थी। पिछले वर्ष दिसंबर में इंडोनेशिया की राजधानी बाली में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के पूर्व अनेक प्रकार की आशंकाएं व्यक्त की गईं थीं। किंतु 190 देशों के प्रतिनिधियों द्वारा करीब दो सप्ताह तक तपती धरती पर विचार करके सर्वसम्मत निष्कर्ष तक पहुंचना ही दुनिया के लिए महत्वपूर्ण परिघटना है। सबसे बड़ी बात अमेरिका का बाली कार्ययोजना पर राजी होना था। जो अमेरिका पहले नाक पर मक्खी नहीं बैठने दे रहा था वह 190 देशों की कतार में खड़ा हो गया यह साधारण परिवर्तन नहीं है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि पर्यावरण के उग्र स्वरूप के विनाशकारी प्रभावों को सभी ने समझा है एवं इसे दूर करने या कम करने के प्रति आम सहमति जैसी बन चुकी है।लेकिन क्या इससे दुनिया के मंडराते भयावह पर्यावरण संकट के खतरे से मुक्त होने की संभावना भी बन रही है? धरती के बढ़ते बुखार के लिए कार्बन सहित अन्य हानिकारक गैसों के उत्सर्जन को मुख्य खलनायक माना गया है। अभी तक न इसके स्तर को निश्चित सीमा तक कम करने के प्रति सहमति बनी है और न इसके लिए समय सीमा ही निर्धारित हुई है। 2009 के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की आ॓र सबकी नजर लगी हुई है। किंतु वहां से किसी प्रकार की चमत्कार की उम्मीद बेमानी है। इंटरनेशनल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज के वैज्ञानिक विश्लेषणों में भविष्य की जैसी भयानक तस्वीर प्रस्तुत की गई है उसके बाद किसी भी देश द्वारा वातावरण में आ रहे खतरनाक परिवर्तनों को अस्वीकार करने का कोई कारण नहीं है, पर मूल बात इससे अलग है। आखिर ये विषैले गैस उत्सर्जित क्यों हो रहे हैं? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इनके लिए जिम्मेवार वही बातें हैं जिन्हें हम विकास का मानक बना चुके हैं। विकास के इन मानकों को दोषी मानने को कोई तैयार नहीं है। जब विकास के लिए चारों आ॓र उद्योग लगेंगे तो उनसे धुंआ, अवशिष्ट ,कचरा आदि तो बाहर आएगा ही। जब नदियों पर बड़े–बड़े बांध बनेंगे, जब चमचमाती चौड़ी पक्की सड़कों के जाल बिछेंगे, जब हवाई अड्डों का संजाल खड़ा होगा, जब रेलवे का विस्तार होता रहेगा, जब अत्यधिक फसल के लिए रासायनिक खादों का प्रयोग होगा तब तक कोई पर्यावरण को समस्त जीव मंडल के बिल्कुल अनुकूल बनाने की सोच भी नहीं सकता। भारत एवं चीन में बढ़ता ऊर्जा खपत एवं कार्बन उत्सर्जन दुनिया भर के लिए मुद्दा बना हुआ है लेकिन इन दोनों का तर्क है कि पश्चिमी देशों ने लंबे समय से आर्थिक विकास के नाम पर उत्सर्जन किया है, इसलिए वे ज्यादा कटौती करें एवं उन्हें समय दिया जाए। भारत एवं चीन की जगह दूसरा विकासशील देश होता तो उसका तर्क भी यही होता एवं दुनिया के लिए उसे बिल्कुल अस्वीकार करने का कोई कारण नहीं हो सकता है। आखिर विकास का हक सबको है। आपने विकास कर लिया और दूसरे को नसीहत दीजिए कि पर्यावरण के लिए आप विकास की गति पर विराम लगा दो तो कैान इसे स्वीकार करेगा! बाली कार्ययोजना में कहा गया है कि आर्थिक एवं सामाजिक विकास तथा गरीबी में कमी विश्व की प्राथमिकतायें हैं। लेकिन वहां गठित कार्यसमूह इसके लिए विकास का कोई नया ढांचा लाएंगे जिसमें वातवारण बिल्कुल प्रकृति के हवाले रहेगा एवं मनुष्य के द्वारा उसके साथ छेड़छाड़ नहीं होगी ऐसी आशा नहीं की जा सकती है। 1992 के वायुमंडल परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्रसंघ ढ़ांचे (युनाइटेड नेशन फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज) में ग्रीनहाउस गैसों को स्थिरांक पर लाने का निर्णय हुआ था।कहा गया था कि इससे वायुमंडल प्रणाली में मनुष्य के अन्यायपूर्ण हस्तक्षेप का अंत होगा। आज तक यह लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सका। दुनिया के लिए विकास एवं संपन्नता का मानक निर्धारित करने वाले पश्चिमी देश यह स्वीकार ही नहीं कर रहे कि वर्तमान आर्थिक विकास एवं वातावरण को प्रकृति निर्धारित अवस्था में लाने का लक्ष्य एक साथ पाया ही नहीं जा सकता है। कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि विकास एवं सुविधाओं की वर्तमान तकनीकों की जगह नई तकनीकों एवं सामग्रियां लाने से यह हो सकता है। यह नितांत ही अनैतिक एवं अव्यावहारिक दलील है। पृथ्वी एवं इससे जुड़े पूरे वायुमंडल को बचाने के लिए प्रमुख चुनौती तेल, प्राकृतिक गैस एवं कोयले से निकलने वाले कार्बन डाईऑक्साइड का अंत करना है। वर्तमान विकास प्रणाली इन ईंधनों पर ही टिकी है। आज विश्व की कुल वाणिज्यिक ऊर्जा खपत में इनका अंशदान 80 प्रतिशत है। इनकी बजाए वैकल्पिक ऊर्जा प्रयोग करने की बात हम सालों से सुन रहे हैं। बिजली पैदा करने या बिजली प्रतिष्ठानों में ताप पैदा करने में, मोटरगाड़ी एवं उघोगों में इस ऊर्जा का 75 प्रतिशत खपत हो जाता है। दूसरी तकनीकों का प्रयोग करके या कम ईंधन पर चलने वाली मोटरगाड़ियों का निर्माण करके हम कार्बन उत्सर्जन में थोड़ी बहुत कमी ला सकते हेंैं सम्पूर्ण पर्यावरण को बचा नहीं सकते।वास्तव में संकट की जड़ तो पश्चिमी देशों द्वारा निर्धारित विकास मानकों एवं उन पर आधारित जीवन प्रणाली मे निहित है। मनुष्य के संदर्भ में पश्चिम की पूरी विचारधारा उसके शरीर सुख के इर्द–गिर्द ही घूमती है। इसी से औघोगिक क्रांति की उत्पत्ति हुई और उसके बाद पूंजीवाद एवं बाजार पैदा हुआ। इसने जीवन शैली के रूप में अत्यधिक भोग साधन एकत्रित करने और उसका प्रयोग करने का सूत्र दिया। पूरी विकास प्रक्रिया इसी दुष्चक्र का शिकार है। अगर पृथ्वी एवं पूरे पर्यावरण को बचाना है तो फिर इस जीवन शैली को अस्वीकार करना होगा। उसकी जगह मनुष्य के तौर पर जो लक्ष्य भारतीय सभ्यता ने लंबी चिंतन प्रक्रिया के बाद निर्धारित किए उनको पुनर्स्थापित करना होगा। दुर्भाग्य यह है कि जीवन को शरीर तक सीमित न मानने वाली भारतीय सभ्यता के मानक इसकी चकाचौंध में हाशिए पर चले गए हैं। भारतीय सभ्यता ने शरीर को नश्वर मानकर केवल उसके सुख को त्याज्य करार दिया है। इसमें मनुष्य के लिए ऐसी जीवन प्रणाली अपनाने की स्थापित परंपरा थी जिसमें उसका प्रकृति के साथ पूर्ण साहचर्य कायम रहे। प्रकृति के तांडव से लटकते विनाश खतरे के अंत का सूत्र तो इस जीवन प्रणाली में निहित है किंतु जब भारत के नीति निर्माता ही अपनी महान सभ्यता से आत्मग्लानिबोध से ग्रस्त इन विनाशकारी पश्चिमी मानकों को स्वीकार कर पूरा विकास ढ़ांचा उसी दिशा में सशक्त करने की कोशिश कर रहे हैं तो फिर इसकी आ॓र किसी का ध्यान जाएगा तो कैसे?


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खाद्य असुरक्षा का आयात

देविंदर शर्मा

बढ़ती महंगाई पर अंकुश लगाने के लिए भारत सरकार ने खाद्य तेलों और चावल के आयात शुल्क में भारी कटौती कर दी है. चावल पर आयात शुल्क पूरी तरह खत्म कर दिया गया है, जबकि क्रूड पाम आयल का आयात शुल्क 45 फीसदी से घटाकर 20 प्रतिशत कर दिया गया है. क्रूड पाम आयल में क्रूड पामोलीन भी शामिल है.

पिछले दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने कहा कि हम कृषि के क्षेत्र में बड़ी रियायतें देना चाहते हैं, किंतु दूसरे राष्ट्रों को भी अपने बाजार खोलने होंगे. दरअसल बुश का यह बयान इस परिप्रेक्ष्य में सामने आया कि अमेरिका और यूरोप पर कृषि अनुदान में बड़ी कटौती का दबाव पड़ रहा था. इसके बदले में वे चाहते हैं कि भारत और ब्राजील जैसे देश अपने बाजार खोलें. इस दिशा में भारत ने पहला कदम बढ़ा दिया है. भारत सरकार ने शुल्कों में कमी कर दी है और ऐसा करके राष्ट्रपति बुश को सकारात्मक संकेत दे दिया गया है. अपना वचन पूरा करने की बारी अब बुश की है.
आप अब भी सोच रहे होंगे कि विश्व व्यापार संघ की दोहा वार्ता सात वर्ष बीत जाने के बाद भी जहां कीतहां क्यों खड़ी है? इस संबंध में हाल-फिलहाल किसी प्रगति की उम्मीद भी नजर नहीं आ रही है। यहां यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि दोहा वार्ता इसलिए जहां की तहां पड़ी है, क्योंकि हम समझौता वार्ता का पालन सावधानी के साथ नहीं कर रहे हैं. मध्य मार्च में ब्राजील के मुख्य वार्ताकार राबर्ट एजेवेडो ने कहा कि दोहा वार्ता समझौते के जितने करीब है वैसी स्थिति पहले कभी नहीं रही.

भारत ने आयात शुल्क में जो कटौती की है वह काफी ज्यादा है. क्रूड पाम तेल के अलावा सरकार ने रिफाइंड पाम तेल की आयात दरों में भी कटौती कर दी है. यह 52.5 प्रतिशत से घटकर 27.5 पर आ गई है. सरसों के कच्चे तेल पर आयात शुल्क 75 फीसदी के बजाय 20 फीसदी और सरसों के रिफाइंड तेल पर 75 के स्थान पर 27.5 फीसदी कर दिया है. दूसरे शब्दों में कहें तो खाद्य तेलों पर सीमाबद्ध आयात शुल्क 300 प्रतिशत से घटकर प्रभावी रूप में 20 प्रतिशत हो गया है. अब विश्व व्यापार संगठन आयात शुल्क बढ़ाने के भारत के अधिकार को छीन लेगा, जिसका मतलब यह हुआ कि भविष्य में भारत को आयात शुल्क की दरों को 20 फीसदी तक ही रखना होगा.

विश्व व्यापार संगठन से जारी वार्ता के अनुसार बाधित शुल्क और लागू शुल्क के बीच का अंतर घटाने के प्रयास चल रहे हैं. यद्यपि भारत के पास खाद्य तेलों पर आयात शुल्क 300 प्रतिशत तक करने का अधिकार है, किंतु विश्व व्यापार संगठन इन्हें फिर से वर्तमान दरों पर स्थिर करना चाहता है. इसका मतलब यह कि आयात शुल्क की दरों को 20 फीसदी के स्तर से ऊपर नहीं उठाया जा सकता.
चावल पर आयात शुल्क समाप्त करने और खाद्य तेलों पर शुल्क में कमी लाने का फैसला ऐसे समय आया है जब गेहूं और दालों के आयात पर पहले ही शुल्क समाप्त किया गया है. इन चार प्रमुख जींसों, जिनमें तीन सबसे महत्वपूर्ण जींस शामिल हैं, को अंतरराष्ट्रीय व्यापार के सागर में डूबने के लिए छोड़ दिया गया है. किसी भी सूरत में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में चावल और गेहूं के दाम आसमान छू रहे हों तो आयात शुल्क को शून्य करने का कोई तुक नहीं है.

यह हैरत की बात है कि चावल, गेहूं और दालों से आयात शुल्क समाप्त करने और खाद्य तेलों पर इसमें भारी छूट देने का फैसला उस समय आया है जब 8 हजार करोड़ रुपये की लागत से राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अभियान शुरू किया गया है. इसका उद्देश्य इन चार जींसों की उत्पादकता बढ़ाना है. 11वीं योजना के अंत तक चावल का उत्पादन एक करोड़ टन, गेहूं का 80 लाख टन और दालों का 20 लाख टन बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है. मैं यह नहीं समझ पा रहा हूं कि जब आयात के लिए दरवाजे खोल दिए गए हों तो अगले पांच साल में इतनी उत्पादकता बढ़ाना कैसे संभव है? आयात बढ़ाने का निर्णय निश्चित तौर पर उत्पादकता विरोधी कदम है.

यह विचित्र है कि चावल, गेहूं, दालों और खाद्य तेलों का उत्पादन बढ़ाने के लिए समयबद्ध खाद्य सुरक्षा मिशन और सस्ते आयात के लिए आयात शुल्क में कटौती साथ-साथ कैसे चल सकते हैं? जहां तक खाद्य तेलों का संबंध है 1993-94 में इनके उत्पादन में भारत करीब-करीब आत्मनिर्भर था. इसके बाद जैसे-जैसे सरकार ने आयात शुल्क में कटौती करनी शुरू की, खाद्य तेलों का आयात कई गुना बढ़ गया और देखते ही देखते भारत खाद्य तेलों का सबसे बड़ा आयातक बन गया. सस्ते आयात के कारण भारत तिलहन की फसल बढ़ा पाने में नाकामयाब रहा. जो छोटे किसान बरसाती पानी से सिंचित जमीन पर तिलहन की फसल बो रहे थे, सस्ते आयात के कारण उन्होंने यह फसल बोनी बंद कर दी. सस्ते आयात से जीवीकोपार्जन का खतरा उत्पन्न हो जाता है. खाद्य तेलों का उदाहरण सामने है. 1997-98 में दस लाख टन खाद्य तेलों के आयात की तुलना में अब इनका आयात 59.8 लाख टन पर पहुंच गया है. इस प्रकार भारत दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य तेल आयातक देश बन गया है.

अगर हम इस रुझान को उलटना चाहते हैं तो सस्ते आयात को बंद करने और फिर तिलहन के किसानों के लिए उचित वातावरण तैयार करने के अलावा कोई अन्य विकल्प मौजूद नहीं है. देश के नीति-नियंता यदि इसे समझने से इनकार करेगे तो तिलहन का उत्पादन इसी प्रकार घटता रहेगा. आगामी वर्षो में खाद्य तेलों पर बचा हुआ आयात शुल्क भी समाप्त कर दिया जाएगा. आसियान देशों को भारत पहले ही वचन दे चुका है कि मुक्त व्यापार समझौते के तहत वह खाद्य तेलों पर आयात शुल्क समाप्त कर देगा. खाद्य सुरक्षा के लिए अति आवश्यक समझे जाने वाले गेहूं, चावल और दालों के लिए भारत पहले ही आयात शुल्क शून्य कर चुका है. इसका मतलब है कि मुक्त व्यापार के लिए चार सर्वाधिक महत्वपूर्ण फसलों का बलिदान कर दिया गया है. आखिर हम किस दिशा की ओर बढ़ रहे हैं? इन स्थितियों में क्या हम खाद्य सुरक्षा का सपना देख सकते हैं? सभी इस तथ्य से परिचित हैं कि सस्ता आयात खाद्य सुरक्षा पर बड़ा नकारात्मक प्रभाव डालता है. ऐसे समय जब राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन की स्थापना की गई है, आयात शुल्क समाप्त करने से उत्पादन बढ़ने के बजाय घट जाएगा. इस नीति के पीछे कोई समझदारी दिखाई नहीं देती. अगर हम घरेलू उत्पादन नहीं बढ़ाते तो बढ़ती मुद्रास्फीति के लिए खाद्य पदार्र्थो की आपूर्ति में बाधा खड़ी होने की बात करना बेइमानी है.

तात्पर्य यह है कि हम महंगाई के लिए यह दलील नहीं दे सकते कि मांग के अनुरूप खाद्य पदार्थों का उत्पादन नहीं हो पा रहा. भारत अगर खाद्य पदार्र्थो में आत्मनिर्भरता हासिल करना चाहता है तो उसे इन चार सर्वाधिक महत्वपूर्ण खाद्य पदार्र्थो पर फिर से पुरानी दर से आयात शुल्क लगाना होगा. यदि ऐसा नहीं किया जाता तो फिर यह कहने में कोई बुराई नहीं कि सरकार खाद्य असुरक्षा का आयात करने की इच्छुक है.
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धर्म परिवर्तनः एक राजनैतिक हथियार


राम पुनियानी

इन दिनों ईसाई मिश्नरियों द्वारा कराए जा रहे तथाकथित धर्मपरिवर्तनों की चर्चा देशभर के मीडिया में हो रही है. ऐसा कहा जा रहा है कि आदिवासियों द्वारा एक ''विदेशी धर्म'' को अपनाए जाने से हिंदू राष्ट्र को खतरा है. इस आधारहीन आशंका की सामाजिक स्वीकार्यता में भारी वृध्दि हुई है. महाराष्ट्र के अलीबाग में मार्च महीने में ननों पर हमला और गत 27 अप्रैल को मुबई में बडे पैमाने पर हुआ शुध्दि यज्ञ भी धर्मपरिवर्तन की राजनीति का हिस्सा है. शुध्दि यज्ञ में बड़ी संख्या में ईसाई आदिवासियों को हिंदू बनाया गया.

ननो पर हमले और शुध्दि यज्ञ के पीछे एक ही व्यक्ति था. ननों पर हमले के लिए रामानंदाचार्य पीठ के सद्गुरू नरेन्द्र महाराज के शिष्य जिम्मेदार थे और शुध्दि यज्ञ का नेतृत्व स्वयं नरेन्द्र महाराज ने किया. इस अवसर पर बोलते हुए नरेन्द्र महाराज ने कहा कि ईसाई मिश्नरियों की गतिविधियों के कारण हिंदू अपने ही देश में अल्पसंख्यक बनने की ओर बढ़ रहे हैं. उन्होंने केन्द्र सरकार की इस बात के लिए कड़ी आलोचना की कि उसने धर्मपरिवर्तन पर रोक लगाने वाला कानून अब तक नहीं बनाया है और महाराष्ट्र सरकार के अंधविश्वास- विरोधी कानून की निंदा की. उनके अनुसार ये दोनों ही कदम हिंदू विरोधी हैं.
नरेन्द्र महाराज का यह दावा कि हिंदू इस देश में अल्पसंख्यक बनते जा रहे हैं, हास्यास्पद और तथ्यहीन है. सच यह है कि भारत की कुल जनसंख्या में हिंदुओं का प्रतिशत लगभग स्थिर बना हुआ है. कई राज्यों में जो धर्मपरिवर्तन-विरोधी विधेयक पास किए गए हैं, वे हमारे संविधान की अनेक धाराओं के खिलाफ हैं. हमारा संविधान तार्किक सोच को प्रोत्साहन देने की बात करता है और इस सिलसिले में महाराष्ट्र सरकार द्वारा पारित अंधविश्वास-विरोधी विधेयक एक प्रशंसनीय कदम है.

इस विधेयक का विरोध करने वाले शायद यह चाहते हैं कि समाज में अंधविश्वास बने रहें और उनका सामाजिक और राजनैतिक वर्चस्व कायम रहे. गुरूजी ने यह बात स्पष्ट शब्दों में कही. इन्हीं गुरूजी के समर्थक हिंसा करने से नहीं चूकते. अलीबाग में ननों पर हमला उस दौरान किया गया जब एड्स पर एक लेक्चर सुनने के लिए लोग इकट्ठा थे.
आदिवासी इलाकों में ईसाईयों पर हमले की घटनाओं में वृध्दि का कारण समझना मुश्किल नहीं है. पिछले साल क्रिसमस के आसपास उड़ीसा के कंधारमल और फूलबनी जिलों में व्यापक हिंसा हुई थी. गुजरात के डांग, मध्यप्रदेश के झाबुआ और उड़ीसा के अनेक जिलों सहित आदिवासी इलाकों में हिंसा का एक अंतहीन सिलसिला चल रहा है. ये वे इलाके हैं जहां आदिवासियों के ''हिंदूकरण'' का अभियान भी चलाया जा रहे हैं. यहां यह स्पष्ट कर देना उपयोगी होगा कि आदिवासी मूलत: प्रकृति-पूजक हैं. वे न तो ईसाई हैं और न ही हिंदू.

कुछ आदिवासी समय-समय पर ईसाई धर्म को अपनाते रहे हैं परंतु यह कोई नई बात नहीं है. आदिवासियों का ईसाई धर्म से परिचय सदियो पुराना है. पिछले कुछ दशकों में भारत की ईसाई आबादी में हल्की गिरावट दर्ज की गई है. सन् 1971 में ईसाईयों का आबादी में प्रतिशत 2.60 था जो 1981 में घटकर 2.44 प्रतिशत और 1991 में 2.34 प्रतिशत रह गया. सन् 2001 की जनगणना के अनुसार भारत में ईसाई, आबादी का 2.30 प्रतिशत हैं. यह भी सच है कि कुछ ईशाई मिश्नरियां धर्मपरिवर्तन कराने में विश्वास करती हैं और उन्होंने आदिवासियों का धर्मपरिवर्तन कराया भी है.
आदिवासी इलाकों में आर.एस.एस. की घुसपैठ लगभग दो दशक पहले शुरू हुई जब वनवासी कल्याण आश्रम ने इन इलाकों में अपनी गतिविधियां चलाना शुरू कीं. इन इलाकों में ईसाईयों और ईसाई धर्म के खिलाफ जहरीला प्रचार किया गया जिससे हिंसा भड़की. चूंकि ये घटनाएं दूरदराज के इलाकों में होती हैं इसलिए अपराधी अक्सर बच निकलते हैं. सांप्रदायिक हो चुका शासकीय तंत्र भी इस मामलें में कुछ खास नहीं करता. आदिवासी इलाके में आर.एस.एस. से सीधे या अपरोक्ष रूप से जुडे धर्मगुरू अपने आश्रम स्थापित कर रहे है और अपनी गतिविधियां बढ़ा रहे हैं. डांग क्षेत्र में असीमानंद, उडीसा में लखानंद, झाबुआ में आसाराम बापू और महाराष्ट्र में नरेन्द्र महाराज इनमें प्रमुख हैं.
ईसाई मिशनरियों को आतंकित करने के अलावा आदिवासियों को सांस्कृतिक रूप से हिंदू बनाने की कोशिशें भी जारी हैं. इसके लिए हिंदू संगम और शबरी कुंभ आयोजित किए जाते हैं. दिलीप सिंह जूदेव मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में लंबे समय से आदिवासियों को हिंदू बनाने के अभियान में लगे हुए हैं. इस अभियान को घरवापसी और शुध्दिकरण कहा जाता है. स्पष्ट है कि आदिवासियों को हिंदू मानकर चला जा रहा है. यह इस तथ्य के बावजूद की आदिवासी प्रकृति-पूजक हैं और हिंदू धर्म, इस्लाम या ईसाई धर्म से उनका कोई वास्ता नहीं है.
आदिवासी इस देश के सबसे वंचित समूहों में से एक हैं और उनका लंबे समय से राजनैतिक रोटियां सेंकने के लिए शोषण किया जाता रहा है. सन् 1920 के दशक की शुरूआत में ''तन्जीम'' (मुस्लिम सांप्रदायिक) अभियान के प्रतिउत्तर में ''शुध्दि'' (हिंदू सांप्रदायिक) अभियान चलाया गया था. अब शुध्दि अभियान एक बार फिर लौट आया है. इस अभियान को घरवापसी का नाम देने के पीछे की मंशा स्पष्ट है. जहां ईसाई मिश्नरियों को धर्मपरिवर्तन के लिए कटघरे में खड़ा किया जा रहा है, वहीं संघ परिवार की संस्थाओं द्वारा कराए जा रहे धर्मपरिवर्तन को घरवापसी का नाम दे दिया गया है. प्रचार यह किया जाता है कि आदिवासी वे हिन्दू हैं जो मुस्लिम राजाओं द्वारा जबरदस्ती मुसलमान बनाए जाने के डर से जंगलों में भाग गए थे. कई सदियों तक जंगलों में रहने के कारण उनका हिंदू सामाजिक मुख्यधारा से संपर्क कट गया.

इस मिथक को फैलाए जाने के दो फायदे हैं. पहला तो यह कि इससे इस गलतफहमी को बढ़ावा मिलता है कि इस्लाम को तलवार की नोंक पर फैलाया गया था. दूसरे, इससे आदिवासियों का यह दावा गलत सिध्द होता है कि वे इस देश के मूल निवासी हैं. इस प्रकार भारत के हिंदू राष्ट्र होने की परिकल्पना को मजबूती मिलती है क्योंकि उसके मूल रहवासी भी हिंदू हैं.
सांप्रदायिक ताकतें यह अच्छी तरह से जानती हैं कि भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए चुनावों में सफलता जरूरी है. इसके लिए आदिवासियों का हिंदूकरण करना फायदेमंद है. आदिवासी देश की आबादी का लगभग 8 प्रतिशत हैं और अगर दक्षिणपंथी राजनैतिक दलों को उनका समर्थन मिल जाता है तो इन दलों के जनाधार में भारी वृध्दि होगी. दूसरा फायदा यह है कि आदिवासियों का हिंदूकरण करने के बाद उनका उपयोग हिंदू राष्ट्र के अन्य शत्रुओं, जैसे मुसलमानों के खिलाफ भी किया जा सकता है. गुजरात में हमने देखा था कि किस तरह आदिवासियों का उपयोग हिंदू राष्ट्र के सैनिकों की तरह किया गया था.
चाहे वह रामकृष्ण मिशन हो या ईसाई मिशनरियां- शांतिपूर्वक आदिवासी क्षेत्रों में इनके काम करने से किसी को कोई परेशानी नहीं है. परंतु धर्म के नाम पर अंधविश्वास और दूसरे धर्मो के प्रति घृणा फैलाना निश्चित रूप से राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए बड़ा खतरा है.

http://www.raviwar.com/ से साभार

Monday, March 31, 2008

सोया, साम्राज्यवाद और पर्यावरण : संस्कृति तथा स्वास्थ्य का खतरनाक खेल


वंदना शिवा
मनुष्यत्व के विकास से लेकर अब तक खाद्यान्न प्रजाति के 80000 से अधिक पौधों का स्वाद हमने चखा है. इनमें से तीन हज़ार से ज्यादा मनुष्य के लगातार इस्तेमाल में आ रहे हैं. बहरहाल, अब हम विश्व की खाद्य जरुरतों को पूरा करने के लिए सिर्फ आठ फसलों पर निर्भर हैं जो कि इस जरुरत का 75 प्रतिशत पूरा करती हैं. लेकिन अब अनुवांशिक अभियांत्रिकी ने उत्पादन को तीन फसलों – सोया, मक्का और राई के बीच समेट दिया है.मोनोकल्चर हमारी जैव विविधता, हमारे स्वास्थ्य और खाद्यान्न की गुणवत्ता और बहुविविधता को नष्ट कर रहे हैं. मोनोकल्चर को औद्योगिक निर्वासन और कृषि के वैश्वीकरण के जरूरी घटक के जैसा देखा जाता रहा है. उन्हें ज्यादा खाद्यान्न पैदा करने वाला समझा जाता है. हालांकि वे सिर्फ मोनसांटो, कारगिल और ए.डी.एम के लिए ज्यादा प्रभुत्व और मुनाफा कमाने वाले साबित हो रहे हैं. वे जैव विविधता, स्थानीय खाद्यान्न प्रणाली और खाद्यान्न संस्कृति को खत्म करके फर्जी आधिक्य और असल अभाव पैदा कर रहे हैं. सरसों, नारियल, मूंगफली, तिल, अलसी आदि से बनाए जाने वाले भारतीय देसी खाद्य तेल जिनका प्रसंस्करण विशिष्ट मिलों में किया जाता था, उन्हें “खाद्यान्न सुरक्षा” के बहाने प्रतिबंधित कर दिया गया.इसके साथ ही साथ सोया तेल पर लगे हुए आयात प्रतिबंध को हटा लिया गया. इसने एक करोड़ किसानों की आजीविका पर संकट पैदा कर दिया. गाँवों में दस लाख तेल मिलें बंद हो गईं. भारतीय बाजारों को सोया सो पाट दिए जाने के कारण स्थानीय खाद्यान्न तेल के दामों में गिरावट आ रही थी. इसके विरोध प्रदर्शन के दौरान बीस से ज्यादा किसानों की जाने गईं. कई लाख टन कृत्रिम रुप से सस्ता जीएमओ सोया तेल भारतीय बाजार में उतार दिया गया.जंगलों का विनाशसोया को इस तरह बाजार में डंप करने के विरोध और सरसों तेल की वापसी के लिए दिल्ली की झोपड़ पट्टियों में रहने वाली महिलाओं ने एक आंदोलन शुरु किया और “सरसों बचाओ, सोयाबीन भगाओ” के नारे के साथ दिल्ली की सड़कों पर निकल आई. इस “सरसों सत्याग्रह” से हमें सरसों को वापस लाने में सफलता मिली. कुछ दिनों पहले अमेज़न में थी. जहां कारगिल और एडीएम, वो ही कंपनियां जो भारत में सोया का डंप कर रहीं थी; सोया का उत्पादन करने के लिए अमेज़न को बरबाद करने में तुली हुई थी. निर्यात योग्य सोया उगाने के लिए लाखों एकड़ में फैला बारामासी अमेज़न जंगल, जो कि वैश्विक जलवायु का जिगर, फेफड़ा और दिल है; जलाया जा रहा है. कारगिल ने तो पारा में, सांतारेन नामक जगह में एक अवैध बंदरगाह बना रखा है जिससे वह बारामासी अमेज़न जंगल में सोया का विस्तार कर रहा है. हथियारबंद गिरोह जंगल में कब्जा कर लेते हैं और गुलामों से सोया की खेती कराते हैं. और जब सिस्टर डोरोथी स्टैंग जैसे लोग जंगलों के विनाश का विरोध करते हैं तो उनकी हत्या करा दी जाती है. ब्राज़ील और भारत में लोगों को डरा-धमका कर कृषि व्यवसाय को फायदा पहुँचाने वाले मोनोकल्चर को बढ़ावा दिया जा रहा है. यूरोप और अमेरिकी लोग अप्रत्यक्ष रुप से खतरे में हैं, क्योंकि वहां 80 % सोया पशुचारे के रुप में उपयोग किया जा रहा है, जिससे सस्ता गोश्त उपलब्ध हो सके.सस्ता प्रोटीन जो कि फैक्ट्री-फार्मों में पाले जाने वाले पशुओं का चारे जैसा इस्तेमाल होता है, बारामासी अमेज़न जंगल और संपन्न देशों के लोगों के स्वास्थ्य, दोनों को नुकसान पहुँचा रहा है. एक अरब लोगों के पास खाद्यान्न इसलिए नहीं हैं क्योंकि मोनोकल्चर ने उनकी कृषि और अन्य खाद्यन्न आधारित रोज़गार छीन लिया है. खतरे और भी हैंलगभग 1.7 अरब अन्य लोग मोटापे और अन्य खाद्य से जुड़े रोगों से प्रभावित हैं. मोनोकल्चर जरुरत से अधिक भोजन करने वाले और जरुरत से कम भोजन करने वाले, दोनो प्रकार के लोगों के लिए कुपोषण का कारण बनता जा रहा है.सहकारी संस्थाएं हमें जी.एम.ओ जैसे अपरीक्षित खाद्य पदार्थ खाने पर मजबूर कर रहे हैं. सोया, जो कि आज हमारे पूरे प्रसंस्कृत खाद्य प्रदार्थों में मौजूद है, किसी भी संस्कृति में आज से 50 साल पहले तक नहीं खाया जाता था. इसमें उच्च मात्रा में “इसोफ्लावोन” और “फोटो-ऑस्ट्रीजंस” होते हैं जो मनुष्यों में हार्मोन असंतुलन पैदा करते हैं. चीन और जापानी संस्कृति में पारंपरिक रुप से मौजूद खमीर उठाने की विधि से इसोफ्लावोन के स्तर में गिरावट आती है. खाद्यान्न में सोया को बढावा देना एक बहुत बड़ा प्रयोग है, जो कि 1998 से 2004 के बीच अमेरीकी सरकार द्वारा 13 अरब डालर के, और अमेरिकी सोया उद्योग के 8 करोड़ डालर सालाना के अनुदान के साथ शुरु किया गया था. प्रकृति, संस्कृति और मानव स्वास्थ सबका ह्रास हो रहा है. स्थानीय खाद्यान्न संस्कृति में सोया से ज्यादा समृद्ध और विभन्न प्रकार के विकल्प मौजूद हैं. प्रोटीन के लिए हमारे पास हजारों प्रकार की सेमों और दलहनों की किस्में मौजूद हैं जैसे – अरहर, बरबट्टी, मूंग, चना भाजी, उड़द फली, धान, खैरी चना, राजमा, मोठ फली, मटर, लाल चना, दालें, छोले, ग्वारफली, कमरख आदि. खाद्य तेलों में हमारे पास– तिल, सरसों, अलसी, सूर्यमुखी, मूंगफली और नाइगर सफोला हैं. हमारी खाद्य प्रणाली को सुधारने के लिए अपने मोनोकल्चर मनोविज्ञान से उबरना हमारी आवश्यकता है. छोटे जैवविविधता युक्त खेतों में ज्यादा उत्पादकता होती है और वो किसानों के लिए ज्यादा आमदनी का जरिया हो सकता है. साथ ही जैवविवध खुराक ज्यादा पोषक और स्वादिष्ट होती हैं.खेतों में जैवविविधता की वापसी और छोटे किसानों की खेतों में वापसी साथ-साथ होगी. कॉरपोरेट घरानों का फैलना, फूलना, पनपना मोनोकल्चर पर निर्भर है. इससे उबरना हमारी जरुरत भी है और मज़बूरी भी।
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Thursday, January 17, 2008

दूर तक जायेगी एक रोशनी उसके साथ


इस कविता के कवि हालाँकि इतने चर्चित नहीं रहे हैं कि उनका नाम सुनकर ही कविता पढ़ने की इच्छा जग जाये। एक अत्यंत प्रतिभावान कवि और उससे भी ज़्यादा संवेदनशील शख्सियत वाले युवा श्री राजीव झा आज गुमनामी झेल रहे हैं और हममें से अधिकांश साथी शायद ही उनका अता-पता बता सकें। इतनी प्रतिभा के बावजूद यदि वे नटरंग प्रतिष्ठान जैसे संगठन में पिछले कई सालों से दो-तीन हजार रुपये में काम कर रहे हैं , जहाँ भरपूर फंड्स रहने के बाद भी ज़रूरतमंद युवाओं से पांच सौ, हजार रुपये देकर महीने भर आठ घंटों तक काम करवाया जाता है तो यह हमारी भी संवेदनहीनता का परिचायक है। गौरतलब है कि यह संस्थान जिसके संस्थापक स्व.नेमिचंद्र जैन थे ,अब उनके परिवार के दूसरे सदस्य इसे अशोक वाजपेयी के सहयोग से चला रहे हैं। इस प्रतिष्ठान के बारे में फिर कभी बात करेंगे , आइये पहले राजीव की यह कविता पढ़ें-


कुछ दृश्य
अकेलेपन
में कौंधते हैं
स्वप्न में नहीं
सुबह नहाने के बाद
आइने से
वह आज फिर नहीं पोंछ पाई
उस चेहरे को
गुमसुम कोई चेहरा
किसी को कुछ कहता है
एक पुकार को सुनता हुआ

वह ऑफिस जा रही है
कुछ
सोचते हुए
काफी दूर तक जायेगी
एक रोशनी उसके साथ
यह याददाश्त है
जिसमें वह खुद को
ठीक से पहचानती है।

Tuesday, January 15, 2008

थिएटर मेरा पहला प्यार है: पंकज कपूर


रामकिशोर पारचा
फ़िल्म समीक्षक

पंकज कपूर का मानना है कि वो हमेशा अपनी तरह काम करने की कोशिश करते हैं
वरिष्ठ अभिनेता पंकज कपूर के करियर की कोई भी फ़िल्म देखें तो वही भूमिका उनकी अब तक की सर्वश्रेष्ठ भूमिका लगेगी, पर पंकज ऐसा नही मानते.
वे चाहे धर्म जैसी फ़िल्म करें, व्यावसायिक सिनेमा की 'दस' या इसी हफ्ते रिलीज़ हुई फ़िल्म 'हल्ला बोल', वो हर चरित्र को सर्वश्रेष्ठ बना देते हैं.
हल्ला बोल की रिलीज़ और विशाल भारद्वाज की फ़िल्म ब्लू अम्ब्रेला के लिए सर्वश्रेष्ठ खलनायक का स्क्रीन अवार्ड दिए जाने पर उनसे हुई बातचीत के अंश.
ब्लू अम्ब्रेला के लिए आपको सर्वश्रेष्ठ खलनायक का अवार्ड मिलना सही है?
यह मुझे भी समझ नही आया कि यह किस कैटेगरी के तहत दिया गया है. वह तो नंदू नाम का सपने देखता सीधा इंसान है. मक़बूल और दस की भूमिकाएँ पूरी तरह नकारात्मक थीं.
अवार्ड का मतलब है आपके काम का सम्मान. पर उसका वर्गीकरण होना चाहिए. मैं नही जानता कि जूरी की क्या मजबूरियां होती होंगी. हम यूरोपीय या पश्चिम के सिनेमा या पुरस्कारों की बात करते हैं पर नही जानते सच्चाई क्या है.
हल्ला बोल से पहले आपके करियर की सर्वश्रेष्ठ कौन सी भूमिका है?
नहीं बता सकता. मेरे लिए मेरी हर भूमिका बच्चे की तरह है. मैं चाहे 'धर्म' करूँ या 'सहर', मैं हमेशा अपनी तरह काम करने की कोशिश करता हूँ.
पंकज कपूर ने हल्ला बोल में एक अलग तरह की भूमिका निभाई है
हल्ला बोल के सिद्धू की भूमिका ऐसे ही एक पूर्व डकैत मगर रंगकर्मी की है. मैं लोगों का शुक्रगुजार हूँ कि मैं उनकी तरह का काम कर पा रहा हूँ.
मैंने जब राजश्री की 'मैं प्रेम दीवानी' की तो लोगों ने कहा कि हिन्दी सिनेमा को एक नया पिता मिल गया है. हल्ला बोल में सिद्धू को देखकर लोग मेरी तुलना प्रेमनाथ से कर रहे हैं पर मैं अपनी तरह का काम ही कर रहा हूँ.
क्या यह मशहूर नुक्कड़ नाटककर्मी सफ़दर हाशमी या मॉडल जेसिका लाल की हत्याओं से प्रेरित कहानी है?
नहीं. फ़िल्म हमारे समाज का ही प्रतिबिम्ब हैं, उनमे अगर हमारे समाज और दुनिया के चेहरे नज़र आते हैं तो यह हमारे सिनेमा की कामयाबी है.
पर सतर के दशक में शुरू हुआ ऐसा नया सिनेमा आन्दोलन क्यों मर गया?
सत्तर का दशक सिनेमा के प्रयोगों के दौर था. उस समय हम फ्रांस, इटली के त्रुफो जैसा सिनेमा बनने कि कोशिश कर रहे थे पर अस्सी के दशक में तेज़ी से पनपा टीवी हमारे नए सिनेमा को खा गया.
इसमे पैसा नहीं था. टीवी ने पैसा और नाम दोनों दिया. अब वैसा टीवी भी नही रहा. तमाम चीजों और बाज़ारवाद के बावजूद उस समय वह आधार और रचनात्मकता के स्तर पर साहित्य और जड़ों से जुडा था.
यह फंतासी किस्म की ऐसी दुनिया दिखाता है जो हमसे नही मिलती. हाँ फ़िल्मों के मामले में हम आर्थिक और सामाजिक रूप से ज़रूर बदल गए हैं. इसे पूरी दुनिया देख और समझ रही है.
जब आप किसी साहित्यिक कृति पर बनने वाली फ़िल्म या शो में काम करते हैं तो इतने नेचुरल कैसे हो जाते हैं?
मेरे लिए मेरी हर भूमिका बच्चे की तरह है. मैं चाहे 'धर्म' करूँ या 'सहर', मैं हमेशा अपनी तरह काम करने की कोशिश करता हूँ
मकबूल शेक्सपीयर के मकबेथ और ब्लू अम्ब्रेला रस्किन बोंड की कृतियों पर आधारित फ़िल्में थीं.
मैंने कोशिश की कि उनकी मौलिकता को हानि न पहुँचे. मैं कोई तकनीक इस्तेमाल नहीं करता.
मैं किसी एक्टिंग स्कूल की नकल नही करता. फ़िल्मकार मुझे जो चारित्रिक आधार देते हैं, बस मैं उन्हें विकसित कर लेता हूँ. चाहे वे मेरे करमचंद का चरित्र हो या ऑफिस ऑफिस का मुसद्दी लाल.
मैं जब एक रूका हुआ फ़ैसला, खामोश और हल्ला बोल जैसे फ़िल्में कर रहा था तब भी मैंने यही अप्रोच रखी.
आपके और शाहिद के साथ काम करने को लेकर आजकल बहुत बातें हो रही रही हैं ?
मैंने अपनी जिन्दगी में कभी किसी से कुछ नहीं कहा और न शिकायत की. मैं नहीं चाहता कि आप जैसे वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकारों को ऐसे प्रकरणों और अफ़वाहों पर ध्यान देना चाहिए.
जहाँ तक हमारे साथ काम करने की बात हैं तो यदि कोई अच्छी पटकथा होगी तो ज़रूर करेंगे. पर मैं उनके साथ कोई फ़िल्म इसलिए नही करूंगा कि लोग मुझे उनके पिता की भूमिका में देखना चाहते हैं.
सुप्रिया के साथ भी मैंने 'धर्म' तभी की जब हमे लगा कि कोई कहानी और पटकथा वैसी है.
अब कौन सी फ़िल्म आएगी और थियेटर में वापसी कब होगी ?
फिलहाल एक फ़िल्म है गुड शर्मा. मैं थोड़ा चूजी हो गया हूँ. अब नए नाटक नहीं लिखे जा रहे हैं. लेकिन थियेटर मेरा पहला प्रेम है.