Thursday, July 17, 2008

बढ़ रहा है अर्थव्यवस्था के क्रैश करने का खतरा

आनंद प्रधान
अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों से आ रहे संकेतों से साफ है कि कुछ महीनों पहले तक नवें आसमान पर कुलांचे भर रही अर्थव्यवस्था की रफ्तार न सिर्फ धीमी पड़ने लगी है बल्कि वह अपने ही बोझ से थककर हांफने लगी है। चिंता की बात यह है कि केंद्र में सरकार गिराने और बचाने के खेल के शोर में कोई अर्थव्यवस्था की इस कराह को सुन नहीं रहा है। इससे यह आशंका जोर पकड़ने लगी है कि अर्थव्यवस्था नवें आसमान से उतरते हुए ‘साफ्ट लैंडिंग’ के बजाय कहीं क्रैश न कर जाए। राजनीतिक अस्थिरता के कारण यह खतरा और बढ़ गया है।
यह कोई बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जा रहा खतरा नहीं है। अर्थव्यवस्था से आ रहे संकेतों से बिल्कुल स्पष्ट है कि अगर उसे पूरी सक्रियता और समझदारी के साथ संभाला नहीं गया तो उसे क्रैश होने से बचाना मुश्किल हो जाएगा। पिछले कुछ दिनों में दो अंतरराष्ट्रीय क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों -स्टैंडर्ड एंड पुअर और फिच- ने भारतीय अर्थव्यवस्था की लड़खड़ाहट और बिगड़ती वित्तीय स्थिति का हवाला देते हुए भारत की रेटिंग घटा दी है। निश्चय ही इसका नकारात्मक असर भारतीय शेयर बाजार से लेकर मुद्रा बाजार में सक्रिय अंतरराष्ट्रीय निवेशकों विशेषकर विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) के सेन्टिमेंट पर पड़ा है। इसका तात्कालिक नतीजा काले मंगलवार के रूप में सामने आया जब मुंबई शेयर बाजार का संवेदी सूचकांक ‘सेंसेक्स’ 654 अंकों तक लुढ़क गया। सेंसेक्स की मौजूदा मरियल स्थिति का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि वह पिछले 15 महीनों के अपने सबसे न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया है। सेंसेक्स को भारतीय अर्थव्यवस्था की सेहत का संकेतक मानने वालों के लिए यह सचमुच बड़ी चिंता का विषय होना चाहिए कि बाजार 21200 अंकों के एवरेस्ट से लुढ़कता हुआ 12700 अंकों तक पहुंच गया है। सिर्फ साढ़े छह महीनों में सेंसेक्स में लगभग 30 खरब रूपए की पूंजी इस गिरावट के साथ स्वाहा हो चुकी है।
कहने की जरूरत नहीं है कि शेयर बाजार में इस भारी गिरावट और अफरातफरी की सबसे बड़ी वजह वे विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) हैं जिन्होंने पिछले वर्षों में सेंसेक्स को एवरेस्ट पर चढ़ाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई थी लेकिन पिछले कुछ महीनों से भारतीय अर्थव्यवस्था की डगमगाती नैया से कूद– कूदकर भागने में लगे हुए हैं। तथ्य यह है कि पिछले वर्ष एफआईआई ने भारतीय शेयर बाजारों में लगभग 17।36 अरब डालर (लगभग 75000 करोड़ रूपए) का निवेश किया था लेकिन इस साल वे पिछले साढ़े छह महीनों में लगभग 7 अरब डालर की रकम निकाल ले गए हैं।
शेयर बाजार से एफआईआई के पलायन का असर डालर के मुकाबले रूपए की कीमत पर भी पड़ा है। काफी अरसे तक डालर के मुकाबले मजबूत बने रहने के बाद एक बार फिर रूपया कमजोर पड़ने लगा है क्योंकि भारतीय बाजारों से डालर निकाल रहे विदेशी निवेशकों के बीच डालर की मांग बढ़ गई है। इस कारण डालर के मुकाबले रूपए की कीमत गिरकर प्रति डालर 43।22 रूपए तक पहुंच गई है जबकि कुछ महीनों पहले तक कमजोर डालर के मुकाबले रूपया मजबूत होकर प्रति डालर 39 रूपया पहुंच गया था।
भारतीय बाजारों में एफआईआई के पलायन के कारण शेयर बाजार के लुढ़कने और रूपए के कमजोर होने से भी अधिक चिंता की बात यह है कि इससे भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में एक ‘नकारात्मक सेन्टिमेंट’ बनता है जिसका असर घरेलू निवेशकों पर भी पड़ता हैै। वे भी बाजार से हाथ खींचने लगते हैं और इसका असर अर्थव्यवस्था में नए निवेश पर पड़ता है। नया निवेश न होने से अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर मंद पड़ने लगती है जिससे कंपनियों के मुनाफे पर असर पड़ता है। नए रोजगार के अवसर नहीं बढ़ते हैं, उल्टे छंटनी और तालाबंदी का दौर शुरू हो जाता है। इससे निवेश और प्रभावित होता है। इस तरह एक दुष्चक्र बन जाता है और अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में आ जाती है।
सवाल यह है कि क्या भारतीय अर्थव्यवस्था उसी दुष्चक्र की आ॓र बढ़ रही है? इस बारे में अभी कोई बिल्कुल सटीक घोषणा करना जल्दबाजी होगी लेकिन अर्थव्यवस्था से आ रही कई नकारात्मक खबरें इसी आ॓र इशारा कर रही हैं। पहली बुरी खबर यह है कि मई में औघोगिक उत्पादन सूचकांक ‘आइपीपी’ गिरकर 3।8 प्रतिशत पर पहुंच गया है जो पिछले छह वषार्र्ें में सबसे न्यूनतम दर है। इससे साफ जाहिर है कि औघोगिक विकास की दर लगभग धराशायी हो चुकी है। उससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि पूंजीगत वस्तुओं (कैपिटल गुड्स) के उत्पादन की दर लुढ़ककर मात्र 2।5 प्रतिशत रह गयी है जो पिछले वर्ष मई में 22 प्रतिशत थी। कैपिटल गुड्स के उत्पादन में इतनी भारी गिरावट इस बात की सूचक है कि अर्थव्यवस्था में नया निवेश कम या नहीं हो रहा है । जाहिर है कि इसका सीधा असर अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर पर पड़ेगा। यही कारण है कि कुछ महीनों पहले तक जीडीपी की 9 से 10 प्रतिशत की वृद्धि दर के दावे करने वाले आर्थिक मैनेजर और विश्लेषक भी अब दबी जुबान से स्वीकार करने लगे हैं कि मौजूदा स्थितियों में जी डी पी की 7 से 8 प्रतिशत की दर भी बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। यह 7 से 8 प्रतिशत की वृद्धि दर भी अच्छे मानसून और कृषि क्षेत्र के बेहतर प्रदर्शन के आसरे टिकी है। अन्यथा अर्थव्यवस्था खासकर औघोगिक क्षेत्र जिस तरह से लुढ़क रहा है, उसके कारण जी डी पी की 6 से 7 प्रतिशत की विकास दर को भी हासिल करना टेढ़ी खीर साबित होगी । असल में, अर्थव्यवस्था को आसमान छूती मुद्रास्फीति की दर ने पटरी से उतार दिया है। मुद्रास्फीति ने पिछले चार महीनों में जिस तरह से सुरसा की तरह अपना बदन बढ़ाया है और तेरह वर्र्षों का रिकार्ड तोड़ती हुई 11।89 प्रतिशत की बेचैन कर देने वाली ऊंचाई पर पहुंच गयी है, उससे अर्थव्यवस्था के मैनेजरों के हाथ–पांव फूले हुए हैं। मुद्रास्फीति की बेकाबू रफ्तार को थामने के लिए पिछले कुछ सप्ताहों में रिर्जव बैंक और वित्त मंत्रालय ने जो भी उपाय किए, वे न सिर्फ नाकाफी साबित हुए हैं बल्कि उनका उल्टा असर अर्थव्यवस्था की गति को धीमा करने के रूप में सामने आ रहा है। हताशा में अब अर्थव्यवस्था के मैनेजरों ने मुद्रास्फीति की सुरसा के आगे घुटने टेक दिए हैं और कहने लगे हैं कि महंगाई पर नियंत्रण का असर नवम्बर–दिसंबर से दिखेगा। जाहिर है कि यह सिर्फ दिलासा है ।
सच यह है कि मुद्रास्फीति का जिन्न बोतल से बाहर आ चुका है और अर्थव्यवस्था को अपनी चपेट में ले चुका है। कोढ़ में खाज की तरह मौजूदा राजनीतिक अस्थिरता का असर यह हो रहा है कि यूपीए सरकार का सारा ध्यान अर्थव्यवस्था को संभालने के बजाय सरकार का अस्तित्व बचाने में जाया हो रहा है। इस अनिश्चितता के कारण अर्थव्यवस्था की गति तो मंद पड़ती ही जा रही है, वह दिशाहीनता का शिकार भी हो गई है। दिशाहीनता के साथ हमेशा क्रैश करने का खतरा जुड़ा रहता है। शेयर बाजार के साथ-साथ अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों से आ रही खतरे की घंटी इसी क्रैश की पूर्व चेतावनी है। उम्मीद है कि अर्थव्यवस्था के मैनेजर इसे सुन रहे होंगे।
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Wednesday, July 16, 2008

हमारी आधुनिकता की चार उलझनें

अभय कुमार दुबे
जैसा कि हम जानते हैं कि कोई भी आधुनिकता अपने-आप में एक मुकम्मल सिक्काबंद शै नहीं होती। मानवता के इतिहास में हर आधुनिकता दो-तरफा संवाद चला कर लोगों और समुदायों को अपने रंग में रंगती है, और उसी प्रक्रिया में उसकी सार्वभौमिकता को स्थानीय परिवेश का संस्कार मिलता है। भारतीय संदर्भों में यह बात और भी सही है। हमारे यहां आधुनिकता अपनी संरचना में एक बहुवचन है। आधुनिकता का राजनीतिक रूप उस समय तक संकटमुक्त नहीं हो सकता, जब तक उसके अन्य रूप ठीक से विकसित नहीं हो जाते। हम मुख्यत: चार तरह की उलझनों से दो-चार हो रहे हैं। पहली उलझन आधुनिकता के घरेलू संस्करण से संबंधित है। तमाम तरह के कानून बनाने के बावजूद समाज के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया परिवार की संस्था में पर्याप्त सुधार करने में नाकाम रही है। दूसरी उलझन दलित समाज के आईने में देखी जा सकती है। छुआछूत से काफी हद तक मुक्ति प्राप्त कर लेने के बावजूद आज तक दलित मध्यवर्गीय समाज की मुख्यधारा में शामिल नहीं हो पाए हैं। तीसरी उलझन अल्पसंख्यकों से जुड़ी हुई है। वे उदारतावादी आधुनिकता से टकराव में नजर आते हैं। वे उसकी शर्तों और कसौटियों के मुताबिक अपना पुन: संस्कार करने से इनकार कर रहे हैं। उसकी चौथी उलझन सेक्सुअलिटी यानी यौनिकता के सवाल के आसपास है जिसकी सबसे तीखी अभिव्यक्ति वेश्याओं से संबंधित अनिर्णय की स्थितियों में दिखती है। हिंदी साहित्य की कुछ नई रचनाओं ने जाने-अनजाने इन प्रश्नों के साथ कुछ संवाद कायम किया है। साहित्य की यह कोशिश आश्वस्तिकारक है।
विख्यात लेखिका मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’ में ग्रामीण परिवेश से आई एक पढ़ी-लिखी स्त्री के साहित्यकार बनने की मानीखेज दास्तान बिखरी हुई है। यह रचना केवल एक परिवार का ही यथार्थ-वर्णन नहीं है, बल्कि इसके पन्नों पर मौजूद लगभग सभी परिवार वैवाहिक संबंधों में आए अंतर्विरोधों के दौर से गुजर रहे हैं। इनमें हिंदू परिवार भी शामिल हैं, और मुसलमान परिवार भी। भारतीय परिवार के लिए अभी तक घर अभी भी बाहर से भिन्न है। वे दोनों एक-दूसरे के विस्तार नहीं हो पाए हैं। उनके बीच आनुषंगिकता की संरचनाओं का अभाव है। स्त्री का घर के बाहर कदम रखना एक औपचारिकता ही है। जैसे ही वह उसे अनौपचारिक बनाने की कोशिश करती है, उसे अलंघ्य चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। जाहिर है कि स्त्रियों की आजादी के गले में भारतीय परिवार की यह कमोबेश अपरिवर्तनीयता अटकी हुई है। इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि स्त्रियों को राजनीतिक आरक्षण देने के बाद भी इस स्थिति में कोई परिवर्तन होगा।
युवा दलित साहित्यकार अजय नावरिया ने अपनी रचना ‘उधर के लोग’ के माध्यम से दलित मध्यवर्ग की भीतरी बेचैनियों को उभारा है। कहना न होगा कि दलित मध्यवर्ग बनना अपने-आप में एक श्रेयस्कर परिघटना है। लेकिन, चिंताजनक बात यह है कि यह दलित मध्यवर्ग समग्र भारतीय मध्यवर्ग से अलग-थलग अपने किसी कोने में बैठा अपनी बहसें और गतिविधियां चला रहा है। यह अलगाव उसका चुनाव नहीं बल्कि उसकी मजबूरी है। आजादी के बाद उभरा भारतीय मध्यवर्ग अभी इतना सार्वदेशिक नहीं हो पाया है कि दलितों को अपने बीच एक बेहिचक किस्म की जगह दे सके। नावरिया का उपन्यास यह संदेश भी देता है कि सेकुलरीकरण की लगातार चलती हुई प्रक्रिया के तहत वर्गरचना भी हो रही है, पर राजनीतिक समुदाय के आधार पर मध्यवर्ग दो हिस्सों में बंट गया है।
भारतीय आधुनिकता की तीसरी उलझन अब्दुल बिस्मिल्लाह के उपन्यास ‘अपवित्र आख्यान’ के जरिए सामने आती है। इस उपन्यास के नायक के सामने तीन रास्ते हैं। पहला रास्ता अल्पसंख्यकवाद का है। इस पर चलने से वह उस भारतीय सार्वदेशिकता का अंग नहीं बन सकता जो बहुत धीरे-धीरे परवान चढ़ रही है। दूसरा रास्ता बहुसंख्यकवाद का है। इसे अपना लेने का नतीजा यह होगा कि उसे और उसके समुदाय को बहुसंख्यकवादी राजनीति के सांस्कृतिक वर्चस्व के साथ ‘समरस’ हो जाना होगा। तीसरा रास्ता ग्रामों की दुनिया में आज तक अपनी चमक दिखा रहे हिंदू-मुसलमानों की सामासिक संस्कृति के छिट-पुट अवशेषों के रूप में में सामने आता है। मुश्किल यह है कि शहर में, जो आधुनिकता का थिएटर है, इस तरह की सांस्कृतिक साझेदारी उपलब्ध नहीं है। शहर सदियों पुरानी इस सामासिक निष्पति से पल्ला छुड़ा कर अलग-अलग अस्मिताओं में रम चुका है। वहां यह संस्कृति या तो नॉस्टेल्जिया के रूप में मिलती है या फिर सेकुलरवाद के अजायबघर में रखी हुई किसी जज़्बाती शै की तरह देखी-दिखाई जाती है। शहर में उर्दू की ‘हे’ का मतलब है हिंदू और ‘मीम’ का मतलब है मुसलमान।
भगवानदास मोरवाल ने अपने नए उपन्यास ‘रेत’ के जरिए एक ऐसा सवाल उठाया है जिसका जवाब हमारी आधुनिकता को अभी तक नहीं मिला है। भारतीय आधुनिकता वेश्याओं के साथ संवाद स्थापित करने के मामले में खुद को भयग्रस्त महसूस करती है। उनकी पॉलिटिकल इकॉनॉमी सेक्स-वर्क से होने वाली आमदनी पर आधारित है, जबकि यह एक व्यावहारिक हकीकत है कि हमारे सार्वजनिक जीवन पर आत्मदमन आधारित यौन शुचिता और ब्रह्मचर्य की निहायत अवैज्ञानिक और बेवकूफाना धारणाएं हावी हैं। इस मामले में ज्यादातर कम्युनिस्ट होलटाइमर और संघ परिवार के जीवनदानी प्रचारक एक ही मुकाम पर खड़े हुए हैं। वेश्याओं की इस पॉलिटिकल इकॉनॉमी को भूमि सुधार या ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम चला कर या कोई फैक्ट्री खोल कर भी नहीं बदला जा सकता। दरअसल, हमारे पास सेक्स की पॉलिटिकल इकॉनॉमी से निबटने का कोई औजार नहीं है।
आजकल हमारी राजनीतिक आधुनिकता एक नए संकट से उबरने की कोशिश कर रही है। ऊपर से दिखने में लगता है कि बहस देशी और विदेशी की परिभाषाओं के आसपास हो रही है। बहस के केंद्र में राष्ट्रहित का प्रश्न भी प्रतीत होता है। कुल मिला कर यह एक दुविधा है जो हमारे सार्वजनिक जीवन को सता रही है। आखिर आजादी के 61वें साल में भी यह सार्वजनिक जीवन आधा-अधूरा सा क्यों है? क्या इस अपरिपक्वता की जड़ मे आधुनिकता की वे उलझनें नहीं हैं जिन्हें न सुलझा पाने के कारण ही हर नया राजनीतिक संकट हमें इतना संगीन लगने लगता है। भारतीय आधुनिकता के विकास संबंधी प्रश्नों पर गहराई से सोचने वालों के लिए आज का माहौल एक तरह का निमंत्रण है। इसके बहाने वे बुनियादी सवालों पर एक बार फिर नजर डाल सकते हैं।
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Tuesday, July 15, 2008

जल से खल

राजेन्द्र सिंह
(संरक्षक, जल बिरादरी)
एक तरफ हम और हमारी सरकारें नदियों को ‘मां’ कहती है लेकिन दूसरी तरफ वह इन नदियों के साथ मैला ढोने वाली मालगाड़ी की तरह व्यवहार कर रही है। देश भर के उघोग, नगरपालिका, पंचायतें और महानगर सब अपनी सारी गंदगी को नदी में ही डालते हैं। इसके बावजूद आज तक किसी भी सरकार ने किसी भी नगरपालिका व पंचायतों को दंडित नहीं किया है। फलस्वरूप अब सभी सरकारी संस्थाओं ने यह मान लिया है कि नदियों का काम मैला ढोना ही है। इसलिए शहर के सभी नाले नदियों में खोल दिये जाते हैं। आज एक तरफ तो नदियों को मैला करने का काम हो रहा है तो दूसरी तरफ इसे दूर करने के लिए हजारों करोड़ का बजट बन रहा है। यह हमारी मैली राजनीति के मैले चरित्र को उजागर करता है।
मैल की मैली राजनीति को ठीक करने के लिए नदियों की शुद्धता के नाम पर हो रहे भ्रष्टाचार, नदियों के प्रदूषण और अतिक्रमण को रोकने हेतु एक बड़ा आंदोलन आवश्यक है। इसे चलाने का काम हम लोग (जल बिरादरी) देश भर में कर रहे हंै। हमने देश भर में जागरूकता फैलाना तय किया है। देशभर के महाविघालयों व विघालयों में नदियों के संकट को समझने और इसके प्रति सरकार को संवेदनशील बनाने के लिए एक जनवरी से 31 मार्च तक नदियों को समझने और समझाने का काम किया है। जबकि एक अप्रैल से 31अक्टूबर तक राज्य सरकारों पर नदी नीति बनवाने के लिए दबाव डालने का काम चल रहा है। इस कार्यक्रम के तहत भागीरथी और सरयू नदी में आमरण अनशन चल रहा है। भागीरथी में देश के सर्वोच्च पर्यावरणविद जीडी अग्रवाल (गुरदास अग्रवाल) और सरयू नदी में सौंग गांव की महिलाओं व पुरूषों ने आमरण अनशन किया। यह अनशन तब तक चला जब तक सरकार ने आयोग गठित नहीं किया। इसी प्रकार देशभर के दूसरे राज्यों में भी नदी सत्याग्रह अपनी जीत की तरफ बढ़ रहा है। दिल्ली में चल रहा यमुना सत्याग्रह तब तक जारी रहा जब तक उपराज्यपाल ने यमुना खादर में डीएमआरसी का निर्माण कार्य न रोक दिया। इसी प्रकार महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात समेत देशभर में नदी संरक्षण अभियान ने अपनी कामयाबी हासिल की है।
अब समाज सरकार से नदियों के बारे में सवाल पूछने लगा है। अब भारत का समाज नदियों के साथ जुड़ने लगा है जब समाज नदियों के साथ जुड़ जायेगा तो नदियों को जोड़ने के नाम पर नदी जोड़ योजनाओं को रोकने में सफलता मिलेगी। नदी सत्याग्रह संरक्षण का लक्ष्य यही है कि समाज खुद नदियों के साथ जुड़ कर नदियों को शुद्ध सदा नीरा बनाने हेतु राज्य सरकारों तथा भारत सरकार से नदी पुनर्जीवन नीति बनवाने तथा नदियों को राजस्थान की अरवरी नदी की तरह पुनर्जीवित करने के लिए समाज भी इस काम में जुड़े। आज सरकारें नदियों के साथ खिलवाड़ कर रही है। हमारे अधिकारियों को नदियों का चरित्र समझ में नहीं आ रहा है। जब तक किसी अधिकारी या सरकार को नदियों के चरित्र का पता नहीं चलेगा तब तक नदियों का भला नहीं होगा।प्रस्तुति : अमित कुमार
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वामपंथी दलों का आत्मघाती कदम

राजकिशोर
भारत के वामपंथी दल अपने आपको सबसे बुद्धिमान समझते हैं। लेकिन संप्रग सरकार से समर्थन वापस लेकर उन्होंने न केवल भारतीय राजनीति को एक कदम पीछे कर दिया है, बल्कि अपने भविष्य पर भी प्रश्नचिह्न लगा लिया है। जो दल पश्चिम बंगाल और केरल में गठबंधन की राजनीति सफलतापूर्वक चलाते रहे हैं, उन्होंने केंद्र के गठबंधन को एक ऐसी ठोकर मारी है जिससे बहुत कुछ तहस-नहस होगा। लेकिन वाम दलों को इसकी फिक्र शायद इसलिए नहीं है कि राष्ट्रीय राजनीति में उनकी कोई महत्वाकांक्षा नहीं है और न ही वे कोई महत्वाकांक्षा पालना चाहते हैं। शायद वे अपनी क्षेत्रीय हैसियत से ही खुश हैं। लेकिन यह क्षेत्रीय हैसियत भी तभी बरकरार रह पाएगी जब वे अपनी राजनीति को गत्यात्मक बनाएं और व्यावहारिक राजनीति की चुनौतियों को समझने की कोशिश करें।वामपंथ अपनी सैद्धांतिक प्रतिबद्धताओं पर कुछ ज्यादा ही मुग्ध है।
आजकल राजनीति में सिद्धांतवादिता जिस तरह घटती जा रही है या कहिए विलुप्त हो रही है, उसे देखते हुए इस घटना पर खुश हुआ जा सकता है कि चलो, कोई तो राजनीतिक समूह है जो अपनी मान्यताओं पर अडिग है। लेकिन सिर्फ एक मान्यता पर इतना बल देना कि उसके परिणामस्वरूप केंद्र सरकार संकट में पड़ जाए और बाकी मान्यताओं को भूल जाना सिद्धांत प्रेम नहीं, महज हठ है- एक ऐसा हठ, जिसका कोई रचनात्मक पहलू नहीं है। मनमोहन सिह जिस तरह परमाणु करार पर अड़े हुए थे, उसे महसूस करते हुए भी वाम दलों द्वारा अपनी जिद पर अड़े रहना बताता है कि वे अपनी नाक कटा कर भी इतिहास में अपनी जगह बनाना चाहते हैं। राजनीति का मामला इतना किताबी नहीं होता। खासकर उस समय जब देश एक भारी संक्रमण से गुजर रहा हो।
दरअसल, संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन में वामपंथी जिस तरह शामिल हुए, वह एक समस्यामूलक घटना थी। इस गठबंधन का तात्पर्य क्या था? सभी का मानना है कि यह गठबंधन सांप्रदायिक शक्तियों को सत्ता में न आने देने और उनकी स्थिति कमजोर करने के लिए बनाया गया था। लेकिन सिर्फ कुछ धर्मनिरपेक्ष दलों के निकट आ जाने से यह उद्देश्य सिद्ध होनेवाला नहीं है, यह बात जिसे मालूम न हो, उसे राजनीति से बाहर हो जाना चाहिए। धर्मनिरपेक्षता बनाम सांप्रदायिकता एक बड़ी बहस है, लेकिन यह बहस इस व्यापक बहस का हिस्सा है कि देश को किस तरह चलाया जाए। भाजपा के गठबंधन ने देश को जिस तरह चलाया, उससे लोगों को संतोष नहीं हुआ। इसीलिए भाजपा की सीटें कम हुईं, न कि इस कारण कि भाजपा ने सत्ताा में जाने के बाद भी अपना सांप्रदायिक नजरिया नहीं छोड़ा। गुजरात में नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री बनने के बाद सांप्रदायिकता बढ़ी है, लेकिन इससे नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई। इसका एक बड़ा कारण लोगों का यह महसूस करना है कि गुजरात का प्रशासन सुधर रहा है और सरकार विकास को बढ़ावा देने के लिए जरूरी और उपयुक्त कदम उठा रही है। वामपंथियों की मौजूदगी से केंद्र सरकार की छवि भी कुछ इस तरह की बनती, तो संप्रग के गठबंधन में उनके होने का सार्थक और प्रगतिशील मतलब निकलता। वामपंथियों को पता था कि गठबंधन में उनकी ऐसी हैसियत नहीं है। वे अपनी यह हैसियत बनाना भी नहीं चाहते थे। इसके बावजूद समय-समय पर वे ऐसे आग्रह करते रहे जिनसे लगता था कि मनमोहन सिह की सरकार उनकी बंदी है। यह ब्लैकमेल था, कोई स्वस्थ राजनीति नहीं।
वाम दलों के सामने दो ही विकल्प थे। एक विकल्प यह था कि वे संप्रग में शामिल होने के बाद उसे अपनी सैद्धांतिक जमीन की आ॓र मोड़ने की कोशिश करते। गठबंधन सिर्फ़ सत्ता के लिए नहीं, सिद्धांत के लिए भी होना चाहिए। वाम दल इसके लिए तैयार नहीं थे। आज भी वे तैयार नहीं हैं, क्योंकि समर्थन वापस लेने के बाद वे कोई और ज्यादा प्रगतिशील गठबंधन बनाने की कोशिश नहीं करेंगे और न ही वाम दलों के प्रभाव क्षेत्र को राष्ट्रीय स्तर पर ले जाने की मेहनत करेंगे। इसके बजाय वे अपने सुरक्षित बाड़ों में सिमट जाएंगे। अभी तक उनकी बातों को गौर से सुना भी जाता था, क्योंकि वे सरकार का अनौपचारिक अंग थे। अब यह भी नहीं होगा। वाम दलों के सामने दूसरा विकल्प यह था कि वे मनमोहन सिह की सरकार को अपने रास्ते चलने देते और बाहर से उसका समर्थन करते रहते। ऐसी स्थिति में वे यह दावा कर सकते थे कि सरकार की नीतियों से उनका कुछ भी लेना-देना नहीं है और उनका समर्थन तभी तक है जब तक यह सरकार कोई बड़ा जन विरोधी कदम नहीं उठाती। इससे वामपंथियों की नैतिक छवि बनी रहती और कोई यह दावा नहीं कर सकता था कि वे सांप्रदायिक श‡ियों को सत्ताा में आने से रोकने में सहयोग नहीं कर रहे हैं। लेकिन वामपंथियों ने अपने लिए एक ऐसा विकल्प चुना जो इन दोनों विकल्पों का अवसरवादी घालमेल था। इसीलिए उनके मौजूदा फैसले से कोई प्रसा नहीं है।परमाणु करार का मामला एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, लेकिन इसका संबंध हमारी परमाणु नीति से ज्यादा और अमेरिका से कम है। अगर हम परमाणु शक्ति के अपने कार्यक्रम को बनाए रखना चाहते हैं, तो अमेरिका या रूस या फ्रांस- यह सवाल गौण हो जाता है। लेकिन वाम दलों ने देश के परमाणु कार्यक्रम पर आपत्ति नहीं की, न उन्हें कोई वास्तविक आपत्ति है। उनकी आपत्ति यह है कि अमेरिका से यह करार क्यों किया जा रहा है। यह अंध अमेरिका-विरोध शीत युद्ध के वर्षों की एक बेजान दुम है। इस दुम को पकड़ कर वैतरणी पार करने की आशा तब और हास्यास्पद हो जाती है जब हम पाते हैं कि वाम दलों ने आर्थिक मोर्चे पर पूरी तरह समझौता कर लिया है और अपने द्वारा शासित राज्यों को उसी दिशा में ले जा रहे हैं जो मनमोहन सिह सरकार की आर्थिक दिशा है। वाम दलों को वास्तविक ग्लानि इस पर होनी चाहिए कि समर्थन वापसी के लिए उन्होंने आर्थिक मोर्चे पर सरकार की विफलताओं को क्यों नहीं चुना। अगर वे ऐसा करते, तो उनकी वामपंथी छवि कुछ उज्ज्वल ही होती। लेकिन समर्थन वापसी के लिए उन्होंने एक ऐसा मुद्दा चुना जिसके प्रति देश की अधिकांश जनता उदासीन है। अमेरिका से परमाणु करार होता है या नहीं, इस सवाल पर कोई उद्वेलित नहीं है। फिर वामपंथी इस कदर उद्वेलित क्यों हुए कि उन्होंने चार वर्ष से ज्यादा का साथ क्यों छोड़ दिया? क्या इसीलिए कि वे अतीत के बंदी और भविष्य की चुनौतियों से लापरवाह हैं? आत्मघात और किसे कहते हैं?
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वामपंथ, भद्रलोग और एटमी करार

मुद्राराक्षस
‘वामपंथी दलों ने आखिर वर्तमान केन्द्र सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। समर्थन वापस लेते वक्त बहुत रवायती तरीके से उन्होंने अपने आभिजात्य पंथी तर्क के साथ महंगाई का मुद्दा भी जोड़ दिया। वर्तमान प्रगतिशील गठबंधन वाली सरकार से समर्थन वापसी के इस मौके पर महंगाई का मुद्दा क्यों याद किया गया, इसकी वजह समझ में नहीं आयी। इस देश की समूची राजनीति के सभी विचारों के कर्ताधर्ता मध्यवर्गीय और उच्च मध्यवर्गीय हैं, जिनके लिए महंगाई जैसा विषय कोई अर्थ नहीं रखता। सत्ता की राजनीति करने वाली वामपंथी पार्टियों की स्थिति भी इससे बाहर या अलग नहीं है। उनके समग्र सरोकार मध्यवर्गीय हो चुके हैं, उनका जमीन से, मिट्टी से अब कोई रिश्ता नहीं रहा है। वामपंथ अब देश के आदमी को छूकर नहीं, इंटरनेट और लैपटाप से पहचानता है।
वामपंथ की इसी लैपटाप राजनीति का नतीजा है कि केन्द्र सरकार से समर्थन वापसी के लिए उन्होंने उस अर्थव्यवस्था को कारण नहीं बनाया जो इस देश में बहुराष्ट्रीय कम्पनियां अपनी सुविधा और बेहतरी के लिए चला रही हैं। दुनिया के सबसे बड़े बाजार को अब बहुराष्ट्रीय कम्पनियां अपने फायदे के लिए ज्यादा से ज्यादा लाभकारी बना रही हैं। गेहूं, चावल, तेल का बाजार भी अब ये कम्पनियां अपने फायदे के अनुसार चला रही हैं। इन्हीं कम्पनियों ने अपने छपे प्लास्टिक के थैलों में अठारह रूपये किलो गेहूं का आटा बेचना शुरू किया और गलियों-मोहल्लों से लेकर कस्बों-गांवों तक में गेहूं का आटा बिकने लगा। डॉक्टर अपने मरीज को कहता है- एक सेब रोज खाआ॓। पिछले साल पच्चीस-तीस रूपये किलो बिकने वाला सेब अब एक सौ रूपये किलो से ज्यादा में बिक रहा है। अच्छा चावल पिछले बरस पैंतालिस रूपये किलो था। आज चंद महीनों में सौ फीसद बढ़कर नब्बे रूपये किलो हो गया है।
वर्तमान भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़, राष्ट्रीयकृत बैंकों का राष्ट्रीय उद्देश्य पूरी तरह खत्म किया जा रहा है और ऊपरी तौर पर राष्ट्रीयकृत दिखने वाले बैंक निजी उघोग के चारागाह बना दिए गए हैं। आज सभी अर्द्धसरकारी या सरकारी वित्तपोषित संस्थानों के खजाने निजी बैंकों के पास हैं। साल 2007-08 का जो बजट देश की अर्थव्यवस्था को बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की टहलुआ बनाने का बेशर्म दस्तावेज था, उस वक्त अगर वामपंथी दलों ने वह किया होता जो वे आज कर रहे हैं तो शायद देश के अवाम के कपड़े इतने ज्यादा तार-तार होने से बच जाते।
दिलचस्प यह है कि वामपंथ के पुराणपंथी मंत्रपाठी नेता यह समझकर खुश रहते हैं कि देश के लोग तो मूर्ख हैं। कांग्रेस पार्टी और भारतीय जनता पार्टी ने तो शुरू से ही अपनी राजनीति का आधार यह अवधारणा बनाई कि देश मूर्ख जनता से भरा हुआ है और उसे झूठ का कोई भी गलीज परोसा जाएगा, वह भुक्खड़ उसे खुशी से खाएगा। वामपंथ के मध्यवर्गीय चरित्र वाले भी सत्ता में आने के बाद से यही समझने लगे हैं। जिन वामपंथी नेताओं और बुद्धिजीवियों को इस बात से असुविधा महसूस हो रही हो वे जरा इस देश के सबसे गरीब आदमी और अपनी मासिक आय की ईमानदारी से तुलना करके देख लें। वजह यही है, यही मध्यवर्गीय चरित्र इसकी वजह है कि वामपंथ को वर्तमान सरकार गिराने की वजह भी एक मध्यवर्गीय ही मिली, एटमी करार! लेकिन देश की करीब तीन चौथाई जनता को पता ही नहीं है कि एटमी करार बला क्या है।
वामपंथ को इस बात में भी कोई रूचि नहीं है कि वह बताए कि इस करार का विरोध करके वह आम मुसलमान के कितने पक्ष में खड़ा हो रहा है। देश के दलित आंदोलन से उच्चवर्गीय वामपंथ इतना ज्यादा चिढ़ता रहा है कि जब बहुजन समाज पार्टी ने एटमी करार को लेकर कांग्रेस पार्टी का विरोध किया तो वामपंथ की जबान तालू से चिपक गयी है। उच्चवर्गीय मानसिकता में आकंठ डूबे सत्तारूढ़ वामपंथ को अपने ही पक्ष में खड़े न तो आम मुसलमान से कोई सहानुभूति है और न ही दलित वर्ग से। समूचे देश के दलित-पिछड़े वर्ग की सबसे सशक्त नेता मायावती ने जिस वक्त एटमी करार के विरोध में बयान दिया, वामपंथ ने उनके इस निर्णय का स्वागत भी नहीं किया। जिस उच्चवर्गीय चरित्र वाले वामपंथ का एक नेता खुलकर बयान देता हो कि वह पहले हिन्दू है बाद में वामपंथी, उस वामपंथी आंदोलन पर देश कितना भरोसा कर सकता है? वामपंथ शायद सोचता है कि वर्तमान स्थिति में कांग्रेस नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार गिर जाएगी और चुनाव होंगे। उसे यह खामखयाली भी हो चुकी है कि चुनाव में वामपंथ को लाभ होगा। उसे जानना चाहिए कि बंगाल और केरल को छोड़कर बाकी देश के अल्पसंख्यक और दलित-पिछड़ों के साथ खड़े होने का कोई सुबूत उसने कभी नहीं दिया है। वामपंथ को यह वहम भी है कि वह गरीब आदमी की लड़ाई लड़ता है। यह शुद्ध वहम है। भारत का गरीब धार्मिक और जातीय अस्मिता से बाहर नहीं है और उच्च मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी हो चुके वामपंथ ने इसी अस्मिता से भद्रलोक की दूरी बना ली है। इसीलिए वह जमीनी नहीं बौद्धिक उच्चवर्गीय आंदोलनों में विश्वास करता है। देश वामपंथ का एक और दुर्भाग्यपूर्ण रूप समझ चुका है। वह जान रहा है कि वामपंथ बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की अर्थव्यवस्था अन्दर ही अन्दर स्वीकार कर चुका है।
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Thursday, July 3, 2008

एक करोड़ लोगों का एक साल का निवाला सड़ाया

नई दिल्ली (एजेंसी)

पिछले एक दशक के दौरान भारतीय खाघ निगम (एफसीआई) के गोदामों में सैकड़ों करोड़ रूपए मूल्य का 10 लाख टन से ज्यादा अनाज सड़ गया जो एक करोड़ से अधिक लोगों की एक साल तक पेट की आग बुझाने के लिए काफी था। यह स्थिति तब है जब संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में रेखांकित है कि भारत के 63 फीसदी बच्चे भूखे पेट सोने के लिए मजबूर हैं।अनाज को भंडारण के समय नुकसान से बचाने के लिए निगम द्वारा 245 करोड़ रूपए खर्च किए जाने के बावजूद यह स्थिति है। यह विडंबना है कि अनाज के सड़ जाने के बाद उन्हें निपटाने के लिए भी निगम को 2।59 करोड़ खर्च करने पड़े। अनाजों के भंडारण से संबंधित ये सनसनीखेज तथ्य सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत दिल्ली निवासी देवाशीष भट्टाचार्य के आवेदन पर सामने आए। श्री भट्टाचार्य के सवाल पर निगम ने उन्हें सूचित किया कि देश भर में अनाजों की खरीदारी व वितरण की जिम्मेदारी निभा रही सरकारी एजेंसी के भंडारों में पिछले एक दशक के दौरान 10 लाख टन अनाज सड़ गए। निगम की सूचना के अनुसार 1997 से 2007 के बीच 1.83 लाख टन गेहूं, 3.95 लाख टन चावल, 22 हजार टन धान और 110 टन मक्का सड़ गए। निगम ने बताया कि उत्तरी क्षेत्र के तहत आने वाले उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, पंजाब, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश व दिल्ली में सात लाख टन अनाज सड़ गए। निगम ने 86.15 करोड़ रूपए अनाज को नुकसान से बचाने के लिए खर्च किया जबकि 60 लाख रूपए सड़े अनाज को निबटाने में गए। भट्टाचार्य ने बताया कि एफसीआई ने अपने गोदामों में अनाजों के संरक्षण के लिए जितनी रकम खर्च की उसे देखते हुए यह नुकसान विशाल है। क्या यह राष्ट्रीय शर्म नहीं है। निगम के अनुसार पूर्व क्षेत्र-असम, नगालैंड, मणिपुर, उड़ीसा, बिहार, झारखंड, और पश्चिम बंगाल में 1.5 लाख टन अनाज सड़ा। निगम ने यहां अनाजों को सड़ने से बचाने के लिए 122 करोड़ रूपए खर्च किए जबकि सड़े अनाज को निबटाने के लिए 1.65 करोड़ रूपए खर्च किए गए। दक्षिण क्षेत्र-आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल में 25 करोड़ रूपए खर्च करने के बावजूद 43069.023 टन अनाज सड़ गए। सड़े अनाज को निपटाने के लिए 34867 रूपए खर्च किए गए। महाराष्ट्र व गुजरात में 73814 टन अनाज को नुकसान पहुंचा। एफसीआई ने अनाजों को सड़ने से बचाने के लिए 2.78 करोड़ रूपए खर्च किए। सड़े अनाज को ठिकाने लगाने के लिए 24 लाख रूपए खर्च किए गए। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 23323.57 टन अनाज सड़ गए। अनाजों को सड़ने से बचाने के लिए वहां साढ़े पांच करोड़ रूपए खर्च किए गए। यहां मामला दूसरे राज्यों के गोदामों से भिन्न नहीं है। एफसीआई को सड़े अनाज निबटाने के लिए वहां 10.64 लाख रूपए खर्च करने पड़े। भट्टाचार्य ने कहा कि एफसीआई के आंकड़ों में उलटफेर प्रतीत होता है।

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सत्ता सुख के बाद चुनावी वैराग्य



तरूण विजय


एक व्यक्ति खेत से ताजा लाए गए खरबूजे को नदी में धोने आया। मिट्टी धोई, साफ किया और नदी से बाहर निकल कर उसे खाने की लालसा लिये घर की आ॓र बढ़ रहा था कि खरबूजा हाथ से फिसल गया। बड़ी कोशिश की उसे नदी की धारा से पकड़ लाने की, पर खरबूजा बह ही गया। मायूस हो उस व्यक्ति ने खरबूजे की क्षति को पूरा करने के लिए एक उपाय किया। घुटनों तक नदी में खड़ा होकर अंजुलि में जल भरकर छोड़ा और कहा- जा, तुझे पितरों को दान दिया।भारत-अमेरिका परमाणु संधि को चुनावी मुद्दा बनाकर सरकार से समर्थन वापस लेने की धमकी के पीछे भारतीय कम्युनिस्टों की भी ऐसी ही मानसिकता है। सरकार में न रहते हुए भी सत्ता का भरपूर सुख लिया। विभिन्न संस्थाओं, संस्थानों और राजकीय दरबार के उच्चासनों पर वामपंथी बिठाए, सुबह मीडियार्थ आलोचना-पर्व किया, शाम को चित्त-सुख के लिए 10 जनपथ पर डिनर पर्व मनाया। सिल्चर, कोलकाता और तिरूअनन्तपुरम में कांग्रेस के विरूद्ध लाल झंडों के साथ प्रदर्शन किये और गर्मी की छुटि्टयां अमेरिका में बिताईं- कुछ इसी आरोह-अवरोह से गुजरते हुए वामपंथियों को ठीक चुनाव के समय अपनी बंधुआ रियाया की याद आई- हे मार्क्स, हे लेनिन इस प्रजा का सर्वहारापन, मूर्खता से आवृत्त होता नहीं, कोलकाता में गर्मी और दिल्ली में वसंत का पाखंड ज्यादा छुपा नहीं रह सकता सो चुनाव के वक्त तो कांग्रेस का विरोध करना ही था, लिहाजा भारत-अमेरिका परमाणु संधि को ही मुद्दा बनाकर सत्ता के छूट रहे खरबूजे को अबूझे सैद्धांतिक पितरों को अर्पित कर दिया।यूपीए सरकार को अपने समर्थन पर टिकाए हुए मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी व भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने गत वर्ष यूपीए के साथ एक पन्द्रह सदस्यीय समिति गठित की थी। सरकार के साथ इस समिति की हर वार्ता के बाद कम्युनिस्टों का बयान ‘समय बिताने की कसरत’ के मानिन्द ही रहा। दो वर्ष से जो कम्युनिस्ट परमाणु संधि के हर पहलू के बारे में जानते रहे, वार्ताओं में हिस्सा लेते रहे, उन्हीं कम्युनिस्टों ने कभी भी सरकार द्वारा संधि की दिशा में बढ़ाए जा रहे कदम रोकने के लिए कोई निर्णायक रूख नहीं अपनाया।सितम्बर 2007 की बात है। यूपीए और वामपंथियों की 15 सदस्यीय परमाणु-संधि समीक्षा समिति की दूसरे दौर की बैठक हुई। भाकपा के डी।राजा और माकपा के सीताराम येचुरी ने कहा कि सरकार को अगले छह माह के लिए इस संधि के संदर्भ में सभी वार्ताएं रोक देनी चाहिए। सरकारी पक्ष ने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि भारत-अमेरिका परमाणु संधि के बारे में सरकार निर्णय ले ही चुकी है और अब अगला कदम है अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आई।ए.ई.ए.) की स्वीकृति प्राप्त करने हेतु परमाणु आपूर्ति समूह (न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप) के 45 सदस्य राष्ट्रों से बिना शर्त छूट प्राप्त करने हेतु प्रयास की। उसके बाद अमेरिकी संसद इस संधि को अधिकृत तौर पर लागू कर देगी। कम्युनिस्ट नेताओं ने चुप्पी साध ली। उन्होंने उस समय सरकार से समर्थन लेने की बात नहीं की, क्योंकि साल भर का सत्ता सुख अभी बाकी बचा था। अमेरिकी विदेश मंत्री कोंडालिसा राइस और इस संधि के लिए विशेष तौर पर नियुक्त वार्ताकार रिचर्ड स्ट्रैटफोर्ड के स्पष्ट बयान आते रहे जिनमें उन्होंने दिसम्बर 2007 तक संधि को स्वीकार्य तथा लागू करने की समय सीमा घोषित कर दी।सुविज्ञ सरकारी सूत्रों के अनुसार साउथ ब्लाक को वामपंथी दल लगातार इस भ्रम में रखे रहे कि थोड़े बहुत प्रारंभिक विरोध के बाद वे सरकार को संधि पर हस्ताक्षर के लिए कोई रास्ता खोल देंगे। प्रारंभ से ही संधि के हर अनुच्छेद, 123 उपबंध, हाइड एक्ट आदि की संपूर्ण जानकारी वामपंथी नेताओं को दी जाती रही, परंतु उसे वे सहेज कर रखते हुए समय बिताते रहे। इस बीच संधि पर हस्ताक्षर के मामले को हिन्दू-मुस्लिम बनाने की भी कोशिश हुई और मार्क्सवादी नेताओं ने अमेरिका को हिन्दुत्व समर्थक पक्ष से जोड़ते हुए मुसलमानों को हिन्दू-विरोध के पड़ाव से संधि-विरोध में खड़ा करने की कोशिश की। सौभाग्य से एक नितान्त सुरक्षात्मक और तकनीकी विषय का सांप्रदायीकरण आगे नहीं बढ़ा, क्योंकि हिन्दुत्वनिष्ठ संगठनों ने यह दांव खेला नहीं।फिर प्रकाश करात का बयान आया कि यह परमाणु संधि इस भू-राजनीतिक क्षेत्र में चीन के विरूद्ध अमेरिकी स्थिति ज्यादा मजबूत करेगी इसलिए हम इसका विरोध करते हैं। इस बयान पर काफी तीव्र प्रतिक्रियाएं हुईं। वामपंथियों द्वारा परमाणु संधि के विरोध की सारी कलई खुल गई क्योंकि उनका विरोध किसी भारतीय हित के मुद्दे से नहीं जुड़ा था, बल्कि चीन के हितों पर चोट के अंदेशे ने उन्हें संधि के विरोध में खड़ा किया। दूसरी आ॓र भाजपा के संधि विरोध से वे लोग हतप्रभ रह गए जो पार्टी को अमेरिका-समर्थक चित्रित करते आ रहे थे। भाजपा का रूख था कि इस संधि से भारत के सुरक्षा भविष्य पर ताला लगता है, इसलिए एक सम्प्रभु राष्ट्र के नाते यह संधि अस्वीकार्य है। यह ठीक है कि संधि से भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं को कुछ हद तक पूरा किया जा सकता था लेकिन उसकी कीमत यह चुकानी पड़ती है कि हमें आवश्यकतानुसार पोखरण-3 का स्वप्न भी छोड़ना पड़ता और सरल संधि के अन्तर्गत परमाणु ईंधन की आपूर्ति हेतु अमेरिकी राष्ट्रपति की स्वीकृति की प्रतीक्षा करनी पड़ती जो वस्तुत: एक स्वाभिमानी राष्ट्र के लिए अपमानजनक होती।वामपंथियों ने भाजपा के इन तर्र्कों का मजाक उड़ाते हुए वस्तुत: स्वयं को एक ऐसे वर्ग में खड़ा कर दिया जो संधि के विरोध को भारत से जोड़ने में नाकामयाब रहा। अब उनकी ‘चुनावी-रणनीति’ है कि वे संधि से मुद्दे पर सरकार से समर्थन वापस लेकर जनता के पास परमाणु करार से होने वाले खतरे का मुद्दा लेकर जाएंगे। यानी कि सिंगूर और नंदीग्राम में टाटा की कार फैक्ट्री के लिए हजारों किसानों को बेदखल करने और ‘जलियांवाला बाग’ जैसा खूनखराबा घटित करने के बाद मार्क्सवादियों की ‘रणनीति’ है कि वे जनता को समझाएंगे कि उन्होंने चीन को अमेरिका के बढ़ते प्रभाव से बचा लिया और परमाणु संधि को नाकामयाब कर दिया इसलिए हमें वोट दो।प.बंगाल इन दिनों अराजकता से जूझ रहा है। दार्जिलिंग में गोरखालैंड आंदोलन के नवीन रूप ने इस साल का पर्यटन तबाह कर दिया। बांकुड़ा, मिदनापुर से लेकर जलपाईगुड़ी तक गरीबी और बदहाली से तंग जनता हिंसा एवं माआ॓वाद की गर्त में गिर रही है। बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियों की संख्या में लगातार वृद्धि से बंगाल के नगर संत्रस्त हैं। अब उनके सामने परमाणु संधि का मुद्दा चुनाव में ले जाने का फैसला हास्यास्पद ही कहा जा सकता है।वास्तव में वामपंथियों का किसी न किसी मुद्दे पर केन्द्र सरकार से समर्थन वापस लेना एक चुनावी मजबूरी ही है। अभी तक वे इस आवरण का सहारा लेते रहे कि यदि मध्य-काल में केंद्र सरकार से समर्थन वापस लिया तो भाजपा आ जाएगी, इसलिए सिर्फ भाजपा को रोकने के लिए वे कांग्रेस की गलत नीतियों को अनदेखा करने के लिए ‘मजबूर’ हैं। यह ‘मजबूरी’ वास्तव में ‘सत्ता सुख’ के लिए भी, तब भाजपा एक बहाना बनी तो अब चुनाव के वक्त जनता को अपना कांग्रेस-विरोधी मुखौटा दिखाने के लिए परमाणु संधि का विरोध एक सहारा बना है। इस परिस्थिति में माकपा की राजनीतिक सूझबूझ प्रकट हुई है या चुनावी-अपरिपक्वता, यह तो मतदाता ही बताएंगे। परंतु लगातार ‘भाजपा के सत्ता की आ॓र बढ़ते कदम रोकने’ की ‘मार्क्स प्रदत्त प्रतिबद्धता’ व्यक्त करने वाले कम्युनिस्टों की लाख कोशिशों के बावजूद आज माहौल ऐसा बना है कि भाजपा के प्रबल विरोधी भी उसके सत्ता में लौटने का विश्वास जताने लगे हैं। परमाणु संधि के द्वार पर माकपा का चुनावी-वैराग्य सेकुलर दुविधा और सीमा-पार वफादारी का द्वंद्व ही दर्शाता है, इसमें भारत-हित का तत्व पूर्णत: अनुपस्थित ही रहा है।


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Tuesday, July 1, 2008

एक दर्द का नाम है हरसूद

दयाशंकर मिश्र
भोपाल से
कीमत तो चुकानी पड़ती है !
इंदिरा सागर बांध परियोजना से प्रभावित 250 गांवों और उनके दर्द के प्रतीक बने एक खंडवा जिले के हरसूद के विस्थापितों के बारे में नजदीकी जिलों और राजधानी के नेताओं, अफसरों से लेकर आम जनता तक यही राय रखते हैं.
30 जून को हरसूद डूबने के चार साल बाद विस्थापितों की बस्ती नया छनेरा में बड़ी संख्या में ऐसे परिवार आपको मिल जाएंगे, जिनके लिए दो जून की रोटी दुनिया का सबसे बड़ा सवाल है. एक ऐसा सवाल जो हर रोज उनके घरों में सुबह होने के साथ जागता है और पूरा घर हर रोज उससे जुझता रहता है.
मंगल ग्रह जैसी सुर्ख लाल जमीन पर बसाए गए लोगों की आजीविका का कोई साधन नहीं है. मुआवजे का पैसा धीरे-धीरे खत्म होता गया और अब हालात भुखमरी के हो रहे हैं. उन चंद लोगों की बात छोड़ दें जिन्होंने अलग-अलग तरीकों से मोटा मुआवजा हड़पा तो 250 गांवों के 25000 से अधिक लोग 1000 मेगावाट बिजली की कीमत अपनी जड़ों से कटकर, बेरोजगार होकर चुका रहे हैं. बरस दर बरस हरसूद सरकार और सरकारी योजनाओं के केंद्र से हाशिए पर जा रहा है. लापरवाही की हद है कि अभी भी लोग खतरे के निशान की जद में है. ऐसे लोग मुआवजे की आस में अपने परिवारों को संकट में डाले हुए हैं. हर साल की तरह इस साल भी यहां जड़ों से खदेड़े गए लोग अपने प्यारे शहर को याद करने एकजुट हुए और नम आंखों से खंडहर में तब्दील हो चुके शहर में जाकर उसे याद किया.
हरसूद का मूल पेशा खेती-किसानी तो हरसूद डूबने के साथ ही खत्म हो गया. इसके साथ ही उस तबके की परेशानियां भी बढ़ गईं जो मजदूरी करके अपने परिवारों का पेट पालता था. इसी लिए नए छनेरा में तेजी से विस्थापन बढ़ा. आलम यह है कि हरसूद से विस्थापित किए गए 5600 परिवारों में से न्यू हरसूद में बमुश्किल हजार परिवार ही बचे हैं. बाकी कहां गए, विस्थापित बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य किस कदर प्रभावित हुई है, इसका आंकड़ा किसी के पास नहीं है. कम से कम सरकार के पास तो नहीं ही है, जिसके जिम्मे इन विस्थापितों का पुनर्वास था.
दलितों की स्थिति तो और भी बदतर है. नए हरसूद में पचास से अधिक दलितों के घर हैं, जिनमें से अधिकांश घरों के बच्चों की पढ़ाई दम तोड़ चुकी है. स्वास्थ्य सेवा की हालत खराब है.
कौन देगा विस्थापन का सूद
जून 2004 में विस्थापित की गई ऐतिहासिक हरसूद नगरी को 1815 में राजा हर्षवर्धन द्वारा बसाया गया था. आधुनिक समय का हरसूद दरबदर होने से पहले तहसील का दर्जा पाने वाला ऐसा नगर था, जो कि अनेक गांवों से घिरा हुआ था. वहां लोगों के पुश्तैनी कारोबार थे. किसानों के लिए खेती थी तो मजदूरों के लिए मजदूरी. कुल मिलाकर सबके लिए कुछ न कुछ जरूर था, जो अब नहीं रहा.
बिजली के लिए इस नगर को विस्थापित होना पड़ा और जो यहां से विस्थापित हुए उनके हिस्से रोशनी नहीं थी, केवल अंधेरा था.मध्यप्रदेश में ऐसी दूसरी जगह खोजना मुश्किल है, जहां लोगों के पास रहने के लिए पक्के मकान तो हैं, लेकिन खाने के लिए रोटी नहीं है. इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि ज्यादातर लोग मकान बनवाते-बनवाते ही कंगाल हो गए. नया हरसूद जिसे उस समय की मुख्यमंत्री रहीं साध्वी उमा भारती ने विस्थापितों का आदर्श नगर बनाने की घोषणा की थी, वास्तव में बेहद बंजर और कठोर जमीन का इलाका था. जिसमें नींव खुदवाने में ही लोगों को बहुत अधिक पैसा खर्च करना पड़ा. जब किसी की बसी बसाई गृहस्थी उजाड़ दी जाए तो उसकी सबसे पहली जरूरत ठिकाना तलाशना होता है. इसी कमजोरी का सबसे अधिक लाभ नये हरसूद में बसने वालों से ठेकेदारों, सीमेंट, रेत और लोहे के व्यापारियों ने उठाया.
उन्होंने अमूमन 2300 रूपए प्रति क्विंटल में बिकने वाले लोहे और हजार-पंद्रह सौ की रेत-गिट्टी के लिए मजबूर लोगों से क्रमश: चार हजार और तीन हजार रूपए वसूले. इस तरह खदेड़े गए लोगों की मुआवजे की रकम घर बनवाने में ही खर्च हो गई.
2004 में हरसूद के लोगों ने अपने ही हाथों से घरों पर रोते हुए हथौड़े चलाए थे और बरसात की आहट के बीच मंगल ग्रह सरीखी लाल और कठोर जमीन पर खुले आसमान के नीचे आ बैठे थे, उनके लिए सबसे पहली जरूरत घर थे, इसलिए उनके पास जो कुछ था, वह सब कुछ उन्होंने अपना घर बनाने में लगा दिया.
घर के भीतर का सच
अब हालत यह है कि उनके पास घर और केवल घर ही हैं. सरकार के नुमाइंदे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में पक्के मकानों के विहंगम दृश्य दिखाकर अदालतों को यह बताने में कामयाब हो जाते हैं कि लोगों के पुनर्वास के समूचे इंतजाम हैं, जबकि यह केवल एक छल है. सरकारी छल !
नए हरसूद के सरकारी रिकार्ड में वाणिज्य केंद्र के आगे यह दावा किया गया है कि भूखंड विकसित हैं और कार्य प्रगति पर है. जबकि सच्चाई तो यह है कि महज खाली भूखंडों वाला यह वाणिज्य केंद्र अपनी स्थापना के साथ ही नाकाम हो चुका है. क्योंकि न तो नये हरसूद में बस स्टैंड है, न ही मंडी और ही ऋण देने वाले बैंक. हां विकास दिखाने के लिए कांक्रीट की नालियां और अधचुपड़ी डामर की सड़कें जरूर मौजूद हैं.
विस्थापितों की मांगों के लिए लंबी लड़ाई लड़ने वाले डॉ. अशोक श्रीवास्तव कहते हैं कि यहां डामर की सड़कें और नालियां इसलिए हैं, क्योंकि सरकार को हाईकोर्ट में यह बताना होता है कि लोगों के लिए कायदे का पुनर्वास किया गया है.
डॉ.श्रीवास्तव कहते हैं “ हरसूद अपने में एक कंप्लीट एकोनॉमिक जोन था. जहां किसानों की बड़ी मंडी थी, लगभग 200 गांवों की सीधी पहुंच थी, जिससे वहां हर किसी के लिए काम था. जबकि यहां हालत बिल्कुल ही बदले हुए हैं. यहां पक्के मकानों, सरकारी परियोजनाओं के अफसरों के कार्यालयों के अलावा कुछ भी नहीं है.” नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़े आलोक अग्रवाल के अनुसार अभी तक नए हरसूद में बसाए गए लोगों को प्लाट के स्वामित्व तक नहीं दिए गए हैं. जिसके कारण उन लोगों को किसी भी तरह के रोजगार के लिए ऋण नहीं मिल सका है.
आलोक कहते हैं “ बीते तीन सालों में यहां अपराध का ग्राफ तेजी से बढ़ा है। लोगों के पास रोजगार के साधन नहीं हैं, उनके परंपरागत बाजार खत्म हो गए हैं और घरों में भूख तेजी से पांव पसारती जा रही है, इसलिए यहां अपराधिक गतिविधियां तेजी से बढ़ती जा रही हैं.”
बराबर का दुख
ऐसा नहीं कि हरसूद के विस्थापन ने केवल गरीब तबके की आंखों में आंसू दिए. हरसूद के पास छनेरा में किराने के बड़े व्यापारी त्रिलोक भंडारी बताते हैं कि वह अपने शहर हरसूद में भी किराने की दुकान चलाते थे, लेकिन वहां कभी यह संकट नहीं आता था कि परिवार का पेट कैसे भरें ? लेकिन यहां हम अपनी पूरी पूंजी दांव पर लगाने के बाद भी अभी तक खुद को स्थापित नहीं कर सके हैं क्योंकि यहां क्रयशक्ति पहले की तुलना में आधी भी नहीं रह गई है. दलितों की कौन सुने: नए हरसूद के सेक्टर सात जिसे दलित सेक्टर भी कहा जाता है; के पचास घरों में से ज्यादातर के बच्चे अब अपनी पीठ पर से स्कूली बस्तों को उतार कर गैंती-फावड़ा उठा रहे हैं.
राहुल जो हरसूद उजड़ने के समय दसवीं की पढ़ाई कर रहा था, यहां बस्ते को खूंटी पर टांग चुका है क्योंकि पढ़ाई से अधिक जरूरी है, उसके परिवार के लिए रोटी.
विस्थापितों के इस नए डेरे नया छनेरा में दो जून की रोटी का जुगाड़ मुश्किल हो चला है, लेकिन सबको रोजगार की गारंटी देने वाली योजना का यहां अता-पता नहीं है। लोगों का आरोप है कि विस्थापन के समय स्थानीय लोगों द्वारा असुविधाओं और भ्रष्टाचार के कारण यहां के लोगों का तीखा विरोध झेलने वाले कुछ प्रभावशाली नेता और मंत्री अब यहां के लोगों को उस विरोध की सजा दे रहे हैं। विपक्षी नेताओं के लिए भी हरसूद अब पुराना मुद्दा है, पुराना और ग़ैरजरुरी. जाहिर है, नए हरसूद का वोट बैंक इतना बड़ा नहीं है, जो चुनाव में कोई बड़ी भूमिका निभाए.
अब भी फंसे हैं लोग
कालीमाचक नदी को डूब चुके हरसूद की जीवनदायिनी कहा जाता था. यह बात और है कि इंदिरा सागर बांध का जलस्तर बढ़ने पर इसके बैकवाटर ने ही हरसूद को डुबोने का काम किया. अब जबकि हरसूद एक बड़े खंडहर में तब्दील हो चुका है. बावजूद इसके हरसूद के वार्ड क्रमांक 9 मोही रैयत के लगभग 30-35 लोग यहां से जाने को तैयार नहीं हैं, क्योंकि उनको अभी तक मुआवजे की रकम नहीं मिली है. इन परिवारों में से ही एक मोहन गेंदालाल कहते हैं- “ सरकार द्वारा घोषित धारा 4 के प्रावधानों को पूरा करने के बाद भी हम लोग अब तक मुआवजा नहीं पा सके हैं.” मोहन इस बात से परेशान हैं कि उनका मुआवजा कहां गया. वैसे यहां ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जिनको उनका हक नहीं मिला. उनके हिस्से का मुआवजा या तो सरकारी अफसर डकार गए या फिर दूसरे दबंग. टीबी की मरीज पूनम बताती हैं कि पटवारी और अन्य सरकारी अफसरों ने उनसे रिश्वत की मांग की. पूनम पूछती हैं- “ जिसके पास खाने को ही न हो, वह भला कैसे रिश्वत देगा.”और हरसूद में सब कुशल हैकलेक्टर से लेकर सरकार के मंत्री तक हरसूद पर कोई शिकायत सुनने को तैयार नहीं होते. आपको बताया जाएगा कि वहां सब कुछ ठीक है. कलेक्टर को बताइए तो वह कहेंगे –“ आपके बताने से ही यह नई सूचना हमें मिली. इस पर त्वरित कार्रवाई की जाएगी.”
विस्थापितों की मांगों के लिए लंबी लड़ाई लड़ने वाले डॉ. अशोक श्रीवास्तव कहते हैं कि यहां डामर की सड़कें और नालियां इसलिए हैं, क्योंकि सरकार को हाईकोर्ट में यह बताना होता है कि लोगों के लिए कायदे का पुनर्वास किया गया है.
डॉ.श्रीवास्तव कहते हैं “ हरसूद अपने में एक कंप्लीट एकोनॉमिक जोन था. जहां किसानों की बड़ी मंडी थी, लगभग 200 गांवों की सीधी पहुंच थी, जिससे वहां हर किसी के लिए काम था. जबकि यहां हालत बिल्कुल ही बदले हुए हैं. यहां पक्के मकानों, सरकारी परियोजनाओं के अफसरों के कार्यालयों के अलावा कुछ भी नहीं है.” नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़े आलोक अग्रवाल के अनुसार अभी तक नए हरसूद में बसाए गए लोगों को प्लाट के स्वामित्व तक नहीं दिए गए हैं. जिसके कारण उन लोगों को किसी भी तरह के रोजगार के लिए ऋण नहीं मिल सका है.
आलोक कहते हैं “ बीते तीन सालों में यहां अपराध का ग्राफ तेजी से बढ़ा है. लोगों के पास रोजगार के साधन नहीं हैं, उनके परंपरागत बाजार खत्म हो गए हैं और घरों में भूख तेजी से पांव पसारती जा रही है, इसलिए यहां अपराधिक गतिविधियां तेजी से बढ़ती जा रही हैं.”बराबर का दुख
ऐसा नहीं कि हरसूद के विस्थापन ने केवल गरीब तबके की आंखों में आंसू दिए. हरसूद के पास छनेरा में किराने के बड़े व्यापारी त्रिलोक भंडारी बताते हैं कि वह अपने शहर हरसूद में भी किराने की दुकान चलाते थे, लेकिन वहां कभी यह संकट नहीं आता था कि परिवार का पेट कैसे भरें ? लेकिन यहां हम अपनी पूरी पूंजी दांव पर लगाने के बाद भी अभी तक खुद को स्थापित नहीं कर सके हैं क्योंकि यहां क्रयशक्ति पहले की तुलना में आधी भी नहीं रह गई है. दलितों की कौन सुने: नए हरसूद के सेक्टर सात जिसे दलित सेक्टर भी कहा जाता है; के पचास घरों में से ज्यादातर के बच्चे अब अपनी पीठ पर से स्कूली बस्तों को उतार कर गैंती-फावड़ा उठा रहे हैं.
राहुल जो हरसूद उजड़ने के समय दसवीं की पढ़ाई कर रहा था, यहां बस्ते को खूंटी पर टांग चुका है क्योंकि पढ़ाई से अधिक जरूरी है, उसके परिवार के लिए रोटी.
विस्थापितों के इस नए डेरे नया छनेरा में दो जून की रोटी का जुगाड़ मुश्किल हो चला है, लेकिन सबकोरोजगार की गारंटी देने वाली योजना का यहां अता-पता नहीं है. लोगों का आरोप है कि विस्थापन के समय स्थानीय लोगों द्वारा असुविधाओं और भ्रष्टाचार के कारण यहां के लोगों का तीखा विरोध झेलने वाले कुछ प्रभावशाली नेता और मंत्री अब यहां के लोगों को उस विरोध की सजा दे रहे हैं. विपक्षी नेताओं के लिए भी हरसूद अब पुराना मुद्दा है, पुराना और ग़ैरजरुरी. जाहिर है, नए हरसूद का वोट बैंक इतना बड़ा नहीं है, जो चुनाव में कोई बड़ी भूमिका निभाए.अब भी फंसे हैं लोगकालीमाचक नदी को डूब चुके हरसूद की जीवनदायिनी कहा जाता था. यह बात और है कि इंदिरा सागर बांध का जलस्तर बढ़ने पर इसके बैकवाटर ने ही हरसूद को डुबोने का काम किया. अब जबकि हरसूद एक बड़े खंडहर में तब्दील हो चुका है. बावजूद इसके हरसूद के वार्ड क्रमांक 9 मोही रैयत के लगभग 30-35 लोग यहां से जाने को तैयार नहीं हैं, क्योंकि उनको अभी तक मुआवजे की रकम नहीं मिली है. इन परिवारों में से ही एक मोहन गेंदालाल कहते हैं- “ सरकार द्वारा घोषित धारा 4 के प्रावधानों को पूरा करने के बाद भी हम लोग अब तक मुआवजा नहीं पा सके हैं.” मोहन इस बात से परेशान हैं कि उनका मुआवजा कहां गया. वैसे यहां ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जिनको उनका हक नहीं मिला. उनके हिस्से का मुआवजा या तो सरकारी अफसर डकार गए या फिर दूसरे दबंग. टीबी की मरीज पूनम बताती हैं कि पटवारी और अन्य सरकारी अफसरों ने उनसे रिश्वत की मांग की. पूनम पूछती हैं- “ जिसके पास खाने को ही न हो, वह भला कैसे रिश्वत देगा।”
और हरसूद में सब कुशल है
कलेक्टर से लेकर सरकार के मंत्री तक हरसूद पर कोई शिकायत सुनने को तैयार नहीं होते. आपको बताया जाएगा कि वहां सब कुछ ठीक है. कलेक्टर को बताइए तो वह कहेंगे –“ आपके बताने से ही यह नई सूचना हमें मिली. इस पर त्वरित कार्रवाई की जाएगी।”
www.raviwar.com से साभार

नदी बचाने की जंग

प्रसून लतांत
उत्तराखंड से
अब नदियों पर संकट है, सारे गांव इकट्ठा हों,
निजी कंपनी आई है, झूठे सपने लाई है
जिन जेबों में सत्ता है, सारी सुविधा पाई है
अब रोटी पर संकट है, सारे गांव इकट्ठा हों।

इन दिनों जनकवि अतुल शर्मा के गीतों की ये पंक्तियां उत्तराखंड के गांव-गांव में गाई जा रही हैं। गांवों में इन गीतों के संदेशों से मिलते-जुलते विषयों पर नुक्कड़ नाटक भी खेले जा रहे हैं। यहां अब आपस में बैटकर नदियों पर बांधों के चलते उत्पन्न मसलों पर बातें की जा रही हैं. जल, जंगल और जमीन को कंपनियों के कब्जे में जाते देख कर उन्हें लगने लगा है कि अब अगर नदियां नहीं बचीं तो हम भी नहीं बचेंगे.
लोग उत्तराखंड नदी बचाओ अभियान के आह्वान पर पदयात्रा, धरना और प्रदर्शन करने लगे हैं। इनमें महिलाएं और युवा बढ़-चढ़ कर भाग ले रहे हैं.
नदियों को लेकर उत्तराखंड में शुरु हुई यह लड़ाई अब भले पूरे राज्य में सतह पर उभर कर एकजुट दिखने लगी है, लेकिन इसकी अलग-अलग शुरुवात विभिन्न नदी घाटियों में कई साल पहले ही हो गई थी, क्योंकि टिहरी शहर के डूबने और चाई जैसे गांव के जमींदोज हो जाने की घटनाएं उन्हें कभी चैन से सोने नहीं दे रही है।
ऊर्जा के नाम पर
उत्तराखंड राज्य बनते ही प्रदेश के लोगों को यहां की सरकारों ने जिस तरह ऊर्जा प्रदेश बनाने के सपने दिखाए थे, उनने यहां के लोगों को न सिर्फ ठगा है, बल्कि उन्हें अपने पैतृक स्थलों से पलायन के लिए भी विवश कर दिया है. लोग नए आसरे की ओर निकलते जा रहे हैं. ऐसे में जो पलायन नहीं कर रहे हैं, वे अपनी धरती, जंगल, पहाड़ और नदियों को बचाने के लिए अपनी कमर कसने लगे हैं.नदियों की मौजूदा असलियत उत्तराखंड निवासियों के लिए असहनीय हो गई है. उत्तराखंड के पूर्व में काली (शारदा) से लेकर पश्चिम में तमसा (टौंस) तक उत्तराखंड की सभी हिमपोषित नदियों पर बिजली उत्पादन के लिए दो सौ से अधिक परियोजनाएं निर्माणाधीन या प्रस्तावित हैं, जिन्हें बांधों और सुरंगों के माध्यम से क्रियान्वित किया जा रहा है. इसके कारण इन नदियों का सनातन प्रवाह और इनका अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है. बड़े हादसे तो जैसे अभिशाप की तरह जुड़ गए हैं.पिछले दिनों विष्णुप्रयाग जल विद्युत परियोजना के लिए बनाई गई सुरंग के धंस जाने से उसके ऊपर बसा हुआ चॉई गांव ध्वस्त हो गया और कड़ाके की सर्दी में इस गांव के लोगों को अपने टूटे-फूटे दरकते मकानों को छोड़ कर बेघर होना पड़ा. जंगल साफ हो रहे हैं सो अलग.लोग हैरान हैं कि नदियों पर बांध औऱ सुरंग बनाने के प्रस्तावों पर बगैर इसके नतीजे की परवाह किए केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्रालय ने भी अपनी ओर से हरी झंडी कैसे दिखा दी !लेकिन मामला अकेला चॉई का नहीं है.उत्तरकाशी के करीब चौदह गांव लोहारी नाग और पाला मनेरी जल विद्युत परियोजनाओं से प्रभावित हैं. इन गांवों की महिलाओं का कहना है कि उनके यहां बांध निर्माण एजेंसियां गांव के पुरुषों को प्रलोभन देकर निर्माण कार्य में मनमानी कर रही हैं. भागीरथी घाटी में सुरंग निर्माण के लिए कंपनियां हर दस मीटर पर विस्फोट कर रही हैं, जिससे मकानों में दरारें आ रही हैं. भूजल का रंग बदल गया है.इस इलाके में 18 कंपनियां एनटीपीसी के संरक्षण में काम कर रही हैं, जिसमें बड़ी संख्या में बाहरी लोग आ रहे हैं. जाहिर है, इससे इन गांवों में सामाजिक असुरक्षा के मामले बढ़े हैं. दूसरी ओर जिनकी जमीन अधिगृहित की जा रही हैं, उनकी सुरक्षा और आजीविका के लिए कोई बात नहीं की जा रही है.
भागीरथ पर बांध बनाने की परियोजना के चलते सबसे अधिक खतरे की जद में कुंजन व तिहार गांव हैं. इन गांवों की सुरक्षा व आजीविका के लिए परियोजना में कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं है. लोहारी नाग-पाला बांध परियोजना की 12.05 किलोमीटर लंबी सुरंग बनने पर इसके डंपिंग यार्ड की कोई व्यवस्था नहीं है. ग्रामीणों का आरोप है कि विस्फोट के दौरान गांव वालों को उनकी कच्ची फसलें काट लेने के लिए बाध्य किया जाता है.
और गंगा भी
इन हिमपोषित नदियों के अलावा उत्तराखंड की अन्य नदियों- कोसी, नयार, पनार, पश्चिमी रामगंगा, गौला, गगास, गोमती गरुड़गंगा और सरयू आदि सघन वनों से निकली और वर्षा से पोषित नदियों की जलधाराएं निरंतर घटती चली जा रही हैं।वैज्ञानिकों की मानें तो कौसानी के पास पिनाथ पर्वत से निकलने वाली कोसी नदी का जल प्रवाह अल्मोड़ा के निकट 1994 में 995 प्रति सेकंड था, जो 10 साल बाद 2003 में घट कर मात्र 85 प्रति सेकंड रह गया है. दूसरी नदियों का भी यही हाल है. वैज्ञानिकों के अनुसार ऐसी हालत बनी रही तो 10 से 15 साल के भीतर ये नदियां पूरी सूख जाएंगी.
गंगा का भूगोल छिन्न-भिन्न किया जा रहा है. टिहरी से धरासू तक टिहरी बांध का जलाशय ही नजर आता है. यहां रुका हुआ पानी हरा हो गया है, यहां गंगा मर चुकी है. इससे आगे धरासू से गंगोत्री की दूरी 125 किलोमीटर है. अब यहां भी गंगा को अपने प्राचीन रास्ते बदलकर सुरंगों और बांधों से गुजरना होगा. गंगा को इस तरह बाधित करने से उसके सूख जाने की आशंका जाहिर की जा रही है.धरासू-उत्तरकाशी से गंगोत्री तक बनने वाली पांच नई परियोजनाओं में मनेरी भाली प्रथम और द्वितीय, भैरोघाटी प्रथम और द्वितीय सहित लोहारी नागपाला बांधें शामिल हैं. इनमें भैरोघाटी प्रथम और द्वितीय परियोजनाएं तो गंगोत्री में ही बनने वाली हैं.
हिमालय के मध्य भाग में गंगा की दो धाराएं हैं जो विपरीत दिशाओं में अलकनंदा और भागीरथी के नाम से बहती हुई देवप्रयाग में एक-दूसरे से मिल जाती हैं और यहीं मिलने वाली दोनों नदियों की धाराएं गंगा के स्वरुप में पूरी तरह से ढल जाती है. प्रस्तावित बांधों के बनने से गंगा बहुत जल्द ही हमारी आंखों से ओझल हो जाएगी और वह सुरंगों से होकर बहेगी. ऐसे में सुरंगों में पहुंचाई जाने वाली गंगा अपने वजूद के लिए कब तक खैर मनाएगी !गंगा नदी को सुरंग में डालने का विरोध धीरे-धीरे तेज़ हो रहा है. यह विरोध उत्तराखंड की सीमाओं से बाहर निकल कर देशव्यापी हो रहा है. इसमें नदी बचाओ अभियान के अलावा हिमालय के पर्वत श्रृंखलाओं पर आश्रम बना कर रहने वाले साधु-संत भी कूद गए हैं. गंगा की मूल धारा के रुप में विख्यात भागीरथी के प्रवाह को गंगोत्री से उत्तरकाशी तक किसी भी तरह के मानवीय व्यवधानों से मुक्त रखने की अपील के साथ वैज्ञानिक और पर्यावरण मामलों के जानकार प्रोफेसर जी डी अग्रवाल तो आमरण अनशन पर ही बैठ गए हैं.
उत्तराखंड में नदियों को बचाने के लिए अहिंसक तरीके से शुरु हुई इस लड़ाई की पहली कामयाबी तो यह हुई है कि गढ़वाल और कुमाऊं के बीच भेद खत्म हो गए हैं। उत्तराखंड नदी बचाओ अभियान द्वारा आयोजित जलयात्रा के तहत साल के शुरु में प्रदेश की पंद्रह नदी घाटियों से आई पदयात्रा टोलियों ने गढ़वाल और कुमाऊं के संगम स्थल रामनगर में सभा की और यहीं नदियों को बचाने का सामूहिक संकल्प लिया.
राधा भट्ट का नेतृत्व
अभियान को इसलिए भी गति मिलने लगी है क्योंकि इसका नेतृत्व चिपको आंदोलन सहित शराबबंदी के खनन उद्योगों के खिलाफ और उत्तराखंड राज्य बनाने के आंदोलनों के अनुभवों से तपी-तपाई और गांधी शांति प्रतिष्ठान की अध्यक्ष राधा भट्ट ने स्वीकार कर लिया है. इस लड़ाई में प्रदेश के करीब तीस से अधिक संगठन एकजुट हो गए हैं.
देश के सर्वोच्च गांधीवादी महिला संस्थानों की सचिव रहते हुए अनेक उल्लेखनीय कार्य करने वाली 75 साल की राधा भट्ट नदी बचाओ के लिए संघर्ष का आह्वान करती हुई कोसी नदी की मुख्य घाटी के कोटली से चनौदा, सोमेश्वर तक और मनसारी नाला व साईगाड़ घाटी के महिला मंडलों की मिसाल पेश करती हैं, जिन्होंने वसंती बहन के नेतृत्व में पिछले पांच वर्षों से आरक्षित वनों को संरक्षित करके नदी जल को बढ़ाने के भागीरथ प्रयास किए हैं। भट्ट उत्तराखंड नदी बचाओ अभियान के लिए साल भर का कार्यक्रम तय कर कार्यकर्ताओं की फौज के साथ संघर्ष के मैदान में कूद गई हैं. वे नदियों पर बांध के विरुद्ध हैं, साथ ही जहां बांध बन गए हैं, वहां से स्थानीय लोगों की हिस्सेदारी सुनिश्चित करने की भी वकालत करती हैं.उत्तराखंड के लोग अपनी नदियों को बचाने के लिए एकजुट हो रहे हैं. लगातार धरना, प्रदर्शन और जलयात्राएं निकल रही हैं. देखना यह होगा कि नदियों को बचाने के लिए दृढ़संकल्प होने का दावा करने वाली उत्तराखंड की सरकार की आंखों में भी पानी बचा या है नहीं.
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मौत की फसल

देविंदर शर्मा
सभा कक्ष में स्तब्धकारी चुप्पी छाई हुई थी. कुछ देर के लिए किसी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की. वे सभी बस मुझे घूरे जा रहे थे. शायद उनमें से ज्यादातर लोगों को मेरी बात पर विश्वास नहीं था. ऐसा लगा कि जैव विविधता वाली फसलों (जीएम क्राप्स) के नाम की कसमें खाने वाले जैव विशेषज्ञ और वैज्ञानिक गलत काम करते हुए पकड़े गए हों.

वास्तव में उन्होंने कभी ऐसा सुना ही नहीं था. जीएम बीज के बिना फसल उगाना और कीटनाशकों के इस्तेमाल के बगैर उससे बंपर पैदावार हासिल करना ऐसी ही बात है, जिस पर वैज्ञानिकों को भरोसा न करना सिखाया जाता है. हाल ही में तिरुअनंतपुरम में राजीव गांधी सेंटर फार बायोटेक्निक द्वारा जीएम फसलों पर आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में मैंने बताया कि बंपर पैदावार हासिल करने के वैकल्पिक और स्थायी उपाय हैं. देश में लाखों किसान जीएम बीजों और रासायनिक कीटनाशकों के बिना ही छोटी जोतों में भरपूर पैदावार हासिल कर लेते हैं.
यह सुनते ही वैज्ञानिकों ने मुझ पर खेती के रोमानीकरण का आरोप जड़ दिया. जब उन्हें बताया गया कि आंध्र प्रदेश के लगभग प्रत्येक जिले में लाखों किसान 70 लाख हेक्टेयर भूमि पर टिकाऊ खेती व्यवस्था के अनुरूप खेती कर रहे हैं. इस व्यवस्था में घातक कीटों और रोगों पर स्वत: ही नियंत्रण पा लिया जाता है और फसल की पैदावार में कमी भी नहीं आती. इसके बाद जब मैंने कहा कि कीटनाशक रहित प्रबंधन का क्षेत्र एक करोड़ बीस लाख हेक्टेयर हो गया है और दो-तीन साल में बढ़कर दो करोड़ पचास लाख हेक्टेयर हो जाएगा तो जो प्रतिरोध करने की वे तैयारी कर रहे थे, वह फूट पड़ा.

पौध जैवप्रौद्योगिकी केंद्र के निदेशक डा. पी आनंद कुमार ने पहल की. उन्होंने कहा कि अगर मेरी बातें सत्य हैं तो वह जीएम फसल अनुसंधान छोड़कर इन किसानों के साथ काम करेंगे. उन्होंने कहा कि अगर मरीज स्वस्थ हैं तो दवाइयों की कोई जरूरत ही नहीं है. जीएम फसलों को प्रचारित-प्रसारित करने वाली कंपनी मोनसैंटो के बीज अनुसंधान के पूर्व निदेशक डा. टीएम मंजुनाथ ने भी सहमति जताई.

अनेक दूसरे वैज्ञानिक भी स्वस्थ कृषि व्यवस्था को प्रोत्साहित करने के लिए आगे आए. इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि जो लोग जीएम फसलों की संभावनाओं की बातें करते हैं, वे इतना भी नहीं जानते कि यही लक्ष्य पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना और मानव, पशु तथा पौधों के स्वास्थ्य को बनाए रखते हुए हासिल किया जा सकता है. जो काम जीएम फसल बीमारियां परोस कर करती हैं, वही काम टिकाऊ कृषि व्यवहार अपनाकर न केवल आंध्र प्रदेश के लाखों किसान, बल्कि देश भर के करोड़ों किसान कर रहे हैं. वैज्ञानिक इस कम खर्चीले और पर्यावरण के रक्षक विकल्पों को मान्यता प्रदान क्यों नहीं करते?

आंध्र प्रदेश के खम्मम जिले के रामचंद्रपुरम गांव का उदाहरण सामने है. रासायनिक कीटनाशकों के नियमित प्रयोग या दुरुपयोग के कारण पूरे गांव की समस्त भूमि गिरवी रखनी पड़ी. कुछ साल तक कीटनाशक रहित प्रबंधन अपनाने के बाद गांववासियों ने पूरा ऋण चुकता कर अपनी जमीन छुड़वा ली. दूसरी तरफ जब से भारत में बीटी काटन की शुरुआत हुई तब से तकनीक फीस के नाम पर गरीब किसानों की जेब से बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने दस हजार करोड़ रुपये निकाल लिए. कोई आश्चर्य नहीं कि कृषि पर आए संकट ने दानवी रूप धारण कर लिया.

प्रौद्योगिकी मात्र ब्रांडेड उत्पाद के रूप में ही नहीं आती. अगर मोनसैंटो की बीटी काटन प्रौद्योगिकी है तो इसी प्रकार समय की कसौटी पर खरी उतरने वाली परंपरागत प्रौद्योगिकी भी हैं, जिन्हें परिष्कृत करने में किसानों को सैकड़ों-हजारों साल लग गए. वैज्ञानिक सुरक्षित, भरोसेमंद, लाभदायक, टिकाऊ और स्वस्थ प्रौद्योगिकी मुहैया क्यों नहीं कराते? केवल इसलिए कि ये किसी परियोजना के तहत विकसित नहीं की गई और इनका वित्तीय पोषण नहीं हुआ है, पर इसका मतलब यह नहीं कि इनकी अवहेलना कर दी जाए. पहले ही हरित क्रांति प्रौद्योगिकी ने जमीन, भूमिगत जल और पर्यावरण को इस कदर विषैला बना दिया है कि इसकी क्षतिपूर्ति संभव नहीं. आधुनिक विज्ञान पर्यावरण और मानव शरीर को और कितना प्रदूषित करना चाहता है?

इस परिप्रेक्ष्य में जीएम फसल के लिए अनुमति हासिल करने के लिए राष्ट्रीय जैव तकनीक नियामक प्राधिकरण के रूप में एकल खिड़की के जरिए अनापत्ति जारी करने के प्रयास महत्वपूर्ण नजर आते हैं, जिन पर ध्यान देने की जरूरत है. यह पूरी कवायद बायोटेक्नोलाजी कंसोर्टियम द्वारा की गई, जो बायोटेक्नोलाजी उद्योग का एक उपक्रम है. एनबीआरए के साथ विचार-विमर्श के नाम पर जिन्हें आमंत्रित किया जाता है वे मुख्य रूप से उद्योग जगत के लोग होते हैं या पौध जैवविज्ञानियों में से किसी को आमंत्रित किया जाता है. अलग-अलग तरह के दृष्टिकोण को सही ठहराने के लिए कुछ गैर-सरकारी संगठनों और किसानों को भी आमंत्रित कर लिया जाता है.

नि:संदेह इस प्रकार की बातचीत का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि इस पूरी कवायद का परिणाम पहले से पता होता है. जीएम फसलों को संस्तुति प्रदान करने वाली तथा उनका नियमन करने वाली सर्वोच्च संस्था जेनेटिक इंजीनियरिंग एप्रूवल कमेटी पहले ही जैव-तकनीक के वैज्ञानिकों से भरी हुई है. जाहिर है, इन स्थितियों में इस समिति की पूरी कवायद एक प्रकार का छलावा ही साबित होती है. जीईएसी वास्तव में जैव तकनीक उद्योग के लिए एक रबर स्टांप की तरह साबित हो रही है. प्रस्तावित एनबीआरए के संदर्भ में इस धारणा को मजबूत होने से रोका नहीं जा सकता कि यह संस्था अनिवार्य रूप से जैव तकनीक उद्योग के लिए, जैव तकनीक उद्योग द्वारा और जैव तकनीक उद्योग की है.

क्या यह विचित्र नहीं कि भारत में मानव समाज द्वारा इस्तेमाल की गई सर्वाधिक खतरनाक तकनीकों में से एक जीएम प्रोद्योगिकी के लिए एकल खिड़की अनुमति की व्यवस्था लागू करने के प्रति इतना अधिक उत्साह और रुचि प्रदर्शित की जा रही है, वहीं दूसरी ओर ऐसी फसलों का मक्का माने जाने वाले अमेरिका में इनके लिए तीन नियामक संस्थाएं गठित की गई हैं? इसके बाद भी वहां नियमन प्रक्रिया की विश्वसनीयता को लेकर सवाल खड़े किए जाते रहते हैं. फिर क्या वजह है कि भारत में जीएम फसलों के लिए इतनी हड़बड़ी दिखाई जा रही है?

एक ऐसे समय में जब विश्व का अधिकांश भाग जीएम फसलों से सुरक्षा को लेकर चिंतित है और तरह-तरह के सवाल खड़े कर रहा है तब क्या यह जरूरी नहीं कि हम इसकी प्रक्रिया लागू करते समय चौकन्ना रहें? मूलभूत प्रश्न अभी भी शेष है. भारतीय वैज्ञानिक टिकाऊ खेती की तकनीकों को क्यों प्रोत्साहित नहीं करते? क्यों वे खतरनाक फसलों के स्थान पर पर्यावरण की दृष्टि से व्यवहारिक कृषि के तौर-तरीकों के साथ सामने नहीं आ रहे?

उत्तर आसान है। पिछले अनेक वर्षो में वे कृषक समुदाय से कट गए हैं. वे उस मूक क्रांति से अपरिचित हैं जो देश के खेतों में प्रवाहित हो रही है. यदि भारत खतरनाक जीएम फसलों के स्थान पर आंध्र प्रदेश के किसानों द्वारा आजमाए जा रहे कीटनाशक रहित कृषि प्रबंधन को प्रोत्साहित करे तो वह बड़ी आसानी से विश्व में टिकाऊ खेती और स्वस्थ जीवन का रोल माडल बनकर उभर सकता है.
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