हरीश अग्रवाल
विज्ञान सत्य की खोज है, लेकिन वैज्ञानिक अनुसंधान करनेवाले कई वैज्ञानिक सत्य का रास्ता न अपनाकर झूठ का रास्ता अपनाते हैं। वे अपने परिणामों की सचाई को झूठ में बदल देते हैं, और इस प्रकार जनता के धन से खिलवाड़ करते हैं। कहने को तो सारे वैज्ञानिक समुदाय में इनकी संख्या बहुत कम है, फिर भी इनका सारी बिरादरी पर खराब असर पड़ता है, जनता गुमराह होती है और विज्ञान पर से आस्था उठने लगती है। बहुत से झूठ पकड़े जाते हैं, लेकिन बहुतों के बारे में पता नहीं चलता।अमेरिका में सबसे ज्यादा वैज्ञानिक शोध होते रहते हैं, इसलिए वहीं सबसे ज्यादा जालसाजी पकड़ी जाती है। देखा गया है कि रिसर्च में इस तरह की जालसाजी को पहले बहुत कम समझा जाता था, लेकिन एक सर्वे से चौंकाने वाले परिणाम सामने आए हैं। लगभग दस प्रतिशत वैज्ञानिकों का कहना है कि उन्होंने स्वयं झूठे परिणाम देखे हैं, जो मनगढंत थे या किसी दूसरे वैज्ञानिक शोध को अपना बनाकर प्रस्तुत कर दिए गए। इससे बड़ी जालसाजी क्या हो सकती है और वह भी विज्ञान जैसे क्षेत्र में। इस सर्वे का प्रकाशन प्रतििष्ठत पत्रिका ‘नेचर’ में किया गया है। लगभग 600 विश्वविघालयों और शोध संस्थानों के 2,200 जैवचिकित्सा वैज्ञानिकों से प्रश्न किए गए, तो मालूम हुआ कि शोधकर्ता कदाचार का रहस्योद्घाटन नहीं करते। या तो वे डरते हैं या सोचते हैं कि उन्हें वांछित अनुदान नहीं मिलेगा। बताया गया है कि 37 प्रतिशत संदिग्ध मामले संबंधित संस्थानों को कभी बताए नहीं गए। सोचा गया कि यदि बताया गया तो गलत शोध परिणामों पर वैज्ञानिक को प्रताड़ित किया जाएगा या उसका वैज्ञानिक करियर चौपट हो जाएगा। इसलिए जालसाजी तो बहुत होती है लेकिन वह छुपायी जाती है।बहुत से वैज्ञानिक सोचते हैं कि गलत को ठीक बताकर क्यों न धन ऐंठा जाए। वास्तव में शोध से नाता रखने वाले वैज्ञानिकों को ये गलतियां पकड़नी चाहिए, नहीं तो ऐसा भी हो सकता है कि वरिष्ठ वैज्ञानिक नीचे के वैज्ञानिक के काम पर अपनी मुहर लगा दें। अब उसकी वास्तविकता या झूठ को कोई तीसरा वैज्ञानिक या पक्ष ही समझ सकता है। उपरोक्त सर्वे ऐसे समय आया है जब अमेरिका और अन्य देशों में शोध ईमानदारी पर प्रश्न उठाये जा रहे हैं। वैज्ञानिकों को औषध कंपनियों से धन मिलता है और ये कंपनियां झूठे शोध परिणामों से औषधियां बना सकती हैं, जो जनता के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकती हैं। यहां वैज्ञानिकों और कंपनियों की सांठ-गांठ भी हो सकती है। अमेरिका के शोध जांच कार्यालय का कहना है कि गत तीन साल में उसने किसी न किसी प्रकार की जालसाजी पकड़ी है। पाया गया है कि प्रति वर्ष हर 100 शोधकर्ताओं में तीन केस जालसाजी के होते हैं। सबसे आम उदाहरण परिणामों में संख्या बढ़ाकर पेश करना है, जिससे शोध को संशोधित या सुधार कर रखा जाता है। हर वैज्ञानिक जानता है कि परिणामों में इस प्रकार की उलटफेर किसी भी वैज्ञानिक निष्कर्ष को अर्थहीन बना देती है। सत्य की खोज का अर्थ ही बदल जाता है। कार्यालय ने रहस्योद्घाटन किया है कि हर वर्ष अमेरिकी विश्वविघालयों में लगभग 1,350 मामले झूठे शोध के होते हैं, जिनमें अधिसंख्य पकड़े ही नहीं जाते हैं, क्योंकि वे कार्यालय को रिपोर्ट नहीं किये जाते। सर्वे स्वास्थ्य तथा जीवन विज्ञान में शोध पर किया गया। मालूम हुआ है कि ऐसे मामले विश्वव्यापी बन गए हैं, जिनमें मामूली शोध झूठों का पता ही नहीं चलता।वास्तव में इसी प्रकार के बड़े मामले का भंडाफोड़ 2005 में दक्षिण कोरिया में हुआ। वहां एक वैज्ञानिक ह्वांग वू सुक ने शोध परिणामों को गलत बताकर आदमी की स्तंभ कोशिकाओं के क्लोन तैयार करने का दावा किया। बाद में उसकी करोड़ों रूपये की ग्रांट छीन ली गई। इसी प्रकार 2002 में भौतिकी में एक और शोध जालसाजी का पता चला था, जो इस क्षेत्र में सबसे बड़ा मामला बताया जा रहा है। चार वर्ष तक एक युवा वैज्ञानिक हेनरिक शोन बैल प्रयोगशाला में अति चालकता से नेनो टेक्नोलॉजी तक जैसे विषयों के झूठे परिणाम गढ़ता रहा, और इस प्रकार सारे विज्ञान जगत को अंधेरे में रखा। केलिफोर्निया के एक वैज्ञानिक विक्टर निनोव ने नए सुपरहैवी तत्व 118 की खोज का दावा किया, जो सरासर झूठा सिद्ध हुआ।अब कुछ दशक पहले की अपेक्षा शोध वैज्ञानिकों की संख्या बहुत बढ़ गई है। उस हिसाब से सरकारी अनुदान भी बढ़ गया है। पहले के वैज्ञानिक केवल शोध का ध्यान रखते थे, उन्हें ग्रांट या धन की लालसा नहीं रहती थी। हमारे प्रफुल्ल चंद्र राय, जगदीश चंद्र बसु, सर सीवी रमन आदि ने बहुत कम धन में और समुचित प्रयोगशालाएं न होने पर भी महत्वपूर्ण शोध करके दिखाया और दुनिया में भारतीय विज्ञान का नाम ऊंचा किया। अब ऐसे वातावरण कहां है? आज विज्ञान पूरा प्रोफेशनल है, और वैज्ञानिक नाम कमाने और करियर बनाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाते हैं, जिसका अर्थ यह नहीं कि सभी वैज्ञानिक ऐसे हैं। अपवाद भी बहुत हैं।यह अच्छी बात है कि सबसे महत्वपूर्ण शोध कार्य का जल्दी पर्दाफाश हो जाता है। विज्ञान में दोहराव बहुत आते हैं, यानी बारबार शोध के प्रयोग करने पड़ते हैं। यह नहीं कि एक बार में ही सफलता मिल जाए। हर बड़े दावे को दोहरा कर दिखाना पड़ता है, जिनकी परीक्षा स्वतंत्र वैज्ञानिक करते हैं। यदि कोई सफल परिणाम दोबारा नहीं दिखाया जा सकता, तो वह असफल सिद्ध हो जाता है। अनेक झूठे प्रयोग इसी प्रकार पकड़े जाते हैं। जो जालसाजी पकड़ी जाती है, वह इस बात का प्रमाण है कि वैज्ञानिक विधि ही सफल होती है। फिर भी विज्ञान और देखरेख व जांच-पड़ताल की जरूरत है। अनेक झूठे दावे पकड़ में भी नहीं आते। इसलिए जो वैज्ञानिक ऊपर बैठे हैं, उन्हें नैतिकता से ही काम लेना पड़ेगा और अनैतिकता का पर्दाफाश करना होगा।जालसाजी के मामले भारत में भी हुए हैं। चंडीगढ़ के एक भू वैज्ञानिक ने हिमाचल के कुछ फॉसिल चट्टानें खोजने का दावा किया था, जो अमेरिका की सिद्ध हुई। लेकिन विज्ञान में जालसाजी पूरी तरह नहीं रूक सकती। यह भी जीवन के अन्य क्षेत्रों की तरह होती रहेगी। नाम कमाने और सबको पीछे छोड़कर आगे बढ़ने की लालसा हमेशा रहेगी, जिस पर नियंत्रण की सबसे ज्यादा जरूरत है। वैज्ञानिक शोध का काम बड़ा महत्वपूर्ण है और यह आसान भी नहीं है। आदमी की कमियां तो आड़े आती रहेंगी, जिनके विरूद्ध एक पूरा मोर्च स्थापित करना होगा। आखिर विज्ञान की साख कैसे बनी रहेगी?
www.rashtriyasahara.com से साभार
तुम पूछते हो कि मेरी कविताएं क्यों नहीं करतीं फूलों और पत्तियों की बातें मेरे साथ आओ और देखो सड़कों पर बहता हुआ लहू ...पाब्लो नेरुदा.
Friday, July 25, 2008
कैसे नियंत्रित होगी महंगाई
भारत डोगरा
महंगाई के बारे में सरकारी स्तर पर यह बार-बार कहा गया है कि यह विश्व बाजार में आई तेल व खाघ उत्पादों की कीमत में वृद्धि जैसे बाहरी मुद्दों से अधिक प्रभावित है। यह सच है कि तेल व खाघ उत्पादों की वृद्धि विश्व स्तर हुई है पर इसका अर्थ यह कतई नही है कि महंगाई व उसके दुष्परिणामों को नियंत्रित करना हमारे हाथ में नहीं है। सच्चाई तो यह है कि यदि खाघ ऊर्जा व्यापार व वित्त नीतियों में पहले से सुधार किए जाते तो महंगाई को काफी हद तक रोका जा सकता था। पर सरकार ने दीर्घकालीन अनुचित नीतियां अपनाई और वह काफी देर तक महंगाई के खतरे के प्रति उदासीन रही। इस वर्ष फरवरी में वार्षिक आर्थिक सर्वेक्षण प्रस्तुत करते समय तक महंगाई के खतरे के प्रति सरकार अनभिज्ञ बनी रही और उसने बहुत विश्वास से कहा कि महंगाई के तेज होने की संभावना नहीं है। ध्यान रहे कि इस समय तक विश्व में तेल व खाघ संकट की विकटता स्पष्ट हो चुकी थी। आज जब सरकार महंगाई के लिए बाहरी दबावों को जिम्मेदार बताती है तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि सरकार इस विषय पर समय पर सचेत क्यों नहीं हुई और उसने जरूरी कदम क्यों नहीं उठाए।महंगाई नियंत्रण को लेकर जिस कठिनाई की या जादू की छड़ी उपलब्ध न होने की बात जो कि प्राय: की जाती है, वह चर्चा केवल अल्पकालीन नीतियों के सन्दर्भ में होने के कारण है। यदि दीर्घकालीन नीतियां सही हैं तो ऐसी कठिनाई नहीं आएंगी क्योंकि बाहर से आने वाले किसी संकट का सामना करने के लिए भी हमारा रक्षा कवच तैयार होगा। हमारे देश ने जो दीर्घकालीन नीतियां सही दिशा में अपनाई हैं, उनका लाभ हमें आज भी मिलता है। हमने अनाज के बफर स्टाक रखने की नीति अपनाई, गोदामों में पर्याप्त अनाज रखा, सार्वजनिक वितरण प्रणाली का विस्तार देश भर में किया, सबसे गरीब परिवारों को विशेष तौर पर अधिक सस्ते अनाज के राशन कार्ड दिए। इन नीतियों का कुछ न कुछ लाभ आज भी मिलता है। यही कारण है कि आज हमारा खाघ संकट उतना विकट नहीं है और खाघ कीमतें उतनी नहीं बढ़ी हैं जितनी कि कई अन्य देशों में।पर दुख की बात यह है कि खाघ सुरक्षा की दिशा में हमारी तैयारी कभी पूरी नहीं हुई। एक मुख्य कमी यह रही है कि खाघ उत्पादन बढ़ाने के खर्चीले तौर-तरीके अपनाए गए। ये तकनीकें टिकाऊ नहीं थीं और इनके निरंतर अधिक महंगे होते जाने की संभावना थी। दूसरी कमी यह बनी रही कि खाघान्न उत्पादन बढ़ाने के प्रयास कुछ विशेष स्थानों पर केन्द्रित रहे। इस तरह एक आ॓र तो खाघान्न उत्पादन महंगा हुआ तथा दूसरी आ॓र इसे कुछ अधिक उत्पादन के स्थानों से देशभर में पहुंचाने का खर्चा बढ़ गया। इस तरह किसान को विशेष लाभ दिए बिना ही खाघान्न की कीमत महंगी होने लगी। पर सरकार ने अरबों रूपए की सब्सिडी देकर यह प्रयास किया कि खाघान्न की कीमत आम लोगों के लिए सहनीय रहे। इस प्रयास में भी तीन कारणों से छेद होने लगे। पहली समस्या तो यह थी कि सरकारी सब्सिडी पर आधारित सार्वजनिक वितरण प्रणाली में भ्रष्टाचार बहुत बढ़ गया और जो लाभ सरकार आम लोगों, विशेषकर सबसे गरीब परिवारों को देना चाहती थी उस लाभ को असरदार लोग हड़पने लगे। दूसरी कठिनाई यह आई कि सरकार पर सब्सिडी कम करने या एक सीमा से आगे न बढ़ने देने का दबाव भी पड़ने लगा। तीसरी समस्या यह हुई कि सरकार की अनुचित नीतियों के कारण अनाज की सरकारी खरीद कम होने लगी और निजी कंपनियों की खरीद बढ़ने लगी। अत: सरकारी गोदामों में अनाज कम होने लगा।हाल के समय में कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खेती में वर्चस्व बढ़ने से बीज, कीटनाशक दवाओं आदि पर खर्च और तेजी से बढ़ा। उधर तेल तथा गैस की कीमत विश्व बाजार में तेजी से बढ़ी तो इनसे उत्पादित रासायनिक खाद, पंपसेट व ट्रैक्टर के लिए जरूरी डीजल का खर्च भी बढ़ा। विश्व स्तर पर बहुत सी खाघ उत्पादन करने वाली भूमि का उपयोग बायोडीजल की फसलों के लिए होने लगा तथा तैयार खाघ फसलों को खाघ के रूप में बेचने के स्थान पर उन्हें बायोडीजल बनाने की फैक्ट्रियों में भेजा जाने लगा। इन मिले-जुले कारणों से अनेक खाघ उत्पादों के बाजार में जबरदस्त तेजी आई। जरूरत इस बात की थी कि सरकार खाघ उत्पादन बढ़ाने के लिए सस्ती व आत्मनिर्भर तकनीकों पर ध्यान केन्द्रित करती व उत्पादन बढ़ाने के प्रयासों को अधिक पिछड़े व गरीब क्षेत्रों में अधिक सशक्त करती। इस तरह एक आ॓र तो खाघ उत्पादन की लागत कम होती, साथ ही खाघ वितरण की लागत भी कम होती। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए अधिकांश अनाज स्थानीय स्तर पर ही उचित कीमत पर खरीदा जाता और उसे गरीब परिवारों तक पहुंचाने के कार्य को सरकार व सजग नागरिकों की निगरानी में किया जाता। वैसे तो पूरी सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार जरूरी है पर गरीबी की रेखा के नीचे के (बी।पी।एल।) व सबसे निर्धन (अंत्योदय) परिवारों के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली सुधारना और भी जरूरी है। अनाज की सरकारी खरीद और गोदामों में पर्याप्त भंडार रखने को उच्चतम प्राथमिकता दी जानी चाहिए थी ताकि उसमें कमी की कोई शिकायत उपलब्ध न हो। तिलहन व दलहन में देश को आत्मनिर्भर बनाना निश्चित तौर पर संभव है। इस पर पर्याप्त ध्यान देकर दालों व खाघ तेलों की कीमत वृद्धि को रोका जा सकता था। इस समय भी बहुत देर नहीं हुई है। यदि सरकार उचित प्राथमिकताओं को अपनाए तथा साथ ही मुनाफाखोरों-सट्टेबाजों जैसे तत्त्वों पर कड़ा नियंत्रण रखे तो देश के सभी लोगों के लिए उचित कीमत पर खाघ उपलब्ध करवाना संभव है।इसी तरह तेल के आयात पर अधिक निर्भरता को देखते हुए हमें तेल बचाने वाली नीतियों पर अधिक जोर देना चाहिए था। विकास का ऐसा माडल अपनाना चाहिए था जो तेल की कम खपत करे, उस पर कम आश्रित हो। फिलहाल जो स्थिति है उसके आधार पर तो यही स्वीकार करना होगा कि हम तेल के आयात पर बहुत निर्भर हैं और तेल की कीमतें बहुत तेजी से बढ़ रही हैं। अत: तेल की खपत को कम करने व वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोत विकसित करने पर हमें अधिक ध्यान देना चाहिए।महंगाई के बढ़ते दौर में इस आ॓र पहले से भी अधिक ध्यान देने की जरूरत है कि गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों तथा समाज के विभिन्न जरूरतमंद वर्गों को राहत देने वाली परियोजनाओं के क्रियान्वयन को बेहतर किया जाए, विशेषकर गांवों में रोजगार गारंटी योजना में भ्रष्टाचार दूर करने व इसे बेहतर बनाने पर विशेष ध्यान देना जरूरी है ताकि बढ़ती महंगाई के समय में गरीब लोग अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा कर सकें।
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महंगाई के बारे में सरकारी स्तर पर यह बार-बार कहा गया है कि यह विश्व बाजार में आई तेल व खाघ उत्पादों की कीमत में वृद्धि जैसे बाहरी मुद्दों से अधिक प्रभावित है। यह सच है कि तेल व खाघ उत्पादों की वृद्धि विश्व स्तर हुई है पर इसका अर्थ यह कतई नही है कि महंगाई व उसके दुष्परिणामों को नियंत्रित करना हमारे हाथ में नहीं है। सच्चाई तो यह है कि यदि खाघ ऊर्जा व्यापार व वित्त नीतियों में पहले से सुधार किए जाते तो महंगाई को काफी हद तक रोका जा सकता था। पर सरकार ने दीर्घकालीन अनुचित नीतियां अपनाई और वह काफी देर तक महंगाई के खतरे के प्रति उदासीन रही। इस वर्ष फरवरी में वार्षिक आर्थिक सर्वेक्षण प्रस्तुत करते समय तक महंगाई के खतरे के प्रति सरकार अनभिज्ञ बनी रही और उसने बहुत विश्वास से कहा कि महंगाई के तेज होने की संभावना नहीं है। ध्यान रहे कि इस समय तक विश्व में तेल व खाघ संकट की विकटता स्पष्ट हो चुकी थी। आज जब सरकार महंगाई के लिए बाहरी दबावों को जिम्मेदार बताती है तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि सरकार इस विषय पर समय पर सचेत क्यों नहीं हुई और उसने जरूरी कदम क्यों नहीं उठाए।महंगाई नियंत्रण को लेकर जिस कठिनाई की या जादू की छड़ी उपलब्ध न होने की बात जो कि प्राय: की जाती है, वह चर्चा केवल अल्पकालीन नीतियों के सन्दर्भ में होने के कारण है। यदि दीर्घकालीन नीतियां सही हैं तो ऐसी कठिनाई नहीं आएंगी क्योंकि बाहर से आने वाले किसी संकट का सामना करने के लिए भी हमारा रक्षा कवच तैयार होगा। हमारे देश ने जो दीर्घकालीन नीतियां सही दिशा में अपनाई हैं, उनका लाभ हमें आज भी मिलता है। हमने अनाज के बफर स्टाक रखने की नीति अपनाई, गोदामों में पर्याप्त अनाज रखा, सार्वजनिक वितरण प्रणाली का विस्तार देश भर में किया, सबसे गरीब परिवारों को विशेष तौर पर अधिक सस्ते अनाज के राशन कार्ड दिए। इन नीतियों का कुछ न कुछ लाभ आज भी मिलता है। यही कारण है कि आज हमारा खाघ संकट उतना विकट नहीं है और खाघ कीमतें उतनी नहीं बढ़ी हैं जितनी कि कई अन्य देशों में।पर दुख की बात यह है कि खाघ सुरक्षा की दिशा में हमारी तैयारी कभी पूरी नहीं हुई। एक मुख्य कमी यह रही है कि खाघ उत्पादन बढ़ाने के खर्चीले तौर-तरीके अपनाए गए। ये तकनीकें टिकाऊ नहीं थीं और इनके निरंतर अधिक महंगे होते जाने की संभावना थी। दूसरी कमी यह बनी रही कि खाघान्न उत्पादन बढ़ाने के प्रयास कुछ विशेष स्थानों पर केन्द्रित रहे। इस तरह एक आ॓र तो खाघान्न उत्पादन महंगा हुआ तथा दूसरी आ॓र इसे कुछ अधिक उत्पादन के स्थानों से देशभर में पहुंचाने का खर्चा बढ़ गया। इस तरह किसान को विशेष लाभ दिए बिना ही खाघान्न की कीमत महंगी होने लगी। पर सरकार ने अरबों रूपए की सब्सिडी देकर यह प्रयास किया कि खाघान्न की कीमत आम लोगों के लिए सहनीय रहे। इस प्रयास में भी तीन कारणों से छेद होने लगे। पहली समस्या तो यह थी कि सरकारी सब्सिडी पर आधारित सार्वजनिक वितरण प्रणाली में भ्रष्टाचार बहुत बढ़ गया और जो लाभ सरकार आम लोगों, विशेषकर सबसे गरीब परिवारों को देना चाहती थी उस लाभ को असरदार लोग हड़पने लगे। दूसरी कठिनाई यह आई कि सरकार पर सब्सिडी कम करने या एक सीमा से आगे न बढ़ने देने का दबाव भी पड़ने लगा। तीसरी समस्या यह हुई कि सरकार की अनुचित नीतियों के कारण अनाज की सरकारी खरीद कम होने लगी और निजी कंपनियों की खरीद बढ़ने लगी। अत: सरकारी गोदामों में अनाज कम होने लगा।हाल के समय में कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खेती में वर्चस्व बढ़ने से बीज, कीटनाशक दवाओं आदि पर खर्च और तेजी से बढ़ा। उधर तेल तथा गैस की कीमत विश्व बाजार में तेजी से बढ़ी तो इनसे उत्पादित रासायनिक खाद, पंपसेट व ट्रैक्टर के लिए जरूरी डीजल का खर्च भी बढ़ा। विश्व स्तर पर बहुत सी खाघ उत्पादन करने वाली भूमि का उपयोग बायोडीजल की फसलों के लिए होने लगा तथा तैयार खाघ फसलों को खाघ के रूप में बेचने के स्थान पर उन्हें बायोडीजल बनाने की फैक्ट्रियों में भेजा जाने लगा। इन मिले-जुले कारणों से अनेक खाघ उत्पादों के बाजार में जबरदस्त तेजी आई। जरूरत इस बात की थी कि सरकार खाघ उत्पादन बढ़ाने के लिए सस्ती व आत्मनिर्भर तकनीकों पर ध्यान केन्द्रित करती व उत्पादन बढ़ाने के प्रयासों को अधिक पिछड़े व गरीब क्षेत्रों में अधिक सशक्त करती। इस तरह एक आ॓र तो खाघ उत्पादन की लागत कम होती, साथ ही खाघ वितरण की लागत भी कम होती। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए अधिकांश अनाज स्थानीय स्तर पर ही उचित कीमत पर खरीदा जाता और उसे गरीब परिवारों तक पहुंचाने के कार्य को सरकार व सजग नागरिकों की निगरानी में किया जाता। वैसे तो पूरी सार्वजनिक वितरण प्रणाली में सुधार जरूरी है पर गरीबी की रेखा के नीचे के (बी।पी।एल।) व सबसे निर्धन (अंत्योदय) परिवारों के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली सुधारना और भी जरूरी है। अनाज की सरकारी खरीद और गोदामों में पर्याप्त भंडार रखने को उच्चतम प्राथमिकता दी जानी चाहिए थी ताकि उसमें कमी की कोई शिकायत उपलब्ध न हो। तिलहन व दलहन में देश को आत्मनिर्भर बनाना निश्चित तौर पर संभव है। इस पर पर्याप्त ध्यान देकर दालों व खाघ तेलों की कीमत वृद्धि को रोका जा सकता था। इस समय भी बहुत देर नहीं हुई है। यदि सरकार उचित प्राथमिकताओं को अपनाए तथा साथ ही मुनाफाखोरों-सट्टेबाजों जैसे तत्त्वों पर कड़ा नियंत्रण रखे तो देश के सभी लोगों के लिए उचित कीमत पर खाघ उपलब्ध करवाना संभव है।इसी तरह तेल के आयात पर अधिक निर्भरता को देखते हुए हमें तेल बचाने वाली नीतियों पर अधिक जोर देना चाहिए था। विकास का ऐसा माडल अपनाना चाहिए था जो तेल की कम खपत करे, उस पर कम आश्रित हो। फिलहाल जो स्थिति है उसके आधार पर तो यही स्वीकार करना होगा कि हम तेल के आयात पर बहुत निर्भर हैं और तेल की कीमतें बहुत तेजी से बढ़ रही हैं। अत: तेल की खपत को कम करने व वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोत विकसित करने पर हमें अधिक ध्यान देना चाहिए।महंगाई के बढ़ते दौर में इस आ॓र पहले से भी अधिक ध्यान देने की जरूरत है कि गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों तथा समाज के विभिन्न जरूरतमंद वर्गों को राहत देने वाली परियोजनाओं के क्रियान्वयन को बेहतर किया जाए, विशेषकर गांवों में रोजगार गारंटी योजना में भ्रष्टाचार दूर करने व इसे बेहतर बनाने पर विशेष ध्यान देना जरूरी है ताकि बढ़ती महंगाई के समय में गरीब लोग अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा कर सकें।
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सामाजिक नियंत्रण के गैरपारंपरिक नुस्खे
सुभाष गाताडे
क्या आप ऐसे दृश्य की कल्पना कर सकते हैं कि मुल्क का मशहूर मजदूर नेता फैक्टरी गेट पर हड़ताली मजदूरों के हक में भाषण दे रहा है और अचानक बेहोश होकर गिरता है? इतना ही नहीं, नेता को सुनने एकत्रित भीड़ में से कई लोग उसी वक्त अपनी जगह पर खड़े-खड़े धड़ाम से गिर जाते हैं? अंदाजा लगाया जा सकता है कि आभासी लगनेवाला यह दृश्य अगर हकीकत में बदल जाए तो किस किस्म की भगदड़ मच सकती है और जीत के करीब पहुंची लड़ाई कभी अचानक हार में बदल सकती है।वैसे इन दिनों अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन में सामाजिक नियंत्रण के जिन गैरपारंपरिक और गैरप्राणघातक हथियारों पर जोरशोर से काम हो रहा है, उसे देखते हुए आनेवाले कुछ दिनों में ऐसी संभावना से हम रू-ब-रू भी हो सकते हैं। विज्ञान पर चर्चित पत्रिका ‘न्यू साइंटिस्ट’ के कुछ समय पहले प्रकाशित अंक में ऐसे हथियारों की चर्चा थी (3 जुलाई, 2008)। इसके मुताबिक, पूंजीपति उघमियों का एक हिस्सा इन दिनों एक ऐसी माइक्रोवेव किरण गन तैयार करने में जुटा है, जो सीधे लोगों के सिर में आवाज पहुंचा देगी। इस उत्पाद को अमेरिका सेना द्वारा ‘युद्ध के अलावा अन्य कामों में’ भीड़ नियंत्रण हेतु इस्तेमाल किया जाएगा। इसमें माइक्रोवेव ऑडिआ॓ इफेक्ट का इस्तेमाल होता है, जिसमें छोटे माइक्रोवेव लहरें/पल्सेस तेजी से टिशू को गर्म करते हैं और सिर में एक शॉकवेव पैदा करते हैं। पेंटागन प्रसन्न है कि इस किरण को इलेक्ट्रॉनिक पद्धति से संचालित किया जाता है जो एक साथ कई निशानों तक पहुंच सकती है!साफ है कि इस माइक्रोवेव गन से किरणें फेंकी जाएगी तो पता चला, भाषण देते–देते मजदूर नेता वहीं बेहोश होकर गिर गया और उसके इर्दगिर्द खड़े मजदूर इसी तरह धराशायी हुए। इस बात के मद्देनजर रखते हुए कि ऐसी गन का विरोध होगा और उसे मानवाधिकारों का हनन बताया जाएगा, इसे स्वीकार्य बनाने की कवायद भी चल रही है। यह कहा जा रहा है कि इसके गैरसैनिक उपयोग भी हो सकते हैं, जैसे कहीं टिड्डी दल का हमला हो जाए तो ऐसे कीड़ों को भगाया जा सकता है। इतना ही नहीं, यह बात भी रेखांकित की जा रही है कि ऐसी तकनीक से उन लोगों को लाभ हो सकता है जिनकी सुनने की क्षमता ठीक नहीं है। पेंटागन में इसके लिए एक महकमा तैयार किया गया है, जो इस दिशा में नए–नए उपकरणों/हथियारों की खोज में जुटा है। इसका नाम है ‘ज्वाइंट नान–लेथल वेपन्स डायरेक्टोरेट’ अर्थात ‘गैरप्राणघातक हथियार निदेशालय’। यहां विकसित किए जा रहे अकोस्टिक माइक्रोवेव हथियार, लेसर चालित प्लाज्मा चैनल्स या वोर्टेक्स रिंग गंस जैसे उपकरणों से लोगों को बोध हो सकता है कि ये किसी विज्ञान कथा के हिस्से तो नहीं हैं। एक तरह से कहें, तो यहां सबसे महत्वपूर्ण काम रेथोन्स एक्टिव डिनॉयल सिस्टम पर हो रहा है जो एक तरह का संदेश ऊर्जा हथियार है जिसे भीड़ को काबू करने में हो सकता है। इसके इस्तेमाल के बारे में मशहूर है कि यह मनुष्य की त्वचा को 130 डिग्री फारेनहाइट तक गर्मा देती है। देख सकते हैं कि माइक्रोवेव किरण गन इसी का बहुत सुधरा रूप है। अमन पसंद वैज्ञानिकों में इन गैरपारंपरिक हथियारों को लेकर जागरूकता बढ़ रही है। चर्चित विश्लेषक टॉम बुर्गहार्ड के मुताबिक ‘यह नया फासीवाद जैव निर्धारणवादी विचारधारा और अग्रगामी तकनीकी साधनों का इस्तेमाल करते हुए शरीर पर हमला करता है।’ इन गैरपारम्परिक हथियारों के आविष्कार के जरिए अमेरिकी सैन्यवाद मानवाधिकार उल्लंघन की ऊंचाइयों पर पहुंच रहा है। अब लोगों को ‘शांत’ करने की अपनी योजनाओं के तहत सीधे मानवीय शरीर और मन की सीमाओं का उल्लंघन कर रहा है। इस नयी किस्म की ‘युद्धभूमि’ पर अपना वर्चस्व कायम करने में अकादमिक जगत न केवल केन्द्रीय भूमिका निभा रहे हैं। दमन के खास मकसद के लिए पेशेवर वैज्ञानिकों की विशष्टि सेवाएं ली जा रही हैं। ‘गैरप्राणघातक’ हथियारों के निर्माण के काम को सरकारों या निजी कॉरपोरेट प्रतिष्ठानोें की तरफ से धड़ल्ले से आगे बढ़ाया रहा है, जिसमें अग्रणी शिक्षा संस्थान जुड़े हैं। अपनी चर्चित किताब ‘द कॉम्प्लेक्स’ में निक टर्स नामक अनुसंधानकर्ता बताते हैं कि किस तरह दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिकी अकादमिक जगत अनुसंधान एवं विकास की परियोजनाओं के लिए पेंटागन के पैसे पर निर्भर रहने लगा है, जिसके अंदर ‘उच्च शिक्षा के परिदृश्य को बदलने, रिसर्च एजेंडे को प्रभावित करने, पाठ्यक्रमों की अन्तर्वस्तु बदलने’ की क्षमता दिखती है। इसी के अंतर्गत एमआईटी जैसे विश्वविख्यात संस्थान द्वारा स्थापित अपनी रिसर्च इंस्टीट्यूट ‘द मितर कॉरपोरेशन को 88 करोड़ डॉलर का अनुदान मिला!
www.rashtriyasahara.com से साभार
क्या आप ऐसे दृश्य की कल्पना कर सकते हैं कि मुल्क का मशहूर मजदूर नेता फैक्टरी गेट पर हड़ताली मजदूरों के हक में भाषण दे रहा है और अचानक बेहोश होकर गिरता है? इतना ही नहीं, नेता को सुनने एकत्रित भीड़ में से कई लोग उसी वक्त अपनी जगह पर खड़े-खड़े धड़ाम से गिर जाते हैं? अंदाजा लगाया जा सकता है कि आभासी लगनेवाला यह दृश्य अगर हकीकत में बदल जाए तो किस किस्म की भगदड़ मच सकती है और जीत के करीब पहुंची लड़ाई कभी अचानक हार में बदल सकती है।वैसे इन दिनों अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन में सामाजिक नियंत्रण के जिन गैरपारंपरिक और गैरप्राणघातक हथियारों पर जोरशोर से काम हो रहा है, उसे देखते हुए आनेवाले कुछ दिनों में ऐसी संभावना से हम रू-ब-रू भी हो सकते हैं। विज्ञान पर चर्चित पत्रिका ‘न्यू साइंटिस्ट’ के कुछ समय पहले प्रकाशित अंक में ऐसे हथियारों की चर्चा थी (3 जुलाई, 2008)। इसके मुताबिक, पूंजीपति उघमियों का एक हिस्सा इन दिनों एक ऐसी माइक्रोवेव किरण गन तैयार करने में जुटा है, जो सीधे लोगों के सिर में आवाज पहुंचा देगी। इस उत्पाद को अमेरिका सेना द्वारा ‘युद्ध के अलावा अन्य कामों में’ भीड़ नियंत्रण हेतु इस्तेमाल किया जाएगा। इसमें माइक्रोवेव ऑडिआ॓ इफेक्ट का इस्तेमाल होता है, जिसमें छोटे माइक्रोवेव लहरें/पल्सेस तेजी से टिशू को गर्म करते हैं और सिर में एक शॉकवेव पैदा करते हैं। पेंटागन प्रसन्न है कि इस किरण को इलेक्ट्रॉनिक पद्धति से संचालित किया जाता है जो एक साथ कई निशानों तक पहुंच सकती है!साफ है कि इस माइक्रोवेव गन से किरणें फेंकी जाएगी तो पता चला, भाषण देते–देते मजदूर नेता वहीं बेहोश होकर गिर गया और उसके इर्दगिर्द खड़े मजदूर इसी तरह धराशायी हुए। इस बात के मद्देनजर रखते हुए कि ऐसी गन का विरोध होगा और उसे मानवाधिकारों का हनन बताया जाएगा, इसे स्वीकार्य बनाने की कवायद भी चल रही है। यह कहा जा रहा है कि इसके गैरसैनिक उपयोग भी हो सकते हैं, जैसे कहीं टिड्डी दल का हमला हो जाए तो ऐसे कीड़ों को भगाया जा सकता है। इतना ही नहीं, यह बात भी रेखांकित की जा रही है कि ऐसी तकनीक से उन लोगों को लाभ हो सकता है जिनकी सुनने की क्षमता ठीक नहीं है। पेंटागन में इसके लिए एक महकमा तैयार किया गया है, जो इस दिशा में नए–नए उपकरणों/हथियारों की खोज में जुटा है। इसका नाम है ‘ज्वाइंट नान–लेथल वेपन्स डायरेक्टोरेट’ अर्थात ‘गैरप्राणघातक हथियार निदेशालय’। यहां विकसित किए जा रहे अकोस्टिक माइक्रोवेव हथियार, लेसर चालित प्लाज्मा चैनल्स या वोर्टेक्स रिंग गंस जैसे उपकरणों से लोगों को बोध हो सकता है कि ये किसी विज्ञान कथा के हिस्से तो नहीं हैं। एक तरह से कहें, तो यहां सबसे महत्वपूर्ण काम रेथोन्स एक्टिव डिनॉयल सिस्टम पर हो रहा है जो एक तरह का संदेश ऊर्जा हथियार है जिसे भीड़ को काबू करने में हो सकता है। इसके इस्तेमाल के बारे में मशहूर है कि यह मनुष्य की त्वचा को 130 डिग्री फारेनहाइट तक गर्मा देती है। देख सकते हैं कि माइक्रोवेव किरण गन इसी का बहुत सुधरा रूप है। अमन पसंद वैज्ञानिकों में इन गैरपारंपरिक हथियारों को लेकर जागरूकता बढ़ रही है। चर्चित विश्लेषक टॉम बुर्गहार्ड के मुताबिक ‘यह नया फासीवाद जैव निर्धारणवादी विचारधारा और अग्रगामी तकनीकी साधनों का इस्तेमाल करते हुए शरीर पर हमला करता है।’ इन गैरपारम्परिक हथियारों के आविष्कार के जरिए अमेरिकी सैन्यवाद मानवाधिकार उल्लंघन की ऊंचाइयों पर पहुंच रहा है। अब लोगों को ‘शांत’ करने की अपनी योजनाओं के तहत सीधे मानवीय शरीर और मन की सीमाओं का उल्लंघन कर रहा है। इस नयी किस्म की ‘युद्धभूमि’ पर अपना वर्चस्व कायम करने में अकादमिक जगत न केवल केन्द्रीय भूमिका निभा रहे हैं। दमन के खास मकसद के लिए पेशेवर वैज्ञानिकों की विशष्टि सेवाएं ली जा रही हैं। ‘गैरप्राणघातक’ हथियारों के निर्माण के काम को सरकारों या निजी कॉरपोरेट प्रतिष्ठानोें की तरफ से धड़ल्ले से आगे बढ़ाया रहा है, जिसमें अग्रणी शिक्षा संस्थान जुड़े हैं। अपनी चर्चित किताब ‘द कॉम्प्लेक्स’ में निक टर्स नामक अनुसंधानकर्ता बताते हैं कि किस तरह दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिकी अकादमिक जगत अनुसंधान एवं विकास की परियोजनाओं के लिए पेंटागन के पैसे पर निर्भर रहने लगा है, जिसके अंदर ‘उच्च शिक्षा के परिदृश्य को बदलने, रिसर्च एजेंडे को प्रभावित करने, पाठ्यक्रमों की अन्तर्वस्तु बदलने’ की क्षमता दिखती है। इसी के अंतर्गत एमआईटी जैसे विश्वविख्यात संस्थान द्वारा स्थापित अपनी रिसर्च इंस्टीट्यूट ‘द मितर कॉरपोरेशन को 88 करोड़ डॉलर का अनुदान मिला!
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स्पीकर का लोभ या पार्टी की तानाशाही
राजकिशोर
लोकसभा की कार्यवाही और सांसदों के आचरण के स्तर पर आई भयावह गिरावट की चर्चा बहुत हो रही है, लेकिन स्पीकर सोमनाथ चटर्जी के व्यवहार पर सार्वजनिक चर्चा बहुत कम देखने में आई। ऐसा मान लिया गया था कि यह स्पीकर और उनकी पार्टी सीपीएम के बीच का मामला है। लेकिन अब जबकि सोमनाथ को पार्टी से निकाल दिया गया है, यह मामला निश्चय ही विवादास्पद बन गया है। कुछ लोगों को पार्टी के इस निर्णय में तानाशाही की बू आ रही है, तो कुछ स्पीकर की मनमानी को पचा नहीं पा रहे हैं। हमारी लोकसभा के छोटे-से इतिहास में यह अपने ढंग की पहली घटना है। इसलिए इस पर संजीदगी से विचार होना चाहिए, ताकि स्पीकर पद की कुछ मर्यादाएं निश्चित हो सकें। अराजकता के वर्तमान माहौल में कोई ऐसा बिन्दु नहीं छोड़ना चाहिए, जहां अराजकता को पनपने का अवसर मिल सके - यह अराजकता स्वयं स्पीकर की हो या उसकी पार्टी की। कायदे से स्पीकर ही सदन का नेता होता है। दिलचस्प है कि लोकसभा के अध्यक्ष को ‘स्पीकर’ कहा जाता है, पर वह सिवाय सदन को संचालित करने के अपनी आ॓र से कुछ भी ‘स्पीक’ नहीं करता। जब इंग्लैंड की संसद का, जिसे दुनिया की सभी ‘संसदों की मां’ कहा जाता है, विकास हो रहा था, उस समय संसदीय शासन नहीं था। संसद थी, पर विचार-विमर्श के लिए। वह न कानून बना सकती थी, न यह तय कर सकती थी कि सरकार की नीतियां क्या होंगी। यह सारा काम सम्राट ही करता था। उन दिनों स्पीकर ही सदन की आ॓र से सदन का प्रतिवेदन सम्राट के सामने रखता था। इस तरह वास्तविक जगह पर बोलने वाला सांसद स्पीकर ही था। जैसे-जैसे शासन की संसदीय प्रणाली का विकास होने लगा, स्पीकर की भूमिका कम होती गई। अब उसका रोल सिर्फ इतना रह गया है कि वह सदन की कार्यवाही का संचालन करे तथा उसकी मर्यादाओं की रक्षा करे।संसदीय प्रणाली दलों के आधार पर चलती है। बहुत-से सांसद स्वतंत्र और निर्दलीय भी होते हैं। जिस व्य‡ि को स्पीकर की भूमिका निभानी है, उसे लोकसभा का सदस्य तो होना ही चाहिए। कायदे से किसी निर्दलीय को स्पीकर बनाया जाए, तो सबसे अच्छा हो। लेकिन ऐसा हो नहीं पाता है, क्योंकि सभी सत्ताारूढ़ दल या गठबंधन चाहते हैं कि स्पीकर उनका अपना प्रतिनिधि हो। इसलिए कि स्पीकर अपने दल या गठबंधन का हुआ, तो संसदीय कामकाज संपन्न करने में सरकार को आसानी होती है। हमारे देश में स्पीकर को एक और महत्वपूर्ण काम दिया गया है-- दलबदल विरोधी कानून के प्रावधानों के तहत यह निर्णय करने का कि दलबदल हुआ कि नहीं और हुआ, तो दलबदल करने वाले की संसदीय सदस्यता को रद्द करना। इसलिए भी स्पीकर का राजनीतिक मूल्य बढ़ गया है। हम जानते हैं कि हमारे अनेक स्पीकरों ने दलबदल के मामले में पक्षपातपूर्ण फैसले किए हैं और अपने से संबंधित दलों को फायदा पहुंचाया है। इसके बावजूद माना यही जाता है कि किसी खास दल का सदस्य होने के बावजूद जब कोई सांसद स्पीकर चुन लिया जाता है, तो वह वास्तव में दलविहीन हो जाता है। दलविहीन हो जाने से उसके हितों को क्षति न पहुंचे, इसलिए कई देशों में परंपरा है कि स्पीकर की सीट पर कोई भी दल अपना उम्मीदवार खड़ा नहीं करता, ताकि वह दुबारा र्नििववाद चुना जा सके। हमारे देश में ऐसी कोई परंपरा नहीं बन पाई है। इसलिए यह श्य भी देखने में आता है कि स्पीकर का पद संभाल चुकने के बाद भी कोई सांसद बाद में मंत्रिमंडल का सदस्य हो जाता है या कहीं का राज्यपाल बना दिया जाता है। वर्तमान गृह मंत्री शिवराज पाटिल लोकसभा के स्पीकर रह चुके हैं। सोमनाथ चटर्जी एक आदर्श स्पीकर साबित हुए हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है। ‘लोकसभा’ चैनल शुरू कर उन्होंने निश्चय ही एक खास काम किया है, लेकिन वह स्पीकर चुने जाते समय सीपीएम के सदस्य थे। स्पीकर बनने के बाद उन्होंने अपनी पार्टी से इस्तीफा नहीं दिया। इसलिए सीपीएम के शीर्ष नेताओं ने राष्ट्रपति को अपने सांसदों की सूची देते समय सोमनाथ चटर्जी का नाम भी जोड़ लिया, तो तकनीकी तौर पर वे गलत नहीं थे। बेशक, वह भूल गए कि सोमनाथ चटर्जी सिर्फ सीपीएम के सांसद नहीं हैं, बल्कि लोकसभा के अध्यक्ष भी है। यह कोई मामूली भूल नहीं थी। इससे पता चलता है कि पार्टी में न्यूनतम संवेदनशीलता भी नहीं बची है। चूंकि स्पीकर को निर्दलीय माना जाता है, इसलिए पार्टी पॉलिटिक्स में खींचने के पहले उनसे संवाद तो करना ही चाहिए था और उनकी सहमति के बिना उनका नाम सूची में शामिल नहीं करना चाहिए था। यह दुख की बात है कि सीपीएम नेतृत्व ने अपनी इस त्रुटि के लिए सोमनाथ चटर्जी और लोकसभा से माफी भी नहीं मांगी, न ही किसी प्रकार का खेद ही व्यक्त किया। सिक्के का दूसरा पहलू भी है। सोमनाथ चटर्जी के इस ष्टिकोण की भी प्रशंसा नहीं की जा सकती कि सीपीएम के प्रति मेरी कोई प्रतिबद्धता नहीं है और यह फैसला मुझे करना है कि स्पीकर पद से इस्तीफा देना है या नहीं। स्पीकर को फूंक-फूंक कर कदम रखना चाहिए-- खासतौर से पतनशीलता के इस दौर में। जब उनकी पार्टी ने फैसला कर लिया कि उन्हें परमाणु करार के विरोध में स्पीकर के पद से इस्तीफा दे देना चाहिए, तो उनके लिए विचार-पुर्निवचार की कोई बात ही नहीं बचती। संसद के प्रति वफादारी और पार्टी के प्रति वफादारी में विरोधाभास नहीं होना चाहिए। सोमनाथ चटर्जी भी कम्युनिस्ट हैं। उनकी विचारधारा वही है, जो सीपीएम की विचारधारा है। इसलिए यह कैसे हो सकता है कि जब पार्टी परमाणु करार के मुद्दे पर यूपीए सरकार से समर्थन वापस लेने जैसा कठोर कदम उठा चुकी हो, तब सोमनाथ चटर्जी जैसे वरिष्ठ मार्क्सवादी नेता का अंत:करण अविचलित रहे और वे निष्पक्षता के आवरण में अपने विचार से संसद को और देश को वंचित रखें? उन्हें अपनी पार्टी के निर्णय को शिरोधार्य कर लोकसभा अध्यक्ष के पद से तत्काल इस्तीफा दे देना चाहिए था और इस प्रकार वे अन्य सांसदों से जिस प्रतिबद्धता, मर्यादा, अनुशासन और शील की अपेक्षा करते हैं, उसका एक उदाहरण अपने निजी आचरण से प्रस्तुत करना चाहिए था।
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लोकसभा की कार्यवाही और सांसदों के आचरण के स्तर पर आई भयावह गिरावट की चर्चा बहुत हो रही है, लेकिन स्पीकर सोमनाथ चटर्जी के व्यवहार पर सार्वजनिक चर्चा बहुत कम देखने में आई। ऐसा मान लिया गया था कि यह स्पीकर और उनकी पार्टी सीपीएम के बीच का मामला है। लेकिन अब जबकि सोमनाथ को पार्टी से निकाल दिया गया है, यह मामला निश्चय ही विवादास्पद बन गया है। कुछ लोगों को पार्टी के इस निर्णय में तानाशाही की बू आ रही है, तो कुछ स्पीकर की मनमानी को पचा नहीं पा रहे हैं। हमारी लोकसभा के छोटे-से इतिहास में यह अपने ढंग की पहली घटना है। इसलिए इस पर संजीदगी से विचार होना चाहिए, ताकि स्पीकर पद की कुछ मर्यादाएं निश्चित हो सकें। अराजकता के वर्तमान माहौल में कोई ऐसा बिन्दु नहीं छोड़ना चाहिए, जहां अराजकता को पनपने का अवसर मिल सके - यह अराजकता स्वयं स्पीकर की हो या उसकी पार्टी की। कायदे से स्पीकर ही सदन का नेता होता है। दिलचस्प है कि लोकसभा के अध्यक्ष को ‘स्पीकर’ कहा जाता है, पर वह सिवाय सदन को संचालित करने के अपनी आ॓र से कुछ भी ‘स्पीक’ नहीं करता। जब इंग्लैंड की संसद का, जिसे दुनिया की सभी ‘संसदों की मां’ कहा जाता है, विकास हो रहा था, उस समय संसदीय शासन नहीं था। संसद थी, पर विचार-विमर्श के लिए। वह न कानून बना सकती थी, न यह तय कर सकती थी कि सरकार की नीतियां क्या होंगी। यह सारा काम सम्राट ही करता था। उन दिनों स्पीकर ही सदन की आ॓र से सदन का प्रतिवेदन सम्राट के सामने रखता था। इस तरह वास्तविक जगह पर बोलने वाला सांसद स्पीकर ही था। जैसे-जैसे शासन की संसदीय प्रणाली का विकास होने लगा, स्पीकर की भूमिका कम होती गई। अब उसका रोल सिर्फ इतना रह गया है कि वह सदन की कार्यवाही का संचालन करे तथा उसकी मर्यादाओं की रक्षा करे।संसदीय प्रणाली दलों के आधार पर चलती है। बहुत-से सांसद स्वतंत्र और निर्दलीय भी होते हैं। जिस व्य‡ि को स्पीकर की भूमिका निभानी है, उसे लोकसभा का सदस्य तो होना ही चाहिए। कायदे से किसी निर्दलीय को स्पीकर बनाया जाए, तो सबसे अच्छा हो। लेकिन ऐसा हो नहीं पाता है, क्योंकि सभी सत्ताारूढ़ दल या गठबंधन चाहते हैं कि स्पीकर उनका अपना प्रतिनिधि हो। इसलिए कि स्पीकर अपने दल या गठबंधन का हुआ, तो संसदीय कामकाज संपन्न करने में सरकार को आसानी होती है। हमारे देश में स्पीकर को एक और महत्वपूर्ण काम दिया गया है-- दलबदल विरोधी कानून के प्रावधानों के तहत यह निर्णय करने का कि दलबदल हुआ कि नहीं और हुआ, तो दलबदल करने वाले की संसदीय सदस्यता को रद्द करना। इसलिए भी स्पीकर का राजनीतिक मूल्य बढ़ गया है। हम जानते हैं कि हमारे अनेक स्पीकरों ने दलबदल के मामले में पक्षपातपूर्ण फैसले किए हैं और अपने से संबंधित दलों को फायदा पहुंचाया है। इसके बावजूद माना यही जाता है कि किसी खास दल का सदस्य होने के बावजूद जब कोई सांसद स्पीकर चुन लिया जाता है, तो वह वास्तव में दलविहीन हो जाता है। दलविहीन हो जाने से उसके हितों को क्षति न पहुंचे, इसलिए कई देशों में परंपरा है कि स्पीकर की सीट पर कोई भी दल अपना उम्मीदवार खड़ा नहीं करता, ताकि वह दुबारा र्नििववाद चुना जा सके। हमारे देश में ऐसी कोई परंपरा नहीं बन पाई है। इसलिए यह श्य भी देखने में आता है कि स्पीकर का पद संभाल चुकने के बाद भी कोई सांसद बाद में मंत्रिमंडल का सदस्य हो जाता है या कहीं का राज्यपाल बना दिया जाता है। वर्तमान गृह मंत्री शिवराज पाटिल लोकसभा के स्पीकर रह चुके हैं। सोमनाथ चटर्जी एक आदर्श स्पीकर साबित हुए हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है। ‘लोकसभा’ चैनल शुरू कर उन्होंने निश्चय ही एक खास काम किया है, लेकिन वह स्पीकर चुने जाते समय सीपीएम के सदस्य थे। स्पीकर बनने के बाद उन्होंने अपनी पार्टी से इस्तीफा नहीं दिया। इसलिए सीपीएम के शीर्ष नेताओं ने राष्ट्रपति को अपने सांसदों की सूची देते समय सोमनाथ चटर्जी का नाम भी जोड़ लिया, तो तकनीकी तौर पर वे गलत नहीं थे। बेशक, वह भूल गए कि सोमनाथ चटर्जी सिर्फ सीपीएम के सांसद नहीं हैं, बल्कि लोकसभा के अध्यक्ष भी है। यह कोई मामूली भूल नहीं थी। इससे पता चलता है कि पार्टी में न्यूनतम संवेदनशीलता भी नहीं बची है। चूंकि स्पीकर को निर्दलीय माना जाता है, इसलिए पार्टी पॉलिटिक्स में खींचने के पहले उनसे संवाद तो करना ही चाहिए था और उनकी सहमति के बिना उनका नाम सूची में शामिल नहीं करना चाहिए था। यह दुख की बात है कि सीपीएम नेतृत्व ने अपनी इस त्रुटि के लिए सोमनाथ चटर्जी और लोकसभा से माफी भी नहीं मांगी, न ही किसी प्रकार का खेद ही व्यक्त किया। सिक्के का दूसरा पहलू भी है। सोमनाथ चटर्जी के इस ष्टिकोण की भी प्रशंसा नहीं की जा सकती कि सीपीएम के प्रति मेरी कोई प्रतिबद्धता नहीं है और यह फैसला मुझे करना है कि स्पीकर पद से इस्तीफा देना है या नहीं। स्पीकर को फूंक-फूंक कर कदम रखना चाहिए-- खासतौर से पतनशीलता के इस दौर में। जब उनकी पार्टी ने फैसला कर लिया कि उन्हें परमाणु करार के विरोध में स्पीकर के पद से इस्तीफा दे देना चाहिए, तो उनके लिए विचार-पुर्निवचार की कोई बात ही नहीं बचती। संसद के प्रति वफादारी और पार्टी के प्रति वफादारी में विरोधाभास नहीं होना चाहिए। सोमनाथ चटर्जी भी कम्युनिस्ट हैं। उनकी विचारधारा वही है, जो सीपीएम की विचारधारा है। इसलिए यह कैसे हो सकता है कि जब पार्टी परमाणु करार के मुद्दे पर यूपीए सरकार से समर्थन वापस लेने जैसा कठोर कदम उठा चुकी हो, तब सोमनाथ चटर्जी जैसे वरिष्ठ मार्क्सवादी नेता का अंत:करण अविचलित रहे और वे निष्पक्षता के आवरण में अपने विचार से संसद को और देश को वंचित रखें? उन्हें अपनी पार्टी के निर्णय को शिरोधार्य कर लोकसभा अध्यक्ष के पद से तत्काल इस्तीफा दे देना चाहिए था और इस प्रकार वे अन्य सांसदों से जिस प्रतिबद्धता, मर्यादा, अनुशासन और शील की अपेक्षा करते हैं, उसका एक उदाहरण अपने निजी आचरण से प्रस्तुत करना चाहिए था।
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Tuesday, July 22, 2008
ग्लोबल वार्मिंग के लिए कार्बन तत्व कितने जिम्मेदार
भगवती प्रसाद डोभाल
हाल ही में पश्चिमी देशों ने एक स्वर से भारत और चीन को मौसम परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग का मुख्य कारण माना है, लेकिन इसके ठीक विपरीत रूसी वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन के कुछ और ही कारण मानते हैं। वे कार्बन डायऑक्साइड को किसी भी रूप में ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार नहीं मानते हैं। क्यूटो संधि में धरती की तपन का कारण कार्बन डायआक्साइड उर्त्सजन ही माना गया। लेकिन रूसी वैज्ञानिकों का मानना है कि बिना वैज्ञानिक तथ्यों का परीक्षण किये कार्बन को इसके लिए दोष देना उचित नहीं है। रूसी वैज्ञानिक आंद्रे कापिस्ता कहते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से कार्बन डाइआक्साइड वातावरण में है न कि कार्बन डाइआक्साइड की वजह से ग्लोबल वार्मिंग।
रूसी अनुसंधानवेत्ता अपने इस परिणाम पर तब पहुंचे, जब वे अंटाकर्टिका में साढ़े तीन किलो मीटर बर्फ के अंदर गहराई में विभिन्न पर्तों के नमूने इकठ्ठा कर रहे थे। प्राचीन काल में बर्फ गिरते और जमते समय हवा के बुलबुले ग्लेशियर के भीतर कैद हो गये थे, जो उस काल के पृथ्वी के वातावरण की सही जानकारी देते हैं। इन बुलबुलों के अध्ययन से बहुत सारी जानकारियां सामने आई हैं। यह अध्ययन धरती के पिछले चालीस हजार वर्षों की वातावरण की पूरी जानकारी देता है। इसमें उन्होंने पाया कि वातावरण में कार्बन की मात्रा समय-समय पर भिन्न-भिन्न रही है। पूरे इतिहास में पांच सौ से छह सौ वर्षों के बाद वातावरण गर्म होने पर कार्बन डाइआक्साइड की मात्रा बढ़ी है। इसलिए वे मानते हैं कि ग्रीन हाउस गैसों की वातावरण में सांद्रता ही मुख्य कारण है ग्लोबल वार्मिंग का।वे यह भी मानते हैं कि ग्रीन हाउस प्रभाव का मुख्य कारण पानी का वाष्पन ही है जो वातावरण में कार्बन डाइआक्साइड से दस गुणा अधिक है। यदि धरती से पूरी कार्बन डाइआक्साइड हटा दी जाए, तब भी धरती का तापमान इतना गिर नहीं सकता कि धरती ठंडी हो जाए। इस बात पर भैतिकविज्ञानी ब्लादिमिर बाशकृतसेव का विशेष मत है। रूसी विज्ञान संस्थान के आ॓लेग सोरोख्तिन, जो सागर विशेषज्ञ हैं के साथ–साथ अन्य वैज्ञानिकों का भी मानना है कि पृथ्वी का मौसम परिवर्तन एक प्राकृतिक कारण है। जैसे सौर गतिविधि, पृथ्वी के अक्ष में हलचल, सागर की तरंगों में बदलाव, समुद्र की सतह पर नमक के पानी की विरलता और सघनता का होना। ऐसे बहुत से कारण हैं ग्लोबल वार्मिंग के। औघोगिक उर्त्सजन इस स्थिति में मौसम परिवर्तन पर कोई विशेष प्रभाव नहीं डालता। पृथ्वी पर कार्बन डाइआक्साइड की मात्रा का बढ़ना पृथ्वी में जीवन के लिए अच्छा है। डा। सोरोख्तिन तर्क देते हैं कि इससे फसलों की पैदावार अच्छी होती है और वनों की वृद्धि भी तेजी से होती है।
इतिहास में बहुत समय ऐसा भी रहा जब कार्बन डाइआक्साइड की मत्रा पृथ्वी पर आज से लाखों गुणा अधिक रही, और जीवन का विकास सफलतापूर्वक चलता रहा। इस बात को रूस के रसायन भौतिकी विज्ञान के अरूत्यानोव ने भी स्वीकार किया है।
चार वर्ष पहले रूसी वैज्ञानिकों ने सलाह दी थी कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर राष्ट्रपति पुतिन इस बात को दुनिया के बतायें कि पृथ्वी को गर्म करने में कार्बन तत्व जिम्मेदार नहीं है। लेकिन पुतिन ने इस बात को राजनीतिक कारणों से अनसुना कर रूस की संसद में क्यूटो संधि के पक्ष में वातावरण बनाया इसके पीछे तर्क यह था कि यदि मास्को संधि का समर्थन करेगा, तभी यूरोपियन यूनियन डब्लूटीआ॓ में सदस्यता के लिए समर्थन करेगी। रूस को इसकी आवश्यकता थी क्योंकि सोवियत संघ के बिखरने से वह बुरी तरह पस्त था, उसे मुक्त व्यापार में शामिल होने से अपनी अर्थव्यवस्था सुधारनी थी। इस रास्ते पर चलने के लिए उसे वैज्ञानिकों द्वारा दिये सुझावों को ठुकराना पड़ा।
डॉक्टर सोरोख्तिन का कहना है कि पृथ्वी के वातावरण में स्वयं एक स्व नियंत्रण प्रणाली है। उसी से तापमान घटता-बढ़ता रहता है। जब तापमान बढ़ता है, तब सागर का पानी तेजी से वाष्पित होकर घने बादलों को बनाता है और इतना बनाता है कि सूर्य की किरणें पृथ्वी तक पहुंचने से रूक जाती हैं , फलस्वरूप पृथ्वी की सतह का तापमान घटने लगता है। शिक्षा शास्त्री कपिस्ता तो क्यूटो संधि को सबसे बड़ा वैज्ञानिक घोटाला मानते हैं। रूसी वैज्ञानिकों का मानना है कि मंच से 1995 में मेड्रिड संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन से उन वैज्ञानिकों के दस्तावेजों को गायब किया गया जो भिन्न मत रखते थे। हां, सल्फर डाइआक्साइड, नइट्रोजन आक्साइड, भारी धातुओं और अन्य जहरीले पदार्थों के उत्सर्जन पर जरूर रोक लगानी चाहिए न कि कार्बन के उर्त्सजन पर, जिसके असर को सिद्ध भी नहीं किया गया।
यदि एक बार 1970 के वर्ष में चलें तब पता चला कि पृथ्वी का तापमान घट रहा है। सावधान किया गया कि हमें हिम युग की चुनौतियां झेलनी पड़ेगी।
www.rashtriyasahara.com से साभार
हाल ही में पश्चिमी देशों ने एक स्वर से भारत और चीन को मौसम परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग का मुख्य कारण माना है, लेकिन इसके ठीक विपरीत रूसी वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन के कुछ और ही कारण मानते हैं। वे कार्बन डायऑक्साइड को किसी भी रूप में ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार नहीं मानते हैं। क्यूटो संधि में धरती की तपन का कारण कार्बन डायआक्साइड उर्त्सजन ही माना गया। लेकिन रूसी वैज्ञानिकों का मानना है कि बिना वैज्ञानिक तथ्यों का परीक्षण किये कार्बन को इसके लिए दोष देना उचित नहीं है। रूसी वैज्ञानिक आंद्रे कापिस्ता कहते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से कार्बन डाइआक्साइड वातावरण में है न कि कार्बन डाइआक्साइड की वजह से ग्लोबल वार्मिंग।
रूसी अनुसंधानवेत्ता अपने इस परिणाम पर तब पहुंचे, जब वे अंटाकर्टिका में साढ़े तीन किलो मीटर बर्फ के अंदर गहराई में विभिन्न पर्तों के नमूने इकठ्ठा कर रहे थे। प्राचीन काल में बर्फ गिरते और जमते समय हवा के बुलबुले ग्लेशियर के भीतर कैद हो गये थे, जो उस काल के पृथ्वी के वातावरण की सही जानकारी देते हैं। इन बुलबुलों के अध्ययन से बहुत सारी जानकारियां सामने आई हैं। यह अध्ययन धरती के पिछले चालीस हजार वर्षों की वातावरण की पूरी जानकारी देता है। इसमें उन्होंने पाया कि वातावरण में कार्बन की मात्रा समय-समय पर भिन्न-भिन्न रही है। पूरे इतिहास में पांच सौ से छह सौ वर्षों के बाद वातावरण गर्म होने पर कार्बन डाइआक्साइड की मात्रा बढ़ी है। इसलिए वे मानते हैं कि ग्रीन हाउस गैसों की वातावरण में सांद्रता ही मुख्य कारण है ग्लोबल वार्मिंग का।वे यह भी मानते हैं कि ग्रीन हाउस प्रभाव का मुख्य कारण पानी का वाष्पन ही है जो वातावरण में कार्बन डाइआक्साइड से दस गुणा अधिक है। यदि धरती से पूरी कार्बन डाइआक्साइड हटा दी जाए, तब भी धरती का तापमान इतना गिर नहीं सकता कि धरती ठंडी हो जाए। इस बात पर भैतिकविज्ञानी ब्लादिमिर बाशकृतसेव का विशेष मत है। रूसी विज्ञान संस्थान के आ॓लेग सोरोख्तिन, जो सागर विशेषज्ञ हैं के साथ–साथ अन्य वैज्ञानिकों का भी मानना है कि पृथ्वी का मौसम परिवर्तन एक प्राकृतिक कारण है। जैसे सौर गतिविधि, पृथ्वी के अक्ष में हलचल, सागर की तरंगों में बदलाव, समुद्र की सतह पर नमक के पानी की विरलता और सघनता का होना। ऐसे बहुत से कारण हैं ग्लोबल वार्मिंग के। औघोगिक उर्त्सजन इस स्थिति में मौसम परिवर्तन पर कोई विशेष प्रभाव नहीं डालता। पृथ्वी पर कार्बन डाइआक्साइड की मात्रा का बढ़ना पृथ्वी में जीवन के लिए अच्छा है। डा। सोरोख्तिन तर्क देते हैं कि इससे फसलों की पैदावार अच्छी होती है और वनों की वृद्धि भी तेजी से होती है।
इतिहास में बहुत समय ऐसा भी रहा जब कार्बन डाइआक्साइड की मत्रा पृथ्वी पर आज से लाखों गुणा अधिक रही, और जीवन का विकास सफलतापूर्वक चलता रहा। इस बात को रूस के रसायन भौतिकी विज्ञान के अरूत्यानोव ने भी स्वीकार किया है।
चार वर्ष पहले रूसी वैज्ञानिकों ने सलाह दी थी कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर राष्ट्रपति पुतिन इस बात को दुनिया के बतायें कि पृथ्वी को गर्म करने में कार्बन तत्व जिम्मेदार नहीं है। लेकिन पुतिन ने इस बात को राजनीतिक कारणों से अनसुना कर रूस की संसद में क्यूटो संधि के पक्ष में वातावरण बनाया इसके पीछे तर्क यह था कि यदि मास्को संधि का समर्थन करेगा, तभी यूरोपियन यूनियन डब्लूटीआ॓ में सदस्यता के लिए समर्थन करेगी। रूस को इसकी आवश्यकता थी क्योंकि सोवियत संघ के बिखरने से वह बुरी तरह पस्त था, उसे मुक्त व्यापार में शामिल होने से अपनी अर्थव्यवस्था सुधारनी थी। इस रास्ते पर चलने के लिए उसे वैज्ञानिकों द्वारा दिये सुझावों को ठुकराना पड़ा।
डॉक्टर सोरोख्तिन का कहना है कि पृथ्वी के वातावरण में स्वयं एक स्व नियंत्रण प्रणाली है। उसी से तापमान घटता-बढ़ता रहता है। जब तापमान बढ़ता है, तब सागर का पानी तेजी से वाष्पित होकर घने बादलों को बनाता है और इतना बनाता है कि सूर्य की किरणें पृथ्वी तक पहुंचने से रूक जाती हैं , फलस्वरूप पृथ्वी की सतह का तापमान घटने लगता है। शिक्षा शास्त्री कपिस्ता तो क्यूटो संधि को सबसे बड़ा वैज्ञानिक घोटाला मानते हैं। रूसी वैज्ञानिकों का मानना है कि मंच से 1995 में मेड्रिड संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन से उन वैज्ञानिकों के दस्तावेजों को गायब किया गया जो भिन्न मत रखते थे। हां, सल्फर डाइआक्साइड, नइट्रोजन आक्साइड, भारी धातुओं और अन्य जहरीले पदार्थों के उत्सर्जन पर जरूर रोक लगानी चाहिए न कि कार्बन के उर्त्सजन पर, जिसके असर को सिद्ध भी नहीं किया गया।
यदि एक बार 1970 के वर्ष में चलें तब पता चला कि पृथ्वी का तापमान घट रहा है। सावधान किया गया कि हमें हिम युग की चुनौतियां झेलनी पड़ेगी।
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विकासवादी होने के खतरे
अनिल चमड़िया
भारत में जातिवाद और सम्प्रदायवाद से समाज के टूटने का खतरा जाहिर किया जाता है। यह खतरा इसीलिए है कि समाज के विविधता के ढांचे और चरित्र को बचाए रखना चाहते हैं। समाज को उन लड़ाइयों से दूर रखना चाहते हैं जिससे आखिरकार समाज के बड़े हिस्से का हर स्तर पर नुकसान ही होना है। ये धर्म और जाति पुरानी व्यवस्थाओं के आधार रहे हैं जिन्हें आधुनिक व्यवस्था से दूर करने का लक्ष्य होता है। आधुनिक व्यवस्थाएं ये लक्ष्य राजनीतिक विचारधाराओं के आधार पर निर्धारित करती हैं लेकिन पुरानी व्यवस्थाओं के जो आधार रहे हैं उनसे जुड़े वगा के हित उसमें सुरक्षित होते हैं इसीलिए वे किसी भी स्तर पर उसे बनाए रखना चाहते हैं। वे उन आधारों को एक विचारधारा में परिर्वितत करने और उसे स्थापित करने की कोशिश लगातार करते हैं। लेकिन दूसरी तरफ आधुनिक व्यवस्थाओं की भी अपनी टकराहट होती है। वे नई-नई विचारधाराओं की जगह बनाने की कोशिश करती हंै। आधुनिकतम होती व्यवस्थाओं में विचारधाराओं का आधार जाति, लिग, धर्म और क्षेत्र से बदल जाता है। उस समय लगता है कि जातियां समानता ग्रहण कर रही हैं। धर्म की भूमिका कम हो रही है। पूरी दुनिया ही एक क्षेत्र में बदल गई है। शोषित, पीडित आबादी को मुक्ति मिल रही है। लेकिन एक उदाहरण से समझने की ये कोशिश की जा सकती है कि जो आधुनिक व्यवस्था में बदलने और विकास का अहसास है वह दूसरी तरफ कैसे एक अधीनता और असमानता को बनाए रखने की कोशिश आधुनिकतम कहलाने वाली विचारधाराएं करती रहती हैं।
सन 1660 का एक तथ्य है। उस समय दिल्ली की आबादी लगभग पांच लाख थी। उसमें आधी से ज्यादा आबादी झुग्गी-झोपडियों में रहती थी। इस संख्या का अनुमान 1661 में दिल्ली में आग लगने की एक घटना के तथ्यों से भी लगाया जा सकता है। उसमें 60 हजार झुग्गियां और झोपडियां जलकर राख हो गई थी। दूसरा तथ्य खेत में अनाज पैदा करने वालों से जुड़ा है। दिल्ली और आगरा के इलाके में गेहूं का उत्पादन करने वाले खेतिहरों की स्थिति ऐसी नहीं थी कि वे गेहूं खरीद सकें। तीसरा तथ्य औरंगजेब के बाद के इतिहास में उल्लेख मिलता है कि 1770 के आरम्भ में जितनी मौतें हुई और अनाज की जिस तरह से किल्लत देखी गई उतनी अतीत में न कभी देखी गई थी और न ही सुनी गई थीं। इन साढ़े तीन सौ वषा में व्यवस्थाएं आधुनिकतम होती चली गई हंै लेकिन ये कहने की जरूरत नहीं होगी कि व्यवस्थाएं कहां खड़ी रही हैं और आज भी हैं।
उपरोक्त स्थितियों के आलोक में कहा जा सकता है कि राजनीतिक विचारधाराओं ने नई व्यवस्थाओं में विकास को एक ऐसा आधार बनाया जिसे केन्द्र में रखकर असमानताओं के पुराने आधारों को खत्म किया जा सकता है। इसीलिए विकास की अवधारणा के अंदर तमाम तरह की राजनीतिक विचारधाराओं के बीच तीखे संघर्ष होते रहे हैं। विकास की धुरी पर राजनीतिक सत्तााएं बनती-बिगड़ती रही हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि विकास अपने आप में एक विचारधारा है पर विकास को एक ऐसी विचारधारा के रूप में विकसित किया गया है। पुरानी व्यवस्थाओं के आधार जातिवादी, सम्प्रदायवादी आदि रहे हैं उसी तर्ज पर विकासवादी जुड़ जाता है। भूमंडलीकरण की प्रक्रिया ने जाति और धर्म की तरह इसे एक विचारधारा के रूप में विकसित करने की कोशिश की है। भारतीय समाज को जातिवाद और सम्प्रदायवाद के मनोविज्ञान, मानसिक अवस्था और उसकी आक्रामकता के बारे में बताने की जरूरत नहीं है। लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि भारत जैसे देशों में विकासवाद और विकासवादियों का वही चरित्र है। भूमंडलीकरण की नई र्आिथक नीतियों के लागू करने के फैसले सरकार ने जितने चरणों में लिए हंै वे उस विचारधारा को करपंथी के रूप में विस्तार करने के चरण रहे हैं। इस विचारधारा के करपंथी होने के कम से कम दो लक्षण यहां देखे जा सकते हैं। पहला लक्षण शाइनिग इंडिया या भारत 2020 का नारा बनना है। यानी ये देखा जा रहा है कि लोग अपनी पहले की स्थिति में ही हैं लेकिन सत्तााएं विकासवादी कहलाती हैं। इसमें आवाज पैदा की जाती है कि दूरदराज कहीं सपने पूरे हो रहे हैं। दूसरे विकास के सवाल उठाने वाले आक्रमण के शिकार होते हैं। दिल्ली में लाखों की तादाद में झुग्गियों के गिराए जाने से लेकर छत्ताीसगढ़ में नदियों को बेच देने तक पर कोई सत्ताा का बाल बांका नहीं कर सका और न ही लाख से ऊपर की तादाद में किसानों की मौत को कोई देख पाया। जातिवाद और सम्प्रदायवाद की भयावहता इसी तरह की तो देखी जाती है। विकासवाद भी उपरोक्त तथ्यों के आधार पर कम से कम साढ़े तीन सौ वषा पुरानी स्थिति में हमें खड़ा किए हुए है। वहां अनाज का अभाव और गेहूं के ऊंचे भाव से भुखमरी और मौत, और कर्ज से किसानों की मौत में क्या अंतर है। पुराने विचार वहां और यहां केवल जाति, धर्म की तलाश करेंगे लेकिन नई विचारधारा ने विकासवादी एक नई जाति और धर्म को विकसित कर लिया है उसकी शिनाख्त कैसे होगी। व्यवस्था आधार के रूपों का भी आधुनिकीकरण कर देती है।
समाज ने जिन तमाम तरह की बहसों को जन्म दिया और वैचारिक लड़ाइयां लड़ी वे उसकी सांस्कृतिक पूंजी हैं। उनकी उपलब्धियों के तौर पर उसे देखा जा सकता है। लेकिन विकासवाद ने तमाम उन उपलब्धियों और सांस्कृतिक पूंजी पर अपना आक्रमण जमा लिया है। यदि भारतीय समाज और राजनीतिक व्यवस्थाओं में इस विचारधारा के प्रभावों का अध्ययन किया जाए तो ये बेहद गहरे स्तर पर सक्रिय और सूक्ष्म स्तर पर आक्रामक दिखाई देगा। इसने अपनी भाषा विकसित की है और दूसरी तरफ बेजुबां करने के लिए भाषा ही छीन ली है। यह अब अक्सर सुना जाता है कि अजीब सा लग रहा है या वह अजीब सा है। क्या कभी किसी समाज में ऐसा होता है कि उसके बीच कुछ खड़ा हो और वह अजीब सा लगे। यदि आश्चर्यजनक चीजें अचानक खड़ी होती हों तो ऐसा हो सकता है। लेकिन यहां तो अजीबों की कड़ी तैयार दिख रही है और समाज उसे व्यक्त करने के लिए भाषा भी तैयार नहीं कर पा रहा है। सारे संबंध विघटन के दौर से गुजर रहे हैं। विकास जब तक एक योजना और कार्यक्रम है वह आक्रमणकारी नहीं हो सकता है लेकिन जैसे ही वह विकासवादी होता है उसके खतरे शुरू हो जाते हैं। विकासवाद ने तमाम और खासतौर से समानता मूलक राजनीतिक विचारों को रक्षात्मक स्थिति में कर दिया है। इसने व्यक्ति की हरेक इकाई को अपने प्रभाव में कर रखा है। हमें और आपको इसके बारे में सोचना होगा।
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भारत में जातिवाद और सम्प्रदायवाद से समाज के टूटने का खतरा जाहिर किया जाता है। यह खतरा इसीलिए है कि समाज के विविधता के ढांचे और चरित्र को बचाए रखना चाहते हैं। समाज को उन लड़ाइयों से दूर रखना चाहते हैं जिससे आखिरकार समाज के बड़े हिस्से का हर स्तर पर नुकसान ही होना है। ये धर्म और जाति पुरानी व्यवस्थाओं के आधार रहे हैं जिन्हें आधुनिक व्यवस्था से दूर करने का लक्ष्य होता है। आधुनिक व्यवस्थाएं ये लक्ष्य राजनीतिक विचारधाराओं के आधार पर निर्धारित करती हैं लेकिन पुरानी व्यवस्थाओं के जो आधार रहे हैं उनसे जुड़े वगा के हित उसमें सुरक्षित होते हैं इसीलिए वे किसी भी स्तर पर उसे बनाए रखना चाहते हैं। वे उन आधारों को एक विचारधारा में परिर्वितत करने और उसे स्थापित करने की कोशिश लगातार करते हैं। लेकिन दूसरी तरफ आधुनिक व्यवस्थाओं की भी अपनी टकराहट होती है। वे नई-नई विचारधाराओं की जगह बनाने की कोशिश करती हंै। आधुनिकतम होती व्यवस्थाओं में विचारधाराओं का आधार जाति, लिग, धर्म और क्षेत्र से बदल जाता है। उस समय लगता है कि जातियां समानता ग्रहण कर रही हैं। धर्म की भूमिका कम हो रही है। पूरी दुनिया ही एक क्षेत्र में बदल गई है। शोषित, पीडित आबादी को मुक्ति मिल रही है। लेकिन एक उदाहरण से समझने की ये कोशिश की जा सकती है कि जो आधुनिक व्यवस्था में बदलने और विकास का अहसास है वह दूसरी तरफ कैसे एक अधीनता और असमानता को बनाए रखने की कोशिश आधुनिकतम कहलाने वाली विचारधाराएं करती रहती हैं।
सन 1660 का एक तथ्य है। उस समय दिल्ली की आबादी लगभग पांच लाख थी। उसमें आधी से ज्यादा आबादी झुग्गी-झोपडियों में रहती थी। इस संख्या का अनुमान 1661 में दिल्ली में आग लगने की एक घटना के तथ्यों से भी लगाया जा सकता है। उसमें 60 हजार झुग्गियां और झोपडियां जलकर राख हो गई थी। दूसरा तथ्य खेत में अनाज पैदा करने वालों से जुड़ा है। दिल्ली और आगरा के इलाके में गेहूं का उत्पादन करने वाले खेतिहरों की स्थिति ऐसी नहीं थी कि वे गेहूं खरीद सकें। तीसरा तथ्य औरंगजेब के बाद के इतिहास में उल्लेख मिलता है कि 1770 के आरम्भ में जितनी मौतें हुई और अनाज की जिस तरह से किल्लत देखी गई उतनी अतीत में न कभी देखी गई थी और न ही सुनी गई थीं। इन साढ़े तीन सौ वषा में व्यवस्थाएं आधुनिकतम होती चली गई हंै लेकिन ये कहने की जरूरत नहीं होगी कि व्यवस्थाएं कहां खड़ी रही हैं और आज भी हैं।
उपरोक्त स्थितियों के आलोक में कहा जा सकता है कि राजनीतिक विचारधाराओं ने नई व्यवस्थाओं में विकास को एक ऐसा आधार बनाया जिसे केन्द्र में रखकर असमानताओं के पुराने आधारों को खत्म किया जा सकता है। इसीलिए विकास की अवधारणा के अंदर तमाम तरह की राजनीतिक विचारधाराओं के बीच तीखे संघर्ष होते रहे हैं। विकास की धुरी पर राजनीतिक सत्तााएं बनती-बिगड़ती रही हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि विकास अपने आप में एक विचारधारा है पर विकास को एक ऐसी विचारधारा के रूप में विकसित किया गया है। पुरानी व्यवस्थाओं के आधार जातिवादी, सम्प्रदायवादी आदि रहे हैं उसी तर्ज पर विकासवादी जुड़ जाता है। भूमंडलीकरण की प्रक्रिया ने जाति और धर्म की तरह इसे एक विचारधारा के रूप में विकसित करने की कोशिश की है। भारतीय समाज को जातिवाद और सम्प्रदायवाद के मनोविज्ञान, मानसिक अवस्था और उसकी आक्रामकता के बारे में बताने की जरूरत नहीं है। लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि भारत जैसे देशों में विकासवाद और विकासवादियों का वही चरित्र है। भूमंडलीकरण की नई र्आिथक नीतियों के लागू करने के फैसले सरकार ने जितने चरणों में लिए हंै वे उस विचारधारा को करपंथी के रूप में विस्तार करने के चरण रहे हैं। इस विचारधारा के करपंथी होने के कम से कम दो लक्षण यहां देखे जा सकते हैं। पहला लक्षण शाइनिग इंडिया या भारत 2020 का नारा बनना है। यानी ये देखा जा रहा है कि लोग अपनी पहले की स्थिति में ही हैं लेकिन सत्तााएं विकासवादी कहलाती हैं। इसमें आवाज पैदा की जाती है कि दूरदराज कहीं सपने पूरे हो रहे हैं। दूसरे विकास के सवाल उठाने वाले आक्रमण के शिकार होते हैं। दिल्ली में लाखों की तादाद में झुग्गियों के गिराए जाने से लेकर छत्ताीसगढ़ में नदियों को बेच देने तक पर कोई सत्ताा का बाल बांका नहीं कर सका और न ही लाख से ऊपर की तादाद में किसानों की मौत को कोई देख पाया। जातिवाद और सम्प्रदायवाद की भयावहता इसी तरह की तो देखी जाती है। विकासवाद भी उपरोक्त तथ्यों के आधार पर कम से कम साढ़े तीन सौ वषा पुरानी स्थिति में हमें खड़ा किए हुए है। वहां अनाज का अभाव और गेहूं के ऊंचे भाव से भुखमरी और मौत, और कर्ज से किसानों की मौत में क्या अंतर है। पुराने विचार वहां और यहां केवल जाति, धर्म की तलाश करेंगे लेकिन नई विचारधारा ने विकासवादी एक नई जाति और धर्म को विकसित कर लिया है उसकी शिनाख्त कैसे होगी। व्यवस्था आधार के रूपों का भी आधुनिकीकरण कर देती है।
समाज ने जिन तमाम तरह की बहसों को जन्म दिया और वैचारिक लड़ाइयां लड़ी वे उसकी सांस्कृतिक पूंजी हैं। उनकी उपलब्धियों के तौर पर उसे देखा जा सकता है। लेकिन विकासवाद ने तमाम उन उपलब्धियों और सांस्कृतिक पूंजी पर अपना आक्रमण जमा लिया है। यदि भारतीय समाज और राजनीतिक व्यवस्थाओं में इस विचारधारा के प्रभावों का अध्ययन किया जाए तो ये बेहद गहरे स्तर पर सक्रिय और सूक्ष्म स्तर पर आक्रामक दिखाई देगा। इसने अपनी भाषा विकसित की है और दूसरी तरफ बेजुबां करने के लिए भाषा ही छीन ली है। यह अब अक्सर सुना जाता है कि अजीब सा लग रहा है या वह अजीब सा है। क्या कभी किसी समाज में ऐसा होता है कि उसके बीच कुछ खड़ा हो और वह अजीब सा लगे। यदि आश्चर्यजनक चीजें अचानक खड़ी होती हों तो ऐसा हो सकता है। लेकिन यहां तो अजीबों की कड़ी तैयार दिख रही है और समाज उसे व्यक्त करने के लिए भाषा भी तैयार नहीं कर पा रहा है। सारे संबंध विघटन के दौर से गुजर रहे हैं। विकास जब तक एक योजना और कार्यक्रम है वह आक्रमणकारी नहीं हो सकता है लेकिन जैसे ही वह विकासवादी होता है उसके खतरे शुरू हो जाते हैं। विकासवाद ने तमाम और खासतौर से समानता मूलक राजनीतिक विचारों को रक्षात्मक स्थिति में कर दिया है। इसने व्यक्ति की हरेक इकाई को अपने प्रभाव में कर रखा है। हमें और आपको इसके बारे में सोचना होगा।
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Monday, July 21, 2008
बिके हुए समझौतावादी
विजय बहादुर सिंह
एक ऐसे वक्त में जब लोकतंत्र, बकौल अरुंधति राय राजनेताओं का बिजनेस भर रह गया हो, तब ऐसीठगिनी राजनीति से निपटने के बारे में सोचा जाना चाहिए या फिर अपने करियर के बारे में- यह एक बड़ा सवाल है। जिसे कभी देशप्रेम और देशभक्ति कहते थे, वह जज्बा अब बचा नहीं है।
कुछ लोग तो यही समझने लगे हैं कि देश का मतलब अपना घर, परिवार भर है। ज्यादा से ज्यादा कुल खानदान या फिर नाते-रिश्तेदार। इसकी शुरुआत तभी हो गई थी, जब एक बड़ी राष्ट्रीय पार्टी धीरे-धीरे एक परिवार की राजनीति में सिमटने लगी और बाद में तो यहाँ तक हिमाकत की गई कि पार्टी बॉस को ही देश (राष्ट्र) का पर्याय कह डाला गया।
संतोष की बात यह है कि भारत के लोगों ने इसे नहीं माना। यह बात जो बात तो कम, बकवास अधिक थी, किसी के भी गले नहीं उतरी। हाँ, कुछेक दिनों के लिए वह पार्टी और उसका बॉस जरूर पटिए पर आ गए। यह इस देश के लोगों की राजनीतिक समझ ही थी जिसके आगे एक बड़ी राजनीतिक पार्टी के सबसे निरंकुश नेता को घुटने टेकने पड़े और माफी तक माँगनी पड़ी।
लोगों को भी समझ में आया कि लोकतंत्र लोगों की राजनीतिक सचेतनता और सजगता के बल पर बचता है, न कि उन राजनेताओं के सहारे जो राजनीति को अपना करियर बना चुके हैं। जिस महान (?) लोकतंत्र में राजनीति करने वाली बिरादरी का यह हाल हो, वहाँ लोकतंत्र का चेहरा, चरित्र और उसकी सेहत कैसी होगी, इसकी थोड़ी-बहुत कल्पना वे लोग तो कर ही सकते हैं, जो खुद को पढ़ा-लिखा और पेशेवर बुद्धिजीवी तबके से आया हुआ समझते हैं।
किंतु यह सब सोचना और ऐसी बातों में सिर खपाना उनका कन्सर्न नहीं बचा। राजनेता की राजनीति जैसे उसके अपने बीवी-बच्चों या घर-परिवार तक सिमट गई, वैसे ही कथित तौर पर पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी तबकों की बुद्धि अपने निहायत घटिया स्वार्थों तक। इसलिए इन दोनों के बीच एक अलिखित समझौता-सा हो चुका है।
मुठभेड़ और संवाद करने के बजाय अब ये दोनों या तो एक-दूसरे के कुकृत्यों पर आँख मूँदते और चुप्पी साधते हैं या फिर एक-दूसरे की रक्षा और मदद के लिए भीतर ही भीतर सक्रिय हो उठते हैं। चूँकि संसद, विधानसभा और सचिवालय से लेकर पुलिस कोतवाली और एक सीमा तक कचहरियों तक इनका अपना व्यवस्थित नेटवर्क काम कर रहा है।
अपराधियों को बचाने और अपराध छिपाने के लिए कोई खास मशक्कत उन्हें नहीं करनी पड़ती। ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर तक इनके कारगर चैनल बने हुए हैं, जमीन और आसमान यहाँ तक कि हवा और पानी तक इनका इतना असर कायम है कि इस किले को भेदना आसान नहीं रह गया है। स्थिति इतनी खतरनाक हो उठी है कि इनके विरुद्ध उठी हुई उँगली काटी और इनके विरुद्ध उठी आँख निकाली जा सकती है।
सिंगुर और नंदीग्राम तो खैर बड़े उदाहरण हैं, पर छोटे-छोटे उदाहरणों की सूची भी कम नहीं है। जिस लोकतांत्रिक समाज में बुद्धिजीवी और राजनेता एक-दूसरे के स्वार्थों के इतने करीब हों और एक-दूसरे के काले कारनामे को ढँकने और छिपाने में महारत हासिल कर चुके हों, उस समाज में शासित जनसमूहों को अपनी रक्षा के उपाय अपने आप करने पड़ते हैं। पर अब यह इतना आसान काम नहीं रह गया है।
कारण यह कि बड़ी-बड़ी विदेशी कंपनियाँ और उनकी तर्ज पर विश्व विजयी देशी पूँजीपति विकास का ताजा से ताजा मुहावरा लेकर हमारे बीच आ खड़े हैं और जो बिकने लायक हैं उनको खरीद रहे हैं, जो बिकने में आनाकानी कर रहे हैं, उन्हें सत्ता के सहारे अपने रास्तों से हटाकर अपना विजय रथ वे निर्ममता से हाँककर आगे ले जा रहे हैं।
मजेदार बात फिर भी यह कि तब भी मंगल पांडे, झाँसी की रानी, बहादुरशाह जफर, झलकारी बाई, यहाँ तक कि तिलक, गाँधी, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस और भगतसिंह की जयंतियाँ मनाई जा रही हैं, उन्हें याद करने (रखने का नहीं) का स्वाँग किया जा रहा है।
1857 के जज्बे को करोड़ों रुपए खर्च कर जगह-जगह याद किया जा रहा है और याद करने वाले यही लोग हैं, जिनका जिक्र ऊपर बहुत चिंता और अफसोस के साथ किया गया है। कितने दुःख और शर्म की बात है कि अब हमारी महान राष्ट्रीय स्मृतियाँ भी दगाबाज राजनेताओं और उनके साथ मौसेरापन निभाने वाले बुद्धिजीवियों के बीच का एक कर्मकांड भर बची रह गई हैं।
यह कैसा वक्त है कि मंगल पांडे के खेतिहर वंशजों से उनकी पुश्तैनी जमीनें जबरन छीनी जा रही हैं। उन्हें उनके पुश्तैनी हकों से वंचित और बेदखल किया जा रहा है। दूसरी तरफ 1857 को एक महा समारोह की तरह करोड़ों-करोड़ खर्च कर याद किया जा रहा है। कहीं यह देश धूर्त और मक्कार किस्म के लोगों के हाथ तो नहीं पड़ गया है, जो इसे नए सिरे से बेच डालने की तैयारी में जुटे हुए हैं?
इसे समझना अब कोई ऐसी मुश्किल बात भी नहीं है। पिछले पन्द्रह-बीस सालों का इतिहास उठाकर देखें तो पता चल जाएगा कि भारत में जो विकास की नई अर्थनीति आई है, वह सबसे पहले उन लोगों को बेदखल करने में लगी है जिनका जीवन यहाँ के पुश्तैनी परंपरागत प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर रहा आया है।
नई अर्थ व्यवस्था का सबसे पहला उद्देश्य इस देश के प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा करके उन्हें अपनी मुट्ठी में लेना है। वह चाहे कोयला हो या कच्चा लोहा, बॉक्साइट हो या उपजाऊ जमीन या फिर मसालों और फलों वाले ऐसे क्षेत्र, जिनसे भारत के लोग हजारों सालों से दुनिया के बाजारों में अपनी साख और पहचान बनाते रहे हैं।
यह भी कम विचारणीय नहीं है कि राजसत्ता धीरे-धीरे लोकसत्ता से ऊपर होती जा रही है। सत्ता की राजनीति ने इस लोक समाज को इतना अधमरा कर डाला है कि वह अपने जनप्रतिनिधियों से सवाल पूछने और उन्हें कटघरे में खड़ा कर पाने का सहज अधिकार और विवेक खो चुका है। ऐसा तो उस जमाने में भी नहीं होता था, जब राजतंत्र था। तब इस देश के लोग ऐसे कैसे हो गए?
फिर भी एक सिरफिरे की तरह यह पूछने का मन करता है कि इस देश में विकास की नई अर्थनीति के तहत जब किसान नहीं बचेगा, उनके खेत नहीं बचेंगे, कारीगरी और तरह-तरह के हुनर नहीं बचेंगे, अपनी प्रतिभा और मेहनत के बल पर जीने और मरने वाले लोग नहीं बचेंगे, तब देश भी कैसे बचेगा?तब क्या उन लोगों के भरोसे बचेगा, जिनकी जेबें नोटों की गड्डियों से भरी होंगी और बाजार अटे पड़े होंगे चीन और अमेरिका या जापान और फ्रांस के सामानों से। हमारे जूते भी बाहर से आएँगे और गेहूँ भी। तब चाहे हम दिल्ली, मुंबई में रहें, चाहे शिकागो या पेरिस में, देश का हमारे लिए क्या अर्थ बचेगा?भारतीय राजनीति में अब चाहे दक्षिण हो या वाम या फिर मध्य मार्ग के लोग, सभी ने 'सेज' को मंजूर कर लिया है। उनके दिमाग में अब दूसरा कोई विकल्प बचा ही नहीं है। बिके हुए समझौतावादी बुद्धिजीवियों के लिए करियर बनाने के सुनहरे अवसरों की भीड़ सामने है। देश के सामने है एक और महागुलामी। क्या यह सबसे बड़ा सच नहीं है?
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं।)
http://www.webdunia.com/ से साभार
एक ऐसे वक्त में जब लोकतंत्र, बकौल अरुंधति राय राजनेताओं का बिजनेस भर रह गया हो, तब ऐसीठगिनी राजनीति से निपटने के बारे में सोचा जाना चाहिए या फिर अपने करियर के बारे में- यह एक बड़ा सवाल है। जिसे कभी देशप्रेम और देशभक्ति कहते थे, वह जज्बा अब बचा नहीं है।
कुछ लोग तो यही समझने लगे हैं कि देश का मतलब अपना घर, परिवार भर है। ज्यादा से ज्यादा कुल खानदान या फिर नाते-रिश्तेदार। इसकी शुरुआत तभी हो गई थी, जब एक बड़ी राष्ट्रीय पार्टी धीरे-धीरे एक परिवार की राजनीति में सिमटने लगी और बाद में तो यहाँ तक हिमाकत की गई कि पार्टी बॉस को ही देश (राष्ट्र) का पर्याय कह डाला गया।
संतोष की बात यह है कि भारत के लोगों ने इसे नहीं माना। यह बात जो बात तो कम, बकवास अधिक थी, किसी के भी गले नहीं उतरी। हाँ, कुछेक दिनों के लिए वह पार्टी और उसका बॉस जरूर पटिए पर आ गए। यह इस देश के लोगों की राजनीतिक समझ ही थी जिसके आगे एक बड़ी राजनीतिक पार्टी के सबसे निरंकुश नेता को घुटने टेकने पड़े और माफी तक माँगनी पड़ी।
लोगों को भी समझ में आया कि लोकतंत्र लोगों की राजनीतिक सचेतनता और सजगता के बल पर बचता है, न कि उन राजनेताओं के सहारे जो राजनीति को अपना करियर बना चुके हैं। जिस महान (?) लोकतंत्र में राजनीति करने वाली बिरादरी का यह हाल हो, वहाँ लोकतंत्र का चेहरा, चरित्र और उसकी सेहत कैसी होगी, इसकी थोड़ी-बहुत कल्पना वे लोग तो कर ही सकते हैं, जो खुद को पढ़ा-लिखा और पेशेवर बुद्धिजीवी तबके से आया हुआ समझते हैं।
किंतु यह सब सोचना और ऐसी बातों में सिर खपाना उनका कन्सर्न नहीं बचा। राजनेता की राजनीति जैसे उसके अपने बीवी-बच्चों या घर-परिवार तक सिमट गई, वैसे ही कथित तौर पर पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी तबकों की बुद्धि अपने निहायत घटिया स्वार्थों तक। इसलिए इन दोनों के बीच एक अलिखित समझौता-सा हो चुका है।
मुठभेड़ और संवाद करने के बजाय अब ये दोनों या तो एक-दूसरे के कुकृत्यों पर आँख मूँदते और चुप्पी साधते हैं या फिर एक-दूसरे की रक्षा और मदद के लिए भीतर ही भीतर सक्रिय हो उठते हैं। चूँकि संसद, विधानसभा और सचिवालय से लेकर पुलिस कोतवाली और एक सीमा तक कचहरियों तक इनका अपना व्यवस्थित नेटवर्क काम कर रहा है।
अपराधियों को बचाने और अपराध छिपाने के लिए कोई खास मशक्कत उन्हें नहीं करनी पड़ती। ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर तक इनके कारगर चैनल बने हुए हैं, जमीन और आसमान यहाँ तक कि हवा और पानी तक इनका इतना असर कायम है कि इस किले को भेदना आसान नहीं रह गया है। स्थिति इतनी खतरनाक हो उठी है कि इनके विरुद्ध उठी हुई उँगली काटी और इनके विरुद्ध उठी आँख निकाली जा सकती है।
सिंगुर और नंदीग्राम तो खैर बड़े उदाहरण हैं, पर छोटे-छोटे उदाहरणों की सूची भी कम नहीं है। जिस लोकतांत्रिक समाज में बुद्धिजीवी और राजनेता एक-दूसरे के स्वार्थों के इतने करीब हों और एक-दूसरे के काले कारनामे को ढँकने और छिपाने में महारत हासिल कर चुके हों, उस समाज में शासित जनसमूहों को अपनी रक्षा के उपाय अपने आप करने पड़ते हैं। पर अब यह इतना आसान काम नहीं रह गया है।
कारण यह कि बड़ी-बड़ी विदेशी कंपनियाँ और उनकी तर्ज पर विश्व विजयी देशी पूँजीपति विकास का ताजा से ताजा मुहावरा लेकर हमारे बीच आ खड़े हैं और जो बिकने लायक हैं उनको खरीद रहे हैं, जो बिकने में आनाकानी कर रहे हैं, उन्हें सत्ता के सहारे अपने रास्तों से हटाकर अपना विजय रथ वे निर्ममता से हाँककर आगे ले जा रहे हैं।
मजेदार बात फिर भी यह कि तब भी मंगल पांडे, झाँसी की रानी, बहादुरशाह जफर, झलकारी बाई, यहाँ तक कि तिलक, गाँधी, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस और भगतसिंह की जयंतियाँ मनाई जा रही हैं, उन्हें याद करने (रखने का नहीं) का स्वाँग किया जा रहा है।
1857 के जज्बे को करोड़ों रुपए खर्च कर जगह-जगह याद किया जा रहा है और याद करने वाले यही लोग हैं, जिनका जिक्र ऊपर बहुत चिंता और अफसोस के साथ किया गया है। कितने दुःख और शर्म की बात है कि अब हमारी महान राष्ट्रीय स्मृतियाँ भी दगाबाज राजनेताओं और उनके साथ मौसेरापन निभाने वाले बुद्धिजीवियों के बीच का एक कर्मकांड भर बची रह गई हैं।
यह कैसा वक्त है कि मंगल पांडे के खेतिहर वंशजों से उनकी पुश्तैनी जमीनें जबरन छीनी जा रही हैं। उन्हें उनके पुश्तैनी हकों से वंचित और बेदखल किया जा रहा है। दूसरी तरफ 1857 को एक महा समारोह की तरह करोड़ों-करोड़ खर्च कर याद किया जा रहा है। कहीं यह देश धूर्त और मक्कार किस्म के लोगों के हाथ तो नहीं पड़ गया है, जो इसे नए सिरे से बेच डालने की तैयारी में जुटे हुए हैं?
इसे समझना अब कोई ऐसी मुश्किल बात भी नहीं है। पिछले पन्द्रह-बीस सालों का इतिहास उठाकर देखें तो पता चल जाएगा कि भारत में जो विकास की नई अर्थनीति आई है, वह सबसे पहले उन लोगों को बेदखल करने में लगी है जिनका जीवन यहाँ के पुश्तैनी परंपरागत प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर रहा आया है।
नई अर्थ व्यवस्था का सबसे पहला उद्देश्य इस देश के प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा करके उन्हें अपनी मुट्ठी में लेना है। वह चाहे कोयला हो या कच्चा लोहा, बॉक्साइट हो या उपजाऊ जमीन या फिर मसालों और फलों वाले ऐसे क्षेत्र, जिनसे भारत के लोग हजारों सालों से दुनिया के बाजारों में अपनी साख और पहचान बनाते रहे हैं।
यह भी कम विचारणीय नहीं है कि राजसत्ता धीरे-धीरे लोकसत्ता से ऊपर होती जा रही है। सत्ता की राजनीति ने इस लोक समाज को इतना अधमरा कर डाला है कि वह अपने जनप्रतिनिधियों से सवाल पूछने और उन्हें कटघरे में खड़ा कर पाने का सहज अधिकार और विवेक खो चुका है। ऐसा तो उस जमाने में भी नहीं होता था, जब राजतंत्र था। तब इस देश के लोग ऐसे कैसे हो गए?
फिर भी एक सिरफिरे की तरह यह पूछने का मन करता है कि इस देश में विकास की नई अर्थनीति के तहत जब किसान नहीं बचेगा, उनके खेत नहीं बचेंगे, कारीगरी और तरह-तरह के हुनर नहीं बचेंगे, अपनी प्रतिभा और मेहनत के बल पर जीने और मरने वाले लोग नहीं बचेंगे, तब देश भी कैसे बचेगा?तब क्या उन लोगों के भरोसे बचेगा, जिनकी जेबें नोटों की गड्डियों से भरी होंगी और बाजार अटे पड़े होंगे चीन और अमेरिका या जापान और फ्रांस के सामानों से। हमारे जूते भी बाहर से आएँगे और गेहूँ भी। तब चाहे हम दिल्ली, मुंबई में रहें, चाहे शिकागो या पेरिस में, देश का हमारे लिए क्या अर्थ बचेगा?भारतीय राजनीति में अब चाहे दक्षिण हो या वाम या फिर मध्य मार्ग के लोग, सभी ने 'सेज' को मंजूर कर लिया है। उनके दिमाग में अब दूसरा कोई विकल्प बचा ही नहीं है। बिके हुए समझौतावादी बुद्धिजीवियों के लिए करियर बनाने के सुनहरे अवसरों की भीड़ सामने है। देश के सामने है एक और महागुलामी। क्या यह सबसे बड़ा सच नहीं है?
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं।)
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देश को ले डूबेगा परमाणु समझौता
संदीप पांडेयआज जबकि सारे देश में महंगाई वृध्दि को लेकर त्राहि-त्राहि मची हुई थी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अचानक भारत-अमरीका परमाणु समझौता को प्रतिष्ठा का मुद्दा बनाकर सभी को अचंभित कर दिया है. अमरीका के मध्य पूर्व एवं दक्षिण एशिया मामलों की संसदीय उपसमिति के अध्यक्ष गैरी एकरमैन ने कह दिया है कि अब जार्ज बुश के राष्ट्रपति काल की समाप्ति के पहले इस समझौते के अमरीकी संसद द्वारा स्वीकृत होना सम्भव नहीं दिखता. अमरीका की संसद में पहुंचने से पहले भारत को इस समझौते के क्रियान्वयन हेतु अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेन्सी व 45 देशों के 'परमाणु आपूर्ति समूह' से महत्वपूर्ण स्वीकृतियाँ हासिल करनी हैं.
यह पहली बार है कि कोई देश परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर किए बगैर तथा अपनी सभी परमाणु गतिविधियों की अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेन्सी द्वारा जाँच हेतु तैयार हुए बगैर परमाणु आपूर्ति समूह के सदस्य देशों से परमाणु प्रौद्योगिकी एवं ईधन का व्यापार करने की छूट चाह रहा है। यदि यह समझौता स्वीकृत हो जाता है तो भारत को औपचारिक रूप से अद्योषित परमाणु शस्त्र सम्पन्न राष्ट्र का दर्जा मिल जाएगा। लेकिन इससे दुनिया के परमाणु निशस्त्रीकरण अभियान को बड़ा धक्का पहुंचेगा.
सुरक्षा परिषद के पांच स्थाई सदस्यों- अमरीका, इंग्लैण्ड, रूस, चीन, फ्रांस, तथा इज़राइल व पाकिस्तान के अलावा दुनिया के सभी देशों ने परमाणु नि:शस्त्रीकरण हेतु अपनी प्रतिबध्दता जाहिर की है। 112 देश तो ऐसे हैं, जो स्वेच्छा से परमाणु शस्त्र मुक्त क्षेत्र के अंग हैं. दुनिया में पांच ऐसे क्षेत्र हैं -दक्षिणी अमरीका, अफ्रीका, दक्षिण-पुर्वएशिया, दक्षिण प्रशांत महासागर का क्षेत्र तथा मध्य एशिया. इनके अलावा मंगोलिया ने अपने आप को एकल परमाणु शस्त्र मुक्त क्षेत्र घोषित कर रखा है. 1988 में संयुक्त राष्ट्र संघ में राजीव गांधी के भाषण तक भारत भी परमाणु नि:शस्त्रीकरण का स्पष्ट रूप से समर्थक रहा है. किन्तु अब महात्मा गांधी व गौतम बुध्द का यह देश दुनिया में शांति चाहने वाले देशों का साथ छोड़ रहा है.असल में भारत-अमरीका परमाणु समझौता ऊर्जा हेतु है ही नहीं. प्रधानमंत्री बताते हैं कि भारत की बिजली की जरूरतों को पूरा करने हेतु यह समझौता आवश्यक है. किन्तु भारत सरकार का ही योजना आयोग यह बता रहा है कि इस समझौते के लागू होने के बाद हम 2020 तक बहुत ज्यादा 40,000 मेगावाट परमाणु ऊर्जा से बिजली उत्पादन की क्षमता हासिल कर लेंगें, तो भी वह हमारे कुल बिजली उत्पादन का 9 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होगा. यानी हमें 90 प्रतिशत से ज्यादा बिजली के लिए अन्य स्रोतों पर निर्भर रहना ही पड़ेगा. दुनिया के सभी विकसित देश जिन्होंने परमाणु ऊर्जा से बिजली उत्पादन के संयंत्र स्थापित किए हैं, धीरे-धीरे अपने कारखानों को बंद कर रहे हैं तथा नए कारखाने नहीं लगा रहे. अमरीका ने तो पिछले तीन दशक में परमाणु ऊर्जा का एक भी नया कारखाना नहीं लगाया है. फ्रांस जिसको परमाणु ऊर्जा के मामले में एक सफल उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जो आज अपनी 75 प्रतिशत बिजली इस प्रौद्योगिकी से प्राप्त करता है, आने वाले दिनों में सिर्फ एक ऐसा और कारखाना लगाएगा. यानि आने वाले दो-तीन दशकों में फ्रांस की बिजली के प्रतिशत में भारी गिरावट आएगी.
जापान भी परमाणु ऊर्जा को छोड़कर पुनर्प्राप्य स्रोतों से बिजली उत्पादन के तरीकों पर शोध हेतु भारी धन खर्च कर रहा है. सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह है कि परमाणु ऊर्जा संयत्रों हेतु यूरेनियम की आपूर्ति करने वाले सबसे बड़े देश आस्ट्रेलिया में अभी तक परमाणु ऊर्जा से बिजली उत्पादन का एक भी कारखाना नहीं लगा है. उपर्युक्त से स्पष्ट है कि दुनिया के पैमाने पर परमाणु ऊर्जा का कार्यक्रम असफल रहा है.भारत में पिछले दस वर्षों में पवन ऊर्जा से 5000 मेगावाट बिजली उत्पादन की क्षमता स्थापित हो गई है जबकि परमाणु ऊर्जा से तो अभी हम मात्र 3000 मेगावाट बिजली का ही उत्पादन कर पाते हैं. किन्तु पवन ऊर्जा की सफलता का कहीं जिक्र तक नहीं होता. भारत में इसमें 45,000 मेगावाट तक की क्षमता स्थापित होने की सम्भावना है. सौर ऊर्जा में तो अभी तक हमने ठीक से निवेश ही नहीं किया. स्पेन जैसे देश में घरों की छत पर सोलर पैनल लगाने अनिवार्य हो गए हैं. जापान व यूरोप ने 2050 तक कम कार्बन उत्सर्जन करने वाले समाज बनने का लक्ष्य तय किया है. समझदार देश अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु पुनर्प्राप्य स्रोतों की ओर ध्यान दे रहे हैं.अमरीका की एक संस्था का पुर्वानुमान है कि आने वाले दो-तीन दशकों में बिजली उत्पादन के जो कारखाने स्थापित होंगे, उनमें से करीब दो-तिहाई गैस आधारित होंगे. इस दृष्टि से ईरान से मिल सकने वाली गैस हमारे लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है. किन्तु अमरीका हमारे ऊपर यह दबाव बना रहा है कि हम ईरान-पाकिस्तान-भारत गैस पाइपलाईन समझौता रद्द कर दें तथा ईरान के साथ अपने संबंध खत्म कर लें. यदि भारत ऐसा करता है तो वह अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा.भारत-अमरीका परमाणु समझौते में अमरीका के कई निहित स्वार्थ हैं. अमरीका की संसद को यह बताया गया है कि लगभग पंद्रह वर्षों बाद उसके चीन से एक युध्द होने की सम्भावना है. इस युध्द में अमरीका चाहता है कि भारत उसके पक्ष में रहे. करीब सात वर्षों से अमरीकी व भारतीय सेनाएँ संयुक्त सैन्य अभ्यास कर ही रही हैं. इन अभ्यासों के लिए हमें उसको बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है. उदाहरण के लिए अगस्त 2008 में अमरीका के नेवादा राज्य में भारतीय वायुसेना के 150 लोग अपने जहाज, आदि उपकरणों के साथ एक सैन्य अभ्यास में शामिल होंगे जिसका शुल्क हमें रूपए 100 करोड़ अदा करना होगा. अमरीका अपने महँगे हथियार हमें बेच रहा है. हाल ही में भारत ने 200 करोड़ डालर के आठ बोईंग पी.81 जासूसी जहाज खरीदे हैं. अमरीकी संसद को बताया गया है कि भविष्य में अमरीका भारत में अपना सैनिक अड्डा बनाना चाहता है. धीरे-धीरे हम अमरीका के कनिष्ठ सामरिक सहयोगी बन जाएंगे तथा दक्षिण एशिया का इलाका एक युध्द क्षेत्र. यह अमरीका का इतिहास रहा है कि जहां-जहां उसने हस्तक्षेप किया है, उस इलाके में तबाही ही फैली है. हमें पाकिस्तान के उदाहरण से सीखना चाहिए कि अमरीका का कनिश्ठ सामरिक सहयोगी बनने का क्या परिणाम हो सकता है? हमारी हैसियत एक दोयम दर्जे के इज़राइल या इंग्लैण्ड जैसी हो जाएगी. यानी अमरीका से दुश्मनी मोल लेना जितना खतरनाक है, उससे कम खतरा उसका मित्र बनने में नहीं है.
इसके अलावा भारत जैसा बड़ा बाजार मिलना अमरीका के लिए सोने में सुहागा हो गया है. भारत-अमरीका परमाणु समझौते से अमरीका का मृतप्राय परमाणु ऊर्जा उद्योग पुनर्जीवित हो जाएगा. इसके अलावा उपभोक्ता वस्तुओं, शीतल पेय एवं बोलतबंद पानी, कृषि, सेवा क्षेत्र, बीमा, मीडिया, खुदरा व्यापार, आदि विभिन्न क्षेत्रों में अमरीकी कम्पनियाँ या तो भारतीय बाजार में घुसपैठ कर चुकी हैं या करने की तैयारी में हैं.
चूंकि अब हम अमरीका के सामरिक एवं राजनीतिक सहयोगी की भूमिका में हैं, हमारे लिए यदि ये कम्पनियाँ भारतीय जनता के हितों के विरूध्द कोई कार्य करती है तो उनके खिलाफ कोई कार्यवाही करना आसान न होगा. आज कोका कोला एवं पेप्सी के खिलाफ भू-गर्भ जल दोहन से लेकर जल एवं मृदा प्रदूषण के तमाम सबूत होने के बावजूद हम इन कम्पनियों के देश के अंदर स्थित संयंत्रों को नहीं बंद करा सकते. आज भारतीय राजनीति की मुख्यधारा का हरेक दल अमरीकी सरकार एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का दबाव महसूस कर रहा है.अमरीका ने हमारी राजनीति व विदेश नीति का प्रभावित करना शुरू कर दिया है. अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेन्सी की बैठक में भारत पर दबाव डाल कर ईरान के खिलाफ मत डलवाया गया. भारत व अमरीका की बढ़ती नजदीकी से भारत व चीन के बीच भी तनाव बढ़ा है. ऐसा प्रतीत होता है कि हमारे प्रधानमंत्री भारत की जनता की अपेक्षा जार्ज बुश के प्रति अपने आप को ज्यादा जवाबदेह मानते हैं. इसलिए देश के सामने तमाम गभ्भीर समस्याओं जैसे मंहगाई, गरीबी, किसानों की आत्महत्या, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, आदि को छोड़कर पूरे देश का ध्यान परमाणु समझौते पर केन्द्रित कर दिया है. भारत की जनता ने पिछले लोकसभा चुनाव में दिखा दिया है कि यदि कोई राजनीतिक दल देश की जनता से जुड़े असली मुद्दों को छोड़कर 'चमकते भारत' जैसी सतही अवधारणा के आधार पर चुनाव जीतना चाहेगा तो उसे मुँह की खानी पड़ेगी. लगता है आने वाले चुनाव में कांग्रेस पार्टी को भारत-अमरीका परमाणु समझौता ले डूबेगा.
इसके अलावा भारत जैसा बड़ा बाजार मिलना अमरीका के लिए सोने में सुहागा हो गया है. भारत-अमरीका परमाणु समझौते से अमरीका का मृतप्राय परमाणु ऊर्जा उद्योग पुनर्जीवित हो जाएगा. इसके अलावा उपभोक्ता वस्तुओं, शीतल पेय एवं बोलतबंद पानी, कृषि, सेवा क्षेत्र, बीमा, मीडिया, खुदरा व्यापार, आदि विभिन्न क्षेत्रों में अमरीकी कम्पनियाँ या तो भारतीय बाजार में घुसपैठ कर चुकी हैं या करने की तैयारी में हैं.
चूंकि अब हम अमरीका के सामरिक एवं राजनीतिक सहयोगी की भूमिका में हैं, हमारे लिए यदि ये कम्पनियाँ भारतीय जनता के हितों के विरूध्द कोई कार्य करती है तो उनके खिलाफ कोई कार्यवाही करना आसान न होगा. आज कोका कोला एवं पेप्सी के खिलाफ भू-गर्भ जल दोहन से लेकर जल एवं मृदा प्रदूषण के तमाम सबूत होने के बावजूद हम इन कम्पनियों के देश के अंदर स्थित संयंत्रों को नहीं बंद करा सकते. आज भारतीय राजनीति की मुख्यधारा का हरेक दल अमरीकी सरकार एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का दबाव महसूस कर रहा है.अमरीका ने हमारी राजनीति व विदेश नीति का प्रभावित करना शुरू कर दिया है. अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेन्सी की बैठक में भारत पर दबाव डाल कर ईरान के खिलाफ मत डलवाया गया. भारत व अमरीका की बढ़ती नजदीकी से भारत व चीन के बीच भी तनाव बढ़ा है. ऐसा प्रतीत होता है कि हमारे प्रधानमंत्री भारत की जनता की अपेक्षा जार्ज बुश के प्रति अपने आप को ज्यादा जवाबदेह मानते हैं. इसलिए देश के सामने तमाम गभ्भीर समस्याओं जैसे मंहगाई, गरीबी, किसानों की आत्महत्या, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, आदि को छोड़कर पूरे देश का ध्यान परमाणु समझौते पर केन्द्रित कर दिया है. भारत की जनता ने पिछले लोकसभा चुनाव में दिखा दिया है कि यदि कोई राजनीतिक दल देश की जनता से जुड़े असली मुद्दों को छोड़कर 'चमकते भारत' जैसी सतही अवधारणा के आधार पर चुनाव जीतना चाहेगा तो उसे मुँह की खानी पड़ेगी. लगता है आने वाले चुनाव में कांग्रेस पार्टी को भारत-अमरीका परमाणु समझौता ले डूबेगा.
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ये नावों को डुबाने वाले
विभांशु दिव्याल
जी हां, हमारा लोकतंत्र मंडी में है। नीलामी की खुली मंडी में। आइए, बतियाइए, जुतियाइए, झिंझोड़िए, फींचिए, फटकारिए, जो चाहे करिए मगर बोली लगाइए- एक गैरतन मरी हुई सरकार को जिंदा रखने के लिए उसके पक्ष में या फिर सारे नियम-तकाजों, सिद्धांत-मर्यादाओं-वैचारिकताओं को लात मार अवसर लाभ लेने के लिए एकजुट हुए सरकार गिराऊ मजमे के साथ खड़े होकर उसके विपक्ष में। जो भौंडा प्रहसन उद्घाटित हो रहा है उसमें अमेरिकी डील गायब है और अगर है भी तो सिर्फ एक बहाना बनकर। अन्यथा हर कोई अपनी-अपनी टुच्ची, आ॓छी, निजी डील के साथ डुल रहा है।
सरकार के प्रति विश्वास-अविश्वास के ये दिन बेशर्मी, झूठ, पाखंड, अवसरवाद, लालच, व्यक्तिगत लाभ, सत्तालोलुपता, सौदेबाजी और सट्टेबाजी से ऊब-चूब होते दिन हैं। जिन्हें लगता है कि संसद में शक्ति परीक्षण होते ही ये दिन अपनी वर्तमान लंपटता के कारण अतीत बन जाएंगे, वे गलत हैं। इन दिनों का असर भारतीय राजनीति और समाज पर काले साये की तरह दूर तक और देर तक मंडराता रहेगा। आखिर इस समय सांसदों को अपने-अपने पक्ष में खींचने की बेलगाम कोशिश में क्या कुछ ऐसा नहीं घट रहा जो इस देश की ईमानदार जनता को खटक नहीं रहा और उसे कचोट नहीं रहा?
एक पार्टी का सांसद मीडिया के सामने खुलकर कहता है कि उसके वोट के लिए उसे पच्चीस करोड़ का प्रस्ताव दिया गया है। हाल ही में पक्ष छोड़कर विपक्ष बनी पार्टी का एक सूत्रधार भरे मंच पर दुहराता है कि एक-एक सांसद की बोली पच्चीस करोड़ लगाई जा रही है। इसके उत्तर में लगभग विपक्ष से पाला बदल पक्ष में आये दल का प्रवक्ता कहता है कि उनके सांसदों को तीस करोड़ में खरीदा जा रहा है और केवल इतना ही नहीं गुंडों और माफियाओं द्वारा धमकाया भी जा रहा है। अब कौन तय करे कि कौन सही है कौन गलत, कौन सच कह रहा है और कौन झूठ? जनता और कुछ जाने या नहीं जाने, पच्चीस या तीस करोड़ को माने या नहीं माने, मगर वह पक्के तौर पर जानती है कि ऐसा होता रहा है और अब भी हो रहा है। जब इतने बड़े-बड़े माननीय, देश और लोकतंत्र को इतने कद्दावर भाग्यविधाता इतने भरोसे और विश्वास से यह बात कह रहे हैं तो उनकी बात पर अविश्वास करने का कारण?
अगर चर्चा इस पर हो कि मुसलमान इस अमेरिकी डील से खुश हैं या नहीं और हमारे दिग्गज राजनेता भारत के हित के बजाय डील को मुसलमान बनाम गैर-मुसलमान हित का डील बनाने पर उतर आयें तो अमेरिका क्या करे? अगर सांसदों का एक गुट इस आशय के साथ विचार करे कि सिख प्रधानमंत्री के पक्ष में जाना है या विरोध में तो इसमें देश का हित-अहित कहां दिखता है? अगर एक पार्टी का रहनुमा सीधे-सीधे कहे कि जो पार्टी उसकी अलग राज्य की मांग को स्वीकार कर लेगी वह उसी के पक्ष में हो जाएगा, तो इसमें भारत की अमेरिका परस्ती किस तरह प्रमाणित होती है? अगर छोटी-बड़ी पार्टियां पक्ष-विपक्ष में जाने के लिए पदों से लेकर प्रशासनिक तंत्र में पैठ बनाने की सौदेबाजी करें तो परमाणु करार के अच्छा या बुरा होने का मसला कैसे तय होता है?
और अब बात करें 543 की लोकसभा में चंद लघुदलिया, निर्दलिया और जेलिया सांसदों की। ये सब के सब तराजू के पासंग यकायक संसद शिरोमणि हो गये हैं। इनमें से कौन किसके पक्ष में पलड़ा झुकाने की कोशिश करेगा और क्यों, यह कोई नहीं जानता। लेकिन यह सब जानते हैं कि इनके फैसले में परमाणु करार के गुण-दोष दूर-दूर तक नहीं होंगे। आपको याद होंगे अपने गुरूजी शिबू सोरेन। ये वही गुरूजी हैं जिन्होंने मुद्रा सिद्धांत के आधार पर नरसिम्हा राव की सरकार बचाई थी। तब थोड़े नासमझ थे इसलिए पकड़ में आ गये थे, लेकिन तब से अब तक गंगा में कई साल बह गये हैं। अब फिर गुरूजी उसी भूमिका में हैं और उनके पत्ते निश्चित तौर पर जिस सोच-समझ के साथ खुलेंगे, उसमें यह कहीं नहीं होगा कि परमाणु करार की कौन सी धारा सही है और कौन सी गलत।
परमाणु करार पीछे छूट गया है। अब सत्ता बचाने और सत्ता छीनने का नंगा खेल जारी है। इस खेल में कोई भी पार्टी ऐसी नहीं है जो साबुत बची है। किसी भी पार्टी के सांसदों की निष्ठा खरी नहीं निकली। सब में अश्लील टूट-फूट हुई है। जिस सूत्रधार मार्क्सवादी पार्टी ने इस खेल की शुरूआत की वह टूटी भले न हो मगर दरार उसमें भी आ गई है। राष्ट्रवादी पार्टी को अपने कुनबे को एकजुट रखने के लिए बार-बार कोड़ा फटकारना पड़ रहा है, मगर कभी इस कोने से किसी के बिदकने की खबर उड़ जाती है तो कभी उस कोने से। और यह सब करार के समर्थन या विरोध के लिए नहीं हो रहा, अपने खुद के खाते-खजाने, गैर-ठिकाने साधने के लिए हो रहा है। देश, लोकतंत्र और देश की जनता के लिए नहीं अपने नंगे स्वार्र्थों के लिए हो रहा है। इसे वे भी जानते हैं जो यह खेल-खेल रहे हैं और वे भी जानते हैं जो यह खेल खिला रहे हैं। मीडिया लगातार डुगडुगी बजाकर यही बता रहा है।
जिस देश के लोकतंत्र को ऐसी आत्महंता राजनीति संचालित कर रही हो उसे अपने विनाश के लिए किसी अमेरिकी करार की क्या जरूरत? यहां तो भस्मासुर अपने सर पर हाथ रखकर नाच रहा है। हजार अमेरिका इस विशाल राष्ट्र की अस्मिता को इतनी चोट नहीं पहुंचा सकते जितनी कि स्वयं इसके कर्णधार पहुंचा रहे हैं। हां, इस भारत-अमेरिका परमाणु करार ने इस देश की लोकतांत्रिक नंगई को एक बार फिर पूरी तरह नंगा कर दिया है। करार हो या न हो मगर इस नंगई के चलते इस देश को डूबने से कौन बचा सकता है। एक सुप्रसिद्ध उर्दू शेर का भौंडा हिंदी अनुवाद यूं है
-इन्हें कौन रोकेगा डूब जाने से
ये वे हैं जो नावों में डूब जाते हैं।
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जी हां, हमारा लोकतंत्र मंडी में है। नीलामी की खुली मंडी में। आइए, बतियाइए, जुतियाइए, झिंझोड़िए, फींचिए, फटकारिए, जो चाहे करिए मगर बोली लगाइए- एक गैरतन मरी हुई सरकार को जिंदा रखने के लिए उसके पक्ष में या फिर सारे नियम-तकाजों, सिद्धांत-मर्यादाओं-वैचारिकताओं को लात मार अवसर लाभ लेने के लिए एकजुट हुए सरकार गिराऊ मजमे के साथ खड़े होकर उसके विपक्ष में। जो भौंडा प्रहसन उद्घाटित हो रहा है उसमें अमेरिकी डील गायब है और अगर है भी तो सिर्फ एक बहाना बनकर। अन्यथा हर कोई अपनी-अपनी टुच्ची, आ॓छी, निजी डील के साथ डुल रहा है।
सरकार के प्रति विश्वास-अविश्वास के ये दिन बेशर्मी, झूठ, पाखंड, अवसरवाद, लालच, व्यक्तिगत लाभ, सत्तालोलुपता, सौदेबाजी और सट्टेबाजी से ऊब-चूब होते दिन हैं। जिन्हें लगता है कि संसद में शक्ति परीक्षण होते ही ये दिन अपनी वर्तमान लंपटता के कारण अतीत बन जाएंगे, वे गलत हैं। इन दिनों का असर भारतीय राजनीति और समाज पर काले साये की तरह दूर तक और देर तक मंडराता रहेगा। आखिर इस समय सांसदों को अपने-अपने पक्ष में खींचने की बेलगाम कोशिश में क्या कुछ ऐसा नहीं घट रहा जो इस देश की ईमानदार जनता को खटक नहीं रहा और उसे कचोट नहीं रहा?
एक पार्टी का सांसद मीडिया के सामने खुलकर कहता है कि उसके वोट के लिए उसे पच्चीस करोड़ का प्रस्ताव दिया गया है। हाल ही में पक्ष छोड़कर विपक्ष बनी पार्टी का एक सूत्रधार भरे मंच पर दुहराता है कि एक-एक सांसद की बोली पच्चीस करोड़ लगाई जा रही है। इसके उत्तर में लगभग विपक्ष से पाला बदल पक्ष में आये दल का प्रवक्ता कहता है कि उनके सांसदों को तीस करोड़ में खरीदा जा रहा है और केवल इतना ही नहीं गुंडों और माफियाओं द्वारा धमकाया भी जा रहा है। अब कौन तय करे कि कौन सही है कौन गलत, कौन सच कह रहा है और कौन झूठ? जनता और कुछ जाने या नहीं जाने, पच्चीस या तीस करोड़ को माने या नहीं माने, मगर वह पक्के तौर पर जानती है कि ऐसा होता रहा है और अब भी हो रहा है। जब इतने बड़े-बड़े माननीय, देश और लोकतंत्र को इतने कद्दावर भाग्यविधाता इतने भरोसे और विश्वास से यह बात कह रहे हैं तो उनकी बात पर अविश्वास करने का कारण?
अगर चर्चा इस पर हो कि मुसलमान इस अमेरिकी डील से खुश हैं या नहीं और हमारे दिग्गज राजनेता भारत के हित के बजाय डील को मुसलमान बनाम गैर-मुसलमान हित का डील बनाने पर उतर आयें तो अमेरिका क्या करे? अगर सांसदों का एक गुट इस आशय के साथ विचार करे कि सिख प्रधानमंत्री के पक्ष में जाना है या विरोध में तो इसमें देश का हित-अहित कहां दिखता है? अगर एक पार्टी का रहनुमा सीधे-सीधे कहे कि जो पार्टी उसकी अलग राज्य की मांग को स्वीकार कर लेगी वह उसी के पक्ष में हो जाएगा, तो इसमें भारत की अमेरिका परस्ती किस तरह प्रमाणित होती है? अगर छोटी-बड़ी पार्टियां पक्ष-विपक्ष में जाने के लिए पदों से लेकर प्रशासनिक तंत्र में पैठ बनाने की सौदेबाजी करें तो परमाणु करार के अच्छा या बुरा होने का मसला कैसे तय होता है?
और अब बात करें 543 की लोकसभा में चंद लघुदलिया, निर्दलिया और जेलिया सांसदों की। ये सब के सब तराजू के पासंग यकायक संसद शिरोमणि हो गये हैं। इनमें से कौन किसके पक्ष में पलड़ा झुकाने की कोशिश करेगा और क्यों, यह कोई नहीं जानता। लेकिन यह सब जानते हैं कि इनके फैसले में परमाणु करार के गुण-दोष दूर-दूर तक नहीं होंगे। आपको याद होंगे अपने गुरूजी शिबू सोरेन। ये वही गुरूजी हैं जिन्होंने मुद्रा सिद्धांत के आधार पर नरसिम्हा राव की सरकार बचाई थी। तब थोड़े नासमझ थे इसलिए पकड़ में आ गये थे, लेकिन तब से अब तक गंगा में कई साल बह गये हैं। अब फिर गुरूजी उसी भूमिका में हैं और उनके पत्ते निश्चित तौर पर जिस सोच-समझ के साथ खुलेंगे, उसमें यह कहीं नहीं होगा कि परमाणु करार की कौन सी धारा सही है और कौन सी गलत।
परमाणु करार पीछे छूट गया है। अब सत्ता बचाने और सत्ता छीनने का नंगा खेल जारी है। इस खेल में कोई भी पार्टी ऐसी नहीं है जो साबुत बची है। किसी भी पार्टी के सांसदों की निष्ठा खरी नहीं निकली। सब में अश्लील टूट-फूट हुई है। जिस सूत्रधार मार्क्सवादी पार्टी ने इस खेल की शुरूआत की वह टूटी भले न हो मगर दरार उसमें भी आ गई है। राष्ट्रवादी पार्टी को अपने कुनबे को एकजुट रखने के लिए बार-बार कोड़ा फटकारना पड़ रहा है, मगर कभी इस कोने से किसी के बिदकने की खबर उड़ जाती है तो कभी उस कोने से। और यह सब करार के समर्थन या विरोध के लिए नहीं हो रहा, अपने खुद के खाते-खजाने, गैर-ठिकाने साधने के लिए हो रहा है। देश, लोकतंत्र और देश की जनता के लिए नहीं अपने नंगे स्वार्र्थों के लिए हो रहा है। इसे वे भी जानते हैं जो यह खेल-खेल रहे हैं और वे भी जानते हैं जो यह खेल खिला रहे हैं। मीडिया लगातार डुगडुगी बजाकर यही बता रहा है।
जिस देश के लोकतंत्र को ऐसी आत्महंता राजनीति संचालित कर रही हो उसे अपने विनाश के लिए किसी अमेरिकी करार की क्या जरूरत? यहां तो भस्मासुर अपने सर पर हाथ रखकर नाच रहा है। हजार अमेरिका इस विशाल राष्ट्र की अस्मिता को इतनी चोट नहीं पहुंचा सकते जितनी कि स्वयं इसके कर्णधार पहुंचा रहे हैं। हां, इस भारत-अमेरिका परमाणु करार ने इस देश की लोकतांत्रिक नंगई को एक बार फिर पूरी तरह नंगा कर दिया है। करार हो या न हो मगर इस नंगई के चलते इस देश को डूबने से कौन बचा सकता है। एक सुप्रसिद्ध उर्दू शेर का भौंडा हिंदी अनुवाद यूं है
-इन्हें कौन रोकेगा डूब जाने से
ये वे हैं जो नावों में डूब जाते हैं।
www.rashtriyasahara.com से साभार
Friday, July 18, 2008
तीसरे विश्वयुद्ध की दस्तक
सुभाष धूलिया
मध्य-पूर्व में क्या तीसरा महायुद्ध छिड़ने जा रहा है? क्या ईरान पर इस्राइल-अमेरिका आक्रमण करने जा रहे हैं या यह सिर्फ दबाव डालने के हथकंडे भर हैं। आज वास्तविकता ये है कि इस्राइल किसी भी कीमत पर ईरान को यूरेनियम संवर्धन की क्षमता विकसित नहीं करने देगा जिसका इस्तेमाल बिजली और नाभिकीय हथियार दोनों को बनाने के लिए किया जा सकता है। ईरान बिजली बनाने के लिए इस क्षमता को विकसित करने के अपने अधिकार का समर्पण करेगा, ये भी उम्मीद नहीं की जा सकती। ईरान को एक क्षेत्रीय महाशक्ति के रूप में उभरने से रोकना अमेरिका और इस्राइल की उस रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत इराक-अफगानिस्तान में युद्ध लड़े जा रहे हैं और मध्यपूर्व में सैनिक अड्डों की भरी-पूरी श्रृंखला कायम की गई है।इस्राइल ने पिछले दिनों एक बहुत बड़ा सैनिक अभ्यास किया जिसमें 100 से भी अधिक लड़ाकू विमानों ने भाग लिया जिसका मकसद 1400 किलोमीटर की दूरी पर बड़ा हमला करना था। इस्राइल से ईरानी नाभिकीय प्रतिष्ठान भी इतनी ही दूर हैं। इसके बदले में ईरान ने कई मिसाइलों का परीक्षण किया जो इस्राइल तक मारने की क्षमता रखती हैं। इस्राइल हालांकि स्वीकार नहीं करता पर ये सर्वविदित है कि इस्राइल के पास 100 से अधिक नाभिकीय बम हैं। लेकिन इस्राइल ईरान जैसे देश को नाभिकीय हथियार विकसित नहीं करने देगा जो इसके अस्तित्व को ही नहीं स्वीकार करता।अमेरिकी प्रशासन के एक हल्के में ये मानना है कि ईरान पर आक्रमण के विनाशकारी परिणाम होंगे जो द्वितीय विश्वयुद्ध के विनाश को भी बौना कर देंगे इसलिए राजनयिक तरीकों से ही ईरान को रोका जाना चाहिए। दूसरी आ॓र बुश प्रशासन के एक प्रभावशाली तबके का मानना है कि ईरान को राजनयिक तरीके से राजी करने के सारे राजनयिक प्रयास विफल हो चुके हैं और अब युद्ध ही एकमात्र विकल्प है। राष्ट्रपति बुश के हाल के ही बयानों से स्पष्ट है कि वो आक्रमण के विकल्प की आ॓र झुक रहे हैं। अमेरिका की सभी खुफिया एजेंसियों का आकलन है कि ईरान नाभिकीय हथियार बनाने के कार्यक्रम का 2003 में ही परित्याग कर चुका है लेकिन अमेरिका का राजनीतिक नेतृत्व इसे स्वीकार नहीं करता और उसका मानना है कि यूरेनियम संवर्धन की क्षमता हासिल करते ही नाभिकीय हथियार बनाए जा सकते हैं।ईरान के पास नाभिकीय हथियार होने भर से ही सत्ता समीकरण बदल जाएंगे। नाभिकीय ईरान के उदय से तेल संपन्न मध्यपूर्व पर नियंत्रण कायम करने का अमेरिका का सपना पूरा नहीं हो पाएगा। ईरान नाभिकीय हथियारों के साथ-साथ अपने अकूत तेल संसाधनों के बल पर एक बड़ी क्षेत्रीय महाशक्ति बन जाएगा। नाभिकीय ईरान इस्राइल के लिए केवल सैनिक खतरा ही नहीं बल्कि अनेक तरह के संकट पैदा करेगा। इस्राइल इतना छोटा देश है कि इसके अस्तित्व को मिटाने के लिए एक ही बम काफी है। नाभिकीय ईरान के उदय के बाद इस्राइल मध्यपूर्व में सैनिक कार्रवाइयों के लिए उतना स्वच्छंद नहीं रह पाएगा जितना अब तक रहा है। नाभिकीय ईरान मध्यपूर्व में इस्राइल विरोधी तमाम इस्लामी और कट्टरपंथी ताकतों के संगठित होने का केंद्र बन जाएगा। इस्राइल के अस्तित्व को पैदा होने वाले खतरे से हर तरह के संसाधनों का पलायन शुरू हो जाएगा और इस्राइल का संपन्न तबका भी अधिक सुरक्षित स्थानों की आ॓र कूच कर सकता है। इस स्थिति में सैनिक ताकत के बल पर भी इस्राइल को जर्जर होने से रोकना मुश्किल होगा।सैनिक रूप से इस्राइल के लिए ईरान के नाभिकीय प्रतिष्ठानों को ध्वस्त करना उतना आसान नहीं होगा जो उसने 1981 में इराक और पिछले सितंबर में सीरिया में किया था। लेकिन इस्राइली नेतृत्व का मानना है कि ईरान को नाभिकीय क्षमता हासिल करने से रोकने के लिए कुछ तो जोखिम उठाना ही होगा। अब चाहे आक्रमण इस्राइल करे या वह अमेरिका के साथ मिलकर आक्रमण करे, ईरान दोनों ही स्थितियों में इस्राइल और खाड़ी में अमेरिकी सैनिक अड्डों, युद्धपोतों और इराक और अफगानिस्तान में अमेरिकी सेनाओं पर प्रति आक्रमण करेगा। ईरान ने होमुर्ज चलडमरूमध्य को भी बंद करने की धमकी दी है जहां से विश्व की 40 प्रतिशत तेल की आपूर्ति होती है। अमेरिका ने चेतावनी दी है कि वह किसी भी कीमत पर इस सामरिक जलमार्ग को बंद नहीं होने देगा।तेल संकट से जूझ रहे विश्व के लिए 40 प्रतिशत तेल आपूर्ति के बाधित होने से क्या असर पड़ेगा इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। फिर ईरान तो दुनिया का चौथा बड़ा तेल उत्पादक देश है ऐसी स्थिति में क्या होगा इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि ईरान द्वारा मिसाइल परीक्षण करने पर तेल के दाम प्रति बैरल 135 से बढ़कर 140।6 डॉलर हो गए थे।युद्ध के विनाशकारी परिणामों को सीमित करने के लिए अमेरिका और इस्राइल ऐसे आक्रमण की योजना बना रहे हैं जिससे ईरान की प्रतिआक्रमण की क्षमता को युद्ध के शुरूआती दौर में कुंद कर दिया जाए। इसके लिए एक बड़े आक्रमण की योजना बनाई जा रही है और ईरान के केवल नाभिकीय प्रतिष्ठानों को नहीं बल्कि तीन हजार से अधिक लक्ष्यों पर क्रूज मिसाइल से हमला किया जाएगा। यह भी कहा जा रहा है कि ईरान के अतिसुरक्षित नाभिकीय प्रतिष्ठानों को ध्वस्त करने के लिए एक छोटे नाभिकीय बम का प्रयोग भी करना पड़ सकता है। इराक और अफगानिस्तान के अनुभव के बाद अमेरिका ईरान के युद्ध को चटपट खत्म करना चाहेगी और हां, इसके लिए ईरान का इस हद तक विनाश जरूरी है कि वो जल्द उठ ना सके। इस पृष्ठभूमि में यही सवाल बचा नजर आता है कि आक्रमण कब होगा?ईरान पर आक्रमण के मसले पर राष्ट्रपति बुश इस्राइल की सोच से सबसे ज्यादा करीब माने जाते हैं और अपना कार्यकाल खत्म होने से पहले ऐसा भी कुछ करना चाहते हैं कि उन्हें ‘ऐतिहासिक’ होने का दर्जा हासिल हो सके। अमेरिकी राष्ट्रपति पद के डेमोक्रेट उम्मीदवार बराक आ॓बामा ईरान से सीधी बात के पक्षधर हैं और इस्राइल का भी ये मानना है कि अगर रिपब्लिकन मैक्केन भी राष्ट्रपति बनते हैं तो वे सत्ता संभालते ही ईरान पर आक्रमण का फैसला नहीं करेंगे। ऐसे में इस्राइल का मानना है कि ईरान को नाभिकीय क्षमता हासिल करने के लिए पर्याप्त समय मिल जाएगा। इसलिए ईरान पर आक्रमण के लिए सबसे उपयुक्त समय 4 नवम्बर को मतदान और 20 जनवरी को अमेरिका में नए राष्ट्रपति के सत्तासीन होने के बीच का समय ही ‘ऐतिहासिक मौका’ है जब ईरान को ध्वस्त किया जा सकता है।इस पृष्ठभूमि में अगर युद्ध रोकने का कोई भी रास्ता तैयार करना है तो इस्राइल, अमेरिका या अहमदीनेजाद के नेतृत्व वाले ईरान में से किसी न किसी को तो झुकना ही होगा। लेकिन अब सवाल ये उठता है कि जब हर पक्ष का इतना कुछ दांव पर लगा हुआ हो तो झुकेगा कौन?
http://www.rashtriyasahara.com/ से साभार
मध्य-पूर्व में क्या तीसरा महायुद्ध छिड़ने जा रहा है? क्या ईरान पर इस्राइल-अमेरिका आक्रमण करने जा रहे हैं या यह सिर्फ दबाव डालने के हथकंडे भर हैं। आज वास्तविकता ये है कि इस्राइल किसी भी कीमत पर ईरान को यूरेनियम संवर्धन की क्षमता विकसित नहीं करने देगा जिसका इस्तेमाल बिजली और नाभिकीय हथियार दोनों को बनाने के लिए किया जा सकता है। ईरान बिजली बनाने के लिए इस क्षमता को विकसित करने के अपने अधिकार का समर्पण करेगा, ये भी उम्मीद नहीं की जा सकती। ईरान को एक क्षेत्रीय महाशक्ति के रूप में उभरने से रोकना अमेरिका और इस्राइल की उस रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत इराक-अफगानिस्तान में युद्ध लड़े जा रहे हैं और मध्यपूर्व में सैनिक अड्डों की भरी-पूरी श्रृंखला कायम की गई है।इस्राइल ने पिछले दिनों एक बहुत बड़ा सैनिक अभ्यास किया जिसमें 100 से भी अधिक लड़ाकू विमानों ने भाग लिया जिसका मकसद 1400 किलोमीटर की दूरी पर बड़ा हमला करना था। इस्राइल से ईरानी नाभिकीय प्रतिष्ठान भी इतनी ही दूर हैं। इसके बदले में ईरान ने कई मिसाइलों का परीक्षण किया जो इस्राइल तक मारने की क्षमता रखती हैं। इस्राइल हालांकि स्वीकार नहीं करता पर ये सर्वविदित है कि इस्राइल के पास 100 से अधिक नाभिकीय बम हैं। लेकिन इस्राइल ईरान जैसे देश को नाभिकीय हथियार विकसित नहीं करने देगा जो इसके अस्तित्व को ही नहीं स्वीकार करता।अमेरिकी प्रशासन के एक हल्के में ये मानना है कि ईरान पर आक्रमण के विनाशकारी परिणाम होंगे जो द्वितीय विश्वयुद्ध के विनाश को भी बौना कर देंगे इसलिए राजनयिक तरीकों से ही ईरान को रोका जाना चाहिए। दूसरी आ॓र बुश प्रशासन के एक प्रभावशाली तबके का मानना है कि ईरान को राजनयिक तरीके से राजी करने के सारे राजनयिक प्रयास विफल हो चुके हैं और अब युद्ध ही एकमात्र विकल्प है। राष्ट्रपति बुश के हाल के ही बयानों से स्पष्ट है कि वो आक्रमण के विकल्प की आ॓र झुक रहे हैं। अमेरिका की सभी खुफिया एजेंसियों का आकलन है कि ईरान नाभिकीय हथियार बनाने के कार्यक्रम का 2003 में ही परित्याग कर चुका है लेकिन अमेरिका का राजनीतिक नेतृत्व इसे स्वीकार नहीं करता और उसका मानना है कि यूरेनियम संवर्धन की क्षमता हासिल करते ही नाभिकीय हथियार बनाए जा सकते हैं।ईरान के पास नाभिकीय हथियार होने भर से ही सत्ता समीकरण बदल जाएंगे। नाभिकीय ईरान के उदय से तेल संपन्न मध्यपूर्व पर नियंत्रण कायम करने का अमेरिका का सपना पूरा नहीं हो पाएगा। ईरान नाभिकीय हथियारों के साथ-साथ अपने अकूत तेल संसाधनों के बल पर एक बड़ी क्षेत्रीय महाशक्ति बन जाएगा। नाभिकीय ईरान इस्राइल के लिए केवल सैनिक खतरा ही नहीं बल्कि अनेक तरह के संकट पैदा करेगा। इस्राइल इतना छोटा देश है कि इसके अस्तित्व को मिटाने के लिए एक ही बम काफी है। नाभिकीय ईरान के उदय के बाद इस्राइल मध्यपूर्व में सैनिक कार्रवाइयों के लिए उतना स्वच्छंद नहीं रह पाएगा जितना अब तक रहा है। नाभिकीय ईरान मध्यपूर्व में इस्राइल विरोधी तमाम इस्लामी और कट्टरपंथी ताकतों के संगठित होने का केंद्र बन जाएगा। इस्राइल के अस्तित्व को पैदा होने वाले खतरे से हर तरह के संसाधनों का पलायन शुरू हो जाएगा और इस्राइल का संपन्न तबका भी अधिक सुरक्षित स्थानों की आ॓र कूच कर सकता है। इस स्थिति में सैनिक ताकत के बल पर भी इस्राइल को जर्जर होने से रोकना मुश्किल होगा।सैनिक रूप से इस्राइल के लिए ईरान के नाभिकीय प्रतिष्ठानों को ध्वस्त करना उतना आसान नहीं होगा जो उसने 1981 में इराक और पिछले सितंबर में सीरिया में किया था। लेकिन इस्राइली नेतृत्व का मानना है कि ईरान को नाभिकीय क्षमता हासिल करने से रोकने के लिए कुछ तो जोखिम उठाना ही होगा। अब चाहे आक्रमण इस्राइल करे या वह अमेरिका के साथ मिलकर आक्रमण करे, ईरान दोनों ही स्थितियों में इस्राइल और खाड़ी में अमेरिकी सैनिक अड्डों, युद्धपोतों और इराक और अफगानिस्तान में अमेरिकी सेनाओं पर प्रति आक्रमण करेगा। ईरान ने होमुर्ज चलडमरूमध्य को भी बंद करने की धमकी दी है जहां से विश्व की 40 प्रतिशत तेल की आपूर्ति होती है। अमेरिका ने चेतावनी दी है कि वह किसी भी कीमत पर इस सामरिक जलमार्ग को बंद नहीं होने देगा।तेल संकट से जूझ रहे विश्व के लिए 40 प्रतिशत तेल आपूर्ति के बाधित होने से क्या असर पड़ेगा इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। फिर ईरान तो दुनिया का चौथा बड़ा तेल उत्पादक देश है ऐसी स्थिति में क्या होगा इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि ईरान द्वारा मिसाइल परीक्षण करने पर तेल के दाम प्रति बैरल 135 से बढ़कर 140।6 डॉलर हो गए थे।युद्ध के विनाशकारी परिणामों को सीमित करने के लिए अमेरिका और इस्राइल ऐसे आक्रमण की योजना बना रहे हैं जिससे ईरान की प्रतिआक्रमण की क्षमता को युद्ध के शुरूआती दौर में कुंद कर दिया जाए। इसके लिए एक बड़े आक्रमण की योजना बनाई जा रही है और ईरान के केवल नाभिकीय प्रतिष्ठानों को नहीं बल्कि तीन हजार से अधिक लक्ष्यों पर क्रूज मिसाइल से हमला किया जाएगा। यह भी कहा जा रहा है कि ईरान के अतिसुरक्षित नाभिकीय प्रतिष्ठानों को ध्वस्त करने के लिए एक छोटे नाभिकीय बम का प्रयोग भी करना पड़ सकता है। इराक और अफगानिस्तान के अनुभव के बाद अमेरिका ईरान के युद्ध को चटपट खत्म करना चाहेगी और हां, इसके लिए ईरान का इस हद तक विनाश जरूरी है कि वो जल्द उठ ना सके। इस पृष्ठभूमि में यही सवाल बचा नजर आता है कि आक्रमण कब होगा?ईरान पर आक्रमण के मसले पर राष्ट्रपति बुश इस्राइल की सोच से सबसे ज्यादा करीब माने जाते हैं और अपना कार्यकाल खत्म होने से पहले ऐसा भी कुछ करना चाहते हैं कि उन्हें ‘ऐतिहासिक’ होने का दर्जा हासिल हो सके। अमेरिकी राष्ट्रपति पद के डेमोक्रेट उम्मीदवार बराक आ॓बामा ईरान से सीधी बात के पक्षधर हैं और इस्राइल का भी ये मानना है कि अगर रिपब्लिकन मैक्केन भी राष्ट्रपति बनते हैं तो वे सत्ता संभालते ही ईरान पर आक्रमण का फैसला नहीं करेंगे। ऐसे में इस्राइल का मानना है कि ईरान को नाभिकीय क्षमता हासिल करने के लिए पर्याप्त समय मिल जाएगा। इसलिए ईरान पर आक्रमण के लिए सबसे उपयुक्त समय 4 नवम्बर को मतदान और 20 जनवरी को अमेरिका में नए राष्ट्रपति के सत्तासीन होने के बीच का समय ही ‘ऐतिहासिक मौका’ है जब ईरान को ध्वस्त किया जा सकता है।इस पृष्ठभूमि में अगर युद्ध रोकने का कोई भी रास्ता तैयार करना है तो इस्राइल, अमेरिका या अहमदीनेजाद के नेतृत्व वाले ईरान में से किसी न किसी को तो झुकना ही होगा। लेकिन अब सवाल ये उठता है कि जब हर पक्ष का इतना कुछ दांव पर लगा हुआ हो तो झुकेगा कौन?
http://www.rashtriyasahara.com/ से साभार
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