Tuesday, August 5, 2008

लोकतंत्र की विचारधारा का विस्तार और विस्फोट

अनिल चमड़िया
भाजपा शासित बंगलूरू और अहमदाबाद में बम विस्फोट की घटनाएं और सूरत में बम विस्फोट की बड़े पैमाने पर तैयारी ने कुछ अहम सवाल खड़े किए हैं। पहली बात तो इन घटनाओं के बाद जिस तरह की राजनीतिक प्रतिक्रियाएं हुई हैं वे पिछली तमाम ऐसी घटनाओं से बिल्कुल भिन्न हैं । भाजपा की सुषमा स्वराज ने कहा है कि ये विस्फोट सुनियोजित हैं। उन्होंने विश्वास मत प्रकरण में पैसे देकर वोट खरीदने और अमेरिकी परस्त छवि से ध्यान हटाने के उद्देश्य से विस्फोट किए गए बताया है। पहली बार हुआ है कि विस्फोटों में पाकिस्तान और बांग्लादेश की तरफ इशारा करके उनकी भूमिका की तरफ उंगुली नहीं उठाई गई है। बल्कि इससे उलट कहा गया कि अमेरिकी परस्त छवि से मुस्लिम मतदाताओं में पसरी नाजरागी को भुलाकर धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक समीकरणों की तरफ मुस्लिमों को खींचने की कोशिश की गई है। पहला सवाल है कि पहले जितने विस्फोट हुए उनमें से किसी को भी सुनियोजित क्यों नहीं माना जाए? संभव है उन्हें भी किसी बात से ध्यान हटाने के लिए ही अंजाम दिया गया हो? दूसरा कि क्या राजनीति का इतना पतन हो चुका है कि किसी नकारात्मक रूख को दूसरी दिशा में मोड़ने के लिए किसी भी स्तर पर जाया जा सकता है? क्या राजनीति ने अपने हितों के लिए हिंसक गिरोह खड़े कर लिये हैं? इन विस्फोटों को साजिशन बताकर जिस तरफ इशारा किया जा रहा है यदि उसकी समझ सही है तो देश के लोगों के सामने क्या चारा रह जाता है? भूमंडलीकरण के दौर में आतंकवाद की राजनीति जिस साजिश के तहत विस्तारित हुई है इसकी जड़ें कितनी दूर तक और गहरे फैली हुई हैं?
ये सवाल तो सुषमा स्वराज की प्रतिक्रिया से सीधे खड़े होते हैं। लेकिन इन सवालों के विपरीत दिशा में भी सवाल खड़े होते हैं। भाजपा शासित राज्यों में ही ये विस्फोट क्यों? इन राज्यों से पहले जयपुर में भी इसी तरह विस्फोट हुए। क्या इन विस्फोटों को भाजपा को बदनाम करने की साजिश के बजाय इस तरह भी देखा जाए कि भाजपा की गतिविधियों ने आम जन जीवन को बेहद असुरक्षित बना दिया है? भाजपा की साम्प्रदायिक राजनीति से लोगों में असुरक्षा बोध बढ़ा है। अपने ऊपर उठते सवालों को लेकर वह चितित हो गई है और खुद को सुरक्षित करना अपनी प्राथमिकता समझने लगी है। यह महज संयोग तो नहीं हो सकता है कि गोधरा की ट्रेन आगजनी की घटना के बाद जिस तरह से गुजरात के मुख्यमंत्री ने सेना को बुलाने में कोताही बरती वहीं नरेन्द्र मोदी ने इन विस्फोटों के बाद आधे घंटे के अंदर सेना बुला ली और प्रतिक्रिया की भाषा में बात करने के बजाय लोगों से अमन चैन बनाए रखने की अपील के लिए दौड़ पड़े। अहमदाबाद में विस्फोट से पहले इसका दावा ठोकने वाले ने ईमेल के जरिये इसकी वजह 2002 के मुस्लिम विरोधी दंगों को बताया । बाबरी मस्जिद को गिराए जाने के बाद ही मुंबई में विस्फोट की घटनाएं हुई थीं।
देश एक गंभीर स्थिति में हैं। तत्काल राजनीतिक फायदे के लिए जो कुछ किया जाता है उससे सत्ता तो प्राप्त हो सकती है लेकिन उससे जो राजनीतिक प्रवृत्ति स्थापित होती है उसके गंभीर परिणाम देश को भुगतने पड़ते हैं। देश के गृह राज्य मंत्री प्रकाश जायसवाल ने कहा है कि विस्फोट गुजरात दंगों की प्रतिक्रिया है। पंजाब में स्वर्ण मंदिर में ब्लू स्टार आपरेशन के बाद इंदिरा गांधी की हत्या की घटना और उसके बाद हुई हिसा को राजीव गांधी ने पेड़ के उखड़ने पर धरती के हिलने की भाषा में प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। पंजाब को अब तक शांत मानकर बैठा नहीं जा सकता है। यदि ऐसी तमाम घटनाओं को इस दिशा में देखा जाए कि क्या आतंकवाद का विस्तार लोकतंत्र के संकुचन और वर्चस्व की राजनीति स्थापित करने की योजना से जुड़ा हुआ है? देश में जिन घटनाओं को आतंकवाद की श्रेणी में रखकर बात की जाती है वह अल्पसंख्यकों से जुड़ी राजनीति के इर्द-गिर्द दिखाई देती है। देश में अल्पसंख्यकों की आमतौर पर सत्ता से शिकायत रही है। न केवल सत्ता मशीनरियों के उनके खिलाफ हमलों को लेकर, बल्कि उनके खिलाफ हमलों के बाद न्याय नहीं मिलने को लेकर भी। पिछले दिनों से यह भी देखा जा रहा है कि नक्सलवाद एवं माआ॓वाद को भी आतंकवाद की श्रेणी में शामिल करने की कोशिश हुई है। इन नक्सलवादियों और माआ॓वादियों के साथ कौन हैं? आखिर देश के दलितों के किसी छोटे से भी हिस्से को हथियार उठाने की जरूरत क्यों पड़ती है? सत्ता अपने भारी-भरकम बल के बूते हमले कर सकती है तो हमले के शिकार लोगों के सामने क्या चारा रह जाता है?
भारत को गणतांत्रिक बनाए रखना इसके बने रहने की अनिवार्यता से जुड़ा है। लेकिन राजनीतिक पार्टियों ने लोकतंत्र को सत्ता में बने रहने से जोड़ दिया है और उसके लिए उन्हें बहुसंख्यक और वर्चस्ववादी समूहों की राजनीति तक समेट कर रख दिया है। ये बात सभी संसदीय पार्टियों की विचारधारा के रूप में स्थापित हो चुकी है। हर राजनीतिक पार्टी लोकतंत्र के विस्तार के बजाय लोकतंत्र की सुरक्षा पर जिस तरह से जोर देती है उस पर गौर करने की जरूरत है। अब विस्फोटों की घटना के बाद मुख्यत: दो तरह की मांग सामने आती है। एक के द्वारा संघीय जांच एजेंसी बनाने की होती है तो दूसरे के द्वारा कठोर कानून बनाने की मांग दोहरायी जाती है। इन मांगों में क्या दिखाई देता है? संघीय जांच एजेंसी के क्या मायने है? गणतंत्र में राज्यों के अधीन कानून एवं व्यवस्था की मशीनरी होती है। आखिर केन्द्र विस्फोटों के बाद राज्य की इस ताकत को ही अपने हाथों में लेने पर क्यों जोर देता है? इससे लोकतंत्र का विस्तार कहां जुड़ा है? लोकतंत्र का विस्तार तो राज्यों को मजबूत करने से जुड़ा है, राज्यों के बीच ताममेल की संस्कृति को बढ़ाने से जुड़ा है। केन्द्र ऐसी घटनाओं के पीछे भारतीय दंड विधान की धाराओं से देखने की ही ष्टि क्यों अपनाता है? दूसरा, कठोर कानून का क्या अर्थ है? कानून के साथ लगे कठोर के विशेषण को खोलकर क्यों नहीं बताया जाता है कि गणतांत्रिक व्यवस्था में न्यायिक प्रक्रिया का जो ढांचा खड़ा है उसे सत्ता द्वारा तोड़ना शामिल है। टाडा और पोटा का सीधा अर्थ क्या है? पुलिस किसी वर्ग या जाति को अपने डंडों के बूते डरा धमकाकर रखे। लेकिन इससे लोकतंत्र मजबूत नहीं हो सकता है। बल्कि इसमें लोकतंत्र में असुरक्षा के भाव का विस्तार हो जाता है। अल्पसंख्यकों के अंदर से निकल बहुसंख्यकों के दबे-कुचले हिस्से तक में सत्ता के भय और असुरक्षा का विस्तार हो जाता है।
देश में विस्फोटों की घटनाओं को अब तक जिस तरह से देखा जा रहा है उसने कई राजनीतिक सवाल खड़े किए हैं। इससे पहले महाराष्ट्र में विस्फोट की घटनाओं ने इस माइंड सेट को तोडा था कि इनमें केवल अल्पसंख्यकों के समूहों के बीच के लोग होते हैं। वहां हिन्दुओं के दस्तों की भूमिका पाई गई थी। विस्फोट की घटनाओं को आतंकवाद की अमेरिकी परिभाषा और भारतीय दंड विधान के नजरिये से देखने के बजाय लोकतंत्र के विस्तार पर कुंडली मारकर बैठने वाली राजनीति को समझने की दृष्टि से भी देखने की कोशिश की जानी चाहिए। सत्ता द्वारा आतंकवाद की घटनाओं को अपनी निरकुंशता मजबूत करने का बहाना बनाने की कोशिशों पर अंकुश लगाना चाहिए।
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Thursday, July 31, 2008

ब्लॉग, आजादी और जिम्मेदारी

सुधीश पचौरी
ब्लॉग लेखन साइबर–लेखन है। साइबर–स्पेस नई तरह की आजादी वाला स्पेस है।
हिंदी में ब्लॉग बढ़ रहे हैं। यहां एकदम नवांकुर- नवेच्छु अभिव्यक्तियां करने लगे हैं। इनमें नए पत्रकार ज्यादा हैं। बहुत से अखबारों में काम करने वाले हैं, बहुत से टीवी आदि में काम करते हैं, बहुत से एनजीआ॓ वाले हैं और बहुत से लिखने-पढ़ने के शौकीन हैं। इन सबमें एक समान तत्व मिलता है : अपने मत को साइबर में धड़ल्ले से व्यक्त करना।
जिस हिंदी में अनेक पढ़े-लिखे लोग, बुद्धिजीवी कल तक कम्प्यूटर क्रांति के विरोध में रहे, उसे खतरा मानते रहे, उनकी जगह नए आ रहे हैं और धड़ल्ले से साइबर स्पेस का उपयोग कर रहे हैं। यह एक प्रगतिशील तत्व है। एक नई पीढ़ी नए ढंग की आजादी में ‘आजाद’ हो रही है। साहित्य-संस्कृति के बहुत सारे बौद्धिकों के चंगुल से बाहर निकलकर वे अपनी अभिव्यक्तियों की दुनिया रच रहे हैं। यह अच्छी बात है। उनके विषय अनंत हैं।
बहुत से ब्लॉग गंभीर काम करते हैं। वे सामाजिक महत्व की टिप्पणियां करते रहते हैं। बहुत से ब्लॉग उतने गंभीर नजर नहंीं आते हैं। ज्यादातर हिंदी ब्लॉगर हिंदी और समाज तथा निजी व्यक्तिगत विषयक विचार करते हैं। कई राजनीति पर लिखते हैं और राजनीति-सी करते रहते हैं। कई पर्सनल स्कोर सेटल करने के चक्कर में रहते हैं। भाषा अराजक-सी हो उठती हैं। उनके लेखक अपने लक्ष्य के एकदम समक्ष होते हैं और उनके आहत-अनाहत भी उनसे सम्मुखता में रहते हैं। यहां बेहद ‘तात्कालिकता’ का सदृश्य बना रहता है। उसी में उनके हिस्सेदार भी रहते हैं। ऐसे कई ब्लॉग हैं, जिनमें निजी समक्षता और तीखा तुरंतापन नजर आता है। दुश्मन साफ नजर आते हैं। मारने वाले भी सामने होते हैं और मजेखोर भी।
हिंदी ब्लॉग का यह वर्तमान सीन सातवें दशक के आसपास की ‘लिटिल मैग़जीनों’ के विस्फोट की याद ताजा करता है। तब का सीन ऐसा था : किसी छोटे शहर से या कहीं से भी कोई छोटी पत्रिका निकाल बैठता। उसमें अपनी रचना अपने दोस्तों की रचनाएं और विचार देता। वह नए लोगों के बीच प्रसारित रहती। पुरानों के बीच जाती। भाषा में नाराजगी एक स्थायी भाव की तरह होती। बड़े ंसंस्थानों के विरोध में उनमें टिप्पणियां रहतीं। बड़े प्रेस के विरोध में उनमें लिखा रहता। भाषा तीखी, एकदम पर्सनल हिसाब निपटाने की भी रहती।
अकविता, अकहानी और मोहभंग के लेखन के तीखे नए स्वर यहंीं नजर आए। उनसे एक प्रवृत्ति बनी। कई कवि ख्यात हुए, कई कहानीकार बने, अपने निजीपन-अपनी तात्कालिकता और गरम मिजाजी के कारण छोटी पत्रिकाएं नयों का ध्यान खींचतीं। उनकी दीक्षा-सी करतीं। उनका मंच बनतीं। अंतत: यह प्रवृत्ति अपनी ताजगी खो बैठी। गुस्सा पिलपिला हो गया और ठहराव आ गया।
ब्लॉग लेखन का स्पेस लिटिल मैगज़ीन के स्पेस से जरा अलग है। यह साइबर है, इसलिए ‘अनंत’ का अहसास देता है, ज्यादा आजाद जगह का अहसास देता है। भारत में कम्प्यूटर अभी कम है। हिंदी क्षेत्रों में उनका ज्यादा प्रवेश नहीं है। इंटरनेट का उपयोग करने वाले बहुत नहीं हैं। उसका भी निजी अभिव्यक्तिपरक उपयोग करने वाले और भी कम हैं, इसलिए उसकी नागरिकता अभी सीमित है। इसलिए इसमें उपलब्ध होने वाली आजादी अपने निश्चित समाज के अनुशासन में नहीं होती, क्योंकि यहां कोई निश्चित समाज या कहें, साक्षात पाठक नहीं रहता। पाठक होते हैं, प्रतिक्रिया करने वाले सक्रिय पाठक होते हैं। वे प्रतिक्रियाएं देते भी हैं। उन्हें भी स्पेस मिलता है। इस तरह ब्लॉग स्पेस मूलत: इंटरएक्टिव है।
यहीं साइबर स्पेस की आजादी के यथार्थ अंतर्विरोध पैदा होने लगते हैं। वहां ‘स्थिरता’ और ‘आजादी’ में विलोम का भाव रहता है। उसके ताजापन यानी तात्कालिता और शब्दार्थ की निरंतर परिवर्तनशीलता में अ–विरोध रहता है। वहां अर्थ की अराजकता रहती है। यह लेखनी का क्रीड़ा– स्थल बनता है। चूंकि साइबर स्पेसी लेखन में पोस्टमॉडर्न के लक्षण भी रहते हैं, इसलिए उसमें कुछ अनिवार्य नैतिक विमर्श काम करते हैं। साइबर स्पेस के लेखन में आजादी और नैतिक विमर्शों के बीच तनाव रहते हैं। साइबर स्पेस में पुराने ढंग के साहित्य की उम्मीद करना व्यर्थ है। यह अच्छा भी है और बुरा भी है।
पाठक के प्रति समक्षता रहती है, मगर पाठक की साक्षात उपस्थिति का अभाव रहता है। तिस पर भी एक ब्लॉग कम्युनिटी का अहसास तिहरे अंतर्विरोध को जन्म देता है। समक्ष है, लेकिन साक्षात नहंीं। समाज है, लेकिन निर्गुण है लेकिन यह जीवन तो सगुण है भाई!
इस तरह किसी भी समाज में आते ही उसके कानून से इस आजादी का टकराव होता है। प्रिंट में कानून सीधे लागू होता है इसलिए स्थिरता रहती है, टीवी आदि में भी रहती है लेकिन साइबर स्पेस की आजादी इस ख्याल में अपनी अति पर रहती है कि उसकी नकेल किसी के हाथ में नहीं है। यह गलतफहमी एक हताशा ही साबित हो सकती है।
आजादी है, तो जिम्मेदारियां कम नहीं होतीं, बढ़ती जाती है। जितने आप आजाद हैं उतने आपको जिम्मेदार होना होता है और उतनी ही आजादी दूसरे को देनी होती है। साइबर स्पेस का असल मूल्य उदारवाद है, सहने की क्षमता है। अगर साइबर स्पेस एकतरफा निजी आजादी का स्पेस बना रह जाता है, तो वह जिम्मेदारी से विरत होने वाली बात है। यहां अभिव्यक्तियां करने वाले अपने शौक या काम के अंतर्विरोधों के बारे में सोच-विचार किया करें। इससे साइबर स्पेस वयस्क और जिम्मेदार बनेगा।
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बोल इस देश के गूंगे आदमी

विभांशु दिव्याल
बता इस महान देश के गूंगे आदमी
उस दिन जब लाल नोटों के काले बंडल दिखाए जा रहे थे
समूचे देश की खुली आंखों के आगेजोर-शोर से लहराए जा रहे थे
उस दिन जब नैतिकता नंगी की जा रही थी
मर्यादाएं बाजारू बनाई जा रही थीं
झूठ, बेईमानी, धूर्तता और मक्कारी की इबारतें लिखी जा रही थीं
पाप को पुण्य और पुण्य को पाप कहा जा रहा था
अपराध को जीत का जयकारा बनाया जा रहा था
नियम, नीति, विधान-संविधान की बोली लग रही थी
और तेरे देश की तेरी अपनी संसद सरेआम तुझे ठग रही थी
तब तुझे कैसा लगा,
कैसा लगा तुझे जब लोकतंत्र की असलियत खुल रही थी
जब विधाताओं की काली करतूत की दुर्गंध
समूचे देश की हवा में घुल रही थी
और तब कैसा लगा तुझे
जब लड़की की हत्या पर
दिन में कई-कई घंटों तक चीख-चीख कर
जुगाली करने वाली
चौथी जमात कुंडली मार गयी
सड़ी खाल वाले चूहे की तरह
घिनौनी चुप्पी के बिल में घुस गयी
एक बेहयाई दूसरी बेहयाई के गले लग गयी
किसी ने नहीं खोजा कौन कितने में बिका
किसी ने नहीं तलाशा
किसने किसे कितने में खरीदा
आखिर इस कमीनी बेईमानी पर,
थूक कर चाट जाने वालों के दाम कितने तय हुए
सच को हर कीमत पर सामने लाने की शपथ कितने में बिकी
निष्पक्षता की दावेदारी किसके बिस्तर पर जा लेटी
इस महान देश के गूंगे आदमी
तुझे नहीं लगता यह तेरे हक पर डाका है
तेरे अधिकार और हित की नीलामी है
यहतेरे घर की बेहया लूट है
तेरी अस्मिता पर भद्दी, अश्लील चोट है
और तेरी सामान्य जिंदगी का क्रूर आखेट है
यह आखिर कब तक देखेगा, सुनेगा, सहेगा
यह तेरी विवशता की छाती पर कब तक चलेगा
यह उनसे उम्मीद मत कर कि उन्हें शर्म आएगी
उनकी तरफ मत देख कि उनकी दरिंदगी पिघल जाएगी
मत सोच कि वे तेरी बात बोलेंगे
या वे तेरे लिए कभी अपनी जुबान खोलेंगे
या अपने पैरों की कुटिल चाल कभी तेरी आ॓र मोड़ेंगे
बता, उस दिन किसने कसम खायी कि वह सच खोलेगा
किसने शपथ ली कि वह झूठ को उजागर करेगा
किसने दम भरा कि मक्कारी का नकाब खींचेगा
किसने प्रतिज्ञा की कि संसद की इज्जत बचाएगा
किसने घोषणा की कि बेहयाई की जीभ पर लगाम लगाएगा
किसने आश्वासन दिया कि
सड़ांध मारती गंदगी को खोदकर बाहर बहाएगा
इतनी नंगई कि नंगई शरमा जाए
इतनी बेशर्मी कि बेशर्मी घबरा जाए
इतना कुटिल झूठ कि झूठ को पसीना आ जाए
इतना क्रूर पाखंड कि पाखंड तिरमिरा जाए
क्या तू अब भी इनसे अपेक्षा करेगा,
इनसे जो जिस जमीन पर चलेंगे
उसे बंजर बना देंगे
जिस हवा में सांस लेंगे उसमें जहर मिला देंगे
जिस भाषा में बोलेंगे उसे गंदा नाला बना देंगे
जिन शब्दों को उचारेंगे
उन्हें काला बना देंगे
मूल्यों-मर्यादाओं को नंगा नचा देंगे
इस देश की आशाओं-आकांक्षाओं को मंडी में बिठा देंगे
बता इस देश के विवश आदमी
क्या गिद्ध बनाएंगे यहां के परिंदों के घोंसले
क्या सांप दिखाएंगे तुझे तेरे चलने के रास्ते
क्या लुटेरों के गिरोह करेंगे तेरे वर्तमान की रखवाली
क्या तेरे देश का भविष्य दल्ले तय करेंगे
बोल गूंगे आदमी दीवार पर माथा फोड़,
अपनी चेतना को झिंझोड़ मगर चुप्पी तोड़,
जुबान खोल बोल इस देश के गूंगे आदमी,
बोल !
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आतंक और हिंसा को बढ़ावा देती फिल्में

भारत डोगरा
छब्बीस जुलाई को अहमदाबाद में हुए आतंकवादी हमले के बारे में एक संभावना यह व्यक्त की गई है कि इस हमले की योजना बनाते समय आतंकवादी एक फिल्म की कहानी से प्रभावित हुए थे। इस संदर्भ में बॉलीवुड के जाने-माने फिल्म निर्माता राम गोपाल वर्मा द्वारा निर्देशित फिल्म ‘कांट्रेक्ट’ चर्चा का विषय बनी है। यह फिल्म हाल ही में रिलीज हुई है। राम गोपाल वर्मा हिंसा व अपराध की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्मों के लिए विशेष तौर पर चर्चित रहे हैं जैसे कि ‘कंपनी’। इस फिल्म के बारे में कहा गया था कि यह एक कुख्यात अपराधी के जीवन पर आधारित है जिसका नाम बाद में आतंकवादी हमलों से भी जुड़ा। लेकिन अब ‘कांट्रैक्ट’ फिल्म के बारे में तो यह कहा जा रहा है कि इस फिल्म ने आतंकवादियों को प्रभावित कर दिया। इस फिल्म में खलनायक पहले अपेक्षाकृत छोटे विस्फोट की योजना बनाता है और फिर जब लोग अस्पताल में एकत्र होते हैं तो बड़े विस्फोट की। कुछ इसी तरह का बहुत निंदनीय व क्रूर आतंकवादी हमला अहमदाबाद में भी देखा गया।‘कांट्रेक्ट’ फिल्म की एक अभिनेत्री ने टाइम्स ऑफ इंडिया के संवाददाता को बताया कि अहमदाबाद के हादसे के बाद इस फिल्म के विभिन्न सहयोगी आपस में बातचीत कर रहे थे कि यह हादसा तो फिल्म से मिलता-जुलता है। कुछ समय पहले बॉलीवुड की फिल्म ‘धूम’ के बारे में कहा गया था कि डकैती की कुछ घटनाएं इससे प्रभावित हुईं। हैदराबाद डायमंड डकैती केस में एक गैंग लीडर ने स्वीकार किया था कि उसे ‘धूम’ से आइडिया मिला। एक अन्य बॉलीवुड फिल्म ‘जिस्म’ के बारे में कहा गया था कि दिल्ली में एक हत्या इससे प्रभावित हुई।आज के समाज पर असर डालने में सिनेमा तथा टीवी की बहुत असरदार भूमिका है, अत: यह बार-बार कहा जाता है कि हिंसा व अपराध की वारदातें सिनेमा व टीवी पर दिखाते हुए बहुत सावधानी बरतने की जरूरत है। विशेषकर अपराध करने के तौर-तरीकों को बहुत विस्तार से बताने व हिंसा के नए तौर-तरीकों को आकर्षक ढंग से प्रस्तुत करने से परहेज जरूरी है।
ब्रिटेन में प्रो. एलिजाबेथ न्यूसन की अध्यक्षता में 25 बाल मनोवैज्ञानिकों ने कुछ समय पहले प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में कहा कि टीवी और वीडियो फिल्मों में दिखाई जा रही हिंसा का बच्चों और युवाओं में हिंसक प्रवृत्तियां बढ़ाने की दृष्टि से निश्चित असर पड़ता है। विशेषज्ञों की इस टीम ने इस बारे में खेद प्रकट किया कि टीवी और वीडियो पर जिस तरह की हिंसा और क्रूरता दिखाई जाती है और उसके असर को जिस तरह आधुनिक तकनीकी द्वारा बढ़ाया जाता है उसके संभावित दुष्परिणामों की आ॓र मनोवैज्ञानिकों ने आवश्यक ध्यान नहीं दिया है या उन्हें वास्तविकता से कम कर आंका है।
संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रो. सेंटरवेल और उनके सहयोगियों ने अनेक वर्षों के अध्ययन के बाद इस विषय पर जो निष्कर्ष निकाले हैं वे तो और भी चौंकाने वाले हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा में 1950 के दशक में और उसके बाद तो टीवी का प्रसार दूर-दूर तक हुआ। इसके अगले दो दशकों में ही इन देशों में हत्याओं की दर लगभग दुगुनी हो गई। अध्ययन में इसके लिए मुख्य रूप से टीवी को दोषी पाया गया। केवल हत्याएं ही नहीं अन्य हिंसक अपराध बढ़ाने में भी टीवी पर दिखाई गई हिंसा को इस अध्ययन ने दोषी पाया।
एक विशेष चिंताजनक खतरा तब उत्पन्न होता है जब कुछ युवक टीवी तथा सिनेमा पर हिंसा व अपराध देखकर उसी तरह के अपराध स्वयं करने की कुचेष्टा करते हैं। कुछ समय पहले प्रकाशित समाचारों के अनुसार फिल्म ‘दिव्य शक्ति’ के असर में कुछ लड़कों ने एक लड़की का अपहरण किया, उसे जबरन शराब पिलाई और उसके शरीर पर कुछ चित्र बनाए।
अंग्रेजी फिल्म ‘बानी एंड क्लाइड’ प्रदर्शित होने के बाद इसी शैली के अनेक अपराधों के समाचार मिले। सेनदियागो में हाईस्कूल के एक छात्र ने टीवी में एक हत्याकांड देखकर अपने ही परिवार के 3 सदस्यों की बहुत क्रूर ढंग से हत्या कर दी, तो इस केस की सुनवाई करने वाले जज ने भी कहा कि संभवत: इस क्रूर अपराध में टीवी-फिल्म की भी जिम्मेदारी थी। एक अमेरिकी टीवी सीरियल में बम बनाने की प्रक्रिया देखने के बाद फ्रांस के एक युवक ने भी बम बनाने का प्रयास किया पर इस कारण हुए विस्फोट में स्वयं मारा गया। इस युवक की मां ने उस टीवी चैनल पर हत्या का आरोप लगाया।
विशेष चिंता की वजह वे टीवी कार्यक्रम या फिल्में हैं जहां अपराध या हत्या करने के तौर-तरीकों को अधिक विस्तार से दिखाया गया। कुछ समय पहले दूरदर्शन पर व्योमकेश बख्शी जासूस का सीरियल दिखाया गया जिसमें कई बार यह विस्तार से दिखाया गया कि दैनिक उपयोग की साधारण वस्तुओं का दुरूपयोग हत्या के हथियार के रूप में कैसे हो सकता है। इस तरह के कई टीवी कार्यक्रमों का निश्चित ही कोई बुरा इरादा नहीं होता है, पर अनजाने में वे अपराध या हत्या का सरल उपाय लोगों में फैला देते हैं जिसके दुष्परिणाम हो सकते हैं। अत: इस बारे में सावधानी बरतने की जरूरत है।
अमेरिकी बच्चों के बारे में कहा गया है कि 16 वर्ष की आयु होने तक औसतन वे टीवी पर 33000 हत्याएं तथा दो लाख हिंसक घटनाएं देख चुके होते हैं। इतनी अधिक हिंसा देखने से आक्रमकता बढ़ती है और हिंसा के प्रति जो स्वाभाविक विरोध मनुष्य में होता है वह कम हो जाता है।
एक समस्या यह भी है कि बॉलीवुड में सफलता का जो तथाकथित फार्मूला प्राय: चर्चा में रहता है, उसमें कुछ समय से अपराध तथा हिंसा को काफी महत्व दिया जा रहा है। टीवी चैनलों की टीआरपी रेटिंग बढ़ाने में भी प्राय: अपराध के सनसनीखेज समाचारों को बहुत महत्वपूर्ण मान लिया गया है। पर कमर्शियल सफलता के फार्मूले की तलाश में यह नहीं भूला जा सकता है कि समाज को सुरक्षित रखने व हिंसा तथा अपराध को कम करने की भूमिका निभाना भी बहुत जरूरी है।
किसी सेंसर का इन्तजार किये बिना स्वयं ही किसी दुष्परिणाम की संभावना को दूर करने के लिए फिल्म व टीवी निर्माताओं को इसके मद्देनजर और सजग हो जाना चाहिए।
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Wednesday, July 30, 2008

संघर्ष की धाराएं

अनिल चमड़िया
भारत में राजनैतिक आंदोलनों का इतिहास पुराना है। अगर एक-डेढ़ सौ साल के आसपास का इतिहास देखें तो आदिवासी इलाकों में अंग्रेज साम्राज्यवाद के खिलाफ विद्रोह हुए। अंग्रेजों ने अपना साम्राज्य बनाए रखने के लिए जिस निरंकुश नौकरशाही ढांचे को निर्मित किया उसके खिलाफ विद्रोह तेजी से पनपा। उसके बाद ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के खिलाफ संघर्षों की लंबी कड़ी शुरू होती है। इसके बाद के भारत में सामंतवाद का विरोध राजनैतिक आंदोलन के केंद्र में खडा़ दिखाई देता है। वह सामंतवाद जो साम्राज्यवादी विचारों और निर्मित होने वाली निरंकुश व्यवस्था की धूरी के रूप में दिखाई देता है। यानी अपने यहां आंदोलन का वास्तविक अर्थ किसी व्यवस्था के आमूलचूल परिवर्तन की अपेक्षा में प्रगट होता रहा है। उसकी मुख्य अंतर्धारा राजनैतिक विकल्प की रही है। लेकिन यह भी देखा जा सकता है कि अंग्रेज साम्राज्यवाद के खिलाफ विद्रोह की पृष्ठभूमि को सिंचने वाला आदिवासी समाज यानी इस समाज का सबसे ज्यादा शोषित, पीड़ित, दमित व्यक्ति तमाम तरह के व्यवस्था विरोधी आंदोलनों के बावजूद अपनी स्थिति से निकल नहीं पाया है। उसे कल भी लूटना जारी था और वह निरंतर आज तक जारी है। आज सबसे ज्यादा ‘जनांदोलन’’ आदिवासी इलाके में ही हो रहे हैं और इलाकों में ही बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ सबसे ज्यादा एमआ॓यू (मैमोरडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग) साइन हो रहे हैं। जनांदोलन भी हो रहे हैं और गांव के गांव उजड़ रहे हैं।
आज जनांदोलन वे सभी तरह के आंदोलन कहलाने लगे हैं जिसमें किसी जाति, धर्म, समुदाय, पेशेवर तबके के किसी मुद्दे या समस्या को लेकर आंदोलन होते हैं। जनांदोलन से वास्तव में जो ध्वनि निकलती है क्या ये स्थितियां उसके अर्थ का विस्तार हंै या फिर उसके संकुचन के उदाहरण हैं ? इस पर बाद में विचार कर सकते हैं कि विस्तार और संकुचन की वाहक कौन सी शक्तियां रही है यानी किसने इस तरह से जनांदोलनों की धारा को विस्तारित किया है या फिर उसकी अर्थवत्ता को समेटने की योजना तैयार की। लेकिन यहां एक बात बहुत स्पष्ट तौर पर सामने आती है कि जनांदोलनों का अर्थ महज परिवर्तनगामी राजनीति के वाहक के रूप में नहीं रह गया है। सुधार के लिए संगठित कार्यक्रम नियमित तौर पर किए जाते हैं तो वे भी जनांदोलन कहलाते हैं। किसी समस्या या सीमित अर्थों वाले मुद्दों को लेकर विरोध कार्यक्रम, मांग के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं तो उन्हें भी जनांदोलन कहा जा सकता है। अब तो कई बार सरकारें भी अपने किसी कार्यक्रम के लिए जनांदोलन करने का नारा देने लगती हैं। क्या इससे यह बात बहुत हद तक स्पष्ट नहीं होती है कि जनांदोलन के साथ विरोध की चेतना और परिवर्तन की राजनीति का जो पक्ष अनिवार्य रूप से जुडा़ दिखता रहा है वह बेहद कमजोर हुआ है। राजनीति अनिवार्यत: जनांदोलन का आधार होती है। कई बार राजनैतिक पक्ष को व्यापक अर्थों में प्रगट कर यह साबित करने की कोशिश की जा सकती है कि किसी क्षेत्र विशेष में किसी यथास्थितिवादी या वर्चस्ववादी समूहों की पक्षधर सरकार की नीति के खिलाफ सामूहिक भागेदारी वाले कार्यक्रमों को राजनैतिक जनआंदोलन कैसे नहीं माना जा सकता है? उसे भी माना जा सकता है और तमाम सुधारवादी आंदोलनों को भी राजनैतिक माना जा सकता है।
वह कौन सी तारीख है जब आंदोलनों को जनांदोलन कहने की जरूरत पड़ी। पहली बात तो यह कि यह जरूरत पड़ी क्यों? जहां तक ख्याल है कि अस्सी के बाद आंदोलनों में इस शब्द का तेजी से विकास दिखाई देता है। शायद 1974 के जेपी के नेतृत्व में इंदिरा गांधी के नेतृत्ववाली कांग्रेस की सत्ता के खिलाफ जो आंदोलन चला और जो सरकार बनी उसके भी विफल हो जाने के बाद राजनीतिक स्तर पर बुनियादी परिवर्तन की धाराओं ने अतीत से अलग आंदोलन की एक नई धारा विकसित करने की जरूरत पर बल देने के लिए जनांदोलन की शुरूआत करने की रणनीति बनाई हो। एक वैसे राजनैतिक लेखों का संग्रह सामने है जिसमें जनांदोलनों से जुड़े लेखक बुद्धिजीवी के नाम शमिल है। लेकिन उनमें से एक को छोड़कर किसी ने भी जनांदोलन शब्द का इस्तेमाल नहीं किया है। एक लेखक जिसने जनांदोलन शब्द का इस्तेमाल किया है उसका रिश्ता वर्गवादी विचारधारा से रहा है। ऐसा भी नहीं देखा गया कि पीपुल्स मूवमेंट जैसा कोई अंग्रेजी का शब्द भी अंग्रेजी की पुस्तक में दिखाई दिया हो। आज जिन अर्थों में जनांदोलन प्रचलित हुआ है वह अंग्रेजी के पीपुल्स मूवमेंट का ही अनूदित रूप हो सकता है। यहां इस बात की व्याख्या खुद करें कि अपनी भाषा में उपजे जनांदोलन और शासक की भाषा के अनूदित जनांदोलन से यहां क्या आशय है।अस्सी के बाद जो राजनीतिक स्थितियां बनीं, वह मतदाताओं के जबरदस्त मोह भंग का दौर था। यह बहुत खोज का विषय नहीं है कि उस राजनैतिक परिवर्तन में जन की कोई भूमिका नहीं थी। यहां जन का इस्तेमाल उन अर्थों में ही किया गया है जिन अर्थों में अब किया जा रहा है। जैसे जेपी ने झारखंड के धनबाद में आचार्य राममूर्ति को यह देखने के लिए कहा कि उनकी इस महती सभा में कितने आदिवासी आए हैं। तो आचार्य ने जेपी को जो सूचना दी उससे जेपी बेहद दुखी थे। उस सभा में आदिवासी नहीं थे। आदिवासी से मतलब 1947 के बाद के भारत का सबसे ज्यादा शोषित, दमित तबका जो शायद अपने पुराने जीवन स्तर से जरा भी ऊपर नहीं आ पाया है। सत्ता ने उसके साथ रिश्ता बनाने के बजाय उन्हें अपने लिए खाद पानी बनाए रखा। इस तरह से मोहभंग केवल मध्यवर्ग का हुआ था। असंतोष जो समाज के दबे–कुचले पिछड़े–दलितों के बीच पनप रहा था वह तेज हुआ था। सत्ता और राजनीतिक पार्टियों का रिश्ता जन और नागरिकों से लगभग समाप्त हो गया था।
अस्सी के बाद एक खास प्रवृत्ति यह दिखाई देती है कि समूह का रूप एक व्यक्ति के नेतृत्व में परिवर्तित होता चला गया। उस समय मास मोबलाइजेशन, लोक राजनीति जैसी शब्दावली सामाजिक कार्यकर्ताओं के इर्द–गिर्द दिखाई देने लगी। हालांकि दूसरे स्तर पर राजनीतिक जनांदोलनों की भी कोशिश जारी देखी जाती है। उनके बीच मोर्चाबद्ध होने की पहल भी होती है। लेकिन उनका राजनैतिक आंदोलन क्रमश: विस्तार के बजाय सिकुड़ता चला जाता है। जिस तरह से मोहभंग की स्थिति थी और असंतोष का विस्तार हुआ था उसे जनांदोलन में बदलने की क्षमता उनमें नहीं दिखी दूसरी तरफ विभिन्न हिस्सों में विभिन्न मुद्दों और विषयों पर कई कई ‘जनांदोलन’ दिखाई देने लगते हैं। यह कोशिश भी की गई कि गैर चुनावी और गैर पार्टीगत, राजनीतिक प्रक्रिया से अलग एक धारा विकसित की जाए। इसे आंदोलन की धारा के रूप में तो स्थापित किया गया, लेकिन व्यापक राजनैतिक सरोकार वहां से गायब था। तबकों, समूहों, समुदायों के आंदोलन थे, तो लेकिन दूरियां भी थीं। तब सार्वजनिक जीवन में सामाजिक कार्यकर्ताओं या आज की प्रचलित शब्दावली में स्वयंसेवियों की भूमिका बदल गई और वह ऐसी राजनीतिक भूमिका के रूप में विकसित हुई जो किसी वैकल्पिक राजनीति के विस्तार की संभावना पैदा करने की क्षमता से दूर थी।
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फुटकरीकरण जनांदोलन का

राजकिशोर
आदमी को चोट लगे और वह चीखे नहीं, यह नहीं हो सकता। दांत दबा कर मार खाना मनुष्य के स्वभाव में नहीं है। अगर ऐसा होता, तो दुनिया से दास प्रथा कभी खत्म नहीं होती। यह भी सच है कि गुलामी के संस्कार जाते-जाते ही जाते हैं। इसलिए बहुत लोगों को सिर उठाने में समय लगता है। जब बहुत सारे लोग किसी एक मुद्दे पर संगठित होकर सिर उठाते हैं, तो यह जनांदोलन की शक्ल ले लेता है। भारत का स्वतंत्रता संघर्ष ऐसा ही एक महान जनांदोलन था। जनांदोलन से पैदा होने वाला यह नया देश अपनी मूल प्रतिज्ञा को ही भूल जाए, यह एक अस्वाभाविक स्थिति है। लेकिन आंखों दिखती सचाई से कौन इनकार कर सकता है?
जनांदोलन के लिए कम से कम तीन तत्व चाहिए-- मुद्दा, लोग और नेतृत्व। इनमें से कोई भी एक तत्व गायब हो तो आंदोलन नहीं हो सकता। जरूरी नहीं कि मुद्दा जायज हो। हमने पिछले दो दशकों में राम जन्मभूमि मंदिर को केंद्र में रख कर एक ऐसे आंदोलन को जन्म लेते और पूरे उत्तार भारत में फैलते देखा है, जिसके बिना देश का काम बखूबी चल सकता था। लेकिन नेतृत्व इतना शक्तिशाली था कि आंदोलन घनीभूत होता गया और हजारों लोगों की जान गई तथा समाज में फूट-सी पड़ गई। इस तरह के कई नकारात्मक आंदोलन हम देख चुके हैं। वस्तुत: नकारात्मक आंदोलन भी किसी न किसी कुंठा से शक्ति और ऊर्जा पाते हैं। इसका ताजा उदाहरण कश्मीर में अमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी गई और फिर वापस ले ली गई जमीन का मुद्दा है। अगर यह जमीन न दी गई होती, तो कोई मुद्दा नहीं था। लेकिन दी गई जमीन वापस ले लेने पर हिन्दू मानस में अपमानित होने का भाव पैदा हो गया। इसी तरह राजस्थान के गुर्जर हाल तक शांत थे। लेकिन जब उन्हें यह लगा कि आरक्षण का आश्वासन देकर उनका वोट लेने का छल किया गया था, तो वे उन्माद में आ गए। अब गोरखालैंड की मांग को लेकर गर्मी पैदा होने की बारी आती दिखाई पड़ रही है। सुबास घीसिग जिस मिशन को आधी दूर तक ले जा कर बैठ गए और सत्ताा सुख में डूब गए, उस मिशन को आगे बढ़ाने के लिए कुछ और खूंखार लोग सामने आ रहे हैं। गोरखालैंड कहे जाने वाले इलाके में खून-खराबा होना निश्चित है।
हाल के समय में जो एक तार्किक और संगत आंदोलन देखने में आया, वह है नर्मदा बचाआ॓ आंदोलन। कहा जा सकता है कि नर्मदा बचाआ॓ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर भारत की अंतरात्मा का उज्ज्वल प्रतीक बन चुकी हैं। उन्होंने नर्मदा नदी पर बनाए जा रहे बड़े-बड़े बांधों के खिलाफ जितना सश‡ जनांदोलन खड़ा किया, वह एशिया में एक अद्भुत उदाहरण है। इसकी खास बात यह थी कि इस जनांदोलन का आधार दलित और आदिवासी जन थे। देश का खाता-पीता मध्य वर्ग कुल मिलाकर उसके खिलाफ ही था। सरकार के तीनों अंग -- विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका -- मुख्यत: इसी वर्ग के लोगों द्वारा संचालित होते हैं। इसीलिए जबरदस्त प्रतिवाद के बावजूद नर्मदा को नहीं बचाया जा सका। उसे जगह-जगह बांधा जा रहा है। चूंकि मेधा पाटकर ने इस एक मुद्दे से ही अपनी पहचान को जोड़ रखा है, इसलिए अब उनके पास कोई मुद्दा नहीं बचा। जहां भी जन आक्रोश की लपटें दिखाई देती हैं, वे पहुंच जाती हैं। उनके पास वैकल्पिक व्यवस्था की एक पूरी सोच दिखाई देती है, पर वे सत्तार के दशक तक के समाजवादी या साम्यवादी आंदोलन की तरह कोई व्यापक मुद्दों वाला जनांदोलन खड़ा करने में असमर्थ हैं। यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण घटना है।
ऐसा लगता है कि किसी सक्षम नेतृत्व के अभाव में इस समय कोई ऐसा बड़ा जनांदोलन खड़ा नहीं हो पा रहा है जिसमें मुद्दों की व्यापकता हो और जो एक विस्तृत इलाके को अपने सम्मोहन में ले सके। नई अर्थनीति के खिलाफ और स्वदेशी के पक्ष में राष्ट्रीय स्तर का जनांदोलन संगठित किया जा सकता था। यह गुंजाइश अभी भी है। लेकिन यह न हो पाया, न होता हुआ दिखाई देता है। मुद्दों की कोई कमी नहीं है, लोग भी उत्तोजित हैं, पर सक्षम नेतृत्व का अभाव है। लगता है कि एक बड़ी सेना की छोटी-छोटी टुकड़ियां कभी यहां तो कभी वहां किसी न किसी स्थानीय मुद्दे पर तलवार भांज रही हैं। लेकिन उन्हें किसी वैचारिक व्यवस्था और व्यापक संगठन से जोड़ने वाला नेतृत्व अभी तक पैदा नहीं हो पाया है। परिणामस्वरूप जनांदोलनों का फुटकरीकरण हो रहा है। छोटी-छोटी घटनाओं के माध्यम से लोगों का असंतोष विस्फोटक ढंग से प्रगट हो रहा है, पर इससे सत्ता के तिलिस्म को कोई निर्णायक चोट नहीं लगती। वह और मजबूत होता जाता है। वह जितना मजबूत होता जाता है, उतना ही आततायी हो रहा है। इसलिए असंतोष उत्तारोत्तार विस्फोटक तथा हिसक होता जाता है। लोग कहीं थानेदार को पीट देते हैं, कहीं सरकारी अधिकारियों को घेर लेते हैं, कहीं आग लगा देते हैं, कहीं सड़क बंद कर देते हैं और कहीं अपने इलाके में सरकारी नुमाइंदों को घुसने नहीं देते। पुलिस गोली चलाती है, आतंक फैलाती है और फिर स्थिति जस की तस हो जाती है।
निश्चय ही कुछ जनांदोलन अहिसक और जनशक्ति की प्रखर अभिव्यक्ति पर टिके हुए हैं। सूचना का अधिकार आंदोलन ऐसा ही है। राजस्थान के एक गांव से शुरू हुआ यह जनांदोलन काफी हद तक सफल रहा है। अब वह प्रशासनिक धूल-गर्द को साफ करने में अहम भूमिका निभा रहा है। लोकसभा में नोट उछाल कांड की वास्तविक पृष्ठभूमि की पड़ताल करने के लिए कई व्यक्तियों और संस्थाओं ने स्पीकर से सूचना के अधिकार के तहत आवश्यक जानकारियां मांगी हैं। सामाजिक अंकेक्षण (सोशल ऑडिट) का आंदोलन भी एक ऐसी ही कार्रवाई है। इसके माध्यम से राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में चल रहे तरह-तरह के भ्रष्टाचार को सामने लाने में अद्भुत सफलता मिली है। विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) के खिलाफ भी जगह-जगह फुटकर आंदोलन चल रहे हैं। ये आंदोलन वस्तुत: किसानों के विस्थापन को रोकने के लिए हैं। यह मामूली बात नहीं है कि जमीनी स्तर के उग्र विरोध को देखते हुए गोवा सरकार को नीतिगत घोषणा करनी पड़ी कि हमारे राज्य में कोई सेज नहीं बनेगा। यह भी दिलचस्प है कि गोवा की ग्राम पंचायतें, एक के बाद एक, अपने-अपने क्षेत्र में बड़ी-बड़ी बिल्डगें न बनने देने और सभी प्रकार की मेगा परियोजनाओं के खिलाफ लगातार प्रस्ताव पास कर रही हैं। सिगुर और नंदीग्राम के संघर्ष से कौन अवगत नहीं है?
इसलिए यह कहना उचित नहीं है कि जनांदोलन का समय अब नहीं रहा। समाज के विभिा वगा की पीड़ा बढ़ रही है, लोग विस्थापित हो रहे हैं, आर्थिक नीतियों के कुपरिणाम आने शुरू हो गये हैं, अपराध की वृद्धि और पुलिस की नििष्क्रयता से लोग छटपटा रहे हैं, कार्यस्थलों पर नियोक्ताओं की मनमानी बढ़ गई है। ऐसे बेचैन हालात लोगों को क्यों नहीं आंदोलित करेंगे? मुद्दे हैं, छटपटाते हुए लोग भी हैं, पर उनका नेतृत्व करने के लिए विचारशील, चरित्रवान और व्यवस्थित लोग सामने नहीं आ रहे हैं। वे समाचारपत्रों में लेख लिखकर, सेमिनारों में व्याख्यान दे कर और साथियों के साथ चर्चा कर संतुष्ट हैं, मानो लातों के देवता बातों से ही मान जाएंगे। इसलिए जगह-जगह स्वत: स्फूर्त संघर्ष हो रहे हैं। चिनगारियां उठती हैं और बुझ जाती हैं। अन्याय और अत्याचार में भारत देश की शक्ति जितनी संगठित हो कर प्रगट हो रही है, उनका प्रतिवाद करने वाली शक्तियां उतनी ही बिखरी हुई और असंगठित हैं।
लेकिन क्या यह जरूरी है कि आज का सच ही कल का भी सच बन जाएगा? माफ कीजिए, इतिहास कभी भी लंबे समय तक एक ही करवट नहीं बैठा रहता।
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आंदोलनों के फलित और दलित

सुभाष गाताडे
दिल्ली विश्वविघालय के समाजविज्ञान विभाग की प्रोफेसर सुश्री अमिता बाविसकर पर्यावरण आंदोलन से लंबे समय से जुड़ी रही हैं। उन्होंने नर्मदा आंदोलन पर बहुत कुछ लिखा है। अपनी हालिया किताब के एक हिस्से में उन्होंने मध्य प्रदेश के निमाड़ इलाके में आंदोलन का मजबूत आधार रहे पाटीदार समुदाय (जो राजनीतिक तौर पर ताकतवर है व आर्थिक तौर पर समृद्ध है) के बहाने आंदोलन के सामने खड़े द्वंद्वों की चर्चा की है।उनके मुताबिक निमाड़ के पाटीदार भूस्वामी जो दैनिक आधार पर मजदूरों को रखते हैं, उन्हें हर दिन 12 से 15 रूपए प्रतिदिन की मजदूरी देते हैं जबकि कानूनी न्यूनतम मजदूरी 25 रूपए है। उनके मुताबिक कुछ साल पहले जब एक जागरूक सब- डिवीजनल मैजिस्ट्रेट ने न्यूनतम मजदूरी लागू करने के लिए कोशिशें तेज की तो नर्मदा आंदोलन की रैलियों में अपनी ताकत का अहसास करानेवाले इन्हीं पाटीदारों ने ‘आंदोलन के दौरान हासिल सांगठनिक कुशलताओं का इस्तेमाल करके इस अफसर का तबादला करवा दिया।’ उनका यह भी कहना था कि भूमिहीन मजदूर जो ‘कडमाल जैसे गांवों में आबादी का 40 फीसद हैं, जो मुख्यत: अनुसूचित जाति और जनजातियों से संबद्ध हैं, वे नर्मदा आंदोलन के प्रदर्शनों से और स्थानीय स्तर पर एनबीए कार्यकर्ताओं के बीच लगभग अनुपस्थित दिखते हैं।
’नर्मदा बचाआ॓ आंदोलन जैसे आंदोलन के बारे में आंदोलन की सहयात्री अमिता बाविसकर ऐसे कई अन्य सवालों को उठाती हंै, जिनमें यह स्वर भी उठता प्रतीत होता है कि विस्थापन को लेकर उठे इस आंदोलन में दलित के लिए वाकई कोई जगह है या नहीं। इसे बताने के लिए किसी अध्येता की आवश्यकता नहीं कि नर्मदा आंदोलन के कर्णधारों ने अपने इन पाटीदार समर्थकों पर (जो न्यूनतम मजदूरी देने जैसे संविधानप्रदत्त कर्तव्य को भी पूरा नहीं करते)अंकुश लगाने के लिए कोई कदम उठाया होगा।
ऐसी बात नहीं है कि ऐसे प्रश्न पहली दफा उठे हैं जो आंदोलन के बारे में जनमानस में व्याप्त छवि को अवश्य थोड़ा असहज बनाते हैं। अक्सर होता यही रहा है कि आंदोलन की पक्षधरता का प्रश्न इतनी बड़ी अहमियत हासिल करता रहा है कि सहयात्रियों द्वारा उठाए सवालों को भी एक तरह से उनके खेमा बदलने के तौर पर समझा जाता रहा है और वहीं खारिज किया जाता रहा है।
अगर 90 का दशक बड़ी परियोजनाओं से निर्मित विस्थापन के खिलाफ उठे जनांदोलनों को लेकर चर्चित रहा है, तो 21 वीं सदी की पहली इकाई का उत्तरार्द्ध विशेष आर्थिक क्षेत्र के निर्माण, विशेषकर कारपोरेट समूहों को लिये औने-पौने दाम उपलब्ध की जाती रही जमीन के मसले पर उठती जन हलचलों के इर्द-गिर्द केंद्रित होता दिखा है। आजादी के साठ साल बाद भी इस देश में भूमि सुधार के मसले को लेकर कभी तत्पर न दिखीं विभिन्न सत्ताधारी पार्टियों द्वारा कारपोरेट समूहों को जमीनें उपलब्ध कराने को लेकर दिखायी जा रही अतितत्परता निश्चित ही चौकाने वाली रही है। लेकिन आप देखेंगे कि सेज विरोधी आंदोलन दो किस्म की विसंगतियों, खामियों का शिकार रहा है। जहां सारी लडा़ई का फोकस जमीन देने या न देने पर या उसके बेहतर दाम हासिल करने पर केंद्रित रहा है, वहीं उन आर्थिक नियमों को प्रश्नांकित नहीं किया जा रहा है कि किस तरह ऐसे क्षेत्र मुल्क विशेष में मजदूरों के अधिकारों की सुरक्षा करनेवाले, कर, व्यापार, उत्पादन-शुल्क आदि को लेकर बने निश्चित कानूनों के तमाम ‘बंधनों’ से मुक्ति के क्षेत्र होंगे। दूसरे यह प्रश्न भी नहीं पूछा जा रहा कि इलाका विशेष में रहनेवाले उन लोगों के पुनर्वास का क्या होगा जो मेहनत मजदूरी करके खाते-कमाते रहे हैं, जिनके पास जमीन का एक टुकडा़ भी नहीं रहा है। पिछले दिनों एक अखबार ने हरियाणा में एक ऐसे ही विशेष आर्थिक क्षेत्र पर स्टोरी की थी और उजागर किया था कि एक तरफ जहां सेज निर्माण के बाद मिले मुआवजे से जमीन के मालिकानों अपनी ऊंची-ऊंची हवेलियां बनवायीं और गाड़ियां खरीदीं, वहीं दूसरी तरफ वहां के भूमिहीनों को, जो मुख्यत: दलित थे, जो सदियों से वहीं रहते आए थे, उन्हें बिल्कुल खदेड़ दिया गया।
यह सही है कि जनता के विशष्टि मुद्दों पर खड़े जनांदोलनों का अपना गति विज्ञान होता है और वह काफी हद तक आंदोलन के सहभागी तत्वों की सामाजिक-सांस्कृतिक स्थिति और नेतृत्व के दृष्टिकोण से तय होता है। अगर आंदोलन को अधिकाधिक व्यापक बनाना है तो लोगों की सहभागिता जरूरी होती है। ऐसे में नेतृत्व अगर बेहद सचेत न हों तो कई बार लोक संस्कृति व परंपरा की दुहाई देते हुए ऐसे प्रतीकों को, आंदोलन के ऐसे रूपों को अपनाया जाता है, जो जनता के एक हिस्से को अलगाव में डाल सकते हैं। मध्य प्रदेश में जनांदोलनों से लंबे समय से जुडे़ योगेश दीवान ने नर्मदा आंदोलन में इस्तेमाल प्रतीकों पर काफी कुछ लिखा है। उनका कहना है कि आंदोलन के दौरान नर्मदा मैया की आरती उतारना एक चर्चित मामला है।
अभी पिछले साल जब भोपाल में आंदोलन का लंबा धरना चला था, वहां पर भी मंच पर नर्मदा मैया की आरती उतारी गयी जबकि धरने में न केवल अल्पसंख्यक समुदाय के लोग बल्कि दलित-आदिवासी सभी शामिल थे। उनके मुताबिक आरती उतारने जैसा रूप जो वर्ण समाज में अधिक प्रचलित है हिंदू संस्कृति से बहिष्कृत रखे गए दलितों-आदिवासियों को या अल्पसंख्यक समुदाय के लिए आंदोलन से एकाकार होने में बाधा नहीं बनता होगा ? इस संदर्भ में वह आंदोलन के सेक्युलर रूपों को अपनाने पर जोर देते हैं।
विडंबना यही कही जाएगी कि उच्च-नीच अनुक्रम पर टिके भारतीय समाज में दलितों के अपने आंदोलन भी कहीं न कहीं उन्हीं तरीकों का अनुकरण करते दिखते हैं जिसे वर्ण समाज के कर्णधारों ने प्रचलित किया हो। प्रख्यात समाजशास्त्री एम एन श्रीनिवास इस प्रक्रिया को ‘संस्कृतिकरण या संस्कृताइजेशन’ के तौर पर संबोधित करते हैं। दो साल पहले हरियाणा के हिसार में अनुसूचित जाति व जनजातियों से संबद्ध कर्मचारियों के एक फेडरेशन द्वारा आयोजित संगोष्ठी में इसका गहराई से एहसास हुआ। सभा की शुरूआत में फेडरेशन के चर्चित नेता ने महात्मा बुद्ध के नाम वंदना करने का निर्देश दिया और वहां जुटे जनसमुदाय ने नेता की बात का सम्मान करते हुए बौद्धवंदना की। कुछ समय तक मुझे लगा कि रेल विभाग के कर्मचारियों की सभा में मैं बैठा हूं या किसी धार्मिक आयोजन का हिस्सा हूं।
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जनांदोलनों की दरकती जमीन

विभांशु दिव्याल
‘जनांदोलन’ एक बहुत ही भ्रामक, लचीला और बहुमुहां शब्द है जिसके हजार संदर्भों में हजार अर्थ निकाले जा सकते हैं और हजार व्याख्याएं की जा सकती हैं। इसलिए पहले चरण में ही यह समझ बनानी जरूरी है कि भारतीय लोकतंत्र और वर्तमान भारतीय सामाजिक- आर्थिक परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में जनांदोलन से हम क्या व्यावहारिक अर्थ निकालना चाहते हैं या इस शब्द को हम क्या अर्थवत्ता देना चाहते हैं। इसे स्पष्टता से समझने के लिए हाल ही के कुछ उन आंदोलनों का उल्लेख किया जा सकता है जिनमें भारी संख्या में जनसमूह शामिल थे और जिनके कारण देश के कई हिस्सों में स्थानिक तौर पर सार्वजनिक जीवन अस्त-व्यस्त और त्रस्त रहा। अमरनाथ बोर्ड जमीन मामले में कश्मीर घाटी के मुसलमान तब तक जन-जीवन को ठप किये रहे जब तक कि अमरनाथ बोर्ड को दी गई भूमि का सरकारी आदेश निरस्त न कर दिया गया। इसके विरोध में जम्मू के हिदू संगठन लंबे समय तक आक्रामक आंदोलन चलाते रहे और देश के अनेक हिस्सों में उग्र प्रदर्शन हुए। इससे पहले अनुसूचित जाति में आरक्षित होने के लिए गुर्जरों ने उग्र आक्रामक और परिवहन जाम कर देने वाला जातीय आंदोलन कई दिनों तक चलाया और उत्तार भारत के लोगों को यातायात व्यवस्था भंग हो जाने के कारण पचासियों तरह के कष्ट झेलने पड़े। इससे पहले एक आंदोलन तसलीमा नसरीन के विरूद्ध हुआ था जिसके दबाव में बांग्लादेश की इस निर्वासित लेखिका को मार्क्सवादी पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से एक बार फिर से निष्कासन झेलना पड़ा। एक और आंदोलन सिखों का था जो उन्होंने एक दूसरे मत के संस्थापक बाबा राम रहीम के विरूद्ध कई दिनों तक चलाया था और अब भी यह एक छोटे से उकसावे पर फूट पड़ता है। ऐसे और इसी तरह के मिलते-जुलते आंदोलन किसी न किसी बहाने से देश में होते ही रहते हैं। इनमें जनता की भागीदारी अपनी-अपनी कल्पित अस्मिताओं, हितों के लिए अथवा अपनी उपेक्षा, अपने अपमान या अपने किसी आहत बोध के प्रतिकार के लिए होते हैं। लेकिन क्या ये आंदोलन जनांदोलन है?


अगर इस तरह के आंदोलनों को हम जनांदोलन मान लेंगे तो एक अर्थगत संकट खड़ा हो जाएगा। इन और ऐसे आंदोलनों की उभार या निर्माण प्रक्रिया को देखें तो इनके पीछे दूसरे वर्ग- समूह, धर्म-समूह या जाति-समूह के प्रति नफरत और तिरस्कार का भाव निहित रहता है। इनकी सामाजिक ष्टि क्षुद्र और स्वार्थ केंद्रित होती है। इनकी पहुंच किसी धर्म विशेष, किसी जाति विशेष या किसी क्षेत्र विशेष तक होती है। लोकतांत्रिक आजादी के नाम पर किए गए ये आंदोलन वस्तुत: सामाजिक विग्रह को बढ़ाते हैं, लोकतंत्र का संस्थानात्मक क्षय करते हैं और अपनी परिणति में जनविरोधी होते हैं। ये आंदोलन जो अधिकतर किसी जाति या धर्म-समूह के भावनात्मक दोहन पर आधारित होते हैं, अधिक-से-अधिक जन उभार, जन उत्तोजन या जन विचलन कहे जा सकते हैं लेकिन जनांदोलन नहीं।


इस अर्थ में जनांदोलन उन्हें कहा जा सकता है जो सामान्य जनता के व्यापक हितों पर केंद्रित हों, जड़तावादी और विघटनकारी संकुचित जीवन मूल्यों के विरूद्ध समन्वयवादी, समतावादी, न्यायवादी और बहुजन नागर समाज के सामाजिक, आर्थिक , सांस्कृतिक उत्थान पर केंद्रित हों। यानी जो आर्थिक असमानता के विरूद्ध हों, जातीय दुराग्रहों के विरूद्ध हों, सांप्रदायिक श्रेष्ठताबोध के विरूद्ध हों और लोकतांत्रिक समाज को किसी भी तरह से क्षति पहुंचाने वाली स्थापित परंपराओं और उनके औचित्यीकरण के विरूद्ध हों। मतलब साफ है कि इस समय इस तरह के आंदोलन लगभग अनुपस्थित हैं। जो आंदोलन इस समय होते और चलते दिखाई देते हैं और जो प्राय: मीडिया को अपनी आ॓र खींचते रहते हैं वे वस्तुत: जनविरोधी आंदोलन हैं, जानंदोलन नहीं। अब अगर जनांदोलन नहीं उभर रहे हैं तथा जन विक्षोभ और जन असंतोष अन्यान्य तेवरों और बहानों के साथ उभर रहे हैं तो यह समूचे भारतीय लोकतंत्र के लिए एक चिता की बात है।


यहां यह कहना भी जरूरी है कि जनांदोलन जहां एक आ॓र पुरानी मूल्य व्यवस्थाओं को चुनौती देते हैं तो नई मूल्य व्यवस्थाओं का निर्माण भी करते हैं। जनांदोलनों द्वारा संचालित ध्वंस और निर्माण की प्रक्रिया एक सतत प्रक्रिया है जो नियमबद्ध और अनुशासित तरीके से संचालित होती है। यह प्रक्रिया वृहद् समाज के हित में निश्चित लक्ष्यों के लिए होती है। यह आवेश का निरंकुश तथा नियंत्रणविहीन विस्फोट नहीं होता, बल्कि व्यापक जन अपेक्षाओं की पूर्ति के लिए और व्यापक जन असंतोषों के निराकरण के लिए सुनिश्चित रणनीति के तहत अमानवीय जड़ताओं के विरूद्ध सतत जनसंघर्ष होता है। ऐसा जनसंघर्ष जिसमे संकुचित स्वाथा तथा क्षुद्र हितों के लिए कोई जगह नहीं होती।


कहने की जरूरत नहीं है कि इस समय का भारत लगभग जनांदोलनविहीन भारत है, जिसमें र्आिथक वैषम्य, राजनीतिक कदाचार, सर्व स्तरीय भ्रष्टाचार, क्षुद्र अस्मिताओं के अभद्र दुराग्रह सांप्रदायिक शक्तियों के ध्रुवीकरण, जातियों के टकराव, व्यावसायिक विचलन, सांस्कृतिक अवमूल्यन, सामाजिक संबंधों के बिखराव, पर्यावरणीय संकट आदि निरंतर बढ़ रहे हैं। भारत को अब वास्तविक जनांदोलनों की जरूरत है जो इन सारी दुष्प्रवृत्तिायों विरूद्ध देश की व्व्व राष्ट्रीयसहारा कॉम जनता के वास्तविक हितों को समाहित कर सकें तथा इन हितों पर दावेदारी करने वाले दलालों, ठगों, बेईमानों और अपने-अपने समूहों के मतांध ठेकेदारों को समाज की मुख्यधारा से निर्वासित कर अतीत के कूड़ेदान में फेंक सकें। जनांदोलन इस समय के भारत की एक अनिवार्य मांग हैं और उम्मीद की जानी चाहिए कि भारतीय जनता इस दिशा में सचेत होकर सोचेगी।


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Friday, July 25, 2008

गंगा का आख़िरी गर्जन

विशाल बांध, दरकते पहाड़ और ढहते गांव. भारत की सबसे ताकतवर और उतनी ही पूजनीय नदी गंगा को उसके उद्गम के पास ही बांधकर उसे मानवनिर्मित सुरंगों में भेजा जा रहा है. क्या ऐसा करके महाविनाश को तो दावत नहीं दी जा रही? तुषा मित्तल की रिपोर्ट.
बरसात के मौसम में रात के वक्त भागीरथी घाटी में घुप्प अंधेरा नजर आता है. इसमें सुनाई देती है हिमालय की ढलानों से टकराने वाली तूफानी हवा और घनघोर बारिश के थपेड़ों की आवाज. और ऐसे में अगर आप भागीरथी के किनारे बसी किसी जगह पर हों तो नदी की भयानक गर्जना हर दूसरी आवाज को बौना कर देती है.
मगर दिन निकलने के साथ दृश्य भी बदलने लगता है और आवाजें भी. पहाडों को खोखला करती ड्रिलिंग मशीनों की कर्कश ध्वनि, पीले हेलमेट, कंक्रीट, खोखली सुरंगों में सांय-सांय बहती हवा और ऐसा बहुत कुछ जो बताता है कि यहां मनुष्य प्रकृति पर विजय पाने की लड़ाई लड़ रहा है. नदियों को बांधने की वो लड़ाई जिसका मकसद देश की आर्थिक तरक्की के लिए बिजली पैदा करना है.
भारत में 4,500 बड़े बांध हैं. हाल-फिलहाल तक उत्तरकाशी और गंगोत्री के बीच इनमें से सिर्फ एक यानी मनेरी भाली-1 हुआ करता था. मगर अब 125 किलोमीटर लंबे इस इलाके में पांच बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण अलग-अलग चरणों में है. अगर सब कुछ निर्धारित योजना के मुताबिक चला तो भागीरथी यानी गंगा को अपना वो रास्ता छोड़ना होगा जिस पर वह युगों-युगों से बहती आ रही है. 125 किलोमीटर की इस दूरी में उसे अधिकांश जगहों पर सुरंगों से होकर बहना होगा. गंगा के बारे में कहा जाता है कि वो मुक्तिदायनी है मगर विडंबना देखिए कि वही गंगा अपने ही जन्मस्थल में कैद होकर रह जाएगी.
भागीरथी घाटी में जो हो रहा है उसे अच्छी तरह से समझने के लिए आपको अपनी यात्रा विवादास्पद टिहरी बांध से शुरू करनी होगी जिससे जुलाई 2006 में विद्युत उत्पादन शुरू हुआ था. बांध से बनी झील की लंबाई करीब 60 किलोमीटर है और इसका पानी नीला और जड़ नजर आता है. गंगा की वह पुरानी जीवंतता फिर से वहीं पर नजर आती है जहां ये झील खत्म होती है. मगर यहां भी गंगा की जिंदगी थोड़े ही दिन की मेहमान है.
टिहरी से करीब 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित धरासू नाम की जगह मनेरी भाली जलविद्युत परियोजना का द्वितीय चरण है. यहां जनवरी 2008 से विद्युत उत्पादन शुरू हो चुका है. चूंकि 304 मेगावॉट बिजली बनाने के लिए पानी का टरबाइन पर एक निश्चित ऊंचाई से गिरना जरूरी है इसलिए इस ऊंचाई को हासिल करने के लिए गंगा को 24 किलोमीटर लंबी एक सुरंग से होकर गुजारा जाता है जो उत्तरकाशी से शुरू होती है. यानी 24 किलोमीटर की इस लंबाई में नदी का अस्तित्व लगभग खत्म हो चुका है.
इस क्षेत्र में परियोजनाएं कुछ इसी तर्ज पर बन रही हैं. एक परियोजना की पूंछ जहां पर खत्म होती है वहां से दूसरी परियोजना का मुंह शुरू हो जाता है. यानी नदी एक सुरंग से निकलती है और फिर दूसरी सुरंग में घुस जाती है. इसका मतलब ये है कि जब ये सारी परियोजनाएं पूरी हों जाएंगी तो इस पूरे क्षेत्र में अधिकांश जगहों पर गंगा अपना स्वाभाविक रास्ता छोड़कर सिर्फ सुरंगों में बह रही होगी.
ये बात अलग है कि मनेरी भाली द्वितीय चरण वर्तमान में अपनी निर्धारित क्षमता से काफी कम यानी सिर्फ 102 मेगावॉट बिजली का ही उत्पादन कर रहा है. ये भी गौरतलब है कि इस इलाके में स्थित तीनों बांध—टिहरी और मनेरी प्रथम और द्वितीय—कभी भी अपनी निर्धारित क्षमता के बराबर विद्युत उत्पादन नहीं कर पाए हैं. दिलचस्प है कि सभी जलविद्युत परियोजनाओं को मंजूरी ही इस आधार पर दी गई थी 90 प्रतिशत मौकों पर वे अपनी पूरी क्षमता के हिसाब से बिजली का उत्पादन करेंगे मगर दिल्ली स्थित एक गैरसरकारी संगठन साउथ एशियन नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपुल (एसएएनडीआरपी) के द्वारा जुटाए गए आंकड़े एक अलग ही तस्वीर पेश करते हैं. संगठन ने अपने अध्ययन में जिन 208 बांधों के आंकड़े जुटाए उनमें से 89 फीसदी निर्धारित क्षमता से कम विद्युत उत्पादन कर रहे हैं. 49 फीसदी में तो कुल क्षमता की आधी से भी कम बिजली बन रही है.
एसएएनडीआरपी के संस्थापक हिमांशु ठक्कर कहते हैं, “इससे पता चलता है कि बड़ी संख्या में अव्यावहारिक परियोजनाओं को मंजूरी दी जा रही है. हमें वास्तविक कीमत और वास्तविक लाभों का एक वास्तविक अध्ययन करने की जरूरत है. ये सुनिश्चित करने के लिए कोई भरोसेमंद तंत्र मौजूद नहीं है कि केवल न्यायसंगत परियोजनाओं को ही मंजूरी मिले.”
धरासू से उत्तरकाशी तक के सफर में नदी आपके साथ चलती है. बारिश के मौसम की वजह से आजकल इसमें काफी पानी है मगर स्थानीय लोगों के मुताबिक सर्दियों में ये पानी की एक पतली लकीर सरीखी नजर आती है क्योंकि तब अधिकांश पानी सुरंगों में चला जाता है. इस दौरान नदी को आसानी से पैदल ही पार किया जा सकता है.
भागीरथी घाटी में जो हो रहा है उसके महत्व को समझने के लिए आपको इस नदी की विशालता, इसकी पारिस्थिकी और इस पर निर्भर मानव जीवन के साथ हो रही छेड़छाड़ को समझना जरूरी है.
वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड ने गंगा को दुनिया की उन 10 बड़ी नदियों में रखा है जिनके अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है. गंगा मछलियों की 140 और उभयचरों की 90 प्रजातियों को आश्रय देती है. इसमें पांच ऐसे इलाके हैं जिनमें पाई जाने वाली पक्षियों की किस्में दुनिया के किसी अन्य हिस्से में नहीं मिलतीं. इसके किनारों पर पाई जाने वाली वनस्पति और जंतुओं की इसके पोषण और जल संरक्षण में अहम भूमिका है और ये भूक्षरण को भी नियंत्रण में रखते हैं. गंगा के बेसिन में बसने वाले करीब 45 करोड़ लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इसपर निर्भर हैं.
पर्यावरणविद कहते हैं कि गंगा के पानी में अनूठे बैक्टीरिया प्रतिरोधी गुण हैं. यही वजह है कि दुनिया की किसी भी नदी के मुकाबले इसके पानी में आक्सीजन का स्तर 25 फीसदी ज्यादा होता है. ये अनूठा गुण तब नष्ट हो जाता है जब गंगा को सुरंगों में धकेल दिया जाता है जहां न ऑक्सीजन होती है और न सूरज की रोशनी. ये जलविद्युत परियोजनाएं नदी के रास्ते का बुनियादी स्वरूप भी बदल देती हैं जिससे पानी में जैविक बदलाव आ जाते हैं. उदाहरण के लिए मनेरी भाली प्रथम चरण के लिए जहां से पानी जलाशय में दाखिल होता है वहां पर इसके नमूने बताते हैं कि गुणवत्ता के हिसाब से इसे साफ कहा जा सकता है. मगर जलाशय के आखिर में पानी के नमूने बताते हैं कि ये बुरी तरह से प्रदूषित है. केंद्रीय औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा पिछले साल मई में जारी एक रिपोर्ट बताती है कि भागीरथी में पारे का स्तर भी बढ़ रहा है.
लेकिन ये तो संकट का सिर्फ छोटा सा हिस्सा है. नोबेल पुरस्कार जीतने वाले इंटरनेशनल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज की रिपोर्ट के मुताबिक 2030 तक गंगोत्री ग्लेशियर के आकार में 80 फीसदी तक की कमी आ जाएगी जिससे गंगा, सदानीरा से एक मौसमी नदी में तब्दील हो जाएगी. इसका मतलब है कि सिर्फ 20 साल में इतना पानी ही नहीं बचेगा कि इन बांधों की टरबाइंस चलाई जा सकें.
इसके बावजूद सरकार इन विशाल परियोजनाओं पर अड़ी हुई है. जब तहलका ने पानी की उपलब्धता और व्यावहारिकता से संबंधित डाटा के बारे में केंद्रीय जल आयोग के अध्यक्ष ए के बजाज से जानकारी मांगी तो उनका जवाब था, “गंगा जल से संबंधित डाटा गोपनीय है.”
भागीरथी को सुरंगों और बांधों के जरिये कैद करने का विरोध तो स्थानीय लोग छह साल पहले तभी से कर रहे हैं जब इन परियोजनाओं को मंजूरी दी गई थी. मगर इस विरोध को राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां तब मिलीं जब जाने-माने पर्यावरणविद और आईआईटी कानपुर के पूर्व प्रोफेसर जी डी अग्रवाल ने इसके विरोध में उत्तरकाशी में अनिश्चतकालीन भूखहड़ताल की घोषणा की. पर्यावरण की गहरी समझ रखने वाले अग्रवाल ने इन परियोजनाओं को मातृहत्या जैसा बताया. लोग और साधु-संत उनके समर्थन में उमड़ पड़े और नतीजा ये हुआ कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी दो परियोजनाओं को अस्थाई रूप से रोकने पर सहमत हो गए.
बाद में अग्रवाल दिल्ली आ गए और लोहारीनाग पाला में एनटीपीसी की 600 मेगावॉट की परियोजना के विरोध में उनकी भूख हड़ताल जारी रही. कुछ दिन पहले उन्होंने अपना अनशन तब तोड़ा जब ऊर्जा मंत्रालय ने उन्हें आश्वासन दिया कि गंगा के अविरल प्रवाह को सुनिश्चित करने के लिए एक कमेटी बनाई जाएगी.
मगर मुद्दा अभी सुलझने से काफी दूर है. तहलका से बात करते हुए केंद्रीय ऊर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंदे कहते हैं, “हमने फैसला किया है कि पानी का बहाव अविरल रहना चाहिए. मगर परियोजनाएं भी चलनी चाहिए. तकनीकी रूप से हमें ऐसा करने का रास्ता खोजना होगा. इसलिए हमने तीन महीने का समय मांगा है. एक कमेटी बनाई जा रही है. भागीरथी के साथ भारत के लोगों की भावनाएं जुड़ी हैं. मैं लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहता. यही वजह है कि हम कोई रास्ता खोजने के लिए सहमत हो गए हैं.”
मगर ये केवल भावनाओं की बात नहीं है और रास्ता खोजना आसान नहीं होगा. शिंदे कहते हैं कि 600 मेगावॉट की परियोजना को पूरी तरह से रद्द नहीं किया जा सकता और विशेषज्ञ कमेटी के साथ निर्माण कार्य भी जारी रहेगा. वे कहते हैं, “2000 करोड़ रुपये की अग्रिम मंजूरी हो चुकी है. अब आप इसे रोकने के लिए कह रहे हैं. जब छह साल पहले ये परियोजनाएं शुरू हुई थीं तो मैं मंत्री नहीं था. जब भाजपा ने इनका शिलान्यास किया था. तब तो किसी ने इनका विरोध नहीं किया.”
विडंबना ये भी है कि भारत में बड़े बांधों की योजनाओं को उस दौर में आगे बढ़ाया जा रहा है जब दुनिया भर में बड़े बांधों को हटाया जा रहा है. अकेले अमेरिका में ही 654 बांध खत्म किए जा चुके हैं और 58 दूसरे बांधों के साथ भी ऐसा ही किया जाना है. इनमें से कई ऐसे हैं जिन्हें इसलिए हटाया जा रहा है ताकि सामन मछलियों के निवास को बहाल किया जा सके. गौरतलब है कि सामन मछलियां प्रजनन के लिए समुद्र से नदी के उद्गम की तरफ जाती हैं. बांध उनके इस सफर को रोककर उनकी प्रजाति को संकट में डालते हैं. दरअसल देखा जाए तो सामन मछलियों की घटती संख्या अमेरिका में कई ऐतिहासिक अदालती फैसलों का कारण बनी है. इनमें से सबसे प्रभावशाली उदाहरण है एलव्हा और ग्लाइंस कैन्यन बांध को खत्म किया जाना जो देश के सबसे ऊंचे बांधों में से एक था. इसे हटाने में 10 करोड़ डालर खर्च हुए.
अमेरिकन रिवर्स नामक एक गैरसरकारी संगठन से जुड़ीं एमी कोबर कहती हैं, “इन बड़े बांधों को हटाया जाना इस बात का सूचक है कि अपनी नदियों को लेकर देश के नजरिये में महत्वपूर्ण बदलाव आया है. इस मुल्क को ये अहसास हो गया है कि एक स्वस्थ, अविरल नदी एक समुदाय के लिए सबसे कीमती संपत्तियों में से एक हो सकती है.”
मगर भारत का ऊर्जा मंत्रालय इस बात को समझने के लिए तैयार नहीं है. सवाल ये है कि आखिर जब सारी दुनिया में बड़े बांधों के खिलाफ आंदोलन हो रहा है तो भारत में इन पर अब भी क्यों जोर दिया जा रहा है? शिंदे से पूछिए और जवाब आता है, “भारत में 30 हजार मेगावॉट बिजली की कमी है. हम इतनी बिजली कहां से लाएंगे? चीन को देखिए. उनके थ्री गॉर्जेज डैम को देखिए. जब चीन ये कर रहा है तो हम क्यों नहीं कर सकते? टिहरी में 1000 मेगावॉट की परियोजना के लिए हमें इतनी आलोचना झेलनी पड़ी. अगर आप बिजली चाहते हैं तो आपको कुछ न कुछ बलिदान तो करना ही होगा.”
दरअसल देखा जाए तो टिहरी इसका एक सटीक उदाहरण है कि अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को लेकर भारत की समझ में कितना धुंधलापन है. भारत में किसी भी बांध परियोजना का इसके पूरा होने के बाद मूल्यांकन नहीं किया गया है. टिहरी दुनिया का आठवां सबसे ऊंचा बांध है. मार्च 2008 तक बांध पर कुल 8,298 करोड़ रुपये खर्च हो चुके थे जो उस अनुमानित लागत से कहीं ज्यादा है जो परियोजना के प्रारंभ में तय की गई थी. इसकी प्रस्तावित विद्युत उत्पादन क्षमता 2,400 मेगावॉट थी मगर वर्तमान में यह केवल 1000 मेगावॉट बिजली का उत्पादन कर रहा है. यानी क्षमता के आधे से भी कम.
भागीरथी घाटी में घट रही इस त्रासदी का एक मानवीय पहलू भी है. उसे समझने के लिए आपको प्रेम दत्त जुयाल जैसे किसी व्यक्ति से मिलना होगा. जुयाल के पास धुंधले पड़ते जा रहे कागजों का एक गट्ठर है. ये वो दस्तावेज हैं जिन्हें वे तब से इकट्ठा कर रहे हैं जब से उनके घर के नीचे की जमीन धंसनी शुरू हुई. जुयाल जलवाल गांव के निवासी हैं जो उस जगह से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर है जहां कभी पुराना टिहरी शहर हुआ करता था. जलवाल और इसके आसपास के गांवों को पुनर्वास योजना का हिस्सा इसलिए नहीं बनाया गया क्योंकि ये टिहरी झील के 840 मीटर ऊंचाई के स्तर से ऊपर स्थित थे. पिछले साल से उनके खेत दरक रहे हैं और गांववालों की जान लगातार हो रहे भूस्खलन से खतरे में है. ये सब इसलिए हो रहा है क्योंकि टिहरी झील का पानी लगातार उस बुनियाद को कमजोर कर रहा है जिस पर ये गांव बसा है. इससे भी बड़ी त्रासदी ये है कि जिस बाजार में ये लोग अपनी सब्जियां बेचते थे और जिन स्कूलों में इनके बच्चे पढ़ने जाते थे, वे सब झील में दफन हो गए हैं. नये टिहरी शहर जाने के लिए इन्हें 250 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है. यानी इनकी जिंदगी पूरी तरह से अलग-थलग पड़ गई है. मगर उनके पुनर्वास की मांग पर ध्यान देने वाला कोई नहीं है.
भारतीय लोक प्रशासन संस्थान द्वारा 54 बांधों पर कराया गया एक विस्तृत अध्ययन बताता है कि एक बड़े बांध से विस्थापित होने वाले लोगों की औसत संख्या 44,182 है. भारत में 4,500 बड़े बांध हैं. अगर माना जाए कि एक बांध से कम से कम 10,000 लोग भी विस्थापित होते हैं तो इसका मतलब ये है कि बड़े बांधों के कारण अब तक करीब साढ़े चार करोड़ लोगों को अपनी जड़ों से उखड़ना पड़ा है. उत्तरकाशी के नजदीक बसे जोशियाड़ा और कनसैण नामक गांवों के लोगों को भी अब ये अहसास होने लगा है कि उनकी नियति भी कुछ ऐसी ही होने वाली है.
जोशियाड़ा में मुख्य सड़क पर बद्री सेमवाल अपना हार्डवेयर की दुकान चलाते हैं. दुकान की ऊपरी मंजिल पर ही उनका निवास भी है. उनकी छत से साफ देखा जा सकता है कि मनेरी भाली द्वितीय चरण की झील का पानी धीरे-धीरे उनके घर को निगलने बढ़ा आ रहा है. सेमवाल कहते हैं, “टरबाइन चलाने के बाद ही अचानक उन्हें अहसास हुआ कि हम भी डूब क्षेत्र में आ रहे हैं. अब वे कहीं पहाड़ में हमारे पुनर्वास की बात कर रहे हैं. मगर वहां दुकान कैसे चलेगी. मैं जिंदगी कैसे चलाऊंगा?” जोशियाड़ा के दूसरे परिवारों की भी यही व्यथा है.
उत्तरकाशी से मनेरी भाली प्रथम चरण के लिए जाते हुए हमारी मुलाकात अतर सिंह पंवार से होती है. फैशनेबल जींस और टी शर्ट पहने इस व्यक्ति को देखकर कहीं से भी नहीं लगता कि उसके 38 साल पहाड़ में ही गुजरे हैं. पंवार के हाथ में कुरकुरे का पैकेट और बिसलेरी की बोतल है और वे किसी शहरी बाशिंदे जैसे ही लगते हैं. उन्होंने हाल ही में एनटीपीसी में अनुबंध पर मजदूरी शुरू की है. कभी वे पशु चराते थे और आलू व राजमा की खेती करते थे. वे कहते हैं, “मैं तब कहीं ज्यादा खुश था जब मेरे पास अपनी जमीन थी. तब मैं आजाद था. अब मुआवजे में भले ही लाखों रूपये मिल गए हों मगर जल्द ही ये खत्म हो जाएंगे. पैसा तो आता है और चला जाता है. जमीन हमेशा आपके पास रहती है.”
थोड़ा और आगे चलने पर हम पाला गांव पहुंचते हैं जहां विनाश की शुरुआत हो चुकी है. एक किलोमीटर दूर ही पाला-मनेरी सुरंग की खुदाई की जा रही है. यहां के घरों में दरारें पड़नी शुरू हो गई हैं. पानी के स्रोत सूख रहे हैं क्योंकि सुरंग के मलबे ने प्राकृतिक झरनों का रास्ता रोक दिया है.
अतर सिंह पंवार को कोई ऐसी शक्ति एक शहरी व्यक्ति के रूप में बदल रही है जिस पर उनका बस नहीं चल रहा. अपने जैसे सैकड़ों लोगों की तरह वे शहरी नहीं बनना चाहते. वे गंगा को अविरल बहते देखना चाहते हैं. ठीक वैसे ही जैसे उनकी पीढ़ियां सदियों से देखती आई हैं. मगर उनके लिए ऊर्जा मंत्रालय का जवाब है कि उत्तरी ग्रिड को और भी ज्यादा बिजली चाहिए. भले ही उनके जैसे लोगों को आसानी से पीने का पानी तक न मिले मगर शहरों के शापिंग मॉल्स का दिन-रात रोशनी में नहाना जरूरी है.

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अपना नहीं अमेरिकी हित

सीताराम येचुरी
(वरिष्ठ माकपा नेता)
परमाणु करार को किसी एंगल से देशहित में नहीं कहा जा सकता। समझौता 123 अमेरिका के हाइड एक्ट से नियंत्रित है जो अमेरिका के राष्ट्रीय कानून का हिस्सा है। करार के बाद भारत की विदेश नीति पर अमेरिकी दखल बढ़ जाएगा। ऐसी भी आशंका है कि विदेश नीति से जुड़े कई मुद्दों के बारे में हमें अमेरिका से हर साल सर्टिफिकेट लेना और अमेरिकी कांग्रेस को सूचित करना होगा। भारत करार के बाद दोबारा परीक्षण करने के अपने अधिकार भी खो देगा। फिर ईंधन की आपूर्ति सुनिश्चित करने के प्रति भी करार में कोई प्रतिबद्धता नहीं है। मैं समझता हूं करार के बाद भारत की स्थिति अमेरिका के पिछलग्गुओं की तरह होगी। अमेरिका अपनी हर नीति में भारत को अपना समर्थन करने को बाध्य करेगा। एशिया में अमेरिका का जो हित है उसे पूरा करने के लिए वो भारत को अपने सहयोगी की भूमिका में उतारने को इच्छुक है। भारत की नीति अभी तक बहुधुव्रीय विश्व बनाने की रही है। अब सरकार देश का वह चोला उतार कर उसे गुटीय व्यवस्था की आ॓र मोड़ रही है।
सरकार के आगे अभी महंगाई जैसी बड़ी चुनौती थी किंतु उसने इसे अनदेखा किया और अमेरिकी हितों वाले समझौते की आ॓र बढ़ना जारी रखा। सरकार के हटवादी रवैये ने ही हमें समर्थन वापस लेने को बाध्य किया। हमने सरकार को न्यूनतम साझा कार्यक्रम के आधार पर ही समर्थन दिया था। इस कार्यक्रम में परमाणु करार जैसी कोई बात नहीं थी। सरकार करार के विरोध में संसद के बाहर व भीतर उठी अशंकाओं को दूर करने की जगह हमारी आपत्तियों पर उंगली उठाती रही। हमें विकास विरोधी कहा गया। सरकार करार से जुड़े कई बिंदुओं पर लोगों को गुमराह करती रही है। करार की दिशा में सरकार ने जब बढ़ना चालू किया उसी समय से उसका अमेरिका प्रेम भी बढ़ता गया है। अमेरिका प्रेम ही है कि हम ईरान के परमाणु मुद्दे पर आंख मूंद कर उसके खिलाफ हंै। गुटनिरपेक्ष आंदोलन में हमारी भूमिका भी काफी घट गई है। मध्य एशिया में आज हमारी छवि एक विरोधी राष्ट्र की बन रही है। फिलस्तीन से बढ़ती दूरी और इजराइल से नजदीकी इस आ॓र इंगित करती है।
अमेरिका के साथ हमारे संयुक्त युद्धाभ्यास और उसके साथ हुए उपकरण सहयोग समझौता से जाहिर है कि अमेरिका हमें अपना सैन्य सहयोगी बनाने को उतारू हैं। परमाणु करार हमारी रक्षा और विदेश नीति की स्वतंत्रता और हमारी आर्थिक जरूरतों के खिलाफ है। सवाल केवल अमेरिका विरोध का नहीं बल्कि देश की संप्रुभता, स्वतंत्रता और विदेश नीति की रक्षा का है। फिर करार को ऊर्जा जरूरतें पूरी करने के लिहाज से भी जायज नहीं ठहराया जा सकता। ऊर्जा सुरक्षा डील करने का बहाना भर है। परमाणु ऊर्जा वैसे भी काफी महंगी पड़ती है। ऊर्जा की संकट ही है तो हमें अन्य वैकल्पिक उर्जा के विकास पर ध्यान देना चाहिए।
www.rashtriyasahara.com से साभार