Tuesday, September 9, 2008

आपदा प्रबंधन की आपदाएं

अनिल चमड़िया
अपने समाज में भेड़ चाल की मानसिकता सबसे ज्यादा संगठित और सक्रिय दिखती है। संसद में पूछे जाने वाले सवालों की फेहरिस्त में यह देखकर आश्चर्य हो सकता है कि पिछले कई वर्षों से देश में बाढ़ के समाधान को लेकर बाढ़ग्रस्त राज्यों के सांसदों ने कोई सवाल नहीं पूछा। क्या यह माना जाए कि संसद सदस्यों ने बाढ़ को एक मौसम की तरह मान लिया है? संसद सदस्यों की मानसिकता पूरी सत्ता की मानसिकता है। यही मानसिकता तो राज करती है। एक खास पहलू और है। सत्ता की मानसिकता हर क्षेत्र में ऊंच-नीच का भेद खड़ी कर देती है। बाढ़ आपदाओं की सूची में सबसे निचले पायदान पर दिखती है। नई आपदाएं अब ऊपर की श्रेणी में पहुंच गई हैं। जिस तरह से आपदा की सूची में आपदाओं की एक वर्ण व्यवस्था बनती है, उसी तरह से आपदाओं से ग्रस्त इलाके की सूची में एक ऐसी ही व्यवस्था बनती है। उड़ीसा और गुजरात की आपदाओं पर दो भिन्न दृष्टिकोण देखे गए थे। अब बिहार और असम के मामले में भिन्नता देखी जा सकती है। आखिर यह मानसिकता क्यों जड़ जमाए हुए है? क्या बिना इस पर प्रहार किए आपदाओं को लेकर कोई सार्थक बात हो सकती है? इस तरह यह भी देखा जाए कि अब आपदाओं को रोकने के लिए योजना पर कम बातचीत होती है। आपदा प्रबंधन पर ही ज्यादा बातचीत होती है। ज्यादा बातचीत के सबूत के लिए पिछले दसेक वर्षों के दौरान संसद में सरकार से पूछे जाने वाले सवालों को आधार बनाया जा सकता है। कई आपदाएं प्राकृतिक होती हैं। लेकिन अब स्थिति यह बन गई है कि जो आपदाएं प्राकृतिक नहीं मानी जा सकती हैं, जिनके बारे में तय है कि वे आपदाएं आएंगी और उन्हें नियंत्रित किया जा सकता है उन्हें भी प्राकृतिक आपदाओं की सूची का स्थायी हिस्सा मान लिया गया है। बाढ़ ऐसी आपदाओं में हैं। सूखा को भी उसमें शामिल किया जा सकता है। खेतों को पानी मिले इसके लिए सिचाई की व्यवस्था हो तो उसे दैविक प्रकोप मान लेने से बचा सकता है। लेकिन योजनाकारों के जेहन में यह बात बैठी हो कि लोगों के विचारों में इस तरह की आपदाओं को दैविक बने रहने दिया जाए और उसमें ही उसकी भलाई है तो ऐसी आपदाओं को प्राकृतिक आपदाओं की सूची में ही स्थायी रूप से डालने की योजना बनती रहेगी। बिहार के कोसी आपदा को तो देखकर लगता है कि इस तरह की भी कोशिश हो सकती है कि बाढ़ के नाम पर बड़ी तबाही भी खड़ी की जा सकती है।
दरअसल व्यवस्था की एक मानसकिता होती है और वह हर स्तर पर सक्रिय रहती है। उसका उद्देश्य समानता मूलक कोई समाज खड़ा करने का नहीं है। ऐसी सत्ता में काबिज वर्ग को अपने हितों की ही चिंता होती है। हित यदि इस बात में है कि आपदाओं को नियंत्रित करने की योजना की बजाय आपदा प्रबंधन पर ज्यादा जोर दिया जाए तो क्या देखने को मिल सकता है? संसद में यदि पिछले कई वर्षों से आपदा प्रबंधन के बारे में ही सवाल पूछे गए तो इसे इस दौर की मानसिकता की पड़ताल का आधार बनाना चाहिए। यह प्रबंधन बाजारवाद की भाषा के रूप में आता है। दूसरी आपदाओं के बाद उससे अपने हित साधने वाले वर्ग और इस तरह के प्रबंधन के बीच टकराव चल रहा है। इसलिए 2005 में आपदा प्रबंधन अधिनियम के बनने के बाद जिले स्तर पर आपदा प्रबंधन प्राधिकरण बनाने की योजना का ऐलान किया गया लेकिन देश के कई हिस्सों में तो उसका नाम तक नहीं पहुंचा है।
देश में कई ऐसी समस्याएं हैं जिनके बारे में समाधान की दिशा ही बदल दी गई है। लगता है कि समस्याएं समाधानों के टकराव में फंसी हुई हैं। सत्ता का जोर जिस तरह के समाधान पर होता है उसे समाज के अनुभव खारिज करते हैं। ऐसी स्थिति में सत्ता अपने समाधानों के लिए या तो परिस्थितियां पैदा होने का इंतजार करती है या फिर स्थितियां तैयार करती है। बाढ़ जैसी समस्या का समाधान कैसे होगा? पहले समाज का अनुभव था कि नदियों की धाराओं के साथ छेड़छाड़ न किया जाए। छोटे बांध बनने चाहिए। बिहार में कोसी से जो तबाही हुई है उसमें बाढ़ विशेषज्ञ कह रहे हैं कि बड़ा बांध बनना चाहिए। वहां साढे पांच हजार मेगावाट बिजली भी पैदा की जा सकती है। लेकिन अब बिजली के लिए सरकार परमाणु की तरफ चली गई है और बाढ़ और सूखा से बचने के लिए देश की सारी नदियों को जोड़ देने की योजना में भिड़ी हुई है। आपदाओं के नुकसान की भरपायी की प्रबंधकीय व्यवस्था कर रही है। पहले कहा जाता था कि आपदा के लिए फंड तैयार किया जाए। अब एक मंत्रालय बनाने पर जोर दिया जा रहा है। सुधारों की इस दिशा से अब तक क्या किसी ऐसी समस्या का समाधान हो सका है?
ढांचे विचारों से चलते हैं। विचारों में जब बाढ़ और सूखे को मौसम की तरह आपदाओं को मान लेने की मानसिकता है तो उसमें प्रबंधन का ठीक-ठाक ढांचा खड़ा हो पाएगा, यह कहना बड़ा मुश्किल है। इस बार बिहार की तबाही के बाद एक अनुभव यह हुआ कि बिहार के लिए कुछ पैसे अपनी जेब से देने को लोग तैयार तो दिखे लेकिन वे पैसे किसे दें ताकि वह सही जगह पर पहुंच सकें, यह भरोसा ही ऐसे लोगों के बीच से गायब था। पहले कम से कम लोग यहां तक भरोसा करते थे कि जो ऐसे काम के लिए पैसे लेगा और उसका सही उपयोग नहीं करेगा तो उसे अपने आप सजा मिलेगी। लेकिन परंपराओं, रूढियों, मान्यताओं, सामाजिक मान-मर्यादाओं पर जितने भी ढांचे खड़े थे सब टूट चुके हैं। कोई रिलीफ कमेटी की बात नहीं सुनी जाती।
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पहले भ्रष्टाचार अब बाढ़ में डूबा समाज

निर्मल चंद्र
मधु, मखान, मक्खन, धान और पान से जुड़ी मिथिलांचल की संस्कृति के स्मृतियों में शामिल होने का दौर तो पहले ही शुरू हो गया था, अब इस इलाके का भूगोल भी बदल जाएगा। कोसी ने जो प्रलय ढाया है, उसे अप्रत्याशित नहीं माना जा सकता। गैरजिम्मेदारी के आरोप में बिहार के जल संसाधन मंत्री विजेंद्र यादव कठघरे में खड़े किए जा रहे हैं। उधर, यादव कुसहा बांध की समय से मरम्मत न होने के लिए नेपाल सरकार और वहां के मजदूरों के असहयोग को कारण बता रहे हैं। उचित समय पर पहल न करने के लिए केंद्र सरकार को दोषी मानने वाले भी कम नहीं हैं। बहरहाल, ये सारे आरोप-प्रत्यारोप तो कोसी बांध के रख-रखाव या मरम्मत को लेकर ही चल रहे हैं, पर असल सवाल तो अब भी यही है कि विकास के नाम पर विनाशलीला को आमंत्रण देने की मजबूरी को किस तरह की अक्लमंदी मानी जाए। इस पड़ताल के लिए कोसी परियोजना से जुड़े कुछ ऐतिहासिक पक्षों और तथ्यों की छानबीन जरूरी है।


ब्रितानी शासन के दिनों में पूर्णिया जिला अंग्रेज हाकिमों के बीच ‘काला पानी’ के नाम से कुख्यात था। कोसी को बिहार का शोक कहा जाता है पर तब यह मान्यता यहां रहने वालों की नहीं बल्कि यहां नियुक्त होने वाले अधिकारियों की थी। इस पूरे इलाके में आवागमन की सुविधा न के बराबर थी। पूर्णिया, कटिहार और मानसी रेलवे स्टेशनों से प्राय: बगैर किसी साधन के नदी-नालों को पारकर अररिया, मधेपुरा और सहरसा जाना पड़ता था। यहां पदस्थापित होने वाले अंग्रेज अधिकारी तो अपने परिवार को यहां लाने के बारे में सोच ही नहीं सकते थे। खुद भी वे यहां के हवा-पानी का बहुत अभ्यस्त नहीं होने के कारण मानसिक और शारीरिक रूप से अस्वस्थ हो जाते थे। बता दें कि तब का पूर्णिया जिला ही आज छह जिलों पूर्णिया, अररिया, सहरसा, मधेपुरा, सुपौल और कटिहार में बंट गया है।


भौगोलिक रूप से यहां की बनावट भले थोड़ी भिन्न हो, पर यह पूरा इलाका शुरू से काफी संपन्न रहा है। गांव-गांव में महिलाएं देवकपास से बारीक सूत कातती थीं। विद्यापति के गीत गूंजते थे और इसके साथ घरों की दीवारों तक पर सजती थी मिथिला पेंटिग। प्रकृति की गोद में खेलने वाले नदियों की आरती उतारते थे और दीप प्रवाहित कर बाढ़ का स्वागत करते थे। लोग नाव खेने की कला में तो पारंगत थे ही तैरने की उनकी निपुणता भी विलक्षण थी। बाढ़ के दिनों में कोसी की मुक्त धारा मीलों फैलकर बहती थी। बाढ़ क्षेत्र में ऊंचे झौवे और कास के कारण धारा में तीव्रता नहीं होती थी। इलाके में सघन अमराइयां और बांस के बीट थे, जो प्रवाह के अवरोधक थे। पोखरों और बड़े-बड़े तालाबों की भरमार थी, जो जल प्रकोप को जल संचयन का रूप देते थे। तालाबों के ऊंचे मुहार बाढ़ के समय जान-माल को आश्रय देते थे। बांस के टाट और फूस से बने घर बाढ़ और भूकंप निरोधी थे। बाढ़ में फूस के छप्पर को वृक्ष से बांधकर लोग स्वयं और सामान की हिफाजत कर लेते थे। इस क्षेत्र में धान की एक किस्म बाढ़ के साथ बढ़ती थी। किसान नाव पर सवार होकर इसकी बाली की कई बार कटाई करते थे। सब मिलाकर यह पूरा क्षेत्र सुरक्षित, संपन्न और स्वावलंबी था।


आजादी के बाद विकास की नई बयार बही। नेपाल की सीमा पर कोसी किनारे के बलुआ के जमींदार ललित नारायण मिश्र और उनका पूरा परिवार राज्य और केंद्र में खासे दबंग नेताओं की जमात में शामिल थे। इन लोगों ने इस क्षेत्र को विकास की नई ऊंचाइयां प्रदान करने का निश्चय किया। बाढ़ का नियंत्रण और यातायात की सुविधा के लिए ऊंची सड़कें, पूल-पुलिया, गांवों में पक्के मकान, स्कूल व अस्पताल आदि की बुनियादी सुविधाओं के लिए कोसी की धारा को नियंत्रित करने की कवायद शुरू हुई इस तरह कोसी बांध की महत्वाकांक्षी योजना शुरू हुई। इस क्षेत्र में स्वर्ग उतारने का सपना जगाया गया। स्थानीय लोगों ने भी विकास की नई इबारत लिख रहे नेताओं को पलकों पर बिठाया। इलाके के बुजुगा और दूरदर्शी सोच के लोगों को इस आशंका को निर्मूल ठहराया गया कि कोसी से छेड़छाड़ खतरनाक साबित हो सकता है। सिघिया प्रखंड के मुसहरिया गांव के बुजुर्ग नेता शेर खान ने तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिह से अपनी निकटता का लाभ उठाते हुए योजना की समीक्षा के लिए विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों की टीम गठित कराने में सफल हुए। इस टीम में विदेशों से भी कई जानकारों को शामिल किया गया था। टीम ने अपनी रिपोर्ट में कोसी योजना के खतरों को सही ठहराया। पर इससे भी विकास की राह बढ़ चुके नेताओं के पग नहीं रूके। यही नहीं शेर खान जैसों के विरोध को इलाके की जनता ने दकियानूसी ठहराया। फिर क्या था बांध बनना शुरू हुआ। श्रमदान के लिए स्कूल और कॉलेज के छात्रों की बड़ी सेना गुलजारीलाल नंदा के नेतृत्व में भारत सेवक समाज के बैनर तले जुटी। राष्ट्र निर्माण के लिए तब युवकों का जुनून देखते ही बनता था। बाद में बड़ा धक्का तब लगा जब सुनने में आया कि युवा नेता शालीग्राम की हत्या श्रमदान की व्यवस्था के हिसाब में हेरा-फेरी के विरोध में आपत्तिा करने पर करवाई गई। तटबंध के साथ बराज बनाने के काम में इंजीनियरों, आ॓वरसियरों और दूसरे अधिकारियों की बड़ी फौज लगी। सरकारी काम में भ्रष्टाचार की बाढ़ आ गई। बांध और बैराज के लिए जो इंजीनियरों की टीम बनी, उसने बराज के पश्चिमी किनारे यानी नेपाल की सीमा पर भूदान की परती जमीन पर निर्मली का नया बाजार बसा दिया। फिर क्या था, एक तरफ अधिकारियों को नियमित भुगतान मिलने लगे, वहीं स्मगलिग की नई धारा प्रवाहित हुई। यह पूरा इलाका स्वर्ग तो क्या बनता ललित नारायण मिश्र के गांव में हवाई पी जरूर बन गई। बलुआ बाजार आज अंतरराष्ट्रीय तस्करी के केंद्र के रूप में जाना जाता है।


भ्रष्टाचार के जिस रेत से विकास की इमारतें बनाई गईं, वह आज ढह रही है। तब जिन लोगों के विरोध की आवाजें नहीं सुनी गईं, उनकी आशंका आज सच साबित हुई। अदूरदर्शी विकास का खामियाजा आज यह पूरा क्षेत्र भुगत रहा है। बालू के जमाव और तटबंधों की उचित देखरेख नहीं होने से कोसी ने अपनी दिशा ही बदल ली। आज जब एक साथ चालीस लाख लोग बाढ़ की चपेट में फंसे हैं तो आगे के लिए यह सबक सबको सीख लेना चाहिए कि विकास की बड़ी योजनाओं का लालच न सिर्फ हम भ्रष्टाचार के दीमक को खुराक देते हैं बल्कि यह आम लोगों की तबाही के लिए भी रास्ता खोल देताहै। प्रकृति के साथ जीने वाला समाज अगर प्रकृति को हाथ में लेकर आगे बढ़ना चाहेगा तो विनाशलीला तय है।

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कोसी के कसूरवार

विकास कुमार झा (वरिष्ठ पत्रकार)
कोसी हमारे सामने सचमुच सप्राण सत्ता की तरह खड़ी है। ध्वंस की असह्य लीला दिखाती– उग्र और उग्र उससे भी ज्यादा उग्र। शायद देखती है कि मनुष्य कितना सहन कर सकता है। इस इलाके के अनगिनत लोग हर साल कोसी को जोड़ा छागर कबूलते हैं। मल्लाह हमेशा से इन्हें फूल-दूब और अक्षत चढा़कर ही अपनी नाव खोलते रहे हैं, इस मन्नत के साथ कि ईश्वर न करे कि कोसी अपना वास्तविक तांडव दिखाने पर तुल जाए।’ मिथिलावासी बांग्ला के अमर रचनाकार स्व. विभूतिभूषण मुखोपाध्याय की ये पंक्तियां उनकी दशकों पूर्व लिखित बांग्ला पुस्तक ‘कुशी प्रांगणेर चिठी’ के पृष्ठों में आज फिर नये सिरे से धड़क रही हैं और नीतीश सरकार के सुशासन में हाहाकार करती कोसी की लहरों के बीच तबाह हजारों–हजार कोसीवासियों की चीख भी जैसे उनका साथ नहीं दे रही है। तकरीबन तीन सौ साल बाद कोसी ने फिर से अपना रौद्र रूप दिखाया है। अद्भुत संयोग है कि भारत–नेपाल के तालमेल से नियंत्रित इस प्रचंड नदी का पूर्वी बांध विगत 18 अगस्त,2008 को नेपाल के कुसहा में तभी टूटा जब नेपाल के प्रधान मंत्री पद पर प्रचंड शपथ ग्रहण कर रहे थे।

आज जबकि संपूर्ण कोसी अंचल स्लेट पर खड़िया से बने चित्र की तरह पानी से लगभग धूमिल और मिट चुका है तथा बचा-खुचा अंश भी नष्ट होने की प्रतीक्षा कर रहा है, बजाय कारगर राहत कार्य और पुनर्वास की दृढ़ इच्छाशक्ति के बिहार सरकार हवा में छाती पीट रही है और केंद्र से लेकर विभिन्न प्रांतों की सरकारों से अपने दान पात्र में चेक बटोर रही है। पर इस बात का जवाब आज भी बिहार सरकार के पास नहीं है कि जब 4 अगस्त से ही कोसी में कटाव परिलक्षित होने लगा था और खतरे की घंटी बजने लगी थी तो सूबे की सरकार और उनके अमले कहां थे ? वर्षों–वर्ष से यह स्थायी दस्तूर था कि सावन-भादो के पहले बाढ़ से सुरक्षा के मद्देनजर पहले से ही क्रेट्स, बी।ए। वायर एवं अन्य आवश्यक सामग्रियां जुटा कर डाल दी जाती थीं। पर राज्य में न्याय के साथ विकास के लिए सदा-सर्वदा चिंतित रहने वाली सरकार ने पता नहीं क्यों इस बार ऐसी तैयारियों की आवश्यकता महसूस नहीं की। लिहाजा, 4 अगस्त से 17 अगस्त तक कोसी का स्पर टूटता रहा। दरअसल, मुख्य बांध के पहले स्पर ही क्षतिग्रस्त होता है। लेकिन राज्य का तंत्र एक भीषण सुनिश्चित प्रलय से मुंह मोड़ कर सोया रहा। हाय–तौबा तब शुरू हुई जब पानी नाक के ऊपर चला गया। मुख्य मं®ी नीतीश कुमार ने ‘दैव–दैव आलसी पुकारा’ वाले मुहावरे को चरितार्थ करते हुए कहा, ‘अब भगवान ही बिहार की रक्षा कर सकते हैं।’ बिहार के आला अधिकारीगण अब लगातार सफाई में कह रहे हैं कि सुरक्षात्मक दृष्टि से कार्य करने जब बांध पर सरकारी मुलाजिम गए तो नेपाल के माआ॓वादियों ने कार्य नहीं होने दिया। अगर इस स्थिति को एक क्षण के लिए सच मान भी लिया जाए तो भी यह सवाल उठता है कि क्या बिहार सरकार को समय रहते इन परिस्थितियों की सूचना केंद्र सरकार को नहीं देनी चाहिए थी?

कोसी बांध की रक्षा में सीमावर्ती नेपाल से कोई अवरोध था तो केंद्र नेपाल पर तब दबाव भी बना सकता था। पर प्रलय की प्रतीक्षा की जाती रही। अब प्रलयजनित विनाश पर नाना विवाद और आरोप–प्रत्यारोप का दौर तेज है। पर इसका कोई औचित्य नहीं। श्मशान में सिर्फ शोक का स्थान होता है विवाद और बहसों का नहीं। आज से तकरीबन ढाई दशक पहले 1985 में भी कुसहा में ऐसी ही स्थिति उत्पन्न हुई थी और तत्कालीन बिहार सरकार ने एक सप्ताह में एड़ी-चोटी एक कर कोसी में सुरक्षात्मक कार्रवाई की थी। पर इस बार ऐसा तिल भर भी प्रयास नहीं किया गया। वैसे भी राज्य के अभियंताओं के पास उतने संसाधन नहीं कि वे कुछ कर सकते। सरकार तो खैर चैन से बैठी ही थी। जेनरल रिजर्व इंजीनियर फोर्स (जीआरईएफ) के हवाले करने की बात भी ठंडी पर गई। सेना बुलाने में भी खासा विलंब हुआ। नावों का इंतजाम नगण्य। इस विभीषिका में तबाह हो चुके लोगों को यही मलाल है कि समय रहते अगर प्रभावित होने वाले इलाकों को खाली करने की हिदायत दी गई होती तो आज जान-माल की इस सीमा तक क्षति न हुई होती। प्रभावित सुपौल जिले के प्रतापगंज की 40 वर्षीया झलिया देवी अब किसके पास और क्या फरियाद लेकर जाएगी, जिसके पति खेखन मंडल और दो बच्चे कोसी की तेज धार में बह गए। सिमराही के राहत शिविर में छाती पीट रही झलिया देवी के जीने का मकसद खत्म हो चुका है। सुपौल जिले के छातापुर के करीमन मियां के बीवी–बच्चे को निगल चुकी है कोसी। झलिया और करीमन जैसे लोग बेशुमार हैं जिनका जीवन पूरी तरह आशा रहित हो चुका है।

कोसी में फिलहाल तो बांध बांधना मुमकिन नहीं। जब पानी कुछ कम होगा तभी शायद यह संभव हो सके। वैसे रो-पीटकर कुसहा में मरम्मती का काम चल रहा है। कुसहा को बांधकर फिर से कोसी को अपनी जगह लाने की जद्दोजहद जारी है। अनेक स्वयंसेवी संगठन, राजनीतिक दलों की विभिन्न शाखाएं अनाज, मोमबत्ती, कपड़ों और रूपयों का संग्रह करने में प्राणपण से सक्रिय हैं। यह बिहार का शोकोत्सव है। अशोक के बिहार को लगता है शोक का उत्सव ही सुहाता है। लुटे-पिटे भूखे लोगों का आर्तनाद ही इस उत्सव का संगीत है। इसलिए पहली सितंबर को कोसी के भूखे-बर्बाद लोगों ने राहत कार्य के नाम पर चक्कर मार रही सरकारी गाड़ियों और अनाज के भंडार पर हमला किया। कई दिनों से उनके बच्चों को एक दाना भी नसीब नहीं हुआ था। प्रलय के एक पखवारे बाद भी यह तस्वीर क्या यह बताने के लिए काफी नहीं कि राज्य सरकार का पूरा तंत्र अब भी किस तरह जार-जार है? देश भर से जल, थल और नभ के जवानों ने अपने दो दिनों का राशन इन बाढ़ पीड़ितों को देना तय किया है, जो अनाज तकरीबन 10,000 टन होगा। पर उम्मीद कम है कि सरकार का तार-तार तंत्र जरूरतमंदों के बीच इसे वितरित करा भी पाएगा।

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Tuesday, September 2, 2008

बाढ़ का हवाई सर्वे

ऊपर से बिहार डूबता हुआ बड़ी तसल्ली देता है। ये बिहारी हैं ही इसी लायक। पानी जबतक कंठगत नहीं होता मन मारे बैठे रहते हैं, जैसे ब्रह्मानंद मिल गया हो। ब्रह्मानंद तो वास्तव में अब जाके मिला है, सीधा साक्षात्कार जो हो रहा है ईश्वर से। इंतजाम बड़ा पक्का था। क्या गणित बिठाया था ऐन चुनाव से पहले। ऐसा मणिकांचन संयोग बड़ा दुर्लभ होता है। अच्छे-अच्छे धाकड़ भूतपूर्व भी चकरा गए होंगे कि ऐसी कमाल की कारगर सूझ तब क्यों नहीं आई थी जब बागडोर अपने पास थी। बैठे-बिठाये लक्ष्मी अपने पैरों चलकर कैसे न्योछावर हुई जा रही है दुश्मनों पर- यह देख कर कलेजा मुंह को आता है। दोहाई कोसी मइय्या..... पहले कहाँ थी......
अब बिहारियों को इस बात से क्या लेना-देना कि किसकी गलती से ऐसा प्रलय आया। अरे पहले अपने माय-बाप, नाना-दादा, नानी-दादी, बीवी-बाल-बच्चों का श्राद्ध करेंगे , तर्पण करेंगे, हंडिया-बर्तन, चूल्हा-लकड़ी, माल-जाल, खुरपी-दबिया, सुतरी-संठी, खढ़-पतार, नार-पुआर, कल-इनार का बंदोबस्त करेंगे, जलखै-कलेवा के लिए भलमानुषों के आगे दांत निपोड़ेंगे, और इतना सबकुछ कर लेने की कुव्वत अब शायद किसी माइ के लाल बिहारी में नहीं बच पायेगी। और यह सब भी तभी तो कर पाएंगे जब पानी उतरेगा। आने वाले महीने और भयानक होंगे ऐसा कोसी कछार पर रहने वाले तमाम लोग जानते हैं। कोसी मइय्या अक्टूबर-नवम्बर के महीने में हर साल उफान पर होती हैं और तब उसकी गर्वोन्मत्त-रक्तपिपासु जलधार गरजती-हुंकारती-अट्टहास करती हुई दिशाओं को ध्वस्त-ध्वांत-मर्दित करने को उतावली हो जाती है। नहीं इसे नदी नहीं कहना, यह एक जीवित किंवदंती ही है। कोसी को बाँधने की कोशिश आत्महत्या है, नरमेध है- क्या इसे समय ने साबित नहीं किया? कोसी की कई संततियों ने चीख-चीखकर, निहोरा कर, गुहार लगा कर उन दिनों में भी बहेलियों को रोकने की पुरजोर कोशिश की थी जब वे दाने डाल रहे थे, सपने दिखा रहे थे कि उत्तरी बिहार स्वर्ग बन जाएगा, कि सबके खेत को पानी, हर हाथ को काम मिलेगा, हर घर को सस्ती बिजली मिलेगी। लोगों ने इन सपनों की असलियत महज दो-चार साल में ही देख ली। न बिजली मिली, न खेतों को पानी। कोसी ने अपने स्वभाव के अनुसार सबकुछ रेत से पाट दिया। खेत या तो बहते रहे या सूखते रहे। लोगों की नियति बिल्कुल नहीं बदली। सरकारें आती रहीं-जाती रहीं, इंजीनियर आते रहे-जाते रहे, ठेकेदार आते रहे-जाते रहे, हर साल रेत निकालने, तटबंध को ऊँचा करने की नौटंकी होती रही और करोड़ों का वार-न्यारा होता रहा। जैसे कोसी सदानीरा रही, यह व्यापार भी सदाबहार रहा। वीरपुर के कोसी प्रोजेक्ट और कटैया के हाइडल पॉवर संयंत्र से हर साल करोड़ों का लोहा, बेशकीमती मशीनें चोरी-छिपे बेची जाती रहीं। पिछले कई सालों से न तो नदी-नहरों की सफाई हुई न तटबंधों की मरम्मत। हर साल जुलाई से नवम्बर तक लोग रात-रातभर जागते रहे, कि पता नहीं कल का सूरज देख पाएंगे भी या नहीं। सब जानते थे कि यह डैम अपनी ज़िंदगी पूरी कर चुका है, तटबंधों की इतनी औकात नहीं रह गयी कि कोसी के प्रबल प्रहार के सामने टिक सकें। सब जानते थे कि जो हुआ है उसकी मियाद बहुत पहले ही आ गयी थी। अगर कोई नहीं जानता था तो वह सरकार थी।
छतों पर पिछले दस-पन्द्रह दिनों से फंसे हुए लोग कितने अच्छे वोटर हो सकते हैं। मरो अब, ज़िंदगी बचाओगे या उसकी कुल जमा पूंजी? कुछ लोगों के लिए इसका जवाब कितना आसान है जैसे इस बात का जवाब कि भारत अमरीका परमाणु करार क्यों ज़रूरी है। बचाव की नाव भी जात और राजनीतिक पक्ष बताकर मिल रही है, आगे राहत और पुनर्वास का बड़ा और चमत्कारी खेल तो बाकी ही है। देश की कम्युनिस्ट पार्टियों का बिहार में भविष्य नहीं है यह समझ कर ही वे काम करेंगे। लाशों की सही गिनती करते वक़्त और पुनर्वास के ठेके के समय उनकी उपस्थिति ज़रूर रहेगी। अभी ये उनके मतलब का विषय नहीं है। अभी पोलित ब्यूरो की दस-बीस बैठकें होंगी तब बिहार की बाढ़ पर एक विद्वतापूर्ण और जनपक्षधर वक्तव्य आ सकेगा। आख़िर जनता बड़ी उम्मीद से उनकी तरफ़ देखती रहती है और उन्हें इस बड़ी भारी जिम्मेदारी का अहसास भी तो रहा करता है। जल्दबाजी में कही गयी कोई बात या उठाया गया कोई कदम ऐतिहासिक गलती भी साबित हो सकता है सो संभलकर भइय्या...
जो लोग अपने परिजनों को बाढ़ में डूबे घरों-गाँवों से बाहर निकालने के लिए अफसरों के सामने नाक रगड़ रहे हैं उन्हें तब कितनी मुश्किल हो रही है जब अफसर परिवार के सदस्यों की उम्र और उनको बचाने की अहमियत पर बहस करते हुए यह शर्त रख रहा है कि हम किसी एक सदस्य को निकाल सकते हैं अब जल्दी बताओ कि किसे निकालना है। अवाक्-से लोगों को धकेलते हुए अफसर कहता है जा घर जाकर सोचना फ़िर आना। यहाँ हमारे पास इतना वक़्त नहीं है बहुत काम हैं। चौदह-पन्द्रह दिनों से छतों पर फंसे लोग वैसे भी एक-एककर कम होते जा रहे हैं। लाशों के परिजन उसे कोसी मइय्या को समर्पित कर रहे हैं।
मुझे अंगरेजी फ़िल्म "टाइटैनिक" का अन्तिम दृश्य याद आ रहा है जब मृत्यु की गहन खामोशी में नाव पर आ रहे बचाव दल के मुख्य नाविक की आवाज़ लहरों पर तरंगित होती है....कोई जीवित बचा है वहां.... कोई मेरी आवाज़ सुन पा रहा है....हम आपको बचाने आए हैं....प्लीज हमें जवाब दीजिये..............धीरे धीरे यह आवाज़ सरकार और विपक्ष का कोरस बन जाती है।

Monday, September 1, 2008

एक चिट्ठी मोहल्ले में

( अविनाश जी के मोहल्ले पर छपे चिट्ठे http://mohalla.blogspot.com/2008/08/blog-post_31.htmlपर एक चिट्ठी)
अविनाश जी वीरपुर जहाँ से कोसी ने बिहार को रौंदना शुरू किया है, मेरी जन्मस्थली है। १८ अगस्त को जब कुसहा का तटबंध टूट चुका था और सुपौल के डी एम को इसकी ख़बर नहीं थी, उसके तीन-चार दिनों पहले ही लोगों को आने वाली विपदा का आभास हो गया था, और छिटपुट लोग अपने परिवारों के साथ सहरसा, फोरबिसगंज, पटना अथवा दिल्ली के लिए भागने लगे थे। मेरे बाबूजी माँ, दोनों बहुओं और बच्चों को लेकर आनन-फानन में सहरसा चले गए और घर पर केवल छोटा भाई रह गया। बड़े भाई साहब इधर अपने काम के सिलसिले में ज्यादातर यू पी में रहते हैं और अब भी वहीं थे। वीरपुर, भीमनगर, बलुआ बाज़ार, बिसनपुर, चैनपुर, तुलसीपट्टी , तिलाठी, नरपतगंज, प्रतापगंज, जयनगरा, सुरसर, बथनाहा, सीतापुर, भवानीपुर, अरिराहा, निर्मली, राघोपुर, कटैया आदि गाँव और हाट-बाज़ार सब उस तीस-चालीस किलोमीटर के दायरे में हैं जहाँ कोसी ने सबसे ज़्यादा रौद्र रूप दिखाया है और ये इलाके जो कभी नवधान्य, पटुआ, कास-पटेर, केला, आम-कटहल-लताम-जामुन-बेर-मखान, मूंग-खेसारी-आलू-कोबी-गेन्हारी-नोनहर-सजमनि-तोड़ी-मुनिगा, अड़हुल-जूही-सर्वजाया और माछ-भात से भरे-पूरे थे, अब इतिहास बन गए हैं। आपने बिल्कुल सही कहा है कि अब ये इलाके कभी नहीं बसेंगे।
१८ अगस्त को जब मृत्यु का यह सैलाब आया तो उसकी रफ्तार ऐसी थी जिसमे दोमंजिले-तिमंजिले मकान जड़ों से उखड़ गए, ९०-९५ प्रतिशत लोग अब भी अपने घरों में ही थे और आज इतने दिनों बाद भी जबकि पानी कहीं 1० फीट तो कहीं २० फीट की ऊंचाई तक भरा हुआ है, लोग अपने घरों से निकलने को तैयार नहीं हैं। ज्यादातर लोगों तक अभी कोई मदद नहीं पहुँची है और कई इलाकों में जाने को सेना भी तैयार नहीं है। बलुआ, बिसनपुर, वीरपुर, चैनपुर, छातापुर, प्रतापगंज आदि इलाकों में जहाँ दूर-दूर तक अट्टहास करती कोसी की जलधार के बीच मौत नाच रही है, लील रही है, विगत १८ अगस्त से हजारों जिंदगियां एक अंतहीन आस की डोर को पकड़े घिसट रही हैं। तिनका-तिनका सहेजकर बनाई अपनी दुनिया का मोह छुड़ाये नहीं छूटता। कैसे छोड़ जायें सबकुछ......चले भी जायें तो कैसे कटेगा जीवन? पहले ही किसने इनकी सुधि ली है जो अब लेगा? इन्हें किसी सरकार पर भरोसा नहीं है। मेरे छोटे वाले बहनोई साहब का पूरा परिवार जिसमे एक साल के बच्चे के साथ विधवा बहन, विवाहित छोटा भाई और वृद्ध माता-पिता हैं- १८ अगस्त से अपने गाँव बिसनपुर में फंसे हैं। आजतक उनके बारे में कोई सूचना नहीं मिल सकी है। बहनोई साहब जो मेरी बहन के साथ लुधियाना में रहते हैं, अपने सम्बन्धियों को फ़ोन कर-करके हताश हो गए हैं। कोई बिसनपुर जाकर जान जोखिम में डालने को तैयार नहीं।मैं ख़ुद उनको दिल्ली से फोन लगाता हूँ तो फट पड़ते हैं- किसी को चिंता नहीं है, सब अपना देखने में लगे हैं। फ़िर यह सोचकर कि वह ख़ुद घर के बड़े बेटे होकर भी नहीं पहुँच सके-एक तो अर्थाभाव और दूसरे मकान बदलने की अनिवार्यता की वजह से क्योंकि वर्त्तमान मकान मालिक काफी परेशान कर रहा है और इस हालत में मेरी बहन को दो छोटे बच्चों के साथ अकेले छोड़कर कैसे गाँव चले जायें? फ़िर भी वे कहते हैं- २-३ अगस्त तक मकान बदलकर निकल जाऊँगा।मुझे नहीं मालूम परिवार के अबतक सकुशल होने की कितनी उम्मीद उनके अन्दर बची है।
बड़े बहनोई साहब सपरिवार फोरबिशगंज, अररिया में हैं जहाँ से बाहर निकल पाना लगभग असंभव है। सरकार ने वहां शिविर लगाये थे पर विगत दो दिनों से बाढ़ का पानी प्रवेश कर जाने के बाद शिविर वहां से हटाये जाने की चर्चा चल रही है। करीब एक लाख शरणार्थी अभी वहां रह रहे हैं। फोरबिशगंज बाज़ार एक टापू की शक्ल ले चुका है और शायद एक दो दिन में वहां भी हालात बिगड़ने वाले हैं।
छोटे भाई को वीरपुर से निकालने के लिए बड़े भाई साहब २५ अगस्त को किसी तरह दस हज़ार में प्राइवेट नाव लेकर वीरपुर पहुंचे और रात भर नाव पर दोनों भाई सुबह का इंतजार करते रहे ताकि रास्ता भटकने अथवा बह जाने से बचें पर सुबह इतनी मूसलाधार बारिश शुरू हो गयी कि अँधेरा छा गया और वहां से निकलना अनिवार्य हो गया। नाव तेज़ धार में बेकाबू होकर कुसहा की तरफ़ चली गयी और बड़ी मशक्कत के बाद वे लोग किसी तरह भंटाबाड़ी, नेपाल में किनारे पर पहुँच सके।वहां से किसी-किसी तरह सहरसा पहुंचे तब चार दिनों बाद सबके जान में जान आई।
पिताजी वीरपुर के ललित नारायण मिश्र कॉलेज के हिन्दी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त होने के बाद स्थानीय स्तर पर साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियाँ चला रहे थे। बड़ी मुश्किल से एक दर्जन लोगों का परिवार चलाते हुए एक घर बना पाए थे। नौकरी ऐसी थी जिसमें कभी भी समय पर तनख्वाह नहीं मिली। अब पेंशन भी समय पर नहीं मिलता। २०-२५ बीघे पुश्तैनी खेत वहीं वीरपुर में थे जिसमें साल भर का अनाज उपज जाता था। अब सब कुछ एक इतिहास का हिस्सा है। छोटा भाई बेरोजगार है और बड़े भाई साहब बड़े होने नियतियाँ झेलते हुए पैंतालीस की उम्र में भूगोल नाप रहे हैं। मैं तो दिल्ली में सपरिवार माशा अल्लाह.....
सच यही है कि फिलहाल सहरसा में २००० रुपये किराये पर एक दो कमरों वाला मकान लेकर पूरा परिवार रह रहा है पर कबतक और आगे क्या होगा कुछ नहीं पता। न अनाज है, न बर्तन, न कपड़े, न बिस्तर, न चूल्हा और न अब आग ही बची है। सब बुझ गया ...बिखर गया...हवा हो गया। यह तो फ़िर भी एक ऐसे परिवार की कहानी है जिसने इतनी भारी विपदा में भी जीने का जुगाड़ कर लिया पर क्या होगा उन लाखों निरीह, असहाय और पहले से ही असंभव जिंदगी जी रहे लोगों का जो सबंधु-बांधव पटना और दिल्ली और पंजाब और मुंबई और जाने कहाँ निकल पड़े हैं बची-खुची जिदगी की तलाश में.......... महानगरों की सड़कें, फुटपाथ, रेलवे स्टेशन, बस अड्डे, वेश्यालय, किडनियों के सौदागर और जाने कौन-कौन उनकी अगवानी में पलक-पांवडे बिछाए बैठे हैं...उन सबके लिए इस बार अच्छी फसल हुई है। फसल तो इस बार नीतीश बाबू के लिए भी सबसे अच्छी हुई है...जय हो कोसी मैया की।

Thursday, August 28, 2008

बिहार बेहाल : नेता-मंत्री फिर मालामाल

बिहार के १३ जिलों के ३० लाख से अधिक लोग कोशी की विभीषिका झेल रहे हैं । सुपौल, मधेपुरा, सहरसा, अररिया, पूर्णिया, कटिहार आदि जिले पूरी तरह तबाह हो गए हैं। १० दिनों से लोग एक मुर्दा, भ्रष्ट, पतित और इंसानी उम्मीदों, बेबसियों, हाहाकारों-चीत्कारों से खेलने वाली , उनका मखौल उडाने वाली सरकार की लफ्फाजियां, उसकी नंगई देख रहे हैं। एक भयानक किस्म का ज्वालामुखी आज हर बिहारी के अन्दर उबल रहा है। बिहार ने अबतक भ्रष्टतम मुख्यमंत्रियों को झेला है पर यह मुख्यमंत्री तो सबसे अधिक बेशर्म साबित हुआ जिसने लाखों लोगों को मौत के हवाले कर दिया और ख़ुद राजधानी में बैठकर रंगरेलियां मनाता रहा, डूबते लोगों को बचाने की कोई कोशिश नहीं की, भूख से बच्चे मरते रहे, लाशें सड़ती रहीं, पर इस मुख्यमंत्री का विलास नहीं छूटा। हद तो यह है कि उधर लोग मौत का आतंक झेल रहे हैं , स्वजनों को अपनी आंखों के सामने एक-एककर मरते देख रहे हैं, और यह मुख्यमंत्री, यह सरकार झूठ पर झूठ बोले जा रही है कि सेना बचाव कर रही है, कि लोग युद्धस्तर पर निकाले जा रहे हैं, कि इतने हेलीकॉप्टर खाने के पैकेट गिरा रहे हैं , कि किसी को भूख से मरने नहीं दिया जाएगा। या खुदा.........कितना झूठ.....कितना फरेब....और वह भी किससे? उसी जनता से जिसने एक राई को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाया।
मुख्यमंत्री का सारा ध्यान केन्द्र से मिलने वाले उस मुंहमांगे पैसे की तरफ़ था जिससे उनकी और उनके गिद्ध मंडली की सात पीढियाँ निहाल हो जाने वाली थीं। खुदा के मेहर से केन्द्र ने एक हज़ार करोड़ की मुंहमांगी रकम दे दी, जितना माँगा उससे ज़्यादा अनाज दे दिया। शायद अब कोई बाढ़ पीड़ित भूख से नहीं मरेगा, कोई डूबेगा नहीं, किसी को सुरक्षित स्थान (जो अब बिहार में बचा नहीं) तक पहुँचने के लिए जिला प्रशासन को दस हज़ार की रिश्वत नहीं देनी होगी, इतने पैसों से तो बिहार की गरीबी को कई बार ख़त्म किया जा सकेगा, सभी बाढ़ पीडितों के पक्के मकान बन जायेंगे, हर घर में ३-४ महीनों तक खाने लायक अनाज आ जाएगा, बिहार से किसी को पलायन कर दूसरे राज्यों के कृतघ्नों से दुत्कार और मार नहीं सहनी होगी , सबको रोज़गार मिल जाएगा, हर साल आने वाली बाढ़ से भी निजात मिल सकेगी।
........क्या आज बिहार या देश में कोई आदमी अपने कलेजे पर हाथ रखकर कह सकेगा कि उपरोक्त अपेक्षाओं में से कोई एक भी पूरा होने वाला है? कि उपरोक्त अपेक्षाओं को पूरा कर लेने के लिए क्या पहले से ही कम पैसे बिहार को दिए गए हैं? क्या कोई बच्चा भी यह बताने में ज़रा भी वक़्त लेगा कि इन पैसों का क्या होने वाला है? ये ऐसे लोगों का दौर है जो सबकुछ डकार जाने के बाद भी रहनुमा बने रहते हैं। सबको हिस्सा मिलेगा, पत्रकार, चैनल कर्मी , सम्पादक, विधायक, सांसद, मुखिया, पार्षद, जिलाधीश, एसडीओ, बीडीओ , थाना प्रभारी सबको। जिसने सरकार से जितनी वफादारी निभाई होगी उसी हिसाब से उसकी बोली लगेगी। पेरल जाई जनता चुआओल जाई तेल....जय हिंद...जय बिहार...जय लालू...जय पासवान.....जय नीतीश......जय मनमोहन...

















सभी चित्र इंटरनेट से साभार।




Monday, August 25, 2008

ब्लॉगिंग की दुनिया के मिरासियो, नीरो की संतानों

यह तुम सबके लिए भी एक शोकगीत है मृतात्माओं। तुम जिन्होंने उस इकलौते वैकल्पिक माध्यम की भी हत्या कर दी जो शायद इस तेज़ी से बदलती और अमानवीय होती दुनिया में पूरी तरह गैरज़रूरी मान लिए गए लाखों-करोड़ों असहाय और उत्पीड़ित जनों की आवाज़ बन सकता था। दुनिया की तमाम सरकारों, तमाम पार्टियों, तमाम दृश्य-श्रव्य और शाब्दिक माध्यमों ने जिस प्रकार पूँजी के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है वैसे समय में तुम्हारे लिए यही सही था कि तुम भी वक़्त आने पर जबड़े खोल कर दिखा दो कि तुम्हारे मुंह में भी भेड़िये के दांत हैं ,कि तुम भी इंसानी जज्बातों के कोई मामूली बहेलिये नहीं हो, कि बदले में थोड़ी सी जूठन तुम्हारी तरफ़ भी उछाल दिया जाए।
पूरा उत्तर बिहार कोशी के पेट में समा चुका है सुपौल,सहरसा,अररिया,मधेपुरा,कटिहार, किशनगंज,पूर्णिया,खगडिया,बेगूसराय जिलों का कहीं पचास तो कहीं शत प्रतिशत इलाका जलमग्न है। एक लाख से अधिक लोगों के डूबकर मरने की चर्चा हो रही है, पन्द्रह-बीस लाख लोग पूरी तरह तबाह हो गए हैं,लाखों लोग ऊंची जगहों पर विगत दस-बारह दिनों से भूखे-प्यासे बाट जोह रहे हैं कि अब तो कोई मदद के लिए उनकी तरफ़ बढेगा,पर हर नए दिन भूख, भय और निराशा उनमें से ज्यादातर को मौत के मुंह में पहुँचा रही है। जो भी जिंदा है, जहाँ है वही फंसा हुआ है चारों तरफ़ दस से बीस मीटर हिलकोरें मारते हुए पानी का महासमुद्र है,सड़ रही हजारों-हज़ार इंसानी लाशों का अम्बार है,भूख-प्यास से मरते हुए बच्चों, औरतों,बुजुर्गों एवं अन्य लोगों का चीत्कार-हाहाकार है, आर्तनाद है, पर कहीं कोई मीडिया नहीं है,कोई सरकार नहीं है,कोई प्रशासन नहीं है, कोई मददगार हाथ नहीं है। ख़बर है कि सुपौल जो बाढ़ में सबसे ज़्यादा तबाह हुआ है, जहाँ सबसे ज़्यादा लोग मरे हैं या मर रहे हैं वहां जिलाधिकारी और कुछ ठेकेदारों-पूंजीपतियों की तरफ़ से कुछ नावों और मोटर बोटों का इंतजाम किया गया है जो इन इलाकों में फंसे हुए जीवित लोगों को बाहर निकालने के एवज में पाँच से दस हज़ार की रकम ले रहे हैं और खूब कमाई कर रहे हैं।
लाशें सड़ रही हैं महामारी फ़ैल चुकी है, नीतीश सरकार पर मुर्दनी छाई है जैसे नीतीश को सांप सूंघ गया हो। सरकार कभी कहती है ये बाढ़ नेपाल के असहयोग का परिणाम है,कभी मुकर जाती है,कभी कहती है सेना बचाव-कार्य में लगा दी गयी है पर उसका आपदा-प्रबंधन विभाग ही इसका ज़ोरदार खंडन कर देता है,कभी कहती है बाढ़-प्रभावित लोग काफी हिंसक हो गए हैं और राहत पहुंचाने वाले प्रतिनिधियों की हत्या कर देने पर उतारू हैं इसलिए कोई सरकारी अमला आगे आने को तैयार नहीं। ये मुख्यमंत्री कहीं सन्निपात का रोगी तो नहीं? ये किस तरह की लफ्फाजी है, ये कैसा बकवास है? पूरा मीडिया-तंत्र जैसे लकवाग्रस्त हो गया है-पटना से लेकर दिल्ली तक। मैंने सुना है दिल्ली की मीडिया में भी बिहारी पत्रकारों की बहुतायत है, फ़िर क्या वजह है कि यहाँ के अखबारों, चैनलों में अबतक इतनी भयावह आपदा की कोई नोटिस नहीं ली गयी? क्या हो गया है इन बिहारी पत्रकारों को क्या ये सब इतने संवेदनहीन हो गए हैं कि अपने ही स्वजनों, सम्बन्धियों,जिला-जवारियों का चीत्कार इन्हें सुनाई नहीं दे रहा। क्या ये सभी उसी हत्यारी हुकूमत की जारज संतानें बन गए हैं जो आज बिहार की गद्दी पर गाव-तकिया लगाकर विराजमान है और पूरा विपक्ष जो इस आस में चुपचाप है कि अच्छा है सरकार के खिलाफ गुस्सा भड़क रहा है, या कि इस शर्मिन्दगी में दड़बों में घुस गया है कि हमने भी तो यही सब किया था जब हमारी सत्ता थी।
ख़बर यह भी आ रही है(अफवाह नहीं)कि कोशी के नेपाल वाले हिस्से में तटबंध का एक और बड़ा हिस्सा (मुझे जगह का नाम बताया गया था जो मैं याद नहीं रख सका)लगभग ध्वस्त हो चुका है, जिसकी मरम्मत का कोई प्रयास फिलहाल शुरू नहीं हुआ। इस ख़बर से इलाके में काफी दहशत फ़ैल गयी है और जिन छिटपुट इलाकों में अबतक पानी का कहर नहीं पहुँचा था अब वहां भी लोग मौत के खौफ में जी रहे हैं-जैसे फोरबिशगंज और सहरसा के जिला केन्द्रों के आसपास रहने वाले। कहा जा रहा है कि अगर यह तटबंध उस स्थान पर टूटा तो बिहार के कई जिलों से जीवन का नामोनिशान ही शायद मिट जाए।
खैर नीतीश बिल में छुपे हैं,लालू और उनकी पार्टी इंसानी लाशों के अन्तिम आंकडों के आने तक चुप रहने की नीति अपना रही है। पूरा प्रांतीय और राष्ट्रीय मीडिया जगत जनता के नहीं सरकार और विपक्ष के सुर में बोल रहा है-और मालपुए के इंतजार में है। मुझे ब्लॉगिंग की दुनिया के तथाकथित जनपक्षधरों (सफेदपोश बगुलों)से भी गहरी निराशा है खासकर बिहारी ब्लॉगरों से। क्या हो गया है इन्हें, कैसी ठकुरसुहाती और व्यभिचार(साहित्यिक,सांस्कृतिक,पत्रकारीय,वाग्वैलासिक) में संलिप्त हैं। इनके विषय देखिये तो छिः उबकाई आती है .......यहाँ भी कितना घिनौना व्यापार चल रहा है। मैंने अपनी एक कविता में लिखा था कभी....उधृत करने की धृष्टता कर रहा हूँ....
"....मेरे समय के लेखक, पत्रकार,
प्रोफेसर और कविगण
कार,कॉर्डलैस और कंडोम से लैस हैं
दुराचारी सत्ता और जनता के बीच डैस हैं
इनके डूबने के लिए
चुल्लू भर पानी अब भी इसलिए कम है,
क्योंकि इन्हें आत्मा का नहीं
थोड़ी सुविधाएँ और जुटा लेने का गम है।"

Saturday, August 23, 2008

यमुना पुश्ता के आसपास रह रहे बेघर-बेसहारा बच्चे, सरकार, समुदाय और मीडिया

(यमुना पुश्ता और पुरानी दिल्ली के इलाकों में रहने वाले बेघर-बेसहारा बच्चों के बीच काम करने के अपने लगभग डेढ़ वर्षों के दरम्यान मैंने काफी नज़दीक से इन बच्चों की असंभव दुनिया को महसूस करने की कोशिश की थी और आज मैं ख़ुद को ऐसा दावा करने की स्थिति मै पाता हूँ कि जब तक आप इन बच्चों के साथ उनकी रोज़मर्रा की जद्दोज़हद में शिरकत नहीं करते तब तक आप उनकी ज़िन्दगी की वास्तविकताओं का अनुमान भी नहीं लगा सकते। और इतना कर पाना भी एकदम आसान नहीं है, मैंने ऐसे दर्जनों कार्यकर्ताओं(कर्मचारियों) को इनके आसपास मंडराते देखा है जो महीनों गुज़र जाने के बाद भी अपनी समझ को संस्कारों से ऊपर नहीं ले जा पाते। ज्यादातर लोग यहाँ अपनी उसी नफरत और हिकारत को अन्दर छिपाए हुए काम करते रहते हैं जिसे वे समाज से ग्रहण करते हैं। यह हिकारत की भावना उन्हें सचमुच में बच्चों से एक अदृश्य(उनकी समझ से) दूरी बनाये रखने के लिए प्रेरित करती है और वे अंत तक निरपेक्ष बने रह जाते हैं। मैंने जो समझा है उसके हिसाब से ये बच्चे घरेलू बच्चों से अतुलनीय रूप से ज़्यादा संवेदनशील,शंकालू,आक्रामक और मेधावी होते हैं तथा zindagee ke निर्मम प्रहार उन्हें इतना परिपक्व बना देते हैं कि वे पहली नज़र में ही आप का नजरिया भांप लेते हैं कि आप उनके विषय में क्या सोचते हैं। इन बच्चों की ज़िंदगी में जिस एक चीज़ का सबसे बड़ा अभाव रहता है वह है सम्मान। जिस दुनिया में वे रहते हैं वहां हर कोई या तो उनका इस्तेमाल करता है या फिर उनसे बेइंतहा नफरत करता है। जब ये बच्चे अपने घरों को पीछे छोड़कर फुटपाथ की दुनिया में कदम रखते हैं तो स्थानीय समुदाय, छोटे व्यवसाइयों, ढाबा मालिकों, सेक्स रैकेटों, ड्रग्स के सौदागरों, पुलिस और पहले से सड़क पर रह रहे बड़े बच्चों के भयावह शोषण का शिकार होते हैं। ऊपर से सरकारी और गैरसरकारी संस्थानों के बहेलिये भी इन बच्चों पर घात लगाये रहते हैं। इतने मज़बूत घेराव में जीते और सबकुछ बर्दाश्त करते हुए ये बच्चे किस मनःस्थिति में पहुँच जाते होंगे इस बात का अनुमान तो लगाया ही जा सकता है। इन बच्चों के साथ मैंने जितना वक़्त गुज़ारा वह पुलिस और अस्पताल और तमाम किस्म के शिकारियों के साथ लड़ते-भिड़ते हुए गुज़ारा, इतने अनुभवों को समेट पाना मेरे लिए कठिन है और बातें क्रम में नहीं आ पा रहीं हैं, पर कुछ खंडों में बातें ज़रूर आपतक पहुचाने की कोशिश करूंगा)
जब
हम पूरी दुनिया में बच्चों की हालत पर दृष्टिपात करते हैं तो हम एक असंभव दुनिया से रूबरू होते हैं। तीसरी दुनिया के देशों में और खासकर भारत में तो हालत और भी बदतर है और बच्चों की विशाल आबादी अत्यंत कठिन और अमानवीय परिस्थितियों में जीवन व्यतीत कर रही है। ये बच्चे जीवन की बुनियादी सुविधाओं एवं अधिकारों से भी वंचित हैं और इनके बारे में सोचते ही अन्दर एक हाहाकार भर जाता है। पूँजी के अनियंत्रित बहाव,महानगर केन्द्रित विकास और गरीबी के परिणामस्वरूप राष्ट्रव्यापी विस्थापन का भयानक संकट नया नहीं था, पर ग्लोबलाइजेशन और उदारीकरण ने दुनिया के कमजोर और मेहनतकश वर्गों को और भी असहाय, और भी बेहाल कर दिया और गैरबराबरी की खाई इतनी चौड़ी हो चुकी है कि उसे पाटना दिन पर दिन असंभव होता जा रहा है। आर्थिक विपन्नता और उपभोक्तावाद ने सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न तो किया ही है, इसे संवेदनहीन और असहिष्णु भी बना दिया है। इसका सबसे बडा खामियाजा बच्चों को ही भुगतना पड़ा और आज अगर केवल महानगर दिल्ली की ही बात करें तो लाखों बच्चे सूदुर प्रांतों से आकर यहां के सड़कों, फुटपाथों, रेलवे प्लेटफार्मों और खुले पार्कों में नारकीय जीवन जी रहे हैं। इनके साथ न तो किसी आत्मीय या अभिभावक का संरक्षण है और न ही समाज उनपर विश्वास करता है। इनके साथ ही अगर दिल्ली की झुग्गी बस्तियों से आए उन बच्चों को भी जोड़ लिया जाए जिनका अधिकांश समय दिल्ली की सड़कों पर गुजरता है और परिवार के साथ उनका संपर्क नहीं के बराबर है तो यह आँकड़ा अविश्वसनीय लगने लगता है। ये बच्चे चाहे स्थानीय हों अथवा बाहर से भाग कर आए, उनकी स्थिति में कोई गुणात्मक अन्तर नहीं है। ये बच्चे कूड़ा चुनते हैं, भीख माँगते हैं, बूट पॉलिश करते हैं, नशा करते हैं और दैहिक मानसिक शोषण का शिकार होते हैं। इन बच्चों में बड़े पैमाने पर लड़कियाँ भी शामिल हैं जो फुटपाथों पर वेश्यावृत्ति करने को बाध्य हैं। मंदिरों और गुरुद्वारों में मुफ्त बँटने वाले भोजन के कारण बच्चे काफी संख्या में उन इलाकों में केन्द्रित हो जाते हैं। गन्दगी में रहने, शारीरिक -मानसिक प्रताड़ना, पौष्टिकता से रहित भोजन, नशे की अधिकता और सर्दी गर्मी बरसात में खुले में रहने से ये बच्चे सहज ही बीमारियों का शिकार हो जाते हैं और बड़ी संख्या में बच्चों की मौत हो जाती है। इन परिस्थितियों में रहते हुए इन बच्चों के लिए शिक्षा अथवा अन्य अधिकारों की बात करना बेमानी है। जब तक इन बच्चों के लिए जीवन की बुनियादी सुविधाओं और सुरक्षा एवं संरक्षण का पक्का इंतजाम न किया जाए तथा इनके प्रति सामाजिक नजरिये में परिवर्तन न लाया जाए,इन्हें मुख्यधारा में लाने का लक्ष्य हासिल नही किया जा सकता। चुनौती सचमुच बहुत बड़ी है और इसे अब और अनदेखा नही किया जा सकता।
यमुना पुश्ता क्षेत्र की सामाजिक, आर्थिक एवं भौगोलिक स्थिति
यमुना पुश्ता का इलाका यमुना नदी के किनारे लाल किला, विजय घाट, आइएसबीटी बस अड्डा और कश्मीरी गेट तक फैला हुआ है। इस इलाके की सामाजिक संरचना निम्न मध्यवर्गीय है और यहां की संस्कृति के केन्द्र में हिन्दू धर्मावलम्बियों की आस्था और उससे अनुस्यूत् कर्मकाण्ड हैं जिनसे यहां का जनसमुदाय किसी न किसी रूप में जुड़ा हुआ है। खास तौर से प्राचीन हनुमान मंदिर और निगमबोध घाट की अवस्थिति स्थानीय समुदाय के व्यवसाय और सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकारों को प्रभावित निर्देशित करती है। अधिकांशतः लोग मंदिर के इर्द-गिर्द मिष्टान्न,पूजन-सामग्री,धार्मिक प्रतीकों-मूर्तियों के उत्पादन-विपणन कार्य में संलग्न हैं या फिर मंदिर की सफाई, अन्य जन सुविधाओं एवं परिवहन व्यवस्था में हैं। मंगलवार और शनिवार को यहां हजारों श्रद्धालुओं का जमाव रहता है अतः पूरे क्षेत्र में अच्छी व्यावसायिक चहल-पहल रहती है। खैरात बाँटने की पुरानी परंपरा ने इस मंदिर के आसपास आलसी मुफ्तखोरों की एक विशाल जमात तैयार की है जो इन दो दिनों में सुबह से लेकर रात तक पूरी-कचौरी,मिठाइयों,फलों,कम्बल एवं दूसरी चीजों के लिए धमाचौकड़ी मचाती रहती है। विविधतापूर्ण भोजन-सामग्रियों नशीली वस्तुओं एवं भीख की सहज उपलब्धता ने सुदूर प्रांतों से भागकर आए अथवा निकटवर्ती इलाकों के सैकड़ों बच्चों को मन्दिर व इसके आसपास के पार्कों को अपना स्थायी ठिकाना बनाने को मजबूर किया है, जहां वे भयावह नारकीय जीवन जी रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक तकरीबन 800 लोग इस हनुमान मंदिर और निकटस्थ मंदिरों में बँटनेवाले खैरात और भीख के सहारे जीवनयापन कर रहे हैं,जिनमें 350से अधिक 16 साल की उम्र तक के बच्चे हैं। बाकी लोगों में असहाय औरतें, विकलांग और वृद्ध शामिल हैं। बच्चों के इतने बडे जमाव के पीछे एक बड़ा कारण यह भी है कि यहां से अन्तर्राज्यीय बस अड्डा, पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन, जामा मस्जिद, मीना बाजार, लाल किला, चांदनी चौक बाजार आदि काफी नजदीक हैं, जहां दिन में बड़ी तादाद में बाल श्रमिकों के लिए काम की गुंजाइश रहती है, पर शाम होते ही वहां के पार्कों और दूसरे खाली स्थानों में पुलिस की दबिश बढ़ जाती है जिस वजह से बच्चे यमुना बाज़ार के खुले पार्कों और घाटों की ओर रुख करते हैं जहां रात में हजारों की तादाद में बेघर, बेसहारा और मुसीबतजदा लोग मौसम,भूख और पुलिस की मार सहते हुए रात काटते हैं। इनके साथ ही सैकड़ों ऐसे लोगों की भी यह शरणस्थली बनी हुई है जिनका काम नशीली वस्तुओं का विक्रय-विनिमय, ठगी, जुआ-खेलना, चोरी, लूटपाट आदि है। कुछ लोग अवैध रूप से विडियो पर अश्लील फिल्में दिखाने का कारोबार कर रहे हैं, जहां दर्शकों में छोटे बच्चों की बहुतायत रहती है तो कुछ लोग अबोध बच्चों को भयाक्रांत कर अथवा लालच देकर उनका दैहिक शोषण करने-करवाने का संगठित उद्योग चला रहे हैं। जाहिर है,इतने बड़े पैमाने पर गैरकानूनी गतिविधियाँ बगैर पुलिस के सहयोग और संरक्षण के नही चलायी जा सकतीं।



शहरीकरण और विकास के नाम पर एक दशक पहले यमुना पुश्ता और आसपास की झुग्गी बस्तियों को उजाड़ने की दमनात्मक कार्रवाई का आतंक आज भी यहां की आबोहवा में गूँजता महसूस होता है। आधुनिक लोक कल्याणकारी राज्य के पुनर्वास के सरकारी मुहावरों की सच्चाई तब यहां सामने आ गई जब उजाड़े गए विस्थापितों ने अपना सबकुछ गँवाने के बावजूद एक सर्वथा अपरिचित स्थान बवाना जाकर पुनर्वासित होना कबूल नहीं किया और सांस्कृतिक एवं स्थानिक मोहवश फुटपाथ की भयावह जिन्दगी को नियति मानकर अपना लिया। इस अमानवीय विस्थापन की यही स्वाभाविक परिणति हो सकती थी कि आज इन परिवारों की अधिकांश स्त्रियाँ पेट के लिए देह-व्यापार के पेशे में संलग्न हैं और बच्चे भीख मांगने को विवश। क्षेत्र के दैनिक जन जीवन का सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक अन्वेषण करते हुए हमने लक्ष्य किया कि पूरे परिदृश्य में सबसे ज्यादा मुसीबत में बच्चे हैं-उनमें भी वैसे बच्चे जो पूरी तरह सड़क पर हैं और जिन्हें किसी आत्मीय या अभिभावक का संरक्षण भी प्राप्त नहीं है। 300 से 350 बच्चों की इस आबादी में 5 से लेकर 18 साल तक के बच्चों की अधिकता है। इन बच्चों में लगभग 60 प्रतिशत बच्चे नशा करते हैं और कुछ ही बच्चों ने प्राथमिक स्तर की शिक्षा प्राप्त की है। 40 प्रतिशत बच्चे भीख मांग रहे हैं और 50-60 प्रतिशत बच्चे कूड़ा चुनने, ढाबों में काम करने जैसे कार्यों में लगे हुए हैं। भयावह नारकीय परिस्थितियों में जी रहे इन बच्चों को न तो भोजन उपलब्ध है न रहने का ठिकाना। चार-पाँच प्रतिशत बच्चे भी स्वास्थ्य के सामान्य स्तर तक नही पहुँचते हैं। हाँ यह बात बिल्कुल तय है कि शत-प्रतिशत बच्चे पुलिस की ज्यादतियों के शिकार होते हैं। इन बच्चों की तत्काल सबसे बड़ी आवश्यकता भोजन और सुरक्षित आवास की है। खास बात यह है कि लगभग 60-70 प्रतिशत बच्चे पढ़ाई करने की इच्छा जाहिर करते हैं, पर परिस्थितियाँ इन्हें एक जगह टिककर रहने नहीं देतीं, और इनका बिखराव जारी रहता है। इन्हें इनके भोजन, आवास, शिक्षा , स्वास्थ्य और रोजगार के अधिकार के लिए जागरूक और संगठित करना एक बड़ी चुनौती है, जिसे आगे बढ़कर स्वीकार करना एक सभ्य समाज और संवेदनशील सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए, किन्तु वास्तविकता यह है कि भयावह परिस्थितियों में जी रहे इन बच्चों की तरफ से सरकार तो सर्वथा उदासीन है ही, गैरसरकारी संस्थाओं का रवैया भी आपराधिक है। ज्यादातर संस्थाएँ बच्चों का इस्तेमाल कर देशी-विदेशी धनदाताओं से करोड़ों का अनुदान प्राप्त करने में सफल हो जाती हैं। यह शोध का विषय हो सकता है कि दर्जनों बाल अधिकार संस्थाओं और बच्चों के नाम पर प्रतिवर्ष खर्च होने वाले हजारों-लाखों डॉलर की राशि के बावजूद आज तक कितने बच्चों की जिन्दगियों में बदलाव आ सका है।

Friday, August 22, 2008

नीतीश बाबू "नंगटा" हो जाइये यही वक़्त है

भीमनगर बराज से १०-१२ किलोमीटर दूर कुशहा में पूर्वी कोशी तटबंध के करीब १००० मीटर तक ध्वस्त हो जाने से बिहार के सुपौल, सहरसा, अररिया, किशनगंज, कटिहार और खगडिया जिले में भीषण तबाही हुई है। सुपौल जिले के वीरपुर, बसंतपुर, बलुआबाज़ार, बिसनपुर, बसमतिया, राघोपुर, सिमराही, करजाइन, हृदयनगर, सीतापुर, नरपतगंज, प्रतापगंज आदि इलाकों में जान-माल की भारी क्षति हुई है। पाँच लाख से भी ज़्यादा लोग विगत दस दिनों से बाढ़ में फंसे हुए हैं, हजारों लोग पानी के तेज़ बहाव में बह गए हैं- हजारों लापता हैं। वीरपुर और इसके आसपास के इलाकों में लोगों के घरों में औसतन १० फीट से ज़्यादा पानी भरा हुआ है। यहाँ की अधिकांश आबादी खेती-किसानी पर निर्भर थी और लगभग सभी घरों में माल-मवेशी थे। इस बाढ़ में कितने मवेशी डूबे या मरे हैं इसका हिसाब लगाने की कोई कोशिश अभी नहीं हुई है। अभी तो इंसानी लाशों को ही गिनना बाकी है।
खास बात यह है कि अन्य सभी पिछली सरकारों की तरह नीतीश की सरकार भी बाढ़ को बिहार में कमाई करने का सबसे बड़ा और सुरक्षित जरिया मानती है। सभी जानते हैं कि बिहार बाढ़ का पर्याय है और यहाँ हर साल कहीं न कहीं बाढ़ आती है। जानकार लोग तो यह भी कहते हैं कि बिहार में हर साल बाढ़ आती नहीं बल्कि लाई जाती है ताकि यहाँ के हुक्मरान, सरकारी अमले, नेता-मंत्रीगण, पत्रकार, बाबू लोग जमकर अपनी सात पुश्तों के लिए बसंत बुन सकें। पुलिस और गुंडे मिलकर बाढ़ में घिरे घरों में घुसकर लोगों के खून-पसीने की कमाई जमकर लूटते हैं और हर सफेदपोश बगुले तक उनका हिस्सा पहुचाते हैं। तटबंध अगर नहीं टूट रहे हों तो तोड़ दिए जाते हैं, पुल ऐसे बनाये ही जाते हैं जो थोड़ा सा भी दबाव न झेल सकें। बाढ़ आती है- तो सारे जिम्मेदार बिलों में छिप जाते हैं बाबू से लेकर मुख्यमंत्री तक। सारा का सारा मीडिया मुख्यमंत्री और सत्ता की नंगी गोद में चिपटकर लौलीपौप चाभने लगता है। उसे भी आदमी की चीखें सुनाई नहीं देती। तबाही जितनी होगी कमाई भी उसी अनुपात में होगी। सो जब तक दबा सकते हो बाढ़ की ख़बरों को दबाओ, घरों को उजड़ने दो, इंसानों को मरने दो। फिक्र क्या है, यहाँ तो चित भी अपनी है और पट भी अपनी। पहले बाढ़ की होली खेलेंगे फ़िर राहत की दीवाली मनाएंगे। क्या स्टेट है अपना बिहार भी- मज़े करो नीतीश जी आपके पौ-बारह हैं ...........वरना मुख्यमंत्री की कुर्सी में और भला धरा ही क्या है?
ये बाढ़-वाढ़ सब विरोधियों की साजिश है जनता की चुनी हुई अबतक की सबसे जिम्मेदार सरकार को बदनाम करने की साजिश। जब नीतीश जी विपक्ष में थे तब भी विपक्ष की साजिश से ही बिहार में बाढ़ आती थी। खैर नीतीश बाबू(ये बाबुओं की जो प्रजाति है इसने बहुत नाम कमाया है) ने एक नया तुक्का छोड़ा है। उनका कहना है कि नेपाल के इलाक़े में स्थित तटबंध को मज़बूत करने के लिए इंजीनियर भेजे गए थे लेकिन स्थानीय लोगों ने उन्हें सहयोग नहीं दिया। इधर विपक्षी दलों का आरोप है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपनी नाकामी छिपाने के लिए ये बयान दे रहे हैं। दरअसल बाढ़ से पहले ही तटबंध का जायजा लेने के लिए टीम भेजी गई थी जिसने कहा था कि तटबंध टूटने का ख़तरा नहीं है। क्यों कहते कि खतरा है- यह तो आ बैल मुझे मार वाली बात हो जाती। भइया बड़े भाग मुख्यमंत्री पद पावा..........पिछली बार निगोड़ी लक्ष्मी आते-आते रह गयी थी। मुझे क्या लल्लू समझ रखा है ? अगर ये साबित भी हो जाए कि मुझे इस तबाही का पहले से पता था ....तो क्या उखाड़ लोगे ?
बीबीसी हिन्दी की वेबसाइट पर यह ख़बर दी गयी है कि समय पर राहत नहीं पहुँचने के कारण प्रभावित लोगों में भारी रोष है। सहानुभूति जताने पहुँचे एक विधायक पर लोग टूट पड़े और उनका एक हाथ टूट गया। इसी तरह पटना से विशेष प्रतिनिधि के तौर पर पहुँचे दो अधिकारियों को भी लोगों ने खदेड़ दिया और पुलिस वालों पर भी लोगों का गुस्सा फूटा। गुरुवार को सेना के हेलीकॉप्टर की मदद से खाने की सामग्री पहुँचाने की कोशिश की गई लेकिन सिर्फ़ दो सौ पैकेट गिराए गए। आम जनता में गुस्से को देखते हुए सरकार के प्रवक्ता पिछले दो दिनों से कह रहे थे कि अब राहत और बचाव कार्य में सेना की मदद ली जाएगी। लेकिन राज्य आपदा प्रबंधन विभाग के सचिव आरके सिंह ने बीबीसी को बताया कि सेना के किसी जवान को राहत कार्य में नहीं लगाया गया है। आपदा विभाग का कहना है कि राज्य में बाढ़ से अब तक 40 लोगों की जानें गई हैं और 11 ज़िले के 900 गाँव इसकी चपेट में हैं।
...............जितने मुंह उतनी बातें...........सत्ता इसीका तो फायदा उठाती है। सच को अफवाह और अफवाह को सच बनाती है। वास्तव में अबतक न तो प्रशासन और न ही सरकार ने लोगों की सुधि लेने की कोशिश की है। इतनी भयावह बाढ़ में जो लाखों लोग ऊँची जगहों पर बीवी बाल बच्चों को लिए इस आस में पल गिन रहे हैं कि कोई तो आएगा उनके पास नए जीवन का संदेश लेकर ....कोई तो उनके भूखे बच्चों को सूखी रोटी का एक टुकडा देगा ......कोई तो बताएगा कि पास वाले गाँव में उनके स्वजन-सम्बन्धियों में से कितने लोग जीवित बच रहे हैं....कौन बताये इन निरीह लोगों को कि तुम्हारी जिंदगियों की कीमत इन हुक्मरानों के लिए कुछ भी नहीं है...कि तुम्हारी कराहों और बेबसियों से वे अपने और अपनी समस्त पीढियों के लिए बसंत बुनेंगे। कि इसी दिन के लिए तो वे अपनी आत्माओं को वेश्या बनाते रहते हैं।
....यही वक़्त है...अपनी किस्मत चमकाने का, कुछ कर जाने का यही वक़्त है नीतीश जी ..........अपने मतलब का वक़्त पहचानने की आपकी कला का लोहा तो जयप्रकाश बाबू भी मानते थे...बड़ी पारखी नज़र थी उनकी!....इस बाढ़ उत्सव के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद...आपके बच्चे जियें.....

Wednesday, August 20, 2008

भारत के माओवादी भी चुनाव लड़ें

आलोक प्रकाश पुतुल
झापा, नेपाल से लौटकर
नेपाल की सीमा में घुसते ही मेचीनगर में जब हमारा ड्राइवर कस्टम की औपचारिकता निभा रहा था तो मैंने वहीं चहलकदमी कर रहे नेपाल पुलिस के जवान से आहिस्ता से पूछा-“कल तक जिन माओवादियों को आप लोग चुन-चुन कर मारते थे, अब उनकी सरकार बन रही है. क्या सोचते हैं ? ”उसने पहले तो अजीब-सा चेहरा बनाया फिर हंसते हुए कहा-“अब उनको शलामी करेंगे.”
लेकिन इस एक वाक्य के जवाब को हमारे गोरखा ड्राइवर ने यात्रा के दौरान बाद में पूरा किया, जब मैंने उससे भी यही सवाल पूछा कि यहां कि पुलिस क्या करेगी ? उसने मुस्कुराते हुए कहा “ इंडिया में भी तो डाकू लोग, गुंडा लोग पार्लियामेंट में मेंबर बन जाता है। उनका तो कोई आईडोलॉजी भी नहीं होता।”मुझे लगा कि सवाल पूछने में अब थोड़ी सावधानी बरतनी होगी.हम नेपाल के झापा जिले में थे. झापा यानी माओवादियों का इलाका. हाल के चुनाव में नेकपा माओवादी के विश्वदिप लिङदेन लिम्बु, धर्म प्रसाद धिमिरे और गौरी शकर खडका इस इलाके से चुनाव जीत कर काठमांडू पहुंचे हैं.
माओवादी गांव शांतिनगर
घने जंगलों वाले इलाकों से होते हुए सड़क किनारे एक स्कूल का बोर्ड देख कर हमने गाड़ी रुकवाई. लिटिल ऑक्सफोर्ड इंग्लिश स्कूल. पड़ोस के सोनसरी जिले से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद अपने गांव शांतिनगर लौटे दीपेंद्र प्रधान 160 बच्चों वाला यह बोर्डिंग स्कूल चलाते हैं.उनके छोटे से कार्यालय की दीवार पर नेपाल नरेश स्व. वीरेंद्र विक्रम शाह और उनकी पत्नी की एक उखड़ी हुई तस्वीर टंगी हुई है. नेपाल में अब माओवादी सरकार को लेकर दीपेंद्र प्रधान मुस्कराते हुए कहते हैं- “ मैं सोचता हूं कि हमारे देश को इसकी आवश्यकता थी, इसलिए ऐसा हुआ.इसके पीछे सबसे बड़ा कारण भ्रष्टाचार है”
दीपेंद्र बताते हैं- “ हमारे गांव में कभी कोई नहीं आता था, कोई पुलिस वाला नहीं। आप जिस रास्ते से आए हैं, वो हाईवे है लेकिन अगर य़हां कोई मर भी जाता, अगर कोई किसी को शूट भी कर दे तो यहां कोई नहीं आता था न सेना, न पुलिस. ये हालत इलेक्शन से दो साल पहले तक थी. नेपाली जनता को लगा कि इतने साल तक सबको अपना समझ के वोट दिय़ा तो एक बार माओवादियों को ट्राई करने में क्या हर्ज है. इसलिए जनता ने माओवादियों को वोट दिया. मैंने भी माओवादियों को वोट दिया.मुझे उम्मीद है कि वे कुछ करेंगे. अगर ये इसमें असफल रहे तो दो साल बाद फिर चुनाव होगा.”वे बताते हैं कि किस तरह माओवादियों ने उनके गांव में नहर लाई और किस तरह माओवादियों के कारण इलाके में चोरी की घटनाएं खत्म हो गईं. दीपेंद्र के पास माओवादियों के पक्ष में कई बाते हैं.लेकिन तीन महीने पहले दुलाबाड़ी से ब्याह कर शांतिनगर में आने वाली गांव की एक बहु ने इस बार चुनाव में भाग नहीं लिया. जिंस-टॉप पहने हुए इस बहु ने हाथों को घुमाते हुए पूछा- “किसी के जीतने से क्या होता है ? जो जीतता है, वो तो राजगद्दी में बैठता है. वो थोड़ी हमसे चावल-दाल के बारे में पूछता है.”
बेरोजगारी
शांतिनगर गांव में दूर-दूर तक धूसर वीरान जमीन नजर आती है. कहीं-कहीं कुछ पेड़ नजर आते हैं, थोड़े से नारियल के थोड़े कुछ और पेड़. कुछ नौजवान एक कच्चे घर के बरामदे में लुडो खेल रहे हैं. घर और पड़ोस की कुछ बुजुर्ग महिलाएं भी वहीं खेल देख रही हैं. हमारे वहां बैठते और दुआ सलाम करते भीड़ इकट्ठी होने लगती है. गांव के लोगों से बात करें तो सबके मन में राजा औऱ पुरानी सरकार के प्रति एक आक्रोश साफ नजर आता है. राजा के लिए गांव के एक नौजवान कहते हैं-उसका घड़ा भर चुका था.गांव में अधिकांश लोगों के पास खेती के लिए जमीन नहीं है. जो खेत हैं, वे सरकार के हैं. सरकार के कब्जे वाले. खेती की संभावना भी नहीं है क्योंकि सिंचाई के साधन नहीं हैं. गांव वालों की मानें तो गांव के 90 फिसदी घर गिरवी हैं, साहूकार के पास. गांव के हर घर से कोई न कोई नौजवान काम करने के लिए दूसरे देश में है. अधिकांश भारत में. कागज पत्तर बनवाने औऱ रोजगार के लिए एजेंट को एक लाख दस हजार नेपाली रुपए देने पड़ते हैं. भारतीय़ मुद्रा में कोई 70 हजार.भीड़ में से एक नौजवान कहते हैं- “ हमारे यहां की सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी है. हमारे लोग बाम्बे से बिहार तक काम की तलाश में जाते हैं लेकिन अभी तो प्रचंड जी का सरकार बना है, अभी तो उनसे उम्मीद करने ठीक नहीं है लेकिन हमें विश्वास है कि वे हमारी समस्याओं को दूर करेंगे.”लेकिन माओवादियों के बारे में तो कहा जाता है कि वे उग्रवादी हैं, आतंक फैलाते हैं ? उनसे कैसी उम्मीद ?“ ये सब गलत इश्यू बनाए गए हैं. हम भी माओवादी हैं.” एक नौजवान आत्मविश्वास के साथ भीड़ में खड़े औऱ बैठे लोगों की ओर इशारा करते हुए कहते हैं- “ये भी माओवादी है, वो भी माओवादी है, हम सब माओवादी है. ये जनता ही माओवादी है.”
हम सब माओवादी है.
वे बताते हैं कि गांव के सभी लोगों ने माओवादियों को ही वोट भी दिया. भीड़ में कुछ पुरुष-स्त्री स्वर उभरते हैं- “ हम भी माओवादी...माओवादी...!”आतंकवादी मत कहिए
भीड़ में शामिल एक प्रौढ़ कहते हैं- “हम लोगों ने बहुत आशा के साथ माओवादियों को चुना है. हमने नेपाली कांग्रेस को देखा, नेकपा को देखा, राजी की पार्टी को भी देखा. लेकिन किसी ने हमारा दुख नहीं समझा. हमें गांव में रोजगार चाहिए. हम अपने दुख-दर्द को लेकर बाहर जाते हैं. हम भी अपने मां-पिता के साथ रहना चाहते हैं, अपने बच्चों के साथ रहना चाहते हैं.”गांव के कमल भंडारी कहते हैं- “ वो आतंकवादी इसलिए कहे जाते हैं, क्योंकि वे सरकार से जीत गए हैं. गरीब आदमी के पास घास नहीं है, कपास नहीं है. कल कारखाना नहीं है. सरकार के पास तो सब कुछ है लेकिन हम लोगों को देता नहीं है. माओवादी सब ठीक करेंगे .”
गांव में दुकान चलाने वाले बुजर्ग अभिकेसर मानते हैं कि माओवादियों ने चुनाव में आ कर अपनी ताकत दिखा दी है. उन्हें इस बात से बहुत दुख होता जब कोई माओवादियों को आतंकवादी कहता है. अमरीका से खासे नाराज अभिकेसर के अनुसार माओवादी जनता के साथ हैं और वे जनता की लड़ाई लड़ रहे हैं. ऐसे में जनता को कोई आतंकवादी कहे, यह उन्हें अच्छा नहीं लगता. देश-दुनिया की खबरों से वाकिफ अभिकेसर कहते हैं- “ भारत में जिस तरह आज माओवादी आंदोलन चल रहा है, एक समय नेपाल में भी ऐसा ही था. जिस तरह से यहां के माओवादियों ने हथियार छोड़ कर, जनता को साथ लेकर पार्लियामेंट में गए, वहां के माओवादी भी ऐसा ही करें, आपके साथ कितनी जनता है, ये दिखा दें. अगर जनता आपके साथ है तो वहां भी नेपाल जैसा ही होगा न ? अगर जनता आपके साथ है तो क्यों डरते हैं.” अभिकेसर ठहाके लगाते हुए कहते हैं- “ अगर जनता आपके साथ नहीं है तो फिर छोड़िए.”
www.raviwar.com से साभार