Monday, December 28, 2009

आम आदमी के नाटक का त्रासद पटाक्षेप-वर्ष


राजेश चन्द्र
वर्ष 2009 के रंगजगत की सबसे सांघातिक घटना रही - पिछली शताब्दी से वर्तमान शताब्दी तक, यानि साठ वर्षों से अधिक समयावधि तक निरन्तर उद्देश्यपूर्ण रंगमंच करने वाले विश्व रंगमंच के अद्वितीय निर्देशक, अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के मशहूर रंगकर्मी, भारतीय जननाट्य संघ (इप्टा) के संस्थापकों में एक हबीब तनवीर का 8 जून को पच्चासी वर्ष की अवस्था में गुर्दे की असाध्य बीमारी से जूझते हुए निधन। हबीब तनवीर धर्मनिरपेक्ष, जनवादी और प्रगतिशील मूल्यों के प्रति अटूट प्रतिबद्धता रखने वाले ऐसे महान शख्स थे, जिनके निधन से थियेटर की दुनिया में एक कभी न भरने वाला शून्य पैदा हो गया। एक ऐसे रंग-शख्सियत जो एक ही समय अभिनेता, नाटककार, निर्देशक, गायक, संगीतकार के अतिरिक्त वस्त्रसज्जा, मंचसज्जा में परिपूर्ण, पत्रकार, शायर, आलोचक के साथ-साथ अच्छे सैलानी भी थे। लम्बा चेहरा, गोरा रंग, ऊँचा कद, इकहरा जिस्म, चैड़ा माथा, माथे पर अस्सी-पच्चासी वर्षों के अनुभवों की लकीरें, गहन-गम्भीर आँखों पर काले फ्रेम का बड़ा चश्मा, होंठों के बीच फँसा पाइप, पुरकशिश आवाज़ और हिन्दी-उर्दू मिश्रित हिन्दुस्तानी या अंगरेज़ी में बेबाक बात करने के लिये पहचाने जाने वाले हबीब तनवीर ने हिन्दी नाट्य-जगत और भारतीय रंगमंच को जो नयी दिशा दी, वह अविस्मरणीय है। स्वातन्त्र्योत्तर युग अथवा बीसवीं शताब्दी के पाँचवें दशक से लेकर 21वीं शताब्दी के प्रथम दशक तक हबीब तनवीर ने हिन्दुस्तानी साहित्य और रंगमंच को करीब दो दर्जन नाट्य कृतियाँ दी हैं जिनमें आगरा बाज़ार (1954), शतरंज के मोहरे (1954), लाला शोहरत राय (1954), मिट्टी की गाड़ी (शूद्रक रचित ‘मृच्छकटिकम‘ पर आधारित,1977), चरणदास चोर (1975), उत्तररामचरित (1977), बहादुर कलारिन (1978), पोंगा पण्डित (1990), ज़हरीली हवा (2002) और राजरक्त (2006) इत्यादि ख़ासे प्रसिद्ध हैं। बतौर पत्रकार अपना कैरियर शुरू करने वाले हबीब तनवीर ने नाटकों के क्षेत्र में ऐसा मुकाम हासिल किया जो हर दृष्टि से बेमिसाल है। उनके ‘आगरा बाज़ार‘ और ‘चरणदास चोर‘ ने ऐसी धूम मचाई कि हबीब जीते जी एक किंवदन्ती बन गये। चरणदास चोर में छत्तीसगढ़ के लोक कलाकारों - गोविन्द राम, मदनलाल, दीपक तिवारी, फ़िदाबाई, मुल्वाराम, पूनम और स्वयं हबीब ने अभिनय और आपसी तालमेल का एक ऐसा नया, अनूठा और मोहक लोक छन्द रचा कि दुनिया दंग रह गयी और 1982 में एडनबर्ग के इन्टरनेशनल ड्रामा फेस्टिवल में ‘चरणदास चोर‘ को विश्व का सर्वश्रेष्ठ नाटक घोषित किया गया। नज़ीर अकबराबादी की शायरी, शख्सियत और उनके युग पर आधारित नाटक ‘आगरा बाज़ार‘ को हिन्दुस्तानी रंगमंच की एक अक्षय निधि, एक अनमोल धरोहर माना जाता है। इस नाटक के फ़कीर, ककड़ीवाला, तरबूजवाला, लड्डूवाला, बरफवाला, रीछवाला, पतंगवाला, किताबवाला, मदारी, शायर, हमजोली, दरजी, पनवाड़ी आदि पात्रों को कभी भुलाया नहीं जा सकता। नाटक का एक गीत है - "जितने हैं आज आगरे में कारखाना जात/सब पर पड़ी है आज के रोज़ी की मुश्किलात/किस-किसके दुख को रोइये और किसकी कहिये बात/रोज़ी के अब दरख़्त का हिलता नहीं है पात.................बेवारिसी से आगरा ऐसा हुआ तबाह/फूटी हवेलियाँ हैं तो टूटी शहरपनाह/पैसे का ही अमीर के दिल में ख़याल है/पैसे का ही फ़कीर भी करता सवाल है/पैसा ही फ़ौज, पैसा ही जाहो जलाल (सत्ता प्रताप) है/पैसे ही का तमाम यह तंगो दवाल (हंगामा) है/पैसा ही रूप रंग है, पैसा ही माल है/पैसा न हो तो आदमी चरखे की माल है।" हबीब तनवीर एक विशिष्ट प्रयोगधर्मी और आम आदमी के नाट्यकार के रूप में प्रसिद्ध हुए और उन्होंने नाटक की परम्परा में सर्वथा नये एवं अत्यधिक सफल प्रयोग किये। छत्तीसगढ़ की नाचा शैली उनकी मौलिक एवं विशिष्ट देन है। हबीब तनवीर की प्रतिभा केवल नाटकों तक सीमित नहीं थी। वे थियेटर की दुनिया का बेशकीमती नगीना थे। उन्होंने अपनी बहुमुखी प्रतिभा का परिचय फिल्मों के लिये अभिनय एवं लेखन, शायरी, पत्रकारिता और संगीत के क्षेत्र में अपनी अनूठी सृजनात्मकता के माध्यम से दिया। 1945 में रॉयल अकादमी ऑफ़ ड्रामेटिक आर्ट्स, लन्दन से थियेटर का प्रशिक्षण प्राप्त कर आकाशवाणी मुम्बई की नौकरी करते हुए हबीब तनवीर ने 1953 तक इप्टा के साथ रंगान्दोलन में शिरक़त की और 1959 में दिल्ली में नया थियेटर की स्थापना की। संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1969), शिखर सम्मान (1975), अन्तर्राष्ट्रीय फ्रिज फस्र्ट एवार्ड (1982), पद्मश्री (1982) आदि सम्मानों-पुरस्कारों से नवाज़े गये हबीब तनवीर के बारे में ब॰ व॰ कारन्त ने कहा था कि हबीब तनवीर ने भारतीय संस्कृति को समकालीनता से जोड़ते हुए लोक नाटकों को 20वीं सदी में नयी शक्ति और ऊर्जा प्रदान की। वे रंगधुनी हैं। हबीब तनवीर 1972 से 1978 तक राज्यसभा में मनोनीत सदस्य भी रहे थे। एक त्रासद सच्चाई यह भी है कि दुनिया की कला प्रेमी जनता के बीच अत्यन्त सम्मानित हबीब तनवीर को हिन्दुस्तान की साझी सांस्कृतिक विरासत, लोकतन्त्र तथा धर्मनिरपेक्षता के प्रति अपने प्रेम और प्रतिबद्धता के कारण आजीवन भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विहिप और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं-नेताओं के हाथों बार-बार अपमानित-प्रताड़ित होना पड़ा। उन पर और उनके नाटकों पर कई बार हमले किये गये पर हबीब तनवीर कभी अपने इरादों से टस से मस नहीं हुए और न ही कभी एक आम हिन्दुस्तानी के पक्ष को उन्होंने अपनी आँखों से ओझल होने दिया। देश के तमाम छोटे-बड़े शहरों, सुदूर गाँवों-कस्बों या विदेशों में भी उनके लगभग सभी नाट्य प्रदर्शनों में दर्शकों की जैसी भीड़ जुटती रही, वह उनके समकालीन या उत्तरवर्ती उन नाट्यकर्मियों-निर्देशकों के लिये या तो एक कौतूहल या फिर एक अबूझ पहेली ही बनी रही जो सोते-जागते रंगमंच में दर्शकों के संकट पर दार्शनिक भंगिमा बनाये रखते हैं पर मौका मिलने पर अक्सर निरर्थक और बहुसंख्यक जनता के दुख-दर्द या उसके उल्लास से परे होकर नाट्यकर्म करते रहते हैं। दरअसल हबीब तनवीर की लोकप्रियता का आधार हिन्दुस्तानी लोक, भाषा एवं शैली का आधुनिक मूल्य बोध के साथ प्रस्तुतीकरण रहा है। मुझे याद है पटना में प्रेरणा द्वारा आयोजित सफदर हाशमी नाट्य महोत्सव में 3 जनवरी 2002 को रखी गयी ‘आधुनिक रंगमंच और लोक संस्कृति‘ विषयक संगोष्ठी में हबीब तनवीर ने कहा था -"यदि हमारे सारे आचार संस्कृति में शामिल नहीं हैं तो वह संस्कृति नहीं है। सत्ता कल्चर को बर्बाद करने में ही आराम का अनुभव करती है - बाज़ार भी। जनता की रचनात्मकता लोक शैली है - लोक परम्परा है। ज़बान भी एक बदलती हुई चीज़ है। वह जो कल थी आज नहीं है, जो आज है वह कल नहीं रहेगी। कला भी कोई ठहरी हुई चीज़ नहीं है, जो बदलती नहीं। संस्कृति भी धीरे-धीरे बदलती है। अगर हमारे पास अपनी ज़मीन नहीं होगी तो हम हवा में उड़ जायेंगे। मैं यह नहीं कहता कि हमारी परम्परा के अन्दर जो जैसा है, वैसा ठीक है, अथवा परम्परा का पुजारी होना चाहिये - यह बुतपरस्ती है -कबीर की पूजा करने वाले कबीरपन्थी हैं, उन्हें उस आग से मतलब नहीं है जिसकी हमें ज़रूरत है - क्योंकि उस आग से हम दुनिया को बदल सकते हैं, तो लोक की दृष्टि यह होनी चाहिये। संस्कृति को ठीक से समझ लेने से विकास की भी सही समझ आ जायेगी और राजनीति की भी। लोक शैली के भीतर जो सीमाएँ हैं, वह तो हैं ही, पर यदि कोई चीज़ परम्परा के साथ चल कर उसकी सीमाओं को तोड़ती भी है तो वही आधुनिकता है। आधुनिकता खुद पैदा नहीं होती, वह परम्परा से आती है।" परम्परा की इसी आग को आजीवन हबीब तनवीर सुलगाते रहे और उन्होंने आम आदमी को हिन्दुस्तानी रंगमंच के केन्द्र में स्थापित किया। उनके निधन के बाद इस रंगमंच का पटाक्षेप हो गया है। यह तो आने वाला समय ही बतायेगा कि इस रंगमंच का भविष्य अब क्या होगा।

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