Showing posts with label संघर्ष और जनांदोलन. Show all posts
Showing posts with label संघर्ष और जनांदोलन. Show all posts

Saturday, January 30, 2010

आज़ादी के लिए संघर्ष का सन्देश देती हैं गोरख की कविताएँ

‘गोरख पाण्डेय की कविता हमें आज़ादी के लिए संघर्ष का सन्देश देती है। हिन्दी की जो राजनीतिक कविता है उसमें नागार्जुन और गोरख पाण्डेय ऐसे कवि हैं जिनकी रचनाएँ कलात्मकता और लोकप्रियता - दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण हैं। आज जब संस्कृति के क्षेत्र में एक नये धनिक मध्यवर्ग का वर्चस्व हो गया है और जनपक्षधर साहित्य को जानबूझकर हाशिये पर धकेल दिया गया है, तब जनसाहित्य के पक्ष में जो लोग सक्रिय हैं उन्हें गोरख के रचनाकर्म से बहुत कुछ सीखना होगा।’ कनौट प्लेस स्थित इण्डियन काॅफी हाउस में जसम के पहले महासचिव क्रान्तिकारी कवि गोरख पाण्डेय की याद में जन संस्कृति मंच, दिल्ली और नई जमात द्वारा आयोजित कार्यक्रम में आलोचक प्रो॰ चमनलाल ने ये विचार व्यक्त किए।
जसम की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कवि शोभा सिंह ने कहा कि जनता के बीच गहराई से उतरकर और उनके दुख-दर्द, लूट-शोषण की दुनिया और उनके संघर्ष को ठीक से जानकर ही गोरख की काव्य परम्परा को आगे बढ़ाया जा सकता है और बेहतर दुनिया के सपने को साकार किया जा सकता है। युवा कवि प्रमोद कुमार तिवारी ने कहा कि भोजपुरी में लिखना गोरख का एक सचेत वैचारिक चुनाव था। आज जो भोजपुरी संस्कृति में अश्लीलता का बोलबाला है उससे निबटने के लिए भी गोरख जैसे कवियों के गीतों को व्यापक समाज के केन्द्र में लाना चाहिए।
कार्यक्रम की शुरुआत हिरावल द्वारा निर्मित आॅडियो कैसेट में संतोष झा द्वारा गाये गये गोरख के प्रसिद्ध गीत ‘एक दिन राजा मरले आसमान में उड़त मैना’ से हुई। इस मौके पर कवि रन्जीत वर्मा, रोहित प्रकाश, कुमार मुकुल, राजेश चन्द्र, भाषा सिंह, शोभा सिंह, अच्युतानंद मिश्र, रूबल सक्सेना, मुकुल सरल ने क्रमशः गोरख पाण्डेय की स्वर्ग से विदाई, बच्चों के बारे में, कैथर कला की औरतें, फिलिस्तीन, समझदारों का गीत, जानता हूँ, बंद खिड़कियों से टकराकर, कला कला के लिए, रफ़्ता-रफ़्ता नज़रबन्दी का जादू घटता जाए है, हम कैसे गुनहगार हैं आदि कविताओं और ग़ज़लों का पाठ किया। इस अवसर पर गोरख के निधन के तुरत बाद जनसांस्कृतिक आंदोलन के उनके सहयोद्धा महेश्वर द्वारा लिखे गए बेहद मार्मिक और प्रभावकारी स्मृतिलेख ‘एक नग़मा है पहलू में बजता हुआ’ का पाठ सुधीर सुमन ने किया।
कार्यक्रम में गोरख कीे रचनाओं के बारे में नागार्जुन, शमशेर और अनिल सिन्हा के विचारों को भी पढ़ा गया। बकौल नागार्जुन ‘गोरख की कविताएँ अन्धेरी रात के स्याह सन्नाटे में जुगनुओं की तरह जगमगाएँगी, बियाबान में टाॅर्च का काम करेंगी, टिमटिमाते दीपक की तरह तब तक रोशनी देती रहेंगी जब तक भोर का सूरज नहीं उग जाता।’
शमशेर के अनुसार गोरख माक्र्सवाद के होशमंद अध्येता थे। इतनी सुलझी हुई दृष्टि बहुत कम माक्र्सवादी लेखकों व विचारकों में मिलेगी। गोरख असली, टटके, शुद्ध, एकदम ओरिजिनल - यानी मौलिक रूप से - सच्चे लोककवि थे। अपनी शैली और वैचारिक ईमानदारी के कारण वह पाठकों के हृदय और मस्तिष्क दोनों को अत्यन्त सहजता से गाइड करते चलते हैं। नए लेखकों, कवियों और विचारकों, स्वस्थ साहित्य के प्रेमियों के लिए निश्चय ही वह विशिष्ट कवि, लेखक व विचारक हो जाते हैं। यही चीजें उन्हें मजदूर, किसान, मध्यवर्ग का एकदम अपना कवि व लेखक बनाती हैं।
अनिल सिन्हा ने चिह्नित किया है कि ग़ज़लों की जिस परम्परा को दुश्यन्त कुमार छोड़ गए थे, उसे गोरख ने समृद्ध ही नहीं किया उसके अलंकार भी बदल दिए। दुश्यन्त कुमार की ग़ज़लों के बाद हिन्दी में ग़ज़लों की भरमार हो गयी - ग़ज़लें चुटकुलों की तरह लिखी जाने लगीं और कुछ भी किसी तरह कहने का फैशन सामने आया। गोरख की ग़ज़लें इस गिरती हुई दशा पर एक ब्रेक है। उन्होंने सिद्ध किया कि लोकप्रिय काव्य-विधा को विचारों का वहन करते हुए लोक में जाना चाहिए।
इस अवसर पर पत्रकार अजय प्रकाश, कवयित्री विपिन चैधरी, कवि इरेन्द्र, गीतकार कमल कुमार, इतिहास के शोधार्थी धीरज कुमार नाइट, चित्रकार रोहित जोशी, पत्रकार संजय त्रिपाठी आदि भी मौजूद थे। संचालन भाषा सिंह ने किया तथा अध्यक्षता प्रो. चमनलाल ने की। धन्यवाद ज्ञापन कवि-आलोचक कुमार मुकुल ने किया।  
इस मौके पर जसम की ओर से विश्व पुस्तक मेले में साहित्य के कारपोरेटाइजेशन के खिलाफ पर्चे बाँटने और साहित्यकारों की स्वतन्त्रता एवं साहित्यिक संस्थाओं की स्वायत्तता के पक्ष में अभियान चलाने का प्रस्ताव लिया गया। जसम की ओर से वहाँ पर्चे बाँटे जाएँगे ताकि इस गम्भीर मुद्दे को लेकर साहित्यकार और पाठक विचार मन्थन करें। जनता के साहित्यकार गोरख पाण्डेय के प्रति भी यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।  
                                                   भाषा सिंह
                                                   सचिव,
                                        जन संस्कृति मंच, दिल्ली
                                                   

Wednesday, July 30, 2008

संघर्ष की धाराएं

अनिल चमड़िया
भारत में राजनैतिक आंदोलनों का इतिहास पुराना है। अगर एक-डेढ़ सौ साल के आसपास का इतिहास देखें तो आदिवासी इलाकों में अंग्रेज साम्राज्यवाद के खिलाफ विद्रोह हुए। अंग्रेजों ने अपना साम्राज्य बनाए रखने के लिए जिस निरंकुश नौकरशाही ढांचे को निर्मित किया उसके खिलाफ विद्रोह तेजी से पनपा। उसके बाद ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के खिलाफ संघर्षों की लंबी कड़ी शुरू होती है। इसके बाद के भारत में सामंतवाद का विरोध राजनैतिक आंदोलन के केंद्र में खडा़ दिखाई देता है। वह सामंतवाद जो साम्राज्यवादी विचारों और निर्मित होने वाली निरंकुश व्यवस्था की धूरी के रूप में दिखाई देता है। यानी अपने यहां आंदोलन का वास्तविक अर्थ किसी व्यवस्था के आमूलचूल परिवर्तन की अपेक्षा में प्रगट होता रहा है। उसकी मुख्य अंतर्धारा राजनैतिक विकल्प की रही है। लेकिन यह भी देखा जा सकता है कि अंग्रेज साम्राज्यवाद के खिलाफ विद्रोह की पृष्ठभूमि को सिंचने वाला आदिवासी समाज यानी इस समाज का सबसे ज्यादा शोषित, पीड़ित, दमित व्यक्ति तमाम तरह के व्यवस्था विरोधी आंदोलनों के बावजूद अपनी स्थिति से निकल नहीं पाया है। उसे कल भी लूटना जारी था और वह निरंतर आज तक जारी है। आज सबसे ज्यादा ‘जनांदोलन’’ आदिवासी इलाके में ही हो रहे हैं और इलाकों में ही बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ सबसे ज्यादा एमआ॓यू (मैमोरडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग) साइन हो रहे हैं। जनांदोलन भी हो रहे हैं और गांव के गांव उजड़ रहे हैं।
आज जनांदोलन वे सभी तरह के आंदोलन कहलाने लगे हैं जिसमें किसी जाति, धर्म, समुदाय, पेशेवर तबके के किसी मुद्दे या समस्या को लेकर आंदोलन होते हैं। जनांदोलन से वास्तव में जो ध्वनि निकलती है क्या ये स्थितियां उसके अर्थ का विस्तार हंै या फिर उसके संकुचन के उदाहरण हैं ? इस पर बाद में विचार कर सकते हैं कि विस्तार और संकुचन की वाहक कौन सी शक्तियां रही है यानी किसने इस तरह से जनांदोलनों की धारा को विस्तारित किया है या फिर उसकी अर्थवत्ता को समेटने की योजना तैयार की। लेकिन यहां एक बात बहुत स्पष्ट तौर पर सामने आती है कि जनांदोलनों का अर्थ महज परिवर्तनगामी राजनीति के वाहक के रूप में नहीं रह गया है। सुधार के लिए संगठित कार्यक्रम नियमित तौर पर किए जाते हैं तो वे भी जनांदोलन कहलाते हैं। किसी समस्या या सीमित अर्थों वाले मुद्दों को लेकर विरोध कार्यक्रम, मांग के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं तो उन्हें भी जनांदोलन कहा जा सकता है। अब तो कई बार सरकारें भी अपने किसी कार्यक्रम के लिए जनांदोलन करने का नारा देने लगती हैं। क्या इससे यह बात बहुत हद तक स्पष्ट नहीं होती है कि जनांदोलन के साथ विरोध की चेतना और परिवर्तन की राजनीति का जो पक्ष अनिवार्य रूप से जुडा़ दिखता रहा है वह बेहद कमजोर हुआ है। राजनीति अनिवार्यत: जनांदोलन का आधार होती है। कई बार राजनैतिक पक्ष को व्यापक अर्थों में प्रगट कर यह साबित करने की कोशिश की जा सकती है कि किसी क्षेत्र विशेष में किसी यथास्थितिवादी या वर्चस्ववादी समूहों की पक्षधर सरकार की नीति के खिलाफ सामूहिक भागेदारी वाले कार्यक्रमों को राजनैतिक जनआंदोलन कैसे नहीं माना जा सकता है? उसे भी माना जा सकता है और तमाम सुधारवादी आंदोलनों को भी राजनैतिक माना जा सकता है।
वह कौन सी तारीख है जब आंदोलनों को जनांदोलन कहने की जरूरत पड़ी। पहली बात तो यह कि यह जरूरत पड़ी क्यों? जहां तक ख्याल है कि अस्सी के बाद आंदोलनों में इस शब्द का तेजी से विकास दिखाई देता है। शायद 1974 के जेपी के नेतृत्व में इंदिरा गांधी के नेतृत्ववाली कांग्रेस की सत्ता के खिलाफ जो आंदोलन चला और जो सरकार बनी उसके भी विफल हो जाने के बाद राजनीतिक स्तर पर बुनियादी परिवर्तन की धाराओं ने अतीत से अलग आंदोलन की एक नई धारा विकसित करने की जरूरत पर बल देने के लिए जनांदोलन की शुरूआत करने की रणनीति बनाई हो। एक वैसे राजनैतिक लेखों का संग्रह सामने है जिसमें जनांदोलनों से जुड़े लेखक बुद्धिजीवी के नाम शमिल है। लेकिन उनमें से एक को छोड़कर किसी ने भी जनांदोलन शब्द का इस्तेमाल नहीं किया है। एक लेखक जिसने जनांदोलन शब्द का इस्तेमाल किया है उसका रिश्ता वर्गवादी विचारधारा से रहा है। ऐसा भी नहीं देखा गया कि पीपुल्स मूवमेंट जैसा कोई अंग्रेजी का शब्द भी अंग्रेजी की पुस्तक में दिखाई दिया हो। आज जिन अर्थों में जनांदोलन प्रचलित हुआ है वह अंग्रेजी के पीपुल्स मूवमेंट का ही अनूदित रूप हो सकता है। यहां इस बात की व्याख्या खुद करें कि अपनी भाषा में उपजे जनांदोलन और शासक की भाषा के अनूदित जनांदोलन से यहां क्या आशय है।अस्सी के बाद जो राजनीतिक स्थितियां बनीं, वह मतदाताओं के जबरदस्त मोह भंग का दौर था। यह बहुत खोज का विषय नहीं है कि उस राजनैतिक परिवर्तन में जन की कोई भूमिका नहीं थी। यहां जन का इस्तेमाल उन अर्थों में ही किया गया है जिन अर्थों में अब किया जा रहा है। जैसे जेपी ने झारखंड के धनबाद में आचार्य राममूर्ति को यह देखने के लिए कहा कि उनकी इस महती सभा में कितने आदिवासी आए हैं। तो आचार्य ने जेपी को जो सूचना दी उससे जेपी बेहद दुखी थे। उस सभा में आदिवासी नहीं थे। आदिवासी से मतलब 1947 के बाद के भारत का सबसे ज्यादा शोषित, दमित तबका जो शायद अपने पुराने जीवन स्तर से जरा भी ऊपर नहीं आ पाया है। सत्ता ने उसके साथ रिश्ता बनाने के बजाय उन्हें अपने लिए खाद पानी बनाए रखा। इस तरह से मोहभंग केवल मध्यवर्ग का हुआ था। असंतोष जो समाज के दबे–कुचले पिछड़े–दलितों के बीच पनप रहा था वह तेज हुआ था। सत्ता और राजनीतिक पार्टियों का रिश्ता जन और नागरिकों से लगभग समाप्त हो गया था।
अस्सी के बाद एक खास प्रवृत्ति यह दिखाई देती है कि समूह का रूप एक व्यक्ति के नेतृत्व में परिवर्तित होता चला गया। उस समय मास मोबलाइजेशन, लोक राजनीति जैसी शब्दावली सामाजिक कार्यकर्ताओं के इर्द–गिर्द दिखाई देने लगी। हालांकि दूसरे स्तर पर राजनीतिक जनांदोलनों की भी कोशिश जारी देखी जाती है। उनके बीच मोर्चाबद्ध होने की पहल भी होती है। लेकिन उनका राजनैतिक आंदोलन क्रमश: विस्तार के बजाय सिकुड़ता चला जाता है। जिस तरह से मोहभंग की स्थिति थी और असंतोष का विस्तार हुआ था उसे जनांदोलन में बदलने की क्षमता उनमें नहीं दिखी दूसरी तरफ विभिन्न हिस्सों में विभिन्न मुद्दों और विषयों पर कई कई ‘जनांदोलन’ दिखाई देने लगते हैं। यह कोशिश भी की गई कि गैर चुनावी और गैर पार्टीगत, राजनीतिक प्रक्रिया से अलग एक धारा विकसित की जाए। इसे आंदोलन की धारा के रूप में तो स्थापित किया गया, लेकिन व्यापक राजनैतिक सरोकार वहां से गायब था। तबकों, समूहों, समुदायों के आंदोलन थे, तो लेकिन दूरियां भी थीं। तब सार्वजनिक जीवन में सामाजिक कार्यकर्ताओं या आज की प्रचलित शब्दावली में स्वयंसेवियों की भूमिका बदल गई और वह ऐसी राजनीतिक भूमिका के रूप में विकसित हुई जो किसी वैकल्पिक राजनीति के विस्तार की संभावना पैदा करने की क्षमता से दूर थी।
www.rashtriyasahara.com से साभार

फुटकरीकरण जनांदोलन का

राजकिशोर
आदमी को चोट लगे और वह चीखे नहीं, यह नहीं हो सकता। दांत दबा कर मार खाना मनुष्य के स्वभाव में नहीं है। अगर ऐसा होता, तो दुनिया से दास प्रथा कभी खत्म नहीं होती। यह भी सच है कि गुलामी के संस्कार जाते-जाते ही जाते हैं। इसलिए बहुत लोगों को सिर उठाने में समय लगता है। जब बहुत सारे लोग किसी एक मुद्दे पर संगठित होकर सिर उठाते हैं, तो यह जनांदोलन की शक्ल ले लेता है। भारत का स्वतंत्रता संघर्ष ऐसा ही एक महान जनांदोलन था। जनांदोलन से पैदा होने वाला यह नया देश अपनी मूल प्रतिज्ञा को ही भूल जाए, यह एक अस्वाभाविक स्थिति है। लेकिन आंखों दिखती सचाई से कौन इनकार कर सकता है?
जनांदोलन के लिए कम से कम तीन तत्व चाहिए-- मुद्दा, लोग और नेतृत्व। इनमें से कोई भी एक तत्व गायब हो तो आंदोलन नहीं हो सकता। जरूरी नहीं कि मुद्दा जायज हो। हमने पिछले दो दशकों में राम जन्मभूमि मंदिर को केंद्र में रख कर एक ऐसे आंदोलन को जन्म लेते और पूरे उत्तार भारत में फैलते देखा है, जिसके बिना देश का काम बखूबी चल सकता था। लेकिन नेतृत्व इतना शक्तिशाली था कि आंदोलन घनीभूत होता गया और हजारों लोगों की जान गई तथा समाज में फूट-सी पड़ गई। इस तरह के कई नकारात्मक आंदोलन हम देख चुके हैं। वस्तुत: नकारात्मक आंदोलन भी किसी न किसी कुंठा से शक्ति और ऊर्जा पाते हैं। इसका ताजा उदाहरण कश्मीर में अमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी गई और फिर वापस ले ली गई जमीन का मुद्दा है। अगर यह जमीन न दी गई होती, तो कोई मुद्दा नहीं था। लेकिन दी गई जमीन वापस ले लेने पर हिन्दू मानस में अपमानित होने का भाव पैदा हो गया। इसी तरह राजस्थान के गुर्जर हाल तक शांत थे। लेकिन जब उन्हें यह लगा कि आरक्षण का आश्वासन देकर उनका वोट लेने का छल किया गया था, तो वे उन्माद में आ गए। अब गोरखालैंड की मांग को लेकर गर्मी पैदा होने की बारी आती दिखाई पड़ रही है। सुबास घीसिग जिस मिशन को आधी दूर तक ले जा कर बैठ गए और सत्ताा सुख में डूब गए, उस मिशन को आगे बढ़ाने के लिए कुछ और खूंखार लोग सामने आ रहे हैं। गोरखालैंड कहे जाने वाले इलाके में खून-खराबा होना निश्चित है।
हाल के समय में जो एक तार्किक और संगत आंदोलन देखने में आया, वह है नर्मदा बचाआ॓ आंदोलन। कहा जा सकता है कि नर्मदा बचाआ॓ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर भारत की अंतरात्मा का उज्ज्वल प्रतीक बन चुकी हैं। उन्होंने नर्मदा नदी पर बनाए जा रहे बड़े-बड़े बांधों के खिलाफ जितना सश‡ जनांदोलन खड़ा किया, वह एशिया में एक अद्भुत उदाहरण है। इसकी खास बात यह थी कि इस जनांदोलन का आधार दलित और आदिवासी जन थे। देश का खाता-पीता मध्य वर्ग कुल मिलाकर उसके खिलाफ ही था। सरकार के तीनों अंग -- विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका -- मुख्यत: इसी वर्ग के लोगों द्वारा संचालित होते हैं। इसीलिए जबरदस्त प्रतिवाद के बावजूद नर्मदा को नहीं बचाया जा सका। उसे जगह-जगह बांधा जा रहा है। चूंकि मेधा पाटकर ने इस एक मुद्दे से ही अपनी पहचान को जोड़ रखा है, इसलिए अब उनके पास कोई मुद्दा नहीं बचा। जहां भी जन आक्रोश की लपटें दिखाई देती हैं, वे पहुंच जाती हैं। उनके पास वैकल्पिक व्यवस्था की एक पूरी सोच दिखाई देती है, पर वे सत्तार के दशक तक के समाजवादी या साम्यवादी आंदोलन की तरह कोई व्यापक मुद्दों वाला जनांदोलन खड़ा करने में असमर्थ हैं। यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण घटना है।
ऐसा लगता है कि किसी सक्षम नेतृत्व के अभाव में इस समय कोई ऐसा बड़ा जनांदोलन खड़ा नहीं हो पा रहा है जिसमें मुद्दों की व्यापकता हो और जो एक विस्तृत इलाके को अपने सम्मोहन में ले सके। नई अर्थनीति के खिलाफ और स्वदेशी के पक्ष में राष्ट्रीय स्तर का जनांदोलन संगठित किया जा सकता था। यह गुंजाइश अभी भी है। लेकिन यह न हो पाया, न होता हुआ दिखाई देता है। मुद्दों की कोई कमी नहीं है, लोग भी उत्तोजित हैं, पर सक्षम नेतृत्व का अभाव है। लगता है कि एक बड़ी सेना की छोटी-छोटी टुकड़ियां कभी यहां तो कभी वहां किसी न किसी स्थानीय मुद्दे पर तलवार भांज रही हैं। लेकिन उन्हें किसी वैचारिक व्यवस्था और व्यापक संगठन से जोड़ने वाला नेतृत्व अभी तक पैदा नहीं हो पाया है। परिणामस्वरूप जनांदोलनों का फुटकरीकरण हो रहा है। छोटी-छोटी घटनाओं के माध्यम से लोगों का असंतोष विस्फोटक ढंग से प्रगट हो रहा है, पर इससे सत्ता के तिलिस्म को कोई निर्णायक चोट नहीं लगती। वह और मजबूत होता जाता है। वह जितना मजबूत होता जाता है, उतना ही आततायी हो रहा है। इसलिए असंतोष उत्तारोत्तार विस्फोटक तथा हिसक होता जाता है। लोग कहीं थानेदार को पीट देते हैं, कहीं सरकारी अधिकारियों को घेर लेते हैं, कहीं आग लगा देते हैं, कहीं सड़क बंद कर देते हैं और कहीं अपने इलाके में सरकारी नुमाइंदों को घुसने नहीं देते। पुलिस गोली चलाती है, आतंक फैलाती है और फिर स्थिति जस की तस हो जाती है।
निश्चय ही कुछ जनांदोलन अहिसक और जनशक्ति की प्रखर अभिव्यक्ति पर टिके हुए हैं। सूचना का अधिकार आंदोलन ऐसा ही है। राजस्थान के एक गांव से शुरू हुआ यह जनांदोलन काफी हद तक सफल रहा है। अब वह प्रशासनिक धूल-गर्द को साफ करने में अहम भूमिका निभा रहा है। लोकसभा में नोट उछाल कांड की वास्तविक पृष्ठभूमि की पड़ताल करने के लिए कई व्यक्तियों और संस्थाओं ने स्पीकर से सूचना के अधिकार के तहत आवश्यक जानकारियां मांगी हैं। सामाजिक अंकेक्षण (सोशल ऑडिट) का आंदोलन भी एक ऐसी ही कार्रवाई है। इसके माध्यम से राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में चल रहे तरह-तरह के भ्रष्टाचार को सामने लाने में अद्भुत सफलता मिली है। विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) के खिलाफ भी जगह-जगह फुटकर आंदोलन चल रहे हैं। ये आंदोलन वस्तुत: किसानों के विस्थापन को रोकने के लिए हैं। यह मामूली बात नहीं है कि जमीनी स्तर के उग्र विरोध को देखते हुए गोवा सरकार को नीतिगत घोषणा करनी पड़ी कि हमारे राज्य में कोई सेज नहीं बनेगा। यह भी दिलचस्प है कि गोवा की ग्राम पंचायतें, एक के बाद एक, अपने-अपने क्षेत्र में बड़ी-बड़ी बिल्डगें न बनने देने और सभी प्रकार की मेगा परियोजनाओं के खिलाफ लगातार प्रस्ताव पास कर रही हैं। सिगुर और नंदीग्राम के संघर्ष से कौन अवगत नहीं है?
इसलिए यह कहना उचित नहीं है कि जनांदोलन का समय अब नहीं रहा। समाज के विभिा वगा की पीड़ा बढ़ रही है, लोग विस्थापित हो रहे हैं, आर्थिक नीतियों के कुपरिणाम आने शुरू हो गये हैं, अपराध की वृद्धि और पुलिस की नििष्क्रयता से लोग छटपटा रहे हैं, कार्यस्थलों पर नियोक्ताओं की मनमानी बढ़ गई है। ऐसे बेचैन हालात लोगों को क्यों नहीं आंदोलित करेंगे? मुद्दे हैं, छटपटाते हुए लोग भी हैं, पर उनका नेतृत्व करने के लिए विचारशील, चरित्रवान और व्यवस्थित लोग सामने नहीं आ रहे हैं। वे समाचारपत्रों में लेख लिखकर, सेमिनारों में व्याख्यान दे कर और साथियों के साथ चर्चा कर संतुष्ट हैं, मानो लातों के देवता बातों से ही मान जाएंगे। इसलिए जगह-जगह स्वत: स्फूर्त संघर्ष हो रहे हैं। चिनगारियां उठती हैं और बुझ जाती हैं। अन्याय और अत्याचार में भारत देश की शक्ति जितनी संगठित हो कर प्रगट हो रही है, उनका प्रतिवाद करने वाली शक्तियां उतनी ही बिखरी हुई और असंगठित हैं।
लेकिन क्या यह जरूरी है कि आज का सच ही कल का भी सच बन जाएगा? माफ कीजिए, इतिहास कभी भी लंबे समय तक एक ही करवट नहीं बैठा रहता।
www.rashtriyasahara.com से साभार

आंदोलनों के फलित और दलित

सुभाष गाताडे
दिल्ली विश्वविघालय के समाजविज्ञान विभाग की प्रोफेसर सुश्री अमिता बाविसकर पर्यावरण आंदोलन से लंबे समय से जुड़ी रही हैं। उन्होंने नर्मदा आंदोलन पर बहुत कुछ लिखा है। अपनी हालिया किताब के एक हिस्से में उन्होंने मध्य प्रदेश के निमाड़ इलाके में आंदोलन का मजबूत आधार रहे पाटीदार समुदाय (जो राजनीतिक तौर पर ताकतवर है व आर्थिक तौर पर समृद्ध है) के बहाने आंदोलन के सामने खड़े द्वंद्वों की चर्चा की है।उनके मुताबिक निमाड़ के पाटीदार भूस्वामी जो दैनिक आधार पर मजदूरों को रखते हैं, उन्हें हर दिन 12 से 15 रूपए प्रतिदिन की मजदूरी देते हैं जबकि कानूनी न्यूनतम मजदूरी 25 रूपए है। उनके मुताबिक कुछ साल पहले जब एक जागरूक सब- डिवीजनल मैजिस्ट्रेट ने न्यूनतम मजदूरी लागू करने के लिए कोशिशें तेज की तो नर्मदा आंदोलन की रैलियों में अपनी ताकत का अहसास करानेवाले इन्हीं पाटीदारों ने ‘आंदोलन के दौरान हासिल सांगठनिक कुशलताओं का इस्तेमाल करके इस अफसर का तबादला करवा दिया।’ उनका यह भी कहना था कि भूमिहीन मजदूर जो ‘कडमाल जैसे गांवों में आबादी का 40 फीसद हैं, जो मुख्यत: अनुसूचित जाति और जनजातियों से संबद्ध हैं, वे नर्मदा आंदोलन के प्रदर्शनों से और स्थानीय स्तर पर एनबीए कार्यकर्ताओं के बीच लगभग अनुपस्थित दिखते हैं।
’नर्मदा बचाआ॓ आंदोलन जैसे आंदोलन के बारे में आंदोलन की सहयात्री अमिता बाविसकर ऐसे कई अन्य सवालों को उठाती हंै, जिनमें यह स्वर भी उठता प्रतीत होता है कि विस्थापन को लेकर उठे इस आंदोलन में दलित के लिए वाकई कोई जगह है या नहीं। इसे बताने के लिए किसी अध्येता की आवश्यकता नहीं कि नर्मदा आंदोलन के कर्णधारों ने अपने इन पाटीदार समर्थकों पर (जो न्यूनतम मजदूरी देने जैसे संविधानप्रदत्त कर्तव्य को भी पूरा नहीं करते)अंकुश लगाने के लिए कोई कदम उठाया होगा।
ऐसी बात नहीं है कि ऐसे प्रश्न पहली दफा उठे हैं जो आंदोलन के बारे में जनमानस में व्याप्त छवि को अवश्य थोड़ा असहज बनाते हैं। अक्सर होता यही रहा है कि आंदोलन की पक्षधरता का प्रश्न इतनी बड़ी अहमियत हासिल करता रहा है कि सहयात्रियों द्वारा उठाए सवालों को भी एक तरह से उनके खेमा बदलने के तौर पर समझा जाता रहा है और वहीं खारिज किया जाता रहा है।
अगर 90 का दशक बड़ी परियोजनाओं से निर्मित विस्थापन के खिलाफ उठे जनांदोलनों को लेकर चर्चित रहा है, तो 21 वीं सदी की पहली इकाई का उत्तरार्द्ध विशेष आर्थिक क्षेत्र के निर्माण, विशेषकर कारपोरेट समूहों को लिये औने-पौने दाम उपलब्ध की जाती रही जमीन के मसले पर उठती जन हलचलों के इर्द-गिर्द केंद्रित होता दिखा है। आजादी के साठ साल बाद भी इस देश में भूमि सुधार के मसले को लेकर कभी तत्पर न दिखीं विभिन्न सत्ताधारी पार्टियों द्वारा कारपोरेट समूहों को जमीनें उपलब्ध कराने को लेकर दिखायी जा रही अतितत्परता निश्चित ही चौकाने वाली रही है। लेकिन आप देखेंगे कि सेज विरोधी आंदोलन दो किस्म की विसंगतियों, खामियों का शिकार रहा है। जहां सारी लडा़ई का फोकस जमीन देने या न देने पर या उसके बेहतर दाम हासिल करने पर केंद्रित रहा है, वहीं उन आर्थिक नियमों को प्रश्नांकित नहीं किया जा रहा है कि किस तरह ऐसे क्षेत्र मुल्क विशेष में मजदूरों के अधिकारों की सुरक्षा करनेवाले, कर, व्यापार, उत्पादन-शुल्क आदि को लेकर बने निश्चित कानूनों के तमाम ‘बंधनों’ से मुक्ति के क्षेत्र होंगे। दूसरे यह प्रश्न भी नहीं पूछा जा रहा कि इलाका विशेष में रहनेवाले उन लोगों के पुनर्वास का क्या होगा जो मेहनत मजदूरी करके खाते-कमाते रहे हैं, जिनके पास जमीन का एक टुकडा़ भी नहीं रहा है। पिछले दिनों एक अखबार ने हरियाणा में एक ऐसे ही विशेष आर्थिक क्षेत्र पर स्टोरी की थी और उजागर किया था कि एक तरफ जहां सेज निर्माण के बाद मिले मुआवजे से जमीन के मालिकानों अपनी ऊंची-ऊंची हवेलियां बनवायीं और गाड़ियां खरीदीं, वहीं दूसरी तरफ वहां के भूमिहीनों को, जो मुख्यत: दलित थे, जो सदियों से वहीं रहते आए थे, उन्हें बिल्कुल खदेड़ दिया गया।
यह सही है कि जनता के विशष्टि मुद्दों पर खड़े जनांदोलनों का अपना गति विज्ञान होता है और वह काफी हद तक आंदोलन के सहभागी तत्वों की सामाजिक-सांस्कृतिक स्थिति और नेतृत्व के दृष्टिकोण से तय होता है। अगर आंदोलन को अधिकाधिक व्यापक बनाना है तो लोगों की सहभागिता जरूरी होती है। ऐसे में नेतृत्व अगर बेहद सचेत न हों तो कई बार लोक संस्कृति व परंपरा की दुहाई देते हुए ऐसे प्रतीकों को, आंदोलन के ऐसे रूपों को अपनाया जाता है, जो जनता के एक हिस्से को अलगाव में डाल सकते हैं। मध्य प्रदेश में जनांदोलनों से लंबे समय से जुडे़ योगेश दीवान ने नर्मदा आंदोलन में इस्तेमाल प्रतीकों पर काफी कुछ लिखा है। उनका कहना है कि आंदोलन के दौरान नर्मदा मैया की आरती उतारना एक चर्चित मामला है।
अभी पिछले साल जब भोपाल में आंदोलन का लंबा धरना चला था, वहां पर भी मंच पर नर्मदा मैया की आरती उतारी गयी जबकि धरने में न केवल अल्पसंख्यक समुदाय के लोग बल्कि दलित-आदिवासी सभी शामिल थे। उनके मुताबिक आरती उतारने जैसा रूप जो वर्ण समाज में अधिक प्रचलित है हिंदू संस्कृति से बहिष्कृत रखे गए दलितों-आदिवासियों को या अल्पसंख्यक समुदाय के लिए आंदोलन से एकाकार होने में बाधा नहीं बनता होगा ? इस संदर्भ में वह आंदोलन के सेक्युलर रूपों को अपनाने पर जोर देते हैं।
विडंबना यही कही जाएगी कि उच्च-नीच अनुक्रम पर टिके भारतीय समाज में दलितों के अपने आंदोलन भी कहीं न कहीं उन्हीं तरीकों का अनुकरण करते दिखते हैं जिसे वर्ण समाज के कर्णधारों ने प्रचलित किया हो। प्रख्यात समाजशास्त्री एम एन श्रीनिवास इस प्रक्रिया को ‘संस्कृतिकरण या संस्कृताइजेशन’ के तौर पर संबोधित करते हैं। दो साल पहले हरियाणा के हिसार में अनुसूचित जाति व जनजातियों से संबद्ध कर्मचारियों के एक फेडरेशन द्वारा आयोजित संगोष्ठी में इसका गहराई से एहसास हुआ। सभा की शुरूआत में फेडरेशन के चर्चित नेता ने महात्मा बुद्ध के नाम वंदना करने का निर्देश दिया और वहां जुटे जनसमुदाय ने नेता की बात का सम्मान करते हुए बौद्धवंदना की। कुछ समय तक मुझे लगा कि रेल विभाग के कर्मचारियों की सभा में मैं बैठा हूं या किसी धार्मिक आयोजन का हिस्सा हूं।
www.rashtriyasahara.com से साभार

जनांदोलनों की दरकती जमीन

विभांशु दिव्याल
‘जनांदोलन’ एक बहुत ही भ्रामक, लचीला और बहुमुहां शब्द है जिसके हजार संदर्भों में हजार अर्थ निकाले जा सकते हैं और हजार व्याख्याएं की जा सकती हैं। इसलिए पहले चरण में ही यह समझ बनानी जरूरी है कि भारतीय लोकतंत्र और वर्तमान भारतीय सामाजिक- आर्थिक परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में जनांदोलन से हम क्या व्यावहारिक अर्थ निकालना चाहते हैं या इस शब्द को हम क्या अर्थवत्ता देना चाहते हैं। इसे स्पष्टता से समझने के लिए हाल ही के कुछ उन आंदोलनों का उल्लेख किया जा सकता है जिनमें भारी संख्या में जनसमूह शामिल थे और जिनके कारण देश के कई हिस्सों में स्थानिक तौर पर सार्वजनिक जीवन अस्त-व्यस्त और त्रस्त रहा। अमरनाथ बोर्ड जमीन मामले में कश्मीर घाटी के मुसलमान तब तक जन-जीवन को ठप किये रहे जब तक कि अमरनाथ बोर्ड को दी गई भूमि का सरकारी आदेश निरस्त न कर दिया गया। इसके विरोध में जम्मू के हिदू संगठन लंबे समय तक आक्रामक आंदोलन चलाते रहे और देश के अनेक हिस्सों में उग्र प्रदर्शन हुए। इससे पहले अनुसूचित जाति में आरक्षित होने के लिए गुर्जरों ने उग्र आक्रामक और परिवहन जाम कर देने वाला जातीय आंदोलन कई दिनों तक चलाया और उत्तार भारत के लोगों को यातायात व्यवस्था भंग हो जाने के कारण पचासियों तरह के कष्ट झेलने पड़े। इससे पहले एक आंदोलन तसलीमा नसरीन के विरूद्ध हुआ था जिसके दबाव में बांग्लादेश की इस निर्वासित लेखिका को मार्क्सवादी पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से एक बार फिर से निष्कासन झेलना पड़ा। एक और आंदोलन सिखों का था जो उन्होंने एक दूसरे मत के संस्थापक बाबा राम रहीम के विरूद्ध कई दिनों तक चलाया था और अब भी यह एक छोटे से उकसावे पर फूट पड़ता है। ऐसे और इसी तरह के मिलते-जुलते आंदोलन किसी न किसी बहाने से देश में होते ही रहते हैं। इनमें जनता की भागीदारी अपनी-अपनी कल्पित अस्मिताओं, हितों के लिए अथवा अपनी उपेक्षा, अपने अपमान या अपने किसी आहत बोध के प्रतिकार के लिए होते हैं। लेकिन क्या ये आंदोलन जनांदोलन है?


अगर इस तरह के आंदोलनों को हम जनांदोलन मान लेंगे तो एक अर्थगत संकट खड़ा हो जाएगा। इन और ऐसे आंदोलनों की उभार या निर्माण प्रक्रिया को देखें तो इनके पीछे दूसरे वर्ग- समूह, धर्म-समूह या जाति-समूह के प्रति नफरत और तिरस्कार का भाव निहित रहता है। इनकी सामाजिक ष्टि क्षुद्र और स्वार्थ केंद्रित होती है। इनकी पहुंच किसी धर्म विशेष, किसी जाति विशेष या किसी क्षेत्र विशेष तक होती है। लोकतांत्रिक आजादी के नाम पर किए गए ये आंदोलन वस्तुत: सामाजिक विग्रह को बढ़ाते हैं, लोकतंत्र का संस्थानात्मक क्षय करते हैं और अपनी परिणति में जनविरोधी होते हैं। ये आंदोलन जो अधिकतर किसी जाति या धर्म-समूह के भावनात्मक दोहन पर आधारित होते हैं, अधिक-से-अधिक जन उभार, जन उत्तोजन या जन विचलन कहे जा सकते हैं लेकिन जनांदोलन नहीं।


इस अर्थ में जनांदोलन उन्हें कहा जा सकता है जो सामान्य जनता के व्यापक हितों पर केंद्रित हों, जड़तावादी और विघटनकारी संकुचित जीवन मूल्यों के विरूद्ध समन्वयवादी, समतावादी, न्यायवादी और बहुजन नागर समाज के सामाजिक, आर्थिक , सांस्कृतिक उत्थान पर केंद्रित हों। यानी जो आर्थिक असमानता के विरूद्ध हों, जातीय दुराग्रहों के विरूद्ध हों, सांप्रदायिक श्रेष्ठताबोध के विरूद्ध हों और लोकतांत्रिक समाज को किसी भी तरह से क्षति पहुंचाने वाली स्थापित परंपराओं और उनके औचित्यीकरण के विरूद्ध हों। मतलब साफ है कि इस समय इस तरह के आंदोलन लगभग अनुपस्थित हैं। जो आंदोलन इस समय होते और चलते दिखाई देते हैं और जो प्राय: मीडिया को अपनी आ॓र खींचते रहते हैं वे वस्तुत: जनविरोधी आंदोलन हैं, जानंदोलन नहीं। अब अगर जनांदोलन नहीं उभर रहे हैं तथा जन विक्षोभ और जन असंतोष अन्यान्य तेवरों और बहानों के साथ उभर रहे हैं तो यह समूचे भारतीय लोकतंत्र के लिए एक चिता की बात है।


यहां यह कहना भी जरूरी है कि जनांदोलन जहां एक आ॓र पुरानी मूल्य व्यवस्थाओं को चुनौती देते हैं तो नई मूल्य व्यवस्थाओं का निर्माण भी करते हैं। जनांदोलनों द्वारा संचालित ध्वंस और निर्माण की प्रक्रिया एक सतत प्रक्रिया है जो नियमबद्ध और अनुशासित तरीके से संचालित होती है। यह प्रक्रिया वृहद् समाज के हित में निश्चित लक्ष्यों के लिए होती है। यह आवेश का निरंकुश तथा नियंत्रणविहीन विस्फोट नहीं होता, बल्कि व्यापक जन अपेक्षाओं की पूर्ति के लिए और व्यापक जन असंतोषों के निराकरण के लिए सुनिश्चित रणनीति के तहत अमानवीय जड़ताओं के विरूद्ध सतत जनसंघर्ष होता है। ऐसा जनसंघर्ष जिसमे संकुचित स्वाथा तथा क्षुद्र हितों के लिए कोई जगह नहीं होती।


कहने की जरूरत नहीं है कि इस समय का भारत लगभग जनांदोलनविहीन भारत है, जिसमें र्आिथक वैषम्य, राजनीतिक कदाचार, सर्व स्तरीय भ्रष्टाचार, क्षुद्र अस्मिताओं के अभद्र दुराग्रह सांप्रदायिक शक्तियों के ध्रुवीकरण, जातियों के टकराव, व्यावसायिक विचलन, सांस्कृतिक अवमूल्यन, सामाजिक संबंधों के बिखराव, पर्यावरणीय संकट आदि निरंतर बढ़ रहे हैं। भारत को अब वास्तविक जनांदोलनों की जरूरत है जो इन सारी दुष्प्रवृत्तिायों विरूद्ध देश की व्व्व राष्ट्रीयसहारा कॉम जनता के वास्तविक हितों को समाहित कर सकें तथा इन हितों पर दावेदारी करने वाले दलालों, ठगों, बेईमानों और अपने-अपने समूहों के मतांध ठेकेदारों को समाज की मुख्यधारा से निर्वासित कर अतीत के कूड़ेदान में फेंक सकें। जनांदोलन इस समय के भारत की एक अनिवार्य मांग हैं और उम्मीद की जानी चाहिए कि भारतीय जनता इस दिशा में सचेत होकर सोचेगी।


www.rashtriyasahara.com se sabhar