Thursday, July 17, 2008

बढ़ रहा है अर्थव्यवस्था के क्रैश करने का खतरा

आनंद प्रधान
अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों से आ रहे संकेतों से साफ है कि कुछ महीनों पहले तक नवें आसमान पर कुलांचे भर रही अर्थव्यवस्था की रफ्तार न सिर्फ धीमी पड़ने लगी है बल्कि वह अपने ही बोझ से थककर हांफने लगी है। चिंता की बात यह है कि केंद्र में सरकार गिराने और बचाने के खेल के शोर में कोई अर्थव्यवस्था की इस कराह को सुन नहीं रहा है। इससे यह आशंका जोर पकड़ने लगी है कि अर्थव्यवस्था नवें आसमान से उतरते हुए ‘साफ्ट लैंडिंग’ के बजाय कहीं क्रैश न कर जाए। राजनीतिक अस्थिरता के कारण यह खतरा और बढ़ गया है।
यह कोई बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जा रहा खतरा नहीं है। अर्थव्यवस्था से आ रहे संकेतों से बिल्कुल स्पष्ट है कि अगर उसे पूरी सक्रियता और समझदारी के साथ संभाला नहीं गया तो उसे क्रैश होने से बचाना मुश्किल हो जाएगा। पिछले कुछ दिनों में दो अंतरराष्ट्रीय क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों -स्टैंडर्ड एंड पुअर और फिच- ने भारतीय अर्थव्यवस्था की लड़खड़ाहट और बिगड़ती वित्तीय स्थिति का हवाला देते हुए भारत की रेटिंग घटा दी है। निश्चय ही इसका नकारात्मक असर भारतीय शेयर बाजार से लेकर मुद्रा बाजार में सक्रिय अंतरराष्ट्रीय निवेशकों विशेषकर विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) के सेन्टिमेंट पर पड़ा है। इसका तात्कालिक नतीजा काले मंगलवार के रूप में सामने आया जब मुंबई शेयर बाजार का संवेदी सूचकांक ‘सेंसेक्स’ 654 अंकों तक लुढ़क गया। सेंसेक्स की मौजूदा मरियल स्थिति का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि वह पिछले 15 महीनों के अपने सबसे न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया है। सेंसेक्स को भारतीय अर्थव्यवस्था की सेहत का संकेतक मानने वालों के लिए यह सचमुच बड़ी चिंता का विषय होना चाहिए कि बाजार 21200 अंकों के एवरेस्ट से लुढ़कता हुआ 12700 अंकों तक पहुंच गया है। सिर्फ साढ़े छह महीनों में सेंसेक्स में लगभग 30 खरब रूपए की पूंजी इस गिरावट के साथ स्वाहा हो चुकी है।
कहने की जरूरत नहीं है कि शेयर बाजार में इस भारी गिरावट और अफरातफरी की सबसे बड़ी वजह वे विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) हैं जिन्होंने पिछले वर्षों में सेंसेक्स को एवरेस्ट पर चढ़ाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई थी लेकिन पिछले कुछ महीनों से भारतीय अर्थव्यवस्था की डगमगाती नैया से कूद– कूदकर भागने में लगे हुए हैं। तथ्य यह है कि पिछले वर्ष एफआईआई ने भारतीय शेयर बाजारों में लगभग 17।36 अरब डालर (लगभग 75000 करोड़ रूपए) का निवेश किया था लेकिन इस साल वे पिछले साढ़े छह महीनों में लगभग 7 अरब डालर की रकम निकाल ले गए हैं।
शेयर बाजार से एफआईआई के पलायन का असर डालर के मुकाबले रूपए की कीमत पर भी पड़ा है। काफी अरसे तक डालर के मुकाबले मजबूत बने रहने के बाद एक बार फिर रूपया कमजोर पड़ने लगा है क्योंकि भारतीय बाजारों से डालर निकाल रहे विदेशी निवेशकों के बीच डालर की मांग बढ़ गई है। इस कारण डालर के मुकाबले रूपए की कीमत गिरकर प्रति डालर 43।22 रूपए तक पहुंच गई है जबकि कुछ महीनों पहले तक कमजोर डालर के मुकाबले रूपया मजबूत होकर प्रति डालर 39 रूपया पहुंच गया था।
भारतीय बाजारों में एफआईआई के पलायन के कारण शेयर बाजार के लुढ़कने और रूपए के कमजोर होने से भी अधिक चिंता की बात यह है कि इससे भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में एक ‘नकारात्मक सेन्टिमेंट’ बनता है जिसका असर घरेलू निवेशकों पर भी पड़ता हैै। वे भी बाजार से हाथ खींचने लगते हैं और इसका असर अर्थव्यवस्था में नए निवेश पर पड़ता है। नया निवेश न होने से अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर मंद पड़ने लगती है जिससे कंपनियों के मुनाफे पर असर पड़ता है। नए रोजगार के अवसर नहीं बढ़ते हैं, उल्टे छंटनी और तालाबंदी का दौर शुरू हो जाता है। इससे निवेश और प्रभावित होता है। इस तरह एक दुष्चक्र बन जाता है और अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में आ जाती है।
सवाल यह है कि क्या भारतीय अर्थव्यवस्था उसी दुष्चक्र की आ॓र बढ़ रही है? इस बारे में अभी कोई बिल्कुल सटीक घोषणा करना जल्दबाजी होगी लेकिन अर्थव्यवस्था से आ रही कई नकारात्मक खबरें इसी आ॓र इशारा कर रही हैं। पहली बुरी खबर यह है कि मई में औघोगिक उत्पादन सूचकांक ‘आइपीपी’ गिरकर 3।8 प्रतिशत पर पहुंच गया है जो पिछले छह वषार्र्ें में सबसे न्यूनतम दर है। इससे साफ जाहिर है कि औघोगिक विकास की दर लगभग धराशायी हो चुकी है। उससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि पूंजीगत वस्तुओं (कैपिटल गुड्स) के उत्पादन की दर लुढ़ककर मात्र 2।5 प्रतिशत रह गयी है जो पिछले वर्ष मई में 22 प्रतिशत थी। कैपिटल गुड्स के उत्पादन में इतनी भारी गिरावट इस बात की सूचक है कि अर्थव्यवस्था में नया निवेश कम या नहीं हो रहा है । जाहिर है कि इसका सीधा असर अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर पर पड़ेगा। यही कारण है कि कुछ महीनों पहले तक जीडीपी की 9 से 10 प्रतिशत की वृद्धि दर के दावे करने वाले आर्थिक मैनेजर और विश्लेषक भी अब दबी जुबान से स्वीकार करने लगे हैं कि मौजूदा स्थितियों में जी डी पी की 7 से 8 प्रतिशत की दर भी बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। यह 7 से 8 प्रतिशत की वृद्धि दर भी अच्छे मानसून और कृषि क्षेत्र के बेहतर प्रदर्शन के आसरे टिकी है। अन्यथा अर्थव्यवस्था खासकर औघोगिक क्षेत्र जिस तरह से लुढ़क रहा है, उसके कारण जी डी पी की 6 से 7 प्रतिशत की विकास दर को भी हासिल करना टेढ़ी खीर साबित होगी । असल में, अर्थव्यवस्था को आसमान छूती मुद्रास्फीति की दर ने पटरी से उतार दिया है। मुद्रास्फीति ने पिछले चार महीनों में जिस तरह से सुरसा की तरह अपना बदन बढ़ाया है और तेरह वर्र्षों का रिकार्ड तोड़ती हुई 11।89 प्रतिशत की बेचैन कर देने वाली ऊंचाई पर पहुंच गयी है, उससे अर्थव्यवस्था के मैनेजरों के हाथ–पांव फूले हुए हैं। मुद्रास्फीति की बेकाबू रफ्तार को थामने के लिए पिछले कुछ सप्ताहों में रिर्जव बैंक और वित्त मंत्रालय ने जो भी उपाय किए, वे न सिर्फ नाकाफी साबित हुए हैं बल्कि उनका उल्टा असर अर्थव्यवस्था की गति को धीमा करने के रूप में सामने आ रहा है। हताशा में अब अर्थव्यवस्था के मैनेजरों ने मुद्रास्फीति की सुरसा के आगे घुटने टेक दिए हैं और कहने लगे हैं कि महंगाई पर नियंत्रण का असर नवम्बर–दिसंबर से दिखेगा। जाहिर है कि यह सिर्फ दिलासा है ।
सच यह है कि मुद्रास्फीति का जिन्न बोतल से बाहर आ चुका है और अर्थव्यवस्था को अपनी चपेट में ले चुका है। कोढ़ में खाज की तरह मौजूदा राजनीतिक अस्थिरता का असर यह हो रहा है कि यूपीए सरकार का सारा ध्यान अर्थव्यवस्था को संभालने के बजाय सरकार का अस्तित्व बचाने में जाया हो रहा है। इस अनिश्चितता के कारण अर्थव्यवस्था की गति तो मंद पड़ती ही जा रही है, वह दिशाहीनता का शिकार भी हो गई है। दिशाहीनता के साथ हमेशा क्रैश करने का खतरा जुड़ा रहता है। शेयर बाजार के साथ-साथ अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों से आ रही खतरे की घंटी इसी क्रैश की पूर्व चेतावनी है। उम्मीद है कि अर्थव्यवस्था के मैनेजर इसे सुन रहे होंगे।
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Wednesday, July 16, 2008

हमारी आधुनिकता की चार उलझनें

अभय कुमार दुबे
जैसा कि हम जानते हैं कि कोई भी आधुनिकता अपने-आप में एक मुकम्मल सिक्काबंद शै नहीं होती। मानवता के इतिहास में हर आधुनिकता दो-तरफा संवाद चला कर लोगों और समुदायों को अपने रंग में रंगती है, और उसी प्रक्रिया में उसकी सार्वभौमिकता को स्थानीय परिवेश का संस्कार मिलता है। भारतीय संदर्भों में यह बात और भी सही है। हमारे यहां आधुनिकता अपनी संरचना में एक बहुवचन है। आधुनिकता का राजनीतिक रूप उस समय तक संकटमुक्त नहीं हो सकता, जब तक उसके अन्य रूप ठीक से विकसित नहीं हो जाते। हम मुख्यत: चार तरह की उलझनों से दो-चार हो रहे हैं। पहली उलझन आधुनिकता के घरेलू संस्करण से संबंधित है। तमाम तरह के कानून बनाने के बावजूद समाज के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया परिवार की संस्था में पर्याप्त सुधार करने में नाकाम रही है। दूसरी उलझन दलित समाज के आईने में देखी जा सकती है। छुआछूत से काफी हद तक मुक्ति प्राप्त कर लेने के बावजूद आज तक दलित मध्यवर्गीय समाज की मुख्यधारा में शामिल नहीं हो पाए हैं। तीसरी उलझन अल्पसंख्यकों से जुड़ी हुई है। वे उदारतावादी आधुनिकता से टकराव में नजर आते हैं। वे उसकी शर्तों और कसौटियों के मुताबिक अपना पुन: संस्कार करने से इनकार कर रहे हैं। उसकी चौथी उलझन सेक्सुअलिटी यानी यौनिकता के सवाल के आसपास है जिसकी सबसे तीखी अभिव्यक्ति वेश्याओं से संबंधित अनिर्णय की स्थितियों में दिखती है। हिंदी साहित्य की कुछ नई रचनाओं ने जाने-अनजाने इन प्रश्नों के साथ कुछ संवाद कायम किया है। साहित्य की यह कोशिश आश्वस्तिकारक है।
विख्यात लेखिका मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’ में ग्रामीण परिवेश से आई एक पढ़ी-लिखी स्त्री के साहित्यकार बनने की मानीखेज दास्तान बिखरी हुई है। यह रचना केवल एक परिवार का ही यथार्थ-वर्णन नहीं है, बल्कि इसके पन्नों पर मौजूद लगभग सभी परिवार वैवाहिक संबंधों में आए अंतर्विरोधों के दौर से गुजर रहे हैं। इनमें हिंदू परिवार भी शामिल हैं, और मुसलमान परिवार भी। भारतीय परिवार के लिए अभी तक घर अभी भी बाहर से भिन्न है। वे दोनों एक-दूसरे के विस्तार नहीं हो पाए हैं। उनके बीच आनुषंगिकता की संरचनाओं का अभाव है। स्त्री का घर के बाहर कदम रखना एक औपचारिकता ही है। जैसे ही वह उसे अनौपचारिक बनाने की कोशिश करती है, उसे अलंघ्य चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। जाहिर है कि स्त्रियों की आजादी के गले में भारतीय परिवार की यह कमोबेश अपरिवर्तनीयता अटकी हुई है। इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि स्त्रियों को राजनीतिक आरक्षण देने के बाद भी इस स्थिति में कोई परिवर्तन होगा।
युवा दलित साहित्यकार अजय नावरिया ने अपनी रचना ‘उधर के लोग’ के माध्यम से दलित मध्यवर्ग की भीतरी बेचैनियों को उभारा है। कहना न होगा कि दलित मध्यवर्ग बनना अपने-आप में एक श्रेयस्कर परिघटना है। लेकिन, चिंताजनक बात यह है कि यह दलित मध्यवर्ग समग्र भारतीय मध्यवर्ग से अलग-थलग अपने किसी कोने में बैठा अपनी बहसें और गतिविधियां चला रहा है। यह अलगाव उसका चुनाव नहीं बल्कि उसकी मजबूरी है। आजादी के बाद उभरा भारतीय मध्यवर्ग अभी इतना सार्वदेशिक नहीं हो पाया है कि दलितों को अपने बीच एक बेहिचक किस्म की जगह दे सके। नावरिया का उपन्यास यह संदेश भी देता है कि सेकुलरीकरण की लगातार चलती हुई प्रक्रिया के तहत वर्गरचना भी हो रही है, पर राजनीतिक समुदाय के आधार पर मध्यवर्ग दो हिस्सों में बंट गया है।
भारतीय आधुनिकता की तीसरी उलझन अब्दुल बिस्मिल्लाह के उपन्यास ‘अपवित्र आख्यान’ के जरिए सामने आती है। इस उपन्यास के नायक के सामने तीन रास्ते हैं। पहला रास्ता अल्पसंख्यकवाद का है। इस पर चलने से वह उस भारतीय सार्वदेशिकता का अंग नहीं बन सकता जो बहुत धीरे-धीरे परवान चढ़ रही है। दूसरा रास्ता बहुसंख्यकवाद का है। इसे अपना लेने का नतीजा यह होगा कि उसे और उसके समुदाय को बहुसंख्यकवादी राजनीति के सांस्कृतिक वर्चस्व के साथ ‘समरस’ हो जाना होगा। तीसरा रास्ता ग्रामों की दुनिया में आज तक अपनी चमक दिखा रहे हिंदू-मुसलमानों की सामासिक संस्कृति के छिट-पुट अवशेषों के रूप में में सामने आता है। मुश्किल यह है कि शहर में, जो आधुनिकता का थिएटर है, इस तरह की सांस्कृतिक साझेदारी उपलब्ध नहीं है। शहर सदियों पुरानी इस सामासिक निष्पति से पल्ला छुड़ा कर अलग-अलग अस्मिताओं में रम चुका है। वहां यह संस्कृति या तो नॉस्टेल्जिया के रूप में मिलती है या फिर सेकुलरवाद के अजायबघर में रखी हुई किसी जज़्बाती शै की तरह देखी-दिखाई जाती है। शहर में उर्दू की ‘हे’ का मतलब है हिंदू और ‘मीम’ का मतलब है मुसलमान।
भगवानदास मोरवाल ने अपने नए उपन्यास ‘रेत’ के जरिए एक ऐसा सवाल उठाया है जिसका जवाब हमारी आधुनिकता को अभी तक नहीं मिला है। भारतीय आधुनिकता वेश्याओं के साथ संवाद स्थापित करने के मामले में खुद को भयग्रस्त महसूस करती है। उनकी पॉलिटिकल इकॉनॉमी सेक्स-वर्क से होने वाली आमदनी पर आधारित है, जबकि यह एक व्यावहारिक हकीकत है कि हमारे सार्वजनिक जीवन पर आत्मदमन आधारित यौन शुचिता और ब्रह्मचर्य की निहायत अवैज्ञानिक और बेवकूफाना धारणाएं हावी हैं। इस मामले में ज्यादातर कम्युनिस्ट होलटाइमर और संघ परिवार के जीवनदानी प्रचारक एक ही मुकाम पर खड़े हुए हैं। वेश्याओं की इस पॉलिटिकल इकॉनॉमी को भूमि सुधार या ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम चला कर या कोई फैक्ट्री खोल कर भी नहीं बदला जा सकता। दरअसल, हमारे पास सेक्स की पॉलिटिकल इकॉनॉमी से निबटने का कोई औजार नहीं है।
आजकल हमारी राजनीतिक आधुनिकता एक नए संकट से उबरने की कोशिश कर रही है। ऊपर से दिखने में लगता है कि बहस देशी और विदेशी की परिभाषाओं के आसपास हो रही है। बहस के केंद्र में राष्ट्रहित का प्रश्न भी प्रतीत होता है। कुल मिला कर यह एक दुविधा है जो हमारे सार्वजनिक जीवन को सता रही है। आखिर आजादी के 61वें साल में भी यह सार्वजनिक जीवन आधा-अधूरा सा क्यों है? क्या इस अपरिपक्वता की जड़ मे आधुनिकता की वे उलझनें नहीं हैं जिन्हें न सुलझा पाने के कारण ही हर नया राजनीतिक संकट हमें इतना संगीन लगने लगता है। भारतीय आधुनिकता के विकास संबंधी प्रश्नों पर गहराई से सोचने वालों के लिए आज का माहौल एक तरह का निमंत्रण है। इसके बहाने वे बुनियादी सवालों पर एक बार फिर नजर डाल सकते हैं।
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Tuesday, July 15, 2008

जल से खल

राजेन्द्र सिंह
(संरक्षक, जल बिरादरी)
एक तरफ हम और हमारी सरकारें नदियों को ‘मां’ कहती है लेकिन दूसरी तरफ वह इन नदियों के साथ मैला ढोने वाली मालगाड़ी की तरह व्यवहार कर रही है। देश भर के उघोग, नगरपालिका, पंचायतें और महानगर सब अपनी सारी गंदगी को नदी में ही डालते हैं। इसके बावजूद आज तक किसी भी सरकार ने किसी भी नगरपालिका व पंचायतों को दंडित नहीं किया है। फलस्वरूप अब सभी सरकारी संस्थाओं ने यह मान लिया है कि नदियों का काम मैला ढोना ही है। इसलिए शहर के सभी नाले नदियों में खोल दिये जाते हैं। आज एक तरफ तो नदियों को मैला करने का काम हो रहा है तो दूसरी तरफ इसे दूर करने के लिए हजारों करोड़ का बजट बन रहा है। यह हमारी मैली राजनीति के मैले चरित्र को उजागर करता है।
मैल की मैली राजनीति को ठीक करने के लिए नदियों की शुद्धता के नाम पर हो रहे भ्रष्टाचार, नदियों के प्रदूषण और अतिक्रमण को रोकने हेतु एक बड़ा आंदोलन आवश्यक है। इसे चलाने का काम हम लोग (जल बिरादरी) देश भर में कर रहे हंै। हमने देश भर में जागरूकता फैलाना तय किया है। देशभर के महाविघालयों व विघालयों में नदियों के संकट को समझने और इसके प्रति सरकार को संवेदनशील बनाने के लिए एक जनवरी से 31 मार्च तक नदियों को समझने और समझाने का काम किया है। जबकि एक अप्रैल से 31अक्टूबर तक राज्य सरकारों पर नदी नीति बनवाने के लिए दबाव डालने का काम चल रहा है। इस कार्यक्रम के तहत भागीरथी और सरयू नदी में आमरण अनशन चल रहा है। भागीरथी में देश के सर्वोच्च पर्यावरणविद जीडी अग्रवाल (गुरदास अग्रवाल) और सरयू नदी में सौंग गांव की महिलाओं व पुरूषों ने आमरण अनशन किया। यह अनशन तब तक चला जब तक सरकार ने आयोग गठित नहीं किया। इसी प्रकार देशभर के दूसरे राज्यों में भी नदी सत्याग्रह अपनी जीत की तरफ बढ़ रहा है। दिल्ली में चल रहा यमुना सत्याग्रह तब तक जारी रहा जब तक उपराज्यपाल ने यमुना खादर में डीएमआरसी का निर्माण कार्य न रोक दिया। इसी प्रकार महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात समेत देशभर में नदी संरक्षण अभियान ने अपनी कामयाबी हासिल की है।
अब समाज सरकार से नदियों के बारे में सवाल पूछने लगा है। अब भारत का समाज नदियों के साथ जुड़ने लगा है जब समाज नदियों के साथ जुड़ जायेगा तो नदियों को जोड़ने के नाम पर नदी जोड़ योजनाओं को रोकने में सफलता मिलेगी। नदी सत्याग्रह संरक्षण का लक्ष्य यही है कि समाज खुद नदियों के साथ जुड़ कर नदियों को शुद्ध सदा नीरा बनाने हेतु राज्य सरकारों तथा भारत सरकार से नदी पुनर्जीवन नीति बनवाने तथा नदियों को राजस्थान की अरवरी नदी की तरह पुनर्जीवित करने के लिए समाज भी इस काम में जुड़े। आज सरकारें नदियों के साथ खिलवाड़ कर रही है। हमारे अधिकारियों को नदियों का चरित्र समझ में नहीं आ रहा है। जब तक किसी अधिकारी या सरकार को नदियों के चरित्र का पता नहीं चलेगा तब तक नदियों का भला नहीं होगा।प्रस्तुति : अमित कुमार
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वामपंथी दलों का आत्मघाती कदम

राजकिशोर
भारत के वामपंथी दल अपने आपको सबसे बुद्धिमान समझते हैं। लेकिन संप्रग सरकार से समर्थन वापस लेकर उन्होंने न केवल भारतीय राजनीति को एक कदम पीछे कर दिया है, बल्कि अपने भविष्य पर भी प्रश्नचिह्न लगा लिया है। जो दल पश्चिम बंगाल और केरल में गठबंधन की राजनीति सफलतापूर्वक चलाते रहे हैं, उन्होंने केंद्र के गठबंधन को एक ऐसी ठोकर मारी है जिससे बहुत कुछ तहस-नहस होगा। लेकिन वाम दलों को इसकी फिक्र शायद इसलिए नहीं है कि राष्ट्रीय राजनीति में उनकी कोई महत्वाकांक्षा नहीं है और न ही वे कोई महत्वाकांक्षा पालना चाहते हैं। शायद वे अपनी क्षेत्रीय हैसियत से ही खुश हैं। लेकिन यह क्षेत्रीय हैसियत भी तभी बरकरार रह पाएगी जब वे अपनी राजनीति को गत्यात्मक बनाएं और व्यावहारिक राजनीति की चुनौतियों को समझने की कोशिश करें।वामपंथ अपनी सैद्धांतिक प्रतिबद्धताओं पर कुछ ज्यादा ही मुग्ध है।
आजकल राजनीति में सिद्धांतवादिता जिस तरह घटती जा रही है या कहिए विलुप्त हो रही है, उसे देखते हुए इस घटना पर खुश हुआ जा सकता है कि चलो, कोई तो राजनीतिक समूह है जो अपनी मान्यताओं पर अडिग है। लेकिन सिर्फ एक मान्यता पर इतना बल देना कि उसके परिणामस्वरूप केंद्र सरकार संकट में पड़ जाए और बाकी मान्यताओं को भूल जाना सिद्धांत प्रेम नहीं, महज हठ है- एक ऐसा हठ, जिसका कोई रचनात्मक पहलू नहीं है। मनमोहन सिह जिस तरह परमाणु करार पर अड़े हुए थे, उसे महसूस करते हुए भी वाम दलों द्वारा अपनी जिद पर अड़े रहना बताता है कि वे अपनी नाक कटा कर भी इतिहास में अपनी जगह बनाना चाहते हैं। राजनीति का मामला इतना किताबी नहीं होता। खासकर उस समय जब देश एक भारी संक्रमण से गुजर रहा हो।
दरअसल, संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन में वामपंथी जिस तरह शामिल हुए, वह एक समस्यामूलक घटना थी। इस गठबंधन का तात्पर्य क्या था? सभी का मानना है कि यह गठबंधन सांप्रदायिक शक्तियों को सत्ता में न आने देने और उनकी स्थिति कमजोर करने के लिए बनाया गया था। लेकिन सिर्फ कुछ धर्मनिरपेक्ष दलों के निकट आ जाने से यह उद्देश्य सिद्ध होनेवाला नहीं है, यह बात जिसे मालूम न हो, उसे राजनीति से बाहर हो जाना चाहिए। धर्मनिरपेक्षता बनाम सांप्रदायिकता एक बड़ी बहस है, लेकिन यह बहस इस व्यापक बहस का हिस्सा है कि देश को किस तरह चलाया जाए। भाजपा के गठबंधन ने देश को जिस तरह चलाया, उससे लोगों को संतोष नहीं हुआ। इसीलिए भाजपा की सीटें कम हुईं, न कि इस कारण कि भाजपा ने सत्ताा में जाने के बाद भी अपना सांप्रदायिक नजरिया नहीं छोड़ा। गुजरात में नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री बनने के बाद सांप्रदायिकता बढ़ी है, लेकिन इससे नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई। इसका एक बड़ा कारण लोगों का यह महसूस करना है कि गुजरात का प्रशासन सुधर रहा है और सरकार विकास को बढ़ावा देने के लिए जरूरी और उपयुक्त कदम उठा रही है। वामपंथियों की मौजूदगी से केंद्र सरकार की छवि भी कुछ इस तरह की बनती, तो संप्रग के गठबंधन में उनके होने का सार्थक और प्रगतिशील मतलब निकलता। वामपंथियों को पता था कि गठबंधन में उनकी ऐसी हैसियत नहीं है। वे अपनी यह हैसियत बनाना भी नहीं चाहते थे। इसके बावजूद समय-समय पर वे ऐसे आग्रह करते रहे जिनसे लगता था कि मनमोहन सिह की सरकार उनकी बंदी है। यह ब्लैकमेल था, कोई स्वस्थ राजनीति नहीं।
वाम दलों के सामने दो ही विकल्प थे। एक विकल्प यह था कि वे संप्रग में शामिल होने के बाद उसे अपनी सैद्धांतिक जमीन की आ॓र मोड़ने की कोशिश करते। गठबंधन सिर्फ़ सत्ता के लिए नहीं, सिद्धांत के लिए भी होना चाहिए। वाम दल इसके लिए तैयार नहीं थे। आज भी वे तैयार नहीं हैं, क्योंकि समर्थन वापस लेने के बाद वे कोई और ज्यादा प्रगतिशील गठबंधन बनाने की कोशिश नहीं करेंगे और न ही वाम दलों के प्रभाव क्षेत्र को राष्ट्रीय स्तर पर ले जाने की मेहनत करेंगे। इसके बजाय वे अपने सुरक्षित बाड़ों में सिमट जाएंगे। अभी तक उनकी बातों को गौर से सुना भी जाता था, क्योंकि वे सरकार का अनौपचारिक अंग थे। अब यह भी नहीं होगा। वाम दलों के सामने दूसरा विकल्प यह था कि वे मनमोहन सिह की सरकार को अपने रास्ते चलने देते और बाहर से उसका समर्थन करते रहते। ऐसी स्थिति में वे यह दावा कर सकते थे कि सरकार की नीतियों से उनका कुछ भी लेना-देना नहीं है और उनका समर्थन तभी तक है जब तक यह सरकार कोई बड़ा जन विरोधी कदम नहीं उठाती। इससे वामपंथियों की नैतिक छवि बनी रहती और कोई यह दावा नहीं कर सकता था कि वे सांप्रदायिक श‡ियों को सत्ताा में आने से रोकने में सहयोग नहीं कर रहे हैं। लेकिन वामपंथियों ने अपने लिए एक ऐसा विकल्प चुना जो इन दोनों विकल्पों का अवसरवादी घालमेल था। इसीलिए उनके मौजूदा फैसले से कोई प्रसा नहीं है।परमाणु करार का मामला एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, लेकिन इसका संबंध हमारी परमाणु नीति से ज्यादा और अमेरिका से कम है। अगर हम परमाणु शक्ति के अपने कार्यक्रम को बनाए रखना चाहते हैं, तो अमेरिका या रूस या फ्रांस- यह सवाल गौण हो जाता है। लेकिन वाम दलों ने देश के परमाणु कार्यक्रम पर आपत्ति नहीं की, न उन्हें कोई वास्तविक आपत्ति है। उनकी आपत्ति यह है कि अमेरिका से यह करार क्यों किया जा रहा है। यह अंध अमेरिका-विरोध शीत युद्ध के वर्षों की एक बेजान दुम है। इस दुम को पकड़ कर वैतरणी पार करने की आशा तब और हास्यास्पद हो जाती है जब हम पाते हैं कि वाम दलों ने आर्थिक मोर्चे पर पूरी तरह समझौता कर लिया है और अपने द्वारा शासित राज्यों को उसी दिशा में ले जा रहे हैं जो मनमोहन सिह सरकार की आर्थिक दिशा है। वाम दलों को वास्तविक ग्लानि इस पर होनी चाहिए कि समर्थन वापसी के लिए उन्होंने आर्थिक मोर्चे पर सरकार की विफलताओं को क्यों नहीं चुना। अगर वे ऐसा करते, तो उनकी वामपंथी छवि कुछ उज्ज्वल ही होती। लेकिन समर्थन वापसी के लिए उन्होंने एक ऐसा मुद्दा चुना जिसके प्रति देश की अधिकांश जनता उदासीन है। अमेरिका से परमाणु करार होता है या नहीं, इस सवाल पर कोई उद्वेलित नहीं है। फिर वामपंथी इस कदर उद्वेलित क्यों हुए कि उन्होंने चार वर्ष से ज्यादा का साथ क्यों छोड़ दिया? क्या इसीलिए कि वे अतीत के बंदी और भविष्य की चुनौतियों से लापरवाह हैं? आत्मघात और किसे कहते हैं?
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वामपंथ, भद्रलोग और एटमी करार

मुद्राराक्षस
‘वामपंथी दलों ने आखिर वर्तमान केन्द्र सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। समर्थन वापस लेते वक्त बहुत रवायती तरीके से उन्होंने अपने आभिजात्य पंथी तर्क के साथ महंगाई का मुद्दा भी जोड़ दिया। वर्तमान प्रगतिशील गठबंधन वाली सरकार से समर्थन वापसी के इस मौके पर महंगाई का मुद्दा क्यों याद किया गया, इसकी वजह समझ में नहीं आयी। इस देश की समूची राजनीति के सभी विचारों के कर्ताधर्ता मध्यवर्गीय और उच्च मध्यवर्गीय हैं, जिनके लिए महंगाई जैसा विषय कोई अर्थ नहीं रखता। सत्ता की राजनीति करने वाली वामपंथी पार्टियों की स्थिति भी इससे बाहर या अलग नहीं है। उनके समग्र सरोकार मध्यवर्गीय हो चुके हैं, उनका जमीन से, मिट्टी से अब कोई रिश्ता नहीं रहा है। वामपंथ अब देश के आदमी को छूकर नहीं, इंटरनेट और लैपटाप से पहचानता है।
वामपंथ की इसी लैपटाप राजनीति का नतीजा है कि केन्द्र सरकार से समर्थन वापसी के लिए उन्होंने उस अर्थव्यवस्था को कारण नहीं बनाया जो इस देश में बहुराष्ट्रीय कम्पनियां अपनी सुविधा और बेहतरी के लिए चला रही हैं। दुनिया के सबसे बड़े बाजार को अब बहुराष्ट्रीय कम्पनियां अपने फायदे के लिए ज्यादा से ज्यादा लाभकारी बना रही हैं। गेहूं, चावल, तेल का बाजार भी अब ये कम्पनियां अपने फायदे के अनुसार चला रही हैं। इन्हीं कम्पनियों ने अपने छपे प्लास्टिक के थैलों में अठारह रूपये किलो गेहूं का आटा बेचना शुरू किया और गलियों-मोहल्लों से लेकर कस्बों-गांवों तक में गेहूं का आटा बिकने लगा। डॉक्टर अपने मरीज को कहता है- एक सेब रोज खाआ॓। पिछले साल पच्चीस-तीस रूपये किलो बिकने वाला सेब अब एक सौ रूपये किलो से ज्यादा में बिक रहा है। अच्छा चावल पिछले बरस पैंतालिस रूपये किलो था। आज चंद महीनों में सौ फीसद बढ़कर नब्बे रूपये किलो हो गया है।
वर्तमान भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़, राष्ट्रीयकृत बैंकों का राष्ट्रीय उद्देश्य पूरी तरह खत्म किया जा रहा है और ऊपरी तौर पर राष्ट्रीयकृत दिखने वाले बैंक निजी उघोग के चारागाह बना दिए गए हैं। आज सभी अर्द्धसरकारी या सरकारी वित्तपोषित संस्थानों के खजाने निजी बैंकों के पास हैं। साल 2007-08 का जो बजट देश की अर्थव्यवस्था को बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की टहलुआ बनाने का बेशर्म दस्तावेज था, उस वक्त अगर वामपंथी दलों ने वह किया होता जो वे आज कर रहे हैं तो शायद देश के अवाम के कपड़े इतने ज्यादा तार-तार होने से बच जाते।
दिलचस्प यह है कि वामपंथ के पुराणपंथी मंत्रपाठी नेता यह समझकर खुश रहते हैं कि देश के लोग तो मूर्ख हैं। कांग्रेस पार्टी और भारतीय जनता पार्टी ने तो शुरू से ही अपनी राजनीति का आधार यह अवधारणा बनाई कि देश मूर्ख जनता से भरा हुआ है और उसे झूठ का कोई भी गलीज परोसा जाएगा, वह भुक्खड़ उसे खुशी से खाएगा। वामपंथ के मध्यवर्गीय चरित्र वाले भी सत्ता में आने के बाद से यही समझने लगे हैं। जिन वामपंथी नेताओं और बुद्धिजीवियों को इस बात से असुविधा महसूस हो रही हो वे जरा इस देश के सबसे गरीब आदमी और अपनी मासिक आय की ईमानदारी से तुलना करके देख लें। वजह यही है, यही मध्यवर्गीय चरित्र इसकी वजह है कि वामपंथ को वर्तमान सरकार गिराने की वजह भी एक मध्यवर्गीय ही मिली, एटमी करार! लेकिन देश की करीब तीन चौथाई जनता को पता ही नहीं है कि एटमी करार बला क्या है।
वामपंथ को इस बात में भी कोई रूचि नहीं है कि वह बताए कि इस करार का विरोध करके वह आम मुसलमान के कितने पक्ष में खड़ा हो रहा है। देश के दलित आंदोलन से उच्चवर्गीय वामपंथ इतना ज्यादा चिढ़ता रहा है कि जब बहुजन समाज पार्टी ने एटमी करार को लेकर कांग्रेस पार्टी का विरोध किया तो वामपंथ की जबान तालू से चिपक गयी है। उच्चवर्गीय मानसिकता में आकंठ डूबे सत्तारूढ़ वामपंथ को अपने ही पक्ष में खड़े न तो आम मुसलमान से कोई सहानुभूति है और न ही दलित वर्ग से। समूचे देश के दलित-पिछड़े वर्ग की सबसे सशक्त नेता मायावती ने जिस वक्त एटमी करार के विरोध में बयान दिया, वामपंथ ने उनके इस निर्णय का स्वागत भी नहीं किया। जिस उच्चवर्गीय चरित्र वाले वामपंथ का एक नेता खुलकर बयान देता हो कि वह पहले हिन्दू है बाद में वामपंथी, उस वामपंथी आंदोलन पर देश कितना भरोसा कर सकता है? वामपंथ शायद सोचता है कि वर्तमान स्थिति में कांग्रेस नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार गिर जाएगी और चुनाव होंगे। उसे यह खामखयाली भी हो चुकी है कि चुनाव में वामपंथ को लाभ होगा। उसे जानना चाहिए कि बंगाल और केरल को छोड़कर बाकी देश के अल्पसंख्यक और दलित-पिछड़ों के साथ खड़े होने का कोई सुबूत उसने कभी नहीं दिया है। वामपंथ को यह वहम भी है कि वह गरीब आदमी की लड़ाई लड़ता है। यह शुद्ध वहम है। भारत का गरीब धार्मिक और जातीय अस्मिता से बाहर नहीं है और उच्च मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी हो चुके वामपंथ ने इसी अस्मिता से भद्रलोक की दूरी बना ली है। इसीलिए वह जमीनी नहीं बौद्धिक उच्चवर्गीय आंदोलनों में विश्वास करता है। देश वामपंथ का एक और दुर्भाग्यपूर्ण रूप समझ चुका है। वह जान रहा है कि वामपंथ बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की अर्थव्यवस्था अन्दर ही अन्दर स्वीकार कर चुका है।
www.rashtriyasahara.com से साभार

इन्‍हीं पगडंडियों से


एही ठइयें झुलनी हेराइल हो रामा