बिहार के १३ जिलों के ३० लाख से अधिक लोग कोशी की विभीषिका झेल रहे हैं । सुपौल, मधेपुरा, सहरसा, अररिया, पूर्णिया, कटिहार आदि जिले पूरी तरह तबाह हो गए हैं। १० दिनों से लोग एक मुर्दा, भ्रष्ट, पतित और इंसानी उम्मीदों, बेबसियों, हाहाकारों-चीत्कारों से खेलने वाली , उनका मखौल उडाने वाली सरकार की लफ्फाजियां, उसकी नंगई देख रहे हैं। एक भयानक किस्म का ज्वालामुखी आज हर बिहारी के अन्दर उबल रहा है। बिहार ने अबतक भ्रष्टतम मुख्यमंत्रियों को झेला है पर यह मुख्यमंत्री तो सबसे अधिक बेशर्म साबित हुआ जिसने लाखों लोगों को मौत के हवाले कर दिया और ख़ुद राजधानी में बैठकर रंगरेलियां मनाता रहा, डूबते लोगों को बचाने की कोई कोशिश नहीं की, भूख से बच्चे मरते रहे, लाशें सड़ती रहीं, पर इस मुख्यमंत्री का विलास नहीं छूटा। हद तो यह है कि उधर लोग मौत का आतंक झेल रहे हैं , स्वजनों को अपनी आंखों के सामने एक-एककर मरते देख रहे हैं, और यह मुख्यमंत्री, यह सरकार झूठ पर झूठ बोले जा रही है कि सेना बचाव कर रही है, कि लोग युद्धस्तर पर निकाले जा रहे हैं, कि इतने हेलीकॉप्टर खाने के पैकेट गिरा रहे हैं , कि किसी को भूख से मरने नहीं दिया जाएगा। या खुदा.........कितना झूठ.....कितना फरेब....और वह भी किससे? उसी जनता से जिसने एक राई को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाया।
मुख्यमंत्री का सारा ध्यान केन्द्र से मिलने वाले उस मुंहमांगे पैसे की तरफ़ था जिससे उनकी और उनके गिद्ध मंडली की सात पीढियाँ निहाल हो जाने वाली थीं। खुदा के मेहर से केन्द्र ने एक हज़ार करोड़ की मुंहमांगी रकम दे दी, जितना माँगा उससे ज़्यादा अनाज दे दिया। शायद अब कोई बाढ़ पीड़ित भूख से नहीं मरेगा, कोई डूबेगा नहीं, किसी को सुरक्षित स्थान (जो अब बिहार में बचा नहीं) तक पहुँचने के लिए जिला प्रशासन को दस हज़ार की रिश्वत नहीं देनी होगी, इतने पैसों से तो बिहार की गरीबी को कई बार ख़त्म किया जा सकेगा, सभी बाढ़ पीडितों के पक्के मकान बन जायेंगे, हर घर में ३-४ महीनों तक खाने लायक अनाज आ जाएगा, बिहार से किसी को पलायन कर दूसरे राज्यों के कृतघ्नों से दुत्कार और मार नहीं सहनी होगी , सबको रोज़गार मिल जाएगा, हर साल आने वाली बाढ़ से भी निजात मिल सकेगी।
........क्या आज बिहार या देश में कोई आदमी अपने कलेजे पर हाथ रखकर कह सकेगा कि उपरोक्त अपेक्षाओं में से कोई एक भी पूरा होने वाला है? कि उपरोक्त अपेक्षाओं को पूरा कर लेने के लिए क्या पहले से ही कम पैसे बिहार को दिए गए हैं? क्या कोई बच्चा भी यह बताने में ज़रा भी वक़्त लेगा कि इन पैसों का क्या होने वाला है? ये ऐसे लोगों का दौर है जो सबकुछ डकार जाने के बाद भी रहनुमा बने रहते हैं। सबको हिस्सा मिलेगा, पत्रकार, चैनल कर्मी , सम्पादक, विधायक, सांसद, मुखिया, पार्षद, जिलाधीश, एसडीओ, बीडीओ , थाना प्रभारी सबको। जिसने सरकार से जितनी वफादारी निभाई होगी उसी हिसाब से उसकी बोली लगेगी। पेरल जाई जनता चुआओल जाई तेल....जय हिंद...जय बिहार...जय लालू...जय पासवान.....जय नीतीश......जय मनमोहन...



Thursday, August 28, 2008
बिहार बेहाल : नेता-मंत्री फिर मालामाल
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rajesh chandra
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4:36 PM
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Monday, August 25, 2008
ब्लॉगिंग की दुनिया के मिरासियो, नीरो की संतानों
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rajesh chandra
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12:02 PM
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Saturday, August 23, 2008
यमुना पुश्ता के आसपास रह रहे बेघर-बेसहारा बच्चे, सरकार, समुदाय और मीडिया
जब हम पूरी दुनिया में बच्चों की हालत पर दृष्टिपात करते हैं तो हम एक असंभव दुनिया से रूबरू होते हैं। तीसरी दुनिया के देशों में और खासकर भारत में तो हालत और भी बदतर है और बच्चों की विशाल आबादी अत्यंत कठिन और अमानवीय परिस्थितियों में जीवन व्यतीत कर रही है। ये बच्चे जीवन की बुनियादी सुविधाओं एवं अधिकारों से भी वंचित हैं और इनके बारे में सोचते ही अन्दर एक हाहाकार भर जाता है। पूँजी के अनियंत्रित बहाव,महानगर केन्द्रित विकास और गरीबी के परिणामस्वरूप राष्ट्रव्यापी विस्थापन का भयानक संकट नया नहीं था, पर ग्लोबलाइजेशन और उदारीकरण ने दुनिया के कमजोर और मेहनतकश वर्गों को और भी असहाय, और भी बेहाल कर दिया और गैरबराबरी की खाई इतनी चौड़ी हो चुकी है कि उसे पाटना दिन पर दिन असंभव होता जा रहा है। आर्थिक विपन्नता और उपभोक्तावाद ने सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न तो किया ही है, इसे संवेदनहीन और असहिष्णु भी बना दिया है। इसका सबसे बडा खामियाजा बच्चों को ही भुगतना पड़ा और आज अगर केवल महानगर दिल्ली की ही बात करें तो लाखों बच्चे सूदुर प्रांतों से आकर यहां के सड़कों, फुटपाथों, रेलवे प्लेटफार्मों और खुले पार्कों में नारकीय जीवन जी रहे हैं। इनके साथ न तो किसी आत्मीय या अभिभावक का संरक्षण है और न ही समाज उनपर विश्वास करता है। इनके साथ ही अगर दिल्ली की झुग्गी बस्तियों से आए उन बच्चों को भी जोड़ लिया जाए जिनका अधिकांश समय दिल्ली की सड़कों पर गुजरता है और परिवार के साथ उनका संपर्क नहीं के बराबर है तो यह आँकड़ा अविश्वसनीय लगने लगता है। ये बच्चे चाहे स्थानीय हों अथवा बाहर से भाग कर आए, उनकी स्थिति में कोई गुणात्मक अन्तर नहीं है। ये बच्चे कूड़ा चुनते हैं, भीख माँगते हैं, बूट पॉलिश करते हैं, नशा करते हैं और दैहिक मानसिक शोषण का शिकार होते हैं। इन बच्चों में बड़े पैमाने पर लड़कियाँ भी शामिल हैं जो फुटपाथों पर वेश्यावृत्ति करने को बाध्य हैं। मंदिरों और गुरुद्वारों में मुफ्त बँटने वाले भोजन के कारण बच्चे काफी संख्या में उन इलाकों में केन्द्रित हो जाते हैं। गन्दगी में रहने, शारीरिक -मानसिक प्रताड़ना, पौष्टिकता से रहित भोजन, नशे की अधिकता और सर्दी गर्मी बरसात में खुले में रहने से ये बच्चे सहज ही बीमारियों का शिकार हो जाते हैं और बड़ी संख्या में बच्चों की मौत हो जाती है। इन परिस्थितियों में रहते हुए इन बच्चों के लिए शिक्षा अथवा अन्य अधिकारों की बात करना बेमानी है। जब तक इन बच्चों के लिए जीवन की बुनियादी सुविधाओं और सुरक्षा एवं संरक्षण का पक्का इंतजाम न किया जाए तथा इनके प्रति सामाजिक नजरिये में परिवर्तन न लाया जाए,इन्हें मुख्यधारा में लाने का लक्ष्य हासिल नही किया जा सकता। चुनौती सचमुच बहुत बड़ी है और इसे अब और अनदेखा नही किया जा सकता।
यमुना पुश्ता क्षेत्र की सामाजिक, आर्थिक एवं भौगोलिक स्थिति
यमुना पुश्ता का इलाका यमुना नदी के किनारे लाल किला, विजय घाट, आइएसबीटी बस अड्डा और कश्मीरी गेट तक फैला हुआ है। इस इलाके की सामाजिक संरचना निम्न मध्यवर्गीय है और यहां की संस्कृति के केन्द्र में हिन्दू धर्मावलम्बियों की आस्था और उससे अनुस्यूत् कर्मकाण्ड हैं जिनसे यहां का जनसमुदाय किसी न किसी रूप में जुड़ा हुआ है। खास तौर से प्राचीन हनुमान मंदिर और निगमबोध घाट की अवस्थिति स्थानीय समुदाय के व्यवसाय और सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकारों को प्रभावित निर्देशित करती है। अधिकांशतः लोग मंदिर के इर्द-गिर्द मिष्टान्न,पूजन-सामग्री,धार्मिक प्रतीकों-मूर्तियों के उत्पादन-विपणन कार्य में संलग्न हैं या फिर मंदिर की सफाई, अन्य जन सुविधाओं एवं परिवहन व्यवस्था में हैं। मंगलवार और शनिवार को यहां हजारों श्रद्धालुओं का जमाव रहता है अतः पूरे क्षेत्र में अच्छी व्यावसायिक चहल-पहल रहती है। खैरात बाँटने की पुरानी परंपरा ने इस मंदिर के आसपास आलसी मुफ्तखोरों की एक विशाल जमात तैयार की है जो इन दो दिनों में सुबह से लेकर रात तक पूरी-कचौरी,मिठाइयों,फलों,कम्बल एवं दूसरी चीजों के लिए धमाचौकड़ी मचाती रहती है। विविधतापूर्ण भोजन-सामग्रियों नशीली वस्तुओं एवं भीख की सहज उपलब्धता ने सुदूर प्रांतों से भागकर आए अथवा निकटवर्ती इलाकों के सैकड़ों बच्चों को मन्दिर व इसके आसपास के पार्कों को अपना स्थायी ठिकाना बनाने को मजबूर किया है, जहां वे भयावह नारकीय जीवन जी रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक तकरीबन 800 लोग इस हनुमान मंदिर और निकटस्थ मंदिरों में बँटनेवाले खैरात और भीख के सहारे जीवनयापन कर रहे हैं,जिनमें 350से अधिक 16 साल की उम्र तक के बच्चे हैं। बाकी लोगों में असहाय औरतें, विकलांग और वृद्ध शामिल हैं। बच्चों के इतने बडे जमाव के पीछे एक बड़ा कारण यह भी है कि यहां से अन्तर्राज्यीय बस अड्डा, पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन, जामा मस्जिद, मीना बाजार, लाल किला, चांदनी चौक बाजार आदि काफी नजदीक हैं, जहां दिन में बड़ी तादाद में बाल श्रमिकों के लिए काम की गुंजाइश रहती है, पर शाम होते ही वहां के पार्कों और दूसरे खाली स्थानों में पुलिस की दबिश बढ़ जाती है जिस वजह से बच्चे यमुना बाज़ार के खुले पार्कों और घाटों की ओर रुख करते हैं जहां रात में हजारों की तादाद में बेघर, बेसहारा और मुसीबतजदा लोग मौसम,भूख और पुलिस की मार सहते हुए रात काटते हैं। इनके साथ ही सैकड़ों ऐसे लोगों की भी यह शरणस्थली बनी हुई है जिनका काम नशीली वस्तुओं का विक्रय-विनिमय, ठगी, जुआ-खेलना, चोरी, लूटपाट आदि है। कुछ लोग अवैध रूप से विडियो पर अश्लील फिल्में दिखाने का कारोबार कर रहे हैं, जहां दर्शकों में छोटे बच्चों की बहुतायत रहती है तो कुछ लोग अबोध बच्चों को भयाक्रांत कर अथवा लालच देकर उनका दैहिक शोषण करने-करवाने का संगठित उद्योग चला रहे हैं। जाहिर है,इतने बड़े पैमाने पर गैरकानूनी गतिविधियाँ बगैर पुलिस के सहयोग और संरक्षण के नही चलायी जा सकतीं।
शहरीकरण और विकास के नाम पर एक दशक पहले यमुना पुश्ता और आसपास की झुग्गी बस्तियों को उजाड़ने की दमनात्मक कार्रवाई का आतंक आज भी यहां की आबोहवा में गूँजता महसूस होता है। आधुनिक लोक कल्याणकारी राज्य के पुनर्वास के सरकारी मुहावरों की सच्चाई तब यहां सामने आ गई जब उजाड़े गए विस्थापितों ने अपना सबकुछ गँवाने के बावजूद एक सर्वथा अपरिचित स्थान बवाना जाकर पुनर्वासित होना कबूल नहीं किया और सांस्कृतिक एवं स्थानिक मोहवश फुटपाथ की भयावह जिन्दगी को नियति मानकर अपना लिया। इस अमानवीय विस्थापन की यही स्वाभाविक परिणति हो सकती थी कि आज इन परिवारों की अधिकांश स्त्रियाँ पेट के लिए देह-व्यापार के पेशे में संलग्न हैं और बच्चे भीख मांगने को विवश। क्षेत्र के दैनिक जन जीवन का सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक अन्वेषण करते हुए हमने लक्ष्य किया कि पूरे परिदृश्य में सबसे ज्यादा मुसीबत में बच्चे हैं-उनमें भी वैसे बच्चे जो पूरी तरह सड़क पर हैं और जिन्हें किसी आत्मीय या अभिभावक का संरक्षण भी प्राप्त नहीं है। 300 से 350 बच्चों की इस आबादी में 5 से लेकर 18 साल तक के बच्चों की अधिकता है। इन बच्चों में लगभग 60 प्रतिशत बच्चे नशा करते हैं और कुछ ही बच्चों ने प्राथमिक स्तर की शिक्षा प्राप्त की है। 40 प्रतिशत बच्चे भीख मांग रहे हैं और 50-60 प्रतिशत बच्चे कूड़ा चुनने, ढाबों में काम करने जैसे कार्यों में लगे हुए हैं। भयावह नारकीय परिस्थितियों में जी रहे इन बच्चों को न तो भोजन उपलब्ध है न रहने का ठिकाना। चार-पाँच प्रतिशत बच्चे भी स्वास्थ्य के सामान्य स्तर तक नही पहुँचते हैं। हाँ यह बात बिल्कुल तय है कि शत-प्रतिशत बच्चे पुलिस की ज्यादतियों के शिकार होते हैं। इन बच्चों की तत्काल सबसे बड़ी आवश्यकता भोजन और सुरक्षित आवास की है। खास बात यह है कि लगभग 60-70 प्रतिशत बच्चे पढ़ाई करने की इच्छा जाहिर करते हैं, पर परिस्थितियाँ इन्हें एक जगह टिककर रहने नहीं देतीं, और इनका बिखराव जारी रहता है। इन्हें इनके भोजन, आवास, शिक्षा , स्वास्थ्य और रोजगार के अधिकार के लिए जागरूक और संगठित करना एक बड़ी चुनौती है, जिसे आगे बढ़कर स्वीकार करना एक सभ्य समाज और संवेदनशील सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए, किन्तु वास्तविकता यह है कि भयावह परिस्थितियों में जी रहे इन बच्चों की तरफ से सरकार तो सर्वथा उदासीन है ही, गैरसरकारी संस्थाओं का रवैया भी आपराधिक है। ज्यादातर संस्थाएँ बच्चों का इस्तेमाल कर देशी-विदेशी धनदाताओं से करोड़ों का अनुदान प्राप्त करने में सफल हो जाती हैं। यह शोध का विषय हो सकता है कि दर्जनों बाल अधिकार संस्थाओं और बच्चों के नाम पर प्रतिवर्ष खर्च होने वाले हजारों-लाखों डॉलर की राशि के बावजूद आज तक कितने बच्चों की जिन्दगियों में बदलाव आ सका है।
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rajesh chandra
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लेबल: बेघर बच्चे और हमारा समाज
Friday, August 22, 2008
नीतीश बाबू "नंगटा" हो जाइये यही वक़्त है
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rajesh chandra
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1:25 PM
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लेबल: बिहार : फ़िर बाढ़ उत्सव
Wednesday, August 20, 2008
भारत के माओवादी भी चुनाव लड़ें
झापा, नेपाल से लौटकर
नेपाल की सीमा में घुसते ही मेचीनगर में जब हमारा ड्राइवर कस्टम की औपचारिकता निभा रहा था तो मैंने वहीं चहलकदमी कर रहे नेपाल पुलिस के जवान से आहिस्ता से पूछा-“कल तक जिन माओवादियों को आप लोग चुन-चुन कर मारते थे, अब उनकी सरकार बन रही है. क्या सोचते हैं ? ”उसने पहले तो अजीब-सा चेहरा बनाया फिर हंसते हुए कहा-“अब उनको शलामी करेंगे.”
लेकिन इस एक वाक्य के जवाब को हमारे गोरखा ड्राइवर ने यात्रा के दौरान बाद में पूरा किया, जब मैंने उससे भी यही सवाल पूछा कि यहां कि पुलिस क्या करेगी ? उसने मुस्कुराते हुए कहा “ इंडिया में भी तो डाकू लोग, गुंडा लोग पार्लियामेंट में मेंबर बन जाता है। उनका तो कोई आईडोलॉजी भी नहीं होता।”मुझे लगा कि सवाल पूछने में अब थोड़ी सावधानी बरतनी होगी.हम नेपाल के झापा जिले में थे. झापा यानी माओवादियों का इलाका. हाल के चुनाव में नेकपा माओवादी के विश्वदिप लिङदेन लिम्बु, धर्म प्रसाद धिमिरे और गौरी शकर खडका इस इलाके से चुनाव जीत कर काठमांडू पहुंचे हैं.
घने जंगलों वाले इलाकों से होते हुए सड़क किनारे एक स्कूल का बोर्ड देख कर हमने गाड़ी रुकवाई. लिटिल ऑक्सफोर्ड इंग्लिश स्कूल. पड़ोस के सोनसरी जिले से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद अपने गांव शांतिनगर लौटे दीपेंद्र प्रधान 160 बच्चों वाला यह बोर्डिंग स्कूल चलाते हैं.उनके छोटे से कार्यालय की दीवार पर नेपाल नरेश स्व. वीरेंद्र विक्रम शाह और उनकी पत्नी की एक उखड़ी हुई तस्वीर टंगी हुई है. नेपाल में अब माओवादी सरकार को लेकर दीपेंद्र प्रधान मुस्कराते हुए कहते हैं- “ मैं सोचता हूं कि हमारे देश को इसकी आवश्यकता थी, इसलिए ऐसा हुआ.इसके पीछे सबसे बड़ा कारण भ्रष्टाचार है”
दीपेंद्र बताते हैं- “ हमारे गांव में कभी कोई नहीं आता था, कोई पुलिस वाला नहीं। आप जिस रास्ते से आए हैं, वो हाईवे है लेकिन अगर य़हां कोई मर भी जाता, अगर कोई किसी को शूट भी कर दे तो यहां कोई नहीं आता था न सेना, न पुलिस. ये हालत इलेक्शन से दो साल पहले तक थी. नेपाली जनता को लगा कि इतने साल तक सबको अपना समझ के वोट दिय़ा तो एक बार माओवादियों को ट्राई करने में क्या हर्ज है. इसलिए जनता ने माओवादियों को वोट दिया. मैंने भी माओवादियों को वोट दिया.मुझे उम्मीद है कि वे कुछ करेंगे. अगर ये इसमें असफल रहे तो दो साल बाद फिर चुनाव होगा.”वे बताते हैं कि किस तरह माओवादियों ने उनके गांव में नहर लाई और किस तरह माओवादियों के कारण इलाके में चोरी की घटनाएं खत्म हो गईं. दीपेंद्र के पास माओवादियों के पक्ष में कई बाते हैं.लेकिन तीन महीने पहले दुलाबाड़ी से ब्याह कर शांतिनगर में आने वाली गांव की एक बहु ने इस बार चुनाव में भाग नहीं लिया. जिंस-टॉप पहने हुए इस बहु ने हाथों को घुमाते हुए पूछा- “किसी के जीतने से क्या होता है ? जो जीतता है, वो तो राजगद्दी में बैठता है. वो थोड़ी हमसे चावल-दाल के बारे में पूछता है.”
बेरोजगारी
हम सब माओवादी है.
वे बताते हैं कि गांव के सभी लोगों ने माओवादियों को ही वोट भी दिया. भीड़ में कुछ पुरुष-स्त्री स्वर उभरते हैं- “ हम भी माओवादी...माओवादी...!”आतंकवादी मत कहिए
भीड़ में शामिल एक प्रौढ़ कहते हैं- “हम लोगों ने बहुत आशा के साथ माओवादियों को चुना है. हमने नेपाली कांग्रेस को देखा, नेकपा को देखा, राजी की पार्टी को भी देखा. लेकिन किसी ने हमारा दुख नहीं समझा. हमें गांव में रोजगार चाहिए. हम अपने दुख-दर्द को लेकर बाहर जाते हैं. हम भी अपने मां-पिता के साथ रहना चाहते हैं, अपने बच्चों के साथ रहना चाहते हैं.”गांव के कमल भंडारी कहते हैं- “ वो आतंकवादी इसलिए कहे जाते हैं, क्योंकि वे सरकार से जीत गए हैं. गरीब आदमी के पास घास नहीं है, कपास नहीं है. कल कारखाना नहीं है. सरकार के पास तो सब कुछ है लेकिन हम लोगों को देता नहीं है. माओवादी सब ठीक करेंगे .”
गांव में दुकान चलाने वाले बुजर्ग अभिकेसर मानते हैं कि माओवादियों ने चुनाव में आ कर अपनी ताकत दिखा दी है. उन्हें इस बात से बहुत दुख होता जब कोई माओवादियों को आतंकवादी कहता है. अमरीका से खासे नाराज अभिकेसर के अनुसार माओवादी जनता के साथ हैं और वे जनता की लड़ाई लड़ रहे हैं. ऐसे में जनता को कोई आतंकवादी कहे, यह उन्हें अच्छा नहीं लगता. देश-दुनिया की खबरों से वाकिफ अभिकेसर कहते हैं- “ भारत में जिस तरह आज माओवादी आंदोलन चल रहा है, एक समय नेपाल में भी ऐसा ही था. जिस तरह से यहां के माओवादियों ने हथियार छोड़ कर, जनता को साथ लेकर पार्लियामेंट में गए, वहां के माओवादी भी ऐसा ही करें, आपके साथ कितनी जनता है, ये दिखा दें. अगर जनता आपके साथ है तो वहां भी नेपाल जैसा ही होगा न ? अगर जनता आपके साथ है तो क्यों डरते हैं.” अभिकेसर ठहाके लगाते हुए कहते हैं- “ अगर जनता आपके साथ नहीं है तो फिर छोड़िए.”
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rajesh chandra
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लेबल: आज का वाम कल का वाम, नक्सलवाद
Thursday, August 14, 2008
कानून का अभाव और पानी की लूट
विभूति रंजन
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rajesh chandra
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5:42 PM
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Monday, August 11, 2008
झूठा एक अकेला मैं
उफ सच का यह विकट तूफान
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rajesh chandra
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3:43 PM
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लेबल: बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
मीडिया : डर का बाजार
डर का बाजार नए सिरे से गर्म किया जा रहा है। यह काम कथित धर्ममूलक चैनल तो करते ही रहते हैं, इन दिनों इस धंधे में कुछ खबर चैनल बढ़त ले रहे हैं। यह सब बातें समाचार कर्म के सामान्यतया मान्य लक्ष्यों के विपरीत नजर आती हैं। भारतीय आसमान में धर्ममूलक चैनलों का पहले से ही बोलबाला है। इनकी संख्या आधा दर्जन के करीब है। इनकी दर्शक जनता अलग है। इनमें तरह-तरह के बाबा, स्वामी और योगी आदि आते-जाते हैं। कथाएं कहते, प्रवचन-उपदेश देते रहते हैं। धर्म विषयक चैनल जगत प्रपंच को डरावना बताते हैं। काया को माया बताते हैं और ईश्वर आराधना के विविध तरीके बताते रहते हैं। डर की दुकानें यहां भी लगती हैं। ये दुकानें परंपरागत कही जा सकती हंै। नास्तिक की नजर में धर्मानुभव भक्त्यानुभव उस अनजाने-अनकहे डर के आगे दिलासा देने वाले मानवकृत उपाय हंै जो सबके जीवन में आदतन रहते हैं। धर्ममूलक चैनलों में भक्ति या धर्म भावना किसी भव्य लीला की तरह, तमाशे की तरह दी जाती है। इन चैनलों में रोज प्रवचनादि करने वाले सैकड़ों बाबा लोग बहुत सजे-धजे चमकदार सिंहासन पर शोभित होते हैं। अच्छे सांउड सिस्टम होते हैं। सामने उनके मघ्यवर्गीय खाते-पीते घरों के शिष्य गण, आगंतुक श्रद्धालु जन बैठे होते हैं। उनमें से अनेक बाबा जी के विशेष पंथ में दीक्षित तक होते हैं। गंडा ताबीज बंधाते हैं, कथामृत-उपदेशामृत का पान करते रहते हैं। कीर्तन और गाने बजाने पर नाच उठते हैं। ये चैनल धर्म के इस कारोबार में खासी कमाई करते हैं और इन दिनों महत्वपूर्ण बाबाओं के लाइव टेलिकास्ट भी किया करते हैं। इनके कैमरामैन सुंदर चेहरों की आ॓र युवतियों की आ॓र खास मौकों पर फोकस किया करते हैं। इनमें कथारस तो नाम मात्र को रहता है। गीत-संगीत, नाच-गाने ज्यादा रहते हैं। बाबा लोग, उनकी संगीत मंडली फिल्मी गानों की धुन पर भजनादि गाती रहती हैं अब तो ऐसे चैनल ‘बॉडी फिटनेस’ के, ‘जिम’ के सामान और ब्यूटी प्रसाधनों के विज्ञापन भी देने लगे हैं। इस तरह की इनकी धर्म विषयक लीलाएं अपने लीला रूप में डर का निर्माण करते-करते भी आनंदकारी और कई बार कॉमिक तमाशा लगा करती हैं।
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rajesh chandra
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3:37 PM
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हाशिए पर सिमटे समाज सुधार आंदोलन
भारत डोगरा
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rajesh chandra
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3:30 PM
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लेबल: विचार और संघर्ष, सामाजिक आन्दोलन
Friday, August 8, 2008
यह तो महात्मा गांधी का रास्ता नहीं
रायपुर में छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम, 2005 की वापसी तथा इस अधिनियम के तहत गिरफ्तार तमाम निर्दोष लोगों, जैसे डॉ. विनायक सेन, अजय टीजी, साई रेड्डी, आदि, की रिहाई हेतु आयोजित दस दिवसीय उपवास पर एक लेख के माध्यम से छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक एवं साहित्यकार विश्वरंजन ने टिप्पणी की है कि यदि गांधी आज जीवित होते तो शायद बस्तर के जंगलों में अकेले जा कर माओवादियों से कहते कि, 'मित्र! हिंसा छोड़ो, जो तुमसे असहमत हैं, उन्हें मारना छोड़ो, हम तुम्हें अब नहीं मारने देंगे. तुम्हे आदिवासियों को मारने के पूर्व हमें मारना पड़ेगा. हम उफ्फ तक नहीं करेंगे. हम हाथ तक नहीं उठाएंगे...
यह बात तो विश्वरंजन जी भी स्वीकार करेंगे कि राज्य की जो पुलिस व सेना के रूप में हिंसक शक्ति है वह नक्सलवादियों या किसी भी गैर राज्य हिंसक शक्ति से बड़ी है। विश्वरंजन जी जो बात गांधी के मुंह से गांधीवादियों के लिए कहलवाना चाहते हैं वही बात हम विश्वरंजन जी की पुलिस व उसके द्वारा समर्थित 'सलवा जुडूम नामक गैर संवैधानिक सशस्त्र बल के लिए कहना चाहेंगे। विश्वरंजन जी के अनुसार गांधी किसी भी हालत में उस समूह के साथ नहीं खड़े होते जिसका बुनियादी फलसफा हिंसा और आतंक पर टिका हुआ है। इसीलिए हम विश्वरंजन साहब को बताना चाहते हैं कि हम उनकी पुलिस, सलवा जुडूम व उनकी सरकार के साथ नहीं खड़े हैं.
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rajesh chandra
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3:38 PM
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लेबल: छत्तीसगढ़, नक्सलवाद, सलवा जुडूम
Thursday, August 7, 2008
जीवित रहेगा नक्सलवाद
महाश्वेता देवी
नक्सलवाद की प्रासंगिकता और इसके प्रति जन रूझानों में कोई कमी नहीं आई है। लगता है, 70 के दशक से कहीं अधिक इसकी जरूरत आज है। विगत 10–15 सालों में भूखे, गरीबों की संख्या में लगातार इजाफा हुआ है। राजनीतिक–आर्थिक तंत्र पूरी तरह अमीरों के हवाले हैं। यह आंदोलन और आगे बढ़ेगा, क्योंकि वर्तमान व्यवस्था में बहुसंख्यक लोग हाशिये पर खड़े हैं और उनका तीमारदार कोई नहीं है। सरकार भी मान रही है कि नक्सलवाद का प्रसार लगातार बढ़ रहा है और अभी यह देश के एक-तिहाई से अधिक क्षेत्रों में अपनी जड़ें जमा चुका है, लेकिन सरकार नक्सलवाद को लेकर हमेशा यह दुविधा पालती रही है कि इसे कानून-व्यवस्था की समस्या माना जाए या सामाजिक–आर्थिक समस्या। समस्या यह है कि सरकार नक्सलियों के दमन की नीति पर चलती रही और उन समस्याओं पर बिल्कुल गौर नहीं किया, जिनके आलोक में नक्सलवाद का उदय हुआ था।
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2:57 PM
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लेबल: आज का वाम कल का वाम, नक्सलवाद
लालू से बेहाल लाल
सुरेन्द्र किशोर
बिहार–झारखंड में वाम दल, खासकर भाकपा–माकपा पहले ही कमजोर हो चुके थे। अब राजद जैसे मजबूत दल का सहारा छिन जाने के बाद तो इन दो राज्यों में उनका चुनावी भविष्य और भी अनिश्चित हो गया है। पूरे हिंदी इलाके में से सिर्फ झारखंड से सीपीआई के एक प्रतिनिधि मौजूदा लोकसभा में हैं। जबकि सन् 1991 के चुनाव में सीपीआई के अविभाजित बिहार से लोकसभा के लिए आठ सदस्य चुने गए थे। ऐसा लालू प्रसाद के जनता दल के साथ सीपीआई के चुनावी तालमेल के कारण ही संभव हो सका था। विधायिकाओं में वाम दलों की ताकत, राजद के साथ तालमेल पर निर्भर रहने लगा है। साथ ही खुद राजद की बढ़ती– घटती राजनीतिक ताकत का असर भी वामपंथियों पर पडा़ है। अब तो फिलहाल कोई तालमेल है ही नहीं। लोकसभा में हाल के विश्वास मत प्रकरण के बाद तो वाम दल राजद से कट गए हैं।
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कल का वाम
वामपंथ ने जब से यूपीए सरकार से अपना समर्थन वापस लिया है और खासतौर पर मनमोहन सिंह की सरकार ने जब से वामपंथ के बिना ही लोकसभा में अपना बहुमत साबित किया है, उसके बाद से ही वामपंथ के लिए जोर-जोर से शोक गीत पढ़े जाने की शुरूआत हो गयी है। एक आ॓र यूपीए सरकार को उकसाया जा रहा है कि वामपंथ के अंकुश से बरी होने के बाद, निर्द्वन्द्व होकर नव-उदारवादी रास्ते पर सरपट दौड़ चले। दूसरी आ॓र वामपंथ को समझाया जा रहा है कि इस विफलता से सबक ले कि आर्थिक नीतियों से लेकर विदेश नीति तक, विभिन्न क्षेत्रों में नव-उदारवादी नीतियों का विरोध करेगा तो घाटे में रहेगा। इन दोनों ही फतवों में एक बात समान है। ये फतवे देने वाले यह भूल जाते हैं कि यह झगडा़ सिर्फ वामपंथ बनाम अन्य का आपसी मामला नहीं है। इसमें इस देश की जनता का भी दखल है बल्कि अंतत: तो उसी को फैसला करना है। जनता की यह सत्ता ही वामपंथ के शोक गीत पढ़ने वालों को गलत साबित करते हुए आने वाले दिनों में वामपंथ की बढ़ती प्रासंगिकता साबित करने जा रही है।
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Tuesday, August 5, 2008
राष्ट्रीय राजनीति की अपूरणीय क्षति
राजेन्द्र शर्मा
कामरेड हरकिशनसिंह सुरजीत नहीं रहे। राष्ट्रीय राजनीति के चाणक्य कहलाने वाले सुरजीत, पिछले कुछ महीनों से अस्वस्थ थे। उनके निधन के साथ भारतीय राजनीति के उस दौर का अंत हो गया है, जिसमें देश की प्रमुख राजनीतिक शक्तियों का नेतृत्व ब्रिटिश हुकूमत से देश की आजादी की लड़ाई की आंच में तप कर राजनीति में आए लोगों के हाथों में था।
23 मार्च 1916 को जालंधर जिले के अंतर्गत रोपोवाल गांव में जन्मे सुरजीत, स्कूल के जमाने में ही राष्ट्रीय आंदोलन में कूद पड़े थे। 1931 में वह भगतसिंह और उनके साथियों द्वारा स्थापित ‘नौजवान भारत सभा’ में शामिल हो गए। 1932 के मार्च के महीने में होशियारपुर में जिला अदालत पर, पुलिस के देखते ही गोली मारने के आदेश के बावजूद, राष्ट्रीय झंडा फहराने के असाधारण साहस के लिए, उन्हें पहली बार जेल भेजा गया। इसके बाद, शासन के दमन के बावजूद देश व जनता के हित में संघर्षों का जो सिलसिला शुरू हुआ, उनके आठ दशक लंबे राजनीतिक जीवन में बराबर जारी रहा। उन्होंने ब्रिटिश राज में आठ साल जेल में गुजारे और दो साल आजादी के बाद कांग्रेसी शासन की जेलों में।
1934 में कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हुए सुरजीत, कम्युनिस्टों की उस धारा से थे, जिसने स्वतंत्रता के लिए संघर्ष से शुरूआत की थी और आजादी को बहुजन हित के रूप में परिभाषित करते हुए, कांग्रेस, वर्कर्स एंड पीजेंट्स मंच, कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी से होते हुए, कम्युनिस्ट पार्टी तक की अपनी यात्रा पूरी की थी। इस विकास यात्रा ने कम्युनिस्टों की इस पीढ़ी को दो असाधारण गुण दिए थे। जनता के ठोस संघर्षों के बीच से रास्ता तलाश करना और मौजूदा शक्तियों की ठोस सचाई को ध्यान में रखकर, आगे बढ़ना। इसने कठोर परिस्थितियों में मार्क्सवाद के ठोस व्यवहार की जो सामर्थ्य सुरजीत में पैदा की थी, वह देश के कम्युनिस्ट आंदोलन में भी बहुत दुर्लभ थी।
यह इसके बावजूद है, कि उनकी औपचारिक शिक्षा-दीक्षा कम ही हुई थी और मार्क्सवाद तथा राजनीति पर उनकी गहरी पकड़, मुख्यत: स्वाध्याय तथा आंदोलन व जीवन के अनुभवों पर ही आधारित थी। यह जानकर किसी को भी अचरज होगा कि कम औपचारिक शिक्षा के बावजूद, सुरजीत अपने लंबे राजनीतिक जीवन के अधिकांश हिस्से में कम्युनिस्ट पत्र-पत्रिकाओं के संपादन से घनिष्ठ रूप से जुड़े रहे। वह सीपीआई (एम) की केंद्रीय कमेटी के हिंदी मुखपत्र ‘लोकलहर’ के संस्थापक-संपादक थे।
किसान आंदोलन तथा किसान संगठन के रास्ते कम्युनिस्ट आंदोलन में आगे बढ़ते हुए सुरजीत, 1954 की जनवरी में अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी की तीसरी कांग्रेस में ही पार्टी के पोलित ब्यूरो के लिए चुन लिए गए थे। तभी से कम्युनिस्ट आंदोलन में उनकी नेतृत्वकारी भूमिका रही थी और 1964 में पार्टी में विभाजन के बाद सीपीआई(एम) के गठन तथा मार्गदर्शन में उनकी और भी प्रमुख भूमिका रही थी। इसके बावजूद, इमर्जेंसी के बाद 1978 में सीपीआई(एम) की जालंधर कांग्रेस ने जब जनसंघर्षों व आंदोलनों के हित में पूंजीवादी पार्टियों के आपसी अंतर्विरोधों का उपयोग करने की कार्यनीति तय की, अन्य राजनीतिक शक्तियों के नेताओं तक उनकी सहज पहुंच ने, सुरजीत को राष्ट्रीय राजनीति में कम्युनिस्टों के हस्तक्षेप के लिए और महत्वपूर्ण बना दिया।
केंद्र मे सत्ता पर कांग्रेस की इजारेदारी तोड़ने से लेकर, पहले वीपी सिंह की सरकार और उसके बाद देवगौड़ा व गुजराल की संयुक्त मोर्चा सरकारों के गठन तक, सुरजीत के नेतृत्व में वामपंथ ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। सांप्रदायिकता के बढ़ते खतरे के संदर्भ में, बाहर से वामपंथ के समर्थन पर टिकी यूपीए सरकार के गठन में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। उनके निधन से सिर्फ कम्युनिस्ट आंदोलन की ही नहीं, राष्ट्रीय राजनीति की जो भारी क्षति हुई है, उसे भरने के लिए उनके कद का कोई दूसरा नेता अब शायद ही सामने आ सकेगा।
http://www.rashtriyasahara.com/ से साभार
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rajesh chandra
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लोकतंत्र की विचारधारा का विस्तार और विस्फोट
अनिल चमड़िया
भाजपा शासित बंगलूरू और अहमदाबाद में बम विस्फोट की घटनाएं और सूरत में बम विस्फोट की बड़े पैमाने पर तैयारी ने कुछ अहम सवाल खड़े किए हैं। पहली बात तो इन घटनाओं के बाद जिस तरह की राजनीतिक प्रतिक्रियाएं हुई हैं वे पिछली तमाम ऐसी घटनाओं से बिल्कुल भिन्न हैं । भाजपा की सुषमा स्वराज ने कहा है कि ये विस्फोट सुनियोजित हैं। उन्होंने विश्वास मत प्रकरण में पैसे देकर वोट खरीदने और अमेरिकी परस्त छवि से ध्यान हटाने के उद्देश्य से विस्फोट किए गए बताया है। पहली बार हुआ है कि विस्फोटों में पाकिस्तान और बांग्लादेश की तरफ इशारा करके उनकी भूमिका की तरफ उंगुली नहीं उठाई गई है। बल्कि इससे उलट कहा गया कि अमेरिकी परस्त छवि से मुस्लिम मतदाताओं में पसरी नाजरागी को भुलाकर धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक समीकरणों की तरफ मुस्लिमों को खींचने की कोशिश की गई है। पहला सवाल है कि पहले जितने विस्फोट हुए उनमें से किसी को भी सुनियोजित क्यों नहीं माना जाए? संभव है उन्हें भी किसी बात से ध्यान हटाने के लिए ही अंजाम दिया गया हो? दूसरा कि क्या राजनीति का इतना पतन हो चुका है कि किसी नकारात्मक रूख को दूसरी दिशा में मोड़ने के लिए किसी भी स्तर पर जाया जा सकता है? क्या राजनीति ने अपने हितों के लिए हिंसक गिरोह खड़े कर लिये हैं? इन विस्फोटों को साजिशन बताकर जिस तरफ इशारा किया जा रहा है यदि उसकी समझ सही है तो देश के लोगों के सामने क्या चारा रह जाता है? भूमंडलीकरण के दौर में आतंकवाद की राजनीति जिस साजिश के तहत विस्तारित हुई है इसकी जड़ें कितनी दूर तक और गहरे फैली हुई हैं?
ये सवाल तो सुषमा स्वराज की प्रतिक्रिया से सीधे खड़े होते हैं। लेकिन इन सवालों के विपरीत दिशा में भी सवाल खड़े होते हैं। भाजपा शासित राज्यों में ही ये विस्फोट क्यों? इन राज्यों से पहले जयपुर में भी इसी तरह विस्फोट हुए। क्या इन विस्फोटों को भाजपा को बदनाम करने की साजिश के बजाय इस तरह भी देखा जाए कि भाजपा की गतिविधियों ने आम जन जीवन को बेहद असुरक्षित बना दिया है? भाजपा की साम्प्रदायिक राजनीति से लोगों में असुरक्षा बोध बढ़ा है। अपने ऊपर उठते सवालों को लेकर वह चितित हो गई है और खुद को सुरक्षित करना अपनी प्राथमिकता समझने लगी है। यह महज संयोग तो नहीं हो सकता है कि गोधरा की ट्रेन आगजनी की घटना के बाद जिस तरह से गुजरात के मुख्यमंत्री ने सेना को बुलाने में कोताही बरती वहीं नरेन्द्र मोदी ने इन विस्फोटों के बाद आधे घंटे के अंदर सेना बुला ली और प्रतिक्रिया की भाषा में बात करने के बजाय लोगों से अमन चैन बनाए रखने की अपील के लिए दौड़ पड़े। अहमदाबाद में विस्फोट से पहले इसका दावा ठोकने वाले ने ईमेल के जरिये इसकी वजह 2002 के मुस्लिम विरोधी दंगों को बताया । बाबरी मस्जिद को गिराए जाने के बाद ही मुंबई में विस्फोट की घटनाएं हुई थीं।
देश एक गंभीर स्थिति में हैं। तत्काल राजनीतिक फायदे के लिए जो कुछ किया जाता है उससे सत्ता तो प्राप्त हो सकती है लेकिन उससे जो राजनीतिक प्रवृत्ति स्थापित होती है उसके गंभीर परिणाम देश को भुगतने पड़ते हैं। देश के गृह राज्य मंत्री प्रकाश जायसवाल ने कहा है कि विस्फोट गुजरात दंगों की प्रतिक्रिया है। पंजाब में स्वर्ण मंदिर में ब्लू स्टार आपरेशन के बाद इंदिरा गांधी की हत्या की घटना और उसके बाद हुई हिसा को राजीव गांधी ने पेड़ के उखड़ने पर धरती के हिलने की भाषा में प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। पंजाब को अब तक शांत मानकर बैठा नहीं जा सकता है। यदि ऐसी तमाम घटनाओं को इस दिशा में देखा जाए कि क्या आतंकवाद का विस्तार लोकतंत्र के संकुचन और वर्चस्व की राजनीति स्थापित करने की योजना से जुड़ा हुआ है? देश में जिन घटनाओं को आतंकवाद की श्रेणी में रखकर बात की जाती है वह अल्पसंख्यकों से जुड़ी राजनीति के इर्द-गिर्द दिखाई देती है। देश में अल्पसंख्यकों की आमतौर पर सत्ता से शिकायत रही है। न केवल सत्ता मशीनरियों के उनके खिलाफ हमलों को लेकर, बल्कि उनके खिलाफ हमलों के बाद न्याय नहीं मिलने को लेकर भी। पिछले दिनों से यह भी देखा जा रहा है कि नक्सलवाद एवं माआ॓वाद को भी आतंकवाद की श्रेणी में शामिल करने की कोशिश हुई है। इन नक्सलवादियों और माआ॓वादियों के साथ कौन हैं? आखिर देश के दलितों के किसी छोटे से भी हिस्से को हथियार उठाने की जरूरत क्यों पड़ती है? सत्ता अपने भारी-भरकम बल के बूते हमले कर सकती है तो हमले के शिकार लोगों के सामने क्या चारा रह जाता है?
भारत को गणतांत्रिक बनाए रखना इसके बने रहने की अनिवार्यता से जुड़ा है। लेकिन राजनीतिक पार्टियों ने लोकतंत्र को सत्ता में बने रहने से जोड़ दिया है और उसके लिए उन्हें बहुसंख्यक और वर्चस्ववादी समूहों की राजनीति तक समेट कर रख दिया है। ये बात सभी संसदीय पार्टियों की विचारधारा के रूप में स्थापित हो चुकी है। हर राजनीतिक पार्टी लोकतंत्र के विस्तार के बजाय लोकतंत्र की सुरक्षा पर जिस तरह से जोर देती है उस पर गौर करने की जरूरत है। अब विस्फोटों की घटना के बाद मुख्यत: दो तरह की मांग सामने आती है। एक के द्वारा संघीय जांच एजेंसी बनाने की होती है तो दूसरे के द्वारा कठोर कानून बनाने की मांग दोहरायी जाती है। इन मांगों में क्या दिखाई देता है? संघीय जांच एजेंसी के क्या मायने है? गणतंत्र में राज्यों के अधीन कानून एवं व्यवस्था की मशीनरी होती है। आखिर केन्द्र विस्फोटों के बाद राज्य की इस ताकत को ही अपने हाथों में लेने पर क्यों जोर देता है? इससे लोकतंत्र का विस्तार कहां जुड़ा है? लोकतंत्र का विस्तार तो राज्यों को मजबूत करने से जुड़ा है, राज्यों के बीच ताममेल की संस्कृति को बढ़ाने से जुड़ा है। केन्द्र ऐसी घटनाओं के पीछे भारतीय दंड विधान की धाराओं से देखने की ही ष्टि क्यों अपनाता है? दूसरा, कठोर कानून का क्या अर्थ है? कानून के साथ लगे कठोर के विशेषण को खोलकर क्यों नहीं बताया जाता है कि गणतांत्रिक व्यवस्था में न्यायिक प्रक्रिया का जो ढांचा खड़ा है उसे सत्ता द्वारा तोड़ना शामिल है। टाडा और पोटा का सीधा अर्थ क्या है? पुलिस किसी वर्ग या जाति को अपने डंडों के बूते डरा धमकाकर रखे। लेकिन इससे लोकतंत्र मजबूत नहीं हो सकता है। बल्कि इसमें लोकतंत्र में असुरक्षा के भाव का विस्तार हो जाता है। अल्पसंख्यकों के अंदर से निकल बहुसंख्यकों के दबे-कुचले हिस्से तक में सत्ता के भय और असुरक्षा का विस्तार हो जाता है।
देश में विस्फोटों की घटनाओं को अब तक जिस तरह से देखा जा रहा है उसने कई राजनीतिक सवाल खड़े किए हैं। इससे पहले महाराष्ट्र में विस्फोट की घटनाओं ने इस माइंड सेट को तोडा था कि इनमें केवल अल्पसंख्यकों के समूहों के बीच के लोग होते हैं। वहां हिन्दुओं के दस्तों की भूमिका पाई गई थी। विस्फोट की घटनाओं को आतंकवाद की अमेरिकी परिभाषा और भारतीय दंड विधान के नजरिये से देखने के बजाय लोकतंत्र के विस्तार पर कुंडली मारकर बैठने वाली राजनीति को समझने की दृष्टि से भी देखने की कोशिश की जानी चाहिए। सत्ता द्वारा आतंकवाद की घटनाओं को अपनी निरकुंशता मजबूत करने का बहाना बनाने की कोशिशों पर अंकुश लगाना चाहिए।
www.rashtriyasahara.com से साभार
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rajesh chandra
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3:22 PM
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